Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 81–90
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90
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१२५ - प्रविष्टात्मा, और विश्वात्मविव १२६- प्रविविक्तात्मा, और विश्चविवर्त्त १२७ - विज्ञेय प्रविविक्त ब्रह्म १२.८ - दुर्विज्ञेय - सृष्टब्रह्म १२६- सुविज्ञेय - सृष्टब्रह्म १३० - नित्यानन्द - विव ' १३१ - नित्य विज्ञान - विवत्त १३२ - नित्यसत्ता - विवर्त्त विषयसूची १०६ 53 १०७ " " " " 33 १३३ - श्रात्मानन्द विवत ' 31 १३४ - श्रात्मज्ञान - विवर्त्त ' १३५ - श्रात्मसत्ता - विवत १३६ - विषयानन्द - विवर्त्त १३७ - विषयज्ञान - विवर्त्त १३८ - विषय सत्ता - विवर्त अथ - वैज्ञानिक - वेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय आत्मलक्षणा-25 वेदनिरुक्तिः TRE ३ - श्रात्मविवर्त्त १४६ - सच्चिदानन्दघन - मुक्तिसाक्षी १४७-सृष्टिसाक्षी-१४८ - निष्कामभावापन्न श्रव्ययपुरुष ११७ II १३६ - त्रिवृद्भावापन्न - सचिदानन्दब्रह्म १४० - त्रिवृद्भावापन्न - तद्रूपवेद के महिमा-१४१ - सच्चिदानन्द - लक्षण - श्रात्मवेद मय - तात्त्विक स्वरूप का विस्तार परिलेखः १४२- श्रात्मानुगत - त्रिवृद्वेद-अनुप्राणित- १०८ १४३ - ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' श्रति से महिमामय-वेद का परिलेख के द्वारा विस्तार - महोक्थ- महा-१४४- श्रानन्द चित् - - सत् - लक्षणः व्रत - साममयः - मूलबेदः - परिलेखानुगतः उसका १४५ - शेषभूता- वेदविवर्त्तद्वयी, और रहस्यात्मक - समन्वय " १४६ - सकामभावापन्न श्रव्ययपुरुष " " १५० - अमृतानुगत व्ययपुरुष " " १५१ - मृत्यु से अनुगत श्रव्यपुरुष " १५२ - ' अमृतं चैव मृत्युश्च - सदसच्चाहम-33 39 " " जुन '! का संस्मरण , और मुक्ति-१५३ - आनन्द, विज्ञान, मनोभाव साक्षी अमृतात्मा १५४ – मनः - प्राण - वाग्भाव, मर्त्यात्मा १५५ - श्रानन्द, और ऋग्वेद और सृष्टिसाक्षी-29 " १५६ - विज्ञान, और यजुर्वेद " १०६ १५७ - मन, और सामवेद " १५८ - मन, और ऋग्वेद इति - वैज्ञानिक - वेदनिरुक्तौ-सच्चिदानन्दात्मलक्षणा वेदनिरुक्तिः " १५६ - प्राण, और यजुर्वेद १६० – वाक्, और सामवेद " " इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय अमृतात्मलक्षणा -वेदनिरुक्तिः
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उपनिषद्भूमिका-का - प्रथमखण्ड थ - वैज्ञानिक- वेदनिरुक्ता मनः - प्राण - वाङ्मयी- त्रिकला वेदनिरुक्तिः ४ १८२ - वाङ् मय प्राण, और यजुर्वेद १८२ - वाङमयी वाक्, और सामवेद इति - वैज्ञानिक - वेदनिरुक्तौ मनः - प्राण - वाङमयी - त्रिकला वेदनिरुक्तिः * --" " १६१ - श्रात्मभाव का संस्मरण १६२ - आत्ममन, और कामना १६३ - श्रात्मप्राण, और तप १६४ - आत्मवाक और श्रम १६५ - मनसा नित्यं कामयते १६६ - प्राणेन नित्यं तप्यते १६७ - वाचा नित्यं श्राम्यति - * --१२३ थ - वैज्ञानिक- वेदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म - साम लक्षणा - वेदनिरुक्ति. ५ १८४ - निरुपाधिक - लक्षणातीत निद्ध'क ब्रह्म १८८३ - सोपाधिक आत्मा का लक्षणानुगतत्त्व १८६- श्रात्मा का रहस्यात्मक लक्षण १२६ १६८ - कामयमान मन की ज्ञानशक्ति १६६ - तेपान प्राण की क्रियाशक्ति १७० - श्रमानुगता