Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 111–120
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120
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भाष्यभूमिका ही है, एवं न कोई लाभ ही । सुसूक्ष्म प्राणजगत् का प्रथम आविष्कारक भारतवर्ष इस प्रकार म्थूल जगत् का उपासक बन जायगा, प्राणविद्या का स्थान प्राणी - विद्या ग्रहण कर लेगी, तत्त्ववाद का श्रासन रूढिमूलक कल्पनावाद छीन लेगा, और इन्हीं विडम्बनाओं से हम सचमुच अपने मौलिक, तात्त्विक साहित्य से वञ्चित हो जायँगे, यह दोष किसे दिया जाय? | हम अपना दोष दूसरों के व्याज से कैसे छिपाएँ? अवश्य ही हमें नतमस्तक होकर यह स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि, एकमात्र हमारे प्रज्ञापराध से ही ये सारी विडम्बनाएँ उपस्थित हुईं हैं, जिसके परिशोध का एकमात्र उपाय है – ' तात्त्विक दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाली विलुप्तप्राय वेदस्वाध्यायपरम्पर । ( परम्परा ) का पुनरुज्जीवन, जिसके कि मूल में ऋषितत्त्व प्रतिष्ठित है । एवं ऋषि-तत्त्वप्रतिष्ठा से ही जो परम्परा ' परम्परा ' कहलाई है । परम्परा के सर्वस्वभूत इस ॠषितत्त्व का संक्षेप से परिचय कराना ही प्रकृत परिच्छेद का मुख्य उद्देश्य है । शास्त्रों में प्रतिपादित ' ऋषि ' तत्त्व जिन ऋषियों के द्वारा दृष्टि का विषय बना है, जिस ऋषितत्त्व के साक्षात्कार से शास्त्रकार स्वयं भी ' ऋषि ' उपाधि के अधिकारी बने हैं, तत्त्वात्मक ऋषियों के जो प्राकृतिक कर्म्म इन मनुष्य - ऋत्रियों के साथ अभेदबुद्धया ( पुराणों में ) प्रतिपादित हैं, वे ही तत्त्व ऋषि यद्यपि प्रकृत परिच्छेद के मुख्य उद्देश्य हैं, तथापि प्रसङ्गतः मनुष्य ऋषियों का भी विचार कर लेना प्रासङ्गिक न होगा । ऋषि शब्द की अनेक स्थानों में व्याप्ति देखते हुए हमें इसे चार भागों में विभक्त मानना पड़ रहा है । एवं इन चारों ऋषियों को क्रमशः १ – सल्लक्षण ऋषि, २ – रोचनालक्षण ऋषि, ३ – द्रष्टृ लक्षण ऋषि, ४ - वक्तृलक्षण ऋषि, इन नामों से व्यवहृत करना पड़ रहा है । १ - असल्लक्षण ऋषि-( १ ) — पूर्व के सृष्टिप्रकरण में सावित्राग्नि का स्वरूप बतलाते हुए ब्रह्मः निश्वसितवेद के यजुर्भाग के जिस ' यत् ' नामक प्राणतत्त्व का विश्लेषण हुआ है, उसी मौलिक वेदप्राण का ( यजुः प्राण का ) नाम सल्लक्षण ऋषि है । यही तत्त्त्रात्मक प्रथम ऋषि । इस ऋषिप्रारण को, किंवा प्राणात्मक ऋषि को ' वेद'-‘ असत् ' इत्यादि नामों से व्यवहृत किया गया है । जिस प्राण से सृष्टि का उपक्रम होता है, जिन प्राणों के रासायनिक साम्मिश्रण से मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ होता है, सर्वमूलभूत, सद्रूप, अतएव ' असत् ' नाम से प्रसिद्ध उन्हीं प्राणों का नाम ‘ तत्त्व ऋषि ' है । ' विरूपास इऋषयस्त इद्गम्भीरवेपसः ' ( ऋकसं ०१०।६२।५ । ) इस मन्त्रवर्णन के अनुसार इन ऋषिप्राणों के अनेक विभाग हैं । इस प्राणानन्त्य से ही तद्रूप वेद ग्रनन्त मानें गए हैं । इसी प्राणानन्त्य से विश्व - पदार्थों में वैचित्र्य उपलब्ध हो रहा है । प्राणात्मिका इस ऋषिविद्या का नाम ही वेदविद्या है, जिसका कि शब्दात्मक वेदशास्त्र में विश्लेषण हुआ है । इसी सम्बन्ध में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, एक एक प्राण जहां ' ऋषि ' शब्द से व्यवहृत होता है वहाँ अनेक प्राणों की समष्टि को ‘ पुरुष ' नाम से व्यवहृत किया जायगा, जैसा कि ' सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति ' का स्वरूप व्रत-लाते हुए पूर्वपरिच्छेदों में स्पष्ट किया जा चुका है । इन्हीं सृष्टिप्रवर्त्तक तत्त्वात्मक ऋषियों को ' दिव्यर्षि ' ' वेदर्षि ' ' देवर्षि - ' पुराणर्षि ' इत्यादि विविध नामों से व्यवहृत किया गया है । प्राणात्मक ऋषि के आधिभौतिक, श्राधिदैविक, आध्यात्मिक भेद से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । श्राधिदैविक मण्डलोपलक्षित हिरण्यगर्भमण्डल में ये ऋषिप्राण ' मनु ' तत्त्व को ७६
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द्वितीय ars केन्द्र बना कर इतस्ततः रश्मिरूप से व्याप्त रहते हैं । हिरण्यगर्भमण्डल से सम्बन्ध रखने वाले ये मानव-प्राण दस भागों में विभक्त होने से विराट्पुरुष के स्वरूप - सम्पादक बनते हैं । इसी प्रकार अध्यात्म जगत में ये ही प्राण मन को आधार बनाकर सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहते हैं । एवमेव आधिभौतिक पदार्थों में भूताग्नि से उपलक्षित ङ्गिरोऽग्नि को आधार बना कर ये ऋषिप्राण वितत रहते हैं । आधिभौतिक पदार्थों से सम्बन्ध रखने वाले, अङ्गिरा नामक प्राणाग्नि को आधार बनाकर रश्मिवत् इस के चारों ओर वितत रहने वाले इन्हीं प्राणों को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है - ' तेऽङ्गिरसः सूनवः, तेऽग्नेः परि जज्ञिरे ( ऋक्सं ० १०।६२।५ । ) इन तीनों त्रिवर्ती से सम्बन्ध रखने वाले अनन्त ऋषिप्राणों का न तो प्रकृत परिच्छेद में परिचय ही कराया जा सकता, एवं न वेदप्रकरण में इस ऋषिगाथा का कोई विशेष प्रसङ्ग ही । इस विषय की विशेष जिज्ञासा रखने वालों को तो ' वैदिक प्रारणविद्या ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध ही देखना चाहिए । प्रकृत में इस सम्बन्ध में केवल यही वक्तव्य है कि, ' ऋषि ' शब्द की मुख्य व्याप्ति सल्लक्षण उस मौलिक प्राण से सम्बन्ध रखती है, जो कि मौलिक प्राण पञ्चतन्मात्राओं के उत्पादक बनते हैं | । भौतिक धातुवर्ग उत्पन्न होता है, तेजोमात्राओं का विकास होता है, सर्वविध बलों का विकास होता है, यच्चयावत् संज्ञाकर्म्म, तथा चेष्टाकर्म्मो का सञ्चालन होता है, प्रज्ञामात्रा का उदय होता है, ज्ञानकर्मेन्द्रियों का उद्गम होता है, इन्द्रियों के कम्मों का उदय होता है, पितर देवता - असुर, कहाँ तक गिनावें, ' अस्ति ' नाम से व्यवहृत करने योग्य विश्व में जो कुछ है, सब की मूलप्रतिष्ठा, सत्र का प्रभव - प्रतिष्ठा - परावरा यही ऋषिप्रारण है । प्राण से ही सृष्टि का विकास हुआ है, प्राणाधार पर ही विश्व प्रतिष्ठित है, प्राण ही सत्र की लयभूमि है । यह प्राण वही आपका ऋक् सामावच्छिन्न यजुः - प्राण है, जो कि उपाधिभेद से अनन्तरूपों में परिणत होता हुआ वैचित्र्योपलक्षित आनन्त्य का आधार बन रहा है । ' भृगु - वसिष्ठ- कश्यप - जमदग्नि - अत्रि - मरीचि - पुलस्त्य - पुलह - क्रतु - दक्ष - अङ्गिरा - बृह-स्पति - अगस्त्य - विश्वामित्र ' आदि जो ऋषिनाम हम सुनते आए हैं, वे सत्र मुख्यरूप से प्राणात्मक ऋषि-तत्त्व से ही सम्बन्ध रखते हैं । इन प्राणों के सन्निवेशतारतम्य से ही ग्राधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक विवर्तों में स्वरूप - परिवर्त्तन होता रहता है । यदि आप इन प्राणों को पहिचान लेते हैं, पहिचान सकते हैं, तो आप भी सृष्टिकर्म के सञ्चालक बन सकते हैं । जड़पदार्थों को चेतन बना डालना, मूर्ख को विद्वान् बना देना, विद्वान् को मूर्ख बना देना, अश्व को मनुष्य