Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 51–60
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60
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विषयसूची १७३ - घनाग्नि, और पार्थिवज्योति १७४ - तापलक्षण पार्थिवाग्निज्योति १७५ - विरलाग्नि, और दिव्यज्योति १७६- प्रकाशलक्षण दिव्येन्द्रज्योति १७७ - तरलाग्नि, और अान्तरिक्ष्यज्योति १७८ - विद्युल्लक्षण अन्तरिक्ष्य वायुज्योति १७६ - पश्चिमी विद्वानों की सौरविद्युत् १८० - भारतीयों की सौर- सौम्य - प्रौव विद्य च्छक्तियाँ १८१ - ध्रुवनक्षत्र, और धौवविद्य १८२ - भूपिण्डाधार प्रौवविद्युत् १८३ - इस्पात -सम्पादक भौवविद्युत् १८४ - इन्द्रियवर्ग- सञ्चालिका सौम्यविद्युत् १८५ - समुद्रगर्भ से विनिःसृता सौरविद्य त् १८६ - सरस्वान् समुद्र, और सौरविद्य त् १८७ – ‘ अपां ज्योतिः ’, और भौरविद्युत् १८८ - विद्युत्, और इन्द्रतत्त्व १८६ - सोमसहचारी इन्द्र १६.० - भौतिकविद्युत् १६१ - श्राध्यात्मिक - विद्युत् १६२ - मामेव विजानीहि * - ग्रहपदार्थनिदर्शन ( ३ ) १६३ -ग्रह, और ग्रहयाग १६४-४० प्रहृपदार्थ १६५ - वायुमूर्ति ग्रहतत्त्व १६६ - रुद्र, और ग्रह * - -परिशिष्टपदार्थनिदर्शन ( ४ ) १६७ - ग्रहणविज्ञान १६८ - श्राविष्कारक अत्रिमहर्षि १६६ - पृथिवी - परिभ्रमण विज्ञान २०० - भ्रामक इन्द्रदेवता २०१ - अनी चक्रियेव २०२ - आकर्षण सिद्धान्त, और भास्कराचार्य २०३ - श्रोषधिविज्ञान ५३ २०४ - शल्यचिकित्सा विज्ञान 37 39 २०५ - प्रसवचिकित्साविज्ञान २०६ - पश्चिमी विद्वानों की सम्मतियाँ २०७ - विमानविज्ञान २०८ - वृष्टिविज्ञान २०६ - समाधेया प्रश्नावली " २१० तत्त्वविज्ञान " ५४ ६२ २११- पञ्चतत्त्ववाद २१२ - पश्चिमी विद्वानों की भावना २१३- भारतीय तत्त्ववाद पर श्राक्षेप २१४ - आक्षेप निराकरण ६६-६७ 13 २२५ - स्थिरधर्म्मपरिगणना २१६ - अस्थिरधर्म्मपरिगणना २१७ - सव्यपेक्षधर्म्मपरिगणना २१८ - आकर्षण बलपरिगणना 39 २१६- रूढ, योगरूढ, यौगिक पदार्थ २२० - घन, द्रव, बाष्पावस्थापन्न पदार्थ २२२ - विज्ञानकोशरूप वेदशास्त्र ५५ " २२१ - विविध खण्ड विज्ञान २२३- हमारी क्षुद्रवृत्ति ५६ २२४ - हमारा प्रतीत 29 17 ६० 3 : ६१ 33 : ६३ & : ६४ & 17: ६५ 3 3 ६८ 3 ६६ 3 ७० 3 ७१ 3335 ७७ 35 ७२ ७३ ७४ ७५ ७६ ७८ 37 " 37 " " २२५ - हमारा वर्त्तमान २२६ - ध्रुव की कदम्बपरिक्रमा २२७ - ध्रुवपरिभ्रमण सिद्धान्त २२८ - ध्रुवसिद्धान्त का इतिवृत्त 29 " " २२६- हमारा संकल्प 27 २३० - हमारा कर्त्तव्य ५० २३१- दिव्यपुरुष का प्रसाद 17 " ५८ २३२ - भूमिका में प्रतिपादित विषयों की तालिका २३३ - समाधान की जटिलता २३४ - सम्भूति के द्वारा सम्भूति का विनाश प्रारम्भिक निवेदन उपरत १
