Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 491–500
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 491–500
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श्रीः अथ वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या वेद - - भिन्ना- ज्ञानलक्षणा - वेदनिरुक्तिः 99 में प्रयुक्त देखे गए । एक ही , ब्रह्म, ये तीनों शब्द एक ही अर्थ श्रतिग्रन्थों में वेद, विद्या से उक्त तीन स्वरूपों में परिणत होरहा है । प्रत्येक वस्तु के विज्ञानतत्त्व अवस्थाभेद से, किंवा उपाधिभेद , उपमान, शब्द, इन चार प्रमाणों में से किसी न किसी प्रमाण की से यथार्थ ज्ञान के लिए प्रत्यक्ष, अनुमान प्राधार पर उदित होने वाला, अतएव संशय - वीपर्य्ययादि दोषों अपेक्षा रहती है । प्रमाण चतुष्टयों के ज्ञान है, निश्चित ज्ञान है, उसे ही दार्शनिक विद्वान् " प्रमा " शब्द वा से सर्वथा संस्पृष्ट जो सत्यज्ञान है, निर्भ्रान्त साधन से प्राप्त होती है, वही साधन " प्रमाकरणं - प्रमाजनकं सम्बोधित करते हैं । यह प्रमा जिस " नाम से व्यवहृत किया जाता है । यह प्रमाज्ञान चार साधनों से प्रमाणम् ” व्युत्पत्ति के अनुसार “ प्रमाण का प्रमाणत्त्व सिद्ध हो जाता है । प्रकट होता है, फलत: चारों साधनों प्रमा का जनक बनता ज्ञान ( प्रमा ) होजाता है । इसप्रकार वस्तु के प्रत्यक्ष देखने से उस वस्तु का तत्र वह्निः ” इस अनुमान से भी वह्निविषयक " यत्र यत्र धूमस्तत्र है । एवं अश्व-हुश्रा प्रत्यक्ष प्रमाण कहला सकता है इस । ' उपमान ' से भी गवयपदार्थ का ज्ञान होजाता में " गोसदृशो गवयः " सादृश्यमूलक - घट - पट आदि पदार्थों का ज्ञान होता देखा गया है । विज्ञान ' घटपटादि शब्दों के सुनने से भी अश्व प्रमाणित होरहे हैं | प्रमाणावच्छिन्न ' प्रमाज्ञान ' ही का नाम ' विज्ञान गई है । चारों हीं प्रमाण प्रमाज्ञान के जनक ही नाम विज्ञान है । यह विज्ञानवृत्ति चिन्मयी ज्ञानमयी मानी में है । अन्तःकरण की वृत्तिविशेष का जगत् " ई ० उ ० १ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार संसार ही हैं, " ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां है । सामान्य मनुष्य चेतन प्राणियों में तो चिंदश की सत्ता मानते वे भी समष्टिरूप से सर्वत्र चिंदश व्याप्त कि, जिन पदार्थों को वे जड़ समझते हैं, विज्ञानदृष्टि के अनुसार कराती हुई परन्तु उन्हें विश्वास करना चाहिए हैं । सर्वव्यापक, किंवा विश्वव्यापक इसी चैतन्य का दिग्दर्शन चिदंश से नित्य अनुगृहीत रहते
उपनिषच्छ्र, ति कहती है- एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
॥
दृश्यतेत्यग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः -कठ ० १ | ३ | १२ चिदात्मा प्रत्येक से अन्तःकरणावच्छिन्न बना हुआ यही कर सर्वव्यापक, साथ ही में योगमाया के अनुग्रह अर्करूप ( रश्मिरूप ) से बाहिर निकल प्रतिष्ठित रहता हुआ वस्तु के केन्द्र में उक्थबिम्बरूप से १७५
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प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः तत्तद्विषयों से युक्त होकर तत्तद्विषयाकारारित बनता हुआ हमें ( वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञमूर्ति जीवात्मा को ) तत्तिद्विषयों का ज्ञान करवाता रहता है । चित् के ये ही तीनों विवर्त क्रमशः ' उक्थ अर्क - श्रशीति ' इन नामों से व्यवहृत होते हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । विषय श्रशीति है, आत्मरशियाँ अर्क है, स्वयं श्रात्मा उक्थ है । श्रात्मा अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य है । आत्मरश्मियाँ अन्तःकरणवृत्यवच्छिन्न - चैतन्य है । तीसरा विभाग विषयावच्छिन्न- चैतन्य का है । प्रकारान्तर से यों समझिए कि हमारे में चित् है, जिन विषयों को हम देखते हैं - उन में चित् है, एवं जिस वृत्ति से हम देखते है - वह भी चिन्मयी है । तीनों स्थानों में व्याप्त चैतन्यं, जब एक स्थान पर, एक बिन्दु पर श्राजाता है, तो पूर्वोक्त प्रमाज्ञान का उदय होजाता है | यही उस विषय का प्रत्यक्ष कहलाता है । ' अन्तः कररणावच्छिन्न चैतन्यं, अन्तःकरण-वृत्यवच्छिन्न चैतन्यं, विषयावच्छिन्न- चैतन्यं - चैतन्यम् । एतेषां त्रयाणामेकत्र प्रतिपतिः प्रत्यक्षम् ' इस वेदान्त - सिद्धान्त के अनुसार तीनों चैतन्यों के एकत्र समन्वय पर ही प्रमाज्ञान प्रतिष्ठित है । हम अपने स्थान पर बैठे हैं । सामने घड़ा रक्खा है । हम से ज्ञानरश्मियाँ निकल कर घटज्ञान का हमारे आत्मज्ञान के साथ सम्बन्ध करा देतीं हैं । अव्यवहितोत्तरकाल में हीं ' घटमहं जानामि ' यह प्रमाज्ञान उदित होता है । अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ' प्रमाता ' है, विषयाच्छिन्न चैतन्य प्रमेय है, एवं वृत्यवच्छिन्न चैतन्य प्रमा का साधक, किंवा उत्पादक बनता हुआ ' प्रमाण ' है । प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण, तीनों के समन्वय से ही विषय की प्रतीति होती है । इन सब का मूलाधार ' प्रमाता ' नामक अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही है । यह प्रमाता उस प्रमा का ही मौलिकरूप है । प्रमातृमयी यह प्रमा ( ज्ञान ) स्वस्वरूप से नित्यशुद्ध - मुक्त है । इसे हमनें उक्थ ( प्रभव ) बतलाया है । इसमें से निरन्तर रश्मियाँ निकला करतीं हैं । इन्हीं रश्मियों को ही दार्शनिक परिभाषा में ' अन्तःकरणवृत्ति ' कहा गया है । विज्ञानपरिभाषानुसार यही वृत्ति ' विज्ञान ' नाम से व्यवहृत हुई है । यह विज्ञान ज्ञान है, उस उक्थरूप ज्ञानघन आत्मा का अंश है । यद्यपि अन्तःकरणवृत्तिरूप यह विज्ञान भी आत्मज्ञानवत् प्रातिस्विकरूप से एक ही है, तथापि जैसे विविध वर्णभेद से एक ही प्रकार की सौररश्मियाँ तत्तद्वर्णयुक्त आदर्शो ( काचों ) के साथ संक्रान्त होकर तत्तद्वर्णरूप में परिणत होजाती हैं, एवमेव वह शुद्ध एकरूप विज्ञान भी विषय के भेद से तीन स्वरूप धारण कर लेता है । विषयभेदभिन्न वह त्रिविध विज्ञान ही वेद, विद्या, ब्रह्म, इन नानों से प्रसिद्ध है । आपके सामने घड़ा रक्खा हुआ है । उसके साथ वृत्तिरूप विज्ञान का सम्बन्ध होता है, विज्ञान घटाकाराकारित बन जाता । यही ज्ञान ' विषयावच्छिन्नज्ञान ' कहलाने लगता है । इस विषयावच्छिन्न-विज्ञानात्मक ज्ञानने अपने ऊपर घट को धारण कर रक्खा है । श्रतएव ' विभर्त्ति विषयं तद्ब्रह्म ' इस व्युत्पत्ति से इस विषयावच्छिन्न ज्ञान को ' ब्रह्म ' कहा जासकता है । आपके सामने घट नहीं है । केवल आप के कानों में ' घट ' शब्द का प्रवेश होता है । इस शब्दश्रवण से भी घटपदार्थ का ज्ञान होजाता है । इस शब्दावच्छिन्नज्ञान को ही हम वेद कहेंगे । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि विषय ही शब्द, और अर्थ भेद से दो भागों में विभक्त हैं । अर्थात्मक विषय से अवच्छिन्न ( युक्त ) वही ज्ञान ब्रह्म है, एवं शब्दात्मक विषय से अवच्छिन्न वही ज्ञान वेद है । शब्द, एवं अर्थ के द्वारा होने वाला ज्ञान यदि निरन्तर प्रवाहित रहता है, दूसरे शब्दों में पदार्थ को, किंवा तद्वाचक शब्दों को यदि बुद्धिपूर्वक निरन्तर देखा, एवं सुना आता है, तो कालान्तर में तज्जनित संस्कार आगे जाकर स्मृति का जनक बनता है । यह संस्कारावच्छिन्न ज्ञान ही ' विद्या ' १७६
