Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 511–520

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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श्रीः इति वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( १ ) - " पर्ववेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १२ 999

पृष्ठ 512

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* 100 श्री यथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १३

पृष्ठ 513

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पृष्ठ 514

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थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १३ का ही साम्राज्य है, जैसा कि पूर्व - प्रकरणों में सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान - कर्म्म नाम के दो तत्वों का ' है, एवं ज्ञानगर्भित कर्म्मतत्त्व ' विश्व ' ज्ञानतत्त्व ' विश्वात्मा यत्र तत्र स्पष्ट किया जाचुका है । कर्म्मगर्भित है, विश्व कम्मप्रधान है । कर्म्मप्रधान विश्व ज्ञानप्रधान विश्वात्मा है । दूसरे शब्दों में- विश्वात्मा ज्ञानप्रधान अप्रहितप्रेरणा से विश्व के समष्टि व्यष्टि - कम्मों का सञ्चालन की नियति से नित्य सञ्चालित है । उसी की, वायु अग्नि, मृत्यु, वरुण श्रादि विश्व- पर्वों को कम्मों के होरहा है । उसी प्रेरणा के भय से सूर्य्य, चन्द्रमा रहा है । उसी की प्रेरणा के भय से तत्तल्लोकों में रहने वाले उपक्रम - उपसंहार का अनुगामी बनना पड़ रहते हैं । विश्व, एवं विश्वगर्भ में प्रतिष्ठित कोई भी ऐसा पदार्थ श्रस्मदादि प्राणी तत्तत् कर्म्मविशेषों में श्रारुढ़ के व्यर्थ कालदण्ड के शासन का उल्ल ंघन किया हो । जिधर देखिए, बाकी नहीं बच्चा, जिसने उस महाकाल पुरुष वहीं कर्म्मभावना के प्रत्यक्षदर्शन । और जिस वस्तु का अन्वेषण उधर वही कर्म्मधारा - प्रवाह । जहाँ जाइए, की उपलब्धि । कीजिए, उसी में कर्म्मभावनामूलक वेदतत्त्व करते हैं । कभी हमारे ज्ञानीय - जगत् में सूर्य की हम पद पद पर ' भावना ' शब्द का अभिनय की, किया कभी अन्न की, कभी पशु - पक्षियों कीं, कभी सेवाभाव भावना होती है, कभी चन्द्रमा की कभी पृथिवी शयन की कभी जागृति की, कभी सुख की, कभी दुःख की ( नौकरी ) की, कभी अध्ययनाध्यापन की, कभी की, तो कभी बैठने की । इसप्रकार हमारा सम्पूर्ण ज्ञान कभी मूर्खता की, कभी विद्वत्ता की, कभी चलने है । प्रश्न होता है कि, यावज्जीवन एक महा श्रभ्व, महा यक्ष किसी न किसी भावना से नित्य ही आकान्त रहता, एवं ज्ञानभावना का तात्त्विक स्वरूप क्या है १ । की भाँति पीछे पड़ी रहने वाली इस कर्म्मभावना वे उत्तर में सत्ता, स्वभाव, अभिप्राय, चेष्टा, यदि कोशकारों से उक्त प्रश्न का उत्तर पूँछा जाता है, तो देते हैं । व्याकरणशास्त्र से यदि भागों को हमारे सामने रख आत्मजन्म, क्रिया, विभूति, बन्धु इत्यादि विविध ० ' यह कहता हुआ कोश के साथ ही एकवाक्यता कर लेता पूँछा जाता है, तो वह भी ' भावो भावना क्रिया । अवश्य ही सत्ता - स्वभावादि भाव, किंवा भावनारूप हैं, एवं है । उत्तर ठीक नहीं है, यह बात नहीं है जासकता है । परन्तु प्रश्न तो यह है कि, भावना से वह कौनसा अवश्य ही क्रियाविशेष को ही भावना कहा हुआ ' भावनावेद ' की प्रतिष्ठा बना हुआ है?, इस वेददृष्टि अर्थ गृहीत है, जो कि वेदत्रयी का साधक बनता के लिए अवश्य ही किसी वैदिक - सिद्धान्त का ही अनुगमन से सम्बन्ध रखने वाले भावनापदार्थ के स्पष्टीकरण - ' क्रतु - दक्ष ' । करना पड़ेगा, एवं वही अनुगमभाव कहलाएगा G -१६७

