Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 101–110
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
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भाष्यभूमिका परमाकाशलक्षण परमेश्वर के गर्भ में पुराणाकाशलक्षण महेश्वर प्रतिष्ठित है, पुराणकाशलक्षण ५. हेश्वर के गर्भ में भूताकाशलक्षण ईश्वर प्रतिष्ठित है । ईश्वर के गर्भ में प्रजावर्ग प्रतिष्ठित है । चारों का परस्पर दहरोत्तरलक्षण, वसुधानकोशात्मक, अन्तरान्तरीभाव सम्बन्ध है । हमारी अध्यात्मसंस्था में भी तीनों आकाश यों के त्यों प्रतिष्ठित हैं । भूतात्मा शरीराकाश से परिच्छिन्न है, अन्तरात्मा हृदयाकाश से परिच्छिन्न है, परात्मा हराकाश ( दभ्राकाश ) से परिच्छिन्न है । परमाकाश ही दहराकाश है, पुराणाकाश ही हृदयाकाश है, भूताकाश ही शरीराकाश है । कहने को शरीराकाश के भीतर हृदयाकाश है, सर्वान्तरतम दहराकाश है । परन्तु यह ‘ भीतर ’ भाव केवल ' सूक्ष्मभाव ' का ही ज्ञापक है | शरीराकाश स्थूल, इससे सूक्ष्म किन्तु विशाल हृदयाकाश, सर्वसूक्ष्म, सर्वविशाल दहराकाश । परमाकाश का ज्ञानात्मा से सम्बन्ध माना जा सकता है, पुराणाकाश का कर्मात्मा से सम्बन्ध माना जा सकता है, एवं भूताकाश का भूतात्मा से सम्बन्ध माना जा सकता है । ज्ञानात्मा परमेश्वर है, कम्मरमा महेश्वर भूतात्मा ईश्वर है, यही उपनिषदों में ' सर्वभूतान्तरात्मा ' नाम से व्यवहृत हुआ है । परमाकाशलक्षण ज्ञानवेद परमेश्वरलक्षण ज्ञानात्मा का ' विज्ञानवेद ' है । पुराणाकाशलक्षण कर्म्मवेद महेश्वरलक्षण कर्मात्मा का ' यज्ञवेद ' है । एवं भूताकाशलक्षण अर्थवेद ईश्वरलक्षण सर्वभूतान्तरात्मा का ' प्रजावेद ' है! यही आकाश-लक्षण वेद का पूर्वोक्त आत्मविवर्त्तो के साथ दूसरा दृष्टि - समन्वय है । १ - श्रानन्दः २ - विज्ञानम् { परमाकाशात्मा - परमेश्वरः - ज्ञानात्मा मनोमयः, अनन्तवेदाधिष्ठाता । ३- मनः १- मनः २- प्राणः २ पुराणाकाशात्मा - महेश्वरः - कर्मात्मा प्राणमयः, दिव्यवेदाधिष्ठाता । ३- वाक १- वाक २- श्रापः ३- अग्निः २ भूताकाशात्मा - ईश्वरः - भूतात्मा वाङ्मयः, गायत्री मात्रिक वेदाधिष्ठाता । * १- परमाकाशः ( दहराकाश: ) - तन्मयोऽनन्तवेदः - पारमेश्वरः । २- पुराणाकाशः ( हृदयाकाशः ) तन्मयो दिव्यवेदः - माहेश्वरः । ३- भूताकाशः ( शरीराकाश: ) - तन्मयो भूतवेदः - -ऐश्वरः । III
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द्वितीयखण्ड १ - प्राग्वाग्गर्भितो मनोमयवेद: -- श्रनन्तवेदो ज्ञानात्ममहिमा ( मनःप्राणवाङ्मयः ) । २ - मनोवागूगर्भितः प्राणमयवेदः - - दिव्यवेदः कर्मात्ममहिमा ( मनः प्राणवाङ्मयः ) 1 ३- मनःप्राणगर्भितो वाङ्मयवेदः --भूतवेदो भूतात्ममहिमा ( मनः प्राणवाङ्मयः ) । परब्रह्म से सम्बन्ध रखने वाले, परब्रह्म की महिमारूप इन तीनों वेदविवत्तों के दो विभाग बतलाना ही प्रकृत परिच्छेद का मुख्य उद्देश्य है । एवं वे दोनों विभाग क्रमशः * परब्रह्मवेद, शब्दब्रह्मवेद ' नामों से प्रसिद्ध है | जिन तीन वेदविवर्त्तो का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, विज्ञान – यज्ञ - प्रजात्मक उन नीनों वेदों की समष्टि ही महिमा लक्षण ' परब्रह्मवेद ' है । इस परब्रह्मवेद का, जोकि श्रात्मरूप है, ईश्वररूप है, प्रतिपादन करने वाला शब्दराशिरूप शब्दग्रन्थ ही ' शब्दब्रह्मवेद ' है । परब्रह्मवेद उसी श्रात्मा की अन्त-महिमा है, शब्दब्रह्मवेद ( वेदशास्त्र ) उसी आत्मा की हिम्र्म्महिमा है, जैसा कि - ' सर्वे वेदा यनुपदमामनन्ति ' इत्यादि कठश्रुति से प्रमाणित है । परमाकाश का यद्यपि परात्पर से सम्बन्ध है, परात्पर असीम है, विश्वातीत है । इधर पूर्व में ग्रात्मा के जिन तीन तन्त्रों का दिग्दर्शन कराया गया है, वे तीनों हीं महामाया, योगमाया -सीमा मे सम्बन्ध रखते हुए, विश्वचर हैं । ऐसी परिस्थिति में आनन्द - विज्ञान - मनोमय ज्ञानात्मा के साथ परमाकाशलक्षण अनन्तवेद का मम्बन्ध बतलाना यद्यपि समीचीन प्रतीत नहीं होता । तथापि मनस्तन्त्रात्मक यह ज्ञानात्मा ( अव्ययात्मा ), और नन्त्रातीत वह परमेश्वर, दोनों अभिन्न हैं, अतएव ' परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम ' इत्यादि श्रुतियाँ इस अव्यय -लक्षण ज्ञानात्मा की ( सच्चिदानन्दघन ब्रह्म की ) उस विश्वातीत परात्पर के साथ अभिन्नता बतला रही है । एकमात्र इसी आधार पर हमने ज्ञानात्मा को परमाकाशलक्षण मानते हुए परमाकाशलक्षण ज्ञानवेद का इसके साथ सम्बन्ध मान लिया है । जैसा कि पूर्व में कहा गया है, वाक् और आकाश, दोनों तादात्म्यभावापन्न हैं, अविनाभूत हैं । वाङ्मयवेद, वाङ्मय आकाश, वस्तुगत्या दोनों एक वस्तुतत्त्व है । क्योंकि आकाश तीन हैं, अतएव तद्रूप वाङ्मयवेद के भी तीन ही विवर्त्त हो जाते हैं । परमाकाशलक्षण ' परमेश्वर ' नामक ज्ञानात्मा की महिमा परमाकाशलक्षण ज्ञानवेद है, और यह ' अनन्त ' है, अतएव इसे हम ' अनन्तवेद ' नाम से व्यव करेंगे । पुराणाकाशलक्षण ' महेश्वर ' नामक कम्र्म्मात्मा की महिमा इन्द्राकाशलक्षण कर्म्मवेद है, एवं यह सहस्र-पर्णात्मक ' दिव्यवेद ' है । यह अमृतधर्म्म से, देवभावविकास का मूल प्रवर्त्तक होने से ' अपौरुषेय है, इसे ही ' ब्रह्मनिःश्वसित ' कहा जाता । सूर्य्य से ऊपर इस वेद की प्रधानता है । भूताकाशलक्षण ' ईश्वर ' नामक सर्वभूतान्तरात्मा की महिमा भूताकाशलक्षण अर्थवेद हैं, एकत्रल्शात्मक यही पौरुषेय ' गायत्रीमात्रिक ' वेद है । इस प्रकार अनन्त, दिव्य, गायत्रीमात्रिकरूप, परमाकाश - पुराणकाश - भूताकाशलक्षण, मनोमय - प्राणमय-* द्व े
ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
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भूमिका वाङ्मय, विज्ञानात्मक - यशप्रवर्तक - प्रजाप्रवर्त्तक, इन तीनों वेदों को हम अवश्य ही आत्मा की महिमा कह सकते हैं । इन्हीं तीनों महिमावेदों का पूर्व के अनन्तवेद का विज्ञेय इतिवृत्त, अनन्तवेद का दुर्विज्ञेय इतिवृत्त, अनन्तवेद का विज्ञेय इतिवृत्त, इन तीन परिच्छेदों में क्रमशः निरूपण हुआ है । प्रकृत में इस उक्त की पुनरुक्ति का केवल यही तात्पर्य्य है कि, मनःप्राणवाङ्मय श्रात्मा की महिमालक्षण ये तीनों वेद भी मनःप्राणवाङ्मय ही हैं । अनन्तवेद प्राणवागूगर्भित मनोमय है, दिव्यवेद मनोवागूगर्भित प्राणमय है, एवं गायत्रीमात्रिक़वेद है । इसी तीसरे वेदविवर्त्त को लक्ष्य में रखकर कहा गया है - ' वाविवृताश्च वेदाः ' । मनःप्राणगर्भित वाङ्मय ' शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिच्छति ' का रहस्य यही है कि - परब्रह्मवेद, शब्दब्रह्मवेट, दोनों एक ही आत्मवाक के विभिन्न दो विवर्त्त हैं । मनःप्राणवाङ्मय परब्रह्म का तीसरा वाकू भाग अर्थ, शब्द-भेद से दो भागों में विभक्त है । ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ( शत ० १०/५/३ | १ 1 ) इस रहस्य-श्रुति के अनुसार यह आत्मवाक अग्नि ( ब्रह्माग्नि ) रूप है । इस अग्निलक्षणा वाकू से ही तो परब्रह्मलक्षण-अर्थवेद का विकास हुआ है, एवं इसी से शब्दब्रह्मलक्षण शब्दवेद का विकास होता है । अग्नि के ही ' अग्नि, शब्द ' ये दो रूप हैं । श्राग्नेय वागविवर्त्त विज्ञानवेद है, यही परब्रह्मवेद है, यही वैज्ञानिक नित्यवेद है, यही नित्य कूटस्थ अपौरुषेयवेद है । शाब्दिक वागविवर्त्त शब्दवेद है, यही शब्दब्रह्मवेद है, यही वेदशास्त्र है । ग्राग्नेय वेद अपौरुषेय है, वेदशास्त्र पौरुषेय है । इस प्रकार अर्थ - शब्द भेद से उस आत्मा की वाकू - महिमा दो भागों में विभक्त होकर द्विविधवेद की अधिष्ठात्री बन रही है । स्वयं आत्मा ग्रात्मा है, विज्ञानवेद, शास्त्रवेद, दोनों आत्ममहिमा हैं । श्रात्मम हिमालक्षगणा यह वेद-द्वयी आत्मा का शरीर है । विज्ञानवेद इसी आत्मा का सूक्ष्म शरीर है, सूक्ष्ममहिमा है, अन्तर्महिमा है । शास्त्र-वेद इसी आत्मा का स्थूलशरीर है, स्थूलमहिमा है, बहिर्म्महिमा है । स्थूलशरीरवत् तत्सम शास्त्रवेद अनित्य है, कृतक है, पौरुषेय है, युग - युग के अन्त में उत्पन्न होने वाला है । सूक्ष्मशरीरवत् तत्सम विज्ञानवेद नित्य है, कृतक है, अपौरुषेय है । अपौरुषेयवेद ही पौरुषेयवेद की प्रतिष्ठा है । परब्रह्म ही शब्दब्रह्म का आलम्बन है । यही कारण है कि जो पर्वविभाग विज्ञानात्मक उस अपौरुषेयवेद के हैं, ठीक वे ही, उतने ही