Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 71–80

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80

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विषयसूची से वेद उत्पन्न वेदों | ( ४ ) - " प्रकृतिसिद्ध कालचक्र - मत ( २ ) - " प्रकृतिसिद्ध भौतिक सूर्य तीनों " नामक चतुर्थ - प्राधानिक हुआ है से अभिन्न है " नामक द्वितीय- प्राधा-निक - मत दृष्टिकोण का संस्मरण १३३६ - नव्यन्यायानुगत का संस्मरण ३४० - प्राचीनन्यायानुगत दृष्टिकोण भौतिक - सूर्य्यात्मक- " ३४१ - प्राधानिक दृष्टि, और वेद " ३४२ - सूर्य से श्रभिन्ना त्रयीविद्या ३४३ - निगम शास्त्रात्मक - सूर्य्यनारायण पृथिवी ३४४ - श्रागमशास्त्रात्मिका समन्वय ३४५ - सूर्य्य का सर्वप्रभवत्त्व-अधिष्ठाता सूर्य से ३४६ - रोदसी त्रैलोक्य के अभिन्न तीनों वेद. सन्दर्भ ३४७- द्वितीय - मतानुगत प्रमाण-प्राधानिकानुगत - द्वितीय - मत- उपरत ६० * - भौतिक-( ३ ) - “ प्रकृतिसिद्ध - अग्नीषोमात्मक है " नामक यज्ञ तीनों वेदों से अभिन्न तृतीय- प्राधानिक - मत दृष्टिकोण ३४८ - नव्यन्यायानुगत दृष्टिकोण ३४६ - प्राचीनन्यायानुगत अग्नीषोमरूपा वेद- " ३५० - प्राधानिक - मत, और चतुष्टयी ३५१ - अग्नीषोमात्मक यज्ञ ३५२ - यज्ञात्मक - वेद - यज्ञ ३५३ - हौत्र - प्रौद्गात्रादि - कर्म्मममष्टिरूप ३५४ - यज्ञकर्मात्मक- वेदशास्त्र ३५५ - तृतीय - मतानुगत - प्रमाण- सन्दर्भ उपरत प्राधानिकानुगत -- तृतीय - मत-३ ६१ 93 " ३० स्थावर - जङ्गमात्मक -३५६ - प्रजापति से उपक्रान्त ६२ विश्व का संस्मरण 99, और विश्वचक्र ३५७- कालचक्रानुगता गति परायण कालचक्र ३५८ - सर्व प्रभव, प्रतिष्ठा, , और उससे वेदोत्पत्ति ३५६ - प्राकृतिक कालचक्र सन्दर्भ II ३६० - चतुर्थमतानुगत प्रमाण-प्राधानिकानुगत - चतुर्थ - मत - उपरत ४ में यह वेद प्रकृति 93 ( ५ ) - " सृष्टि के आरम्भ केअनुसार स्वयं उत्पन्न हुआ है " -- मत नामक पश्चम- प्राधानिक ३६१ - सृष्टि का आरम्भकाल, और वेदाविर्भाव का मानव- " ३६२ - अलौकिक - विद्यात्मक - वेदशास्त्र बुद्धि से बहिर्भूतत्त्व पदार्थों के साथ ३६३ - समुद्र पर्वतादि प्राकृतिक ६३ सत्यसंहित वेद का समतुलन की बुद्धि से अतीत ३६४- अनृतसंहित मानव वेदशास्त्र ३६५ - ईश्वरकर्तृत्व पर आपत्ति परिभाषा ३६६ - ईश्वर की स्वरूप-का ईश्वर ३६७ ( क ) -विशिष्टाद्वैतवादियों गुणाकर- ईश्वर ३६७ ( ख ) -अनन्तकल्याण- पुरुषजात - भेदेन ३६७ ( ग ) - नित्य - प्रकृतिजात " पदार्थों का त्रिधा वर्गीकरण की स्वरूप - परिभाषा ३६८ - स्वयंसिद्ध पदार्थों की स्वरूप परिभाषा ३६६ - प्राकृतिक पदार्थों स्वरूप - परिभाषा ३७० - पौरुषेय पदार्थों की " " " " " " 29 22