पृष्ठ 515

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड भावनावेदनिरुक्तिः सत्ता हो, स्वभाव हो, अभिप्राय हो, चेष्टा हो, श्रात्मजन्म हो, क्रिया हो, किंवा विभूति हो, अथवा कम्मप्रधान विश्व का कोई भी किसी भी जाति का पर्व हो, सर्वत्र सबकी भावना में हमें क्रतु - दक्ष, ये दो ही पर्व मिलेगे । ' हम अमुक पदार्थ की सत्ता की अमुक व्यक्ति के स्वभाव की, अभिप्राय की, चेष्टा की, आत्मजन्म की, किया की, विभूति की भावना कर रहे हैं " इन सब वाक्यों में " भावना कर रहे हैं " इन सभी वाक्यों में ऋतु-दक्ष - भाव का ही सम्मिश्रण है । प्रत्येक भावना, चाहे वह किसी पदार्थ की हो, किसी विचार की हो, किसी कर्म की हो, ऋतु - दद को गर्भ में रख कर ही प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में ऋतु - दक्ष भावों के समन्त्रितरूप का ही नाम " भावना " है । यदि किसी में केवल क्रतु है, तो वह भी भावना नहीं । केवल दक्ष है, तब भी भावना नहीं । दोनों एकत्र समन्वित होकर ही भावना के स्वरूप- सम्पादक बनते हैं । एवं साथ ही में यह भी निश्चित है कि, दोनों के समन्वय से जिस ' भावना ' की स्वरूपनिष्पत्ति होती है, श्रवश्य ही उसमे ऋक - साम - यजुर्म्मयी वेदत्रयी का विकास होजाता है । और इसीलिए क्रतु - दक्ष - मयी भावना को हम " भाववेद " - किंवा " भावनावेद " कहने लगते हैं । हम जिन भावों की भावना करते हैं, सत्र में ऋतु - दक्ष द्वन्द्व प्रतिष्ठित है । फलतः भावनादृष्टि से भी भावनाभावित यच्चयावत् वस्तुभावों का वेदत्त्व सिद्ध होजाता है । भावना से सम्बन्ध रखने वाले क्रतु - दक्षभावों का क्या स्वरूप १, इसी प्रश्न का रहस्यात्मक समाधान करती हुई निम्नलिखित वाजिन ति हमारे सामने आती है-" ऋतू - दक्षौ ह वाऽस्य मित्रावरुणौ । एतन्नु - अध्यात्मम् । स यदेव मनसा कामयते-इदं मे स्थात, इदं कुर्वीय इति स एव क्रतुः । श्रथ यदस्मै तत् समृध्यते, स दक्षः । मित्र एव क्रतुः, वरुणो दक्षः । ब्रह्मव मित्रः, क्षत्रं वरुणः । अभिगन्तैव ब्रह्म, कर्त्ता क्षत्रियः 1 । ते हैतेऽग्रे नानेवासतुः - ब्रह्म च क्षत्रं च । ततः शशाकैव ब्रह्म मित्र ऋ चत्राद्वरुणात् स्थातुम् । न चत्रं वरुण ऋते ब्रह्मणो मित्रात् । यद्ध विश्व वरुणः कर्म्म चक्रे - अप्रभूतं ब्रह्मणा मित्रेण, न हैवास्मै तत् समानृधे । स चत्रं वरुणो ब्रह्म मित्रमुपम-न्त्रयाञ्चक्रे -उपमा वर्त्तस्व, संसृजाव है, पुरस्त्वा कर, त्वत्प्रसूतः कर्म्म कर!, इति । तथेति । तौ समसृजेताम् । तत एप मैत्रावरुणो ग्रहोऽभवत् । सोऽएव पुरोधा । तस्मान्न ब्राह्मणः सर्वस्येव क्षत्रियस्य पुरोधां कामयेत 1 । सं ह्य ेतौ सृजेते, सुकृतं च दुष्कृतं च । नोऽएव क्षत्रियः सर्वमिव ब्राह्मणं पुरोदधीत 1 । सं ह्यवैतो सृजेते, सुकृतं च दुष्कृतं च । स यत्ततो वरुणः कर्म्म चक्रे प्रसूतं ब्रह्मणा मित्रेण, संह्यवा-मैदानृधे ॥ यद्यु राजानं लभेत समृद्ध ं तत् । तत्तदवक्लृप्तमेव, यद् ब्राह्मणोऽराजन्यः स्यात् एतद्ध त्वेवानवक्लृप्तं यत् क्षत्रियोऽब्राह्मणो भवति । यद्ध किश्च कर्म्म कुरुतेऽप्रमृतं ब्रह्मणा मित्रेण, न हैवास्मै तत् समृध्यते । तस्मादु क्षत्रियेण कर्म्म करिष्यमाणेन उपसतव्य एव ब्राह्मणः । सं हैवास्मै तद् ब्रह्म प्रसूतं कर्म्मऽर्घ्यते " । - शत ० ब्रा ० ४ कां ० 1 १ ० । ४ ब्रा ० १-२-३-४-५-६ कण्डिका । १६८