बना देना, मनुष्य को पशु बना देना, घन पदार्थ को तरल, तरल को बाष्पावस्था में परिणत कर देना, ये सब कुछ असम्भव कल्पनाएँ इस प्राणविजानात्मिका ' ब्रह्मविद्या ' से सर्वथा सम्भव हैं, जिस सम्भावना का कि – ' ब्रह्मविद्यया हि सर्वं भविष्यन्ता मन्यन्ते मनुष्याः ' ( शतपथ ब्रा ० ) इत्यादि श्रुति बड़े प्रवेश के साथ समर्थन कर रही है । " श्राधिदैविक - प्राध्यात्मिक - श्राधिभौतिक संस्थानों से सम्बन्ध रखने वाले सम्बङ्गिरा - त्रादि प्राणों के कुछ– एक उदाहरण यहाँ भी उद्धृत कर दिए जाते हैं । स्थालीपुलाकन्याय के आधार पर पाठकों को यह स्वीकार कर लेना पड़ेगा कि, अवश्य ही ऋषिशब्द की व्याप्ति प्राणतत्त्व से ही सम्बन्ध रखती है । सर्वप्रथम कुमप्राप्त आधिदैविक - ऋषिप्रारण का ही निदर्शन सामने रखिए । ' मत्स्य, वसिष्ठ, अगस्त्य ', इन तीन प्राणों का एक स्वतन्त्र विभाग माना गया है, एवं ' भृगु, अङ्गिरा, त्रि ' इन तीनों प्राणों का एक स्वतन्त्र विभाग माना गया है । मत्स्यादि प्रथम प्राणत्रयी का विकास क्योंकि ' द्रोणकलश ' से हुआ है, अतएव इन्हें ' कुम्भोद्भव ' ( घट - सोमकलश - से उत्पन्न होने वाले ) कहा जाता है । कुम्भ एक प्रकार का ' मान ' ( माण ) है, इसी 319
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भाष्यभूमिका आधार पर इन्हें ' मान्य ' कहा जाता है । कुम्भ के जिम प्रदेश को मूल मान कर इन तीनों प्राणों का विकास हुआ है, वहीं मित्रावरुण नाम के प्राण प्रतिष्ठित हैं, अतएव इ. हैं ' मैत्रावरुण ' कहा जाता है । इसी कुम्भ-प्रदेश में श्रापोमय सौम्य अप्सराप्राण प्रतिष्ठित हैं, इसी आधार पर इन्हें ' अप्सरापुत्र ' माना गया है । इस प्रकार ' कुम्भोद्भव - मान्य - मैत्रावरुण - ' अ ' सरापुत्र ' इन चार नामों से प्रसिद्ध यह प्राणत्रयी भिन्न भिन्न कम्मों की अधिष्ठात्री बन रही है । इसी प्राणत्रयी के उद्गम के सम्बन्ध में पुराणों में इस आशय का एक आख्यान आता है कि, – " एक बार प्रजापति सोमयज्ञ कर रहे थे । यज्ञ प्रारम्भ हो चुका था, यज्ञाहुतिसाधक सोमरस द्रोणकलश में सम्पन्न था । इस यज्ञ को देखने के लिए उर्वशी अप्सरा भी आई थी । संयोगवश मित्र और वरुण देवता भी यज्ञ देखने उपस्थित हुए । उर्वशी को देख कर इनका रेतः स्खलन हो गया । मित्रावरुण का स्खलित रेत द्रोणकलश में बाहिर - भीतर जा गिरा । जो रेतोभाग कलश के भीतर गिरा, उसने तो ' मत्स्य ऋषि ' उत्पन्न हुए । जो भाग कलश के उत्तरभाग में गिरा, उससे ' वसिष्ठ ऋषि ' उत्पन्न हुए । एवं जो भाग कलश के दक्षिणभाग में गिरा, उससे ' अगस्त्यऋषि ' उत्पन्न हुए । इस प्रकार उवंशी वेश्या के निमित्त से म्खलित मित्रा.रुण के रेत से सोमकलश में तीन ऋषि उत्पन्न हो गए ” । प्राण के उक्त आख्यान का नैदानिक रहस्य न जानने के कारण यदि कोई पश्चिमी विद्वान् आख्यान के सम्बन्ध में अपनी भ्रान्त कल्पना कर बैठता है, तो हमें विशेष आश्चर्य नहीं होता । आश्वर्य्यं तो उस समय होता है, उनके सम्बन्ध में होता है, जबकि वैदिकसाहित्य की अनन्यनिष्ठा का अनुगमन वाले भारतीय भी इन पौराणिक रहस्यात्मक आख्यानों को ' गबोड़ा ' मानने की भूल करने लगते हैं । सम्भवतः इन महाशयों को यह विदित नहीं है कि, प्रारणत्रयी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराण ने जो कुछ कहा है, वे आख्यान ठीक उन्हीं शब्दों में सूत्ररूप से स्वयं वेदसंहिता में उपवर्णित हैं । यदि पुराण का आख्यान असत् - कल्पना है, तो उनका वेद भी ऐसी कल्पनाओं से शून्य नहीं है । देखिए -१ - विद्युतो ज्योतिः परि सजिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा ।
-तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठ।गस्त्यो यत्वा विश आजभार ॥
२ – उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोश्या ब्रह्मन् मनसोऽधिजातः ।
द्रप्तं स्वन्न ब्रह्मणा दैव्येन विश्वेदेवाः पुष्करे त्वाददन्त ॥
३- ३ - स प्रकेत उभयस्य प्रविद्वान्त्सहस्रदान उत वा सदानः ।
यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परिजज्ञे वसिष्ठः ॥
-४ – सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम् ।
ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥
—ऋकसं ० ७ मं ० । ३३ सू ० । १०-११-१२-१३ मन्त्र | II
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द्वितीयखण्ड मन्त्रों का सामान्य तात्पर्य्य पूर्व की श्राख्यानभाषा से गतार्थ है । विशेष ( वैज्ञानिक ) तात्पर्य्य वैदिक प्राणविद्या के उस प्रकरण में द्रष्टव्य है । यहाँ इस समतुलन से हमें कहना यही है कि, बिना सोचे - समझे, तात्त्विक, पारिभाषिक ज्ञान प्राप्त किए बिना सहसा पौराणिक आख्यानों पर टीका - टिप्पणी करने लग जाना सर्वथैव श्रनुचित है । प्रकृत श्राख्यान की मीमांसा कीजिए । सौर सम्वत्सरयज्ञ ही सम्वत्सरप्रजापति का महायज्ञ है । सम्वत्सरबज्ञमण्डलावच्छिन्न खगोल ही द्रोणकलश ( सोमकलश ) है । " त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षम् ” ( ऋक्सं ० १६।१।२२ । ) इत्यादि मन्त्र में उपवर्णित, विशाल खगोल ( अन्तरिक्ष ) में व्या'त दिक्-सोम से यह कलश परिपूर्ण है । अहोरात्र के भेद से इस खगोल के पूर्व कपाल, पश्चिमकपाल भेद से दो विभागे हो रहे हैं, जिनका कि विभाजक याम्योत्तरवृत्त है । उमयकपालावच्छिन्न साम्वत्सरिक सौरप्राण की अह:, तथा रात्रिभेद से ‘ मित्र - वरुण ' नाम की दो अवस्था हो जातीं हैं । ग्रहःकालावच्छिन्न वही सौरप्राण पार्थिवप्रजा से युक्त रहता हुआ ‘ मित्र ' कहलाने लगता है, एवं रात्रिकालावच्छिन्न वही सौरप्राण पार्थिवप्रजा से वियुक्त रहता हुआ ‘ वरुण ' कहलाने लगता है । ये अहोरात्र सूर्योदयास्त से सम्बन्ध न रख कर याम्योत्तरवृत्त से ही सम्बन्ध रखते हैं । याम्योत्तरवृत्त को ही ' ध्रुवप्रोतवृत्त ' कहा जाता है । क्योंकि दक्षिण - उत्तर ध्रुव से ही इन भातिसिद्ध वृत्तों की कल्पना हुई है । संख्या में ये वृत्त ३६० माने गए हैं । इन वृत्तों की प्रतिष्ठा अान्तरिक्ष्य प्रापोमय समुद्र । श्रापोमय समुद्र में सञ्चार करने से ही इन वृत्तों को ' अप्सरा ' ( अासु सरन्ति ) कहा जाता है । इन्हीं अप्सरावृत्तों से दिक् का विभाजन होता है, अतएव दिशाओं को भी अप्सरा मान लिया गया है । भगवान् माहित्थि के मतानुसार दिशा - उपदिशाएँ हीं असरा हैं, जैसा कि निम्नलिखित ' पञ्चचूडब्राह्मण ' वचन से स्पष्ट है-" पुञ्जिकस्थला च क्रतुस्थला चाप्सर सौ - इति दिक्- चोपदेशा चेति स्माह माहित्थिः ” ॥ - शत ० वा ० ८ | ६ | १ | १६ | याम्योत्तरवृत्तात्मक इन आाप्य अप्सराओं का द्रोणकलशात्मक उरु अन्तरिक्ष से घनिष्ठ सम्बन्ध है । पूर्वकथनानुसार उर्षान्तरिक्ष में दिकमोम व्याप्त है, जो कि दिक्सोम अपने आहुतिधर्म से यज्ञात्मक विष्णु की स्वरूपरक्षा करता हुआ ‘ वैष्णव ' नाम से प्रसिद्ध है । वैष्णव गोम यदि राजा है, तो ये अप्सराएँ इसकी प्रजा हैं * । इसी आहुतिधर्म्म के सम्बन्ध से भगवान् याज्ञवल्क्य ने अप्सराओं को भी ' आहुति ' शब्द से व्यवहृत कर दिया है | पञ्चचूड़ोपधान में ऋतुरूप से भी इन अप्सराओं का ग्रहण हुआ है । उस प्रकरण में वसन्त- ग्रीष्म-वर्षा- शरत् - हेमन्त, इन पाँच ऋतुओं में दो दो अप्सराओं का भोग माना है, जो कि दस अप्सराएँ क्रमश: -“ १ – पुञ्जिकम्थला, २ – क्रतुस्थला, १ – मेनका, २ – सहजन्या, १ – प्रम्लोचन्ती, २ – अनुम्लो-चन्ती, १ - विश्वाची, २ – घृताची, १ -- उर्वशी, २ -- पूर्वचिति ", इन नामों से प्रसिद्ध हैं ( देखिए-शत ० ब्रा ० ८ | ६ | १ | ) । * -- " सोमो वैष्णवो राजेत्याह । तस्याप्सरसो विशः । ता इमा सत इति — युवतयः शोभना उपसमेता भवन्ति " ( शत ० ब्रा ० १३ । ४ । ३ । ८ । ) । ७६
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भाष्यभूमिका इनमें ' उर्वशी ' वह अप्सरा - ( याम्योतरवृत ) है, जिससे कि अद्यतन अनद्यतन का विभाग कर रक्खा है । रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे पर्यन्त अद्यतन काल है, एवं दिन के १२ बजे से रात्रि के १२ बजे पर्य्यन्त काल माना गया है । उदयास्त से अहोरात्र का विभाग करना एक प्रकार है, एवं अद्यतन अद्यतन से अहोरात्र का विभाग करना एक प्रकार है । मध्यरात्रि के पीछे से सौरप्राण पार्थि प्रजा के साथ युक्त होने लगता है I । यही ग्रहःकाल का श्रारम्भ है । यहाँ से प्रारम्भ कर मध्याह्न के बारह बजे पर्य्यन्त यह प्राण निरन्तर हमारे साथ योग करता है । अनन्तर सौरप्राण हम से त्रियुक्त होने लगता है, एवं इसकी यह वियुक्ति मध्यरात्रि पर्यन्त प्रक्रान्त रहती है । सौरप्राणसत्ता ग्रहः काल की, तथा सौरप्रागवियुक्ति रात्रिकाल की स्वरूपसमर्पिका है । अहोरात्र की इस सामान्य परिभाषा के अनुसार मध्यरात्रि से मध्याह्न पर्यन्त का १२ घन्टे का काल अहःकाल कहलाएगा, एवं मध्याह्न के १२ बजे से मध्यरात्रि पर्य्यन्त का काल रात्रिकाल कहलाएगा । दोनों में प्रतिष्ठित सौरप्राण ' मित्र- वरुण ' कहलाएँगे । मित्रपारगावच्छिन्न ग्रहः काल पूर्वकपाल कहलाएगा, वरुणप्रारणावच्छिन्न रात्रिकाल पश्चिमकपाल कहलाएगा । इन दोनों कपालों का विभाजक मध्याह्नवृत्त ही उर्वशी अप्सरा कहलाएगा । इसी मध्याह्नवृत्त से मित्रावरुणात्मक पूर्व - पश्चिम कपालोपलक्षित अहोरात्र का विभाजन हो रहा है । स्वयं उर्वशी अप्सरा के साथ मित्र- वरुण, दोनों प्राणों का समन्वय हो रहा है । जहाँ दोनों कपाल मिलते हैं, वहीं उर्वशी है । फलतः उर्वशी के साथ दोनों का समन्वय सिद्ध हो जाता 1 ग्रहःकाल में व्याप्त मित्रप्राण श्राङ्गिरस होने से ' आग्नेय ' है, एवं रात्रिकाल में व्याप्त वरुणप्राणा भार्गव होने से ‘ आप्य ' है । सम्वत्सरात्मक प्राजापत्य यज्ञमण्डल में पूर्व - पश्चिम कपाल की सन्धि में ये दोनों आग्नेय - प्राप्य प्राण प्रतिष्ठित है । कपालद्वयावछिन्न खगोल ( सम्वत्सरमण्डल ) ही पूर्वकथनानुसार सोमपरि-पूर्ण कलश है । मध्याह्नवृत्त उर्वशी है । इसको निमित्त वनाकर इसी कलश में मित्र के आग्नेय वीर्य्य की, तथा वरुण के आय्यवीर्य्य की आहुति होती है । हुत प्राणद्वयी से इस कुम्भ में शीतवीर्य, उष्णवीर्य्य, अनुष्णाशीतवीर्य्य, भेद से तीन नवीन प्राण उत्पन्न होते हैं । शीतवीर्य्यप्राण सोमप्रधान है, कुम्भ के उत्तरभाग में इनको प्रतिष्ठा है । ये ही प्राण ' वसिष्ठ ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इनके लिए ' आपवा: ' - ' असवाः ' - ' वसिष्ठा ': तीनों शब्द प्रयुक्त हुए हैं । वृष्टि करना, पानी ' और मिट्टी के रासायनिक सम्मिश्रण को दृढमूल बनाते हुए, पानी को घनावस्था