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उपनिषत् भूमिका -- प्रथमखण्ड [ २ ] - उपनिषदों के आद्यन्त में । ( ख ) दैवी आसुरीसम्पत्, और मङ्गलरहस्य मङ्गलपाठ क्यों किया जाता है? ( ७ से ११ पर्य्यन्त ) ( १ से ३४ पर्य्यन्त ) क - कर्मभेदमूलक अधिकारी का विभेद " ( १ से ६ पर्य्यन्त ) १ - श्रास्तिकग्रन्थों की मङ्गलकामना २- व्यवहारजगत् की मङ्गलकामना ३ - मनोभावना, और शुभाशुभ फल ४- स्वस्तिभाव, और हमारा लक्ष्य ५ - श्र ेय, प्र ेय, श्र ेय प्रक ६ - हितकर, रुचिकर, हितकर - रुचिकरक ७ - गृहस्थाश्रम, और श्रेयः प्रयोभाव द- जन्मसाफल्य ६- अलौकिक अधिकारी १०- लौकिक अधिकारी ११ - निकृष्ट अधिकारी १२ - श्रात्मनिष्ठ अलौकिक पुरुष १३ - व्यवहारनिष्ठ लौकिकपुरुष " २८- श्रात्माभ्युदयल - क्षण शुभक २६- आत्मपतनलक्षण शुभकर्म ३० - निवृत्तिकर्म्म और श्रात्मनिष्ठा ३१ - प्रवृत्तिकर्म्म, और व्यवहारनिष्ठा ३२- अशास्त्रीयकर्म्म, और निष्ठाविच्युति ३३- देवता, और असुर ३४ - श्रश्वमाहिष्यन्याय ३५ - कौतुकी स्रष्टा ३६ - दैवी, श्रौर श्रासुरी - सम्पत्ति 1- दैवबलप्रधान सात्त्विकभाव ३७-३८ - उभयवल प्रधान राजसभाव ३६ - प्रासुरबल प्रधान तामसभाव ४० - सत्त्वभावप्रवर्त्तिका देवता ४१ - तमोभावप्रवर्त्तक असुर ४२ - श्रासुरभाव, और विघ्नाक्रमण ४३- द्विविधा दैवीसम्पत् ४४ - चतुर्विधा आसुरी सम्पत् ४५- सत्यसंहित - देवता " " १४ - पतनोन्मुख कापुरुष १५ - आरण्यकोपनिषत्, और अलौकिकपुरुष ४६ - विज्ञानघन देवता ५ 29 33 १६ - ब्राह्मणग्रन्थ, और लौकिकपुरुष ४७ - श्रनृतसंहित असुर १७- शास्त्रविरोधी लक्ष्यभ्रष्ट मानव १८ - उत्तमाधिकारी १६- मध्यमाधिकारी २०- धमाधिकारी ४८ - लघन असुर ४६ - त्रिपर्वा मङ्गलपाठ ( P ) 39 ५० श्रभियुक्त - सम्मति " १० ५१ - उपनिषदों का मङ्गलपाठ " ११ २१ - निःश्रेयस् - जनक कर्म्म २२- श्रभ्युदय - निःश्रेयस् - जनक- कर्म २३ - प्रत्यवायजनक क २४- श्रासुरीसम्पत्ति, और मङ्गलफल २५ - देवीसम्पत्ति की अनन्यता " ( ग ) - श्रात्मविद्या, --और उपनिषच्छास्त्र ( १२ से १८ पर्यन्त ) ५२ - उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय १२ २६- श्रेयांसि बहु विघ्नानि २७- उभयतो नमस्कार " १ ९ ५३ - प्रजापति के कलादि विभाग " ५४ - प्राजापत्यसंस्था " ५५ - उद्गीथ उक्थ - अङ्गी ११
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५६ - उपनिषद्विद्या ५७ - प्रजापति- निरूपक उपनिषच्छारू ५८ - ज्ञान - विज्ञान- परिभाषा ५६ - विज्ञानयुक्ता ज्ञानोपासना ६० - ज्ञानयुक्त विज्ञानानुगमन ६१- ज्ञानपक्ष, और उपनिषच्छास्त्र ६२ - वन्यधर्म्म, और उपनिषच्छास्त्र • ६३- ज्ञानमार्ग, और उपनिषच्छ्छास्त्र ६४ - श्राश्रमविभाग ६५ - श्राश्रममेद से कर्त्तव्यकर्म्मविभाग ६६ - क्रत्त्वर्थ- पुरुषार्थक ६७ - ' एकाकी यतचित्तात्मा ' ६८ - पुरुषार्थसफलता ६६ - उपकार्य्य, उपकारकभाव ७० - निष्ठाद्वयी ७१ - उपनिषत् की लक्ष्यदृष्टि ७२ - सांसारिक - बन्धनविमोक ७३ – गृहस्थाश्रम, और उपनिषत् ( घ ) - मङ्गलभेदमीमांसा ( १६ से ३४ पर्य्यन्त ) ७४- उपायप्रदर्शनोपक्रम ७५- प्रज्ञा, प्राण- भूत - मयी आत्मसंस्था ७६- शरीरत्रयी, और आत्मसंस्था ७७ - शरीत्रयी की मौलिक प्रतिष्ठाएँ ७८ अग्नित्रयी के द्वारा वेदत्रयी का विकास . ७६ -स्थूलशरीर, और ऋग्वेद ८०- सूक्ष्मशरीर, और