शास्त्राविभाग शब्दात्मक इस पौरुषेयवेद के हैं, जैसाकि आगे के प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । इस सम्बन्ध में यही कहते हुए. हमें प्रकृत परिच्छेद का उपसंहार कर देना है कि, मनः प्राण - वाङ्मय आत्मा की वाक्--महिमा के अर्थ - शब्द भेद से वेद भी अर्थ - शब्द भेद से दो भागों में विभक्त हो रहा है । यही आत्महिमा -लक्षण द्विविधवेद का संक्षिप्त निदर्शन है । १८ चेदविद्या के संस्थाविभाग-वेदविद्या परब्रह्मलक्षण नित्य विज्ञान वेद, एवं शब्दब्रह्मलक्षण शब्दवेद, भेद से दो भागों में विभक्त है, यह पूर्वपरिच्छेद में स्पष्ट किया जा चुका है । इसी विधा - भेद से वेदमन्त्र भी दो ही भागों में विभक्त माननें पड़ेगे । विज्ञानात्मक मन्त्रों का एक विभाग है, तत् प्रतिपादक शब्दात्मक मन्त्रों का एक विभाग है । विज्ञानात्मक मन्त्र तत्त्वात्मक हैं, एवं शब्दात्मक मन्त्र तत्त्वात्मक मन्त्रों के रहस्यप्रतिपादक हैं । ' ऋषिर्वेदमन्त्रः ' के अनुसार मनोवागूगर्भित स्वयं प्राणात्मक ऋषि ही तत्त्वरूप वेदमन्त्र है | अग्नितस्क ६६
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द्वितीयखण्ड ही वेदतस्व है | अग्नितत्त्व क्योंकि अवस्थात्रयी से अग्नि, वायु, इन्द्र, भेद से तीन भागों में विभक्त है | श्रुतएव तत्त्वात्मक ये मन्त्र भी ऋकू - यजुः साम भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । इन तीनों तत्त्वात्मक मन्त्रों का प्रतिपादन करने वालीं जिन मन्त्रसंहिताओं में जो ऋक् यजुः - साम - मन्त्र पठित हैं, वे शब्दात्मक मन्त्र हैं | शब्दात्मक मन्त्र सर्वसाधारण में प्रसिद्ध हैं, तत्प्रतिपादित तत्त्वात्मक मन्त्रों का दिग्दर्शन निम्नलिखित शब्दात्मक मन्त्र कर रहा है -" रूपं रूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तंन्वं परि स्वाम् । त्रिर्यदिवः परिमुहूर्त्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा " । -ऋक्स ० ३।५३ | ८ | धिदैविक जगत् में इन्द्रत्तत्त्व क्या काम करता है १, प्राध्यात्मिक जगत् में क्या विशेषता उत्पन्न करता है?, आधिभौतिक जगत् में क्या अतिशय उत्पन्न करता है?, एवं वैधयज्ञ में इसका क्या उपयोग है?, प्रकृत ऋङ्-मन्त्र इन चारों प्रश्नों का समाधान करता हुआ इन्द्रस्वरूप का ही स्पष्टीकरण कर रहा है । अपनी श्रास्तिक-निष्ठा को सुरक्षित रखने के लिए पहिले पाठकों को सर्वश्री सायणसम्मत अर्थ पर ही दृष्टि डाल लेनी चाहिए । " मघवा धनवानिन्द्रः रूपं रूपं यद्यद्रूपं कामयते तचद्रूपं बोभवीति तत्तद्रूपात्मको भवति तत्र कारणमुच्यते - मायाः अनेकरूपग्रहणसामर्थ्यपेताः कुण्वानः कुर्वाणः स्वां तन्वं स्वकीयांत परिपञ्चम्यर्थे स्वस्माच्छरीरान्नानाविधानि शरीराणि निर्मिमीते यद्वा स्वां तनूं नानाविधरूपोपेतां करोति तथा च मन्त्रवर्णः - ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप: ईयते ' इति । यद्यस्मात् स्वैम्र्म्मन्त्रैः स्त्रकीयैः स्तुतिलक्षणेर्वाक्यै राहूतः अनृतुपाः न केवलं ॠतुष्वेव पिबति किन्तु अनृतुष्वपि बहुशः सोमं पिबन्नित्यर्थः ऋतावा सत्यवान् तादृश इन्द्रः दिवः स्वर्गलोकात् परिमुहूर्त्तमेकस्मिन्नेव मुहूर्त्ते नानादेशवचिंषु यज्ञेषु तत्रापि त्रिः त्रिसवनेषु आग त् अग-च्छति । बोभवीति भवतेर्यङ्लुकि तिपि यङोवेतीडागमः निघातः । अगात इणो लुङि रूपं पद्श्च योगाद निघातः ” -- ३५३५६ साः भी ० । श्रविकलरूप से उद्धृत उक्त सायणीय मन्त्रभाष्य का तात्पर्य यही है कि, " धनसम्पत्ति से युक्त होने के कारण ही इन्द्र ‘ मघवा ' कहलाए हैं । ये मघवा इन्द्र अपने यथेच्छुरूप बना सकते हैं । जब जिस रूप ( ग्राकार ) की इच्छा करते हैं, तत्काल तद्रूप में परिणत हो जाते हैं । कारण यही है कि, अनेक रूपग्रहण में समर्थ माया के इन्द्र ही सञ्चालक हैं | इसी माया से इन्द्र अपने अनेक शरीर बना लिया करते हैं । यज्ञकर्त्ता के स्तुतिलक्षण मन्त्रों की पुकार पर इन्द्रदेवता तत्काल बिना ऋतु के भी सोमपान करने यज्ञ में चले आते हैं । ये इन्द्र सत्य-बान् है | ऐसे ये इन्द्र स्वर्गलोक से एक ही क्षण में भिन्न भिन्न प्रदेशों में होने वाले यज्ञ में, प्रत्येक यज्ञ के तीन तीन सवनों में श्राया करते हैं " । ६६
