Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 451–460

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवैदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म - साम - मयी —— वेदनिरुक्तिः

पृष्ठ 452

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा वैदनिरुक्तिः -६

पृष्ठ 453

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III

पृष्ठ 454

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्मा - ज्योतिः - प्रतिष्ठा - लक्षणा वेदनिरुक्तिः ६ आत्मा मूलवेद -- प्रकरण का श्रारम्भ करते हुए हमने श्रात्मा को सच्चिदानन्दघन बतलाया है । इस के अतिरिक्त सृष्टिसाक्षी आत्मा को मनः प्राणवाङमय कहा है । साथ ही में मन को ज्ञानशक्तिमय, प्राण तीनों पर्वों में को क्रियाशक्तिमय, एवं वाक् को अर्थशक्तिमयी बतलाया है । सृष्टिसाक्षी श्रात्मा के पदार्थ इन ही अर्थप्रपञ्च क्रमशः श्रानन्द-- विज्ञान सत्ता इन तीनों पर्वों का विकास रहता है । नामरूपकम्मत्मिक इत्यादि वाक्यों है । इस अर्थ, किंवा पदार्थ के आधार पर सत्तातत्त्व विकसित रहता है । घटोऽस्ति, पटोऽस्ति, सत्ता ' है । में घट - पट आदि पदार्थ नामरूपकम्मत्मिक हैं, अस्तिभाग सत्ता है । मनः प्राण - वाक की समष्टि ही तो ' का रूपभाग, कर्म्मभाग -- " नामभाग इस सत्ता के ' मनोभाग, प्रारणभाग, वाग्भाग से ही तो अर्थ का अभिनय होता अनुगृहीत रहता है । सत्ता के ( अस्तित्त्व के ) आश्रय से ही नामरूप कम्मत्मिक पदार्थों के अर्थरूप वाग्भाग है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, श्रात्मा के सत्ताभाग का सृष्टिसाक्षी आत्मा यही प्राणभाग ( त्रिवृद्वाग्भाग ) पर ही विकास होता है । दूसरा पर्व है त्रिवृत्प्राण । यह क्रियाशक्तिमय आनन्द है । की विकास--चेतना की विकासभूमि है । तीसरा त्रिवृत् मन है । यह ज्ञानशक्तिमय है । यही मनोभाग भूमि है । ज्ञान से ही श्रानन्द विकसित होता है । रहता प्रकारान्तर से यों समझिए कि प्रत्येक ज्ञान में प्रज्ञा - प्राणभूत इन तीन मात्राओं का समावेश । इन में है, जैसा कि आगे विस्तार से बतलाया जाने वाला है । प्रज्ञा मन है, प्राण प्राण है, भूत वाक् है है, इन्द्रियवृत्ति वाक् विषय है, प्राण इन्द्रियवृत्ति है, मन इन्द्रियाधिष्ठाता प्रज्ञान है । विषय सत्ता से अनुगृहीत कह सकते चेतना से अनुग्रहीत है, प्रज्ञान श्रानन्द से अनुग्रहीत है । इसी आधार पर मन को श्रानन्दात्मक हैं, प्राण को चेतनात्मक कह सकते हैं, एवं वाक् को सत्तात्मिका कहा जासकता है । रसो ह्येव सः । रसं यद्यपि आनन्द - चेतना - सत्ता, मनः प्राण - वाक्, ये सभी श्रात्मविवर्त्त हैं । फिर भी " सिद्धान्त के अनुसार रसरूप रसप्रधान ) आनन्द को ही ह्येषायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति " इस औपनिषद' ( शा ० सू ० १११।१२ ) । इस श्रानन्द की विकासभूमि हम मुख्य श्रात्मा कहेंगे - आनन्दमयोऽभ्यासात् मन को आत्मा कह सकते हैं । ज्ञानशक्तिमय मन ही है । ऐसी दशा में हम श्रानन्दात्मक ज्ञानमूत्ति इस को ही " रसवेद ” वेदतत्त्वमीमांसासम्मता परिभाषा के अनुसार श्रानन्दात्मक इस विवत्तों मनोमय का विकास आत्मा हुआ है । श्रानन्दात्मक कहा जाता है । इसी के रसन ( प्रखनवण ) से आगे के सम्पूर्ण १३७