यजुर्वेद विषयसूची १२ | ८१ - कारणशरीर, और सामवेद ८२ - कारणशरीर, और ऋग्वेद क " ८३ - स्थूलशरीर, और यजुर्वेद की उपनिषत् ८४ - सूक्ष्मशरीर, और सामवेद की उपनिषत् १३ ८५- मङ्गलमन्त्र ८६- कर्णेभिः श्रक्षभिः १४ ८७- इन्द्रियविज्ञान - ऋङ मूर्ति होता ( अग्नि ८६ - यजुर्मूर्त्तिध्वर्यु ' ( वायु १५ ६० - साममूर्ति उद्गाता ( आदित्य ) ६१ - मङ्गलमन्त्ररहस्यार्थ " " ६२ - शरीरत्रयी की मङ्गलकामना 93 १६ ६३ - ऐतरेयादि ऋगुपनिषत् ६४ - ऋगुपनिषदों का मङ्गलमन्त्र " ६५ - मङ्गलमन्त्र रहस्य ६६ - ईशावास्यादि यजुर्वेदोपनिषत् " १७ ६७- यजुर्वेदोपनिषदों का मङ्गलमन्त्र १८६८ - मङ्गमन्त्ररहस्य EE - शुक्ल, कृष्णयजुर्वेद १००- कठतैत्तिरीयादिकृष्ण यजुर्वेदोपनिषत् १०१ - कृष्ण यजुर्वेदोपनिषदों का मङ्गलमन्त्र | १०२ मङ्गल मन्त्र रहस्य १८ १०२ - केन छान्दोग्यादि सामोपनिषत् १०४- सामोपनिषदों का मङ्गलमन्त्र रहस्य | १०५ -उपनिषदों में दो श्रमङ्गल १०६ - उपनिषदों के दो मङ्गलपाठ " इति - मङगलरहस्यम् " २ " १२ १६ " = = = = = = = = = = = = = " २२ २३ २४ २६
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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ( ३ ) - उपनिषत् शब्द का क्या | २७ - ईश्वरेच्छा, और नियतकर्म्म अर्थ है? ( १-६८ पर्य्यन्त ) ( क ) - विषयोपक्रम ( १ से ६ पर्य्यन्त ) १- ' ते मयि सन्तु ' २- हमारे धार्मिक नेता, और उनके उद्गार ३- हेत्वाभासलक्षण हेतु ४- अन्धप्रणाली का अनुगमन ५ - क्षोभशान्ति की विफलचेष्टा ६ - मनोविज्ञान, और मानहानि ७- छिद्रान्वेषण प्रवृत्ति २८- हमारा त्रित्ववाद २६ - ज्ञान - कर्म्म अर्थधाराएँ ३०- -0 सर्वज्ञ ईश्वर ३१ - सर्वशक्तिघन ईश्वर ३२- सर्ववित् ईश्वर १ ३३- अल्पज्ञ जीव " " " II ३७ - पुरुष की नेदिष्ठता " ६ ३४ - अल्पशक्तियुत जीव ३५ - नियतार्थ, नियतेन्द्रिय जीव ३६ - ईश्वर का भौतिक सर्ग ३८ - भेदक प्रतिबन्धक ३६ - उपनिषत् का प्रतिपाद्य विषय ४० - वेदशास्त्र, और उपनिषत् ४१ - मन्त्र, ब्रह्म, विद्या ४२ - ब्रह्मशब्द का निर्वचन " ४३- नित्या वेदवा " ४४ - वेदवाक्, और सृष्टिविवर्त्त ४५ - अग्नि, सोमवेद १० ११ " १२ १३ " 9 १४ १५ -४० ८- भाष्यकार पतञ्जलि " ३ ६ - वार्त्तिककार वररुचि " १०- धर्म्मनिर्णायक शब्दशास्त्र ११- वररुचि के प्रक्षेप १२- पतञ्जलि का समाधान १३- वररुचि का अभिनिवेश १४ - भाष्यकार का समाधान १५- सामान्य - लौकिक -- दृष्टि, और शास्त्र १६ – तात्त्विक - अलौकिक - दृष्टि, और शास्त्र १७- उपलब्धौ यत्नः क्रियताम् " ४६ - वेदस्वरूपपरिचय " ६ ( ख ) - प्राचीनदृष्टि, और उपनिषच्छाब्दार्थ ( ७ से २६ पर्य्यन्त ) १८ - स्थावर - जङ्गमात्मक त्रिपर्वा विश्व १६ - ज्ञायते, क्रियते, विद्यते २०- ' अर्थक्रियाकारित्वं सत् ' २२- ज्ञानोदय के परिचायक २३- ज्ञान और विषय का पार्थक्य २४- द्रष्टा और दृश्य का पार्थक्य २५ - ज्ञान और क्रिया का पार्थक्य २६ - प्रत्यगात्म, परमात्म - कर्म ४७ - अत्ता, श्रद्यमीमांसा २४८ ' त्रयो वेदा: ' ४६ - ‘ चत्त्वारो वेदाः ५०- ब्रह्मवेदमीमांसा ५१ - ब्राह्मणवेदमीमांसा ५२ - योगत्रयी का समन्वय ५४ - ‘ विधि, आरण्यक, उपनिषत् ' ५५ - पुरोहित अग्नि ८ " ५६ - व्रतपति वायु " w " ५७ - ' आयाहि वीतये ' ५८ - यजुर्वेद का उपक्रम ५- ' अग्ने व्रतपते ' ०- ' इषे त्वोर्जे त्वा ' " १६ १७ " " १८ " १६ ६०-35 " ६१ - श्रथर्वगर्भित त्रयीब्रह्म २० १३
