श्रीगणेशाय नमः।

Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 461–470

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः " " "

पृष्ठ 462

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ' उपलब्धि - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ७

पृष्ठ 463

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पृष्ठ 464

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-I I ' उपलब्धि ' - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ७ कराया गया है, वह ईश्वर- जीव-जिस आत्मवेद का दिग्दर्शन है, जीव भी सच्चिदानन्द-पूर्व में श्रात्मा - प्रतिष्ठा - ज्योतिर्लक्षण है । दूसरे शब्दों में-- ईश्वर भी सच्चिदानन्दमूर्त्ति, आध्यात्मिक, जगत, इन तीन विवर्त्तो में सच्चिदानन्दमूर्त्ति विभक्त है । तीनों संस्थाएँ ह्रीं क्रमशः आधिदैविक - प्रतिष्ठा ज्योति का तार-मूर्ति है, एवं विश्व भी हैं । इन तीनों संस्थाओं के तीनों वेदों में केवल आत्म श्रात्मवेद प्रधान है, चेतना आधिभौतिक नामों से प्रसिद्ध सम्बन्ध रखने वाले ईश्वरीय वेद में आनन्दलक्षण सम्बन्ध रखने वाले जीववेद में तम्य है । श्राधिदैविकसंस्था, से तथा प्रतिष्ठावेद गौण हैं । आध्यात्मिकसंस्था से प्रतिष्ठावेद गौण है । आधि-एवं सत्ता - लक्षण ज्योतिर्वेद है, आनन्द, एवं सत्ता लक्षण ग्रात्मवेद और है । आनन्द एवं चेतनालक्षण चेतनालक्षण ज्योतिर्वेद प्रधान में सत्तालक्षण प्रतिष्ठावेद प्रधान है, ज्योति I द-से सम्बन्ध रखने वाले विश्ववेद । जीव चिन्मूर्त्ति भौतिकसंस्था हैं । ईश्वर आनन्दमूर्ति है, श्रात्मवेदमूर्ति अस्ति - भाति - प्रिय नाम से आत्मवेद और ज्योतिर्वेद गौण , प्रतिष्ठा व दमूर्त्ति हैं । ये ही तीनों संस्थाएँ क्रमशः है, उसीकी भाति है, उसी का मूर्त्ति है । विश्व सन्मूर्त्ति है, वही भाति है, वही प्रिय है ॥ उसी की अस्ति प्रसिद्ध हैं । वही अस्ति है ही उपलब्धिरूप आत्मलक्षरण वेद है । प्रिय है । इन तीनों की समष्टि तीनों का में अस्ति - भाति प्रिय इन कहा जाता है । इस उपलब्धि शब्दों में हमें प्रत्येक पदार्थ वस्तु की प्राप्ति को ही उपलब्धि सत्तालक्षण प्रतिष्ठावदे है । दूसरे उपलब्धि के का मुख्य आधार पदार्थ अस्तिमान् हैं । ये ही समन्वय है । इस उपलब्धि होती है । नामरूपात्मक घटपटादि उपलब्धि क्यों नहीं होती १, की अस्तिरूप से ही उपलब्धि तो इन की उपलब्धि होती है । शशशृङ्गादि की क्या होती है, अस्ति ही विषय बनते हैं । पदार्थ हैं, इसीलिए नहीं, ' यदि स्यादुपलभ्येत " । अस्ति की उपलब्धि " यही तो हमारी उपलब्धि उनकी सत्ता नहीं, अस्तित्त्व और अस्ति को पृथक नहीं किया जासकता । “ घटोऽस्ति " इस प्रकार से आका-उपलब्ध होती है । उपलब्धि हैं । अर्थात् हमारा ज्ञान “ घटोऽस्ति घटोप-यही तो हम जानते दिया जाय, तो का अभिनय है । घट है, का अभिमान करता है । यदि ज्ञान में से अस्ति निकाल करती हुई श्रुति रति बनकर । तो घटोपलब्धि । अस्ति एवं उपलब्धि के इसी तादात्म्यभाव का स्पष्टीकरण लब्धि का कोई स्वरूप ही न रहे कहती है-१४७

पृष्ठ 465

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वेदनिरुक्क़ौ प्रथमखण्ड उपलब्धि - वेदनिरुक्तिः नैव वाचा न मनसा प्राप्तु ं