पृष्ठ 455

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड श्रात्म - ज्योति प्रतिष्ठा - वेदनिरुक्ति सत्तात्मिका हैं । चेतनात्मक क्रियाशक्तिघन प्राण, एवं मनोमय आत्मा की मात्रा ले ले कर ही सब उपजीवित प्राणविभूति को भी ही विभूतियाँ हैं । चेतना ज्योति है, प्रकाश । तद्युक्त अर्थशक्तिघना वाक् इस आत्मा की कह सकते हैं । सत्ता प्रतिष्ठातत्त्व है । ' अस्ति ' यही तो प्रतिष्ठा है । हम चेतनाविकासभूमि के कारण ज्योति कहलाता है । इसप्रकार श्रानन्दात्मक मनोमय श्रात्मा, अस्तित्त्व का मिटना ही तो प्रतिष्ठा का उखड़ना एक ही आत्मा के तीन विवर्त्त हो-, सत्तात्मिका वाङ प्रतिष्ठा के भेद से चेतनात्मिका प्राणमयी ज्योति जाते हैं 15 कहा जाता है, एवं जिस मौलिक तत्व की मूर्ति को छन्दोवेद कहा जाता है, मण्डल को है । वितानवेद रसवेद यजुर्वेद है, विज्ञानवेद सामवेद है, छन्दोवेद मूर्ति एवं मण्डल होता है, उसे रसवेद कहा से जाता दिग्दर्शन कराया जाने वाला है । अभी इस सम्बन्ध में हमें ऋग्वेद है । इन तीनों का आगे विस्तार आत्मा रसरूप होने से ' यजुर्वेद ' है । ज्योति का ही वितान केवल यही कहना है कि, रसस्थानीय पूर्वोक्त । अतः आत्मा की इस ज्योतिर्विभूति को हम सामवेद कह सकते हैं । होता है 1 । यही मण्डल में परिणत होती है । मूर्त्ति ही ऋग्वेद है । फलतः आत्मा की इस प्रतिष्ठाविभूति प्रतिष्ठा ही मूर्ति की स्वरूपसम्पादिका है आत्मा - ज्योति - प्रतिष्ठा के भेद से विभूतियुक्त आत्मा में तीनों का ऋग्वेदत्त्व सिद्ध होजाता है 1 । इसप्रकार वेदों का उपभोग सिद्ध होजाता है । ) १ - श्रानन्दः -- ज्ञानशक्तिमयं मनः ( आनन्दविकासभूमिः भूमिः ) । २ - चेतना -- क्रियाशक्तिमयः प्राणः ' चेतनाविकास ) । ३ - सत्ता ------ अर्थशक्तिमयी वाकू ( सत्ताविकासभूमिः १- श्रानन्दात्मको मनोमय श्रात्मा श्रात्मा २- चेतनात्मकः प्राणमय श्रात्मा ज्योतिः १३- सत्तात्मको वाङमय आत्मा - प्रतिष्ठा dssassinled - ds 125 15957 e ) 1981 $ 15 PER 5831 $ 153 9185 ) fs FP ( METERS ) ) 15 1315 S1 181858 és मे 6 sse en i stugs & क --- रसवेदः ) -- यजुर्वेदः १ - आनन्दात्मको मनोमय आत्मा - आत्मा --- ( श्रात्मदेवः - वितानवेदः ) -सामवेदः २ – चेतनात्मकः प्राणमय आत्मा -- ज्योतिः -- ज्योतिर्वेदः - ( प्रतिष्ठावेद: -छन्दोवेदः ) ऋग्वेदः १३- सत्तात्मको वाङमय आत्मा - प्रतिष्ठा १३८ म