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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ३७१ - सर्वसाक्षी, निराकार, चिद्धन, पुरुष, और प्रकृतिदेवी ६३ ३७२ - पुरुष, और प्रकृति का श्रनादित्त्व ३७३ त्रिविध पदार्थों का अपेक्षानुबन्धी मूल्याङ्कन ३७४ - प्रकृति के प्रवाह में निग्रह की व्यर्थता ३७५ - सर्वप्रपञ्च की प्रकृतिसिद्धता का समर्थन " ३७६ - प्राकृत- वेदशास्त्र ३७७ - पञ्चममतानुगत प्रमाण सन्दर्भ प्राधानिकानुगत - पञ्चम - मत - उपरत " ( ६ ) - " तीन प्राकृत - लोको से क्रमशः तीन बंद उत्पन्न हुए हैं " - नामक पष्ठ-प्राधानिक - मत ३७८ - भूः, और पृथिवी ३७६ - भुवः, और अन्तरिक्ष ३८०- स्वः, और द्यौः ३८१ - लोकत्रयी से वेदत्रयी की उत्पत्ति ३८२ - आग्नेय- पार्थिव - पदार्थ, और ऋग्वेद ३८३ - वायव्य - प्रान्तरिक्ष्य - पदार्थ, और यजुर्वेद ३८४ - सौर- दिव्य - पदार्थ, और सामवेद ३८५ पुरोहित पार्थिव - अग्नि ३८६ - प्रजापति - श्रान्तरिक्ष्य - अग्नि ३८७ - श्रागमनभाव, और दिव्याग्नि ३८८ - श्रग्नित्रयी, और लोकत्रयी ३८६ - लोकत्रयी, और वेदत्रयी ३६० - षष्ठ मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ प्राधानिकानुगत - षष्ठ- मत- उपरत - उपरत ६४ " " " 33 ६४ " ( ७ ) - " तीन छन्दों, सवनों, तथा तदनुगत स्तोमों से त्रयीवेद उत्पन्न हुआ है " --नाम - सप्तम प्राधानिक - मत ३६१ – सुप्रसिद्धा - लोकत्रयी का संस्मरण ३६२ - अष्टाक्षर - गायत्री छन्द ३६३– एकादशाक्षर - त्रिष्टुप्छन्द ३६४- द्वादशाक्षर - जगतीछन्द ३६५ - नव अहर्गणात्मक त्रिवृत्स्तो ३६६- पञ्चदश - अहर्गणात्मक पञ्चदशस्तोम ३६७- एकविंश- अहर्गणात्मक एकविंशशस्तोम ३६८ - त्रिवृत्, और प्रातः सवन ३६६- पञ्चदश, और माध्यन्दिनसवन ४००- एकविंश, और सायंसवन ४०१ - प्रातः सवन । नुगत - ऋग्वेद ४०२ - माध्यंदिन सवनानुगत - यजुर्वेद ४०३ - सांयसवनानुगत - सामवेद ४०४- सप्तम - मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ प्राधानिकानुगत - सप्तम - मत ४०५ - प्राधानिकदर्शनाभिमत- सप्तविध ( ७ ) -अवान्तरमतों का संकलनात्मक समन्वय " II 29 " 1 ६५ " इति - सप्त- ( ७ ) - अवान्तर - मतयुक्तं 33 प्राधानिकदर्शनाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ( सांख्यदर्शनाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ) ४ ३१

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विषयसूची श्रपौ-| ४२६ - धर्मबुद्धि, और तद्द्द्वारा विद्यात्मक ७० अथ सप्त- ( ७ ) अवान्तरमतयुक्तं वैशेषिकदर्शनाभिमतं - मतप्रदर्शनम् 19 रुषेय वेद का सम्भावित स्वरूपबोध द्वारा वैशेषिक मत ४२७ - भगवान् पतञ्जलि के का समर्थन जयादित्यादि के ४२८ - सर्वश्री कैय्यट, तथा समर्थनानुगत संस्मरण ४२ ९ - वचनाभिप्राय समन्वय वैशेषिकदर्शनानुगत - दृष्टिकोण -का पावन संस्मरण ६६ ४०६ - महर्षि उलूक ( कणाद ) " ४०७ - वेदों का ऋषिकृतत्त्व का अपौरुषेयत्त्व ४०८ - ऋषिकृत वेदों ४०६ - दृष्टिभेदेन कृतक, और अपौरुषेववेद, तथा तत्समन्वय पौरुषेयत्त्व ४१०- शब्दापेक्षया वेदों का ४११ - पौरुषेय - वेदों का अनित्यत्त्व प्रतिपादित तत्त्वा-४१२ - शब्दात्मक - वेद के द्वारा 91 त्मक वेद का विद्यात्व समन्वय ४१३ - विद्यात्मक वेद का नित्यत्त्व अपौरुषेयत्त्व ४१४ - विद्यात्मकवेद का संस्मरण ४१५- वैशेषिक - सूत्रत्रयी का विज्ञान ४१६ - प्रज्ञान से अविनाभूत बुद्धि ४१७ - मन से सम्परिष्वक्ता , और उसका वेदत्त्व ४१८ - बुद्धिपूर्वा वाक्यकृति, और तत्कृतिरूप ४१६ - परिच्छिन्न - मानव - पुरुष " " वेदों का पौरुषेयत्त्व प्रक्रिया ४२ • -ब्राह्मणग्रन्थानुगता - निर्वचन का कृतकत्त्व-४२१ - निर्वचनों के द्वारा वेदों संस्थापन धर्म्म ४२२ - मानवबुद्धि का निर्वचनात्मक ४२३- निर्वचनशैली से पौरुषेयत्त्व का वेदविद्यात्त्व-४२४ - वेदशास्त्रानुगत - आर्षज्ञान ७० प्रतिपादन की पौरुषेयता 39 ४२५ - वेदतत्त्वात्मिका वेदविद्या II का उपराम ४३० - वैशेषिकदर्शनानुगत दृष्टिकोण " - नामक तीन ( १ ) - " यह वेद अग्नि वायु - सूर्य - नामक देवर्षियों का वाक्य है " प्रथम - वैशेषिक - मत संस्मरण ४३१ - देवयुगात्मक - पुरायुग का का संस्मरण ४३२ - देवयुगानुगत - भौमस्वर्ग ४३३ - भौमस्वर्गनिवासिनी - देवजातियाँ - मानवजाति 39 ४३४ - पृथिवीलोक - निवासिनी 39 ३३३ - देवमानवानुगत - देवर्षिवर्ग - महर्षि वर्ग ४३६- पार्थिवमानवानुगत - ऋषि मानवविध देवता ४३७ - अग्नि वायु - सूर्य्य- नामक द्वारा वेदमन्त्रों का ४३८ - मानवदेवता त्रयी के निर्माण के ऐतिहासिक तथ्यों ४३६ - भौम मानवदेवताओं 39 का संस्मरण सन्दर्भ ४४० - प्रथममतानुगत प्रमाण वैशेषिकानुगत - प्रथम - मत- उपरत ७१ " ३२

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( २ ) - " यह वेद का वाक्य वैशेषिक - मत 1 पृष्णि नामक ऋषियों ४५१ - वेदसमष्टिरूप - ' अग्निब्रह्म ' है ” – नामक - द्वितीय- ४५२ - श्रग्निब्रह्मात्मक - ‘ ज्येष्ठब्रह्म ’ उपनिषत् भूमिका - प्रथमखण्ड ४५३ - भृगु, और अङ्गिरा की समष्टिरूप ' सोम-ब्रह्म ' ४५४ - सुब्रह्म से अभिन्न- सोमबा ४४१ - पार्थिवी प्रजा का संस्मरण ७१ ४५५ - अग्नि का त्रिधा विभाजन ७२ " 1 29 19 ४४२- पार्थिव प्रजा से श्रनुगत चार प्रकार के वर्ण-मानव ४४३ - चार प्रकार के अवर्ण - मानव 39 ४४४- वेदतत्त्वद्रष्टा भारतीय ब्राह्मण, श्रीर तद-नुगता - ' मनुष्यर्षि ' - उपाधि 33 ४४५ - जपृष्णि - सिकतानिवावरी आकृष्टमाष नाम की भारतीया - महर्षित्रयी ४४६ - अपृष्णि नामक तपस्विवर्ग के द्वारा ही वेदमन्त्रों का स्त्ररूप - निर्माण 32 ४४७ - द्वितीय - मतानुगत - प्रमाण- सन्दर्भ वैशेषिकानुकागत - द्वितीय - मत - उपरत " ( ३ ) –'यह वेद अथर्वाङ्गिरा नामक ब्रह्मर्षि का वाक्य है " ' - -: नामक तृतीय- वैशे-पिक - मत ४४८ - अग्नि की ध्रुवात्मिका घनावस्था, और अग्नि ७२ ४४८ - अग्नि की धत्रात्मिका तरलावस्था, और वायु ४४६ - अग्नि की धरुणात्मिका विरलावस्था, और श्रादित्य ४५० – अग्नित्रयी से ऋक - यजुः साम - रूपा - वेद-त्रयी की स्वरूपाभिव्यक्ति 33 ३३ ४५६ – देवलोकरूप - श्रापोलोक की चतुर्थलोक-रूपता ४५७ - भृगुत्रयी, और अङ्गिरात्रयी का संस्मरण ४५८ - षड् ब्रह्ममय- सोमावच्छिन्न - अथर्ववेद ४५६ - वेदचतुष्टयी का स्वरूप- समन्वय ४६० - चतुम्मुख ब्रह्मा से अनुगता वेदचतुष्टयी ४६१ - ब्रह्मा की ' जगद्गुरु ' उपाधि ४६२ - ब्रह्मा की - ' स्वयम्भू ' - श्रभिधा ४६३ - आदिब्रह्मा का पावन संस्मरण ४६४ - हिरण्यगर्भ - नामक द्वितीय ब्रह्मा ४६५ - अपान्तरतमा - नामक - तृतीय - ब्रह्मा ४६५- प्राचीनगर्भ - महर्षि का संस्मरण ४६६ - अथर्वा नामक - चतुर्थ- ब्रह्मा ४६७ - आदिब्रह्मा का प्रथम देवत्त्व- समन्वय ४६८ - आर्य्यायणात्मक - प्रतीच्य भारत ४६६ - वरुणराजधानी - पुष्कर, और बुखारा ४७० - वाह्लीकनगरनिवासी - वरुण ४७१- वरुण के औरसपुत्र भृगु ४७२ - स्वयम्भू ब्रह्मा के दत्तकपुत्र - मृगु ४७३ - सरस्वती - ग्रामवासी प्राचीनगर्भ ४७४ - वसिष्ठाश्रम का संस्मरण 37 37 33 33 77 23 22 " 29 39 33 " " " ७२ ४७५ - ' सारस्वत - ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध महर्षि " ४७६ - स्वयम्भू - हिरण्यगर्भ प्राचीनगर्भ नाम की ब्रह्मा - त्रयी, और तद्द्द्वारा हिरण्यशृङ्गपर्वत पर वेदनिर्माण 21 ४७७-१७- अथ अर्वाक्, और अथर्वा ४७८ - श्रथर्ववेद का निर्बंचनात्मक समन्वय 21 II

पृष्ठ 75

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४७- ब्रह्मर्षिरूप - ब्रह्मा के द्वारा ही वेदाविर्भाव 39 ४८० - तृतीय- मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ वैशेषिकानुगत- तृतीय-** - मत - उपरत विषयसूची ७३ ४८७-५० सहस्र - गृहस्थाश्रमी महर्षि का ( ४ ) - " यह वेद अपान्तरतमा ऋषि वाक्य है " नामक चतुर्थ - वैशेषिक - मत ४८८-८८ सहस्र - नैष्ठिक - महर्षि ४८६ - महर्षियों के द्वारा सृष्टितत्त्वों का अन्वेषण ४६० - महर्षियों के द्वारा श्राविष्कृत तत्त्ववाद का शब्दात्मक स्वरूप, और उस का वेदत्त्व " ४६१ - पञ्चम - मतानुगत - प्रमाण- सन्दर्भ वैशेषिकानुगत- पञ्चम - मत - उपरत ७४ 37 ७५ द्वारा वेद का ४८१- अपान्तरतमा ऋषि के ७४ निर्वचन ४८२ - श्रादिब्रह्मा के मानव पुत्र श्रपान्तरतमा - वेद संक-४८३- प्रपान्तरतमा महर्षि के अवतार संस्मरण " लनकर्त्ता भगवान् कृष्ण दुपायन का ४८४ - प्राचीनगर्भ, और अपान्तरतमा सन्दर्भ ४८५— ( क ) चतुर्थ - मतानुगत प्रमाण-वैशेषिकानुगत - चतुर्थ मत - उपरत ४ का ( ५ ) - " यह वेद ऊर्ध्वरेता महर्षियों वाक्य है " नामक पञ्चम - वैशेषिक - मत ४८५ ( ख ) महर्षियों की विद्यात्मिक रहस्यपूर्णा वाणी, और वेदशास्त्र ७४ ४८५– ( ग ) कदम्बवृत्तानुगत - विष्णुपद - का वेदयुग संस्मरण का " ४८५ ( घ ) पच्चीससहस्रवर्ष - पूर्वात्मक " पावन संस्मरण ४८६ - ' नाकस्थ विष्णु ' का संस्मरण ( ६ ) - " यह वेद वसिष्ठादि ७ महर्षियों का वाक्य है " नामक षष्ठ - वैशेषिक - मत ४६२ - वसिष्ठ प्रमुख ऋषियों का संस्मरण ४६३ - वेदप्रवत्त'क - सप्तर्षिगण ४६४ - गोत्रप्रवत्त'क - सप्तर्षिगण ४६५ - सृष्टिप्रवर्तक - सप्तर्षिगण ४६६ - सप्तर्षिप्राण - मूला - सप्तावयवा - सृष्टि ४६७ - सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति ४६८ - प्राणात्मक - ऋषितत्त्व ४६६- प्राणात्मक ऋषियों के प्रथमद्रष्टा- मानव-श्रेष्ठ और उनका तत्प्राण नाम से ही 37 ' यश: ख्यापन ५०० - सप्तर्षियों की वंशपरम्परा ५०२ - नित्य ऋषियों का संस्मरण " ३४ ५०२- द्वादश ऋषियों का संस्मरण ५०३ - वेदकर्त्ता - ऋषियों के आठ नाम ७६ 29 " " " "

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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ५०४ - गोत्र, और शाखा- प्रवर्तक सप्तर्षि ७६ ५०५- वसिष्ठ - अगस्त्य त्रित्रयी की मूलपुरुष-रूपता ५०६ - ऋषि ऋषिपुत्र ऋषिपौत्र आदि का पावन संस्मरण ५०७ - गोत्रप्रवर्त्तक- सुप्रसिद्ध - सात महर्षि ५०८ - वेद प्रवर्त्तक- सुप्रसिद्ध - सात महर्षि ५०६ - सृष्टिप्रवर्तक- सुप्रसिद्ध सात- महर्षि ५१० - षष्ठ - मतानुगत प्रमाण- सन्दर्भ वैशेषिकानुगता - षष्ठ - मत - उपरत ६ ७७ 31 ( ७ ) - ‘ ‘ यह वेद श्राम्नायवचनों से संगृहीत " नामक - सप्तम - वैशेषिक - मत है " -५११ - लोकपरम्परानुगता - जनश्रुति ५१२- जनश्रुति से अनुगंत ' ग्राम्नायवचन ' ५१३- श्राम्नायवचनों का प्रमाणत्त्व ५१४ -- ग्राम्नायवचनात्मक वेदमन्त्र ५१५ - ऋषिवंशों से श्राम्नायवचनों का भगवान् व्यास के द्वारा संकलन ५१६ - व्यासदेव के द्वारा संकलित श्राम्नाय-वचनों का ही वेदसंहिताच्त्व ५१७ - वेदशाखाओं का पावन संस्मरण ५१८ - वेदशाखात्मक वेद ५१६ - सप्तम मतानुगत प्रमाण - सन्दर्भ वैशेषिकानुगत सप्तम - मत - उपरत ७ ५२०-६ - वैशेषिक दर्शनाभिमत - सप्तविध- ( ७ ) अवा-न्तर - मतों का संकलनात्मक समन्वय ७६. इति - सप्त- ( ७ ) -अवान्तरमतयुक्तं " वैशेषिकदर्शनाभिमतं - मतप्रदर्शनम् ५ --- * --थ - युगधर्म्मानुगत - कलिवात्या-हित विभिन्न - काल्पनिक - मतप्र--दर्शनम्, तदनु- नास्तिकदर्शना-भिमत - मतप्रदर्शनञ्च PE ७८ " 22 " ५२१- मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र का संस्मरण ५२२ - संहिता - चतुष्टयी - मात्र का ही वेदत्त्वाग्रह 23 39 " " " " मताभासात्मक - काल्पनिक मत ५२३- ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषत् त्रयीरूप ब्राह्म-णभाग के वेदत्व में आपत्ति ५२४- मतानुगता कल्पना ५२५ - मताभासात्मक मतवाद ५२६- प्रमाणवचन का श्रात्यन्तिक अभाव ८३ मताभासात्मक - काल्पनिक - मत का उपराम नास्तिक - दर्शनाभिमत - मत - प्रदर्शन -५२७ - नास्तिकमत की मूलभित्ति - अभिनिवेशात्मक " दुराग्रह ३५ ८३