पृष्ठ 516

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उपनिषद्भूमिका भावना - बेदनिरुक्तिः सम्बन्ध और वरुण हैं । ( वक्ष्यमाण ) अध्यात्म ( से " क्रतु - दक्ष इस ( यज्ञपुरुषलक्षण दैवात्मा ) के मित्र है - " ( मैं ) यह करूँ " यह ( कामना ही ) ऋतु है । इस ता ) है । सो जो कि ( मनुष्य ) मन से कामना करता ) सम्पन्न होजाता है, वह दक्ष है । मित्र ही ऋतु ( संकल्प-ममय ) पुरुष के लिए जो कार्य्य ( कामनानुसार ही मित्र है, क्षेत्र ( सिद्धिमयी, किंवा कर्म्ममयी क्रियाशक्ति ) ही ) दक्ष है । ब्रह्म ( कामनामयी ज्ञानशक्ति ) आगे चलने वाला ) ही ब्राह्मण है, कर्त्ता ( निर्दिष्ट पथ पर चलने है । अभिगन्ता ( पथप्रदर्शक - पहिले श्रागे क्षत्र पहिले पृथक पृथक से ही थे । उस ( पार्थक्य ) दशा में मित्र ला ) ही क्षत्रिय है । दोनों ब्रह्म और से रहने में समर्थ होगया । परन्तु क्षेत्र वरुण बिना मित्र ब्रह्म हाण ( तो ब्रह्म की श्राज्ञा के बिना क्षेत्र वरुण जो बिना क्षत्रिय वरुण के ( स्वस्वरूप भी कर्म किया, वह स्वस्वरूपरक्षा में समर्थ न होसका । मित्र का कारण नहीं बन सका । ( यह देखकर ) वरुण ने मित्र ब्राह्मण से ई भी कर्म्म इस वरुण के लिए समृद्धि जायँ, आपको मैं आगे रक्खूँ, आप जैसा , अपन दोनों मिल नवेदन किया कि, आप मेरी ओर लौट आइए । ब्रह्म मित्र ने ' ऐसा ही हो ' आश्वासन दिया । दोनों मिल नादेश दें, उसी के अनुसार मैं कर्म्म करूँ में ब्रह्म - क्षत्ररूप ) ' मैत्रावरुण ' नामक ग्रह उत्पन्न हुआ | ए । इन दोनों के मिलने से ( आध्यात्मिकसंस्था जो ब्राह्मण जाने वाला ) ही पुरोहित है । अर्थात् मित्र ब्राह्मण ( क्षत्रिय के स्वरूप में घुलमिल होजाते हैं, इसलिए ब्राह्मण को चाहिए गुण - दोष ब्राह्मण में संश्लिष्ट । कारण, जिस यजमान का पुरोहित होता है, उसके जिस किसी क्षत्रिय का ही पुरोहित बनने की इच्छा न करै कि, वह बिना गुण दोष की की परीक्षा किए हैं । इसी प्रकार क्षत्रिय को भी चाहिए कि, परस्पर में मिल जाते मिल जाते हैं । दोनों के सुकृत- दुष्कृत ( पाप - पुण्य अपना ) पुरोहित न बना बैठे । कारण, दोनों के सुकृत दुष्कृत वह भी चाहे जिस ही ब्राह्मण को कर्म किया, तो क्षत्रिय के लिए वह कर्म्म समृद्धि का जब वरुण क्षत्रिय ने ब्राह्मण मित्र के आदेशनुसार कारण सन गया । बिना क्षत्रिय राजा के सहयोग भी अपने स्वरूप की रक्षा । यह बात तो बनी बनाई है कि, ब्राह्मण जाता है, तो उसका विकास होजाता है राजा का सहयोग मिल स्वरूप- रक्षा करने में समर्थ हो जाता है । यदि ब्राह्मण यदि को क्षत्रिय ब्राह्मण का सहयोग न करे, और फिर उसकी परन्तु यह बात सर्वथा अप्राकृतिक है,, अवश्य ही उसके लिए वह कर्म्म कभी ब्राह्मण के सहयोग के भी कर्म करेगा अवश्य ही होजाय । क्षत्रिय बिना यह बहुत श्रावश्यक है कि, कर्म करने वाला क्षत्रिय, समृद्धि का कारण नहीं बनेगा । इसलिए ) बनावे । ऐसा करने से दोनों ( शक्तिएँ ) मिल जाते हैं किसी ब्राह्मण को अपना श्राश्रय ही ( सफल पथप्रदर्शक एवं सुसमृद्ध होजाता है " । ब्राह्मण से निर्दिष्ट कर्म्म अवश्य ' आदि ४० ग्रह - उपांशुसवन - ऐन्द्रवायव - मित्रावरुण सुप्रसिद्ध " ग्रहयाग " में ' उपांशु - अन्तर्याम ग्रहकाण्ड में ( चतुर्थकाण्ड ) में हुआ है । शथपथब्राह्मण के है । उक्त श्रुति ने सम्बन्ध रखने वाला एक मित्रावरुणग्रह के उक्त काण्ड में ही किया है, जो कि शतपथविज्ञानभाष्य होते हैं, जिनका कि विशद वैज्ञानिक विवेचन से उन्हीं ग्रहों में आध्यात्मिक ऋतु - दक्षभावों इसी के आध्यात्मिक रहस्य का विश्लेषण द्रष्टव्य है । सिद्धि में प्रेरणा-यही कहना है कि, प्रत्येक कर्म्म की में प्रकृत में श्रुति के उदाहरण से हमें उदाहरण केवल के लिए उस यज्ञकर्म्म को ही लीजिए, जिसके सम्बन्ध कर्म्म - कर्म्मसिद्धि, ये तीन पर्व होते हैं । १६६

