Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 501–510

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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वेद क्ि प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः अव्यय - अक्षर- श्रात्मक्षर - परात्पर की समष्टिरूप चतुष्पाद् ब्रह्म ही कारणभूत आत्मा है । आत्मक्षर की दृष्टि से वही श्रात्मब्रह्म सृष्टि का उपादान कारण है, अक्षर की दृष्टि से वही श्रात्मब्रह्म निमित्त कारण है, श्रव्यदृष्टि से वही श्रात्मब्रह्म आलम्बन कारण है । एवं परात्परदृष्टि से वही आत्मब्रह्म कार्य - कारणा-तीत है । इस कारणभूत श्रात्मब्रह्म से स्थूलसृष्टि की मूलभूता क्रमशः ब्रह्म - नामरूप अन्न नामकी - ब्रह्म वेद - विद्या-इन तीन सृष्टियों का विकास होता है । इह्रीं तीनों का उपबृंहण यह विश्व है । इस विश्व में आगे जाकर अग्नीषोमात्मक चारों विश्ववेदों का विकास होने वाला है । इससे पहिले पहिले का सम्पूर्ण वेदविवर्त्त ' आत्मकोटि में हीं अन्तर्भूत है । इसी प्रकृतिसिद्ध वेदावतार - क्रम को लक्ष्य में रखकर हमने अनेक दृष्टियों से पहिले सच्चिदानन्दलक्षणभूत मूलकारणात्मक श्रात्मवेद, किंवा आत्मवेदत्रयी का दिग्दर्शन कराया है, इसके पीछे जूलकारणभूत ब्रह्म वेद - विद्या - लक्षण श्रात्मवेद का स्वरूप बतलाया । इसप्रकार आरम्भ से अबतक विश्वगर्भ में सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म - वेद - विद्या - वेदकृतमूर्त्ति सच्चिदानन्दलक्षण आत्मवेद, किंवा मूलवेद का ही निरूपण हुआ है । अब यद्यपि क्रमप्राप्त तूलवेदात्मक श्रग्नीषोममय विश्ववेद का निरूपण करना चाहिए था, तथापि वेदतत्त्व का स्पष्टीकरण करने के लिए दो चार स्थलों में वेदतत्त्व की व्याप्ति दिखला देना आवश्यक प्रतीत होरहा है । इन कुछ एक वेदसंस्थाओं से, साथ ही में पूर्वप्रतिपादित वेद के तात्त्विक स्वरूप से वेदभक्तों को यह मान लेने में श्रणुमात्र भी सन्देह नहीं रहेगा कि, वेद वास्तव में वेद एक तत्त्व विशेष है, जो कि श्रात्मवत् सर्वत्र व्याप्त है । वेदग्रन्थ वेद नहीं है, वेदग्रन्थ तो वेदतत्वप्रतिपादक शब्दशास्त्रमात्र है । श्रागे के वेदप्रकरण में उदाहरणरूप से निम्नलिखित ७ संस्थाओं का ही संक्षेप से दिग्दर्शन कराया जायगा । ( १२ ) १ - पर्णवेदनिरुक्तिः ( १३ ) २ -- भावनावेदनिरुक्तिः ( १४ ) ३ —– भाववेदनिरुक्तिः ( १६ ) ५ -- देश वेदनिरुक्तिः ( १५ ) ४ – दिग्वेदनिरुक्तिः ( १७ ) ६ - कालवेदनिरुक्तिः ( १८ ) ७ — वर्णवेदनिरुक्तिः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या - वेद - भिन्ना-ज्ञानलक्षणा - आत्मवेदनिरुक्तिः ११ १८४

पृष्ठ 502

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पृष्ठ 503

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मविद्या - वेद - भिन्ना-ज्ञानलक्षणा- श्रात्मवेदनिरुक्तिः ११

पृष्ठ 504

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श्रीः अथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( १ ) - पर्ववेदनिरुक्तिः - प्रकोर्णभावापन्ना १२

पृष्ठ 505

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( १ )

पृष्ठ 506

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क श्रीः अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ क ( १ ) - पर्ववेदनिरुक्तिः - प्रकीर्णभावापन्ना १२ - * --समझना चाहिए | त्रयीवेद से ' त्रयीवेद ' के साथ ही सम्बन्ध को अपने गर्भ में क्रमप्राप्त १२ इस ‘ पर्ववेद ' का प्रधानरूप प्रकरणों में देखेगे । असंख्य व्यष्टियों पाठक श्रागे के माना गया है, जैसाकि निम्न की मूलप्रतिष्ठा अग्नितत्त्व है, जैसाकि का मौलिक स्वरूप सोमगर्भित अग्नितत्त्व ही रखने वाले महासमष्टिरूप महाविश्व से स्पष्ट है— लिखित ' बृहज्जाबाल ' सिद्धान्त मृत निष्पत्ति र मृतेनाग्निरेधते ॥ जगत् " अतएव हविःक्लृप्त- “ मग्नीषोमात्मकं ऊर्ध्वशक्तिमयः सोम अधः शक्तिमयोऽनलः ॥२ ॥

ताभ्यां सम्पुटितस्तस्माच्छश्वद्विश्वमिदं जगत् में प्रतिष्ठित व्यष्टिरूप चर-महाविश्व, एवं विश्व के गर्भ किञ्चन " उक्त उपनिषद्वर्णन के अनुसार समष्टिरूप हैं, जिनका कि – “ शिवशक्तिभ्यां नाव्याप्तमिह ने चर - पदार्थ अग्नि - सोम के ही सम्पुटितरूप दाम्पत्यरूप पर विश्राम माना गया है । इसी दाम्पत्यभाव का ही प्रश्नोपनिषत् अपनी याज्ञिक इत्यादि रूप से ' उमामहेश्वर ' के से स्पष्टीकरण किया है । ब्राह्मण रहस्यवेत्ता महर्षि इसे रयि - प्राण, तथा योषा वृषा रूप - तेज, आज्य - पृष्ठ, इत्यादि नामों से व्यवहृत कर रहे हैं । परिभाषा में - शुष्क, स्नेह में रहने वाला विश्व एक महावेद है, एवं विश्वगर्भ तात्पर्य्य यही हुआ कि, सोमगर्भित ' अनन्ता अग्निमूर्त्ति वै वेदाः ' ( तै ० ब्राह्मण ) के अनुसार इन व्यष्टयात्मक प्रत्येक पदार्थ एक एक अल्पवेद है रखने । वाले अग्नीषोममय महाविश्वात्मक उसी महावेद को इस विश्वव्यापक वेदमूर्त्ति में अनन्त वेदों को अपने गर्भ में है, जैसाकि उसके “ वेदमूर्त्ति " नाम से स्पष्ट है । यद्यपि ६ | ५ | १ | ) इस विश्वात्मा का शरीर माना गया है, तथापि " अत्तैवाख्यायते नाद्यम् ” ( शत ० ११ | को ही उसका अग्नि - सोम, दोनों तत्त्वों का समन्वय ( अन्न ) लक्षण सोमगर्भित अता ( अन्नाद ) लक्षण अग्नि गर्भ में प्रतिष्ठित वाजिसिद्धान्त के अनुसार आद्य है । इसी दृष्टि से हम उस महासमष्टि को, एवं समष्टि के यही अग्नितत्त्व प्रातिश्विक स्वरूप मान लिया गया से ही सम्बोधित करना उचित समझते है । आगे जाकर ' व्यक्तियों को केवल ' अग्नि ' शब्द बनता है । हमारे प्रकृत ' पर्ववेद ' की आधारभूमि ०३१८६