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका श्रात्म - ज्योति प्रतिष्ठा - वेदनिरुक्तिः तीनों हीं त्रिवृद्भावापन्न हैं । अर्थात् मनोमय पाठक यह न भूले होंगे कि आत्मकलारूप मनः प्राण - वाकू है, एवं वाङ् मय श्रात्मा भी मन: --आत्मा भी मनःप्राणवाङमय है, प्राणमय आत्मा भी मनःप्राणवाङमय यजुर्वेद, ज्योतिर्लक्षण सामवेद, प्रतिष्ठालक्षगा प्राणवाङमय है । इसी त्रिवृद्भाव के कारण । आत्मलक्षण इन तीनों विवत्तों का ' ईशोपनिद्विज्ञादभाष्य - द्वितीयखण्ड ऋग्वेद, इन तीनों वेदों का उपभोग होजाता है जाचुका है । विशेष जिज्ञासुत्रों को वही प्रकरण के ‘ त्रयीवेदनिरुक्ति ' प्रकरण में विस्तार से निरूपण पृष्ठ किया से ३० पर्य्यन्त ) । यहाँ प्रकरणसङ्गति के लिए इन देखना चाहिए - ( देखिए ई ० उ ० वि ० भा ० दि ० ख ० -वेदविवर्त्ती का नामोल्लेखमात्र कर दिया जाता है । १ - श्रात्मवेदः ( यजुर्वेदः ) -कहा गया है । नन्दगर्भित यह मनोमय आत्मा त्रिवृद्भाव आनन्दात्मक मनोमय तत्त्व को आत्मा भौतिक विश्व के उक्थ - ब्रह्म- साम हैं । के कारण मनः-- प्राण - वाङ मय है । ये ही तीनों श्रात्मविवर्त्त साम है । श्रात्मा का यह उक्थभाग ऋक् मनोमयी वाक् उक्थ है, मनोमय प्राण ब्रह्म है, मनोमय मन में हमने वाक् को साम माना है, प्राण को ब्रह्म है, ब्रह्मभाग यजुः है, सामभाग साम है । उपनिषद्भाष्य को उक्थ, एवं मन को साम बतलाया जारहा है । माना है, मन को उक्थ माना है । एवं प्रकृत में वाक् की प्रधानता है, यहाँ ज्ञानमय श्रानन्द की प्रधानता इस में विरोध नहीं समझना चाहिए । वहाँ नामरूपक का अवसान है । इसीलिए वहाँ वाक् को साम है | नामरूपकर्म्म में नाम वाङमय है, इसी पर रूपकर्म्म है, इस लिए यहाँ आनन्द ही अवसान है । बतलाया गया है । यहाँ आनन्द ही अवसान है । मन को आनन्दमय साम कहा गया है । कहना यही है कि, उक्थ - ब्रह्म-मन आनन्दमय है, इसलिए यहाँ आनन्दमय मन श्रात्मवेद में हीं तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध साम - रूप से केवल श्रानन्दात्मक ( त्रिवृत् ) मनोमय यजुर्वेदमूर्त्ति होजाता है, जैसाकि निम्नलिखित परिलेख से स्पष्ट है-दत्रयोपभोगः । १ - तदित्थं श्रानन्दात्मके मनोमये आत्मलक्षणे यजुर्वेदे मनसस्त्रिवृद्भावाद्व १ - श्रानन्दगर्भिता मनोमयी वाक् -- उक्थम् ऋग्वेदः २- श्रानन्दगर्भितो मनोमयः प्राण - ब्रह्म - यजुर्वेदः १ - श्रात्मनेदत्रयी मनोमयी मनः १३- श्रानन्दगर्भितं मनोमयं मनः- साम- सामवेदः २- प्रतिष्ठावेदः ( ऋग्वेदः ) -ही सम्पूर्ण भूतों का उत्थान होता सत्तात्मक त्रिवृत् - वाक्प्रपञ्च ही प्रतिष्ठारूप ऋग्वेद है । वाकू से है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । यह सत्तात्मिका वाक्, किंवा वाङमयी सत्ता मनः- प्राण- वाक् है, प्राणमयी सत्ता असतोधृति के समन्वय से तीन भागों में विभक्त है । मनोमयी सत्ता आत्मधृति कहलाती १३६

