Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 481–490

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड प्राणापोवाग् - वेदनिरुक्तिः -है । स्वयम्भू – परमेष्ठी - सूर्य्य-यही श्रानन्दात्मक, ब्रह्मानुग्रहीत, प्राणमय ब्रह्मनिःश्वसितवेद की विकासभूमि - विष्णु — इन्द्ररूप विष्णु से तीनों की समष्टि एक स्वतन्त्र विभाग है । यही श्रानन्दविज्ञानमनोमय, ब्रह्मा पृथिवी - इन तीनों का एक अनुग्रहीत, प्राणापोवाङमय गायत्री मात्रिकवेद की विकासभूमि है । सूर्य्य से - चन्द्रमा अनुग्रहीत, वाक् – श्रन्न - अन्नादमय स्वतन्त्र विभाग है । यसी मनःप्राणवागात्मक, इन्द्र - सोम - अग्निरूप शिव दर भी उक्त प्रकार से यज्ञमात्रिकवेद की विकासभूमि है । कहना प्रकृत में केवल यही ही है है कि |, अक्षरवत् तीन वेदों का प्रवर्त्तक बन रहा है, जैसाकि परिलेखों से स्पष्ट होजाता K Ke १ - श्रानन्दः ब्रह्मा ( श्रानन्दमयः ) प्राण: ( ब्रह्ममयः ) K २ - विज्ञानम् विष्णुः ( विज्ञानमयः ) श्राप ( विष्णुमय्यः ) ३ - मनः Ko K Ke इन्द्र: ( मनोमयः ) वाक् ( इन्द्रमयी ) ६ त्र ३ - प्राणः सोमम: ( प्राणमयः ) अन्नम् ( सोममयम् ) ४ - वाक * अग्निः ( वाङमयः ) अन्नादः ( अग्निमयः ) K K पञ्चकलः पुरुषः पञ्चकला पराप्रकृतिः ( अव्ययः ) ( अक्षरः ) प्रकाशते न गूढोत्मा भूतेषु सर्वेषु एष पञ्चकला पराप्रकृतिः क्षरप्रपञ्च ( आत्मक्षरः ) १- १ - ब्रह्मा - प्राण: - ऋषयः -ज्ञानपतयः १ ब्रह्मा २-२ - विष्णुः | वाक् – पितृगर्भिता देवाः-३- इन्द्रः १- इन्द्रः ३-२- सोमः ३- श्रग्निः -क्रियापतयः क्षरः सर्वाणि भूतानि अन्नादः - गन्धर्वगर्भितानि भूतानि श्रर्थपतयः १६४ म PERED ITS

पृष्ठ 482

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका प्राण।पोबाग् - वेदनिरुक्तिः १- १ - आनन्दः - ब्रह्मा - प्राण: ( ऋषयः ) - प्राण: -यजुर्वेदः ( आत्मा ) ब्रह्मनिःश्वसितवेदः १- श्रानन्दः – ब्रह्मा — प्राण: ( ऋषयः ) २ २-२ - विज्ञानम्— विष्णुः- श्रापः ( पितरः ) ( -बाकू सामवेदः ( ज्योतिः ) गायत्रीमात्रिकवेदः ३ - मनः —— इन्द्रः—— वाक् ( देवाः ) J १ - मनः —— इन्द्रः —- वाक् ( देवा:) ३ ३- २ - प्राणः —— सोमः - अन्नम् ( गन्धर्वाः ) श्रन्नादः - ऋग्वेदः ( प्रतिष्ठा ) यज्ञमात्रिकवेदः ३- वाक - अग्नि: - अन्नादः ( भूतानि ) | स्वयम्भूः -- ब्रह्मा ( संयती ) ब्रह्मनिं ० विकासभूमिः १--१ ऋषिभूत्तिंः -- प्राण: ( स्वयम्भूः ) ब्रह्मा १ - ऋषिमूर्त्तिः प्राण: ( स्वयम्भूः ) - ब्रह्मा २- २ - पितृमूर्तिः श्रापः ३ – देवमूर्त्तिः -- बाक् ( परमेष्ठी ) -विष्णुः ( सूर्य्य: ) -इन्द्रः १– देवमूर्त्तिः -- वाक् ( सूर्य्य: ) इन्द्र: १-२ — गन्धर्वमूर्तिः - अन्नम् ( चन्द्रमाः ) -सोमः ३- भूतमूर्त्तिः - अन्नादः ( पृथिवी ) -अग्नि: J -सूर्य्य: विष्णु: ( क्रन्दसी ) --गायत्री ० विकासभूमिः -- पृथिवी - शिव: ( रोदसी ) - यज्ञमा ० विकासभूमिः इति - वेदनिरुक्तौ प्राणापोवाक्सहकृता – वेदनिरुक्तिः ६ १६५

पृष्ठ 483

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ प्राणापोवाक् – सहकृता - वेदनिरुक्तिः ह SIRIDIS

पृष्ठ 484

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ समष्टिरूपेण - श्रात्मवेदनिरुक्तिः १०

पृष्ठ 485

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पृष्ठ 486

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आ ( TETER ) TRIP श्रीः अथ वैज्ञानिकवेदनिरुतौ-समष्टिरूपेण आत्मवेदनिरुक्तिः -१० — चेतना - आनन्द, इन तीनों कलाओं वेदतत्त्व का सम्बन्ध सच्चिदानन्दघन से ( जोकि अन्तश्चिति मुमुक्षा आत्मा से है । सत्ता से । रसप्रधाना अन्तश्चिति का विकास चितिभाव से सम्बन्ध रखता है विकास होता है । बलप्रधाना बहिश्चिति से ( जो कि बहिश्चिति सम्बन्ध रखती है ) आनन्द, एवं चेतना का विकास होता है । मुमुक्षा और सिसृक्षा, दोनों का आधार कामनामय सिसृक्षा से सम्बन्ध रखती है ) सत्ता का, मन का हृदय से सम्बन्ध है, हृदय का माया से सम्बन्ध है, माया बल ही है । कामना का मन से सम्बन्ध है आत्मा का सीमित होना सिद्ध होजाता है । इसीलिए हम सीमाभाव की जननी है । फलतः सच्चिदानन्दघन हैं । यह विश्वात्मा ही " षोडशीप्रजापति " नाम से प्रसिद्ध है । इसे “ विश्वात्मा ” नाम से सम्बोधित करते, निष्कल परात्पर, इनकी समष्टि ही षोड़शी-, पञ्चकल श्रात्मक्षरपुरुष पञ्चकल अव्ययपुरुष, पञ्चकल अक्षरपुरुष आत्मा का श्रव्ययभाग ज्ञानप्रधान है, अक्षरभाग क्रियाप्रधान प्रजापति है । यही विश्वप्रविष्ट गूढोत्मा है । इस ऋग्वेदमूर्त्ति है, क्रियाप्रधान अक्षरभाग सामवेदमूर्त्ति है, क्षरभाग अर्थप्रधान है । अर्थप्रधान क्षरभाग है । तीनों की समष्टि एक आत्मवेद है । कलामेद से प्रत्येक वेद है, एवं ज्ञानप्रधान अव्ययभाग यजुम्मूर्त्ति भागों में विभक्त है । ( विवधभावापन्न - त्रिवृद्भावापन्न ) इस श्रात्मवेद पुनः ऋक्साम - यजुः - भेद से तीन तीन अन्तर्भाव है, जैसाकि समष्टयात्मक आगे के परिलेख से स्पष्ट का परमार्थतः सच्चिदानन्दकोटि में ही होजाता है । ( छ ) FER मकर १६६ 3-

पृष्ठ 487

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ओमित्येवं ध्यायथ-- श्रात्मानम् १ निष्कलः परात्परः - श्रद्ध ' मात्रा ( श्रमात्रा ) ५ ५ पञ्चकलोऽव्ययः आनन्दा पञ्चकलोऽक्षरः चेतना ५ कलः क्षरः सत्ता यजुः १ साम २ ऋक ३ १ १ १- ब्रह्मा - ब्रह्मा - यजुः १- प्राणः ( श्रानन्दः ) १- श्रानन्दः > श्रानन्द: -यजुः १- श्रानन्दः २ - विज्ञानम् - चेतना साम ३ - मनः 5.999 १ -- प्राणः यजुः ( श्रानन्दः ) १- ब्रह्मा १- प्राण: २ २ २ - विष्णुः -- विष्णुः- साम २- श्रापः -वाक - साम )चेतना ) ( चेतना ) ३- इन्द्रः ३- वाक् १- मनः १ – इन्द्रः १- वाकू ३ ३ ३ २ - प्राणः -- सत्ता - ऋक् २ – सोमः - शिवः ऋक् ( सत्ता ) २- अन्नम् -अन्नादः ऋक् ( सत्ता ) ३- वाक ३ – अग्निः } ३- अन्नादः पुरुषवेद: अव्ययवेदः पराप्रकृतिवेदः अक्षरवेदः पराप्रकृतिवेदः क्षरवेदः अकार: उकारः मकारः

पृष्ठ 488

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वेदनिरुक्तो श्रानन्दः OCTO समष्टि वेदनिरुक्तिः उपनिषद्भूमिका सत्ता चेतना Ho Z Zo Zo सच्चिदानन्दवेदः आत्मवेदः स एष अश्वत्थप्रजापतिः तः तस्य वाचकः प्रणवः ( CCEOCEOCOCOCE CECCECCECCCCCC । ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शास्त्र एषोऽश्वत्थः सनातनः छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तद्वेद स वेदवित् ॥ COOO CO इति - वेदनिरुक्तौ-समष्टिरूपेण - आत्मवेदनिक्तिः १० १७१

पृष्ठ 489

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ समष्टिरूपेण - ग्रात्मवेदनिरुक्तिः १०

पृष्ठ 490

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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या - वेदभिन्ना ज्ञानलक्षणा - आत्मवेदनिरुक्तिः ११