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भाष्यभूमिका इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि इन्द्रत्तत्त्व से सम्बन्ध रखने वाले चेतनविध अभिमानी इन्द्रदेवता यज्ञ-कर्मों में अपने विभिन्नरूपों से स्तुतिमन्त्रों से आहूत होकर सोमपान करने के लिए आया करते हैं, एवं अभीष्ट यज्ञफल प्रदान किया करते हैं । और इस यज्ञकर्म की दृष्टि से सर्वश्री सायण ने मन्त्र की जो यज्ञपरक व्याख्या की है, वह सर्वथा श्रादरणीय भी है । परन्तु यज्ञकर्म के व्याज से विश्वविज्ञान का स्पष्टीकरण करने वाले इन मन्त्रों का केवल यज्ञव्याख्या पर ही विश्राम नहीं माना जा सकता । अवश्य ही प्रत्येक वेदमन्त्र यज्ञकर्म के साथ साथ आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक विवत्तों के गुप्त रहस्यों का भी स्पष्टीकरण कर रहा है । पहिले ग्राधिदैविक इन्द्र के स्वरूप का ही विचार कीजिए । संसार में रूपतत्त्व वर्णरूप, तथा ग्राकाररूप, भेद से दो भागों में विभक्त है । इन में चतुष्कोण, घटकोण, समकोण, विप्रमकोण, वर्तुल, दीर्घ, आदि आकाररूपों को ही ' वयोनाघ ' कहा जाता है, यही पूर्व परिच्छेदों में ' छन्द ' नाम से व्यवहृत हुआ है । छन्दोमय इस प्रकाररूप का अधिष्ठाता ' त्वष्टा ' नामक प्राण-विशेष है, जैसाकि ' त्वचा रूपाणि पिंशतु ' ( ऋ ०१० | १८४ | १ | ) इत्यादि वचन से स्पष्ट हैं । दूसरा वर्णरूप है । इसके शुक्ल, कृष्ण, ये दो प्रधान विवर्त्त हैं । अवान्तर सात सामान्य विवर्त्त हैं, सातों के सम्मिश्रणतारतम्य से उत्पन्न अनन्त विवर्त्त है । इन सब वर्णरूपों का विकास सूर्य्यमण्डलस्थ ( सूर्य्यरश्मिस्थ ) मघवा नामक इन्द्रप्रागा से ही हुआ है । प्रत्येक वरूप इन्द्रप्राण से सम्बद्ध है । इन्द्रप्राण ही रश्मिसहयोग के द्वारा वर्ण-ग्राहक पदार्थों की योग्यता के तारतम्य से तत्तद्वरणों का विकासक बनता है । इन्द्र के इसी स्वाभाविक कर्म्म को लक्ष्य ' रखकर ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' कहा गया है । इसके अतिरिक्त योगमायाओं का विस्तार भी इसी इन्द्र का काम है । पूर्व परिच्छेद में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, शुन नामक इन्द्र ही पुराणाकाश है, यही दिव्यवेद है, यही सहस्रबशेश्वर मायी महेश्वर की महाविभूति है । मायोपाधिक यही शुन इन्द्र अपने महामायामय पुर में योगमायाओं के द्वारा खण्ड - खण्डरूप में परिणत होता हुग्रा आरम्भ में सहस्र रूप धारण करता है, आगे जाकर ' सहस्रधा महिमानः सहस्रम् ' के अनुसार प्रत्येक रूप के रश्मिवितानलक्षण ( प्राणवितानलक्षण ) सहस्र सहस्र रूप हो जाते हैं । त्र्यक्षर-विद्या के अनुसार ' द ' अक्षर का इन्द्र से सम्बन्ध माना गया है । खण्डनार्थक ' दो ' धातु की ओर संकेत कराने वाला दकाराक्षर ही खण्डनधर्म्मा इन्द्रतत्त्व का वाचक है । एक के अनेक रूप हो जाना ही खण्डन है, यही एक की अनेक रूप से व्याकृति है, व्याकृति ही व्याकरण है, इन्द्रतत्त्व ही इस व्याकरण के प्रथम प्रवर्त्तक हैं । ध्वनिरूपा वाक को योगमायाओं के द्वारा क च ट त - पादिरूप से खण्ड खण्ड रूपमें परिणत करना इसी प्रज्ञा-लक्षण इन्द्र का काम है । पश्वादि में यह उन्मुग्ध रहता है, अतएव उनमें वर्णवाक का विकास न होकर केवल ध्वनिवाकू ही प्रतिष्ठित रहती है । अदितिमण्डल के गर्भ में प्रतिष्ठित एक ही मरुत्त्वान् वायु को ४६ खण्डों में परिणत कर देना इसी इन्द्रत्तत्त्व का काम है । पूर्व पूर्व मायासीमात्रों का विध्वंस, उत्तर उत्तर माया-सीमाओं का आविर्भाव, यह सब इसी इन्द्र के कर्म्म हैं । इन मायोपाधियों से यह स्वयं ही अनेक खण्डों में विभक्त होता है । इन्द्र के इसी दूसरे स्वाभाविक धर्म्म को लक्ष्य में रख कर - ' मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम् ' यह कहा गया है । आध्यात्मिक दृष्टि से विचार कीजिए । इन्द्र ही विज्ञानात्मरूप से अध्यात्मसंस्था का श्रायु: -स्वरूपरक्षक बन रहा है । सूर्य्यकेन्द्र और ब्रह्मरन्ध्र, दोनों का स्पर्श करता हुआ प्राणरश्मिमय एक महापथ ७०
