Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 61–70

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70

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विषयसूची १५ - त्रयं ब्रह्म, और त्रयो वेदाः १६ - वेद, और ब्रह्म की अभिन्नता १७ - सूर्य्यात्मक ब्रह्म, और वेदात्मिका रश्मियाँ १८ - उक्थरूप ब्रह्म, और कत्मक वेद १६- मूलात्मक ब्रह्म, और तूलात्मक वेद २०- श्रङ्गी रूप ब्रह्म, और अङ्गात्मक वेद २१- अवयवीरूप ब्रह्म, और अवयवात्मक वेद २२ - ' तस्य वाचकः प्रणवः ' का संस्मरण २३- प्रणवात्मक श्रोङ्कार का संस्मरण २४ - ' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' का संस्मरण २५- ' वेदशब्द ' का समन्वय २६ - ईश्वर से अभिन्न वेद का समन्वय २७- प्रथममतानुगत प्रमाणसन्दर्भ मीमांसानुगत प्रथम- मत - उपरत १ ५ ३६ - उभय ब्रह्मानुगत पारिभाषिक - समतुलन ह 39 " ३८ - अन्तरष्टिनिबन्धा नित्यता " ३७- शब्द - पर - ब्रह्मानुगत भेदसम्बन्ध ३६- शब्दार्थरूप परब्रह्म की प्रमेयरूपता का पारिभाषिक - समन्वय 79 ४० प्रमाणानुगत प्रमेय का संस्मरगा 71 ४१ - प्रमेय का संसाधक प्रमाणतत्त्व ६ ( २ ) - " नित्यसिद्ध, अतएव कूटस्थ - अपौरुषेय-वेद ईश्वर के तुल्य है " -नामक - द्वितीय-मीमांसा - मत -- * -२८ - ईश्वर के समकक्ष वेद २६- शब्दब्रह्मधारा, और परब्रह्मधारा ३० - शब्दब्रह्मानुगता स्टोर - स्वर वर्ण त्रयी ε ३१ - परब्रह्मानुगता - अव्यय - श्रक्षर - क्षर - त्रयी ३२- परब्रह्म के ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम - रूप पञ्चाक्षरविवत ३३- शब्दब्रह्म के अ इ उ ऋ लृ - रूप पञ्च-स्वर - विवर्त्त ३४- परब्रह्म का निर्विकार अखण्ड - विवर्त्त ३५ - शब्दब्रह्म का निर्विकार अखण्ड - विवत्त ८ " 21 ४२- प्रमाणात्मक वेद, और प्रमेय ईश्वर ४३ - वेद का ईश्वर से समतुलन ४४- ईश्वरसमकक्ष अपौरुषेय - वेद ४५ - द्वितीयमतानुगत - प्रमाणसन्दर्भ मीमांसानुगत - द्वितीयमत उपरत ? * 17 17 ( ३ ) - " नित्यसिद्ध कूटस्थ, श्रतएव अपौरुषेय यह वेद ईश्वर का निःश्वास है " नामक तृतीय - मीमांसा मत -1141 ४६ - अध्यात्मसंस्थानुगत श्वास - प्रश्वास ४७ - वेद, और ईश्वर का सम्बन्ध ४८ - श्वास - प्रश्वासानुगता जीवसत्ता ४- वेदात्मक श्वास - प्रश्वास 37 ५० - वेदात्मक - ईश्वर ५१ - ईश्यर - निःश्वासात्मक - वेदतत्त्व 23 ५२ - नि: श्वासरूप वेद की अपौरुषेयता ५३- तृतीय- मतानुगत - प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुगत तृतीयमत उपरत ३ १० 17 97 77 ११

