Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 521–530
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 521–530
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड भावना - वेदनिरुक्तिः भावनामय प्रत्येक पदार्थ क्रिया, किंवा कर्म्मरूप है, यह श्रारम्भ में ही कहा जाचुका है । इस कर्म में ब्रह्म का अनुज्ञाकर्म्म, क्षेत्र का धाराकर्म्म, परिणामी समृद्धिकर्म्म, तीन विभाग रहेंगे । ब्रह्म की अनुज्ञा क्योंकि भावनाक की प्रस्तावना है, उपक्रम है, अतएव इसे हम कर्म्म का ' उक्थ ' ( उत्थानबिन्दु ) कहेंगे । उक्थ को क्योंकि प्रस्तावस्थानीय होने से ' ऋक् ' कहा जाता है, अतएव कम्र्मोक्थरूपा ब्रह्मानुज्ञा को हम अवश्य है ही, भावनात्मक ' ऋग्वेद ' कह सकते हैं । क्षत्रकर्म्म के द्वारा प्राप्त होने वाली कर्म्मसिद्धि ही कर्म्म इस का समृद्धि निधन को, उपसंहार है, अवसान भूमि है । क्योंकि अवसानभाव ही साम है, अतएव उपसंहार स्थानीया दूसरे शब्दों में ' दक्ष ' को अवश्य ही भावनात्मक ' सामवेद ' कह सकते हैं । मध्यस्थ कर्म्म इस ओर से अनुज्ञा के साथ, तो उस श्रोर से समृद्धि के साथ योग कर रहा हैं । यजुर्वेद इस ओर ऋक् से, उस ओर साम से युक्त रहता है । इसी समानधर्म्म के कारण मध्यस्थ कर्म्म को कर्मेदमनुज्ञया च युज्यते समृद्धया च युज्यते, इस निर्वचन से अवश्य ही भावनात्मक ' यजुर्वेद ' कह सकते हैं । इसप्रकार भावनाजगत् में प्रतिष्ठित भावना-त्मक कम्मों से ऋतु - कर्म - दक्ष - मेद से सर्वत्र वेदत्रयी का साक्षात्कार किया जासकता है । भावनावेदसंस्थापरिलेख ः— १ - मित्र: - ब्रह्म - ज्ञानम् - - उपक्रमः - ऋग्वेदः २- कर्म्म- पुरुषार्थः प्रवृत्तिः - मध्यविन्दुः - यजुर्वेदः ३- दक्षः — क्षत्रम् -- कर्म्म— उपसंहारः --- सामवेदः भावना वेदत्रयी इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्णभावापन्ना १३ २०४
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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावापन्ना १३
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श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-( ३ ) - “ भाववेदनिरुक्तिः " -- प्रकीर्ण भावापन्ना १४
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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ३ ) “ भाववेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्णभावापन्ना १४ यद्यपि " भावो भावना क्रिया ० " इत्यादि रूप से भाव - भावना को एक ही वस्तुतत्त्व समझा जाता है । क्रियादृष्टि से दोनों को अभिन्न समझना उचित भी है । परन्तु परमार्थतः दोनों का प्रांशिक भेद स्वीकार में करना ही पड़ेगा । अन्तर्जगत् में प्रतिष्ठित क्रियारूप वही वस्तुतत्त्व " भावना " कहलाएगा, एवं बहिर्जगत् में प्रतिष्ठित क्रियारूप उसी वस्तुतत्त्व को हम " भाव " कहेंगे । भावनामय पदार्थ हमारे ज्ञानमण्डल में प्रविष्ट है । भावनात्मक पदार्थ वे ही माने जायँगे, जो हमारे ज्ञान में प्रविष्ट रहेंगे । उधर भावलक्षण पदार्थ उन्हें कहा जायगा, जो हमारे ज्ञान से बहिर रहेंगे । भावनात्मक पदार्थों के निर्माता अन्य व्यक्ति, एवं ईश्वर है । यद्यपि भावना का उदय भावसंसर्ग से ही होता है, परन्तु दोनों का पार्थक्य प्रत्यक्षानुभूत है । बाह्यजगत् के भावात्मक किसी एक पदार्थ के आधार से हमारे ज्ञानीयजगत् में तद्रूप ( भावरूप ) पदार्थ का भावनारूप से जन्म होगया । यह भावनात्मक पदार्थ क्योंकि हमारे ज्ञान से बना, अतएव यह हमारी प्रातिस्विक वस्तु बन गया । अब यदि बाह्यजगत् में प्रतिष्ठित वह भावात्मक पदार्थ नष्ट भी होजाता है, तब भी हमारे भावनात्मक पदार्थ का कुछ नहीं बिगड़ता । जबतक हम रहेंगे, हमारा भावनात्मक पदार्थ सुरक्षित रहेगा । इसप्रकार अन्तर्जगत्-बहिर्जगत् के भेद से भावना और भाव, दोनों सर्वथा पृथक् पृथक ही माने जायेंगे । पूर्व प्रकरण में भावनात्मक वेद का दिग्दर्शन हुआ है, एवं प्रकृत प्रकरण संक्षेप से भाववेद का ही स्पष्टीकरण कर रहा 1 दूसरी दृष्टि से उक्त विमेद का विचार कीजिए । पदार्थों की सत्ता के दो स्वरूप माने गये हैं । ज्ञानपूर्विका सत्ता एक पक्ष है, एवं सत्तापूर्वक ज्ञान दूसरा पक्ष है । जो पदार्थ हमारे ज्ञान में आ गए हैं, दूसरे शब्दों में हम जिन पदार्थों को जानते हैं, उनका अस्तित्त्व इसीलिए है कि, हम उन्हें जानते हैं । हमारे ज्ञानाकाश में हमें जिन सत्तासिद्ध पदार्थों की प्रतीति होती है, उनकी सत्ता ज्ञानपूर्विका ही मानी जायगी । हम उन्हें जानते हैं, इसीलिए वे हैं, यही कहा जायगा । इस ज्ञानपूर्विका सत्ता को, दूसरे शब्दों में ज्ञानानुगृहीत पदार्थ को ही " भावना " कहा जायगा । जो पदार्थ हमारे ज्ञान में अभीतक नहीं आए, इसीलिए जिन्हें हम अभीतक नहीं बन जानते सकते, परन्तु जिनकी सत्ता कहीं न कहीं अवश्य है. जो कि किसी समय हमारे ज्ञान श्राकर भावनात्मक हैं, उन पदार्थों को “ सत्तापूर्वक ज्ञान " इस वाक्य से सम्बोधित किया जायगा । बहिर्जगत् में प्रतिष्ठित इन सत्तासिद्ध पदार्थों के संसर्ग से ही हमारा ज्ञान एतद्र प पदार्थों की कल्पना करने में, अपने अन्तर्जगत् के स्वरूप - निर्माण में समर्थ होता है । सत्तासिद्ध बाह्य जगत् के पदार्थों को आश्रय बना कर ही हम उनका ज्ञान करने में समर्थ होते हैं । ये सत्तासिद्ध पदार्थ ही " भाव " कहलाएँगे । भावना में ज्ञान का प्राथम्य रहेगा, एवं भाव में २०६
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड भाव - वेद निरुक्तिः उन पदार्थों की सत्ता के सम्बन्ध में- ' हम जनते हैं, इस लिए जानते हैं " यह सत्ता का प्राधान्य रहेगा | भावनात्मक पदार्थों पदार्थो के सम्बन्ध में - " पदार्थ हैं, इस लिए हम उन्हें, एवं है ', यह कहा जायगा । एवं भावात्मक सत्ता से सम्बन्ध रखते हुए वे ही पदार्थ " भावना " कहलाएँगे भिन्न कहा जायगा । इसप्रकार ज्ञानपूर्विका वाले वे ही पदार्थ भाव कहलाएँगे । और इसी दृष्टि से दोनों को भिन्न सत्तापूर्वक ज्ञान से सम्बन्ध रखने । ही वस्तुतत्त्व माना जायगा तो प्रतिक्षण ही नवीन नवीन श्रतएव भावरूप पदार्थों में यों पदार्थ ) बहिर्जगत् में प्रतिष्ठित सत्तासिद्ध, परिवर्तन से हम कह सकते हैं कि, प्रत्येक भाव ( सत्तासिद्ध से परिवर्तन होते रहते हैं । एवं इस क्षणिक क्षणभावात्मक अनन्त भावविकारों का प्रधानरूप । परन्तु विद्वानोंने ग्रन्थों में क्रमशः क्षण क्षण में ही विकृत होरहा है समझा है । वे ही * षड्भावविकार निरुक्तादि ६ भागों में हीं वर्गीकरण करना उचित निम्नलिखित नामों से व्यवहृत हुए हैं-१ - जायते २ - अस्ति ३ - विपरिणमते -वद्ध ते ५- अपक्षीयते १ - उपन्न होता है । २ - प्रतिष्ठित होता है । ३ – बदलने लगता ४ - बढ़ने लगता है । ५ - क्षीण होने लगता ६ - नष्ट होजाता है ॥ प्रशा ६ नश्यति में देवदत्त का कर्मभोक्ता । माता - पिता के रजो वीर्य्य के सम्मिश्रण वृद्धि से स्वरूप ॐ अभीतक देवदत्त संसार में न था परिणत होगया । ६ मास की क्रमिक होकर गर्भरूप में भाव की पहिली श्रपपातिक श्रात्मा कर्मानुसार प्रविष्ट भूमिष्ठ होगया । यही इस सत्तात्मक ' के प्रत्याघात से बना । “ जायते - इति धारण कर यथासमय ' एवया मरुतू यह " जायते " इस पहिले भावविकार का पात्र भाव-जन्मावस्था हुई ॥ यहीं आकर, न प्रतिषेधति ” ( यास्क ० नि ० १२६ ) के अनुसार इतर आज पूर्व भावस्यादिमाचष्टं, नापरभावमाचष्टु ही " जायते " से सूचित होती है । उत्पन्न होने के अनन्तर की सत्ता की विकारों की प्रथमावस्था, उपक्रमावस्था " इसरूप से सत्ता का अभिनय होने लगता है, जिस देवदक्ष उसी देवदत्त की " देवदत्त है ' अस्तीत्युत्पन्नम्य सत्त्वस्यावधार-हमें उपलब्ध नहीं थी । यही-, एतत्पूर्व कहीं भी तो स्वरूपाभिव्यक्ति भावविकार हुआ । उत्पन्न हुआ, सत्त्व का अवधारण हुआ भावविकार , पनपा गम् ” लक्षण दूसरा " अस्ति " परिवर्तन का आरम्भ हुआ । यही तीसरा “ विपरिणमते ते " " कहलाया । लीजिए बदलने लगा । क्रमशः, अङ्ग प्रत्यङ्ग पुष्ट होने लगे, यही चौथा भावविकार " वद्ध हुए, दाँत कहलाया । क्रमशः बढ़ने लगा शारीरिक शक्तियों का क्षय होने लगा । बाल सुफेद पर पहुँचते ' अब क्रमशः वृद्धि की चरम सीमा - जायते, अस्ति, विपरिणमते, वद्ध ते, *- - " षड्भावविकारा भवन्ति इति वार्ष्यायणिः अपक्षीयते, नश्यति इति " — यास्कनिरुक्त १२८ 309 २१०
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका भाब – वेदनिरुक्तिः कहलाया । एक समय टूटने लगे, हाथ पैरों में झुर्रियाँ पड़ने लगीं । वहीं पाँचवाँ " अपक्षीयते पहिना था ”, वही भावविकार धराशायी बन कर " नश्यति ” ऐसा श्राया कि, जिस देवदत्त ने एक दिन ' जायते ' का बाना उत्पन्न होने वाले जड़ - चेतनात्मक जितने भी इस छटे भावविकार का पात्र बन गया । उदाहरण मात्र है इतर । अन्यान्य भावविकार - " अतोऽन्ये भावविकारा भाव हैं, सब में इन्हीं ६ भावविकारों का समावेश है । | ३ | १ ) के अनुसार इन्हीं ६ भाव-एतेषामेव विकारा भवन्तीति ह स्माह - ( वार्ष्यायणिः ) " ( यास्क नि ० १ विकारों में यथानुरूप अन्तर्भूत हैं । ' नामक ६ ठा भावविकार, उक्त ६ भावविकारों में ‘ जायते ' नामक पहिला भावविकार, और ' नश्यति दोनों का लक्षण करते हुए दोनों समानधर्म्मा हैं | इसी समानता को लक्ष्य में रखकर सर्वश्री यास्काचार्य्यने पूर्वभावमाचष्ट े , न प्रतिषेधति ” इन दोनों के सम्बन्ध में “ नापरभावमाचष्टे न प्रतिषेधति " मृत्यु - " है न । मध्य में बाल - तारुण्य - प्रौढ - वार्धक्यादि वाक्यों का उल्लेख किया है । इस और जन्म है, उस ओर - अपक्षीयते ये चार भावविकार हैं । इस ओर श्रवस्थाओं से सम्बन्ध रखने वाले अस्ति - विपरिणमते - वद्ध ते है, नश्यति उपसंहार है, जायते ही शेष प्रस्ताव है, उस और निधन है, मध्य में जीवन है । जायते उपक्रम ' ही शेष पाँचों भावविकारों का अन्तिम चारों भावविकारों का उक्थस्थान बनता हुआ ऋग्वेद है । ' नश्यति आदि चारों भावों की समष्टि ही उपक्रमस्थानीय निधनपृष्ठ बनता हुआ ' सामवेद ' है । एवं मध्यस्थ - अस्ति पृष्ठ लक्षण, नश्यतिरूप सामवेद के साथ युक्त उक्थलक्षण नायते रूप श्रृग्वेद के साथ, तथा उपसंहारस्थानीय ' यजुर्वेद ' है । इसप्रकार षड्भावविकारात्मक सत्ता - सिद्ध रहती हुई ' युज्यते - उपक्रमोपसंहाराभ्याम् ' इस निर्वचन से जासकता है, एवं इसी वेद को “ भाववेद ” कहा प्रत्येकमाव में उक्त दृष्टि से तीनों वेदों का समन्वव देखा जाता है । ge भाववेदसंस्थापरिलेखः--१-१-१ - जायते — जन्मावस्था - उपक्रम: -- उक्थम् -- " ऋग्वेदः ” १ - २ - श्रस्ति - बालावस्था २-२-३ - विपरिणमते - तरुणावस्था ३-४- वर्द्धते - प्रौढावस्था -मध्यभावा: - मध्यबिन्दुः- “ यजुर्वेदः ” " भाववेदः ” ४-५ - अपक्षीयते - वृद्धावस्था ३-१-६ - नश्यति - निधनावस्था - उपसंहारः- पृष्ठम् - " सामवेदः ” इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ३ ] - " भावेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना १४ २११
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श Sp 38-1553 ( न लि इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ३ ] - " भाववेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना " १४ पु मित्र IPBOFFIES -6-1-1-1 [ 9 ]
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श्री: अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ४ ) - “ दिग्वेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना १५