Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 91–100

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100

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द्वितीयखण्ड तीन प्रजापति, तीनों के तीन वेद, एवं तीनों से क्रमश: वेद, यज्ञ, प्रजाभावों का विकास, यही दूस दृष्टि है, जिसका कि पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । अत्र व्यष्टिरूप से प्रजापति के स्वरूप का विचार करते हुए व्यष्टयात्मक वेदतत्व की मीमांसा कीजिए । “ यद्वै किन प्राणि, स प्रजापतिः ” ( शतब्बा ० ११।१।६।१७ । ) इस लक्षण के अनुसार प्राणात्मक पदार्थ ही प्रजापति है । चराचर विश्व में ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो प्राणा-त्मक न हो, जिसमें प्राण न हो । अतएव यच्चयावत् व्यक्तियों को हम एक एक स्वतन्त्र प्रजापति मानने के लिए तैयार हैं । प्रत्येक पदार्थ की अभिव्यक्ति हो रही है । यह अभिव्यक्तित्त्व ही तत्तत् पदार्थों का व्यक्तित्त्व है, व्यक्तित्त्व ही ' व्यक्ति ' है, व्यक्ति ही पदार्थ है । क्योंकि प्रत्येक पदार्थ अभिव्यक्तिलक्षण व्यक्तित्त्व से युक्त है, अतएव प्रत्येक पदार्थ को ' व्यक्ति ' कहा जाता है । व्यक्तिरूप से ही पदार्थ की अभिव्यक्ति हो रही है । किंवा अभिव्यक्ति ही व्यक्तिभाव की परिचायिका बन रही है । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति प्राणात्मिका है, अतएव पूर्वोक्त लक्षगणानुसार — ‘ इयमेकैका व्यक्तिः प्रजापतिः ' यह कहा जा सकता है । इसी आधार पर प्रजापति के ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं कि ' ( शत ० प्रा ० १३ | ३ | २ | ६ | ) - ' सर्वमुह्येवेदं प्रजापतिः ” ( शत ० ब्रा ० ५।१।१।४ । ) ये भी लक्षण किए जाते हैं । स्वयं मन्त्रश्रुति ने भी निम्नलिखित रूप से इन्हीं लक्षणों का समर्थन करते हुए विश्वान्तर्गत पदार्थमात्र को प्रजापतिस्वरूप ही माना है——

प्रजापते! न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव ।

यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥

–यजुः सं २३।६५ ॥

व्यक्तियों का आनन्त्य सर्वसम्मत है । अनन्त अभिव्यक्तियों, अनन्त व्यक्तियां, प्रत्येक व्यक्ति प्रजापति, प्रत्येक प्रजापति वेदमूर्ति, अतएव - ' अनन्त प्रजापति ', और " अनन्ता वै वेदा: " । इस व्यक्तिलक्षण, वेदात्मक, प्रजापति के स्वरूपज्ञान के लिए हमें थोड़ी देर के लिए देवयुगकाल से भी पूर्वयुग में अपनी सत्ता रखने वाले साध्ययुग की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना पड़ेगा । साध्ययुग में सृष्टिविद्या के सम्बन्ध में * सदसद्वाद, रजोवाढ, व्योमवाद, अहोरात्रवाद, आवरणवाट, देववाद, आदि १२ वाद प्रचलित थे । इन १२ वादों में से [: मुप्रसिद्ध आवरणवाद ही व्यक्तित्त्वानुगत प्रजापति के स्वरूप का स्पष्टीकरण कर रहा है । आवरणवाद के अनुसार - ‘ सर्वमिदं वयुनम् ' ही मुख्य सिद्धान्त है । चेतन, जड़, पशु, पक्षी, देवता, पितर, सूर्य्य, चन्द्रमा, प्रत्येक पदार्थ ' वयुन ' है । वयुन का ही नाम व्यक्ति है । इस वयुनलक्षण व्यक्ति की ही अभिव्यक्ति होती है । अभिव्यक्ति के आलम्बनभूत इस वयुन में ' वय - वयोनाघ ' भेद से दो पर्व रहते हैं, जिनका कि वयुनात्मक प्रत्येक पदार्थ में प्रत्यक्ष किया जा सकता है । किसी भी वस्तुपिण्ड को आप अपनी दृष्टि के सामने रख लीजिए । वस्तुपिण्ड में आपको वस्तु का ' आकार ' और आकार विशेष से प्राकारित ' वस्तु, ये दो पर्व उपलब्ध होंगे । अवश्य ही प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई बाह्य आकार हुआ करता है, जिसके आधार पर वस्तुस्वरूप का हमें परिज्ञान हुआ करता । इसी बाह्य आकार को ' वयोनाघ ' कहा जाता है । * इन १२ वादों का वैज्ञानिक विवेचन ' गीताविज्ञानभाष्यभूमिका ' तृतीयखण्ड के ' ब्रह्मकर्म्मपरीक्षा ' प्रकरण में देखना चाहिए । ५७