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विषयसूची ६२ - ' विज्ञान - स्तुति इतिहास ' ६३ - इतिहास ही विभीषिका ६४ - त्रिकालज्ञ ईश्वर ६५ - ' धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ६६ - सर्व वेदात् प्रसिद्धयति ' ६७ - निगमशास्त्र का ब्रह्मभाग ६८ - निगमशास्त्र का ब्राह्मणभाग ६६ - कर्म्मयोग, और विधिभाग ७० - भक्तियोग, और आरण्यक भाग ७१ - ज्ञानयोग, और उपनिषत्भाग ७२ - आध्यात्मिकज्ञान, और उपनिषत् ७३ - अर्थकला, और श्रधिभौतिक विश्व ७४ - ज्ञानकला, और आधिदैविकविश्व ७५ - क्रियाकला, और आध्यात्मिकविश्व ७६ - पूर्व, उत्तर, मध्य - काण्डत्रयी ७७ - पूर्व, उत्तर, मध्य - मीमांसात्रयी ७८ - वेदान्तदर्शन ७६- कर्म्मकाण्ड, और विधिभाग ८० - उपासनाकाण्ड, और श्रारण्यक भाग ८१ - ज्ञानकाण्ड, और उपनिषद्भाग ८२ - कर्म्मयोगत्त्वावच्छिन्न विधिभाग ८३ - भक्तियोगत्त्वावच्छिन्न आरण्यक भाग ८४ - अध्यात्मविद्यात्त्वावच्छिन्न उपनिषद्भाग ८५ - उपासना, श्रौर सायुज्यभाव ८६ - ज्ञान, और निर्वाण भाव २० ६६ - प्रात्मकलापरिलेख १७- शरीरकला परिलेख " II ६८ मीमांसात्रयी परिलेख २१ ६६ - वच्छेदकत्रयी परिलेख २२ 31 " " -- * -( ग ) -विज्ञानदृष्टि, और उपनिषच्छब्दार्थ ( २७ से ३० पर्य्यन्त ) १०० - निर्विरोध प्राचीन विचार १०१ - आदरणीया प्राचीनदृष्टि १०२ - वैज्ञानिक का असन्तोष १०३ - उपनिषत् शब्द का व्यापक अर्थ १०४ - शब्दों की अवच्छेदक मर्यादा १०५- भेदक श्रवच्छेदक तत्त्व १०६ - शब्दशक्ति १०७ - श्रवच्छेदकावच्छिन्न १०८ - अनवच्छिन्न ईश्वरतत्त्व १०६ - शब्दातीत ईश्वरतत्त्व ११० -- ' संविदन्ति न यं व ेदाः ' ११ -- भेदक, और छन्द " " ११२ - समानार्थक शब्द " ११३ - कम्बुग्रीवादिमत्त्व २६ " " २६ 37 ( त ) ८७- ' उप श्रासन ' और उपासना ८८ उपनिषत् - शब्द का निर्वाचन ८६ - अध्यात्मविद्या प्रतिपादिका ईशादि उपनिषदें १०- प्राचीनमतमीमांसा ६१ - ब्रह्मवेढपरिलेख ६२ - त्रयीवेदपरिलेख १६३ - ब्राह्मण वेद परिलेख ६४- ब्रह्मवेद के निरूपणीय विषय ६५ - ब्राह्मणवेद के निरूपणीय विषय " " 97 २५ " १४ ११४ -- सामान्य, और अबच्छेदक ११५ - ब्राह्मणग्रन्थों में उपनिषच्छब्दप्रवृत्ति ११६ - आरण्यकग्रन्थों में उपनिषच्छब्दप्रवृत्ति ११७ - उपनिषत् का तात्त्विक्लक्षण 29 " ( घ ) ब्राह्मण में उपनिषत् ३१ से ४७ पर्य्यन्त ११८ - पुरुषार्थ- क्रत्वर्थ - कर्म्मपरिगणना ११६ -- कम्मैतिकर्तव्यता का विभेद १२० -- भिन्नता, और उपनिषत् १२१ -- विज्ञानसिद्धान्त, और उपनिषत् १२२ -- मौलिक - उपपत्ति, और उपनिषत् १२३- ' उप - नि - षत् ' और उपनिषत् ३१ ३२