पृष्ठ 517

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वेदनिरुक्त प्रथमखण्डह भावना - वेदनिरुक्ति का आश्रय है । यज्ञकर्म्म से उक्त श्रुति उद्धत हुई है । यज्ञ करने वाला यजमान ही प्रधानरूप से यज्ञकर्म्म ही है । परन्तु जबतक दैवात्मारूप जो अतिशय उत्पन्न होता है, उसका अन्यतम फलभोक्ता एकमात्र यजमान का वरण कर्म्मकर्त्ता यजमान अपने इस यज्ञ कर्म्म में होता, उद्गाता, अध्वर्यु ', ब्रह्मा आदि ब्राह्मण प्राप्त ऋत्विजों नहीं कर लेता, तब नहीं कर लेता, दूसरे शब्दों में जबतक वह अपने कर्म में इन ब्राह्मणों का सहयोग । इसी विप्रतिपत्ति को तक कभी यह कर्म्मसिद्धि, एवं तजनित कर्मातिशय का अधिकारी नहीं बन सकता देते हैं, यजमान हटाने के लिए इसे विवश होकर ब्राह्मणों को पुरोहित बनाना पड़ता है । वे जो जो आदेश को ठीक उस उस के अनुसार ही यज्ञेतिकर्त्तव्यता का अनुगमन करना पड़ता है । वे जानते हैं ऋत्त्रिक् ब्राह्मण अपनी शास्त्रीय दृष्टि के बल पर कम्मों का परिणाम समझे रहते हैं । ब्राह्मण उसी कि, कौन कम्म, कब, कैसे करने से क्या अतिशय उत्पन्न करता है? । कर्म्म- परिणाम - दर्शी यह ' ( यह करो, परिणाम को अपने लक्ष्य में रखता हुआ यथावसर कर्म्मकर्त्ता यजमान को ' इदं कुरु, एवं कुरु में प्रदर्शक ऐसे करो ) इसप्रकार आदेश देता रहता है । श्रादिष्ट यजमान कर्म्म करता रहता है है ॥ इसप्रकार कालान्तर यजक में आदिष्ट ब्राह्मण एवं यजमान के सहयोग से कर्म्म का स्वरूप सिद्ध होजाता है, ब्राह्मण, यजमान का कर्म्म, कर्म्मसिद्धि, तीन पर्व होजाते हैं । ब्राह्मण क्योंकि कर्मोत्थान है, का अतः श्रारम्भस्थान इसे ' कम्मों-अतएव इसे ' कम्मोपक्रम ' कहा जा सकता है । कर्म्मसिद्धि कर्म्म का अवसानस्थान कहा जासकता है । पसंहार ' माना जासकता है । एवं दोनों के मध्य में सञ्चालित स्वयं यज्ञकर्म्म ' कर्म्ममध्य ' यज्ञकर्म्म उदाहरणमात्र है । संसार, के ओर ओर जितने भी कर्म हैं, सब में यही अवस्था समझनी चाहिए । एक निश्चित सिद्धान्त है कि, प्रत्येक कम्र्म्मसंस्था में, चाहे वह ऐहलौकिक हो, अथवा पारलौकिक, आवश्यक- को ही रूप से ब्रह्म - क्षत्र दोनों का समन्वयलक्षण, पारस्परिक सहयोगलक्षण योग अपेक्षित है । गृहस्थ उस अनुभवी लीजिए । गृहस्थ का सर्ववृद्ध अनुभवी पुरुष ब्रह्म माना जायगा, गृहस्थ के अन्य सब व्यक्ति में गुरु ब्रह्म पुरुष के आदेशानुसार स्व स्व कम्मों का अनुष्ठान करते हुए क्षेत्र कहलाएँगे । अध्ययनसंस्था, नेतृत्वानुगामी माना जायगा, विद्यार्थी - गण क्षेत्र माना जायगा । राष्ट्रीयसंस्था में विशिष्ट उक्त नेता श्रौतसिद्धान्त ब्रह्म माना जायगा का समन्वय देखेंगे । राष्ट्रीयदल क्षेत्र कहा जायगा । इसप्रकार सभी कर्म्मसंस्थाओं में श्राप एक नियम और | जो ब्रह्म होगा, वह कर्म्म में शिथिल रहेगा, जो क्षत्र होगा वह श्रादेश में शिथिल ज्ञान से काम रहेगा । ब्रह्म भी करेगा अवश्य, परन्तु प्रधानता ज्ञानलक्षण आदेश की ही रहेगी । क्षत्र भी अवश्य लेगा, किन्तु प्रधानता कर्म्माचरण की ही रहेगी । कारण इसका यही है कि, ब्रह्म में ज्ञानशक्ति का प्राधान्य , तो है, और क्षत्रिय में क्रियाशक्ति की प्रधानता है । यदि दोनों में दोनों शक्तियों का पूर्ण विकास सम्भव के होता विभिन्न कभी श्रुति के उक्त सिद्धान्त का आविर्भाव न होता । श्राज्ञाप्रदान, और तदनुसार काम करना, दोनों दो क्षेत्र हैं । दोनों के लिए वर्गीकरण प्रत्येक दशा मे वाञ्छनीय है । जब दोनों धर्म एक ही व्यक्ति में आजाते हैं, तो वह अपनी स्वाभाविकी अल्पशक्ति से दोनों का बोझा सँभालने में असमर्थ होता हुआ में दोनों निमग्न ह्रीं शक्तियों से वञ्चित होजाता है । प्रत्यक्ष में भी ऐसा ही देखा गया है । जो व्यक्ति अहोरात्र ज्ञानचिन्ता रहता है, उससे कभी कर्म्म का निर्वाह नहीं होसकता । यदि आप यह चाहें कि, ज्ञान का अनुगामी देता रहे, अध्ययनशील एक ब्राह्मण ज्ञानचिन्ता के साथ साथ सामाजिक, राष्ट्रीय, लौकिक- कम्मों में भी पूर्ण सहयोग २००