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भाष्यभूमिका इस वयोनाधरूप परिच्छेद ( सीमाभाव, ग्राकार ) से परिच्छिन्न ( सीमित, आकारित ) जो वस्तुपिण्ड है, वही ' वय ' है । जिस प्रकार उदर में अन्न प्रतिष्ठित रहता है, एवमेव यह वस्तुपिण्ड वयोवाध के गर्भ में अन्नवत् प्रतिष्ठित रहता है, अतएव इसे वय ( अन्न ) कह दिया गया है । यह स्मरण रखना चाहिए कि, वय और अन्नशब्द पर्य्याय नहीं है । आप अन्न को कभी वय नहीं कह सकते । केवल भक्तिसादृश्य को लेकर ही वथ को अन्न मान लिया गया है । इस वय को चारों ओर से सीमित बनाए रखना, चारों ओर से बद्ध रखना बाह्य आकारलक्षण उसी परिच्छेद का काम है, अतएव उसे ' वयोनाथ ' ( वय को बांधने वाला ) कहना अन्वर्थ बनता है । ' वयोनाथ ' से परिच्छिन्न वय ( वस्तु पिण्ड ) में ' भूत, प्राण ' भेद से दो वस्तुतत्त्वों का समावेश रहता है । प्रत्येक भौतिक पिण्ड वय है, प्रत्येक वय में भूत, प्राण, दोनों प्रतिष्ठित हैं । प्राण ही भूतभाग की प्रतिष्ठा बना हुआ है, जो कि प्राणभाग ' शक्ति ' नाम से व्यवहृत हुआ है । शक्तिलक्षण प्राण ' रूप - रस- गन्ध - स्पर्श-शून्योऽधामच्छदः - कश्चन तत्त्वविशेषः प्राणः ' लक्षण के अनुसार यद्यपि चर्म्मचक्षु का विषय नहीं बनता, तथापि इसकी सत्ता अवश्य ही स्वीकार करनी पड़ती है । भूतपिण्ड अनेक परमाणुओं ( क्षरपरमाणुओं ) का संघ है । इस क्षरकूट को एकसूत्र में बद्ध कर पिण्डरूप में परिणत रखने वाला कूटस्थ अक्षरप्राण ही है, जोकि अपने इसी विधरणधर्म से ' विधर्त्ता ' नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार दृश्य भूतपिण्ड के अतिरिक्त वयरूप वस्तुपिड में प्रारण की सत्ता ओर मान लेनी पड़ती है । जिस दिन भूतपिण्ड इस प्राण से पृथक् जाता है, उस दिन इसके स्वरूप का ही उच्छेद हो जाता है । प्राण ही आदान- विसर्गात्मिका क्रिया के रूप से भूतपिण्ड की रक्षा का कारण बना हुआ है । प्राण क्रियामय है, क्रिया बिना कामना के असम्भव है, कामना बिना ज्ञान के असम्भव है, ज्ञान का उक्थ ‘ मन ' है । फलतः प्राण के साथ साथ एक तीसरे मनस्तत्त्व की ( ज्ञानमूर्ति, श्वोवसीयस् नामक अव्यय-मन की, जो कि जड़ - चेतन सत्र में प्रतिष्ठित है ) सत्ता और स्वीकार कर लेनी पड़ती है । मन सर्वालम्बन है, यही आत्मा है, यही उक्थ है, यही अव्यय है । इस पर प्राण ' हित ' है, यही प्राण है, यही अर्क है, वही अक्षर है । इस पर भूतपिण्ड ‘ उपहित ' है, यही वाक् है, यही अशीति ( अन्न ) है, यही क्षर है । अशीतिलक्षण व।कभाग भूतपिण्ड है, यह प्राण का अन्न बना हुआ है, अतएव इसे ' वय ' कहना अन्वर्थ बनता है । यही प्राण का अन्न बनता हुआ ' पशुभाग ' है । ' यदपश्यत्, तस्मात् पशुः " ( शत बा ० ६।११।२ । ) के अनुसार क्योंकि अन्नरूप यही भूतभाग हमारी दृष्टि का विषय बनता है, अतएव इसे ' ' शु ' कहना भी अन्वर्थ बनता है | यह पशुरूप वाङ्मय ( क्षरमय ) भूतपिण्ड प्राणरूप अर्क से बद्ध है, अतएव प्राण को ' पाश ' कहना भी अन्वर्थं बनता है । पाशलक्षण प्राण के द्वारा केन्द्रस्थ उक्थलक्षण मन इस पशुलक्षण भूतभाग का भोक्ता बन रहा है, अतएव इसे ' पशुपति ' कहना भी अन्य बनता है । इस प्रकार क्योनाथ से सीमित भूत-पिण्डरूप वय में वाङ्मय भूत, प्राण, मन, तीनों भावों की सत्ता सिद्ध हो जाती हैं । इसी आधार पर अब हम व्यक्तिलक्षण प्रजापति के - - " आत्म - प्राण - पशुसमष्टिः प्रजापतिः " - " मनः - प्रारण - बाक्समणिः प्रजा-पतिः ” – “ उक्थार्काशीतिसमष्टिः प्रजापतिः " - इत्यादि लक्षण कर सकते हैं । निष्कर्ष यही निकला कि, प्रत्येक पदार्थ में ' पदार्थ ', और उसका ' आकार ' ये दो पर्व हैं । आकार वयोनाध है, पदार्थ वय है, इस वयोरूप पदार्थ के ' भूत - प्राण - मन ' ये तीन पर्व हैं । चारों की समष्टि ही प्रत्येक पदार्थ का व्यक्तित्त्व है, प्रत्येक व्यक्ति एक एक स्वतन्त्र प्रजापति है । १८