वाकू की अर्थशक्ति १७१ - कायममान मन की उक्थरूपता १७२ - उक्थात्मक मन, और ऋग्वेद १७३- तेपान - प्राण, और यजुर्वेद १७४ - श्रममयी और सामवेद वाक्, १७५ - मनोमय - मन, और ऋग्वेद १७६ - मनोमय - प्राण, और यजुर्वेद १७७ - मनोमयी वाक्, और सामवेद १७८- प्राणमय - मन, और ऋग्वेद १७६- प्राणमय - प्राण, और यजुर्वेद १८० - प्राणमयीवाक्, और सामवेद १८१ - वाङमय - मन, और ऋग्वेद " १८७ - उक्थभाव, और श्रात्मा " १८८८- ब्रह्मभाव, और श्रात्मा " " १२४ 36 " १८६ - सामभाव, और श्रात्मा १६० - लौकिक - उदाहरणों के माध्यम से उक्थ-ब्रह्म साम - भावों का स्वरूप- समन्वय १६१ - आत्मलक्षण का आधिभौतिकी - संस्था के साथ समन्वय प्रयास १६२ - पञ्चमहाभूतों की मूलजननी वाग्देवी १६३ - वाङ् मय - पञ्चमहाभूत १६४ - मन, और प्राण से अविनाभूता वाक् १६५ – अकार, और मनस्तन्त्र " १६६ - उकार, और प्राणतन्त्र १ ९ ७ –'श्रच् ' भाव, और याचा १६८ - ' वाक् ' शब्द के मनः - प्राण - वाक् - स्वरूप-संग्राहक - रहस्यात्मक - निर्वचन का तात्त्विक-स्वरूप- समन्वय " " 39 39 33 29 " " १३० 39 " " ४१
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का पारिभाषिक-१६६ - वाक् की उक्थरूपता १३० समन्वय २०० - विधर्त्ता - प्राणभाव विषयसूची २१७ - मनस्तन्त्र, और रूपभाग २१८ - प्राणतन्त्र, और कर्मभाग २१६ - वाकतन्त्र, और नामभाग २२०- प्रज्ञात्मक - मनस्तन्त्र १३७ II 99 27 २२१- प्राणात्मक - प्राणतन्त्र २२२ - रसो ह्येव सः " सूत्रात्मा - प्राणतत्त्व 29 २०१ - क्षरकूट का अधिष्ठाता " मनस्तन्त्र २०२ - अखण्डधरातलात्मक २०३ - " मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यम्, संस्मरण आकाशात्मा " का समन्वय २०४ - मन के सामभाव का आत्मैक्य २०५ - व्यासज्यवृत्ति, और त्रयम् २०६- आत्मा -- एकः सन्न तत् २०७ - त्रयं सदेकमयमात्मा 39 २२३ - रसात्मक श्रानन्द का २२४ - ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' सूत्र संस्मरण २२५ - श्रानन्दमय - रसवेद और वेदतत्त्व २२६- श्रानन्द विकासभूमि, २०८ - वेदमूर्त्तिरात्मा सर्वेषाम् 39 २२७ - चेतना विकासभूमि, २०६ ऋङ मुर्त्ति उक्थ मन १३१ २२८ - सत्ता विकासभूमि, २१० - यजुम्मूर्त्ति - ब्रह्मप्राण २११ - साममूर्ति - सामवाक् श्रनुगत- परम्परासिद्ध-२१२ उक्थ - ब्रह्म - साम से II त्रिवृद्भाव २१३ – त्रिवृद्भावापन्न वेद का त्रिवृद्भावानुबन्धी विस्तार से विस्तार का सम-२१४- तालिका के माध्यम १३२ न्वय प्रयास इति वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म- साम - मयी - वेदनिरुक्तिः थ -- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ श्रात्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा-वेदनिरुक्तिः ६ -- * --२१५ श्रात्मा का सच्चिदानन्दघनत्त्व - संस्मरण २१६- श्रात्मकलाभाव २२६- श्रानन्दात्मक श्रात्मा, और आत्मभाव ज्योतिर्भाव २३८- चेतनात्मक - श्रात्मा, और प्रतिष्ठाभाव २३१ - सत्तात्मक - श्रात्मा, और, और २३२ - श्रात्मभाव से अनुप्राणित - रसवेद तदात्मक - यजुर्वेद , और २३३ - ज्योतिर्भाव से अनुप्राणित वितान वेद तदात्मक - सामवेद , २३४ - प्रतिष्ठाभाव से अनुप्राणित छन्दोवेद और तदात्मक ॠग्वेद २३५ - श्रानन्दगर्भित -- मनोमय-- ब्रह्मप्राण, यजुर्वेद, २३६- श्रानन्दगर्भित - मनोमन साम - मन, सामवेद " 39 97 १३८ और १३६ और - यजुर्वेदे २३७ - श्रानन्दा मके - मनोमये श्रात्मलक्षणे एव मनसस्त्रिष्टद्भावाद्वेदत्रयोपभोगः अभिन्ना २३७– ( ख ) सत्तागर्भित - वा मय - मन से श्रात्मधृति, और ऋग्वेद १४० से अभिन्ना २३८ - सत्तागर्भित - वाङमय प्राण असतोघृति, और यजुर्वेद से अभिन्ना १३७ | २३६ - सत्तागर्भित - वाङ मयी वाक् " " सतोधृति, और सामवेद ४२
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उपनिषद् भूमिका- प्रथमखण्ड २४० -सत्तात्मके - वाङ मये प्रतिष्ठालक्षणे -- ॠग्वेदे एव वाचस्त्रिवृद्भावाढ त्रयोपभोगः २४१ - चेतनागर्भित प्राणमय - मन से श्रभिन्ना-ज्ञानज्योति, और ऋग्वेद १४१ २४२ - चेतनागर्भित प्राणमय - प्राण से अभिन्ना-भूतज्योति, और यजुर्वेद २४३ - चेतनागर्भिता -- प्राणमयी --- वाक् से अभिन्ना सत्यज्योति, और सामवेद २४४ - चेतनात्मके प्राणमये - ज्योतिर्लक्षणे - सामवेदे प्राणस्य - त्रिवृद्भावाद्वेदत्रयोपभोगः २५५ - प्रिय, और जगद्भाव १४७ १४० २५६ - समष्टिभावात्मिका उपलब्धि " २५७ - वस्तुप्राप्तिरूपा उपलब्धि " २५८ - समन्वयात्मिका उपलब्धि 23 33 इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्मा - ज्योति प्रतिष्ठा - लक्षणा वेदनिरुक्तिः ६ अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ उपलब्धिलक्षणा वेदनिरुक्तिः ७ २४५ - विशिष्टाद्वतानुबन्धिनी - ईश्वर - जीव - जगत्-त्रयीका संस्मरण २४६ - विवर्त्तत्रयीका धारावाहिक -सच्चिदानन्दम-यत्त्व २४७ - श्राधिदैविक- विवत्त ', और ईश्वरसंस्था २४८ - श्राध्यात्मिक- विवत्त ', और जीवसंस्था २४ - श्राधिभौतिक - विवर्त्त ', और जगत्संस्था, " २५० - श्रानन्दमूर्त्ति - ईश्वर, और अधिदैवतभाव 11 २५१ - चिन्मूर्त्ति जीव, और अध्यात्मभाव 22 33 १४७ 39 39 33 २५६ - ' यदि स्यादुपलभ्येत ' २६० - सत्ता से श्रभिन्ना उपलब्धि २६१- अस्ति, और उपलब्धि का तादात्म्य २६२ - अस्तिरूपा उपलब्धि के सम्बन्ध में कठ-श्रुति का संस्मरण २६३ - नामरूपानुग्रह से समन्वित- अस्तित्त्व, और तद्रूपा उपलब्धि २६४ - उपलब्धि के विभिन्न तीन महिमा - विवत्त ' २६५ - उपलब्धित्रयी से अभिन्ना वेदत्रयी २६६ - उपलब्धिवेद का प्रथम पर्व २६७-" २६८-" 33 99 १४८ 77 11 द्वितीय पर्व तृतीय पर्व " 37 २६६ - सत्तानुगता - उपलब्धि २७० - चेतनानुगता - उपलब्धि २७१ - श्रानन्दानुगता- उपलब्धि २७२ - उपलब्धि से अनुगत भूतभौतिक- विवत ' 99 २७३ - निर्विषयक ज्ञान की अनुपलब्धि " २७४ - सविषयक ज्ञान की उपलब्धि २७५ - निर्विषयक - श्रानन्द की अनुलब्धि २७६ - सविषयक आनन्द की उपलब्धि २७७ - निर्विषया - सामान्या - सत्ता की अनुपलब्धि २७८ - सविषया विशेषा- सत्ता की उपलब्धि २७६ - विषयात्मक भूत भौतिक विवर्त्त २८० - श्रानन्दोपलव्धिरूप आत्मलक्षण - यजु-र्वेद " २८१ - चेतनोपलब्धिरूप - ज्योतिर्लक्षण - साम-वेद 22 २८२ - सत्तोपलब्धिरूप प्रतिष्ठा - लक्षण -ऋग्वेद ' २५२ - सन्मूर्त्ति - जगत्, और अधिभूतभाव २५३ - श्रस्ति, और ईश्वरभाव 39 २८३- भूताधारानुगत - उपलब्धिवेद २५४ - भाति, और जीवभाव " २८४ - उपलब्धिवेद - रहस्य का समन्वय " " " 27 33 29 " "
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FIR SOR - FIRE विषयसूची १४६ २८५ - ' त्रय्यां वाव विद्यायां भूतान्यपश्यत् तन्निबन्धन-२८६ - ' विद्यते इति वेदः ', और 99 ' सत्तोपलब्धि वेद ' तन्निबन्धन ' चेत-२८७ - ' वेत्ति - इति - वेदः, और 33 नोपलब्धिवेद ' ' आनन्दो -२८८ - ' विन्दति इति वेदः ', और 19 पलब्धिवेद ' " ' का संस्मरण २८६ - ' सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति २६० - आधिदैविकवेद - का समन्वय समन्वय २६१ - आध्यात्मिकवेद का २६२ - आधिभौतिक वेद का समन्वय का तात्त्विक स्वरूप-२६३ - उपलब्धिरूपा वेदत्रयी १४० समन्वय ३०० - केन्द्र की केन्द्ररूपता ३०१ - हृदयभावनिबन्धन- प्रकृतिभाव ३०२ - मायोदय से पुरुषोदय का उदय ३०३ - पुरुष के साथ ही प्रकृति १५५ " १५५ " 93 ३०४ ( क ) — केन्द्रतत्त्व की व्यापकता, और ' स्वभाव ',, ३०४ ( ख ) - हृदयात्मक ' स्व ' - भाव " ' ३०५ - ' स्वभाव ', और ' प्रकृति ३०६ - ' रसबलमूर्ति - अव्ययपुरुष इति - वैज्ञानिकवेदक्तौ उपलब्धिलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ७ " ३०७ - रसबलात्मिका अव्ययप्रकृति - पराप्रकृति 29 ३०८ – मृत्युगर्भिता - श्रमृतलक्षणा पराप्रकृति ३० - अमृतगर्भिता - मृत्युलक्षणा ३१०- पराप्रकृति, और अन्तरङ्गभाव ३११ - अपरा प्रकृति, और अन्तरङ्गभाव ३१२- अन्तरङ्गप्रकृतिरूप अक्षरतत्त्व ३१३- बहिरङ्गप्रकृतिरूप - क्षरतत्त्व तीन महिमा-३१४- अक्षरप्रकृति के हृदयानुगत विवत ३१५- मूलाक्षरप्रकृति, और स्थितिभाव श्रागतिभाव ३१६ - मध्याक्षरप्रकृति, और ३१७- अमाक्षरप्रकृति, और गतिभाव ब्रह्मा ३१८- मूलानुगत - स्थितिभाव, और थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ, और ब्रह्मन्द्रविष्णुसहकृता - वेदनिरुक्तिः ३१६ - मध्यानुगत - श्रागतिभाव सत्यवेदनिरुक्तिर्वा ८ २६४ सन्तविध - निर्वचनों का सिंहावलोकनात्मक-संस्मरण अनुप्राणित - सप्त-२६५ - पञ्चकल - श्रव्यपुरुष से " विध - निर्वचन का अविनाभाव २६६ - प्रकृति, और पुरुष का अनादिव २६७ - प्रकृति, और पुरुष का रहस्यात्मक श्राविर्भाव २६८ - श्रव्ययपुरुष २६६ - पराप्रकृति की सहृदयता १५५ " " 99 " ३२० - अग्रानुगत गतिभाव, और इन्द्र प्रतिष्ठिता ब्रह्मा-३२१ - अश्वत्थवृक्ष के मूल में क्षरप्रकृति मध्य में प्रतिष्ठिता ३२२ - अश्वत्थवृक्ष के विष्णवक्षरप्रकृति में प्रतिष्ठिता ३२३ - श्रश्वत्थवृक्ष के अग्रभाग इन्द्राक्षरप्रकृति ३२४- व्याख्यामुद्राक्षमालादिरूप श्रागम शास्त्रानुचन्धी रहस्यपूर्ण ध्यान, और परम शिवतत्त्व का माङ्गलिक - संस्मरण ३२५ - यजुर्वेदाध्यक्ष - ब्रह्माक्षर ३२६ - सामवेदाध्यक्ष- विष्वक्षर 29 39 39 27 31 १५६ " 39 27 I
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३२७ - ऋग्वेदाध्यक्ष- शिवाक्षर ३२८ - पञ्चक्षरमूर्त्ति त्र्यक्षरविवर्त्त ३२६ - अक्षरत्रयमूत्ति - सत्यवेद ३३० - सत्यात्मिका त्रयीविद्या ३३१ - सत्य, और धर्म्म अभिन्नता ३३२ - ' अक्षरमित्युपास्व ' उपनिषद्भूमिका - प्र ३३३ - ' एकामूर्त्तिस्त्रयो देवाः - ब्रह्मविष्णु-महेश्वराः ' ३३४ - सत्यानुगतः - अक्षरवेद: ३२५ - ‘ त्रिमूर्त्तिः ' - ‘ सत्यम् ' - ' हृदयम् ', और ' त्रयीविद्या ' -- प्रथमखण्ड १५६ | ३४५- ब्रह्मनिः श्वसितवेद 23 १५७ 23 १५८ " इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मन्द्रविष्णुसहकृता - वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ प्राण व्यापः वाक्- सहकृता-वेदनिरुक्तिः ह ३३६ - अमृत - मर्त्य - भावापन्ना प्रकृति का संस्मरण १६३ ३३७- अमृत की अक्षररूपता का समन्वय ३३८ - मृत्यु की क्षररूपता का समन्वय ३३६ - पराप्रकृति के महिमामय पाँच विवर्त्त 23 ( ३४० - प्राणात्मक ऋषितत्त्व II १३४ - भूतपति शिव की लिङ्गात्मिका उपासना ३४२ - श्रानन्दात्मक ब्रह्मा का अनुग्राहक ऋषितत्त्व ३४३ - ऋषितत्त्व, और क्षरप्रधान यजुर्वेद " ३४४ - ' ऋषिर्वेदमन्त्रः ' का संस्मरण " ३४६ - गायत्रीमात्रिकवेद ३४७ - यज्ञमात्रिकवेद ३८ - पितृणां पतिः- विष्णुः ३४६- देवानां पतिः- ब्रह्मा ३५० - भूतानां पतिः - शिवः ३५१ - ज्ञानपति ऋषि ३५२ - क्रियापति देवता ३५३ - श्रर्थपति - भूत ३५४- प्राणात्मक - यजुर्वेद ३५५ - वागात्मक सामवेद् ३६ - अन्नादात्मक - ऋग्वेद ३५७ - ब्राह्मी - संयती - त्रिलोकी का संस्मरण, और तन्निबन्धन - स्वायम्भुववेद ३५८- वैष्णवी - क्रन्द्रसी - त्रिलोकी का संस्मरण, श्रौर तन्निबन्धन सौरवेद ३५६ - रौद्री - रोदसी - त्रिलोकी का संस्मरण, और तन्निबन्धन - पार्थिववेद. ३६० - स्वयम्भू, और ब्रह्मनिःश्वसितवेद ३६१ - सूर्य्य, और गायत्री मात्रिक वेद ३२- पृथिवी, और यात्रिवेद १६३ II 39 39 १६४ " " १६५ इति - वेदनिरुक्तौ प्राणापोवाक्सहकृता - वेदनिरुक्तिः अथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ समष्टिरूपेण - आत्मवेदनिरुक्तिः १० ३६३ - वेदतत्त्व, और तत्सम्बन्धी सच्चिदानन्दघन-आत्मब्रह्म १६६ ४५
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1994 की कलात्रयी ३६४ -- सत्ता -- चेतना - आनन्द - नाम १६६ से अनुप्राणित चितिभाव तदनुगता ३६५ - रसप्रधाना अन्तश्चिति, और " मुमुक्षा तदनुगता ३६६ – बलप्रधाना बहिश्चिति, और सिसृक्षा की आधारमित्ति-३६७ - मुमुक्षा, तथा सिसृक्षा कामना ३६८ - कामनोक्थरूप- मनस्तन्त्र ३६६ - मन की प्रतिष्ठाभूमि हृदय ३७० - हृदयानुगत- सीमाभाव ३७१ - मायानुगत- सीमाभाव ३७२- सच्चिदानन्दपुरुष का सीमाभावत्त्व ३७३ - सीमानुबन्धी- विश्वात्मा ३७४ - विश्वात्मनिबन्धन - षोडशीप्रजापति ३७५ - विश्वप्रविष्ट - गूढोत् ३७६ - अर्थप्रधान - क्षरात्मा, ऋग्वेद और सामवेद ३७७ - क्रियाप्रधान - अक्षरात्मा, और यजुर्वेद ३७८ - ज्ञानप्रधान - अव्ययात्मा, समन्वय 39 ३७६ - समष्ट्यात्मक- वेद - स्वरूप ३८०- समष्टिवेदानुगत परिलेख परिलेख " ३८१ - प्रारणगावात्मक - समष्टिवेद-इति - वेदनिरुतौ विभिन्नभेद-३८३ ( क ) - विज्ञानतत्त्व के अवस्थाकृत भावों का संस्मरण ३८३ ( ख ) - उपाधिकृत भेद - स्वरूप ३८४ - यथार्थज्ञान, समष्टिरूपेण - श्रात्मवेदनिरुक्तिः और तत्स्वरूपाभिव्यञ्जक नामक प्रत्यक्ष - अनुमान- उपमान- शब्द " चतुर्विध - प्रमाण का ३८५ - प्रमाणचतुष्टयी से अनुगत सत्यज्ञान निर्भ्रान्त-संशय - विपयादि से संस्पृष्ट ज्ञानतत्व ३८६ - प्रमाजनक प्रमाण ३८७ - प्रमाण - शब्दनिर्वचन ३८८ - प्रत्यक्षप्रमाण का संस्मरण संस्मरण ३८६ - अनुमानप्रमाण का ३६० - उपमानप्रमाण का संस्मरण ३६१ - शब्दप्रमाण का संस्मरण ३६२ - चिदंश की सर्वव्याप्ति , ३६३ - विश्वव्यापक चैतन्य का स्वरूप- समन्वय और कठोपनिषत् ३६४ - योगमाया का