पृष्ठ 518

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका भावना - वेद निरुक्तिः व्यक्ति को ज्ञान । ठीक इसके विपरीत यदि श्राप कर्म्मव्यस्त, तो आप की इस चाह का कोई मूल्य नहीं होगा , तो यह भी आपकी दुराशा ही मानी जायगी । गार्हस्थ्य, सामाजिक की उच्च भूमिका में प्रतिष्ठित देखना चाहेंगे, कर्म्मसंस्थाओं को सुसमृद्ध बनाने का एकमात्र यही उपाय है । राष्ट्रीय आदि संस्थाओं को सुरक्षित रखने वाला का रहे, एवं एकवर्ग आदेशानुसार कर्म्म करने वाला रहे । एक कहने कि, प्रत्येक संस्था में एक वर्ग आदेश देने वाला रहै । एक पथप्रदर्शक हो, तो एक तदनुगामी हो । एक ज्ञान-वाला रहै, तो एक सुन कर तदनुसार करने हो । एक उपदेशक हो, तो एक उपदिष्ट हो । एक शासक हो, तो एक शक्तिप्रधान हो, तो एक क्रियाशक्ति प्रधान जाँय । कभी परस्पर एक दूसरे को छोटा बड़ा समझने की भूल न शसित हो, और फिर दोनों एक दूसरे में मिल करते हुए परस्पर एकरूप से बनकर ही तत्तत् कर्म्मसंस्थाओं का करैं । अपने अपने अधिकार का सदुपयोग का आदर करें, यह ( क्षेत्र ) उसको प्रसन्न रक्खे | समृद्धि सञ्चालन करें । वह ( ब्रह्म ) उसके भावों श्रु तिनें इस समृद्धिचीज का ही स्पष्टीकरण किया है । निश्चित है, मैत्रावरुणग्रह - प्रतिपादिका उक्त ' कहा जाता है, एवं द्वेषी ( शत्रु ) को ' वरुण वैदिक - परिभाषानुसार हितैषी को + ' मित्र को ' कहा तो ' मित्र ' कहा है, और कर्म्मसिद्धि, किंवा संकल्पसिद्धि नाता है । इधर हमने कर्म्म सम्बन्धी मानससंकल्प , क्या कर्म्मसिद्धि हमारी शत्रु है? । यदि कम्र्म्मसिद्धि शत्रु होती, तो को ' वरुण ' कहा है । प्रश्न होता है कि नहीं करते । ऐसे मित्र का श्राह्नान कौन बुद्धिमान करेगा, जो कभी भूल कर भी हम कर्म्म के लिए कर्म्मसंकल्प कर देगा हैं? । अपने साथ हमारे लिए एक शत्रु उत्पन्न का ही कोई सन्देह नहीं कि, ' वरुण ' शब्द शत्रुभाव अवश्य ही विप्रतिपत्ति ठीक है । इसमें भी वरुणशब्द से क्यों व्यवहृत किया गया । , कर्म्मसिद्धि को शत्रुवाचक मानना सूचक है । अब जान लेना केवल यही है कि कर्म में जुट पड़ना, यहाँतक तो सभी को मैत्रीभाव कर्म के लिए संकल्प करना, और संकल्पानुसार मित्र कम्मंसंकल्प का अनुगमन नहीं करता, वह अवश्य ही दुःखी पड़ेगा । जो व्यक्ति कर्म्म के लिए अपने तदनुगृहीत कर्म्म, दोनों को अवश्य ही ' मित्र ' कहा जासकता है । रहता है । ऐसी दशा में कर्म्मसंकल्प, और हितैषी मित्र को मार डालता है, दूसरे शब्दों में उसका विरोध मानी हुई बात कि, यदि कोई व्यक्ति हमारे भी शत्रु बन जाता है । कर्म की दक्षता कर्म्मसिद्धि है । जबतक कर देता है, तो वह मित्र का शत्रु हमारा हम कर्मानुगत संकल्पमित्र के साथी बने रहते हैं, अथवा दक्षरूपा कर्म्मसिद्धि प्राप्त नहीं होती, रहता तबतक है । परन्तु जिस क्षण कर्म्म सिद्ध होजाता है, उसी क्षण तत् साधक वह संकल्प स्वयं हमारा साथी बना है । इच्छासिद्धि अवश्य ही इच्छा का विराम कर देती है । कर्म्म से सम्बद्ध संकल्प का भी अवसान होजाता कामना को, हमारे संकल्प को, संकल्प के साथ साथ कर्म्म को भला सोचिए तो, जिस सिद्धिने हमारी कर डाला, उस कर्म्मसिद्धि को शत्रु ( वरुण ) नहीं कहें, समाप्त कर दिया, एक हितैषी मित्र को समाप्त कर्म्मसंकल्परूप मित्र का अवसान कर देती है, श्रतएव श्रुतिने इसे तो और क्या कहें? | क्योंकि कर्म्मसिद्धि है । वरुण कहना ही उचित समझा बहिरङ्गपरीक्षात्मक - गीताविज्ञानभाष्यभूमिका - प्रथम + इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन खण्ड में देखना चाहिए । २०१