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द्वितीयखण्ड यह स्पष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि, वयोनाध, और वय, दोनों में से ' वय ' ही हमारे उपयोग में आया करता है । कारमात्र से हमारा तबतक कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता, जबतक कि उस आकारा-कारित वस्तु के साथ हम अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ लेते । ' रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ' के अनुसार वयोनाधसीमित वयोरस की प्राप्ति से ही तृप्तिलक्षण आनन्द का उदय होता है । भावप्राप्ति ही रसप्राप्ति है, रसप्राप्ति ही तृप्ति है, तृप्ति ही शान्ति है, शान्ति ही आत्मलक्षण आनन्द है । तात्पर्य कहने का यही हुआ कि, वय - वयोनाध की समष्टि ही ' वस्तु ' है । इसी वस्तु को ' वयुन ' कहा गया है । ' सर्वमिदं वयुनम् ' के अनुसार प्रत्येक वस्तु वयुनलक्षण है । प्रत्येक वयुन में एक एक वयोनाध है, तीन तीन वय, किंवा त्रिप एक एक वय है, चारों की समष्टि ही ' सर्वम् ' है -- ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' ( शाङ्खायनब्रा ० १।२।५ ) इम अनुगमन का यहाँ भी समन्वय किया जा सकता है । वय को थोड़ी देर के लिए छोड़ कर वयोनाध पर दृष्टि डालिए । याज्ञिक परिभाषा के अनुसार यही ' छन्द ' नाम से व्यवहृत हुआ है । वयोनाध से वस्तुस्वरूप प्राकृत रहता है, छन्दित रहता है, अतएव इसे ‘ छन्द ' कहना अन्वर्थ बनता है । भूतपिण्ड को वाङ्मय बतलाया गया है । इस वाकू को ( वाङमय भूतपिण्ड को ) एक विशेष परिमाण से युक्त कर देने वाला, वाक् को एक विशेष ढङ्ग से युक्त कर देने वाला वाकूं का परिमाण छन्द है । अतएव वैज्ञानिकों नें छन्द का - ' वाक्परिमाणं छन्द: ' यह अर्थ किया है । यह वाकतत्त्वर्थ, एवं शब्द भेद से दो भागों में विभक्त है । अतएव छन्द भी अर्थछन्द, शब्दछन्द भेद से दो ही भागों में विभक्त हो जाते हैं । गायत्री, त्रिष्टुप् जगती, विराट् पङ्क्ति, अनुष्टुप् बृहती, उभिएकू, ककु, मा, प्रमा, प्रतिमा, आदि जितने भी वैदिक छन्द हैं, प्रत्येक दो दो भागों में विभक्त है । अर्थात्मक छन्द अर्थरूपा वाकू से सम्बद्ध है, शब्दात्मक छन्द शब्दरूपा मन्त्रवाक से सम्बद्ध है । दोनों समान धारा से प्रवाहित हैं । यही कारण है कि यथानुरूप शब्दन्द के प्रयोग से शब्दवाक पकड़ में आ जाती है, इसके द्वारा अर्थछन्द गृहीत हो जाता है, छन्द के द्वारा छन्दित प्राणदेवता गृहीत हो जाता है । मन्त्र से कैसे प्राणदेवता आत्मसात् हो जाते हैं?, जपात् कैसे सिद्धि मिल जाती है?, इन प्रश्नों का यही मौलिक समाधान है । शब्द छन्द का विचार आगे किया जायगा, पहिले अर्थवृन्द का ही समन्वय कीजिए । मनःप्राणवाङ्मय एक ही प्रजापति अनन्त जातिरूपों में, प्रत्येक ' जाति ' अनन्त व्यक्तिरूपों में, प्रत्येक ‘ व्यक्ति ' अनन्त श्रवयवरूपों में, प्रत्येक ' अवयव ' अनन्त परमाणुरूषों में कैसे परिणत हो गए १, इसका उत्तर यही छन्द है, यही छन्दोभेद है । पानी पानीरूप से समान था, परन्तु समुद्र, नद, नदी, वापी, कूप, कलश, आदि छन्दोंभेद से एक ही पानी भिन्न भिन्न नाम - रूप- कम्मों में परिणत हो रहा है । समुद्रछन्द से छन्दित पानी का रूप भिन्न है, नाम भिन्न है, गुण भिन्न है, कर्म्म भिन्न है । मिट्टी मिट्टी रूप से समान थी, परन्तु पृथिवी, शरीर, घट, उदशराव आदि छन्दों के भेद से इसके अनेक रूप हो गए हैं । बल्शेश्वरप्रजापति एक था, किन्तु परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, नक्षत्र, आदि छन्दों के भेद से उस एक ही के अनन्त रूप हो गए । स्वयम्भू, वही स्थिमसादि । किन्तु श्राकार लक्षण मनुष्य, पशु- पक्षी भेद से इस एक ही के अनेक रूप बन गए हैं । वही सुवर्ण, किन्तु कटक, कुण्डल, आदि भेद से इस एक ही के अनेक रूप हो गए हैं । वही शरीर, किन्तु हाथ, पैर, उदर, मस्तक, ग्रीवा, स्तन, श्रोत्र, चक्षु, आदि छन्दों के भेद से एक ही के अनेक अवयव हो गए हैं । निदर्शन-मात्र है । विश्व में, विश्वपदार्थों में, विश्वव्यक्तियों में जो नाम - रूप - कर्म का पार्थक्य उपलब्ध होता है, ५६