शक्यो न चक्षुषा ।

अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १ ॥

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्वभावेन चोभयोः ।

अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ २ ॥

--कठ ० ६। २-१३ । नामरूपानुग्राहिणी यह अस्ति ही उपलब्धि का पहिला पर्व है । यही प्रतिष्ठालक्षण ऋग्वेद है । घट है, उसे हम जानते हैं, यह ज्ञानज्योति ही चेतना है । चेतना ज्योतिर्वेद है । जो बस्तु है, एवं जिसे हम जानते हैं, किंवा जिस का हमें ज्ञान होता है, सत्ता एवं ज्ञान का प्रतिष्ठारूप वही तत्त्व " रस " है । रस की मत्ता है, रस का ज्ञान है । रस ही प्रित्र है, यही श्रात्मा है, यही आनन्द लक्षण आत्मवेद है । श्रनन्द उपलब्धि का मुख्य पर्व ' है । जबतक वस्तुसत्ता, एवं वस्तुज्ञान से आनन्द नहीं आता, तबतक वह उपलब्धि कोईमूल्य नहीं रखती । श्रानन्द ही हमें प्रिय है । तभी तो दार्शनिक लोग इसे “ प्रिय ” नाम से सम्बोधित करते हैं । इसीलिए हम इसे उपलब्धि का मुख्य पर्व मानते हैं । इस मुख्योपलब्धि का आधार चेतनामय ज्ञान है । विद्यमान वस्तु भी बिना ज्ञान के श्रानन्दोपलब्धि का कारण नहीं बन सकती । इस ज्ञान की भी श्राधारभूमि सत्ता ही है । यदि वस्तु न हो तो ज्ञान किस का हो? । इसप्रकार इस दृष्टि से तो सत्ता सर्वमुख्य है, एवं उपलब्धि की दृष्टि से आनन्द सर्व मुख्य है । इसप्रकार सत्तोपलब्धि, चेतनोपलब्धि, एवं श्रानन्दोपलब्धि तीनों के समन्वय से ही उपलब्धि का उदय होता है । यही वेदत्रयीरूपा वेदोपलब्धि है । इतना स्मरण रखना चाहिए कि, इस उपलब्धिवेद की मूलप्रष्ठा नामरूपात्मक भौतिकभाग ही है । घटोऽस्ति में से यदि आप नामरूपकर्मात्मक भूतभाग पृथक् कर देंगे, तो वह विशुद्ध सत्ता सामान्यभाव में परिणत होती हुई, अतएव व्यापक एवं निराकार बनती हुई प्रतीतिलक्षणा उपलब्धिमर्यादा से बाहिर निकल जायगी । व्यापकसत्ता को उपलब्धिरूप में परिणत करना एकमात्र परिच्छिन्न मृत्युरूप साकार नामरूपकम्र्मात्मक भौतिक प्रपञ्च का ही काम है । यही अवस्था ज्ञान ( विषयज्ञान ) एवं आनन्द ( विषयानन्द ) की है । बिना भौतिकविषय के ज्ञान भी निर्विकल्पक, अतएव व्यापक निराकार बनता हुआ उपलब्धि से बाहिर हो जाता है । एवं भौतिक विषय के बिना आनन्द भी नित्यानन्द बनता हुआ, शान्त रूप में परिणत होता हुआ उपलब्धि का विषय नहीं बन सकता । ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि, श्रानन्दोपलब्धिरूप श्रात्मलक्षण यजुर्वेद, चेतनोपलब्धिरूप ज्योतिर्लक्षण सामवेद, सत्तोपलब्धिरूप प्रतिष्ठा - लक्षण ऋग्वेद, ये तीनों हीं उपलब्धिवेद भौतिकपदार्थ के आधार पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं । दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि, आप उपलब्धिवेद को जब भी देखेंगे, भूत के आधार पर ही देखेंगे । उपलब्धिवेद का मूलाधार अस्ति बतलाया गया है । मनः-प्राण - वाक की समष्टि ही ही अस्ति है । यह अस्ति का अमृतरूप है, नित्यरूप है । मन से रूप, प्राण से कर्म्म, बाक से नामात्मक मर्त्यभूत का उदय होता है । नामरूपकर्म्म की समष्टि ही भौतिकभाग है । यही उस अस्ति का मर्त्य, अनित्यरूप है, यह मर्त्य अस्ति ( भूत ) अमृत अस्ति की प्रतिष्ठा है, अमृत अस्ति चेतना की प्रतिष्ठा है, यही अस्ति आनन्द की प्रतिष्ठा है । इसी उपलब्धिवेदरहस्य को लक्ष्य में रखकर वेदभगवान् कहते हैं ---१४८