पृष्ठ 507

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड पर्ववेदनिरुक्तिः पूरणार्थक ' पर्व ' धातु ( ' पर्व ' पूरणे भ्वा ० प ० से ० ) से बाहुलकात् ' कनिन ' होने से ' पर्वन् ' शब्द निष्पन्न हुआ है । फलतः पर्व शब्द का अर्थ होता है— कमी पूरा करने वाला । शरीर के श्रद्धों का जबतक यथावत् सञ्चालन होता रहता है, तभीतक शरीरयष्टि की रक्षा रहती है, एवं तभीतक शरीर की कमी मानीं पूरी होती रहती है । अस्थि - मज्जा - शुक्र - शोणित आदि व्यष्टियाँ हीं शरीरसमष्टि की पूरिका, एवं रक्षिका गई हैं । व्यक्तिरक्षा ही समाज, किंवा राष्ट्ररक्षा का मूलमन्त्र है । व्यक्तियों के प्रयास से ही समाज की श्राव-श्यकताएँ पूरीं होतीं हैं, एवं इन्हीं आवश्यक सामग्रियों से समाज अपने स्वरूप की रक्षा करने में समर्थ होता है । श्रतएव ' पिपर्त्तीति - ( पृ ० - पालन- पूरणयोः - जु ० प ० से ) इस कोशनिरुक्ति के अनुसार उस वस्तु को पर्व कहा जाता है, जिसके द्वारा तत्तद्वस्तुविशेषों का समष्टि - व्यष्टिरूप से पालन होता रहता है, कमी पूरी होती रहती है । समष्टिरूप महाविश्व की रक्षा के लिए भी अवश्य ही ' पर्व ' नाम की एवं विश्व के गर्भ में प्रतिष्ठित व्यष्टिरूप पदार्थों के लिए भी अवश्य ही किसी होनी चाहिए । वही पूरक रक्षक तत्त्व ' पर्व ' कहलाएगा । ऐसी कोई वस्तु होनी चाहिए, पूरक, तथा रक्षक की अपेक्षा शरीर के अङ्ग अपनी धातु- प्रस्रवण क्रिया के द्वारा शरीर के रक्षक - पूरक बनते हुए शरीर के पर्व हैं । उत्सवविशेषों से सम्बन्ध रखने वालीं तिथियाँ दैवाराधन के द्वारा, मानसोल्लास के द्वारा, आदि दृष्टियों से समाज में जीवनस्रोत, तथा श्रात्मशक्तिसञ्चार कग्ने के कारण पर्व हैं । सम्पूर्ण खगोल की मूलप्रतिष्ठा बनता हुना विष्वद्वृत्त खगोल का रक्षक तथा पूरक बनता हुआ पर्व है । इसप्रकार अपनी रक्षावृत्ति, और पूरकवृत्ति से पर्वशब्द अनेक भावों का वाचक बना हुआ महाविश्व भी सोमगर्भित अग्निमय, विश्वगर्भ में प्रतिष्ठित व्यष्टियाँ भी एतद्र प हीं, परिणामतः होरही दोनों - के स्वरूप की ' अग्नि ' तत्त्व पर ही विश्रान्ति । विश्वस्वरूपरक्षक इस अग्नितत्त्व की रक्षा जिन भावों से है, उन्हीं को हम अग्निपर्व कहेंगे । वे ही अग्निपर्व विज्ञानभाषा में उक्थ - पृष्ठ -- ब्रह्म - इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । इन्हीं तीन पर्वों के सम्बन्ध से अग्नितत्त्व त्रयीवेदस्वरूप में परिणत होरहा है । इसी दृष्टि को प्रधान रखता हुआ यह त्रयीवेद ' पर्ववेद ' कहलाया है । जैसाकि विषयारम्भ में स्पष्ट किया जाचुका है, सभी पदार्थ अग्निपदार्थ हैं । यह अग्नितत्त्व उक्थ-एक ही अग्नि-पृष्ठ - ब्रह्म, इन तीन पर्वों से सदा युक्त रहता है, यह भी कहा जासकता है, एवं ये तीनों उस भी वस्तु तत्त्व की तीन विशेष अवस्थाएँ है, यह भी माना जासकता है । उभयथा तात्पर्य्य समान है । किसी । जहाँ से वस्तु को ले लीजिए । अवश्य ही उस वस्तु का आप एक उपक्रम - ( श्रारम्भ ) - स्थान स्वीकार करेंगे का आरम्भ होता है, वस्तुरूप का उपक्रम होता है, वही उपक्रमस्थान ' उक्थ ' कहलाता का है, पृथिवी । इस श्रोषधि- सामान्य परिभाषा के अनुसार दीपार्चि ( लौ ) प्रकाश का, वागिन्द्रिय शब्दों का, मेघ दृष्टि का, पुण्य सुलोकों वनस्पतियों का, लेखिनी लिपि का, न्यायाध्यक्ष ( जज ) न्याय ( जज्मेन्ट ) का, गुरु उपदेश, उद्गाता का, पाप अधोलोकों का, निष्कामभाव विदेहमुक्ति का, श्रध्वर्यु श्रावर्ण्यकर्म्म का, होता हौत्रकर्म्म का अपने श्रपने औद्गात्रकर्म्म का उक्थ माना जायगा । विश्व के समष्टि होंगे - व्यष्टयात्मक । यच्चयावत् जड़चेतन पदार्थ आरम्भस्थान की दृष्टि से “ उक्थ " रूप से उपलब्ध १६०

पृष्ठ 508

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उपनिषद्भूमिका पर्ववेदनिरुक्तिः का हृदय ( केन्द्र - गर्भ ) ही माना गया है । हृदय अग्निप्रधान प्रत्येक पदार्थ का आरम्भस्थान उस पदार्थ ' प्रस्ताव ' भी कहा जाता से ही वस्तु प्रस्तुत होती है श्रतएव इसे ही उस वस्तु का श्रारम्भस्थान है । क्योंकि हृदय चौड़ी वस्तु सुनी जाती है, में प्रस्ताव नाम की जो लम्बी है । उत्तालतरङ्गमयित आज की श्रमर्थ्यादित - सभाओं निरर्थक सिद्ध हो रही है ) उसका से शून्य रहती हुई सर्वथा ( जो कि वस्तु अपने आगे के पृष्ठ - ब्रह्म, इन दो पर्वों जो उपक्रम - बीज है, वही आरम्भ करने वाले व्यक्ति का भी इसी उक्थ पर पर्य्यवसान है । किसी भी विषय का प्रस्ताव है । तचद्वस्तुत्रों का ' उक्थ ' माना जायगा! यही हृदयस्थानीय प्रस्तावबिन्दु, किंवा आरम्भस्थान ही जायगा । और इसी ' उक्थ ' पर्व प्रथम, एवं मुख्यपर्व कहा अग्निरूप वस्तु का, किंवा वस्तुगत श्रग्नितत्व का ) ही ' ऋ ' है । स्तुति शब्द प्रस्ताव का ही सूचक को हम ‘ ऋक् ’ कहेंगे 1 । स्तुत्यर्थक ' ऋच् ' ( ऋचि - स्तुतौ वस्तु का हृदय ही माना गया है । एवं वस्तुगत । प्रस्ताव श्रारम्भस्थान का ही द्योतक है । श्रारम्भस्थान ( उत्थानभूमि ) है । ही उस वस्तु का ' उक्थ ' यच्चथावत् भावों का प्रभव बनता हुआ हृदयपर्व शब्द, पतन रखता है । वियोग की अपेक्षा रखने वाला संयोग ' आरम्भ ' शब्द सर्वथा सापेक्ष भाव से सम्बन्ध शब्द है । प्रस्ताव वस्तु अवसान की अपेक्षा रखने वाला प्रारम्भ की अपेक्षा रखने वाला समुच्छ्रय शब्द, एवमेव अवसान है । प्रस्तावात्मक आरम्भ शब्द से बद्ध निघनात्मक का आरम्भ है, तो निधन वस्तु का नाश का वाचक तो केवल ' मृत्यु ' नहीं है । वस्तु के उच्छेदरूप अवसानशब्द वस्तुस्वरूप के नाश का द्योतक नहीं है । अपितु वस्तुस्वरूप की विद्यमानता से वह मृत्युभाव अपेक्षित शब्द ही माना गया है । यहाँ श्रवसान निधनशब्द से अभिप्रेत है । जिसे प्रकृत में अवसान, किंवा में वस्तु का जो अन्तिम श्रावरण है, वही में जिसे ' वयोनाध ' कहा जाता है, सामपरिभाषा याज्ञिकभाषा में ‘ छन्द ' कहा जाता है, विज्ञानभाषा हैं, अवसान से वही तत्त्व श्रभिप्रेत जिसे ' पारावतपृष्ठ ' कहते जिसे ' निधन ' कहती है, पृष्ठविज्ञानवेत्ता है । तो उपसंहार अन्तिम वयोनाध है । वस्तु का उपक्रम यदि हृदय है, - भाव के समाप्त है, ' पृष्ठ ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रस्ताव वस्तु की वही बाह्य - सीमा, जहाँ वस्तु - स्वरूप के सम्बन्ध से परिधिरूप आरम्भस्थान जैसे ' उक्थ ' कहलाता है, वैसे निधनभाव सम्बन्ध से हृदयरूप कहलाता है, एवमेव पृष्ठ अपने अपने प्रस्तावभाव से ऋक् अवसानस्थान ‘ पृष्ठ ' कहलाता है । उक्थ जहाँ ही साम है, साम ही आत्मविभूति का ही अवसाम है, अवसाम निधनभाव से साम कहलाता है । अवसान परिधि पृष्ठ है । आरम्भविन्दु उक्थ हृदय उक्थ है, वस्तु की अन्तिम विश्रामस्थान है । निष्कर्षतः वस्तु का है । इस ओर ॠक है, उस ऋक् है, पृष्ठ निधनात्मक साम है । अवसानस्थान पृष्ठ है । उक्थ प्रस्तावात्मिका है । मूल में हृदय कहलाने वाला । जो हृदय है, वही परिधि और साम है । आरम्भ ही वस्तु का अवसान है है । अनिरुक्तभाव उक्थ है, निरुक्तभाव परिधि है । भाव ही तूलरूप में श्राकर परिधि कहलाने खगता १६१