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भाष्यभूमिका परस्पर भेदप्रतीति हो रही है, उसका एकमात्र कारण छन्दोभेद ही है । सबका अपना अपना निराला छन्द ( ढँग ) है, अपना अपना निराला आकार है । अपना अपना निराला परिमाण है । और यही परिमाणभाव, साध्य-भाषानुसार श्रावरणभाव अनन्त सृष्टि के आनन्त्य का मूल है, जिसके कि आधार पर उनका ' आवरणवाद ' प्रतिष्ठित हुआ है । जब तक छन्द हैं, तभी तक सृष्टि है, चाहे वह छन्द स्वछन्द हो, अथवा परछन्द । छन्दः-स्वरूप की प्रात्यन्तिक निवृत्ति में छन्दित वस्तु छन्दस्क बनती हुई सीम के गर्भ में विलीन हो जाती है, नाम रूप का परित्याग हो जाता है, और — परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति " । छन्द से छन्दित वस्तु को हमने ‘ वय ' कहा है, एवं इस वय के वाङ्मय दृश्य भूतपिण्ड, प्राण, मन, ये तीन पर्व बतलाए हैं । इन तीनों पर्वों से क्रमशः मन से वस्तुपिण्ड के रूप का ( श्राकाररूप का, एवं कृष्ण - शुक्ल - रक्त- नील- पीत - हरितादि वर्णरूप का ) प्राण से कर्म्म का, वाकू से नाम का विकास हुआ है । मनः - प्राण - वाक् की समष्टि ' अस्ति ' है, रूप - कर्म्म नाम की समष्टि प्रस्तियुक्त दृश्य पिण्ड है । दृश्यपिण्ड मर्त्य है, अस्तिभाव अमृत है । अमृत-मर्त्य ' की समष्टि ही पर्वा वस्तुपिण्ड है, एवं इसका स्वरूपरक्षक वही ' छन्द ' है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो रहा है । प्रत्येक व्यक्ति ' वयुन ', प्रत्येक वयुन में वयोनाध - वय, ये दो पर्व, प्रत्येक वय में मनः - प्राण - वाकू - रूप-कर्म्म — नाम भेद से ६–६ पर्व, पट्पर्वा वय ही वास्तव में रसात्मक पदार्थ, यह वयोनाधरूप छन्द से छन्दित, एवं दोनों की / रस और छन्द की ) समष्टि ही प्रजापति, यह पूर्व में स्पष्ट किया गया । इसी सम्बन्ध में इतना और स्पष्ट कर लीजिए कि, नाम - रूप - कर्म - तीनों तो मर्त्य हैं, एवं मनः- प्राण वाक्, इन तीनों अमृतरूपों में से तीसरा वाकतत्त्व अमृत —– मर्त्य भेद से दो भागों में विभक्त है । अमृतावाकू चितेनिधेय है, मर्त्याचाकू चित् है । चित्य, मर्त्य ', भूतप्रधाना वाक् से तो स्पृश्य वस्तुपिण्ड का स्वरूपनिर्माण होता है, एवं चितेनिधेय, अमृत, प्राणप्रधाना वाक् से दृश्य वस्तुमहिमा का वितान होता है । प्रत्येक वस्तुपिण्ड के केन्द्र से इसके अमृत-वाङ्मय वषट्कारमण्डल के आधार पर उस मनोगर्भित प्राण का बड़ी दूर तक वितान होता है T । वही वितान-मण्डल वस्तु का बाह्य रूप कहलाता है । हम इसी का प्रत्यक्ष करते हैं । वस्तुपिण्ड केवल स्पृश्य है, इसे हम छु भर सकते हैं, देख नहीं सकते । वस्तुमहिमामण्डल दृश्य है, इसे हम देख भर सकते हैं, छू नहीं सकते । जिसे छू सकते हैं, उसे देख नहीं सकते, जिसे देख सकते हैं, उसे छू नहीं सकते, जैसा कि पाठक लागे की वेदनिरु-क्तियों में देखेंगे । अभी इस सम्बन्ध में केवल यही ज्ञातव्य है कि, वयोनाधलक्षण छन्द से छन्दित वय के ही ' पिण्ड, प्राण ' भेद से दो वित्र ' हो जाते हैं । चित्यवाङ्मय स्पृश्यपिण्ड भूतप्रधान प्राणगर्भित वय है, चिते-निधेय वाङ्मय दृश्य महिमा प्राणप्रधान भूतगर्भित वय है । रसरूप वय के चित्य ( पिण्ड ), चितेनिधेय ( महिमा ) भेद से तदभिन्न वयोनाधलक्षण छन्द भी दो भागों में विभक्त हो जाता है । पिण्डछन्द ' छन्द ' कहलाया है, महिमाछन्द ' वितान ' कहलाया है । वितान-रूप छन्द से वय का महिमाभाग छन्दित रहता है, छन्दोरूप छन्द से वय का पिण्ड भाग छन्दित रहता है । बाह्य आकार को छन्द कहा गया है । यह आकार केवल भातिमिद्ध पदार्थ है । भावात्मक पदार्थ को चारों ओर से सीमित बना देने वाला भातिसिद्ध, अतएव श्रभावात्मक तत्व ही छन्द है । दिक् - देश - काल, ये तीनों भातिसिद्ध पदार्थ हैं । इनसे अवच्छिन्न पदार्थ ही छन्दोयुक्त पदार्थ है । पिण्डलक्षण वय भूतात्मा है, प्राणलक्षण वय प्राणात्मा है, वितानात्मा है । छन्दोलक्षण छन्द पिण्डलक्षण वय का ' पद ' ६०

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( ६०, तथा ६१ के मध्य में ) ( १ ) - अभिव्यक्तित्त्वाधारभूत - ' वथुन ' परिलेख: -इयम के का अभिव्यक्ति ' वय वयुनमा सर्वमिदं व वय प्रां वां नाकरू वय के. सा2-वय पर्मम के ण: म. - वयनः प्राम नाकरुवा वय ध प्रजापति व्यक्तिरेव ******* वय -म वय वव्यक्ति अभिव्यक्तिरे श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, दुर्गापुरा ( जयपुर ) इयमेकैका व्यक्तिरभिव्यक्तिः - प्रजापतिः - वयुनम् १. मनः २. प्रारण: ३.. वाक् रूपम् ( 1 ) कर्म्म ( २ ) नाम ( ३ ) अस्ति अयम अमृतम् पर्त्यम् ३ ३ व छान्दितम् यः यो धः ना छन्दः