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५२८ - ' नास्तिक ' की स्वरूप - परिभाषा विषयसूची " ८४ ८३ ५३४- “ यह वेद स्वार्थी मनुष्यों की स्वार्थ-39 सिद्धि का द्वारभूत वाक्यसंग्रहमात्र है " - नामक - ४० वें नास्तिक मत से अनु-प्राणित - नास्तिकों के कतिपय श्रावेशात्मक उद्गार ५३५ - नास्तिकमतोपराम ५२६ - चार्वाकादि षडूविध - नास्तिक ५३० - भ्रान्ति - पथों के प्रवर्तक, प्रचारक - नास्तिक 29 ५३१ - वेदमार्गविरोधी - नास्तिकवर्गं ३२- नास्तिकशिरोमणि बृहस्पति ५३३ – चार्वाक - मत - स्वरूप -- दिग्दर्शन -ISTFE ** इति - नास्तिकदर्शनाभिमत - मतप्रदर्शनम् ६ इति - वेदापौरुषेयत्त्व - पौरुषेयत्त्व - सम्बन्धे “ दार्शनिक - विचारप्रसङ्गः ' उपरतः ३३ ८४ ८६

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श्रीः वेद के तात्त्विक - स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणिता ' वैज्ञानिक - वेद - निरुक्तिः ' विषयोपक्रम नामक सन्दर्भ - उपक्रात १ - वेदपदार्थ का एकत्त्व, और तत्र जैमिनि-व्यासादि- विभिन्न दार्शनिकों के विभिन्न- विचार ६१ २ - विभिन्न विचारानुगत - संशयवाद ३ - संशयोत्थान के कारण का समन्वय - वैज्ञानिक - वेद का माङ्गलिक - संस्मरण ४-५— वैज्ञानिक तथ्यों के समन्वयाधार पर सम्पूर्ण संशयों का सम्भावित - निराकरण ६ – वैज्ञानिक- वेद - निर्वचनोपक्रम -" 39 99 १५ - ईश भाष्य का संस्मरण १६- परात्परब्रह्म का वनत्त्व १७- परात्पर की परमेश्वररूपता ८- दिग्देशकालानवच्छिन्न - परात्पर १६ - परात्पर की अननुमेया इयत्ता २० - श्रसंख्य - मायाबलों का संस्मरण १८-" २१- मायापुर के सीमित परात्पर अंश २१- मायी- परात्परांश की पुरुषरूपता २३ - असंख्य मायी- पुरुष २४ - मायीपुरुष का स्वतन्त्रेश्वरत्व २५- वृक्षात्मक -मायी- महेश्वर अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ २६ - मायी - महेश्वरों के असंख्य - विवत्त वेदप्रतिष्ठानुगता - श्रात्मस्वरूप- २७- अश्वत्थवृक्षात्मक - माथी - महेश्वर निरुक्तिः १ ७ - रागद्वेषादि श्रगणित- द्वन्द्वभावों का संस्मरण ८ - द्वन्द्वभावाक्रान्त विश्व के मूलकारण की जिज्ञासा: " ६ - प्रश्नोत्थानपरा तैत्तिरीय - श्रु ति " १०- उत्तर ति का संस्मरण ११ - श्रुत्यक्षरार्थ - समन्वय १२- ब्रह्मात्मक वन १३- ब्रह्मात्मक- वृक्ष २८ - सप्तलोकाधिपति मायी - महेश्वर २६ - सहस्र - सहस्र - उपेश्वरों को स्वमहिमा के गर्भ में रखने वाला एक एक मायी - महेश्वर " " ३० - अश्वत्थवृक्षमूर्त्ति विश्वेश्वर, और तत्स्वरूप-बर्णनपरा - मन्त्रश्रुति 21 ३१ - अश्वत्थवृक्षेश्वर के अमृत - ब्रह्म - शुक्र - नामक तीन महिमा विव ६२ 93 " 23 " ६३ " 29 39 " 29 22 " ३२- अव्यय - अक्षर - आत्मक्षर की समष्टिरूप-39 ६२ " ' अमृतम् ' ३३- प्राणः - श्रापः- वाक अन्नम् श्रन्नादः - की समष्टि-रूप - ' ब्रह्म ' " 99 १४- ब्रह्मवृक्ष से त्रैलोक्याभिव्यक्ति 29 39 ३४ - वाक् - श्रापः अग्नि की समष्टिरूप ' शुक्रम् ' 33 ३७

पृष्ठ 79