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उपनिषद्भुमिका - प्रथमखण्ड १२४ - उपपत्ति- निश्चय, स्थिति, और उपनिषत् ३२ १२५ - व्यावहारिकी उपनिषत् १२६ -- उपनिषत् युक्त कर्म्म १२७-- विद्या, श्रद्धा, उपनिषत् १२८-- सर्व हुतयज्ञ, और वैधयज्ञ १५७ -- विज्ञानोपनिषत् ३३ १५८ - उपनिषत् से युक्त ब्राह्मण ४६ ४७ " १२६ -- पाङ क्लवैधयज्ञ की उपनिषत् * हविर्वेददि परिलेख १३०-- सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम की उपनिषत् ३५ १३१ - हविर्यज्ञ की उपनिषत् ३६ १३२ - हविर्वेदी की उपनिषत् ३७ १३३ --गार्हपत्यादि कुण्डों की उपनिषत् " " १३४ - यज्ञफल की उपनिषत् ३८ १३५ -- लोकसमतुलित यज्ञोपनिषत् १३६-- श्रष्टाकपालपुरोडाशोपनिषत् ३६ ४० १६५ - उपनिषत् की परव्याप्तियाँ ३४ II II ( ङ - आरण्यक में उपनिषत् ( ४८ से ४६ पर्य्यन्त ) १५६ -- आरण्यक में उपनिषत्, और प्राचीनों की सम्मति १६०-- इत्युपनिषत् ' १६१-- मौलिक सिद्धान्तपरक उपनिषच्छन्द १६२ -- कार्य्य कारण रहस्य १६३-- श्रात्मसम्बन्धसूत्र १६४ -- कर्म का फल के साथ सम्बन्ध ४८ " 39 II " 77 १२७ -'पुरुषसम्मितो यज्ञः ' १६६ - उपनिषत् से युक्त सफलक १३८- क्यों? की उपनिषदें । १३६ -- भूत प्राणमय अग्नि १४०-- भूमहिमा का वितान १४१ -- उद्यचलक्षण निधनसाम १४२ -- पुराणसिद्धान्त की उपनिषत् १४३ - महावेदि, और हविर्वेदि १४४-- उत्तरावेदि, और यूप १४५ - वेदि, यूपों की उपनिषदें १४६ -- हविर्द्धानमण्डप की उपनिषत् १४७- सदोमण्डप की उपनिषत् 22 ४१ ४२ " " " ( च ) - उपनिषत् में उपनिषत् ५० से ७२ पर्य्यप्त १६७ - मन्त्रब्राह्मणात्मक निगमशास्त्र ४३ १६८ - उपनिषत्, और वेदान्त " १६६ - ' सर्वे वेदान्ताः ' " ४४ १७०- लोकव्यवहार १७१ - ज्ञानकाण्ड, और उपनिषत् १७२ - वेद का अन्तिम भाग " } १४८ - ऋत्विजों की उपनिषत् १४६ श्राध्यात्मिक महायज्ञ १५० --हरहयज्ञ १५१ - आध्यात्मिक यज्ञ की उपनिषत् १५२ -- पुराणगार्हपत्य की उपनिषत् १५३ - नूतन गार्हपत्य की उपनिषत् १५४-- उदुम्बरशाखा की उपनिषत् १५५ - यद्वै देवा अकुर्वस्तत करवाणि ' १५६ -- ब्राह्मणग्रन्थ, और उपनिषत् 33 " " I १७३ - सनातन व्यवहार " १७४ - विज्ञानदृष्टि पर आक्षेप " 39 १७५ – समाधानोपक्रम ४६ " १५ १७६ - अनुज्ञाधारा, और विधि १७७ – प्रधानकम्मों के स्वरूपसम्पादक १७८ - श्रनारभ्याधीता श्रुति १७६ - अनारम्याधीत आदेश १८० - सामान्य विधियाँ १८१ - विधि के तीन पर्व ५१ ५२ 39
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१८२ - उपनिषदों की विभिन्नता १८३- क्रत्वर्थकर्मो की उपनिषदें, और ब्राह्मणग्रन्थ विषयसूची ५३ १०२ - सामान्यकर्म्म 29 ५५ २०३ - कम्र्मोपपत्तिजिज्ञासा २०४ - कम्र्मोपनिषत् २०५ - श्राक्षेपसमाधान २०६ - ' सर्वस्यै वाच उपनिषत् ' २०७ - हमारी भ्रान्ति ६३ ६४ " ६५ " ६६ १८४ - पांप्रणयनक ५४ १८८५ - व्रतपति अग्नि की व्रतसम्पत् १८६ - अप उपस्पर्श लक्षण व्रतोपायन १८७ - काम, तप, श्रम, के ऋजुभाव ५६ २०८ - गीतोपनिषत् " " १८८ - महात्मा दुरात्मा १८६ - सत्यभाव, अनृतभाव १६० - अमृतरूप वाङ मूल १६१ - वाक् का पुष्प, फल १६२ - ' तेन पूतिरन्तरतः ' १६३ - मेध्य, पवित्रभाव १६४ - व्रतोपायन की उपनिषत् १६५ - क्रत्वर्थकर्म्म, और उपनिषदों का निदर्शन १६६ - पुरुषार्थकम्मों की उपनिषदें १६७ - वरुणप्रघासेष्टि १६८ - प्रधासेष्टि की उपनिषत् १६६ - अनारभ्याधीत कर्म्म, एवं उनकी G उपनिषदें २०० - एकधनावरोध, देवस्मर २०१ - यज्ञविरिष्टसन्धान [ ४ ] क्या उपनिषत् वेद है? ( क ) - प्रस्तावना -१ से ३ पर्य्यन्त १ - सनातनधर्मी, और उनका विश्वास २ - विश्वास का विरोध ३- सनातनधर्मी जगत् का क्षोभ ४- सनातनधर्मियों से नम्र निवेदन ५- भावुक भारतीय विद्वम्मन्य ६- हमारी जटिलता ७- र्निभ्रान्त वेदशास्त्र 39 ५७ २०६ - उपनिषत्सु २१० - स्मृति और उपनिषत् २११ - ' बागेवोपनिषत् ' २१२ - अथादेशा उपनिषदाम् 27 २१३ - वेदस्योनिषत् ' सत्यम् ' 99 २१४- सत्यस्योनिषत् ' दमः ' ५८ २१५ - दानस्योपनिषत् ' तपः ' २१६ - दमस्योपनिषत् ' दानम् ' २१७ - तपसोपनिषत् ' त्यागः ' २१८ - त्यागस्योपनिषत् ‘ सुखम् ' २१६ - सुखस्योपनिषत् ‘ स्वर्ग: ’ ५६ ६० ६१ २२० - स्वर्गस्योनिषत् ' शमः ' ६२ | २२१ - जीवन की कृतकृत्यता ६३ इत्युपनिषच्छब्दार्थमीमांसा ८- भारतवर्ष के श्रास्तिक ६- मनोविज्ञानसिद्धान्त १० - विचारधारा से क्षोभ १ ११ - श्रद्धालुओं की श्रद्धा १२- नास्तिकोपाधिप्रदान १६ १३- हमारा व्याज से धर्म्मचारण १४- कल्पित कथाओं का समावेश १५- भक्तमण्डली, और उसका अभिनिवेश १६- कर्त्तव्यविमुक्ति का कल्पित उपाय १७ - लोकवृत्तरक्षा, और मौनव्रत 29 " ६७ 33 ६८ 33 " 33 93 २ ३ " 23
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१८- अन्धश्रद्धात्मक लोकवृत्त १६- हमारा प्रश्न २०- प्रकृति का प्रवल अनुरोध २१-- ' मानात् सत्यं विशिष्यते ' उपनिषद्भूमिका प्रथमखण्ड ४ 37 39 39 ५२ -- धर्म - विधर्म का भेद ५३ -- बुद्धिभेद का तात्पर्य्य ५४ - मिथ्या श्रद्धा का विरोध ५५-- प्रबल विप्रतिपत्ति १० , 33 २२ -- उपास्य सत्यतत्त्व २३ - शास्त्रों का निश्चित सिद्धान्त २४ -- मिथ्या श्रद्धा, और समाजविनष्टि २५-- विचारपरामर्श, और श्रद्धानुगमन २६-- श्रद्धालु समाज का वर्गीकरण २७ -- यथार्थग्राही श्रद्धालु २८- शास्त्रग्राही श्रद्धालु २६- कोमलश्रद्ध गतानुगतिक ३० -- सत्यासत्य का परीक्षा के द्वारा निर्णय ३१ -- प्रमाणवाद, और श्रात्मतुष्टि ३२- शास्त्रीय - कल्पित श्रद्धा ३३ - वितण्डावाद का श्राश्रय ३४- ' शेषं कोपेन पूरयेत् ' ३३- ' गतानुगतिको लोकः ' ३६ -- ' न बुद्धिभेदं जनयेत् ' ३७- समाजविरोध का भय ३८-- लोकसंग्रहरक्षा, और मिथ्याभाषण ३६ -- ईश्वराज्ञा का दुरुपयोग ४०- हमारी विडम्बना ४१. सत्यपक्षपाती जगदीश्वर ४२ - आज्ञा का मौलिक रहस्य ४३ -- अधिकारीभेद से कर्म्मभेद ४४ -- उपासना के विविध भेद ४५ -- अधिकारसिद्ध - कम्मों की स्तुति ४६ -- शास्त्र सिद्धमार्ग ४७-- हमारी सम्प्रदाएँ, और शास्त्रनिष्ठा ४८ वर्णाश्रमविभाग " } ५६ -- गुणदोषमय पदार्थ " " 27 97 " I " ५ " ६ ५८-- दोषदृष्टि, और निन्दा ५६ -- परीक्षाविधि, और श्रश्रद्धा ६०-- परीक्षा के असत् परिणाम ६१ - शास्त्रीयदृष्टि और सामाजिकदृष्टि ६२ - श्रावश्यक समाजरक्षा ६३- ' महाजनो येन गतः स पन्थाः ' ६४ - आचार्य्यपरम्परा का सनातनत्व ६५-- श्राचाय्र्यो की गुणदोषमीमांसा ६६ - लोकवृत्त की रक्षा, और मौनव्रत ६७-- गुणदोषमी सांसा, और श्रद्धाविनष्टि ६८- दोषद्वारों का पिधान ७० -- समालोचना, और बर्त्तमानयुग ७१ -- दोषदर्शी समालोचक 99 ६६-- परीक्षा से तटस्थता ७ 39 21 ७२- अद्ध दग्ध समालोचक " ८ I 97 " 29 " ७३ - छिद्रान्वेषण की जघन्यता ७४ - जनता की श्रद्धा का समादर ७५ श्रद्धा का सनातनलक्षण ७६- श्रद्ध ेय, और श्रद्वालु ७७ - श्रद्धा के विविध फल ७८ - श्रद्धा से हिन्दुत्व की रक्षा ७६ - निर्दोष वेदशास्त्र ८० - गुणदोषप्रवृत्ति, और श्रद्धा ८१ - प्रश्नमीमांसा की अनावश्यकता " ११ 76 39 39 47 १२ " " " 23 39 " " १३ II १४ " 39 " 39 ८२ - वेदश्रद्धा का अभिनन्दन ८२ - वेदशास्त्र का सर्वोत्कर्ष " ४६ -- वर्णों का समन्वय " 39 ८४ - वैदिक साहित्य, और परीक्षादृष्टि " ५०-- अधिकृत कर्मानन्यता ८५ - परीक्षा, और अभयपद् ५१-- उत्तम, मध्यम, प्रथम श्रेणि के कर्म 39 ८६- शास्त्र के सकारण प्रदेश 03 १५ १७
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८७- भगवान् राम की सम्मति - भगवान् व्यास की सम्मति ८६ - लोकश्रद्धा, और प्रामाणिकता ६० - वेद की अलौकिकता ६१- लोकोत्तरा - तत्त्वविभूतियाँ ६२ - गहनतम विज्ञानकोश ६३ - अपौरुषेयता के कारण विषयसूची १५ " " " १६ 33 १२० -- विषम वातावरण, और नास्तिक १२१ - - रहस्यंज्ञान की आवश्यकता १२२ - स्वाभाविकी जिज्ञासा १२३ - कोमल श्रद्धों की सद्भावना १२४ - नास्तिकता का मूलकारण १२५ - घातकभावानुगता अन्धश्रद्धा १२६- तामसी श्रद्धा का दूसरा रूप १२७ -- ज्ञानमूला श्रद्धा ६४- अलौकिक विज्ञान भाव " ६५ - महापुरुषता के परिचायक विभूतिगुण ११२८ - विपरीतज्ञानाभिनिवेश 71 ६६ - हमारी युक्ति की निर्मलता १७ १२६-- गया श्राद्ध, और प्र ेतात्मा १३० - बाह्य श्राभ्यन्तर- वायु २१ , " २२ " 37 " 3 71 २३ ६७ - परमवेदशास्त्र 35 ६८ - श्रद्धय की मीमांसा १३१- वातवायु, और कणाद 77 ६६ - परीक्षाभय, और मिथ्याश्रद्धा १३२ - चेष्टाकर्म्म, और प्राणवायु 33 १०० - परीक्षा, और सत्यश्रद्धा १०१ - कल्पित श्रद्धा का अनुपयोग 39 39 १३४ - वायुप्रकरण, और ईश्वर १३५ तामसी श्रद्धा का अन्यविवर्त 39 १८ १०२ - व्यक्तिगत विश्वास, और धर्मरक्षा १०३ - जनसाधारण का अविश्वास १०४ - गुणदोष की मान्यता १०५ - सत्यता की दृढता, और परीक्षा १०६ - परीक्षा, और माता का टीका १०७ - परीक्षा, और शवदाहप्रक्रिया १०८ - परीक्षा, और श्राविष्कार १०६ - परीक्षा, और ग्रहणविज्ञान ११०- परीक्षा, और यज्ञविद्या १११ - परीक्षा, और सत्यासत्यनिर्णय ११२ -- सात्त्विकी श्रद्धा ११३ - राजसी श्रद्धा ११४- तामसी श्रद्धा ११५ - कारण विशेष का अपरिज्ञान, और तामसी " 33 १६ " 37 " 17 श्रद्धा ११६-- गङ्गा श्रद्धा में विप्रतिपत्ति " २० ११७- नास्तिकों