पृष्ठ 509

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड पर्ववेदनिरुक्तिः संकोच उक्थ है, विकास परिधि है । श्रवस्था दो हैं, मूलतः एक ही तत्त्व है । ऋकू ही तो त्रिच बनकर साम कहलाने लगता है । ' ऋच्यध्यूढं साम गीयते ' सिद्धान्त के अनुसार ऋकू पर आरूढ होकर ही तो सामगान होता है । हृदयावच्छिन्न विष्कम्भ ( व्यास ) रूप ऋक् का त्रिगुणित भाव ही तो परिधिरूप साम है । ' त्रिवं साम ' - ऋचा समं मेने तस्मात् साम ' सिद्धान्त इसी रहस्य का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । 1 हृदयरूप उक्थपर्व, एवं परिधिरूप पृष्ठपर्व, दोनों हीं एक प्रकार से वयोनाध ( छन्द ) मात्र हैं । ' अयं घटः, तमहं जानामि ' इस रूप से घटपटादि पदार्थों की जो प्रतीति हुआ करती है, उसे ही ' भाति ' कहा जाता है । हृदय शब्द जैसे परिधिभाव की नित्य अपेक्षा रखता है, एवमेव हृदय, और परिधि दोनों शब्द किसी अन्य सत्तासिद्ध पदार्थ की अपेक्षा रखते हैं । किसी सत्तासिद्ध पदार्थ में ही हृदय और परिधि प्रतिष्ठित रहेंगे । वस्तु का हृदय होता है, वस्तु की परिधि होती है । किंवा वस्तु में हृदय होता है, वस्तु में परिधि होती है । स्वयं हृदय और परिधि वस्तु नहीं है । ये दोनों भाव तो वस्तुस्वरूप के सम्पादक, पूरक तथा रक्षक हैं । हमारी भाति ( प्रतीति - प्रत्यय ज्ञान - उपलब्धि ) का विषय न तो हृदय बनता, न परिधि । श्रपितु हृदय-परिधि से युक्त एक सत्तासिद्ध रसात्मक तीसरे ही पदार्थ की भाति होती है । जिस की हमें भाति होती है, वह सत्तासिद्ध पदार्थ है, वही वास्तव में बस्तुशब्दवाच्य है । जिसका हृदयरूप उक्थ है, जिसका परिधिरूप पृष्ठ है, उक्थ - पृष्ठ के मध्य में प्रतिष्ठित वही सत्तासिद्ध भातिविषयक पदार्थतत्त्व ' ब्रह्म ' कहलाता है । हृदय - परिधिभावों से सीमित बनता हुआ रसभाव ही अपने उपबृंहणधर्म से, तथा भरणवृत्ति से ' ब्रह्म ' कहलाया है । मध्यस्थित सत्तारसात्मक यह तीसरा अग्निपर्व क्योंकि उपक्रम उपसंहार - स्थानीय उक्थ- पृष्ठों से नित्य युक्त रहता है, अतएव इसे हम अवश्य ही ' यजुः ' कह सकते हैं । ' ऋक्साम - यजुः ' ही क्रमशः श्रग्नितत्त्व के उक्थ - पृष्ठ - ब्रह्म-- नामक तीन पर्व हैं । उक्त तीनों पर्व हीं अग्निमूर्ति वस्तु के पूरक, तथा रक्षक बनते हुए पर्व नाम से प्रसिद्ध होरहे हैं | विश्व में ऐसा कोई पदार्थ नही, जिसमें सोमगर्भित अग्नि की प्रधानता न हो । ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जिसमें अग्निस्वरूप - रक्षक उक्त तीनों पर्व न हों । प्रत्येक में तीनों पर्व अविनाभावसम्बन्ध से बिना किसी व्यभिचार के परस्पर उपकार्य - उपकारक बनते हुए, अन्योऽन्याश्रित रहते हुए नित्य प्रतिष्ठित रहते हैं । हृदय - परिधि-हृदयपरिधि से युक्त वस्तुतत्त्व, तीनों भाव आपको पदार्थमात्र में उपलब्ध होंगे । इन्हीं तीनों पर्वों की समष्टि को ' पर्ववेद ' कहा जायगा । जिस तत्त्व के ये तीन पर्व होंगे, वही ' त्रयीवेद ' माना जायगा, और पर्वदृष्टि से आप सम्पूर्ण विश्व में इस वेदत्रयी का साम्राज्य देखेंगे । १६२

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वेदनिरुक्तौ पर्ववेदसंस्था - परिलेख: -प्रथमं पर्व हृदय उपक्रम प्रस्ताव आरम्भ वयोनाध छन्द क ऋग्वेदः उपनिषद्भूमिका द्वितीयं पर्व सत्तारस प्रक्रान्त उद्गीथ मध्यस्थ वय छन्दत मूर्त्ति ब्रह्म यजुर्वेदः १६३ पर्ववेदनिरुक्तिः तृतीयं पर्व परिधि उपसंहार निधन अवसान वयोधान छन्द परिणाह सामवेदः