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः विज्ञानदृष्टि से तीनों एक ही तत्त्व है । इसीलिए-है । कहने को वेद - विद्या - ब्रह्म - पृथक हैं । उपाधिशून्या से इन तीनों में संकरव्यवहार देखा जाता है । एक ही तत्व ' त्रयं ब्रह्म - त्रयो वेदाः त्रयी विद्या ' इत्यादिरूप कहीं ब्रह्म शब्द से व्यवहृत करना तभी सुसङ्गत होसकता है, जब कि को कहीं वेद शब्द से, कहीं विद्या शब्द से, । एवं तभी - ' सैषा त्रयीविद्या - यज्ञः ( शत ० १ | १ | ४ | ३ | ) तीनों को एक तत्त्व मान लिया जाता है वेदा: ' ( श ० १० | ४ | २ | २५ ) इत्यादि श्रौत - स्मात ' -' त्र्यंब्रह्म सनातनम् ' ( मनु ० १।२३ । ) ' त्रयो व्यवहारों का समन्वय होसकता है । बन कर ' ब्रह्म ' अन्तःकरणवृत्ति ( विज्ञान ) विषयाकाराकारिता प्रकारान्तर से तथ्य का समन्वय कीजिए । वही ' कहलाने लगती है, एवं शब्दाकाराकारिता बनकर वही कहलाने लगती है, संस्काराकारिता बनकर ' विद्या पर दृष्टि डालते हैं, उसी समय घटज्ञान होजाता है । यह ' वेद ' कहलाने लगती है । जिस समय हम घट विषयाकाराकारित ज्ञान है । इस समय हमारा ज्ञान घटाकारा-प्राथमिक - ज्ञान, दूसरे शब्दों में तात्कालिक ज्ञान । ही ' सूय्यंवत् स्वज्ज्योतिर्म्मय यह ज्ञान विजातीय घट को कारित बनकर ही प्रतिभासित होता है से प्रकाशित करता हुआ ' जानामि इत्यपि जानामि ' इस रूप से स्वरश्मियों से ' घटमहं जानामि ' इस रूप शब्दों में जिसप्रकार सूर्य्य त्रैलोक्य के पदार्थों को प्रकाशित अपने आपको भी प्रकाशित कर रहा है । दूसरे यह अपने प्रकाश से अपने आपको भी दिखलाता रहा है । इसी करता हुआ उन्हें दिखलाता है, एवमेव अपने भी दर्शन करा रहा है । ' हम घड़ा जानते हैं ' – यह प्रकार, यह ज्ञानसूर्य्यं विषयों को दिखलाता भी हुआ जानते हैं, ' यह स्वदर्शन है । यही स्वज्ञान पाष्र्ष्टिज्ञान, प्रत्यय-विषयदर्शन है । ' हम घड़ा जानते हैं यह, विषयावच्छिन्ना यह अन्तःकरणवृत्ति ही अतिशयरूप से आदि नामों से प्रसिद्ध है । वक्तव्यांश यही है कि होने लगती है । दूसरे शब्दों में शब्दविषयात्मक, एवं बुद्धि में प्रतिष्ठित होकर ' संस्कार ' नाम से व्यवहृत संस्कारावच्छिन्नज्ञानरूप में परिणत होजाता है । साथ ही अर्थविषयात्मक विषयावच्छिन्न ज्ञान हीं आगे जाकर अर्थ दोनों श्रविनाभूत हैं, तादात्म्यभावापन्न हैं । अतएव में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, शब्द और विषय सहकारी बना रहता है, एवं अर्थात्मक विषयज्ञान के शब्दात्मक विषयज्ञान के अवसर पर अर्थात्मक है । घटविषयक अर्थज्ञानकाल में घट शब्द भी अन्तःकरण अवसर पर शब्दात्मक विषय सहकारी बना रहता खड़ा देखते हैं, तो गोअर्थ का ज्ञान तो होता ही है, में प्रकट होजाता है । गोपशु को चज हम अपने सामने में प्रविष्ट होजाता है । इसी प्रकार ' गौ ' शब्द सुनने से परन्तु साथ साथ ही गोशब्द भी हमारी ज्ञानसीमा ही गोशब्दवाच्य गोपदार्थ भी ज्ञान सीमा में प्रविष्ट होजाता है । शब्दात्मक ज्ञान तो होता ही है, परन्तु साथ भाँति शब्द, और अर्थ दोनों नित्य सम्बद्ध हैं । इसी तादात्म्य-कारण इसका यही है कि - पार्वतीपरमेश्वर की हैं— सम्बन्ध का निरूपणा करते हुए भगवान् भतृहरि कहते
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥
- वाक्यपदी , और शब्द दोनों को साथ पूर्वं कथनसे -- ' विषयाकारारिता अन्तःकरणरूपावृत्ति है । संस्कार यही वृत्ति संस्कारज्ञानरूपा है, यही लेती हुई प्रवृत्त होती है ' यह भलीप्रकार सिद्ध है । इसी होजाता भेदभाव के कारण हम तीनों को ( प्रत्येक को ) वेद-अर्थज्ञानरूपा है, एवं यही शब्दज्ञानात्मिका १७७
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः ब्रह्मविद्या इन तीनों शब्दों से सम्बोधित करसकते हैं । कारण स्पष्ट है । आरम्भ में तीनों की यद्यपि विजातीयरूप से प्रतीति होती है, परन्तु विज्ञानदृष्टि से तीनों समान हैं । श्रर्थावच्छिन्न ज्ञान भी अन्ततोगत्त्वा ज्ञान है, संस्कारावच्छिन्न ज्ञान भी ज्ञान है, एवं शब्दावच्छिन्न ज्ञान भी ज्ञान है - " सर्व कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमाप्यते ' ( गीता ० ४।३३ । ) । विशेषणभेद से साधारण दृष्टया भेद प्रतीत होने पर भी मौलिक-तत्त्वदृष्टि से तीनों सर्वथा एक हैं । थोड़ी देर के लिए विशेषणभेद को प्रधान मान कर ही विचार कीजिए । इस भेदभाव की प्रधानता के कारण सर्वथा विभिन्न वेद - विद्या - ब्रह्म- तीनों के अवान्तर तीनों वेदों का स्वरूप ' भिन्न भिन्न होजाता है । अर्थात्मक ऋग्यजुः - साम - भिन्न हैं, इसी भेद को लक्ष्य में रखकर “ त्रयं ब्रह्म " " त्रयोवेदाः " - " त्रयीविद्या " यह कहा गया है । इसप्रकार ब्रह्म वेद - विद्या - रूप तीन विशेषणों के भेट से तीनों को पृथक मान लेने पर भी कोई क्षति नहीं है । भले ही तीनों भिन्न स्रोत हों, वह तो एक ही तत्त्व है । वही ब्रह्म बना है, वही विद्यास्वरूप में परिणत हुआ है, एवं वही वेद बना है । नाम - रूपात्मिका प्रतीति का आधारभूत वेद भी वही है, सर्वप्रतिष्ठारूप ब्रह्म भी वही है, वही संस्काररूप आत्मा का अन्न बना हुआ है-" एकं वा इदं विबभूव सर्वम् " इसका कौन प्रतिवाद कर सकता है? । ज्ञानघन आत्मतत्त्व की इन्हीं विभूतियों का निरूपण करती हुई उपनिषच्छति कहती है—
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म - नामरूपमन्न च जायते ॥
- मुण्डक ० १ | १६ |
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥
— यजुः सं ० ३ | १ | ७ ब्रह्म श्रुत्युक्त नामरूपात्मक तत्त्व शब्दप्रधान बनता हुआ वेदप्रधान है । अर्थात्मक प्रतिष्ठालक्षण ब्रह्मप्रधान है, अन्न संस्कारात्मिका विद्या का सूचक है । उक्त मुण्डकश्रुति का विशद वैज्ञानिक विवेचन तो “ मुण्डकोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य " में हीं देखना चाहिए । यहाँ प्रकरणसङ्गति के लिए केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, ज्ञान - क्रिया - अर्थ - मय, अतएव सर्वज्ञ, सर्वशक्ति सर्ववित् नामों से प्रसिद्ध, श्रव्ययात्मक्षर से अनुग्रहीत, अक्षरमूर्त्ति, उस चिद्धन प्रजापत्ति के ज्ञानमय तप से पहिले “ ब्रह्म - नामरूप-अन्न ” ये तीन ही तत्त्व प्रादुभूत हुए हैं । ब्रह्म से अर्थसृष्टि का विकास हुआ है, नामरूप से शब्दसृष्टि का वितान हुआ है, एवं अन्न से उभय ( शब्दार्थ ) सम्बद्धा संस्कारसृष्टि का उदय हुआ है । सृष्टिवर्ग में ये तीन सृष्टियाँ हीं प्रधान हैं । इतर सम्पूर्ण सृष्टियों का इन्हीं तीनों में अन्तर्भाव है । अर्थसृष्टयवच्छिन्न वही प्रजापति ब्रह्म है, शब्दसृष्टयवच्छिन्न वही प्रजापति वेद हैं, एवं संस्कारसृष्टयवच्छिन्न वही प्रजापति विद्या ( अपराविद्या ) है । यह एक माना हुआ सिद्धान्त है कि अर्थ ही ज्ञान, एवं क्रिया की प्रतिष्ठा है । निर्विषयक ज्ञान तो निर्विकल्पक बनता हुआ तिरोहित ही होजाता है । एवमेव क्षणिक क्रिया का आधार मी स्थिर अर्थ ( पदार्थ ) ही है । यदि अर्थ न हो, तो क्रिया कहाँ प्रतिष्ठित रहे? । विषयात्मक अर्थ ही ज्ञान, एवं क्रिया को अपने उपर १७८
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वेदनिरुक्त उपनिषद्भूमिका ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः प्रजापति पर प्रतिष्ठित हैं । श्रतएव प्रतिष्ठि रखता है । दूसरे शब्दों में- ज्ञान, एवं क्रिया विषयावच्छिन्न ( विषयावच्छिन्न ) प्रजापति को हम “ बिभत्त ज्ञानक्रिये - तद्ब्रह्म " इस निर्वचन के अनुसार प्रतिष्ठा अर्थावच्छिन्न है - " ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ( शत ० श्रवश्य ही " ब्रह्म " कह सकते हैं । यही ब्रह्मतत्त्व सब की ' है । ' ६ | १ | १ | ६ | ) | यही उस प्रजापति का पहिला ब्रह्मविवर्त्त । " गौ " शब्द के सुनते ही " गौ ” यह शब्द से वस्तु का रूप, एवं नाम दोनों पकड़ में आजाते हैं । ऐसी हैं अवस्था में शब्दावच्छिन्न प्रजापति को नाम, और सास्नादिमत्त्व गौ का रूप, दोनों गृहीत होजाते से ही विषय प्रकाशित रहता है, एवं नामरूप हम अवश्य ही " नामरूप " कह सकते हैं । नामरूप को “ ज्योति ” भी कहा जाता है । यही उस से ही विषय की भाति ( ज्ञान ) होती है । अतएव नामरूप प्रजापति का दूसरा ' नामरूपवित्रत ' है । ब्रह्म, दोनों से श्रात्मा संस्कृत रहता | संस्कारा-नामरूपात्मक ज्योतिर्म्मय शब्द, एवं अर्थात्मक अर्क हैं । हैं । जबतक उक्थ है, तभीतक वच्छिन्न प्रजापति ही अन्न है । विषयसंस्कार ही श्रात्मा के उक्थ का सम्बन्ध है । अन्न ने ही साकाररूप में परिणत जत्रतक अर्क हैं, तभीतक श्रात्मा के साथ अशीति ( अन्न ) - " अशीतिभिर्हि महदुक्थमाध्यायते ” होकर आत्मा को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित कर रक्खा है, जैसाकि है, साथ ही में पहिले से प्रतिष्ठित उक्थों का इत्यादि श्रौतवचन से स्पष्ट है । जिस दिन अन्नाहुति बंद होजाती हुआ मुक्त होजाता है । उक्थविद्या वेद की भोग समाप्त होजाता है, उस दिन श्रात्मा संस्कारशून्य होता विशद निरूपण हुआ है । श्रात्मा में अनन्त एक बड़ी ही रहस्यपूर्णा विद्या है । विषेषतः सामवेद में इसना इन अनन्त उक्थों की श्राश्रयभूमि होने से ही अशीतियों के कारण संस्काररूप अनन्त उक्थ बैठे रहते हैं । उक्थ पहिले से प्रतिष्ठित रहता है, वह आत्मा को " महदुक्थ " कहा जाता है । श्रात्मा में जिस उक्थप्रधान अन्न का आत्मा सात्त्विक अन्न की, तामस वाला तत्समानधर्म्म अन्न की ही इच्छा करता है । सात्त्विक अन्न का श्रागमन । यदि बलात्कार से प्रकृतिविरुद्ध तामस की, राजस वाला राजस की ओर ही प्रवृत्त होता है कालान्तर में एक स्वतन्त्र उक्थ बनता हुआ होता है, तो सहसा श्रात्मा घबड़ा जाता । परन्तु आगत अन्न का कारण यही है कि, से घृणा करता है । इस घृणा पुनः तदन्नग्रहण से शान्त होजाता है । एक व्यक्ति मद्य नहीं निकलते । ऐसे व्यक्ति की किसी मद्यपी उसके श्रात्मा में मद्य का उक्थ नहीं है, अतएव तद्रूप अर्क संस्काररूप से धीरे धीरे उस व्यक्ति के ( शरात्री ) से मैत्री होजाती है । सङ्गातिशय के कारण होते मद्यपरमाणु जाते हैं । कालान्तर में जिस दिन संस्कारभाव श्रात्मा में ( श्रात्मानुगृहीत मानस धरातल में ) खचित, उस दिन उस मद्योक्थ से मद्यमय अर्क निकल पुञ्जरूप में परिणत होकर उक्थरूप में परिणत होजाता है अर्क, किंवा रश्मियाँ उस व्यक्ति की मद्यपान की पड़ते हैं । बिम्ब बना नहीं कि, रश्मियाँ निकलीं नहीं । ये ही स्वयं भी शराबी बन जाता है । इसप्रकार अर्क -इच्छा है । इसी इच्छा का वशवर्त्ती बना हुआ वह धीरे धीरे सञ्जायते कामः " ( गी ० २।६२ । ) । रूपा कामना का प्रधान स्तम्भ सङ्ग भी बन जाया करता है पूर्ण - ' सङ्गात् नियन्त्रण किया है । अत्र निवेदन यही करना इसी उक्थार्कभाव से बचने के लिए ऋषियोंनें कुसङ्ग का के अनुसार ही अन्नादान होता है । है कि, अन्न ही उक्थरूप संस्कारों का जनक बनता है । एवं संस्कारों से ही आत्मयज्ञ ( जोकि श्रात्मयज्ञ इसी संस्कारा की कृपा से श्रात्मा शरीरबन्धन में पड़ा हुआ है है । अन्नाहुति ) सम्पन्न होता है । अतएव इस अन्नतत्त्व को ब्राह्मणश्र तियों में - " भैषज्ययज्ञ " नाम से सम्बोधित हुआ " है । ' यज्ञ ' भी कहा जाता है । यही उस प्रजापति का तीसरा " अन्नविवर्त्त १७६
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः ब्रह्म ही प्रतिष्ठा है | नामरूप ही ज्योति है, एवं अन्न ही यज्ञ है । इन तीनों की समष्टि ही ' सर्वम् ' है । प्रतिष्ठा ब्रह्म है, यही विषयावच्छिन्न ज्ञान है । ज्योति नामरूप है, यही शब्दावच्छिन्न ज्ञान है, यही वेद है । यज्ञ अन्न है, यही संस्कारावच्छिन्न ज्ञान यही विद्या है । अपने ज्ञानमय तप से इन तीनों को उत्पन्न कारण कर ' तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार वह श्रभिन्नरूप से तीनों विवत्तों में व्याप्त होरहा है । वह हैं, एक है, ये तीनों उस एक के तीनों कार्य्य हैं । कार्य्यदृष्टि से तीनों भिन्न हैं, कारणदृष्टि से तीनों अभिन्न, सुवर्ण हैं । कारण भूत सुवर्ण से निर्मित कटक - कुण्डल - ग्रैवेयक [ चन्द्रहार ] तीनों कार्य्यं भिन्न भिन्न हैं तीनों में समान है । कार्य्यदृष्टि से तीनों भिन्न भिन्न हैं, कारणदृष्टि से तीनों एक तत्त्व है । निष्कर्ष यही हुआ कि - ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' [ छा ० उप ० ६ | १ | ४ ] इस सिद्धान्त के अनुसार , तो कारण से अनतिरिक्त श्रभिन्न ब्रह्म वेद - विद्या, इन तीनों कारणों को यदि कारणदृष्टि से देखा जाता है । कार्य्यभेदसत्ता विलीन होजाती है । उदाहरण के लिए पाँचों महाभूतों का विवत वाद ही अपने सामने रखिए पार्थिव विभाग [ मिट्टी ] ६४ प्रकार के हैं, आप्यविभाग [ जल ] ३० हैं । मृत् - शर्करा - सिकता मर- -घामन - वल्मीक - पीत - रक्त- श्वेत आदि भेद से मिट्टी ६४ जाति में विभक्त है । श्रम्भ- मरीचि -श्रद्धा - स्यन्दन्ती - एकधना - वसतीवरी - आदि भेद से पानी के ३० भेद है । एकविध गायत्रीतेज एकविध सावित्रतेज, श्रष्टविध नाक्षत्रितेज भेद से तेज १० भागों के विभक्त है । धुनि - ध्वान्त - ध्वन - ध्वनयन् निलिम्प - विलिम्प - विक्षिप ऋतू - सत्य - ध्रुव - वरुण - वर्त्ता- विधर्त्ता आदि वायु के ४६ अवान्तरभेद है हैं । | परमाकाश - पुराणाकाश - शरीराकाश - हृययाकाश - दहराकाश भेद से प्रकाश पाँच भागों में विभक्त । इन सब १५८ विभागों का वैज्ञानिकोंने पाँच ही भूतों में अन्तर्भाव मान लिया है । प्रकारान्तर से देखिए पृथिवी अन्न है, इसके ६४ भेद है, जल के ३० भेद हैं, तेज के १० भेद हैं, संभूय १०४ कार्य्यं होजाते हैं । आर्षं वैज्ञानिक विद्वान् इन सब अवान्तर कार्यो की अविवक्षा कर तेज -- अप् अन्न, इन तीनों कारणों में हीं इन सब कार्यों का अन्तर्भाव मानते हुए तीन ही तत्त्व मानते हैं । त्रिवृत्करण विद्या में ऋषियोंनें तेज अप्-अन्न की ही सत्ता स्वीकार की है - [ छन्दोग्य ० उप ० ६ | ३ | ३ | ] इस भूतविद्या के अनुसार ब्रह्मविद्या में भी न रखते हुए कारणभूत, अचिवर्चनीय सर्वत्र ऋषियोंनें कार्य्यभूत ब्रह्म - विद्या - वेद - इन तीनों का अपेक्षा व्याप्त, महामहनीय, एक ही परमब्रह्म [ श्रव्ययक्षरानुग्रहीत अक्षर ] की सत्ता स्वीकार की है । यही सबका आत्मा है । हम जो कुछ देखते हैं- ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' के अनुसार नानाभेदभिन्न वह सम्पूर्ण ब्रह्म प्रपञ्च " -ऐतदात्म्य है, आत्ममय है । इसी आत्मदृष्टि के आधार पर " ब्रह्म वेद ं सर्वम् ” “ सर्वं खल्विदं ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च ' इत्यादि नैगमिक सिद्धान्त प्रतिष्ठित हैं । इसप्रकार अबतक के कथन से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, सदसद्रूप कारणभूत ब्रह्म के कार्य्यरूप ब्रह्म - वेद - विद्या, इन तीनों कार्यों के कार्य्यत्त्व का अपलाप कर देते से दृश्यमान प्रपञ्च श्रात्मरूप भेद-ही है । घड़ा मिट्टी से बना है । मिट्टी कारण है, घड़ा कार्य्यं है । दोनों में परस्पर भेदाभेद, किंवा मृत्तिकैव " सहिष्णु - अभेदसम्बन्ध है । ऐतदात्म्य - सम्बन्ध से दोनों ही व्यवहार देखे जाते हैं । “ घटोऽयं [ यह घड़ा मिट्टी ही है ] -- ‘ घटोऽयं मृत्तिकाजन्य: ' [ यह घड़ा मिट्टी से उत्पन्न हुआ है, दोनों ' हीं यह व्यवहार व्यवहार सुप्रसिद्ध हैं । ठीक इसी प्रकार यहाँ भी ' ब्रह्म वेदमीश्वरः- विद्ये यमीश्वरः, वेदोऽयमीश्वरः भी भी होसकता है । एवं ' ब्रह्म ' दमीश्वरकृतम्, विद्यमयीश्वर कृता- वेदोऽययीश्वरकृतः ' यह व्यवहार सम्भव है । इसी कार्य्यकारणभाव को लक्ष्य में रखते हुए हम ' वेद ' को साक्षात् परमेश्वर कह सकते हैं । १८०
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः साथी ही में " वेदईश्वरकृत है ", यह भी कहा जासकता है । जिनके मतानुसार ( कारणपक्षपातियों मी अपौरुषेय के मतानुसार ) ईश्वर वेदमूर्त्ति है, ईश्वर अन्यपुरुषसे अनुत्पन्न है, नित्य है, अतएव वेद है । एवं जो है, अकृतक है, नित्यकूटस्थ है, उनके इस मत का भी कारणदृष्टि से समादार किया जासकता की वेद को ईश्वरकृत मानने के पक्षपाती [ कार्य्यदृष्टि को प्रधान मानने वाले ] हैं, उनके मतानुसार भी वेद पौरुषेयता, एवं नित्यता ज्यों की त्यों अक्षुण्ण बनी रह जाती है । कारण स्पष्ट है । महापुरुष ईश्वर के अतिरिक्त । उसका बनाने वाला और कौन होसकता है? । उधर उस नित्य महापुरुष की इच्छाशक्ति सर्वथा नित्या है नित्य इच्छा सिद्ध इस नित्यवेद की पौरुयेयता में कोई बाधा नहीं श्रासकती । ईश्वर को पुरुष मान कर थोड़ी है । देर के लिए तत्कृतिसाध्यता का समादर करते हुए वेद को पौरुषेय भी मानलें, तब भी कोई नहीं क्षति “ शास्त्रयोनित्त्वात् ' [ शारीर ० सू ० १ | १ | ३ | ] इत्यादि वेदान्तसूत्र ऐसा मानने में कोई आपत्ति नहीं समझते । ब्रह्मतत्व को हमने प्रतिष्ठा कहा है । यही आत्मा की सत्ताकला का विकास है, यही ॠग्वेद है । वेदतत्त्व को हमने ज्योति कहा है । यहीं श्रात्मा की चित्कला का विकास है, यही सामवेद है । विद्या को हमने आत्मोक्थ कहा हैं । यही आत्मा है, यही आत्मा की आनन्दकला का विकास है, यही यजुर्वेद है वेदों । वही का ब्रह्म - वेद - विद्या - लक्षण आत्मवेद है । श्रात्मा के त्रिवृद्भाव के कारण इन में [ प्रत्येक में ] तीनों है, एवं उपभोग होजाता है । ऋङमय ब्रह्मात्मक वेद भी त्रयीवेद है, साममय वेदात्मक वेद भी त्रयीवेद यजु विद्यात्मक वेद भी त्रयीवेद है । १- वेदवेदः ( सामवेदः ) -विषयावच्छिन्न ज्ञान को ही हमने ब्रह्म कहा है । यही प्रतिष्ठातत्त्व है, यही सत्तातत्त्व है, यही ऋग्वेद है । इस ' विषय ' में नाम - रूप - कर्म्म, ये तीन कलाएँ नित्य प्रतिष्ठित रहती हैं । इनमें नामप्रपञ्च वाङमय ॠग्वेद है, रूपप्रपञ्च मनोमय यजुर्वेद है । एवं कर्म्मप्रपञ्च प्राणमय सामवेद है । २- ब्रह्मवेद ( ऋग्वेदः ). सामतत्त्व शब्दावच्छिन्न ज्ञान को ही हमनें वेद कहा है । यही ज्योतितस्त्व है, यही चेतनातत्त्व है, मानव यही बोलता है । वाङमय शब्द ही चेतना का निर्गमस्थान है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि ', यह जबतक कहा जाता है | चेत रहता है, तभीतक उसके सम्बन्ध में ' अरे! देखो देखो उसने चेत कर लिया भी यही रहस्य है । करना चेतना का ही व्यापार है । यही श्रात्मज्योति है । ' वाग्ज्योतिरयं पुरुषः ' का कर रहा है । यह शब्द-' सर्व शब्देन भासते ' भी शब्दतत्त्व के इसी ज्योतिर्म्मय चेतना - भाव का ही समर्थन यजुः ऋक् -साम प्रपञ्च गद्य - पद्य - गेय - भेद से तीन भागों में विभक्त है । स्मरण रहै, इन तीनों से सुप्रसिन्न रखने वाले शब्द नाम की वेदसंहिताएँ कभी अभिप्रेत नहीं है । अपितु प्राणिमात्र की वागिन्द्रिय से सब सम्बन्ध यजुर्वेद का विकास है । से ही यहाँ हमारा तात्पर्य है । संसार के शब्दमात्र में जितना गद्य का अंश है, निःसीमतत्त्व वह है । अव्ययप्रधान कारण इस का यही है कि, यजुम्भय आत्मा आनन्दप्रधान है । श्रानन्द गद्यात्मक शब्दप्रपञ्च को यजुर्वेद आनन्द ही यजुः है । गद्य भी निःसीम है । इसी सादृश्य के कारण हम १८१
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा वेदनिरुक्तिः कह सकते मान सकते हैं । पद्यात्मक [ छन्दोबद्ध ] शब्दप्रपञ्च प्रधान है को । सत्ता हम प्रतिष्ठातत्त्व ऋग्वेद है । क्षरप्रधाना सत्ता कारण इसका यही है कि, ऋग्वेदमय श्रात्मा सत्ता पद्य है । इसी सादृश्य के कारण पद्यात्मक शब्द ही ॠग्वेद है । चरकूट ही तो सत्ता है, व्यञ्जनकूट स्वरलहरी ही तो के समावेश से गान का स्वरूप निष्पन्न होजाता ऋग्वेद है । ' गेय ' भाग सामवेद है । पद्य में ही चेतनाप्रधान है । सामात्मक गान से पशु है । पद्य का वितान [ फैलाव ] ही तो गान है । साममय आत्मा चेतना ही साम है । अक्षर को ही स्वर कहा पक्षियों तक में चैतन्य विकसित देखा गया है । अक्षरप्रधाना यह भाग को साम है । इसी समानता से हम गेय जाता है । स्वर ही तो वितत होकर पद्य को गेय बना डालता मान सकते हैं- ' गीतिषु सामाख्या ' । ३ – विद्यावेदः ( यजुर्वेदः ) -होते हैं । शब्दश्रवण संस्कारावच्छिन्न ज्ञान को ही विद्या कहा गया है । संस्कार तीन प्रकार से उत्पन्न , किंवा कर्म्मप्रधान