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द्वितीयखण्ड वितत है | इस महापथ के द्वारा सूर्य से ब्रह्मरन्ध्र पर्य्यन्त, ब्रह्मरन्ध्र से सूर्य्यकेन्द्र पर्य्यन्त यह आयुः स्वरूप-रक्षक इन्द्रप्राण एक मुहूर्त्त तीन बार आता - जाता है । यही इस इन्द्र का अहरहर्यज्ञ है । इसी से हमारी स्वरूपरक्षा है । उस महापथ मेंवेदमन्त्र प्रतिष्ठित हैं, एवं इन्हीं मन्त्रों के द्वारा इन्द्र का अध्यात्मसंस्था से सम्बन्ध होता है | यही ऐसी जटिल समस्या है, जिसे स्पष्ट करना कठिन है । पृथिवी और सूर्य्य, दोनों के पदार्थ दोनों में आते - जाते रहते हैं । इस प्रदान - विसर्ग कर्म का धरातल यही तत्त्वात्मक वेदमन्त्रधरातल है । तत्त्वात्मक पार्थिववेद के साममन्त्रों का, एवं तत्त्वात्मक सौरवेद के साममन्त्रों का परस्पर अतिमान होता है । पृथिवी के रथन्तर साम के साथ सूर्य के बृहत्साम का, पृथिवी के वैरूपसाम के साथ सूर्य्य के वैराजसाम का, एवं पृथिबी के शाक्वरसाम के साथ सूर्य के रैवतसाम का प्रतिमान होता है । इस प्रतिमान से दोनों के साम-मण्डल परस्पर श्रोतप्रोत हो जाते हैं । दोनों के महिमामण्डल एक दूसरे में भुक्त हो जाते हैं । महिमा में पिण्डगत प्राण वितानरूप से प्रतिष्ठित रहते हैं । इन मण्डलों की भुक्ति से तत्तन्मण्डलगत तत्तत् प्राण परस्पर सम्बद्ध हो जाते हैं । वितानात्मक सामवेद ही प्रकृत में ' मन्त्रैः ' से गृहीत हैं । क्योंकि ऋङ् मन्त्र छन्दोरूप से स्व-स्थान में प्रतिष्ठित रहते हैं, यजुर्म्मन्त्र रसरूप से महिमामय साम- मन्त्रों के अनुगत रहते हैं । इन्हीं के द्वारा इन्द्र का यहाँ, अग्नि का वहाँ, उसका हमारे साथ, हमारा उसके साथ सम्बन्ध होता है । इसी तत्त्वात्मक मन्त्ररहस्य को लक्ष्य में रख कर ‘ त्रिर्यद्दिवः परिमुहूर्त्त मागात् स्वैर्मन्त्रैः ' यह कहा गया है | हृदयभाव से सम्बन्ध रखने वाला, अतएव सत्यधर्मा इन्द्र ' अनृतु है । ऋत अग्नि एवं ऋतसोन की समष्टि ही ' ऋतु ' है, क्योंकि इन्द्र सत्य है, अतएव ऋतलक्षण ऋतुमर्य्यादा से पृथक् रहता हुआ वह ' अनृतु ' है । यह अनृतु ( सत्यमूर्ति ) इन्द्र ऋतसोम का पान करने से ' अनृतुपा ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा हैं । प्रत्येक भौतिक पिण्ड ' सहृदयं सशरीरं सत्यम् ' के अनुसार सत्यात्मक है । यह सत्यमर्थ्यादा वेदमूर्त्ति इन्द्र सत्य पर ही अवलम्बित है । अपनी इस सत्यमर्थ्यादा को सुरक्षित रखने के लिए प्रत्येक सत्यपिण्ड को.. ( सत्यपिण्डस्थ सत्य इन्द्र को ) ऋत का अनुगमन करना पड़ता है । पिण्ड के चारों ओर का प्रदेश ऋत है, इसमें प्रतिष्ठित श्राप्य - वायव्य - सौम्य प्रारण ऋत है । इनके समन्वय से ही अनृतुपा इन्द्र भौतिकसृष्टि की प्रतिष्ठा बन रहा है । इसी आधिभौतिक कम को लक्ष्य में रखकर " अनृतुपा ऋतावा " यह कहा गया है । तात्पर्य्य कहने का यही है कि, तत्त्वात्मक वेदमन्त्र अपौरुषेय वेदमन्त्र हैं, एवं इन तत्त्वात्मक अपौरुषेय वेदमन्त्रों का रहस्य बतलाने वाले शब्दात्मक वेदमन्त्र पौरुषेय वेदमन्त्र हैं । तत्त्वमन्त्र रहस्यगर्भित शब्दमन्त्र-समष्टि ही वेदविद्या है । इस वेदविद्या की ग्राहकव्यक्ति की योग्यता के तारतम्य से पाँच संस्था हो जाती हैं । शब्दात्मक वेदमन्त्रों को केवल पारायण की वस्तु मानते हुए, कौत्स के शब्दों में ' अनर्थका हि म त्राः ' यह भावना रखते हुए जो महानुभाव केवल वेदपारायण में ही वेदविद्या की कृतकृत्यता समझ बैठते हैं, उनका तो किसी संस्था से सम्बन्ध नहीं है । यही नहीं, तत्त्वार्थशून्यवादी इन पारायण भक्तों की तो स्वयं श्रुति ने यह कहते हुए निन्दा ही की है कि, जो वेदमन्त्रों का अर्थ नहीं जानता, वह केवल शुष्क स्थाणु है, वृथा भार-वाही है । जो अर्थज्ञ है, वही तदनुरूप वर्त्तन से सकलभद्र का भोक्ता चनता हुआ परलोक में सद्गति प्राप्त करता ७१
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भाष्यभूमिका
- स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् ।
योऽथंज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥
पारायणलक्षणा मन्त्रभक्ति को, एवं तद्भक्तपरम्परा को प्रणाम कर वेदविद्या से सम्बन्ध रखने वाली पाँच संस्थाओं की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । इन पाँचों विद्यासंस्थाओं को क्रमशः " मन्त्रविद्या, अतरविद्या, दृष्टिविद्या, यज्ञविद्या, सिद्धविद्या " इन नामों से व्यवहृत किया जायगा । शब्दात्मक वेदमन्त्रों में तत्त्वात्मक जिस विद्या का निरूपण हुआ है, वही मन्त्रविद्या है । इस मन्त्रविद्या को जानने ' वाला, मन्त्रगत तात्त्विक अर्थों का सम्यक् परिज्ञान रखने वाला व्यक्ति ही ' मन्त्रवित् ' कहलाएगा । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि, सार्थवेद का स्वाध्याय करने वाला ' मन्त्रवित् ' कहलाएगा, एवं इसका यह अर्थज्ञान ही ' मन्त्रविद्या ' कहलाएगी । और इस मन्त्रविद्या ( मन्त्रार्थ ) वित् को ' ब्राह्मण ' कहा जायगा । तत्त्वात्मक मन्त्र का ही नाम ' ब्रह्म ' है, इस ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मवित् ही मन्त्रवित् है, यही ब्रह्म ( मन्त्र ) वेत्ता ब्राह्मण है । यही वेदविद्या की पहिली संस्था है । निम्न लिखित उपनिषच्छ्र ति इसी मन्त्रविद्या की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है -" ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि, यजुर्वेद, सामवेदं, आथर्वणं चतुर्थ, इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं, पित्र्य राशि, दैवं निधि, वाकोवाक्यमेकायनं, देवविद्यां भृतविद्यां क्षत्रवियां, नक्षत्र विद्यां, सर्प - देवयजन विद्यां, एतद्भगवोऽध्येमि । सोऽहं “ मन्त्रवित् ” एवास्मि, नात्मवित् इति । तरति शोकमात्मवित् इति सोऽहं भगवः शोचामि । तं मां भगवान् शोकस्य पारं तारयतु " इति । ( छान्दोग्य उप ० ७।१।२।३ ) । शब्दात्मक मन्त्रों के द्वारा अर्थात्मक ( तत्त्वात्मक ) मन्त्रों का परिज्ञान ही कर्म्मप्रवृत्ति का श्रेयः -कारण बनता है । यद्यपि बिना अर्थज्ञान के भो केवल मन्त्रोच्चारण से इतिकर्तव्यता का यथानुरूप अनुगमन करता हुआ ब्राह्मण वेदविद्यासापेक्ष यज्ञादिकम्मों को सफल बना लेता । तथापि जो विद्वान् ब्राह्मण इन मन्त्रों के, ब्राह्मण - सूत्रग्रन्थप्रदर्शित इतिकर्तव्यतासम्पादक पुरुषार्थ, क्रत्वर्थ कम्मों के तात्त्विक अर्थ को जानकर, विद्या- श्रद्वा - उपनेत्रपूर्वक कम्भों का अनुगमन करता है, उस विद्यायुक्त ब्राह्मण का विद्यात्मक यह कर्म्म कहीं अधिक वीर्य्यवत्तर होता है, जैसा कि - ' यदेव विद्यया करोति, श्रद्धयोपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ” ( छान्दोग्योपनिषत् १।१।१० ) इत्यादि उपनिषच्छ्र ुति से स्पष्ट है । अतएव शब्दवित् की अपेक्षा मन्त्रवित् ( विद्यावित् उपनिषद्वित्, रहस्यवित् ) ब्राह्मण, और मन्त्रवित् ब्राह्मण का विद्यासापेक्ष कर्म, दोनों विशेष महत्त्व की वस्तु मानी जायँगी । मन्त्रसापेक्ष ( विद्यासापेक्ष ) यह कर्म्म प्रवृत्ति - निवृत्ति भेद से दो भागों में विभक्त है । केवल वेदविद्या में आसक्त होते हुए, वेदवादरत बनते हुए, वेदालम्बनभूत आत्मा की उपेक्षा करते हुए, वेदमूलक विश्व– सम्पत्तियों में आसक्ति रखते हुए जो कर्म्म किया जायगा, वह ' प्रवृत्तिकर्म्म ' कहलाएगा । एवं ग्रात्मा को लग्वन बनाते हुए, परमार्थ - भावना से निष्कामबुद्धया कृत कर्म्म ' निवृत्तिकम्मे ' माना जायगा । प्रवृत्तिक ७२
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द्वितायखण्ड मन्त्रविद्या ( वेदविद्या ) को प्रधान आलम्बन मानता हुआ ' मन्त्रकर्म ' कहलाएगा, एत्रं निवृत्तिकर्म्म आत्म-विद्या ( अक्षरविद्या ) को मूल बनाता हुआ ' आत्मकर्म्म ', किंवा ' अक्षरकर्म्म ' माना जायगा । श्रात्मवञ्चिता वेदविद्या वेदविद्या का एक विभाग है, इसी का प्रवृत्तिकर्म से सम्बन्ध है । एवं श्रात्मानुगता वेदविद्या वेदविद्या का एक विभाग है, इसी का निवृत्तिकर्म से सम्बन्ध है । प्रवृत्तिकर्मानुबन्धिनी वेदविद्या परा-विद्या है, निवृत्तिमनुबन्धिनी अक्षरानुगता वही वेदविद्या पराविद्या है । वस्तुतः वेदविद्या श्रात्ममहिमा होने से पराविद्या ही है । केवल प्रवृत्तिभाव के समावेश से जब इसकी आत्मम्मों से ( अक्षरधम्मों से ) वियुक्ति, एवं क्षरधम्मों में नियुक्ति हो जाती है, तो अपर - क्षरधर्म की प्रधानता से यही परा अपराविद्या बन जाती है । इस प्रकार मन्त्रविद्या के ही परा - अपरा भेद से दो विभाग हो जाते है । परालक्षणा वेदविद्या अक्षरविद्या कहलाती है, परालक्षणा वेदविद्या मन्त्रविद्या कहलाती है । मन्त्रविद्यानुगामी ब्राह्मण क्षरासक्ति के अनुग्रह से न तो ऐसे वेदतत्त्व - परिशीलन से ही शान्ति प्राप्त कर सकता, एवं न तदनुबन्धी काम्यकम्मों से ही इसका शोक निवृत्त हो सकता । शोकनिवृत्ति, और शान्तिलाभ इसी मन्त्रविद्या से तत्र सम्भव है, जबकि श्रात्मदृष्टि को लक्ष्य में रखते हुए इस मन्त्रविद्या का अनुगमन ( तत्त्वपरिशीलन ) किया जाय, ज्ञान को मूल बना कर विज्ञानपथ का अनुगमन किया जाय, एवं ज्ञानसहकृता मन्त्रविद्या से ही कर्मानुगमन किया जाय । निष्कर्ष यह निकलता कि, श्रात्ममहिमालक्षणा मन्त्रविद्या के ही ' परा - अपरा ' दो भेद हैं । अपरा वेद-विद्या मन्त्रविद्या है, परा वेदविद्या अक्षरविद्या, किंवा आत्मविद्या है । इस विद्या का अनुगामी आत्मवित् हैं, ' अक्षरवित् है | यही शोकात्यन्तनिवृत्ति में समर्थ बनता है । ऐसे अक्षरवित् को ' रेभ ' कहा जाता है | मन्त्रवित् नहीं ‘ ब्राह्मण ' कहलाएगा, वहाँ श्रात्मवित् ' विप्र ' कहलाएगा, जिसके लिए कि श्रुति में ' रेभ ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । इसी अक्षरविद्या का विश्लेषण करते हुए महर्षि ङ्गिरा कहते हैं— " द्वे विद्ये वेदितव्ये, परा च वापरा च । तत्र अपरा - ऋग्वेदो, यजुर्वेदः, सामवेदो, ऽथर्ववेदः, शिक्षा, कल्पो, व्याकरणं, निरुक्त, छन्दो, ज्योतिषमिति । अथ परा, यया तदक्षरमधिगम्यते । यत्तदनिर्दे श्यमग्राम गोत्रमवर्णचतुःश्रोत्रं, तदपाणिपादं नित्यं, विभु ', सर्वगं, सुसूक्ष्मम् । तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः-थोर्णनाभिः रजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥ - मुण्डकोपनिषत् १ । १ । ४६ । मन्त्रविद्या का अनुगामी ब्राह्मण तत्त्ववित् है, अक्षरविद्या का अनुगामी विप्र श्रात्मवित् है । तात्पर्य्य यही है कि, अपनी विज्ञानदृष्टि से तत्त्वपरिशीलन करने वाला, तदनुसार प्रवृत्तिकर्म में प्रवृत्त रहने वाला ब्राह्मण मन्त्रवित् है | विज्ञानदृष्टि से तत्त्वपरिशीलनपूर्वक श्रात्मभावना रखते हुए परार्थभावना से निष्कामबुद्धया क ७३
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भाष्यभूमिका में प्रवृत्त रहने वाला विप्र अक्षरवित् है । दोनों ही एक प्रकार से सामान्यकोटि में प्रविष्ट हैं । ग्रत्र एक तीसरा विभाग ऐसा है, जिसका ' योगदृष्टि ' से सम्बन्ध है, जोकि दृष्टि ' आर्षदृष्टि ' - ' अतीन्द्रियदृष्टि ' ' दिव्यदृष्टि ' आदि नामों से प्रसिद्ध है | शब्दात्मक मन्त्र से तत्त्वात्मक मन्त्र का अनुमानतः स्वरूप जान लेना, इन्द्र ऐसा है, वायु यह है, अग्नि यह है, इस प्रकार शब्दाधार पर तत्त्वों का सामान्य परिज्ञान प्राप्त कर लेना एक विभाग है । इन तत्त्वों का अपनी आर्षदृष्टि से प्रत्यक्ष कर लेना स्वतन्त्र विषय है । मन्त्रों में जिन तत्त्वों का निरूपण हुआ है, उन तत्त्वों का अपनी योगदृष्टि से प्रत्यक्ष करने वाले महापुरुष ही ' साक्षात्कृतधर्म्मा ऋषि ' कहलाए हैं । इनकी यह दृष्टि ही तीसरी दृष्टिविद्या कहलाई है । परोक्षार्थों को अपनी दृष्टि से देखने वाले इन्हीं महर्षियों नें तत्त्वात्मक मन्त्रवेद का सर्वप्रथम साक्षात्कार किया है । उन्होंनें ही उस तत्त्वामक वेदमन्त्र का शब्दमन्त्रों के द्वारा गुम्फन किया है, जैसा कि निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट हो रहा है—
१ - " युगान्ते ऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥
२ – अनागतमतोतञ्च वर्त्तमानमतीन्द्रियम् ।
विप्रकृष्टं व्यवहितं सम्यक् पश्यन्ति योगिनः ॥
३ - श्रविभूतप्रकाशानामनुप प्लुतचेतसाम् ।
अतीतानागतज्ञान ' प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥
४ — अतीन्द्रियानसंवेद्यान् पश्यन्त्यार्षेण चक्षुषा । ये भावा वचनं तेषां नानुमानेन बाध्यते ॥ " ५ –'साक्षात् कृतघर्माण ऋषयो बभूवुः । तेऽवरेभ्योऽसाक्षात्कृतधर्म्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे बिल्म ग्रहणायेमं ग्रन्थं समाम्नासिषुर्वेदं च व ेदाङ्गानि च " ( यास्कः ) । ६– “ ऋषिदर्शनात् ” । स्वयं वेदतत्त्व का ही नाम ' ऋषि ' है । इसका जिसने प्रत्यक्ष किया है, वह द्रष्टा ऋषि है, वही अपने दृष्टऋषि ( तत्व ) के सम्बन्ध में अन्यतम प्रमाण है । वेदपदार्थ के स्वरूपज्ञान के सम्बन्ध में ' ऋषि ' शब्द भी एक जटिल समस्या है । कहीं ऋषि को वेद कहा जाता है, कहीं ऋषि को वेदवित् कहा जाता है, कहीं ऋषि को मन्त्रपति कहा जाता है । इन सब जटिलताओं के निराकरण के लिए आगे का ' वेद का ऋषि पदार्थ ' नामक परिच्छेद पाठकों के सम्मुख उपस्थित होने वाला है । अभी इस सम्बन्ध में केवल यही वक्तव्य है कि, तत्त्वात्मक वेदमन्त्र का दृष्टि से प्रत्यक्ष कर उससे यथाकाम व्यवहार करने वाले ही ' ऋषि ' कहलाए हैं । यही वेदविद्यासम्बन्धिनी तीसरी दृष्टिविद्या 1 ७४
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द्वितीयखण्ड श्रार्षेयदृष्टि से सम्पन्न, श्रतीन्द्रिय अर्थों के प्रत्यक्षवत् द्रष्टा जिन महापुरुषों नें - यज्ञप्रक्रियाविशेष से तत्तत् प्राणदेवता का अपने मानुषात्मा में आाधान किया था, इस देवाधान से जिन भौम स्वर्गवासियों नें सूर्य्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, वरुण, आदि उपाधियाँ प्राप्त कीं थीं, वे ही पुरुषपुङ्गव ' देवता ' ( भौम मनुष्य देवता ) कहलाए थे । प्राकृतिक प्राणदेवताओं में जो शक्तियाँ, जो सामर्थ्य, जो धर्म हैं, वे सब इनमें विद्यमान थे । अतएव इन्हें उन उन प्राणदेवताओं के ही नाम से व्यवहृत किया गया । सर्वसाधारण में रहने वाले मानुषात्मा १ अतिरिक्त यज्ञातिशयलक्षण दैव आत्मा इनमें विशेष था, जिसका कि – “ देवो वा अस्य स श्रात्मा, मानुपोऽयम् " इत्यादिरूप से स्पष्टीकरण हुआ है । यही वेदविद्या का यज्ञविद्यात्मक चौथा संस्था-विभाग है | यच्चयावत् यज्ञों के द्वारा यच्चयावत् प्राणदेवताओं को श्रात्मसात् करने वाले, श्रतएव सर्वमूर्ति, सर्व-मूर्द्धन्य पुरुषपुङ्गव ही ' ब्रह्मा ' नाम से प्रसिद्ध थे, जिस पद को कि सर्वप्रथम आदि मनु स्वयम्भू ब्रह्मा ने सुशोभित किया था । सर्वसिद्धिलक्षणा, श्रतएव ' सिद्ध विद्या ' नाम से प्रसिद्ध यही वेदविद्या का पांचवा संस्था-विभाग माना जायगा । इस प्रकार मन्त्रार्थपरिज्ञान, मन्त्रार्थपरिज्ञानपूर्वक अक्षरज्ञान, तत्त्वसाक्षात्कार, तत्त्वाधान, सर्वतत्त्वा-धान, भेद से एक ही वेदविद्या की मन्त्रविद्या, अक्षरविद्या, दृष्टिविद्या, यज्ञविद्या, सिद्धविद्या, भेद से पाँच संस्थाएँ हो जातीं हैं । इन पाँचों के अनुवायी क्रमशः ' ब्राह्मण, रेम, ऋषि, देवता, ब्रह्मा ' इन नामों के प्रसिद्ध हुए हैं । १ – मन्त्रविद्या ( ५ ) - शब्दार्थमयी - तन्मया ब्राह्मणाः । २ - श्रतरविद्या ( ४ ) - श्रात्मानुगता - तन्मया रेभाः ( विप्रा वा ) । ३ - दृष्टिविद्या ( ३ ) - तत्त्वसाक्षात्काररूपा - तन्मया ऋषयः । ४ – यज्ञविद्या ( २ ) –तत्त्वावानलक्षणा - तन्मया भौमदेवाः । ५ – सिद्धविद्या ( १ ) - सर्वतत्त्वाधानलक्षणा - तन्मया भौमत्रह्माणः । १६ - वेद का ' ऋषि ' पदार्थ-- * -ऋषि, पितर, देव, असुर, गन्धर्व, पशु आदि सभी वैदिक पदार्थ वर्त्तमान युग में इसलिए एक पहेली वन रहें हैं कि, इनका तात्त्विक, प्राणात्मक स्वरूप वेदस्वाध्यायपरम्परा की विलुप्ति से विलुप्त हो चुका है । इन तत्त्वात्मक ऋषि - पितर - देवादि प्राणविशेषों के स्वरूपज्ञानाभाव से ही तत्त्वात्मक वेदशास्त्र केवल पुण्यपाठ की सामग्री रह गया है, परलोक का प्रमाणपत्रप्रदाता बना दिया गया है । यही कारण है कि, श्राज के इस तत्त्वान्वेषण-युग में जब हम संसार के सामने वेदशास्त्र की चर्चा उठाते हैं, तो शिक्षित समाज का अन्तर्जगत् क्षुब्ध - सा हो पड़ता है । उसकी दृष्टि में वेदशास्त्र, तदनुगत स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, आदि की समष्टिरूप भारतीय शास्त्र तत्त्ववादशून्य केवल पारलौकिक सुखानुगत स्वा'न जगत् है, जिसका कि ऐहलौकिक कर्मकलाप में न तो कोई उपयोग ७५