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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ( ४ ) - ' निन्यासिद्ध - कूटस्थ, अतएव पौ रुषेयवेद को ईश्वरानुग्रह से ब्रह्माने प्राप्त किया है " नामक चतुर्थ - मीमांसा - मत ५४ - ईश्वरानुग्रह से अनुग्रहीत श्रादिदेव ५५ - सर्वसृष्टि प्रवर्त्तक- हिरण्यगर्भप्रजापति ५६ - ब्रह्मा के हृदय में वेद का आविर्भाव ५७ - ब्रह्मा के मुख से वेदों का विनिर्गमन ५८- ब्रह्मा की तटस्थता, और वेद का स्वतः आविर्भाव II ५६ - सर्वज्ञान, और तदनुगत प्राथम्य ६० - प्रयत्न का अभाव ६१ - बुद्धयनुगता - योग्यता, और कम्मप्रवृत्ति ६२ - बुद्धयनुगत - कर्म्म ६३ - ईश्वरीय व्यापारात्मक ज्ञानप्रवाह ६४ - वेदज्ञान के सम्बन्ध में ब्रह्मा का पारतन्त्र्य ६५ ब्रह्मा के द्वारा वेद की अभिव्यक्ति, न तु-उत्पत्ति ६६ - ज्ञानराशिरूप वेद का अपौरुषेयत्त्व ६७ - चतुर्थ - मतानुगत - प्रमाणसन्दर्भ -मत उपरत मीमांसानुगत - चतुर्थ -४ * ११ " " " 39 १२ 17 ( ५ ) - नित्यसिद्ध - कूटस्थ, अतएव अपौ-रुषेय वेद को ईश्वरानुग्रह से महर्षियोंनें प्राप्त किया है'-' नामक पञ्चम-मीमांसा - मत -- * --६८ - ऋषियों की चिरकालानुगता तपश्चर्यां ६६ - तृपोऽनुमत विशुद्धीकरण १३ 31 " ७०-१० - ईश्वरानुग्रह, और ऋषियों के निर्मलान्तः-करण में वेद का आविभाव १३ ७१ - ईश्वरीय ज्ञानरूप वेदों का श्रानन्त्य " " ७२ - ‘ अनन्ता वै वेदाः ' का संस्मरण 27 ७३ - उपलब्ध - वेदों की सापेक्षता ७४ - सापेक्षभावानुबन्धी- समन्वय " ७५ - ऊर्ध्वरेता महर्षियों का अन्तःकरण ७६ - वेदमन्त्रद्रष्टा महर्षिगण ७७ - पञ्चम - मतानुगत - प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुगत पञ्चम - मत-- उपरत :: " 1 " " " ( ६ ) - ' नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय-पृष्णि -- प्रमुख - ऋषियोंनें प्राप्त किया ' - नामक पष्ठ - मीमांसा - मत " वेद को " ७८ - पृष्णि नामक ऋषियों को महती तप-७६- तपश्चर्थ्यानुगत ईश्वरानुग्रह ८०- ईश्वरानुग्रहरूप वेदाविर्भाव ८१ - पारिभाषिकी - ऋषित्रयी ८३- ' आकृष्ट भाषाः । ८४ - ' सिकता - निवावरी ' ८४ - ' पृष्णयोऽजाः ' ८५ श्रपृष्णि - ऋषि की प्रमुखता ८६- षष्ठमतानुगत प्रमाणसन्दर्भ मीमांसानुगत -- षष्ठ- मत -- उपरत ६ 31 १४ 19 39 17 11 २१

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विषयसूची ( ७ ) -- ' नित्यसिद्ध, कूटस्थ, श्रतएव अपौरुषेय वेद को अथर्वाङ्गिरा ऋषिने ईश्वरानुग्रह से प्राप्त किया ' नामक सप्तम - मीमांसामत * ८७- ऋषि सम्प्रदायानुगत - ' अथर्वाङ्गिरा ' सुप्रसिद्ध ऋषि का संस्मरण नामक ८८ अङ्गिराप्राण के परीक्षक अङ्गिरा महर्षि ८६- ब्रह्मपर्षदध्यक्ष- ' ब्रह्मा ' रूप अङ्गिरा महर्षि 29 ६० श्राविज्यानुगत श्रेष्ठता, और तदनुबन्धिनी-' ब्रह्मा ' उपाधि ६१ - श्रङ्गिरा - महर्षि के वंशजों का संस्मरण ६२ – अङ्गिरामहर्षि के अन्तःकरण में नित्यवेद का आविर्भाव ६.३ - श्रङ्गिरा के ज्येष्ठपुत्र अथर्वा ७४- अथर्वा में त्रयीविद्या का संस्थापन ६५ - अथर्वाङ्गिरा के द्वारा वेद की अभिव्यक्ति का समन्वय ६६ - अथर्वाङ्गिरा - महर्षियों का वेद प्रवत्त कत्त्व-समन्वय ६७- सप्तम मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ मीमांसानुगत - सप्तम - मत - उपरत ७ १४ " I 77 II " १५ ( c ) - " नित्यसिद्ध, कूटस्थ, श्रतएव पौरु पेय- वेद ईश्वर के वाक्य हैं, ईश्वर ही इन का सम्प्रदाय प्रवत्त के है " -- नामक श्रष्टम-मीमांसा -- मत ६८ - नित्यसिद्ध, वेद ६६ - वेदों की ईश्वरीय- वाक्यरूपता १०० - वेदसम्प्रदाय प्रवतक ईश्वर १७ 33 १०१ - वेदवाणी, और ईश्वर १०२ - वेदवाणी के द्वारा विश्व का निर्माण १०३ - शिवादि ऋषि - पर्य्यन्त वेदज्ञातृमण्डल १०४- अष्टम - मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ मीमांसानुगत अष्टम - मत - उपरत १७ 19 ( ह ) - " नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव पौ--रुषेय यह वेद चतुम्मुख ब्रह्मा का ' नामक नवम - मीमांसा - मत वाक्य है ".. १०५- नित्यसिद्धवेद, और ब्रह्मवाक्य १०६- सृष्टिनिर्माता - स्वयम्भू ब्रह्मा " १०७ - स्वयम्भू ब्रह्मा के मुख से वेदवाक का विनिर्गमन १०८ - नित्या वेदवाक्, और ब्रह्मा १०६ - वेदवाक्, और सृष्टिनिर्माण ११० - वेदों के आदिसम्प्रदायप्रवर्तक स्वयम्भू-ब्रह्मा १११ - स्वयम्भू के प्राणमुख से वेदों का श्राविर्भाव " ११२ - वेदों के संस्मर्त्ता ब्रह्मा, और वेदों का ११३ - नवम मतानुगत प्रमाण - सन्दर्भ मीमांसानुगत - नवम - मत - उपरत १८ " 67 17 27 33 ( १० ) -- " नित्यसिद्ध, कूटस्थ, श्रतएव पौ-रुपेय- वेद भिन्न भिन्न ऋषियों का वाक्य है " - नामक दशम - मीमांसा - मत - * --११४ - विभिन्न ऋषि - वर्ग ११५ - वेद के सम्प्रदायप्रवर्तक- श्राप्तमहर्षि १६ " २२

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98 ११६ - ऋषियों की तपःपूता- श्रार्षदृष्टि ११७ - आर्षदृहि के द्वारा वेद का दर्शन ११८ - ऋषिकल्पना से संस्पृष्ट वेदशास्त्र ११६ - ईश्वरदत्ता - विभूति, और वेद उपनिषद्भुमिका - प्रथमखण्ड १६ | ( १२ ) - नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरु-पेय वेदशब्दों से ईश्वर ने विश्व का निर्माण किया है " - नामक १२ वाँ मीमांसामत १२० - ऋषियों के हृदयाकाश में वेद का श्राविर्भाव " १२१ - दिव्यज्ञानप्रकाशात्मक - वेद 22 १२२ - वेद का स्वतः आविर्भाव १२३ - वेदप्रचारक महर्षिगण १२४ - वेदनिर्माण से संस्पृष्ट ऋषिगण १२५ - दशममतानुगत प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुगत - दशम - मत - उपरत १० ( १० ) - " नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव पौ-रुषेय वेद के तात्पर्य्यानुसार - ईश्वर ने विश्व का निर्माण किया है " नामक ग्यारवाँ मीमांसामत १२६ - वेदतात्पर्य्याधार पर ईश्वर के द्वारा विश्व-सर्ग की प्रवृत्ति १२७ - पदार्थानुगत उत्पत्ति - क्रमादि १२८ - पूर्वकल्प का उत्तरकल्प में संस्मरण 37 २० 31 39 39 " 33 " १२ १३५ - वेदशब्द, और तद्द्द्वारा ईश्वरप्रजापति से विश्व का निर्माण १३६ - वेदशब्दों से भूत - भौतिक - प्रपञ्च की अभि-व्यक्ति १३७ - शब्दों का सन्निवेश- तारतम्य, और विश्वा-नुगत नाम - रूपों की श्रमिव्यक्ति १३८ - विश्व का वाङ् मयत्त्व १३६ - पञ्चमहाभूतानुगता शब्दोलब्धि १४० - शब्दोपलब्धिमूला वेदानुगता व्यापकता १४१ - शब्द की सर्वव्यापकता का संस्मरण १४२ - द्वादश - मतानुगत प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुगत १२ वाँ मत उपरत १२ ( १३ ) " नित्यसिद्ध, कूटस्थ, २१ अतएव पौरुषेय वेद के पूर्व कल्प का स्मरण " 33 27 23 करके सृष्टि के आदि में इस वेद को ईश्वर ने प्रकट किया हैं ' नामक १३ वाँ मीमांसा-मत १२६ - वेदसृष्टि का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय १३० - ईश्वरीय वेदज्ञान का कल्पानुपात से आविर्भाव १३१ - ईश्वरीय ज्ञानात्मक वेद १३२ - ईश्वरीय प्रत्यक्ष ज्ञान, और वेद १३३ - प्रत्यक्षज्ञानरूप वेद, और तद्द्वारा विश्व-स्वरूप की अभिव्यक्ति १३४ - एकादश- मतानुगत प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुगत ११ वाँ मत उपरत ११ - * --१४३ - निद्रानिमग्न मानव, का उपराम और पूर्वदिनके कम्मों १२३ १४४ - पूर्वकल्प स्थानीय - पूर्व दिन II १३ २३