पृष्ठ 466

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका उपलब्धि वेदनिरुक्तिः एतद् वा अस्ति । एतद्धि - श्रमृ--“ स त्रय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतान्यपश्यत सर्वाणि । भूतनि ( प्रतिष्ठितानि ) " । तम् । एतदु तत् - यन्मर्त्यम् । त्रय्यां वाव विद्यायां ( शत ० १० | ६ | २ | ) इति । से वेद कहलाता है । यही इसका सत्ताप्रधान सत्तोपलब्धिवेद ' विद्यते इति वेद: " वेद इस: " निर्वचन इस निर्वचन से वेद है । यही चेतनाप्रधान ( ज्ञानप्रधान निर्णचन है । चेतनोपलब्धिवेद " वेत्ति इति “ विन्दति इति वेदः ” इस निर्णचन से वेद है । यही इसका भातिप्रधान ) निर्वचन है । श्रानन्दोपलब्धिवेद ) निर्णचन है । सत्तार्थक विद धातु का " विद्यते ” से श्रानन्दप्रधान ( रसप्रधान प्रियप्रधान - लाभप्रधान ( ' विद ' सत्तायाम् ) । ज्ञानार्थक विद धातु का " वेत्ति " से सम्बन्ध सम्बन्ध है | यह ऋग्वेद की प्रतिष्ठा है ) । लाभार्थक विद धातु का " विन्दति " से सम्बन्ध है, यह है, यह सामवेद की प्रतिष्ठा है ( ' विद ' ज्ञाने तीनों भावों के कारण ही तो उपलब्धितत्त्व “ वेद ” कहलाया यजुर्वेद की प्रतिष्ठा है ( ‘ विद्लृ ' लामे ) । श्रानन्द इन भी वेद है । सम्पूर्ण विश्व वेदमूर्त्ति है, सम्पूर्ण जीवप्रपञ्च है । सत्ता भी वेद है, ज्ञान भी वेद है वेद, से, किंवा वेदात्मक सत्ता - चेतना - श्रानन्दभावों से अतिरिक्त और है वेदमूर्त्ति है, स्वयं ईश्वर वेदमूर्ति है । " । ही क्या? - " सर्व वेदात् प्रसिद्ध्यति ( यजुः ) । १ - - ग्राधिदैविकवेदः - आनन्दप्रधानो वा आत्मप्रधानः श्रात्मवेद: -यजुम्र्म्मय: -यजुर्वेदः १ -''- ' आनन्दप्रधानः ' ' ' ' श्रानन्दमयः श्रात्ममयो १ श्रात्मप्रधानो ज्योतिर्वेदः यजुर्म्मयः सामवेदः आनन्दः २'आनन्दप्रधानः ' चेतनामयः प्रतिष्ठावेदः - यजुर्म्मयः ऋग्वेदः ( श्रात्मा ) ३ ' ' ' ' आनन्दप्रधानः सत्तामयः श्रात्मप्रधानः २ - आध्यात्मिकवेदः - चेतना -प्रधानो वा ज्योतिः - प्रधानः-- साममय: -यजुर्वेदः १ - चेतनाप्रधानः श्रानन्दमय: ज्योतिः प्रधानः श्रात्मवेदः २ ज्योतिर्वेदः - साममयः - सामवेदः चेतना २ -- चेतनाप्रधानः चेतनामयः... ज्योतिर्म्मयो ( ज्योतिः ) ३ ' ' ' चेतनाप्रधानः ' ' ' ' सत्तामयः ज्योतिप्रधानः - प्रतिष्ठावेदः साममयः ऋग्वेदः ३- आधिभौतिकवेदः सत्ताप्रधानो वा प्रतिष्ठा - प्रधानः — - ऋङ मयः - यजुर्वेदः १ – सत्ताप्रधानः— श्रानन्दमयः - प्रतिष्ठाप्रधानः - श्रात्मवेदः - ऋङमयः सामवेदः २ - सत्ताप्रधान: - चेतनामयः -- प्रतिष्ठाप्रधानः - ज्योतिर्वेदः वेदः -- ऋङ मयः ऋग्वेदः ३ – सत्ताप्रधान: - सत्तामयः प्रतिष्ठामयः प्रतिष्ठा यजुर्वेदः -आत्मवेदो ईश्वरः ऋग्वेदः --: प्रतिष्ठावेद जगत् -- सामवेदः ज्योतिर्वेदः जीवः १४६

पृष्ठ 467

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उपलब्धि- वेदनिरुक्तिः प्रथमखण्ड १. घटोऽस्ति ] सत्तोपलब्धिः ( विषयात्मक: प्रतिष्ठा लक्षण: ऋग्वेदः ) २ ··· तमहं जानामि ] ' ' ' चेतनोपलब्धि: ( वृत्यात्मक: ज्योतिर्लक्षण: ' -सामवेदः ) ३ यस्यास्तित्त्वं, यस्य च ज्ञानं सोऽयं रसः, तृप्तिलक्षणो लाभात्मकः * -आनन्दोपलब्धि: ( अन्तकरणात्मकः -- श्रात्मलक्षण: -यजुर्वेदः १.... " विद्यते ”.. " इति वेद: सत्तोपलब्धिः ऋग्वेदः प्रतिष्ठा २... " गेत्ति ”.. ' इति वेदः चेतनोपलब्धि: -- सामवेदः -ज्योतिः नेदः उपलब्धि सैषा उपलब्धिरूपा - वेदत्रयी ३.... " विन्दति " -- इति वेदः श्रानन्दोपलब्धि: यजुर्वेदः - श्रात्मा इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ उपलब्धि - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः--७ * -१५०

पृष्ठ 468

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पृष्ठ 469

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ' उपलब्धि ' - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ७

पृष्ठ 470

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श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौः ब्रह्मन्द्रविष्णुसहकृता - वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा ८