Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 531–540
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 531–540
पृष्ठ 531
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ge
पृष्ठ 532
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ४ ] - “ दिग्वेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावापन्ना १५ Terperso उभयसिद्ध मेद से तीन नातियों में विभक्त पदार्थतत्त्ववेत्ता विद्वानोंनें विश्वपदार्थों को सत्ता सिद्ध - भातिसिद्ध होता, उन्हें सत्तासिद्धपदार्थ कहा जाता है | इन माना है । जिन पदार्थों की सत्ता तो है, परन्तु भाव नहीं , वर्त्तमानानुबन्धी- सत्तासिद्ध भेद से दो विभाग होजाते सत्तासिद्ध पदार्थों के भी आगे जाकर विशुद्धसत्तासिद्ध है, परन्तु चर्म्मचक्षुः से, किंवा अन्य किसी इन्द्रिय से हैं । कुछ पदार्थ तो ऐसे हैं, जिन की सत्ता तो अवश्य उदाहरण के लिए ईश्वर, जीव, परलोक, प्रारण, मन, जिनका भान हम साधारण मनुष्यों को नहीं होसकता । श्रादि कितने एक वैसे तत्त्व हैं हैं, जिन की सत्ता तो हमें बुद्धि, चित्त, महान, अव्यक्त, देवता, शक्तियाँ भौतिक पदार्थों की भाँति भान ( इन्द्रियप्रत्यक्ष ) नहीं होता । स्वीकार करनी पड़ती है, परन्तु उन का घटपटादि सब पदार्थों को हम ' विशुद्धसत्तासिद्ध ' ही पदार्थ कहेंगे । इन्हें, एवं प्रत्यक्ष से परे रहने वाले एतत् सजातीय अन्य हैं, अर्थात् जिन की सत्ता भी है, और प्रयास ॐ कितने एक पदार्थ ऐसे हैं, जो उभयसिद्ध तो परन्तु अवश्य विद्यमानकाल में उन का भान नहीं होरहा । ऐसे करने पर यथावसर जिन का भान भी होसकता है, कि, उन का प्रत्यक्ष नहीं होजाता, तबतक के लिए ). अदृष्ट -- अश्रु त उभयसिद्ध पदार्थों को भी हम ( जबतक, भविष्य के लिए सम्भावनात: सत्तासिद्ध, किन्तु वर्त्त मान सत्तासिद्ध ही कहेंगे | सदा के लिए विशुद्ध सत्तासिद्ध, वर्त्तमानानुबन्धी - सत्तासिद्ध भेद से के लिए सत्तासिद्ध, इसप्रकार सत्तासिद्ध पदार्थों के भूगर्भ विशुद्धसत्तासिद्ध में रहने वाले विविध धातु, उपधातु, शरीर के भीतर दो बिभाग होजाते हैं । योरोप अमेरिका, अफ्रिका, बन सकते हैं । परन्तु बिना प्रयास के अप्रत्यक्षदशा रहने वाले अस्थि - मांसादि पदार्थ प्रयास करने पर उभयसिद्ध ही माना जायगा । में रहते हुए इन्हें वर्त्तमानानुबन्धी- सत्ता सिद्ध पदार्थ भी सत्ता ( अस्तित्त्व ) नहीं है, दूसरा विभाग ' भातिसिद्ध ' पदार्थों का है । जिन है पदार्थों , उन्हें की भातिसिद्ध कहीं पदार्थ कहा जायगा । दिक्-परन्तु व्यबहारमार्ग में पद पद जिन का भान ( प्रतीति ) होरहा, जिन की आबालवृद्ध सत्र को प्रतीति होरही है, देश - काल- संख्या - परिमाण आदि जो पदार्थ सुने जाते होरहा हैं है, वे कतिपय पदार्थ अस्तित्त्व की मर्यादा से जिन से सम्पूर्ण लौकिक व्यवहारों का सुव्यवस्थित सञ्चालन कोई भी तो ऐसे पदार्थ नहीं है, जो कि सत्तानुगत सर्वथा ही बद्दिभूत हैं । दिशाएँ समय - स्थान - संख्या - परिमाण है । भाति ही इन का स्वरूप है । अतएव कार्यकारण की मर्यादा से युक्त हो । अस्तित्त्व नहीं है, भाति अवश्य इन्हें भातिसिद्ध पदार्थ कहा जायगा । २१५
पृष्ठ 533
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड दिग्वेदनिरुक्ति तीसरा विभाग ‘ उभयसिद्ध ' पदार्थों का है । सूर्य्य - चन्द्रमा आकाश - वायु - जल- पृथ्वी- ओषधि-मनुष्य - पशु - पक्षी श्रादि जिन परिज्ञात पदार्थों के सम्बन्ध में- हम ' अयं सूर्य्यः अयं चन्द्रमाः ' इत्यादि रूप से अभिनय कर रहे हैं, वे सब पदार्थ सत्ता भी रखते हैं, एवं इन का मान भी होरहा है, श्रतएव हम ऐसे पदार्थंवर्ग को अवश्य ही ‘ उभयसिद्ध ' पदार्थवर्ग मान सकते हैं । पूर्वप्रकरणों में ' उपलब्धिवेद ' का स्वरूप बतलाते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि, उपलब्धिभाव ही ' वेत्ति - इति वेद: ' इस निर्वचन के अनुसार वेदपदार्थ है । क्योंकि सत्तासिद्ध पदार्थों की सत्तारूप से, भातिसिद्ध पदार्थों की भातिरूप से, एवं उभयसिद्ध पदार्थों की उभयरूप से हमें उपलब्धि हो रही है, अतएव इन तीनों हीं वर्गों के साथ वेद शब्द का सम्बन्ध जोड़ा जासकता है । सम्पूर्ण विश्व इन त्रिविध पदार्थों का ही समन्वय है । तीनों उपलब्धि के विषय बनते हुए वेद हैं । अतः सम्पूर्ण विश्व, एवं विश्व के त्रिविध पदार्थ अवश्य ही वेदमय माने जासकते हैं । वेदतत्त्व की इसी सर्वव्याप्ति का दिग्दर्शन कराने के लिए प्रस्तुत प्रतीकवेद- प्रकरण पाठकों सम्मुख उपस्थित हुआ है । क्योंकि सर्वव्यासिलक्षण विश्वमूर्त्ति वेद उक्तापदार्थत्रयी के भेद से तीन संस्थानों में विभक्त होरहा है | श्रतएव इस ' प्रकोकवेदनिरुक्तिप्रकरण ' में तीनों के ही उदाहरण बतलाना आवश्यक होजाता है । इसी श्रावश्यकता की पूर्ति के लिए पूर्वप्रतिज्ञात सात संस्थाओं की निरुक्ति हुई है । अब केवल यह जान लेना है कि, सातों में कौन सत्तासिद्धसंस्था का समर्थक है?, कौन उभयसिद्धसंस्था का १, एवं कौन भातिसिद्धसंस्था का अनुगामी है? | अबतक पर्व - भावना - भाव इन तीनों वेदसंस्थाओं का निरूपण हुआ है, एवं ४ दिक्- " देश-काल - " वर्ण, इन चार वेदसंस्थाओं का निरूपण अवशिष्ट है । हृदय - परिधि - सत्तारस, तीन पर्वों की समष्टि ही ' पर्ववेद ' है । हृदय, और परिधिरूप ऋक्सामलक्षण छन्द हैं | छन्द स्वयं भातिसिद्ध पदार्थ है । इन दोनों ऋक्साम छन्दों से छन्दित स्वयं वस्तुतत्त्व ( रसाग्नि ) यजुः है. और यह सत्तासिद्ध पदार्थ है । इसप्रकार पर्ववेदसंस्था में ऋक्साम तो भातिसिद्ध हैं, एवं यजुः सत्तासिद्ध है । पर्ववेद में क्योंकि दोनों का समन्वय है, अतएव इसे हम ' उभयसिद्धवेदसंस्था ' का उदाहरण मानेंगे । ' भावनावेद ' का मानस - भावना के मुख्य सम्बन्ध है । मानस - भावना में क्रतु- दक्ष, और दोनों से वेष्टित कर्म्मधारा, ये तीन विभाग हैं । क्रतुरूप संकल्प भी कम है, समृद्धिरूप दक्ष भी कर्म्म है, कर्म्मधारा का कर्म्मत्त्व तो सिद्ध हो है । कर्म्म, किंवा क्रिया एक भातिसिद्ध पदार्थ है, और भावनात्मिका वह क्रिया तो अवश्य ही भातिरूपा मानी जायगी, जिसका केवल ज्ञानीय अन्तर्जगत् से ही सम्बन्ध है । इसी हेतु से हम इस दूसरी भावनावेदसंस्था को ' भातिसिद्धवेदसंस्था ' का उदाहरण मानेंगे । भाववेद का बहिर्जगत् से सम्बन्ध बतलाया गया है । बहिर्जगत् के भावात्मक पदार्थ सत्तासिद्ध माने गए हैं । जबतक ये बहिर्जगत् की वस्तु रहते हैं, तभीतक इन्हें ' भाव ' कहा जाता है । अन्तर्जगत् की वस्तु बनने के अनन्तर ही इन्हें ' भावना ' शब्द की उपाधि मिलती है । साथ ही में अपनी भावदशा में ( हमारी ज्ञानलक्षणा २१६
पृष्ठ 534
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका दिग्वेदनिरुक्तिः ही रहते हैं । अतः तीसरी भाववेदसंस्था को ' सत्तासिद्ध भाति से बहिर्भूत रहते हुए ) ये पदार्थं सत्तासिद्ध । वेदसंस्था ' का उदाहरण माना जासकता है को पदार्थ हैं । अत: इन तीनों वेदसंस्थाओं दिग - देश - काल, तीनों विशुद्ध भातिसिद्ध जायगा । एवं सातवीं वर्णवेदसंस्था का विशुद्ध सत्ताभाव से ' विशुद्धभातिवेदसंस्था ' के उदाहरण माना प्राणात्मक हैं ॥ रूप - रस - गन्धादि पञ्चतन्मात्राओं से अतीत सम्बन्ध है । वर्णलक्षण ब्रह्म क्षेत्र - विडवीर्य्यं । इन्द्रियाँ तन्मात्रधम्म के ही ' भाव ' ( स्वरूप ) सम्पादन में समर्थ हैं । तत्त्व ही प्राण का स्वरूप लक्षण है, अतः वर्णवेदसंस्था को ' विशुद्ध सत्तासिद्धसंस्था ' का ही क्योंकि वर्णात्मक प्राण इन्द्रियातीत हैं लक्ष्य में रखते हुए ही प्रकीर्णक- वेदसंस्थाओं के स्वरूप पर दृष्टि उदाहरण माना जायगा । इस वर्गीकरण को डालनी चाहिए । १- पर्ववेदसंस्था --- -उभयसिद्धा ( - वेदसंस्था २- भावनावेद संस्था - प्रभातिसिद्धा - वेदसंस्था ३ - भाववेदसंस्था --- सत्तासिद्धा - वेदसंस्था ४ - दिग्वेद संस्था --- विशुद्धा - भातिसिद्धा - वेदसंस्था ५ - देशवेद संस्था -६- कालवेदसंस्था ---" ७ - वर्णवेदसम्था ---- विशुद्धा सत्ता सिद्धा - वेदसंस्था -दिग्वेदसंस्था ही हमारे सातों में तीन का निरूपण गतार्थ है । चौथी क्रमप्राप्त गई हैं । विशुद्धभातिरूप पूर्व - पश्चिम - उत्तर - दक्षिण ये चार तो सामने आती है । दिशा के सम्बन्ध से १० दिशाएँ मानी - ऊर्ध्व - अधः ये ६ श्रवान्तरदिशाएँ मानी गई हैं । इन दिशाएँ हैं, एवं ईशान - नैऋत - आग्नेय - वायव्य हो अन्तर्भाव मान लिया जाता है । ईशानकोण का छत्र अवान्तरदिशाओं का चार मुख्य दिशाओं में - दिशाओं में, नैऋतकोण का दक्षिण - पश्चिम दिशाओं पूर्वोत्तरदिशाओं में, आग्नेयकोण का पूर्व - दक्षिण अन्तर्भाव है । एवं ऊर्ध्व - श्रधः इन दो अवान्तर दिशाओं में, वायव्यकोण का पश्चिमोत्तर दिशाओं में है । उर्ध्व अधोदिशा, दोनों का क्रमशः खगोलीय का पूर्व पश्चिम, इन दोनों मुख्य दिशाओं में अन्तर्भाव खगोलीय ये दोनों स्वस्तिक ऊर्ध्व अधः- क्रमशः ' मित्रवरुण ' खस्वस्तिक, एवं अधःस्वस्तिक के साथ सम्बन्ध है मध्य । में पड़ते हैं, पूर्णकपाल मित्र है, पश्चिमकपाल ‘ वरुण ’ नाम से प्रसिद्ध पूर्व - पश्चिम - कपालद्रय के वरुण पश्चिमदिशा के दिक्पाल माने गए हैं । क्रतु-है | मित्र - इन्द्र पूर्वदिशा के दिक्पाल हैं । श्राप्यं इन्द्र - वरुण श्राधिदैविक मैत्रारुवण ग्रह माना गया है । क्योंकि दक्ष जहाँ आध्यात्मिक मैत्रावरुणग्रह ' है, वहाँ दिशाएँ मित्रावरुण की सन्धि से युक्त रहती हुई पूर्व-खगोलीय ऊर्ध्व - अधः नामक मध्यस्थ दोन अवान्तर इन दोनों का हम पूर्व पश्चिम दिशाओं में ही अन्तर्भाव मानना पश्चिम दोनों दिशाओं से सम्बन्द्ध है, अतएव प्रकृत में केवल यही है कि, दश दिशाओं का प्रधानरूप से उचित समझते हैं । तात्पर्य इस दिग्विवेचन का होजाता है । पूर्वादि प्रसिद्ध चार दिशाओं में हीं पर्य्यवसान 1 २१७
पृष्ठ 535
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड दिग्वेदनिरुक्तिः पूर्व - पश्चिम - उत्तर - दक्षिण चारों के क्रमशः इन्द्र- वरुण - चन्द्रमा - यम नामक चार देवता अधिपति हैं । इन्द्रदेवतामयी प्राची दिकू ही इतर दिशाओं की उक्थरूपा बनती है, अतएव इसे हम ' ऋग्वेद ' कह सकते हैं । दक्षिणा दिकू यमाग्निमयी बनती हुई अग्निमय ' यजुर्वेद ' से सम्बन्ध रखती है । प्रतीचीदिक् श्रापोमयी बरुणमयी बनती हुई अथर्वाङ्गिरा - लक्षण ' अथर्ववेद ' से सम्बन्ध रही है । एवं उत्तरादिक् सोमययी बनती हुई ' सामवेद ' से अनुगता है । इसी दिग्वेदसंस्था का दिग्दर्शन कराते! हुए महर्षि तित्तिरि कहते हैं-ऋचां प्राची महती दिगुच्यते-ददिणामाहुर्यजुषामपाराम् । श्रथर्व्वणामङ्गिरसां - - प्रतीची-साम्नामुदीची महती दिगुच्यते ॥ -तै ब्रा ० ३ | १२ | ६ | ७ | दिग्वेदसंस्थापरिलेखः— १ - प्राची --- ऐन्द्री - ' ऋग्वेद ' २- दक्षिणा - याम्या – ' यजुर्वेदः ' ३ - उदीची- सौम्या -- सामवेदः ' - " दिग्वेदः " ४ - प्रतीची- वारुणी -- ' अथर्ववेदः ' इति- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-[ ४ ] - " दिग्वेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १५. २१८ -FIND
पृष्ठ 536
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Yf
पृष्ठ 537
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ४ ] - " दिग्वेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्णभावापन्ना १५ - * --
पृष्ठ 538
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ “ देशवेदनिरुक्ति ”: - प्रकीर्णभावापन्ना १६
पृष्ठ 539
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Thorissariat - PTS 39