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' द्वितीयखण्ड है, वितानलक्षण छन्द. महिमालक्षण वय का ' पुनः पद ' है । छन्दोलक्षण छन्द प्रथम छन्दन है, वितानलक्षण छन्द द्वितीय छन्दन है । छन्दोलक्षण छन्दः सीमा में प्राणमय अन्न ( प्राणगर्भित चित्य वाकूपिण्ड ) प्रतिष्ठित है, वितानलक्षण छन्दःसीमा में अन्नमय प्राण ( चित्यवाक् गर्भित अमृतप्राण ) प्रतिष्ठित है । इस प्रकार षयोनाध, वय भेद से प्रारम्भ में द्विपर्षा बना हुवा वयुन वयोनाधलक्षण छन्द के छन्द, वितान, रस, भेद से त्रिपर्वा बन जाता है । रसात्मक वय एक पर्व है, छन्दोरूप छन्द एक पर्व है, एवं वितानरूप छन्द एक पर्व है । छन्दोरूप छन्द ' छन्द ' है, वितानरूप छन्द ' वितान ' है, उभयविध छन्दों से छन्दित मर्त्य - अमृतरस-मूर्ति वय ( वस्तु ) ' रस ' है । ' छन्द, वितान, रस ' तीनों की समष्टि ' वयुन ' है । प्रत्येक व्यक्ति एक एक वयुन ' प्रत्येक वयुन एक एक स्वतन्त्र प्रजापति है – “ प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किन " । वस्तु का क्या स्वरूप है १, उसमें कितने पर्व हैं?, यह उक्त व्यक्तिस्वरूपविवेचन से भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है । प्रत्येक वस्तु में अवश्य ही छन्द ( पिण्डसीमा ), वित्तान ( बहिर्म्मण्डलसीमा ), रस ( पिण्ड - मण्डलमध्यवर्त्ती वस्तुसत्त्व ), तीन भावों को सत्ता मान लेनी पड़ेगी । तीनों की समष्टि को वयुन कहना पड़ेगा, एवं यही वयुन ' त्रयीवेद ' माना जायगा । व्यक्ति का छन्दोभाग ' ऋग्वेद ' है, वितानभाग ' सामवेद ' है, एवं रसभाग ‘ यजुर्वेद ' है । वैज्ञानिक परिभाषा में छन्दोमय ऋग्वेद को ' उक्थ ' कहा जाता है, चित्तानलक्षण सामवेद को ' आर्चिक ' कहा जाता है, एवं रसात्मक यजुर्वेद को ' ब्रह्म ' कहा जाता है । वस्तुगत छन्द ही उक्थलक्षण ' ऋक् ’ है, वस्तुसम्बन्धी वितान ही आर्चिकलक्षण, किवा सामलक्षण ' साम ' है, एवं वस्तुगत इस ही ब्रह्मलक्षण ‘ यजुः ' है, जिनका कि मौलिक रहस्य आगे जाकर स्पष्ट होने वाला है । त्रयीवेदसमष्टि ही वन है, व व्यक्ति है । व्यक्ति अनन्त, अतएव वेद भी अनन्त । अनन्त की इस अनन्त - बेदमहिमा के स्वरूपज्ञान के लिए हमें अन्य दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए । छन्दः- { ऋक् -२ उक्थम् - वयोना at वितानम्-- साम -२ किम { सर्वमिदं वयुनम एस: -- २ यजुः -२ ब्रह्म १-२ वयः १७- आत्मम हिमालक्षणं द्विविध वेद-व्यष्टिलक्षण प्राजापत्यवेद का स्पष्टीकरण करते हुए यह बतलाया गया है कि, वयोनाधलक्षण छन्द से बन्दित पिण्डात्मक वत्र छन्द का ' पद ' है, एवं महिमात्मक वत्र छन्द का पुनःपद है । अत्र एक दूसरी दृष्टि से पद - पुनःपद - भावों का विचार कीजिए । ज्योतिर्मय पदार्थ का यह स्वभाव है कि, वह सदा अपनी महिमा के केन्द्र में ही प्रतिष्ठित रहता है । उदाहरण के लिए ज्योतिर्मय सूर्य - चन्द्रमा को ही लीजिए । सूर्य्य स्वज्योति-र्मय वस्तु पिण्ड है, चन्द्रमा परज्योतिर्भय वस्तुपिण्डं है । सूर्य्य की ज्योति अपनी प्रातिस्त्रिक ज्योति है, एवं चन्द्रमा की ज्योति सूर्य्यज्योति है । ' इत्था चन्द्रमसो गृहे ' ( ऋकसं ० ११८४ | १५ | ) के अनुसार सौररश्मियों में हीं ६ ९

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चन्द्रापेण्ड को ज्योतिर्मय बना रखा है । सूर्य्यपिण्ड के केन्द्र से निकल कर रश्मियाँ बडी दूर तक व्याप्त हैं, इसी प्रकार चन्द्रपिण्ड भी चन्द्रिका मे नित्य युक्त है । सौरज्योतिर्म्मण्डल सूर्य्य का महिमामण्डल है, इसके केन्द्र में सूर्य प्रतिष्ठित है । चान्द्रज्योतिर्म्मण्डल चन्द्रमा का महिमामण्डल है, इसके केन्द्र में चन्द्रमा प्रतिष्ठित है | यही महिमामण्डल ' पुनः पद ' ' विश्वरूप ' ' बहिः पृष्ठ ' ' बहिर्म्मण्डल ' इत्यादि अनेक नामों से व्यवहृत हुआ है । स्वयं सूर्य - चन्द्रपिण्ड ' पद ' है, यही ' अन्तः पृष्ठ ' ' आभ्यन्तरमण्डल ' इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है, यही ग्रात्मा की अन्तर्महिमा है । सूर्य्य - चन्द्र के केन्द्र में रहने वाला उक्थलक्षण हृद्य प्रजापति ही आत्मा है । इस आत्मा की प्रतिष्ठाभूमि ( सञ्चारभूमि, व्याप्तिभूमि, विकासभूमि ) ही ' महिमा ' है । यहौं श्रात्मा प्रपन्न रहता है, अतएव इसे ' पद ' कहना ग्रन्वर्थ बनता है । ग्रात्मा ज्ञानज्योतिर्धन है, ज्ञानज्योति ही ‘ ज्योतिषां ज्योतिः ' है । क्योंकि सर्वत्र सत्र में इस ज्योतिर्बन आत्मा की व्याप्ति है, अतएव ( श्रात्मदृष्टि से ) सभी पदार्थ ज्योतिर्मय हैं । ज्योतिर्भाव के कारण सभी ' आत्मा, श्रात्ममहिमा ' भेद से दो दो भागों में विभक्त हैं | आत्मा एकाकी है, यही मूलस्तम्भ है । श्रात्ममहिमा आत्मा की अशीति है, शरीर है । और महिमालक्षण यह शरीर अन्तःशरीर ( पिण्ड ) बहि: शरीर भेद से दो भागों में विभक्त है । अन्तःशरीर इसी हृद्य आत्मा का ‘ पद ' है, बहिः शरीर इसी हृद्य आत्मा का ' पुनःपद ' है । ' आत्मा, पद, पुनःपद ' तीनों की समष्टि ही प्रत्येक पदार्थ का स्वरूपलक्षण है । १ – आत्मा – हृद्यभावः प्रजापतिः ] -- आत्मा २ - - पदम् — अन्तः शरीरम ३ - - पुनः परम् - बहिः शरीरम् - आत्ममहिमानी मनःप्राणगर्भिता सत्या स्व।यम्भुवी वाकू के विवत ' भावों का ही नाम वेद है, जैसाकि – “ अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा " इत्यादि स्मृति से स्पष्ट है । वाग्विवर्त्तलक्षण ये ही वेद आत्मा की महिमा हैं I | क्योंकि आत्मा त्रितन्त्र है, अतएव तन्महिमारूप ग्रात्मवेद भी त्रिसंस्थ बन जाता है । हृदयस्थ प्रजापति आत्मा है, और यह मनः, प्राण, वाङ्मय बतलाया गया है । मन ज्ञानतन्त्र है, प्राण क्रियातन्त्र है, वाक अर्थतन्त्र है | ज्ञानतन्त्रावच्छिन्न वही ग्रात्मा विद्यात्मा है, ज्ञानात्मा है । क्रियातन्त्रावच्छिन्न वही आत्मा कर्मात्मा । एवं अर्थतत्रावच्छिन्न वही आत्मा भूतात्मा है । ज्ञानात्मा मनोमय है, इस के आनन्द, विज्ञान, अन्तर्म्मन, ये तीन पर्व हैं । कर्म्मात्मा प्राणमय है, इसके बहिर्म्मन, प्राण, वाक्, ये तीन पर्व हैं । एवं भूतात्मा वाङ्मय हैं, इसके वाकू, आपः, अग्निः, ये तीन पर्व हैं । आनन्द - विज्ञान - अन्तर्मनोमय ज्ञानात्मा ' अमृतम् ' है, बहिर्म्मन - प्राण- वाङ्मय कम्र्मात्मा - ' ब्रह्म ' है, एवं वाक्- आप: - अग्निमय भूतात्मा ' शुक्रम् ' है । तदेव ' श्रमृतं ’ है, तदेव ' ब्रह्म ' है, तदेव ' शुक्र ' है । ' अमृत ' अव्ययप्रधान आत्मा है, यही गूढोऽत्मा है | ' ब्रह्म ' अक्षरप्रधान आत्मा है, यही कूटस्थ है, ' क्षर ' क्षरप्रधान आत्मा है, यही ' कूट ' है । गूढोत्मा, कूटस्थ, कूट - समष्टिलक्षण, मनः - प्राण - वाङ्मय आत्मा ही प्रजापति है । मनः प्राणवाङ्मय इत्थंभूत प्रजापति का वाक भाग ही वेद-विवर्त है । क्योंकि महिमालक्षण वेद प्राजापत्य है, प्रजापति त्रितन्त्र है, अतएव वेद भी त्रिसंस्थ ही बन जाता है । ज्ञानतन्त्रमय अमृतात्मा का वेदविवर्त्त मनोमय बनता हुआ ज्ञानप्रधान है । क्रियातन्त्रमय ब्रझात्मा का वेदविबत्ते ६२

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द्वितीयखण्ड प्राणमय बनता हुआ क्रियाप्रधान है । एवं अर्थतन्त्रमय शुक्रात्मा का वेदविवर्त्त वाङ्मय बनता हुआ अर्थप्रधान है । मनोमय ज्ञानप्रधान श्रमृतवेद अमृतात्मा के मानसभावों के द्वारा ' विज्ञानविकास ' का कारण बनता है, प्राणमय कियाप्रधान ब्रह्मवेद ब्रह्मात्मा के प्रारणभावों से ' यज्ञप्रवृत्ति ' का कारण बनता है, एवं वाङ्मय अर्थ -प्रधान शुकवेद शुक्रात्मा के वाकू - मण्डल के आधार पर वाङ्मय सम्पूर्ण आकाश में व्याप्त होता हुआ वाकूद्वारा ' प्रजासृष्टि ' का कारण बनता है ।. प्रत्येक वस्तु में ' विज्ञान - यज्ञ - प्रजा ' तीनों भाव प्रतिष्ठित हैं । स्थूल पिण्डभाग ही प्रजा है, आदान विसर्गा-त्मिका क्रिया ही यज्ञ हैं । यज्ञाधारभूत चिदात्मा ही विज्ञान है । जब तक चिदात्मा है, तब तक यज्ञ है, जब तक यज्ञ है, तब तक प्रजा है | जब तक वेदमहिमा है, तभी तक चिदात्मलक्षण ज्ञान, यज्ञ, प्रजा का सञ्चार है । वेद ही तीनों की प्रतिष्ठा है | महिमा ही वस्तुस्वरूपरक्षा का कारण है । और यह वेद ही आत्ममहिमा बनता हुआ आत्म-स्वरूपरक्षा का कारण बन रहा है । निम्नलिखित परिलेख इसी महिमावेद का स्पष्टीकरगा कर रहे हैं— ( क ) १ - आनन्दः - मनः --- ज्ञानतन्त्रम् -- मनोमयो ज्ञानात्मा २ - विज्ञानम् ३- अन्तर्मनः १ - बहिर्म्मनः २- प्राणः - प्राणः - क्रियातन्त्रम् - प्राणमयः कम्मात्मा ३- वाकू J १ - वाक — वाक — अर्थतन्त्रम् — वाङ्मयो भूतात्मा २- श्रापः ३ - अग्निः प्रजापतिः-प्राणवाङ्मयस्त्रितन्त्रः मनः एष स " आत्मा " १ - श्रानन्दः —मनस्तन्त्रम् —अमृतम् ( अमृतत्री ) - गृढोऽत्मा - अव्यय: ( ज्ञानात्मा ) २ - विज्ञानम् ३ – अन्तर्म्मनः १ – हिम्नः २- प्राण: ३- वाक १- वाकू -२- श्रपः ३- श्रग्निः - प्राणतन्त्रम् — ब्रह्म ( ब्रह्मत्रमी ) – कूटस्थोऽन्नर: ( कम्मात्मा ) —वाक्तन्त्रम् — शुक्रम् ( शुक्रत्रयी ) – कूटात्मकः नरः ( भूतात्मा ) ६६

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भाष्यभूमिका ( ग ) - १ - ज्ञानात्मा - मनोमयो वेद:, ज्ञानप्रधानः - आत्ममहिमा २ – कम्मरमा -- प्राणमयो वेद:, क्रियाप्रधान: - - ग्रात्ममहिमा ३– भूतात्मा --- वाङ्मयो वेदः, अर्थप्रधानः - आत्ममहिमा ) - स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितोऽयं प्रजापतिरात्मा त्रितन्त्रः ( घ ) १ - अमृत महिमा लक्षणो ज्ञानवेद: ( अमृतवेद: ) २ मनसा ज्ञानं जनयति । २ — ब्रह्ममहिमालक्षणः कर्म्मवेद: ( ब्रह्मवेद: ) २ प्राणेन यज्ञ ं प्रवर्त्तयति । ३ - - शुक्रम हिमालक्षणो भूतवेद: ( शुक्र वेदः ) २ वाचा प्रजोत्पादनकर्म विधत्ते । - वेदात् “ सर्वप्रसिद्धयति पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों की समष्टि ही ' अर्थ ' प्रपञ्च है । अर्थ की मूलप्रतिष्ठा शुक्रमहिमालक्षण, वाङ्मय वह भूतवेद है, जिसकी कि पूर्व में आकाश में व्याप्ति बतलाई गई है । वेद आकाश में व्याप्त है, यह अमृताकाश की दृष्टि से कहा जा सकता है । एवं वेद ही आकाश है, यह मर्त्याकाश की दृष्टि से कहा जा सकता है । मर्त्याकाश ही शुक्रवाक् है, यही वाङ्मय भूतवेद है । यही वागाकाशरूप वेद पाँचों भूतों की योनि है । वेदवाकू का ही पहिला रूप शब्दतन्मात्रा है, तदवच्छिन्न मण्डल ही मर्त्याकाश नामक ' आकाश ' भूत है । दूसरा रूप स्पर्शतन्मात्रा है, यही भूतवायु की प्रतिष्ठा है । तीसरा रूप रूपतन्मात्रा है, यही भूताग्नि ( तेज ) का प्रवर्त्तक है । चौथा रूप रसतन्मात्रा है, यही भूतजल की योनि है । पाँचवा रूप गन्धतन्मात्रा है, यही भूतपृथिवी की जननी है । इस प्रकार शब्दतन्मात्रालक्षण, आकाशात्मक, वाङ्मय शुक्रवेद ही पञ्चतन्मात्राओं के द्वारा पञ्चपर्वा विश्व का उत्पादक बन रहा है, जैसा कि निम्नलिखित ' स्मृतिवचन से स्पष्ट है—

शब्दः, स्पर्शश्च, रूपं च, रसो, गन्धश्च पञ्चमः ।

वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूति - गुणकर्म्मतः ॥

१ – शब्दतन्मात्रा — ततः - श्राकाशः ( श्राकाशात्मा स्वयम्भूः ) २ – स्पर्श तन्मात्रा -- ततः - वायुः ( वाय्वात्मा परमेष्ठी ) ३ -- रूपतन्मात्रा -- ततः - तेजः ( तेजोमयः सूर्यः ) ४ -- रसतन्मात्रा — ततः - जलम् ( जलात्मा चन्द्रमाः ) ५ -- गन्धतन्मात्रा - ततः- पृथिवी ( मृण्मयी पृथिवी ) -मनुः १२।६८ | २ सोऽयं शुक्रवेद विकासः ६४