पृष्ठ 519

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प्रथमखण्ड भावना - वेदनिरुक्तिः उत्तर कुछ अंशों में जँचा, कुछ अंशों में नहीं जँचा । क्योंकि कर्म्मसिद्धिरूप वरुणशत्रु कम्र्म्मसंकल्प-रूप मित्र का अवसान कर देता है, इसलिए कर्म्मसिद्धि को शत्रु कहना तो ठीक बन जाता है । परन्तु इस उत्तर में कृतघ्नता बैठी हुई है । जिस मित्र ने ( संकल्पने ) हमें सिद्धि दिलवाई, सिद्धि मिलते ही उसी सिद्धि के द्वारा हम उसे मरवा डालें, उसका अवसान करादें, यह कृतघ्नता नहीं, तो और क्या है? । साथ ही में यह भी प्राकृतिक नियम है कि. सिद्धि होजाने पर संकल्प रह नहीं सकता । बिना सिद्धि के ऐहलौकिक-पारलौकिक कोई व्यवस्था सुरक्षित रह नहीं सकती । अगत्या हमें मित्रद्रोही बनना हीं पड़ता है । क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे सिद्धि प्राप्त करते हुए भी हम मित्र की मित्रता सुरक्षित रख सकें । है, और श्रवश्य है । उसी श्रावश्यक उपाय का नाम है- " वरुण " । सिद्धि को शत्रु समझना ही संकल्प की मैत्री सुरक्षित रखने का अन्यतम उपाय है । इधर संकल्प है, उधर कर्म्मसिद्धि है, मध्य में संकल्पजनित कर्म्म है । यदि इस छोर में रहने वाले संकल्प को उस छोर में रहने वाली कर्म्मसिद्धि का मित्र बना दिया जाता है, तब तो निश्चयेन वह कर्म्म-सिद्धि संकल्प का नाश कर डालती है । सिद्धि स्वयं नाश नहीं करती । श्रपितु सिद्धिजनित भावना वासना-संस्कार ही मानस विकास के अवरोधक बनते हैं । वे ही संस्कार सिद्धि - स्मृति के उत्तेजक बनते हुए मानस संकल्प को तुच्छ बनाए रखते हैं । यह क्षोभ ही संकल्प की अशान्ति हैं । अशान्ति ही इसका दुःख है । दुःख ही एक प्रकार की महामृत्यु, किंवा महाविनाश है । इससे बचने का एकमात्र उपाय यही होगा कि, अपने ( आत्मा के ) मित्र संकल्प को सिद्धि के चङ्गल में नहीं फँसने दिया जाय । यदि संकल्प सिद्धिभाव का मित्र नहीं बनेगा, अपितु वह उसे शत्रु समझता रहेगा, तो दो फल होंगे । क्योंकि संकल्प रहेगा, इसलिए तो सिद्धि मिल जायगी । साथ ही में संकल्प की सिद्धि के साथ क्योंकि वरुण सम्बन्धिनी पाशलक्षण शत्रुता रहेगी, इसलिए सिद्धिजनित भावना - वासना - संस्कार इसे क्षोभ - प्रशान्ति दुःखलक्षण मृत्युमुख में भी नहीं डाल सकेंगे । इसे ही कहते हैं- " लाठी टूटै न भाँडा फूटे ' । एक आपत्ति से पीछा छूटा, दूसरी आपत्ति उपस्थित होगई । संकल्प सिद्धिभाव का मित्र न बने, यह बात असम्भव है । संकल्प का मूल कारण तो सिद्धि ही है । यदि मन को पहिले से यह विदत होजाय कि, सिद्धि मेरी शत्रु है, सिद्धि से कोई प्रयोजन नहीं है, तो भूल कर भी सिद्धयनुगत कर्म्म के लिए मन में संकल्प का उत्थान ही न हो | कर्म्मफल, किंवा कर्म्मसिद्धि ही तो संकल्प की मूल जननी है । फिर " ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग-कामो यजेत ' इत्यादि श्रौतसिद्धान्त भी स्वर्गफल को ही तो यज्ञकामना का जनक बतला रहे हैं । ' प्रयोजन-मनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्त्तते ' इस सुप्रसिद्ध श्राभाणक के अनुसार निष्प्रयोजन, निष्फल, सिद्धिशून्य, कम्मों के लिए एक मूर्ख भी तो कोई संकल्प नहीं करता । फिर विचारशील बुद्धिमान् का तो कहना ही क्या है । संकल्प होगा सिद्धि के लिए ही, सिद्धि को रखना पड़ेगा सामने, तभी संकल्प संकल्प रहेगा । बिना सिद्धि को मित्र बनाए, सिद्धिभाव को लक्ष्य बनाए तो संकल्प का स्वरूप ही शेष नहीं रहेगा । अब बतलाए, सिद्धि के साथ शत्रुता रखने वाले सिद्धान्त का क्या मूल्य रहा? । और ऐसी दशा में सिद्धि को वरुण ( शत्रु ) कहना कहाँतक न्यायसङ्गत रहा! । बात तो ठीक ठीक सी ही विदित हो रही है । अवश्य ही कोई और उपाय निकालना ही पड़ेगा, और उस का एकमात्र श्रालम्बन बनेगा एकमात्र वही मध्यस्थ कर्म्म । बिना मध्यस्थ के निर्णायक और हो भी कौन सकता १२०२