अनुग्रह ३६५ - अन्तःकरणावच्छिन्न चिदात्मा १७१ ३६५ - उक्थ, और अर्कभाव जीवात्मा का ३६६ - वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ- मूर्त्ति -विषयबोध - अशीति-३६७ - चिद्भावानुबन्धी - उक्थ - श्रर्क " नाम के तीन विवर्त - चैतन्य " २६८ - आत्मा, और अन्तःकरणावच्छिन्न अन्तःकरणवृत्यव -३६६ - श्रात्मरश्मियाँ, और " 1 थ - वैज्ञानिकवेदनिक्तौ ४०० - आत्मभोग, और विषयावच्छिन्न - चैतन्य " ब्रह्म - विद्या - वेद - भिन्ना - ज्ञानलक्षणा- " वेदनिरुक्तिः ' शब्दत्रयी का ३८२ - ' वेद'- ' विद्या ' - ' ब्रह्म १७५ संस्मरण स्वरूप - लक्षण ४०१- प्रत्यक्ष का चेतन्यावच्छिन्न -- रूप - प्रमाता " 9 ४०२ - श्रन्तःकरणावच्छिन्न- चैतन्य- प्रमाण " ४०३ - वृत्यवच्छिन्न - चैतन्यरूप स्वरूप ४०४ - अन्तःकरणवृत्ति का दार्शनिक विज्ञान ' ४०५ – अन्तःकरणवृत्तिरूप ' १७५ 11 71 " " " 39 १७६ ४६
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उपनिषद् भूमिका -- प्रथमखण्ड ४०६ - विषयभेदभिन्न ज्ञान से श्रनुगत महिमा - मय-तीन विव १७६ ४-७ - विषयावच्छिन्न - ज्ञान, और तद्रूप ' ब्रह्म ',, और तत्रूप ' वेद ' 39 ४०८ - शब्दावच्छिन्न- ज्ञान, ४०६ - संस्कारावच्छिन्न- ज्ञान, और तद्रूपा ४३१- सृष्टित्रयी में इतर- सम्पूर्ण सृष्टियों का अन्त-भव ४३२ - ज्ञान, तथा क्रिया की श्राधाररूपा प्रतिष्ठा, और अर्थतन्त्र ४३३ - पदार्थ का प्रतिष्ठात्मक स्वरूप - समन्वय ४३४- बिभर्त्ति ज्ञान- तद्ब्रह्म १७८ " ' विद्या ' ४१० - ' त्रयं ब्रह्म ', और ' ब्रह्म ' , ४११ - ' त्रयो वेदाः ', और ' वेद ' ४१२ - ' त्रयी- विद्या ', और - ' विद्या ' ४१३ - ब्रह्म, विद्या, और वेद शब्दों का प्रकारान्तर से स्वरूप- समन्वय ४१४- पाष्टिज्ञान का तात्त्विक स्वरूप समन्वय ४१५ - शब्द, और अर्थ का संस्मरण ४१६- पार्वतीपरमेश्वर से समतुलित शब्दार्थ का अभिन्न सम्बन्ध ४१७ - ' सर्वं शब्देन भासते ' का संस्मरण ४३८ - संस्कार, और शब्द से समन्विता अन्त: -करणवृत्ति ४१ - संस्कारज्ञ।नरूपा वृत्ति का अर्थज्ञानशब्द-ज्ञानमयत्त्व - समर्थन ४२० - ब्रह्म वेद - विद्या- शब्दों का अंशतः परस्पर-पर्य्याय सम्बन्ध ४२१ - तीनों की विजातीयता, एवं प्रांशिक सजा-तीयता का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ४२२ - ज्ञानत्वेन तीनों का भेदप्रतिपादन ४२३ - एकं वा इदं विबभूव सर्वम् ४२४- मुण्डकति का संस्मरण ४२५ - यजुःश्रुति का संस्मरण ४२६- सर्वश - सर्वशक्ति- सर्ववित् - ब्रह्म का संस्मरण ४२७- तथाभूत - ब्रह्म से ब्रह्म, नामरूप, एवं अन्न का प्रादुर्भाव ४२८- ब्रह्मानुगता श्रर्थसृष्टि 29 ४३५ - ' ब्रह्मवै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' 39 १७७ 33 " " १७८ ४३६ - प्रजापति के प्रथम ' ब्रह्म ' विवर्त्त का " तात्त्विक स्वरूप समन्वय ४२७ - नाम - रूपानुग्राहक - शब्दविवर्त्त ४३८ - प्रजापति के नामरूपात्मक द्वितीय - विवत ' का तात्त्विक स्वरूप समन्वय ४३६ - संस्कारावच्छिन्न प्रजापति की अन्नरूपता ४४० - उक्थानुगत अर्कभाव ४४१- श्रात्मानुगत श्रशीतिभाव " ४४२ - ' अशीतिभिर्हि महदुक्थमाध्यायते ' 39 ४४३ – उक्थ, और महदुक्थ शब्दों का तात्त्विक-स्वरूप समन्वय ४४४ - अन्नानुगत- सत्त्व - रज- स्तमोभाव का रहस्या-त्मक समन्वय ४४५ - ' सङ्गात् सञ्जायते कामः ' का पारिभा षिक - समन्वय ४४६ - सुसङ्ग, और कुसङ्ग का समतुलन ४४७ - भैषज्ययज्ञ का संस्मरण ४४८ - प्रजापति के क्रमप्राप्त तीसरे - ' अन्नविवर्त्त ' का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ४४६ - ' ब्रह्म ', और ' प्रतिष्ठातत्त्व ' ४५०- ' नामरूप ', और ' ज्योतिस्तत्त्व ' १७६ 29 99 " 39 " 39 " 33" " 33 १५० " 23 " ४५१ - ' अन्न ', और ' यज्ञतत्त्व ' 39 " ४५२ - समष्टि की ' सर्वरूपता 39 ४५३ - यज्ञात्मक - अन्न, और तनिबन्धन - संस्कारा-" वच्छिन्न- ज्ञान " ४२६ - नामरूपानुगता - शब्दसृष्टि 93 ४३० - श्रन्नानुगता - उभयसृष्टि ४५४ – संस्कारावच्छिन्न ज्ञान, और ' विद्या ' ४५५ - प्रतिष्ठात्मक - ब्रह्म, और तन्निबन्धन - विषय-39 वच्छिन्न- ज्ञान ४७ 39 "
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' १८० ४५ ६ - विषयावच्छिन्न ज्ञान, और ' ब्रह्म शब्दा-४५.७ - ज्योतिर्भावात्मक नामरूप, और वच्छिन्न- ज्ञान ४५८ - शब्दावच्छिन्न ज्ञान, और वेद - भावों की ४५६ - कार्य्यदृष्टि, और ब्रह्म वेद - विद्या विभिन्नता अभिन्नता ४६० - कारणदृष्टि, और तीनों की ४६१ - ' मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' का समन्वय संस्मरण ४६२- महाभूतानुगत विवत ' का ] ४६३ - पार्थिव मृद् विभाग - चतुःषष्टि- [ ६४ ४६४- श्राप्यविभाग - त्रिंशत्- [ ३० ] ६४५ - तेजोविभाग - दश- [ १० ] ६५६ - वायुविभाग - एकोनपञ्चाशत्- [ ४६ ] विषयसूची विभागों में अन्तर्भाव " ४६७-१५८ विभागों का पाँच संस्मरण ४६८ - त्रिवत्करणविद्या का ४६६ - ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ४७० - सर्वं खल्विदं ब्रह्म ४८६ - ब्रह्मात्मिका प्रतिष्ठा ४८८७ - प्रतिष्ठानुगता - सत्ताकला 93 ४८८ - सत्तात्मक ऋग्वेद " ४८६ - नामरूपात्मक - ज्योतिर्भाव ४६० - ज्योतिरनुगता - चेतना - कला 39 ४६१ - चेतनात्मक सामवेद ४६४ - आनन्दात्मक - यजुर्वेद १८१ 39 " I 19 ४६२ - अन्नात्मक यज्ञभाव " 33 ४६३ - यज्ञानुगता श्रानन्दकला सामवेद 19 55 ४६५- ' वेद ' - रूप वेद, और तन्निबन्धन 29 ॠ वेद " ४६६- ' ब्रह्म ' रूप वेद, और तन्निबन्धन ४६७ - ' वाग्ज्योतिरयं पुरुषः ' का समन्वय 93 ४६८ - ' सवं शब्देन भासते ' 29 " I II ४६६ - गद्य - पद्य गेय - भेदभिन्न शब्दविवत्त ५०० - पद्यात्मक - शब्दविवत ', और यजुर्वेद १८२ " ५०१ - गेयात्मक शब्द विवर्त्त, और सामवेद ५०२ - त्रयीवेद का तात्त्विक - समन्वय ५०३ - ' गीतिषु - समाख्या ' का समन्वय " 19 ५०४ - ' विद्या ' रूप वेद, और तन्निबन्धन-" 39 ४७१ - ' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' किन ४७२ - ‘ प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं तत्काय्र्यरूप ४७३ - सदसद्रूप कारणब्रझ, और ब्रह्म - वेद - विद्या - विवत ' ४७४ - भेदसहिविष्णु - श्रभेदसम्बन्ध ४७५ - घटोऽयं मृत्तिकैव ४७६- घटोऽयं मृत्तिकाजन्यः ४७७ - ब्रह्म वेदमीश्वरः ४७८ - त्रिवेयमीश्वरः ४७६ - वेदोऽयमीश्वरः २८० - ब्रह्मदमीश्वरः ४८१ - विद्ये यमीश्वरकृता ४८२-२- वेदोऽयमीश्वरकृतः 39 ऋजुर्वेद ५०५ - संस्कार के जनक 19 ५०६ - संस्कार का दैविध्य " ५०७ - ज्ञानजनिक - संस्कार, और भावना 39 " ५०८- शब्दात्मक - संस्कार का ऋग्वेदत्त्व " " ५०६ - वेदत्रयी का परिलेख १८३ " ४८३ - वेद की परमेश्वररूपता से सभी ४८४ - विभिन्नदृष्टिकोणों के माध्यम 99 तत्त्ववादों का निर्विरोध निरापद - समन्वय ४८५ - ' शास्त्रयोनित्त्वात् ' का मङ्गल - संस्मरण 19 १८१ --५१० - प्रतिष्ठालक्षणे --सत्तात्मके -- ब्रह्मवेदे-39 ऋग्वेदे - वेदत्रयोपभोगः 39 ५११ - ज्योतिर्लक्षणे - चिन्मये --- वेदवेदे - साम-वेदे वेदत्रयोपभोगः " " ५१२ - आत्मलक्षणे -- आनन्दमये - विद्यावेदे- ', यजुर्वेदे - वेदत्रयोयोपभोगः ५१३ - चतुष्पाद्ब्रह्म की कारणरूपता ५१४- उपादानकारणात्मक श्रात्मब्रह्म ५१५ - निमित्तकारणात्मक श्रात्मब्रह्म १८४ "
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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ५१६ - श्रालम्बनकारणात्मक - श्रात्मब्रह्म ६१७- कारणभूत - आत्मब्रह्म से श्रनुगता स्थूलदृष्टि ५१८ - ब्रह्म - नामरूप- अन्न का उपबृंहण, और तद्-रूप विश्व ५१६ - प्रकृतिसिद्ध वेदावतारक का पावन संस्मरण ५२० - श्रात्मानुगत वेद के सम्बन्ध में विभिन्न दृष्टिकोणों का संस्मरण ५२१ - मूलवेद का स्वरूप - दिग्दर्शन- प्रयास, और वेदनिरुक्तियाँ ५२२ - वेदग्रन्थों का वेद से स्पृष्टत्त्व ५२३- वेदतत्त्वप्रतिपादक - शब्दशास्त्रमात्र - अमुक ग्रन्थविशेष 27 ५२४ - प्रकीर्णक - वेदभावों का नामसंस्मरण १८४ इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या - वेद- भिन्ना-ज्ञानलक्षणा आत्मवेदनिरुक्तिः ११ अथ - वेज्ञानिकवेदकिरुक्तौ पर्ववेदनिरुक्तिः- प्रकीर्णभावापन्ना १२ ५२५ - पर्ववेदात्मक - त्रयीवेद ५२६- त्रयीवेद की मूल प्रतिष्ठारूप अग्नितत्त्व " ५२७ - अनन्त - व्यष्टि - गर्भिता समष्टि, और तत् - रूप महाविश्व " " ५२८ - सोमगर्भित अग्नि के द्वारा महाविश्व का स्वरूप- सम्पादन ५२६ - बृहज्जाबालोपनिषत् के द्वारा समर्थन " 37 " १८६ ५३० - शिवरूप अग्नि, और शक्तिरूप सोम की व्यापकता ५३१ - रयि योषा आर्द्र स्नेह - श्राज्य आदि सोम वर्ग १८६३ ५३२- प्रारण वृषा- शुष्क - तेज - पृष्ठ- यदि अग्निवर्ग " ५३३ - वेदमूर्ति विश्वात्मा के अग्नि - सोम - विवर्त ५३४ - श्रत्ता, और श्राद्य का समन्वय " ५३५ - श्राद्यगर्भित अत्ता अग्नि के आधार पर पर्ववेद की स्वरूपाभिव्यक्ति ५३६- पबंधातु, और कनिन् प्रत्यय ५३७ - पर्वशब्द के बिभिन्न निर्वचनों का तात्त्विक-स्वरूप समन्वय ५३८ - पर्व के द्वारा क्षतिपूर्ति, और पर्व का पूर कत्त्व - धर्म्म ५३६- शारीरिक - पर्व, उत्सवात्मक पर्व, अहोरात्रा -नुगत पर्व, श्रादिरूपेण पर्वशब्द की विभिन्ना व्याप्तियों का संस्मरण ५४० - विश्व के क्षतिपूरक उक्थ - पृष्ठ - ब्रह्म - नामक तीन पारिभाषिक - पर्व ५४१- पारिभाषिकी पर्वत्रयी से अनुप्राणित पर्व-वेदत्रयी ५४२- पदार्थों का अग्निमयत्त्व ५४३ - अग्नि की श्रवस्थात्रयी, और उक्थ - पृष्ठ-ब्रह्म त्रयी ५४४ - वस्तु का उपक्रम, और उक्थभाव ५४५ - प्रकाश का उक्थ - दीपार्चि ५४६ - शब्दों का उक्थ वागिन्द्रिय ५४७ - वृष्टि का उक्थ - पद्य ५४८ - श्रोषधि - वनस्पतियों का उक्थ - पृथिवी ५४६- लिपि का उक्थ - लेखिनी ५५० - न्याय का उक्थन्यायाधीश " " 1 II ५५१ - उपदेश का उक्थ श्राचाय्र्यं ५५२ सुलोकों का उक्थ- पुण्य ५५३- श्रधोलोकों का उक्थ- पाप " २६० "