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विषयसूची ६३ - वाकू-५८ - मन्त्रश्रुति से अनुप्राणिता लोक - वेद साहस्री - त्रयी 19 स्वरूप - जिज्ञासा 39 ५६ - इन्द्राविष्णू, और तत्स्पर्द्धा की स्वरूप-६० - स्पर्द्धा के आधारभूत ' अप्तत्त्व ' की जिज्ञासा ६१ - त्रिकल - श्रात्मा का संस्मरण 23 ६२ - ज्ञानात्मा, और मतस्तन्त्र 33 ६३ - कर्मात्मा और प्राणतन्त्र ३५ - तुरीय - परात्पर का सन्निवेश ३६ - चतुष्पाद पुरुषब्रह्म पादों की ३७ - परात्पर - अमृत ब्रह्म रूप तीन ही सृष्ट्य-असङ्गता, एवं तुरीय - शुक्र - पाद का नुगतत्त्व ३८ - ‘ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः ’ ३६ - ‘ पादोस्येहाभवत्पुनः ' विश्वभुवनों ४० - वृक्ष का निकृन्तन, और तद्द्वारा का निर्माण विश्वालम्बनत्व ४१ - परात्परानुगत अव्यय का ४२ - अक्षर का कर्तृत्त्व ४३ - क्षर का उपादान मूलत्त्व ४४- ब्रह्म का उपादानारम्भणव ४५ - शुक्र का उपादानत्त्व ४६ - ब्रह्म - शब्द - व्यवहार का समन्वय का तालिका के ४७- अमृत - ब्रह्म - शुक्र - विवत माध्यम से स्वरूप- समन्वय ६४ ४८८ - ब्रह्म की सच्चिदानन्दरूपता, और तत्समर्थक-श्रुतिवचन, और तत्सम-४६ -ब्रह्म की विश्वरूप में परिणति र्थक श्र तिवचन ५० - विश्व के मूलभूत ब्रह्म का सच्चिदानन्दत्त्व ५ - मूल " 35 39 33 ६४ - भूतात्मा, और वाक्तन्त्र संस्मरण ६५ – त्रिवृद्भाव की व्यापकता का ६६ - मनः प्राणवाङ् मय श्रा मा ६७ - पञ्चीकरण से समतुलित - त्रिवृद्भाव - तीन विभिन्न-६८- आत्मा के त्र्यात्मक - महिमा - मय " विवत्तों का स्वरूप- समन्वय 99 ६६- मनःप्रधान - ज्ञानात्मा की त्रिवृद्भावानुगता " तीन कलाओं का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय 65 ७० - प्राणप्रधान - कर्म्मात्मा की त्रिवृद्भावानुगता तीन कलाओं का तात्त्विक स्वरूप समन्वय ६७ तीन ७१- वाकप्रधान - भूतात्मा की त्रिवृद्भावापन्ना ६५ कलाओं का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय " ७२ - विद्यात्मक - त्रिवृद्भावापन्न - मनस्तन्त्र, और ज्ञानात्मा " P 37 37 37 29 17 99 ६६ 66 हद भी 99 ७३ – वीर्य्यात्मक - त्रिवृद्भावापन्न - प्राणतन्त्र, और से अभिव्यक्त तूल - रूप विश्व का 93 सच्चिदानन्दत्त्व ५२ - शुक्रत्रयी से कृतरूप विश्व , और तद-५३ - वाक् - शुक्र का महिमामय विवर्त्त रूप वेद संस्मरण ५४ - ‘ वाग्विवृताश्च वेदाः ' का ५५ - मूलवेद का स्वरूप- संस्मरण - नामकी देवत्रयी का ५६ - ब्रह्मा - विष्णु-- महेश व्यापार, और वेदाभिव्यक्ति और उस से अभि-५७ - ब्रह्म ेन्द्रविष्णुकृत - वीरण, व्यक्ता साहस्रीत्रयी 33 39 ७४ - अन्नात्मक - त्रिवृद्भावापन्न वाकूतन्त्र, और भूतात्मा ७५ - विद्यात्मक मनःप्रधान - ज्ञानात्मा से अनुगत-अव्ययात्मा ७६ – वीर्य्यात्मक - प्राणप्रधान - कर्मात्मा से अनुगत-" अक्षरात्मा " ७७ - अन्नात्मक - वाक्प्रधान - भूतात्मा क्षरात्मा " εξ 37 से अनुप्राणित-ज्ञानात्मा ७८- अव्ययानुगत - मनः प्रधान - विद्यात्मक का ईश्वरात्मत्त्व - समन्वय " ३८