पृष्ठ 457

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड आत्म - ज्योति प्रतिष्ठा - वेदनिरुक्तिः स्वतन्त्र अस्तित्व रखता कहलाती है, एवं बाङमयी सत्ता सतोधृति कहलाती है । प्रत्येक पदार्थ अपना है, एक तभीतक पदाथ स्वस्वरूप है । यही तत्तत् पदार्थ की सत्ता ( स्वभाव - स्वसत्ता ) है । जबतक स्वसत्ता लेकर सत् बन जाता है । पहिले घट प्रतिष्ठित है । यही स्वसत्ता श्रात्मधृति है । सत्ताशून्य पदार्थ अन्य की सत्ता गया है । मिट्टी से सत् घट में आने वाली सर्वथा असत् था । परन्तु आज वही मृत्सत्ता को लेकर सद्वत् बन पृथिवी पर, वस्त्र शरोर पर प्रतिष्ठित यही सत्ता असतोधृति है । यह प्राणमयी है । पुस्तक मेज पर मनुष्य ने , मनुष्य वस्त्र प्रतिष्ठित हैं । यही परसत्ता । सत् पदार्थ है । मेज - पृथ्वी- शरीर की प्रतिष्ठा से पुस्तक यह वाङयमयी है । आमधृति अन्य सत्पदार्थ की सता का अनुग्रह प्राप्त कर रक्खा है । यही सतोधृति है । तीन धृतियों के भेद से ऋग्वेद-ऋग्वेद है, असतोधृति यजुर्वेद है, एवं सतोधृति सामवेद है । इसप्रकार निम्न इन लिखित परिलेख से स्पष्ट है— मूर्ति प्रतिष्ठावेद में हीं तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध हो जाता है, जैसा कि २- तदित्थं सत्तात्मके वाङमये प्रतिष्ठालक्षणे ऋग्वेदे वाचस्त्रिवृद्भावाद्व दत्रयोपभोगः १ - सत्तागर्भितंः - वाङ्मयं मनः - श्रात्मधृतिः -- ऋग्वेदः २ } २ - सत्ता - गर्मितः - वाङ् मयः प्राण: - असतो धृतिः यजुर्वेदः - प्रतिष्ठावे दत्रयी वाङ मयी बाक् ३ - सत्ता - गर्भिता वाङ मयी बाक् - सतोधृतिः - सामवेदः * ३- ज्योतिर्वेदः ( सामवेदः ) -चेतनात्मक त्रिवृत् -- प्राणप्रपञ्च ही ज्योतिःस्वरूप सामवेद है । " सर्वं तेजः के भी सामरूपं तीन विवर्त्त ह शश्वत् होजाते " ( तै ० ना ० ३।१२।६ ) का यही तात्पर्य है । प्राण के त्रिवृत्करण से इस ज्योति से प्रसिद्ध हैं | मनोमयी-हैं । वे ही तीनों ज्योतियाँ कमशः ज्ञानज्योति, भूतज्योति, सत्यज्योति नामों विद्य त् - नक्षत्र-ज्योति ज्ञानज्योति है, यही आत्मज्योति है । प्राणमयी ज्योति भूतज्योति है । यह सूर्य्य - चन्द्र ० - २।२।१० ) के अग्नि भेद से पाँच भागों में विभक्त है । " तमेव भान्तुमनुभाति सर्वम् ” ( मुण्डक मनोमयी ज्ञानज्योति को अनुसार ज्ञानज्योति से ही यह भूतज्योति प्रकाशित रहती है, अत एव श्रात्मलक्षणा ” । “ ज्योतिषां ज्योतिः ” नाम से भी व्यवहृत किया गया है- “ तच्छुभ्र ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् भाति ( ज्ञान ) का बाङ ्ममयी ज्योति सत्यज्योति है । यह नाम - रूप -- भेद से दो भागों में विभक्त विषय बनते है । नाम हैं । से यही इस का ज्योति-उदय होता है । नाम - रूप के आधार पर ही तत्तद्विषय हमारी प्रतीति के सत्य नाम से व्यवहृत र्भाव है । " नामरूपे सत्यम् " ( शत ० १४ ४ ४ ३ ) के अनुसार नाम - रूप की समष्टि से सम्बोधित कर सकते हैं । हुई है । अतः हम इस ज्योति को अवश्य ही " सत्यज्योति " नाम माना है । याज्ञवल्क्योक्त याज्ञवल्क्यने इन तीनों ज्योतियों को पांच भागों में विभक्त मान कर पुरुष को पञ्चज्योति में सूर्य्य - चन्द्र-वे पाँचों ज्योतियाँ सूर्य्य - चन्द्र - अग्नि वाक् आत्मा, इन नामों से प्रसिद्ध हैं शत । ० इन १४/६/१ १/६ ) । अग्नि, ये तीनों भूतज्योतियाँ, हैं, वाक् सत्यज्योति है, श्रात्मा ज्ञानज्योति है -- ( देखिए सत्यज्योति सामवेद है । इस मनोमयी ज्ञानज्योति ऋग्वेद है, प्राणमयी भूतज्योति ययुर्वेद है, एवं वाङमयी सिद्ध हो जाता है, प्रकार तीन ज्योतियों के भेद से सामवेदमूर्त्ति ज्योतिर्वेद में ही इन तीनों वेदों का उपभोग जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट है-१४०