पृष्ठ 65

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विषयसूची १५६ - वेद का ऋषिद्रष्टत्त्व, न तु कर्तृत्व १६० - वेद की आपत्तिमूला अपौरुषेयता ३१ " १४५ - उत्तरकल्प स्थानीय उत्तर दिन २३ १४६ - निद्राभङ्गानन्तर उत्तरकल्प में पुनः पूर्वकल्प " का आविर्भाव १४७- सुषुप्तिकालानुगता रात्रि १४८ - रात्रिनिबन्धन पूर्वकल्प १४६ - जाग्रदवस्थानुगत ग्रहः १६१ - परोक्षकर्त्ता का अनुगमन II १६२ - आनुमानिक कर्त्ता ईश्वर " " १६३ - वेदका का प्रवर्तक- ईश्वर 29 39 १६४ - वेद की पारिभाषिकी पौरुषेयता 29 १५० - अहरनुगत- उत्तरकल्प १५१ - ईश्वरीय सृष्टि - लय - धारा - क्रमका कल्पानुगत संस्मरण १५२- सृष्टिकालोपलक्षित - हरागम १५३ - रात्र्यागम, और वेदविलयन १५४ - अहरागम, और वेदाविर्भाव 39 76 १५५ - वेदों के स्मर्त्ता ईश्वरप्रजापति १५६ -त्रयोदश - मतानुगत - प्रमाण सन्दर्भ मीमांसानुत १३ वाँ - मत- उपरत * * के १५७ - पूर्वोत्तर - मीमांसा - सम्मत- तेरह ( १३ समन्वय ) प्रकार २५ अवान्तर मतों का संकलनात्मक -२४ इति - त्रयोदश - ( १३ ) श्रावान्तर-मतयुक्तंपूर्वोत्तरमीमांसानुगतं -मतप्रदर्शनम् अथ- सप्त- ( ७ ) - अवान्तरमत-युक्त - नव्यन्यायाभिमतं -मतप्रदर्शनम् २ नव्यन्यायानुगत- दृष्टिकोण-१५८ - वेद की नित्यता के सम्बन्ध में नव्यन्याय का दृष्टिकोण 29 १६५ - कुसुमाञ्जलि, और प्रामाण्यवाद १६६ - तत्त्वचिन्तामणि, और प्रामाण्यवाद " " १६७- नव्यन्यायानुगत - दृष्टिकोण का उपराम 19 39 ( १ ) - ' प्रतिकल्प की सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर नवीन ही वेद बनाता है " -- नामक -प्रथम- नव्यन्याय - मत १६८ - वेदतत्त्व की ईश्वररूप से भिन्नताईश्वर " १६६- नित्य - अनादि, एवं शरीरानाश्रित, १७० - शब्दराशिरूप वेद की अनित्यता, सादिता 39 एवं शरीरव्यापाराधितता १७१ - सूर्य्य - चन्द्रादि - विश्वपदार्थों का युगानुगत-कल्पानुगत - श्राविर्भाव तिरोभाव के १७२- वेदों का विश्वपदार्थवत् प्रतिकल्पादि अन्त में श्राविर्भाव तिरोभाव १७३ - प्रथम - मतानुगत - प्रमाण सन्दर्भ नव्यन्यायानुगत - प्रथम - मत - उपरत १ ** ३२ 17 ३३ ( २ ) - " नित्य सिद्ध - वाक्तत्व से ईश्वर वेद, और विश्व को उत्पन्न करता है " -नामक - द्वितीय- नव्यन्याय - मत - * के द्वारा वेद, १७४ - वाक्तत्त्वरूप साधन से ईश्वर ३४ और विश्व का निर्माण १७५ - कणाद - सिद्धान्त का संस्मरण 39 ३१ १७६ - वाक् की नित्यता का संस्मरण 29 २४

पृष्ठ 66

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उपनिषद् भूमिका -- प्रथमखण्ड १७७ - नित्यपरमाणुओं से अनित्य सूर्य्य आदि का निर्माण १७८ - नित्यावाक से अनित्यवेद का आवि १७६ - वेदों का वाङमयत्त्व १८० - द्वितीय मतानुगत प्रमा सन्दर्भ नव्यन्यायानुग - द्वितीय मत - उपरत २ ३४ ३ ) - " वेद, एवं विश्व को ईश्वर ने अपनी इच्छानुसार बनाया है " नामक-तृतीय- नव्यन्याय - मत १८१ - ईश्वर की इच्छा, और वेद, तथा विश्व का निर्माण ३५ १८२ - नित्य- परमाणु, एवं नित्या वाक् की अपेक्षा से श्रसंस्पृष्टा - ईश्वरेच्छा १८३ - ईश्वरेच्छा का सर्वतन्त्र - स्वातन्त्र्य १८४ - इच्छानुगत निर्माण, और ईश्वर १८५ - अपौरुषेय वेद के शब्दों के द्वारा पौरुषेय-ग्रन्थों का निर्माण १८३ - सूर्य्य ' ममुद्रात्मक उदाहरण १८७- वेद निर्माण - समन्वय १८८ - तृतीय - मतानुगत प्रमाण सन्दर्भ नव्यन्याद्यानुगत- तृतीय- मत - उपरत ३ ( ४ ) - " ईश्वरने वेद का निर्माण कर ब्रह्मा, एवं महर्षियों के द्वारा उसे लोक में प्रवृत्त किया " - नामक - चतुर्थ- नव्य-न्याय मत १८६ - विश्व, तथा वेदों का निर्माता ईश्वर, और उसकी आकारविहीनता 97 " " " १६० - निराकार - ईश्वर के द्वारा वेदोपदेश की प्रवृत्ति ११६१ - शरीरधारी उत्कृष्ट सात्त्विक जीव के माध्यम से ही वेदोपदेश की प्रवृत्ति १६२ - शरीरधारी के द्वारा ही वेदप्रचार - प्रसार ३५ 23 १६३ - उत्कृष्ट आधिकारिक जीवों का नाम - संस्मरण " १६४ -- ब्रह्मा व्यास - महर्षि- श्रादि महामानव, और तद्द्वारा वेदोपदेश १६५ - चतुर्थ - मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ ३६ नव्यन्यायानुगत- चतुर्थ - मत - उपरत ४ ( ५ ) -- “ ईश्वर ने अपनी इच्छा से अग्नि-वायु - सूर्य के द्वारा वेदों को उत्पन्न किया है " नामक पञ्चम - नव्यन्यायमत " १६६ - अग्निरूप- पार्थिवरस " " १६७ - वायुरूप - आन्तरिक्ष्य रस १६८ - श्रादित्यरूपद्य लोकीय - रस १६६ - तीन देवदेवता, और तीन लोक २००- अग्निरस से ऋग्वेद की उत्पत्ति २०१ - वायुरस से यजुर्वेद की उत्पत्ति २०२ - आदित्यरस से सामवेद की उत्पत्ति २०३ -ईश्वरविभूतिरूपा देवदेवता - त्रयी २०४ - ईश्वर के वेदकर्तृत्व की अक्षुण्णता २०५ - पञ्चम- मतानुगस प्रमाण- सन्दर्भ नव्यन्यायानुगत- पञ्चम - मत - उपरत ३६ " 25 २५

पृष्ठ 67

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विषयसूची ( ६ ) - " ईश्वर ने अपनी इच्छा से सूर्य के । द्वारा वेदों को उत्पन्न किया " - नामक षष्ठ - नव्यन्याय मत 111 . संस्मरण २०६ - ज्ञान क्रिया - अर्थ - तन्त्रत्रयी का २०७ – तन्त्रत्रयी के सञ्चालक सूर्यदेव २०८- विष्वद्वृत्तात्मक वृहतीछन्द २०६ - बृहतीछन्द का केन्द्र, और सूर्य्य २१० - एकल - एव - स्थाता - सूर्य्य ३८ " " से वेद का २११ - सहस्रांशु - सूर्य्यं के द्वारा ईश्वेरच्छा आविर्भाव 31 २१२ ईश्वरेच्छा के पूरक सूर्य्यनारायण २१३ -षष्ठ मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ पृष्ठ - मत - उपर नव्यन्यायानुगत - षष्ठ - मत - उपरत ( ७ ) - ईश्वरने अपनी इच्छा से यज्ञपुरुष के द्वारा वेदों को उत्पन्न किया " -नामक सप्तम नव्यन्याय मत 11411-२१४- वेद का प्रभव - स्थान - यज्ञ २१५ - यज्ञ के द्वारा ही वेद की स्वरूपाभिव्यक्ति का समन्वय 17 २१६ - वेदसाक्षात्कर्त्ता महर्षियों के द्वारा संकलित-वेदशास्त्र २१७ - श्राम्नाय - निबन्धन - शाखा - भेद २१८ - वेदाम्नाय प्रवर्त्तक ऋषियों का संस्मरण २१६ - सप्तम - मतानुगत प्रमाण - सन्दर्भ नव्यन्यायानुगत- सप्तम - मत - उपरत ७ " 11 39 २२० - नव्यन्यायानुगत - सप्त ( ७ ) - श्रवान्तरमतों का संकलनात्मक समन्वय ३६ इति - सप्त ( ७ ) - श्रवान्तर - मतयुक्तं नव्यन्यायानुगतं - मतप्रदर्शनम् २ # " अथ - पञ्च ( ५ ) -अवान्तर - मतयुक्तं " प्राचीनन्यायाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ३ प्राचीनन्यायानुगत- दृष्टिकोण २२१ - प्राचीनन्यायानुगा वेददृष्टि का संस्मरण ४३ २२२ ऋषिकृत - वेदों की पौरुषेषता, और प्राचीन-न्याय २२३ - वेदों की समादरणीया प्रवाहनित्यता २२४ - लौकिक - प्रावाहिक - शब्द, और तन्निबन्धना उदाहरण विधि २२५ - श्राप्तपुरुषों का वचनरूप वेदशास्त्र २२६ - प्राप्तवचन की प्रामाणिकता २२७ - न्यायदर्शन, और प्राचीनन्यायानुगत - दृष्टि-कोण २२८ - वात्स्यायनभाष्य, और दृष्टिकोण २२६ - वात्स्यायन सूत्रों का समन्वय प्रयास २३० - प्रमा की साधनभूता - प्रमाणचतुष्टयी का संस्मरण २३१ - सर्वप्रमाणमूर्द्धन्य शब्दप्रमाण का स्वरूप-समन्वय २३२- श्राप्तपुरुषों की विषयाप्तता २३३ - श्राप्तपुरुष, और ' तत्र भवान् ' २३४- दृष्ट श्रदृष्ट- अर्थ - भेद से शब्दप्रमाण का द्वैविध्य 37 ४४ 8 ) " II 39 " २६

पृष्ठ 68

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उपनिषद्भूमिका- प्रथमखण्ड २३५ - श्रदृष्टार्थनिबन्धन शब्दप्रमाण, और वेद की प्रामाणिकता २३६- शास्त्रप्रमाण की अनिवार्य्या शरणी-करणीयता का संस्मरण २३७ - लौकिक क्षेत्रों के श्राप्तपुरुष, और तद्व-चनों की प्रमाणिता II २३८ - अलौकिक क्षेत्रों के श्राप्तपुरुष, और तद्व-चनों की प्रामाणिकता २३- ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते ' का पावन -संस्मरण २४० - शब्द राशि रूप - वेदशास्त्र २४१ - आयुर्वेद - शास्त्र की प्रामाणिकता का सम-न्वय २४२- श्राप्तप्रामाण्यबुद्धि की अनन्या शरणा-नुगति " २४३ - वेदों का आप्तपुरुषों के द्वारा श्राविर्भाव २४४- ' श्रनुज्ञाता स्वयम्भुवा ' का संस्मरण २४५ - मन्वन्तरानुगत - वेदाविर्भाव २४६ - वेदोद्धारक्रम का नैरन्तर्य २४७ - वेद की प्रवाहनित्यता २४८- आयुर्वेद, और वेद के प्रवक्ताओं का सम-तुलन २४६ - प्राप्तता की समानता २५० - वेद की प्रामाणिकता का समन्यय, और तन्नबन्धन - शब्दप्रमाण २५१ - न्यायानुगता - शब्दनित्यता २५२ ( क ) - प्राचीन न्यायानुगत दृष्टिकोण का उपराम २५४ - सगुण - निर्गुण रूपा ब्रह्मविवर्त्तद्वयी ४४ २५५. सगुण - साकार ब्रह्मविव " " 35 ४५ " " " 99 ४५ 27 II " ( १ ) -- " ईश्वरावतार - ब्रह्मा ने वेद का निर्माण किया है " -- नामक प्रथम- प्राचीन न्याय-मत २५२ ( ख ) - ईश्वरावतार ब्रह्मा का संस्मरण २५३ - ब्रह्मा के द्वारा ही सर्वप्रथम वेदोत्पत्ति ४६ " २५६ - निर्गुण - निराकार ब्रह्मविवर्त्त २५ ७ - धर्मोपहित - सगुणेश्वर - ब्रह्म २५८ - धर्म्मविशिष्ट - सगुणेश्वर - ब्रह्म २५६ - ईश्वर - जीव - शिपिविष्टरूपा - महिमात्रयी, और धर्म्मविशिष्ट सगुणेश्वर २६०- सर्वज्ञ- हिरण्यगर्भ - विराट् - रूपा विवर्त्तत्रयी २६१ - क्षेत्रज्ञात्मा - महानात्मा भूतात्मा रूपा विवर्त्तत्रयी २६२ - [ संज्ञ - अन्तः संज्ञ - संसज्ञरूपा जीवत्रयी २६३ - आत्मविवर्त्तसमष्ट्यनुगत ईश्वरप्रपञ्च २६४- मध्यस्थ - हिरण्यगर्भ का संस्मरण २६५ - ईश्वरावतारभूत हिरण्यगर्भ के द्वारा वेदों का निर्माण प्राचीन न्यायानुगत- प्रथम- मत - उपरत - * -४६ " " " 7 " ( २ ) -- ' ईश्वरावतार मत्स्यभगवान ने वेदों का निर्माण किया है " नामक - द्वितीय प्राचीन न्यायमत २६६ - ईश्वरावतार - भूत ' मत्स्य ' भगवान् II २६७ - वेद के आदिप्रवर्त्तक मत्स्यावतार 99 २६८ - भूतावेशन्याय, और मत्स्यावतार ४७ २६६- द्वितीय - मतानुगत - प्रमाण - सन्दर्भ " प्राचीनन्यायानुगत- द्वितीय - मत - उपरत २ २७

पृष्ठ 69

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( ३ ) -- ' ' ईश्वरावतार -- श्रग्नि, वायु -- सूर्य--विषयसूची नामक देवताओंने वेद का निर्माण किया है " - नामक - तृतीय - प्राचीन-न्यायमत २७० - सुप्रसिद्ध । वेदत्रयी का संस्मरण २७१ - लोकत्रयी, और उसके श्रभिमानी देव-देवताओं का संस्मरण २७२ - ' श्रभिमानी व्यपदेश ' का पारिभाषिक-समन्वय २७३ - शरीरधारी - चेतनजीव, और देवदेवता २७४ - २८ इन्द्रियों से समन्वित देवदेवता २७५ सांख्यकारिका का संस्मरण २७६- भूतसर्ग - निबन्धन त्रिविध - महिमा - विवर्त्त २७७ - चतुद्दश ( १४ ) भूतसर्ग का नामस्मरण २७८ - चन्द्रिका निवासी चान्द्रदेवता २७६ - ऐन्द्रसर्ग, और तदनुगत सार्वदैवत्य २८० - वर्गदेवताओं का समन्वय २८१ - ' ईश्वरावतार ' का स्वरूप समन्वय २८२ - भूतात्मक अग्नि वायु - सूर्य ४८ 33 " " २८८- मध्यमस्थानीय - वायु २८६ - भूस्थानीय - अग्नि २६०- देवद्वयी के आविर्भावक सूर्य्यनारायण २६१ - सूर्य्यदेव के द्वारा ही देवत्रयी - निबन्धना वेदत्रयी का आविर्भाव 27 २६२- चतुर्थ - मतानुगत - प्रमाण - सन्दर्भ " प्राचीन न्यायानुगत- चतुथ मत - उपरत ४ ( ५ - " ईश्वरावतार - सर्वहुत - यज्ञपुरुषने वेदों का निर्माण किया है ' नामक - पञ्चम-प्राचीन न्यायमत २६३ - ' यज्ञ ' पदार्थ की आधिभौतिकता का स्वरूप-संस्मरण " २६४ - यज्ञ के अभिमानी - देवता 29 " ५१ २८३- देवात्मक अग्नि वायु - सूर्य २८४ - देवत्रयी से वेदाविर्भाव २८५ - तृतीय- मतानुगत प्रमाण - सन्दर्भ २८६ - ' सूर्य्य ' नामक अभिमानी देवता का संस्मरण प्राचीन न्यायानुगत- तृतीय - मत - उपरत ' ( ४ ) - ' ईश्वरावतार - ' सूर्य्य ' नामक देवताने वेद का निर्माण किया है ' नामक-चतुर्थ प्राचीन न्याय - मत २८७ - वेदत्रयी में सूर्य्यदेव का आपेक्षिक श्रेष्ठत्त्व ५० " " 19 " २६५ - यज्ञभगवान् विष्णुदेवता २६६ - यज्ञ, और विष्णु का अभेद II २६७ - यजनीय - पूजार्ह - विष्णुदेवता की यज्ञरूपता " २६८ यज्ञमूर्त्ति विष्णु के द्वारा ही वेदों का आवि र्भाव २६६- पञ्चम- मतानुगामी - प्रमाण- सन्दर्भ प्राचीन न्यायानुगत पञ्चम - मत - उपरत इति - पञ्चम ( ५ ) श्रवान्तरमतयुक्तं प्राचीनन्यायाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ३ ३०० - प्राचीन न्यायाभिमत - पञ्चविध ( ५ ) अवान्तर मतों का संकलनात्मक समन्वय २८