पृष्ठ 540
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
r SUSERR - निक श्रीः एक 4. Sp boy अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ” -प्रकीर्णभावापन्ना FRE SIPIN & SATOPS [ ५ ] - “ देशवेदनिरुक्तिः ई किक १६ * क ि के दूसरे शब्दों में-ही देशभाव की अनुग्राहिका बनती है ।, तो हम स्थान को ही ' देश ' कहा जाता है । दिशा दिशा स्वयं भातिसिद्धि पदार्थ है है । जब कि देशपरिचायिका देशवेदसंस्था को भी दिशा ही देश की परिचायिका बनती देश को भी भातिसिद्धिपदार्थ ही कहेंगे । अतएव अवश्य ही दिशा के द्वारा परिचित माना जायगा । पूर्वदेश - पश्चिमदेश - उत्तरदेश - दक्षिण देश - इत्यादि भातिसिद्धवेदसंस्था का ही उदाहरण बतलाते हुए इनकी भातिसिद्धता ही प्रकट कर रहे हैं । यह स्मरण रखने शब्द स्पष्ट ही देशों को दिगनुबन्धी ' से तो एक सत्तासिद्ध पदार्थ ही माना जायगा । क्योंकि देश का प्रदेश- पदार्थ की बात है कि, देश अपने स्वरूप ( पिण्डभाव ) से सम्बन्ध है । एवं पिण्ड एक सत्तासिद्ध भाव से सम्बन्ध है, प्रदेश का मूर्तिभाव , धामच्छद - देश - पदार्थों में भातिभाव का उदय होता है । है । दिक् के सम्बन्ध से ही सत्तासिद्ध पूर्व-पड़ता है कि, यदि देशशब्द से दिगनुबन्धी में पूर्वदेश ऐसी परिस्थिति में हमें इस , तब निष्कर्ष तो देशवेद पर भातिवेद पहुँचना का उदाहरण बनेगा । एवं उस दशा । यदि देश पश्चिम - उत्तरादि देश गृहीत हैं उत्तरदेश सामवेदमय, एवं पश्चिमदेश अथर्ववेदमय कहलाएँगे ऋग्वेदमय, दक्षिणदेश यजुर्वेदमय, से विचार किया जायगा, तो उस दशा में यही देशवेद सत्तानु- पूर्व के. का दिक् से सम्बन्ध न मानकर स्वतन्त्ररूप का ही उदाहरण कहा जायगा । क्योंकि दिगनुबन्धी देशवेद । बन्धी बनता हुआ सत्तासिद्ध- वेदसंस्था प्रकृत में सत्तानुबन्धी विशुद्ध देशवेद का ही विचार अपेक्षित होगा दिग्वेदप्रकरण से गतार्थ है, अतः – मनुष्य – श्रादि सत्तासिद्ध पदार्थ है । सूर्य्यं चन्द्रमा पृथिवी जाता है । पूर्वादि दिशाओं से श्रसम्बद्ध हैं, देशपदार्थएक वे सभी देशरूप हैं । देश को ही वैदिकभाषा में ' लोक ' कहा जितने भी सत्तासिद्ध भौतिक पिण्ड । लोकभाषा इसे ही ' पिण्ड ' नाम से सम्बोधित करती है । फलत: इसे ही वैज्ञानिक लोग ' मूर्ति ' कहते सत्तासिद्ध हैं पदार्थों पर होजाती है । देशशब्द की इतिश्री पिण्डात्मक से प्रतीति हुआ है, उस उपलब्ध पदार्थ की ‘ अस्ति ' रूप ही को ( जिसे हमें जब भी जहाँ भी जो भी कुछ उपलब्ध ' सूर्योऽस्ति होता ' यह सत्ताभाव ही है । सत्तात्मक सूर्य्यपिण्ड । इस करती है । सूर्य्य की उपलब्धि का स्वरूप ) आधार बना कर ही हमें सूर्य्यपदार्थ की उपलब्धि होती है में कि हम पूर्वपरिभाषानुसार देश कहेंगे बनने वाला देशात्मक सूर्य्यं ही देशवेद कहलाएगा । इस देशवेद प्रतीति की उपलब्धि का मूलाधार २२३