Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 471–480
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 471–480
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श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मेन्द्रविष्णुसहकृता-- वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा के सम्मुख उपस्थित किया ७ विवर्त्त भावों का स्वरूप पाठकों अव्यय अबतक वेदपदार्थ के सम्बन्ध में जिन सम्बन्ध समझना चाहिए । पञ्चकल श्रव्ययपुरुष के साथ ही गया है, उन सब का एकमात्र पञ्चकल के सभी वेदविवत्तों का सच्चिदानन्दलक्षण अव्ययपुरुष मे हीं अन्तर्भाव ही सच्चिदानन्द कहलाता है । एवं पूर्व उभावपि " ( गीतायाम् ) इस स्मार्च - सिद्धान्त के अनुसार श्रव्यय-है । “ प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी से सर्वथा अविनाभूत है । इसी स्वभाव ( स्व - भाव ) के पुरुष स्वभावभूता अपनी अन्तरङ्गप्रकृति में ही अन्तभूत मान लिया जाता है । असीम परात्पर कारण इस अन्तरङ्गप्रकृति को अव्ययात्मा है, उसे ही अव्ययपुरुष कहा जाने लगता हुआ सकेन्द्र बन जाता परात्पर का जो प्रदेश महामाया से सीमित बनता में ही हृदयभाव ( केन्द्रभाव ) उत्पन्न होजाता है । असीम है । माया के उदय के अव्यवहितोत्तरकाल कोई केन्द्र नहीं होसकता । अथवा दूसरे शब्दों में यों कहलीजिए कि ”, में हृदय नहीं था । क्योंकि व्यापक वस्तु है, में वह सभी केन्द्र है । केन्द्ररूप परात्पर में “ सामान्ये सामान्याभावः से व्यापक वस्तु की प्रतिबिन्दु ही केन्द्र होसकता । इसीलिए वह अहृदय है, अकेन्द्र है । परन्तु मायासीमा इस नियम के अनुसार केन्द्र नहीं बन जाता है । इसप्रकार माया के साथ साथ ही मायी अव्यय, एवं सीमित परात्पर का एक स्वतन्त्र केन्द्र कहलाता है, वहाँ अव्यय से नित्ययुक्त यह हृदयभाव । अव्यय जहाँ पुरुष अपनापन है, आप हृदयबल, दोनों का उदय होजाता है है । हृदय ही उसका स्वभाव है, अपना भाव है, । ही " प्रकृति " नाम से व्यवहृत हुआ ग्रन्थिविमौक से विलीन होजायगा, तत्काल मायासीमा टूट ' जायगी शब्दार्थ ही है । जिस दिन प्रकृतिरूप हृदयभाव ( अव्यय ) अपरिच्छिन्न परात्पररूप में परिणत होजायगा । ' स्वभाव में सीमा के टूटते ही परिच्छिन्न पुरुष रसबलमूर्त्ति है । फलतः तदविनाभूता तन्मयी इस हृदयरूपा प्रकृति का यही रहस्य है । अव्ययपुरुष स्वयं है । बल मृत्यु है, रस अमृत है । मृत्युगर्भित श्रमृताव्यय ही श्रानन्द- में भी दोनों का समन्वय सिद्ध होजाता अव्यय ही मनःप्राणवाक है । ये ही दोनों अवस्थाएँ प्रकृति विज्ञान - मन है । एवं अमृतगर्भित मृत्युलक्षण प्रकृति ' पराप्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध है । इसे ही ' अक्षर ' कहा जाता से समझिए । मृत्युगर्भिता अमृतलक्षणा ' अपराप्रकृति ' नाम से व्यवहृत हुई है, और यही ' आत्मक्षर ' नाम एवं अमृतगर्भिता मृत्युलक्षणा प्रकृति अन्तरङ्गप्रकृति है । दोनों में से पहिले परात्मिका अक्षरप्रकृति का ही प्रसिद्ध है । इन दोनों की समष्टि ही विचार कीजिए । 1 १५५
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ब्रह्म ेन्द्र विष्णु वेद वेदनिरुक्तिः प्रकृति को हमने हृदय कहा है । यही हृदयभाव स्वाभाविक प्राणव्यापार के अवस्थाभेद से अपने आलम्बन - पुरुष के अनुग्रह से पाँच कलानों में परिणत होजाता है । क्षर की ने ही पाँचों कलाएँ क्रमशः ' ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि- " सोम इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ब्रह्मा का श्रव्यय की श्रानन्दकला से, विष्णु का विज्ञानकला से, इन्द्र का मनः कला से, सोम का प्राणकला से, एवं अग्नि का वाक्कला से सम्बन्ध है । आनन्दमय ब्रह्मा एक स्वतन्त्र तत्त्व है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र की समष्टि विष्णु है, एवं इन्द्र - अग्नि - सोम की समष्टि शिव है, यही त्रिमूर्त्ति है । एक ही अश्वत्थ ( अव्यय ) - वृक्ष के ये तीन विवर्त्त हैं । त्रिमूर्तिभावापन्न इसी अव्ययाश्वत्थ का दिग्दर्शन कराते हुए श्रभियुक्त कहते -मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे । अग्रतः शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नमः ॥ आनन्द - ब्रह्मा हैं, श्रानन्द - विज्ञान - मन विष्णु हैं, मनःप्राण - वाक् शिव हैं । आनन्द ब्रह्मा है, चेतना बिष्णु है, सत्ता शिव है । अश्वत्थाव्यय का मूलभाग आनन्द है, यही शिरोभाग है, यहीं ब्रह्मा प्रतिष्ठित हैं । मध्यभाग चेतना है, यही उदरभाग है, यहीं विष्णु प्रतिष्ठित हैं । अग्रभाग सत्ता है, यही पादभाग है । महादेव इस अश्वत्थवृक्ष के नीचे प्रतिष्ठित हैं, जैसा कि श्रागमशास्त्र कहता है-कम
* व्याख्यामुद्राक्षमाला -- कलशसुलिखिते बाहुभिर्वामपादम् ।
विभ्राणो जानुमुर्ध्ना पदतलनिहितापमृतिद्यद्रुमाधः ॥
सौवर्णे योगपीठे लिपिमयकमले सूपविष्टस्त्रिनेत्रः ।
क्षीराभश्चन्द्रमौलिर्वितरतु विबुधां शुद्धबुद्धिं शिवो वः ॥ १ ॥
ब्रह्मा संयती - त्रैलोक्य के, विष्णु क्रन्दसी- त्रैलोक्य के, एवं शिव रोदसी- त्रैलोक्य के प्रतिष्ठावा ( अधिष्ठाता ) देवता हैं | सम्पूर्ण विश्व इन्हीं तीनों देवताओं का वैभव है, जैसा कि पुराण कहता है-" त्रयो लोकस्य कर्त्तारो ब्रह्मा - विष्णुः- शिवस्तथा । ” उक्त तीनों देवताओं में ब्रह्मा यजुर्वेद के अध्यक्ष हैं, X विष्णु सामवेद के अध्यक्ष हैं, एवं शिव ऋग्वेद के अध्यक्ष हैं । ब्रह्मा मूलप्रतिष्ठिा है, इसी पर प्रतिष्ठित होकर विष्णु शिव सृष्टि - प्रलय किया करते हैं । इन तीनों की समष्टि ही “ हृदयम् " है । " हृ " विष्णु हैं, आगति - स्वभाव से आदान करना इनका मुख्य काम है । “ द ” शिव हैं, गति - स्वभाव के विसर्ग करना इनका मुख्य काम है । " यम् ” ब्रह्मा हैं, स्थिति - स्वभाव से श्रादानविसर्गभावों का नियमन करना इनका मुख्य काम है । " यम् " रूप ब्रह्मा " सत् " हैं " हृ " रूप विष्णु “ ती ” हैं, “ द ” रूप शिव " अम् " है । तीनों की समष्टि ही " सतियम् " किंवा " सत्यम् ", है । हृदय ही सत्य है । यही त्र्यक्षररूप सत्यवेद है । इन सब विषयों का प्रकृत में निरूपण नहीं किया जासकता । यहाँ विषयसङ्गति के लिए केवल नाममात्र का उल्लेख कर देना ही पर्याप्त है । पञ्चाक्षरमूर्त्ति त्र्यक्षर ही सत्यवेद है, यही अक्षरवेद है, इसके उपोबलक आगे के श्रुतिवचन हैं— * इस विषय का विशद वैज्ञानिक - विवेचन भक्तियोगपरीक्षा- उत्तरखण्ड में देखना चाहिए । X विष्णुतत्त्व ही कृष्णतत्त्व है । बासुदेवकृष्ण इसी के अवतार थे । तएव उन्होंनें स्वविभूति-गणना में " वेदानां सावेदोऽस्मि " ( गी ० १० | २२ | ) यह कहा है । १५६
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका ब्रह्म ेन्द्रविष्णुवेद निरुक्तिः ० ६ | ५ | १ | १८ ) | १ – “ तद्यत् तत् सत्यं त्रयी सा विद्या " ( शत " " ती " इत्येकमक्षरम्, “ अम् ” २ – “ तदेतत्त्र्यचर ं सत्यमिति । " स इत्येकमक्षरम् । इत्येकमक्षरम् ” ( शत ० १४।८६।२ ) , ' द ' इत्येकमक्षरम्, “ यम् ” ३– “ तदेतत् त्र्यक्षर ं - हृदयमिति । " हृ " इत्येकमक्षरम् | इत्येकमक्षरम् ” ( श ० १४/८/४१ ) है, इसी वेद से का विज्ञान ही वेद है, यही अक्षरवेद इसी सत्य को नियति कहा जाता है, नियति - स्वकर्म्म में प्रतिष्ठित कर रक्खा है । वेद - दण्डने हीं सत्र को स्व सब शासित हैं । दूसरे शब्दों में नियतिरूप वेदात्मक नियतिर्दण्ड से दण्डित हैं, यही कर रक्खा है, सभी इस अन्तर्य्यामी की नियतिने ही सबका सञ्चालन धर्म्म है, धर्म ही तो सत्य है । देखिए— तो वेद है, वेद ही तो नियतिरूप वेदसत्य धर्म्मदण्ड है, धर्म्म ही वदन्तमाहुर्धम्मं वदतीति । धर्म्म १ – ' यो वै धर्म्मः, सत्यं वै तत् । तस्मात् सत्यं ) । वदन्तं सत्यं वदतीति ” ( शत ० १४।४।२।२६ १ - आनन्द: -ब्रह्मा ( न्दमय:) २ - विज्ञानम् - विष्णु: ( विज्ञानमय: ) , ३ - मनः-४- प्राणः-५- वाक्-पञ्चकलः पुरुषः । ( अव्ययः ) इन्द्रः ( मनोमयः ) सोमः ( प्राणमयः ) अग्निः ( वाङमयः ) पञ्चकला प्रकृतिः ( अक्षरः ) * " प्रजायन्ते भावाः तथाक्षराद्विविविधा " -- " अक्षरमित्युपास्व " अक्षरप्रपञ्च ( * ) १५७
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ११-१- श्रानन्दः - श्रानन्दः - ब्रह्मा ( आत्मा ) - चित्पतिः १- श्रानन्दः २-२ - विज्ञानम् - चेतना - विष्णुः ( ज्योतिः ) - देवपतिः ३- मनः १- मनः ३-२- प्राण: ३ - वाक् - सत्ता - शिवः ( प्रतिष्ठा ) - भूतपतिः ब्रह्म े न्द्र विष्णुवेदनिरुक्तिः मूर्त्तिस्त्रयोगेदा एका " " - महेश्वराः - विष्णु ब्रह्म १- १ - श्रानन्दः - ब्रह्मा 1138 १- श्रानन्दः - ब्रह्मा २- २ -- विज्ञानम् -- विष्णुः ३- मन: -- इन्द्रः -ब्रह्मा " यम् ' अजुर्वेदः } -- विष्णु: -.. सामवेदः अक्षरदः सत्यवेदः १- मनः- इन्द्र-३-२-- प्राण: -- सोमः - शिवः....... " यम् ' ३ -- वाक -- अग्निः त्रिमूर्त्तिः सत्यम् हृदयम् त्रयीविद्या ऋग्वेद: ......... इति - वैज्ञानिवेदनिरुक्तौ ब्रह्मन्द्रविष्णुसहकृता वेदनिरुक्तिः ( सत्यवेदनिरुक्तिर्वा ) IS १५८
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II < ASSL II 5 - 2ic 414114 81411344 1 IFDFIDEISFRE
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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मन्द्रविष्णुसहकृता - वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा ८ - * -
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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-प्राण आपः - - वाक् - सहकृता - वेदनिरुक्तिः ह --
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अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ प्राण - आपः - वाक्- सहकृता - वेदनिरुक्ति: ६ गए हैं । अमृतरूप पूर्व की वेदनिरुक्ति में प्रकृति के अमृत – मर्त्य - मर्त्यरूप भेद से दो क्षयभावयुक्त रूप बतलाए होने से क्षर कहलाता है । क्षयभावशून्य होता हुआ जहाँ अक्षर कहलाता है, वहाँ अपराप्रकृति के मर्त्यब्रह्मात्मक प्राण, मर्त्य - विष्यवात्मक यही अव्ययपुरुष की पराप्रकृति कहलाती है । इस एवं मर्त्य - अग्न्यात्मक अन्नाद, ये पाँच रूप हैं । इन पाँचों आपः मर्त्य- इन्द्रात्मिका बाक्, मर्त्य - सोमात्मक अन्न ),, विज्ञानमय अमृतविष्णु, मनोमय अमृतेन्द्र, प्राणमय पर क्रमशः आनन्दमय अमृतब्रह्मा ( अक्षररूब्रह्मा । जैसी परिस्थिति, जैसा संस्थानक्रम अव्ययपुरुष, एवं श्रमृतसोम, एवं वाङमय अमृताग्नि का अनुग्रह है अपराप्रकृतिरूप इस आत्मक्षर का समझना चाहिए । अक्षर का बतलाया गया है, ठीक वैसा ही संस्थानक्रम - वाक् तत्त्व की समष्टि ही पितृप्राणगर्भित देवता है, एवं प्राणतत्त्व स्वतन्त्र है, यही ऋषि है, प्राण - श्राप सत्तात्मक शिव का अनुग्रह है, अतएव शिव को भूतेश वाक् अन्न — अन्नाद की समष्टि ही भूत है । भूत पर लिङ्ग है । इसीलिए शिवतत्त्वप्रतिपादक लिङ्गपुराण ने कहा जाता है । भूत ही अव्यक्त पदार्थों का व्यक्त एवं देवता पर चेतनात्मक विष्णु का अनुग्रह है, भूतेश शिव का लिङ्गरूप से ही निरूपण किया है । पितर, कहा जाता है । ऋषितत्त्व पर श्रानन्दात्मक ब्रह्मा तव विष्णु को पितृणां पतिः, एवं देवानां पतिः का अनुग्रह है । कि आगे के तूलवेद- - प्रकरण में स्पष्ट हो जायगा । ऋषितत्व ही क्षरप्रधान यजुर्वेद है, जैसा । इसी आधार पर " ऋषिर्वेदमन्त्रः " यह सिद्धान्त दूसरे शब्दों में ऋषिरूप ब्रह्मात्मक प्राण ही यजुर्वेद है जाता है । यह श्रानन्दात्मक ब्रह्मा का ही निःश्वास है । प्रतिष्ठित है । इसी को ' ब्रह्मनिःश्वसित ' वेद कहा ' कहा जाता है । भूततत्त्व ही पितृगर्भित देवतत्त्व ही क्षरप्रधान सामवेद है । इसी को ' जाता गायत्रीमात्रिकवेद् है । उक्त पाँचों क्षरों से, किंवा क्षर की पाँच क्षरप्रधान ऋग्वेद है । इसी को ' यज्ञमात्रिकवेद ' कहा पुर उत्पन्न होते हैं, जैसाकि पाठक ईशविज्ञान-कलाओं से विश्वसृट, पञ्चजन, पुरञ्जन क्रम से पाँच, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन भाष्य प्रथमखण्ड में देखेंगे । वे ही पाँचों पुर क्रमशः स्वयम्भू है । परमेष्ठी आपोमय, किंवा पितृमय है । सूर्य्य नामों से प्रसिद्ध हैं । स्वयम्भू प्राणमय, किंवा ऋषिमय है । पृथिवी अन्नादमयी, किंवा भूतमयी है । वाङमय, किंवा देवमय है । चन्द्रमा अन्नमय, किंवा गन्धर्वमय - क्षर में बतलाया गया है । स्वयम्भु स्वतन्त्र है । इन पाँचों का भी वही संस्थानक्रम है, जोकि अव्यय -- अक्षर १६३