संस्कार है । से भी संस्कार होता है । कर्म्म करने से भी संस्कार होता है, यही कम्र्म्मात्मक के आधार पर नवीन नवीन विषयज्ञान से भी संस्कार होता है, एवं बिना विषय के केवल सांस्कारिक विषयों संस्कारों का तो पूर्व के कर्म-काल्पनिक संस्कार उदित होते रहते हैं । इन दोनों में विषयज्ञान - सम्बन्धी प्रथम संस्कार कहलाते हैं । यहाँ संस्कारों में ही अन्तर्भाव है । दूसरे काल्पनिक संस्कार ज्ञानसंस्कार, किंवा ज्ञानप्रधान स्वयं ज्ञान तो ज्ञान है ही । जिन संस्कारों के आधार पर ज्ञान नवीन कल्पना करता है, वे भी ज्ञानमय हैं, एवं से आत्मा पर एक छाप सी इसीलिए इन काल्पनिक संस्कारों को हम ज्ञानसंस्कार कह सकते हैं । शब्द है सुनने । ठाले बैठे नई नई कल्पनाओं से लग जाती है, विषयदर्शन से भी वह विषय हृत्पटल पर खचित होजाता होते देखे गए । इन तीनों हीं संस्कारों का भावना - बासना - संस्कार में अन्त-भी नवीन नवीन संस्कार उदित है, एवं शब्दजनित संस्कार र्भाव है । कर्म्मजनित संस्कार वासनाप्रधान हैं, ज्ञानजनित संस्कार भावनाप्रधान अनुस्यूत है, एवं कर्म्म में भी उभयप्रधान है । इन तीनों में मूल शब्दजनित संस्कार ही है । ज्ञान में लेने भी वाला शब्द एक विद्वान् भी अपनी ज्ञानीय शब्द अनुस्यूत है । दोनों हीं में शब्द सहायक बनता है । ज्ञान से काम भी कर्म्म करते समय शब्द का श्राश्रय लेता कल्पनाओं में शब्द को ही मलाधार बनाता है । कर्म्मप्रधान एक मजदूर हैं, तो सच के मुख देखा गया है । प्रासादादि निर्माणकाल में मजदूर लोग जब भी कभी कोई बोझल करते वस्तु देखे उठाते गए हैं । इस शब्दाश्रय से‘हाँ देखना - सावधान - वाह मेरे शेर अव क्या है ' ऐसे वाक्यों का प्रयोग के कारण शब्दसंस्कार को हम से अवश्य ही उन्हें अपने कर्म में सहायता मिलती है । इसी मूलप्रतिष्ठा , सत्ता ही ऋकू है, यही क्षरभाव है 1 ऋग्वेद मान सकते हैं । क्योंकि प्रतिष्ठा ही सत्ता है है । फलतः कर्म्मजनित-कर्म्म में अक्षरप्रधाना चेतना का विकास है । चेतना ज्योति है । ज्योति साम विकास है, आनन्द आत्मा है, संस्कार का साममयत्त्व होना सिद्ध होजाता है । ज्ञान अव्ययप्रधान कह आनन्द सकते हैं का । इसीलिए तो ज्ञानीय कल्पना आत्मा यजुः है । अतएव हम ज्ञानजनित संस्कार को यजुर्वेद उपभोग सिद्ध होजाता है, जैसा कि आगे के में श्रानन्द आया करता है । इसप्रकार तीनों में तीनों वेदों का परिलेखों से स्पष्ट होजाता है । १८२
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वेदनिरुक् उपनिषद्भूमिका ( प्रतिष्ठा — सत्ता ) — ऋग्वेदः १- विषयावच्छिन्न ज्ञानं ब्रह्म -ब्र प्र - विद्या - बेद लक्षणा - - वेदनिरुक्तिः विकास - चेतना ) -सामवेदः २– शब्दावच्छिन्न ं ज्ञानं– वेद: – ( ज्योतिः एका - वेदत्रयी - श्रानन्दः ) --यजुर्वेदः ३ – संस्कारावच्छिन्न ं ज्ञानं -- विद्या ( आत्मा FRI - वेदत्रयोपभोगः-१- प्रतिष्टलक्षण सत्तात्मके ब्रह्मवेदे मृग्वेदे ) - प्रतिष्ठा — ऋग्वेदः १ – नामप्रपञ्च – ( वाङ मयी सत्ता ) - ज्योतिः — सामवेदः २- रूपप्रपञ्च --- - ( मनोमयी चेताना --- यजुर्वेदः ३ — कर्म्मप्रपञ्च —- ( प्राणमय श्रानन्द ) - श्रात्मा > ब्रह्मवेदः ऋक् 531 - - वेदत्रयोपभोगः-२ – ज्योतिर्लक्षणे चिन्मये वेदवेदे — ऋग्वेदे सत्ता ) - प्रतिष्ठा — ऋग्वेदः १ — पद्यात्मक शब्दप्रपञ्च ( वाङ मयी क्षरप्रधाना अक्षरप्र ० चेतना ) — ज्योतिः - सामवेदः २ - गानात्मक शब्दप्रपञ्च - ( प्राणमयी ० श्रानन्द ) - श्रात्मा - यजुर्वेदः ३ – गद्यात्मक शब्दप्रपञ्च - ( मनोमय अव्ययप्र वेदत्रयोपभोगः– ३ – श्रात्मलक्षणे आनन्दमये विद्यावेदे – यजुर्वेदे -उत्ता १ – शब्दावच्छिन्न संस्कार— ( बाङमय ) -२ –कर्म्मजनित संस्कार —-- ( प्राणमयी चेतना ३ - ज्ञानजनित संस्कार --- ( मनोमय आनन्द ) — श्रात्मा यजुर्वेदः 1 ( 58 ) २ — वेद वेद: --- साम ( 25 ) - विद्यावेद: - यजुर्वेदः - * -१८३ E क है