पृष्ठ 458

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उपनिषद्भूमिका श्रात्म - ज्योति प्रतिष्ठा - वेदनिरुक्तिः वेदनिरुक्तो त्रिवृाभावाद्व दत्रयोपभोगः । ज्योतिर्लक्षणे सामवेदे प्राणस्य ३ - तदित्थं चेतनात्मके प्राणमये - ज्ञानज्योतिः - ऋग्वेदः १ - चेतनागर्भितं प्राणमयं मनः ३ प्राणः - भूतज्योति: - यजुर्वेदः २ - चेतनागर्भितः प्राणमयः प्राणः — ज्योतिवदत्रयी प्राणमयी -वाक् - सत्यज्योतिः - सामवेदः ३ – चेतनागर्भिता प्राणमयी है । मूलवेद में ही अन्तर्भाव होजाता उक्त श्रात्मवेद का सच्चिदानन्दरूप बन कर व्याप्त हो-आत्म - ज्योति - प्रष्ठिा - लक्षण है । यही तीन रूपों से सर्वत्र सबकुछ है, आत्मा श्रानन्द प्रष्ठिा सत्ता है, ज्योति चेतना रहा है । १ - श्रात्मवेदः. यजुर्वेदः . आनन्दः..... आनन्द: --१२ – प्रतिष्ठावेदः. ऋग्वेदः ... सत्ता...... सत्... — सच्चिदानन्दमूर्त्तिवेदः ३ -- ज्योतिर्वेदः.. .चेतना....... ...... चित्.... सामवेदः 11: उक्थवेद..... १ - उक्थम्........... ऋग्वेदः ३ १ २- ब्रह्म. ..ब्रह्मवेद: -... .यजुर्वेदः -आत्मवेदो वेदत्रयात्मकः - यजुर्वेदः श्रानन्दः ३- सामः.. ..सामवेद: -.. . सामवेद: . १ - आत्मा....... आत्मवृतिवेदः २. सत्ता २ – धृतिः....... असतोधृतिवेदः-ऋग्वेदः २ यजुर्वेदः --प्रतिष्ठावेदो वेदत्रयात्मकः - ऋग्वेदः ३ - विघृतिः ……………..सतोधृतिवेद: -. सामवेदः १४१

पृष्ठ 459

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प्रथमखण्ड श्रात्म - ज्योति प्रतिष्ठा - वेद निरुक्तिः १ - श्रात्मा... ज्ञानज्योतिर्वेद:-.... ऋग्वेदः ३ चेतना २ - भृतानि.... भूतज्योतिवद: -.... यजुर्वेदः -ज्योतिव दो - वेदत्रयात्मकः -- सामवेदः ३ - नामरूपे.... सत्यज्योतिवेदः -.... सामवेदः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ६ १४२

पृष्ठ 460

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II FIRE - TIE