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द्वितीयखण्ड अर्थयोनिर्लक्षण वागूरूप आकाश के वैज्ञानिकों की दृष्टि में तीन प्रधान पर्व हैं । वे तीनों पर्व क्रमशः ‘ परमाकाश, पुराणाकाश, भूताकाश ' नामों से प्रसिद्ध हैं । ' परमे व्योमन् ' नाम से प्रसिद्ध, चर - श्रचर का एकमात्र श्रावपनरूप, अतएव ' खं ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत, असीम, अनन्ताकाश ही पहिला ' परमाकाश ' है । अनन्तवेद के श्रविज्ञं य इतिवृत्त का दिग्दर्शन कराते हुए अनन्तमायाचलयुक्त जिस अनन्त परालर परमेश्वर की स्तुति की गई थी, वह इसी परमाकाश से सम्बन्ध रखता है । अनन्त परमेश्वर ही परमाकाश-स्वरूप है, जो कि ग्रूपने असीम लक्षण श्रानन्त्य से परात्पर की भाँति सर्वथा अविज्ञेय ही है । ' नेति, नेति ' ही इसकी उपनिषत् है । अनन्त परात्पर, अनन्तवेद्, अनन्त परमाकाश, तीनों एक ही वस्तुतत्त्व हैं । तीनों हृीं विज्ञेय हैं । दूसरा पुराण।काश दुर्विज्ञेय मायी महेश्वर से सम्बन्ध रखता है । जिस मायी महेश्वर का दुर्विज्ञेय वेदेति-वृत्तप्रकरण में सहस्रबल्शात्मक श्रश्वत्थवृक्ष रूप से यशोगान हुआ है, उस मायी महेश्वर का स्वरूप इसी पुराणाकाश पर प्रतिष्ठित है । पुराणाकाश के अनुग्रह से ही वह ग्राकाशात्मा ' पुराणपुरुष ' कहलाया है । मागी महेश्वर में प्रतिष्ठित, मायामण्डल में परितः व्याप्त, मायादृष्ट्या सर्वव्यापक, किन्तु मायोपाधिक त्रगोवेद-सम्बन्धी यजुःप्राणलक्षण इन्द्रात्मक वेदमूर्ति यही सीमित श्राकाश पुराणाकाश है । इन्द्रसम्बन्ध से हो इसे ' इन्द्राकाश ' भी कहा जा सकता है । इन्द्रात्मक यही पुराणाकाश, दूसरे शब्दों में पुरारणाकाशात्मक यही सर्वव्यापक इन्द्र ऋग्वेद में - ‘ शुन ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जैसाकि - ' शुनं हुवेम मघवान मिन्द्रम् ' ( ऋकमं ० ३।३०।२२ । ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । " नेन्द्रादुऋते पवते धाम किञ्चन " ( ऋक्सं ० ६ ६६ ६ ) के अनुसार इस शुन, ग्राकाशात्मक इन्द्र से कोई स्थान वञ्चित नहीं है । अपनी इन्द्रशचि ( इन्द्रशक्ति ) के द्वारा यह प्राणप्रद ( बलप्रद, ग्रोजप्रद, स्फूर्तिप्रद ) इन्द्रदेवता सर्वत्र एकरूप से व्याप्त है । इसी शुन इन्द्र की व्याप्ति से महामहिम यह अन्तरिक्ष ' शून्य ' कहलाया है । शून्य का अर्थ रिक्त स्थान ( खाली जगह ) समझना विज्ञान दृष्टि से नितान्त अशुद्ध है । रिक्त स्थान सर्वथा खपुष्प है । ' शून्यं ' का तात्पर्य्य है, जहाँ चोर कोई पदार्थ नहीं रहता, वहाँ भी शुन नामक व्यापक इन्द्र अवश्य रहता है । ' शुने - इन्द्राय - हितम् ' ही शून्य शब्द का निर्वचन है । प्रकृत में वक्तव्य यही है कि सहस्रशेश्वर महामायावच्छिन्न दुर्विज्ञेय महेश्वर, उसका सहस्र-पर्णात्मक दुर्विज्ञेय वेदतत्त्व, एवं सहस्रोपाधियुक्त यजुरिन्द्रात्मक इन्द्राकाश, तीनों एक ही वस्तुतत्त्व हैं, एवं तीनों हीं दुर्विज्ञेय हैं । तीसरा भूताकाश विज्ञेय योगमामी ईश्वर से सम्बन्ध रखता है | पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्यवल्शा का एकाकी अध्यक्ष, त्रल्शेश्वर प्रजापति ही ईश्वर है । इसका वाङ्मय ( मर्त्याकाशमय ) वेद शब्दतन्मात्रा के द्वारा पृथक्-पृथक् संस्थाविभागों का कारण बनता है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । शब्दतन्मात्रा के सम्बन्ध से ही इस वेद को ' शब्दबेद भी कहा गया है । पुराणा काश लक्षण महेश्वरवेद, एवं परमाकाशलक्षण परमे -श्वरवेद, दोनों संस्थाविभाग मर्य्यादा से बहिर्भूत हैं । संस्थाविभाग तो इस भूताकाशलक्षण, शब्दगुणक ईश्वरवेट से ही हुआ है, जैसाकि राजत्रिं कहते हैं--सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाच निर्ममे ॥ — मनुः १।२१ । ६५