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड अथ - सप्त [ ७ ] - अवान्तरमतयुक्तं ३२१ - अपौरुषेयता, और नित्यता से अनुमाखित प्राधानिकाभिमतं - मतप्रदर्शनम् [ सांख्यदर्शनाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ] । ३०१ - क्रमानुगत - सांख्यमत ४ ३०२ ( क ) - ' प्रधाना ' प्रकृति का संस्मरण ३०२ ( ख ) - प्रधाना ' प्रकृति से अनुप्राणित प्राधानिक दर्शन ३०३ - प्राकृत - पदार्थों का उत्पत्तिक्रम ३०४ - वेदों की प्रावाहिकता ३०५ - वेदों का उत्पत्ति - विनाशशालित्व ५७ ३०६ - प्रकृतिसिद्ध वेदों की नित्यसिद्धता का अपलाप, ३०७ - वेदों की अपौरुषेयता का समन्वय ३०८ - प्राधानिक - सांख्य सूत्रों का संस्मरण ३०६ - प्रजापति का महान् तप ३१० - प्राजापत्य - तप से वेदाविर्भाव ३११- वेदों की अनित्यता का दिग्दर्शन " विवाद, और तन्निराकरण ३२२- ' कर्ता ' की स्वीकृति, और उसका इन्द्रियातीतत्त्व ५८,, ३२२ - ' दृष्टपादोष ' का उत्थान, और तन्निराकरण,, " ३२४- वादी का प्रश्नाक्षेप, और तन्निराकरण ३२५ - पौरुषेयत्त्व की लक्षणात्मिका मीमांसा ३२ - पौरुषेय - लक्षण - स्वरूप- समन्वय ३२७ - वेदों की अप्रतिहता अपौरुषेयता २३८ - वेदों का प्राकृतित्त्व - समर्थन 23 23 " 33 " ३२६ ( क ) - सांख्यदर्शनानुगत दृष्टिकोण का उपराम " 29 ( १ ) - ' प्रकृतिसिद्ध श्रग्नि वायु - सूर्य- इन तीनों भौतिक पदार्थों से तीनों वेद अभिन्न " हैं ' नामक - प्रथम प्राधानिक - मत ३२६ ( ख ) - श्रग्निवायु- सूर्य्य - रूप भौतिक पदार्थ, और तद्द्वारा वेदोत्पत्ति, तथा नव्यन्यायमत ५५ " ३३० - ईश्वरावताररूपा देवता त्रयी, और तद्द्द्वारा वेदोत्पत्ति, तथा प्राचीनन्याय मत 33 " ३३१- भौतिकपदाथत्रयीरूपा वेदत्रयी का सम-न्वय, और प्राधनिक मत 99 ३१२ - वेदों की पौरुषेयता, और अपौरुषेयता के सम्बन्ध में सूत्रकार ३१३ - सांख्य के द्वारा अभिमत ईश्वर ३१४ - विश्व से संस्पृष्ट ईश्वरपुरुष ३१५ - ' ईश्वरासिद्ध ेः ' का तात्त्विक समन्वय ३१६ - प्रवाहनित्य - प्राकृतिक वेद, और उन की ३१७ - मुक्त - भावानुवन्धी पुरुषवर्ग ३१८ - अमुक्त - भावानुबन्धी - पुरुषवर्ग ३१६ - उभयवििध पुरुषों में द्वारा वेदनिर्माण की कल्पना का विरोध ३२० - अक्षुण्णा अपौरुषेयता ३३२ - जन्य - जनकभाव का संस्मरण ५८ ३३३ - जन्य - जनकभाव का समादर " ३३४- अग्निपदार्थ का ऋग्वेदत्त्व " 39 ३३५ - वायुपदार्थ का यजुर्वेदत्त्व 39 " " २६ ३३६ - आदित्यपदार्थ का सामवेदत्त्व ३३७- प्राधानिक - मत- निष्कर्ष ३३८ - प्रथममतानुगत - प्रमाण- सन्दर्भ प्राधानिकानुगत - प्रथम - मत उपरत १