का तर्कजाल 19 ११८ - हमारी अविश्वासवृद्धि " ११६ - ऋषिवाणी, और कुतर्क २१ १८ " १३३ - तामसीश्रद्धा, और अर्थ का अनर्थ १३६ - पौरुपेयता के अर्थ में भ्रान्ति १३७ - आक्षेप समाधान १३८ - लोकसंग्रह, और उसका स्वरूप १३६ -- असत् - मण्डलियाँ १४०-- धर्म्मवृषभ का संत्रास १४१ -- अन्धश्रद्धा से सर्वनाश १४२ - विज्ञानदृष्टि के द्वारा परीक्षण १४३ - सात्विकी श्रद्धा का अनुगमन इति -- प्रस्तावना - * --11 २४ 37 " 93 13 SP 39 २६ ( ख ) -- विषयप्रवेश - ( ३३ से ३८ पर्य्यन्त ) १४४ -- परोक्षप्रियदेवता १४५ -- पौरुषेय, अपौरुषेयशास्त्रपरिगणना १४६ - अपौरुषेयता, और अतिप्रश्न १४७ - प्रश्नसापेक्ष अतिप्रश्न १४८ - विचारप्रवृत्ति की पद्धति १४६ -- हमारा विकृत बौद्धजगत् १५०-- वर्तमान युगके असदुत्तर २७ " " " "
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उपनिषत् भूमिका -- प्रथमखण्ड १५१- प्रकृति का निरर्थक उद्घोष २८ १५२ - वेदसम्बन्ध में उद्गार १५.३ - सुविज्ञेयभाव की दुर्विज्ञेयता १५४ - यथार्थग्राही, और विज्ञानदृष्टि १५५ - शास्त्रग्राही, और अन्तदृष्टि १५६ - गतानुगतिक, और बाह्यदृष्टि - १५७ - प्रामाणिकी वाह्यदृष्टि १५८ बाह्यदृष्टि के अपवाद १५६ -- सत्या अन्तदृष्टि -१६० - बाह्यदृष्टि, और और अल्पज्ञता १६१ - अन्तदृष्टि, और अनन्तता १६२ -- निरर्थक आक्षेप १६३ - आत्मसत्य के व्याप्ति - स्थान १६४ - निर्भ्रान्त अपौरुषेयत्व सिद्धान्त २६ " " 33 ३१ " 23 , I ३२ १६५ - अपौरुपेयत्त्व, और अतीन्द्रियभाव १६६ -- विज्ञानदृष्टि, और श्रुति १६७ - अन्तदृष्टि, और स्मृति १६८ -- बहिर्ड ' ष्टि, और लोकवृत्त १६६-- ' इदमित्थमेव ' १७० - भातिभाव, और दर्शन १७१ - सत्ताभाव, और विज्ञान १७२ - विज्ञान, और सत्यनिर्णय १७३ - दर्शन, और मतवाद १७४-- भारतीय षड्दर्शनवाद १७५ -- शास्त्रों के विसंवाद १७६- परम्पर विरोध, और दर्शन १७७ - ' हर निरपवादः परिकरः ' १७८- दार्शनिकदृष्टि और अपौरुषेय - पौरुषेय-मीमांसा इति - विषयप्रवेश: ३-ग - वेद पौरुषेय है, अथवा चपौ । पूर्वोत मीमांसाद्वयी रुषेय?, इस सम्वन्ध में दार्शनिकों के विभन्न विचार पृष्ठसं ० १ सेपर्यन्त अथ त्रयोदश- ( १३ ) अवान्तरमत-युक्तं ४- पूर्वमीमांसानुगता षट्सूत्री ५ - सूत्रतात्पर्य्यार्थ समन्वय - प्रयास ६ - समाख्याभाव, और सूत्रार्थसमन्वय ७ - वेद की पौरुषेयता पर आक्षेप ८- काठकं कापिल आदि मूलक आक्षेपों का निराकरण E - अनित्यता का मूलोच्छेद १० - शब्दार्थ का औत्पत्तिक - सन्बन्ध पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिमतं- ११ - नित्यसम्बन्धानुगता - अपौरुषेयता मतप्रदर्शनम् 9 * मीमांसानुगत - दृष्टिकोण १ - विभिन्न - मत - दिग्दर्शनानुगत - प्रमुख लक्ष्य २- मीमांसानुगत दृष्टिकोण ३ ४ १६ १२- मीमांसा सम्मत दृष्टिकोण का उपराम I ३२ II " " " ३३ 33 S " ५ 39 ( १ ) - ' नित्यसिद्ध, अतएव कूटस्थ अपौरुषेय-वेद - ईश्वर से अभिन्न है ' नामक-प्रथममीमांसामत १३ - विज्ञानमय वेदशास्त्र १४ - ब्रह्म का स्वरूप संस्मरण