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
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उपनिषद्भूमिका प्रथमखण्ड ७६- अक्षरानुगत प्राणप्रधान वीर्य्यात्मक कम्र्मात्मा का जीवात्मत्त्व- समन्वय ८० - क्षरानुगत वाक्प्रधान - अन्नात्मक भूतात्मा का जगत् - स्वरूपत्व- समन्वय ८१- ब्रह्माक्षरानुगत ईश्वरतन्त्र ८२ - विष्वक्षर । नुगत- जीवतन्त्र Εξ " " ६५ - विज्ञानकलानुगत - चिद्भाव ६६ - मनः - प्राण - वाक् - कलानुगत - सद्भाव ६७ - पञ्चकला का कलात्रयी पर विश्राम ६८ - मूलप्रभव की - ' उक्थरूपता ' ६६ उक्थ - नाम निर्वचन -१०० - आनन्दमय - उक्थभाव, और तद्रूप-ॠग्तत्त्व १०५ " " " ८३- इन्द्राक्षरानुगत जगत्तन्त्र ८४ - ज्ञानात्मा से अनुगृहीत ब्रह्मा का ज्ञानपतित्त्व 99 ८५ कर्मात्मा से अनुगृहीत विष्णु का कर्म्मपत्तित्त्व II ८६ - भूतात्मा से अनुगृहीत इन्द्र का भूतपतित्त्व " ८७ - ब्रह्मन्दविष्णु - सहकृत - रहस्यपूर्ण - त्रिवृद्भाव का संस्मरण - तालिका के द्वारा त्रिवृद्भाव का स्वरूप-स्पष्टीकरण ८६ - मूलवेद, और सच्चिदानन्दब्रह्म ६० - वेदप्रतिष्ठानुगत त्रिवृद्भावापन्न - आत्मस्वरूप का तात्त्विक - दिग्दर्शन " " १०१ - उक्थ, महद्दुक्थ, और महोक्थ १०२ - ऋचां समुद्रः १०३ - आनन्द का सर्वप्रतिष्ठात्त्व १०० इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ " वेदप्रतिष्ठानुगता - यात्मस्वरूप-निरुक्तिः १ --X-32 १०५- सत्ताभाव " " " १०४ - मूल- ऋग्वेद, और आत्मा की श्रानन्दकला ". आक्रान्त भूत भौतिक पदार्थ १०६ - ' अस्ति ' प्रतीति की व्याप्ति १०७ - स्वतन्त्र अस्तित्त्व से समन्वित पदार्थ १०८ - उपलब्धि के अभाव में क्षोभ का उदय १०६ - जिज्ञासाभाव की उपशान्ति ११० - विषयावाप्ति, और अवसानभूमि " 29 99 93 99 १११ - श्रवसानात्मक ' साम ' भाव ११२ - मत्तानुगत सामभाव ११३ - महती सत्ता, और महात्रत ११४- महाव्रतरूप- सामसमुद्र ११५ - श्रानन्द, और सत्ता का संयोजक - ज्ञान सूत्र ११६ - ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति ' ११७ - यजनात्मक - यजुर्भाव, और मध्यस्थ ज्ञाना-११८ - ' अग्नि ', और यजुः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ त्मक चिद्भाव सच्चिदानन्दात्मलक्षणा वेदनिरुक्तिः ११६ - पुरुष, और यजुः IIII २ ६१ - श्रात्मदृष्टि से श्रनुगत - मूल वेद १०५ ६२ - विश्व के मूलाधार का संस्मरण ६३ - विश्वात्मा की अवान्तर - पाँच कलाएँ ६४- श्रानन्दकलानुगत श्रानन्द भाव " " १२० - श्रानन्दात्मक - ऋग्वेद १२१ - चिदात्मक - यजुर्वेद १२२ - सत्तात्मक सामवेद १२३- प्रकारान्तदेण - मूलवेद का समन्वय प्रयास १२४ ( क ) - सच्चिदानन्दब्रह्म के " विश्व - विश्वात्मा-विश्वचर " - रूप - तीन महिमा - विव १२४ ( ख ) - सृष्टात्मा, और विश्वविवर्त्त १०६ 77 " " 37 " " II " " 27 ३६