पृष्ठ 520

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वेदनिरुक्त उपनिषद्भूमिका भावना - वेदनिरुक्तिः तो उस का जन्म ही अवश्य बनाले | क्योंकि बिना लक्ष्य के है? । संकल्प सिद्धिभाव को आरम्भ में लक्ष्य वह तत्साधक कर्म्म अनन्तर ही उस ओर से सर्वथा तटस्थ बनकर अपना लक्ष्य नहीं होगा | परन्तु लक्ष्य स्थिर बनाने के यह स्मरण रखना चाहिए कि, जिस सिद्धि को उसने का अनुगामी बन जाय । संकल्प को प्राप्त करने में सर्वथा असमर्थ है । सिद्धि का जनक बनता है एकमात्र बनाया है, उसे वह अपने बल पर संकल्प । कर्म का एकमात्र अधिकारी जैसे संकल्प ही है. वैसे कर्म । कर्म का जनक बनता है एकमात्र है । सिद्धि संकल्पफल नहीं है, अपितु कर्मफल है । कर्म्म सुरक्षित फल का एकमात्र अधिकारी कर्म्म करना ही कर्म्म का काम । दोनों के क्षेत्र सर्वथा पृथक पृथक । जब संकल्प का रखना संकल्प का काम, फल उत्पन्न, तो उस का उसे मित्र बनाना मूर्खता है । " शत्रुता बन नहीं सकती, फलप्राप्ति में कोई अधिकार ही नहीं होगा " इस पूर्व हेतु का भी उस समय कोई मूल्य नहीं रह जाता, शत्रुता रहेगी तो संकल्प का जन्म ही न के लिए सिद्धि को लक्ष्य बना लेता है । कर्म में जुटने के बाद जबकि आरम्भ में संकल्प अपनी प्रवृत्तिमात्र ही रहा, तो उस की वह शक्ति, वह अधिकार, जो एकमात्र कर्म्म-यदि संकल्प फिर भी फलचर्वणा करता घातक परिमाण होंगे । एक तो बल की कभी से जायगी । इसके दो फल की ओर स्वरूप सम्पादन के लिए नियत है बँट अपनी पूर्णता में ही पूर्ण फल का जनक बनता है । दूसरे वह कर्म्म पूर्ण रह जायगा, जो कि में अवद्ध होकर सचमुच मृत्युभाव का अनुगामी बन जायगा । झुकाव रहने से संकल्प के द्वारा मन संस्कारासक्ति होपड़ा, कर्म में शिथिलता श्रागई, इह्रीं सत्र दोषों से बचने के फल पूरा मिला नहीं, आसक्ति होगई, बन्धन ही सर्वश्रेष्ठ पक्ष है । और इसी पक्ष को स्थापित करने के लिए अति लिए संकल्प का सिद्धि को शत्रु समझना ने सिद्धि को वरुणरूप शत्रु माना है । भविष्य का विकास हैं, वे आगे जाकर कर्म्मशून्य बनते हुए में सचमुच जो व्यक्ति सिद्धि के दास बन जाते , आदि सिद्धों को, सिद्धि के इन अभिमानियों को अधिकांश रोक देते हैं । ज्ञानसिद्ध, लक्ष्मीसिद्ध, भोजनसिद्ध लोका-पड़कर हम अपने शुभ संकल्पों, एवं संकल्पानुगत यही देखा गया है । ' सिद्धि प्रलोभन में न करदें ' यही आदेश सूचित करने के लिए श्रुतिने समृद्धि म्युदयजनक कम्र्मों को व्यष्टि की तुष्टि में यही ही समाप्त है कि, समृद्धि शत्रु नहीं है । अपितु समृद्धि का अतिमान, समृद्धि को शत्रु कहा है । श्रुति का अभिप्राय ही शत्रुभाव + है । हमें अपने आपको सदा इस वरुणपाश से आत्म - परि-में मानससंकल्प को श्राद्ध कर देना त्राण ही करते रहना चाहिए । मूल विषय पर के सम्बन्ध में प्रासङ्गिकी चर्चा । अब, यह तो हुई मित्र - वरुण - लक्षण - ऋतु वस्तुभाव - दक्ष हैं, सत्र में क्रतु, और दक्ष नामक दोनों भाव ( ब्रह्म ' के संग्राहक जितने भी | दक्षरूप क्षेत्र -श्राइए । ' भावना रहते हैं । क्रतुरूप ब्रह्मभाव वस्तुतत्त्व का पूर्वरूप तथा क्षत्रभाव ) अनिवार्य्यरूपेण प्रतिष्ठित के मध्य में प्रतिष्ठिता कर्म्मधारा मध्यरूप है । आप जब भी जैसी भी भाव वस्तु का उत्तररूप है, एवं दोनों , उसमें अवश्य ही तीनों पर्व उपलब्ध होंगे । भावनामय विश्व, और भाव-जो भी जिसकी भी भावना करेंगे ही उपलब्ध होंगे । उपलब्ध होने वाली इसी पदार्थ सदा त्रिपर्वा नामय विश्वगर्भ में प्रतिष्ठित भावनामय ' कहेंगे । त्रिपर्वा भावना को हम ' भावनावेद ० ' इत्यादि श्लोकभाष्य गीताविज्ञानभाष्य ' के ' कर्म्मण्येवाधिकारस्ते + -- इस समय का विशद विवेचन ' में देखना चाहिए | २०३