में परिणत करते हुए पानी को कालान्तर में मिट्टी बना डालना इसी त्रसिष्ठप्राण की महिमा है । क्योंकि इसकी प्रधानता उत्तर में है । अतएव उत्तर प्रदेशों में क्रमशः भूभाग की वृद्धि होती जा रही है । उष्णवीर्य्य अग्निप्रधान हैं, एवं कुम्भ के दक्षिण भाग में इनकी प्रधानता है । ये ही उम्र आग्नेय प्राण ' अगस्त्य ' नाम से प्रसिद्ध हैं । पानी का शोषण करना अगस्त्यप्राण का मुख्य कार्य्य है, जिसके कि सम्बन्ध में पुराण का अगस्यसम्बन्धी ' समुद्रशोषण ' श्राख्यान सर्वप्रसिद्ध है । अनुष्णाशीतवीर्य्यप्राण कुम्भ के पध्य में ( मध्याकाश में ) अपनी प्रधानता रखते हैं । इन्हीं को ' मत्स्य ' कहा जाता है । इन्हीं को ' याम्यमत्स्य ' मी कहा गया है । मिट्टी को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रखना ही इनका मुख्य कर्म्म है । वसिष्ठ मिट्टी के प्रवर्तक हैं, मत्स्य मिट्टी के रक्षक हैं, अगस्त्य मिट्टी को संहत बनाकर इसे घन ( पाषाण ) रूप प्रदान वाले हैं । क्योंकि अगस्त्य की प्रधान सत्ता दक्षिण में है, अतएव दक्षिण भाग में पर्वत विशेषरूप से घनावयव बने रहते हैं । रसशोषण से इनका वर्ण भी आत्यान्तिक रूप से कृष्ण रहता है, ८०
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द्वितीयखण्ड गुरुत्त्वाकर्षण भी अतिशयरूप से प्रतिष्ठित रहता है । निष्कर्ष यही हुआ कि मित्रावरुण के आग्नेय - प्राप्यवीय्यों के समन्वय से आधिदैविक मण्डलोपलक्षित सम्वत्सरजगत् में वसिष्ठ, अगस्त्य, मत्स्य, नामक तीन प्राण विर्भूत हो जाते हैं । अब आधिभौतिक असत् - प्राण के उदाहरण पर दृष्टि डाल लीजिए । ' भृगु अङ्गिरा - श्रत्रि ' इन तीनों का ग्राधिदैविक स्वरूप जहाँ स्नेहतेज धामच्छदभावों का प्रवतक बना हुआ है, वहाँ इनके आधिभौतिक रूप से अर्चि - श्रृङ्गार - पारदर्शकता प्रतिबन्धकत्त्व, इन तीन भावों की स्वरूप रक्षा हो रही है । एक प्रज्वलित काष्ट को लीजिये । इसका जितना ' ज्वाला ' भाग है, वह भृगुप्राणमय है । भृगुप्रारण ( स्नेहात्मक सौम्यप्राण ) के सहयोग से ही ज्वाला का स्वरूप सुरक्षित है । दहकता हुआ अङ्गार अङ्गिरा प्राणमय है । एवं ज्वाला, तथा श्रृङ्गार की प्रतिष्ठारूप स्वयं काष्ठपिण्ड त्रिप्राणमय है । एक चमत्कार और देखिये । प्रथम बार जब आप काष्ट बलायेंगे, उस समय प्राथमिक ङ्गार का प्रारण अङ्गिरा कहलाएगा । यदि आप उस अङ्गार को बुझा कर पुनः दुबारा प्रदीप्त करेंगे, तो वह प्रारण द्वितीयावस्था में आता हुआ ' बृहस्पति ' कहलाने लगेगा । इस प्रकार थोड़े से तारतम्य से प्राण विपर्य्यय हो जायगा । अतिरा, तथा भृगु की इसी आधिभौतिक व्याप्ति को लक्ष्य में रख कर ऋषि कहते हैं— " अर्चिषि भृगुः सम्बभूव, अङ्गाष्यङ्गिराः सम्बभूव । अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुददीदप्यन्त, अथ बृहस्पतिरभवत् ” ( ऐतरेयब्राह्मण ३।३४ । ) अत्र क्रमप्राप्त प्राध्यात्मिक सत् प्राणों का भी उदाहरणविधि से प्रत्यक्ष कर लीजिए । केवल शिरः-प्रदेश में सप्तर्षिप्राण व्याप्त रहता है । इन सात ऋत्रिप्राणों में ६ ऋषिप्राण तो यमज ( जोड़ले ) हैं, एवं एक प्राण एकाकी है । दो श्रोत्रप्राण, दो नासाप्राण, दो चक्षुः प्राण, ये ६ तो यमज हैं, सातवीं वाङ्मय प्राण एकाको है । शिरःकपाल एक ऐसा चमस ( कटोरा - बाटकी ) है, जिसका पैदा तो ऊपर है, बिल नीचे की ओर है । इस चमस के तीरभाग में ( प्रान्तों में ) उक्त सात ऋषि प्रतिष्ठित हैं । निम्नलिखित मन्त्र- श्रुतियाँ इसी प्राण-सप्तक का स्पष्टीकरण कर रहीं हैं । १ – साकञ्जानां सप्तथमाहुरेकजं पडिद्यमा ऋषयो देवजाः । तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपश: " 11 --ऋक्सं ० १।१६४।१५ ।
२ – अर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुघ्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।
तस्यासतऽऋषयः सप्ततारे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदाना ॥
- शत ० १४ | ५ | २४ | ३ – “ इमावेत्र गोतम - भरद्वाजों । श्रयमेव गोतमः, अयं भरद्वाजः । इमावेव - विश्वा-मित्रजमदग्नी । अयमेव विश्वामित्रः " अयं जमदग्निः । इमात्रेव वसिष्ठ-८१
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भाष्यभूमिका कश्यपौ । अयमेव वसिष्ठः, त्र्यं कश्यपः । वागेवात्रिः । वाचा ह्यन्नमद्यते । ' अत्ति ' हे वैं नामैतद्यदत्रिरिति । सर्वस्यात्ता भवति, सर्वमस्यान्न भवति, य एवं वेद " ( शत ० १४।५।२।६ । ) । इसके अतिरिक्त आध्यात्मिक जगत् में प्रतिष्ठित विविध वृत्तियों का सञ्चालन भी इन्हीं सत्प्राणों के आधार पर प्रतिष्ठित है | अङ्गिरा प्राण से ' कर्म्मप्रवणता ' उत्पन्न होती है । जिसका अङ्गिराप्राण मूर्च्छित रहता हैं, वह सर्वथा अकर्मण्य, आलसी बना रहता है । वसिष्ठप्राण से ' प्रोजस्विता ' का उदय होता है । जिसका वसिष्ठप्राण मूर्च्छित रहता है, उसका मुख कान्तिहीन, उदासीन रहता है । त्रिप्राण से ' अनसूया ' वृत्ति का उदय होता है । जिसमें त्रिप्राण मूच्छित रहता है, वह सदा दूसरों की निन्दा किया करता है, परदोषदर्शन का अनुगामी बना रहता है । पुलस्त्यप्राण से ' घातक ' वृत्ति का साम्राज्य रहता है । ऋतुप्राण से ' अध्यवसाय ' बृत्ति जागृत रहती है | दक्षप्राण ' व्यवसायबुद्धि ' का प्रवर्तक बनता है । कश्यपप्राण ' पुरन्ध्रिता ' - तथा ' प्रजावात्सल्य ' का प्रवर्तक है । जिसका कश्यपप्राण मूच्छित रहता है, न तो वह प्रजासन्तति का ही पात्र बनता, न उसकी वृत्ति में वात्सल्य का ही उदय होता । विश्वामित्रप्राण से ' आयुः स्वरूप रक्षा ', तथा ' दृढ़ता ' का उदय होता है । भृगुप्राण से ' विद्याप्रवणता ' का आविर्भाव होता है । अगस्त्यप्राण से ' पर पकारवृत्ति ' जागृत रहता है । मरीचिप्राण से ‘ स्वेदोत्पत्ति ', तथा ' स्वभावमाद्द ' व ' का उदय होता है । निदर्शनमात्र है | हमारी आध्यात्मिक संस्था मे जितनें भी उच्चावच भाव प्रतिष्ठित हैं, सबकी मूलप्रतिष्ठा ये ही असत् - प्राण हैं । प्राणों के तारतम्य से, विशेषता से ही प्राणियों की वृत्ति में तारतम्य, विशेषता उत्पन्न होती है । एवं असल्लक्षण - ऋषिप्राण का यही संक्षिप्त निदर्शन है । ( २ ) - रोचनालक्षण ऋषि-( २ ) —सुप्रसिद्ध नाक्षत्रिक ऋषि ही रोचनालक्षण ऋषि हैं । खगोल में जितनें भी नक्षत्र है, वे सत्र भिन्न भिन्न प्राणों की प्रतिकृतियाँ हैं । भूतपिण्डात्मक जिस नक्षत्र में जिस प्राण की प्रधानता है, वह नक्षत्र उसी प्राण के नाम से प्रतिद्ध हो रहा है । सृष्टिप्रवर्तकत्त्वेन इनका यदि सल्लक्षण प्राणों में अन्त वि कर लिया जाता है, तो दोनों के दो स्वतन्त्र विभाग न होकर एक ही विभाग रह जाता है | सल्लक्षण प्राण जिस प्रकार विविध सृष्टियों के प्रवर्तक बनते हैं, एवमेव ये नाक्षत्रिक प्राण भी सृष्टिकर्म में प्रधान सहायक बनते हैं । ' निदानविद्या ' की मूलप्रतिष्ठा ये ही नाक्षत्रिकऋषि बनते हैं । ' भचक्र ' में प्रतिश्रुत तत्तन्नक्षत्रों के तत्तत् प्राणधम्मों के आधार पर कल्पित आख्यान बनाए गए हैं, जो कि नाक्षत्रिक आख्यान पुराणोक्त अष्टविध आख्यानों में से ' असदाख्यान ' ( कल्पित कथाएँ ) नाम से प्रसिद्ध हैं । जो महानुभाव पौराणिक आख्यानों को एकान्ततः काल्पनिक समझते हैं, वे भ्रान्ति में हैं । उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि, श्राध्यात्मिक ', आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिकाधिदैविक, प्राध्या-त्मिकाधिभौतिक, आधिदैविकाधिभौतिक, आध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिक, ये सात श्राख्यान तो सर्वथा सदाख्यान हैं । केवल एक विभाग अवश्य ही ऐसा है, जिसके पात्र, चरित्र, यादि सत्र कल्पित हैं । स्वयं पुराणाचार्यों नें इन कल्पित कथाओं के सम्बन्ध में यह स्पष्ट कर दिया है कि, इनके पात्रादि कल्पित ८२
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द्वितीयखण्ड 9 हैं । जिसे आज का युग ' माइथालॉजी ' कहता है, वही हमारा असदाख्यान विभाग ( मिथ्याकथाएँ– माइथालॉजी- मिथ्याज्ञान- कल्पित ज्ञान ) है । देवप्रतिमाएँ, उपासना के विविध प्रकार, वैदिक निदानविद्या, इत्यादि का इसी विभाग के माथ सम्बन्ध है, जैसा कि ' पुरा रहस्य ', तथा ' गीताविज्ञानभाष्यभूमिका • तर्गत ' भक्तिपरीक्षा ' नामक प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । काल्पनिक कथाएँ काल्पनिक अवश्य हैं, परन्तु इनके द्वारा जिस सत्य तात्त्विक रहस्य का बोध कराया जाता है, वह एक अलौकिक वस्तु है । ' असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ' शिक्षण - पद्धति के इस सर्वोच्च सिद्धान्त के प्रथम ग्राविष्कारक महर्नियों ने बालबुद्धियों की प्ररोचना करते हुए अञ्जसा तत्त्वबोध शिक्षणार्थ ही इन कथाओं की सृष्टे की है । प्ररोचना ( मन बहलाव ) के साथ साथ नाक्षत्रिक विद्यापरि-ज्ञान, लोक – राजनीतियों का स्पष्टीकरण, आदि अनेक प्रयोजन इन कथाओं के गर्भ में और प्रतिष्ठित हैं । उदाहरण के लिए एक ग्रारूपान पाठकों के सामने रखा जाता है । इसी से उन्हें विदित हो जायगा कि, अवश्य ही ये नाज्ञःत्रक आख्यान बड़ा सरलता से गहनतम तत्त्वों का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । " * एक वार श्रजापति अपनी लड़की के पीछे दौड़े । हरिणी बन कर दौड़ती हुई लड़की का प्रजापति ने हरिण बनकर पीछा किया । देवताओं नें यह दृश्य देखा, और निश्चय किया कि, प्रजापति अनुचित कर्म्म कर रहे हैं । देवताओं नें अपनी मण्डली में ऐसे व्यक्ति की खोज की, जो प्रजापति को दण्ड दे सके । परन्तु उन्हें अपने में एक भी व्यक्ति इस योग्य प्रतीत न हुआ । अन्ततोगत्वा देवताओं ने अपने घोरतमभाग को ( क्रोधाग्नि का ) एक स्थान पर सचित किया । वही सचित तेजोभाग ‘ नीलकण्ठ ' नामक रुद्रदेवता कहलाया । यही ' भूतवत् ' ( भूतपति ) नाम से भी प्रसिद्ध हुआ । ( अपने सञ्चित क्रोध से उत्पन्न क्रोधमूर्त्ति ) इस देवता को देवताओं नें यह कहा कि, प्रजापति अनुचित कर्म्म कर रहे हैं, आप इन्हें अपने शर से बींध डालिए । " यदि मैं यह * - " प्रजापतिर्वै स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् - दिवमित्यन्ये आहुः, उपसमित्यन्ये । तामृश्यो भूत्वा रोहितं भूतमभ्येत् । तं देवा अपश्यन् - कृतं वै प्रजापतिः करोति, इति । ते तमैच्छन् – य एनमारिष्यति । एतमन्योऽन्यस्मिन्ना वन्दन् । तेषां या एव घोरतमास्तन्त्र आसन, ता एकधा समभरन् । ताः सम्भृता एप देोऽभवत्, तदस्यतद् भूतवन्नाम । तं देवा अब्रुवन् - अयं वै प्रजापतिरकृतमकः, इमं विध्येति । स तथेत्यब्रवीत् । स वै वो वरं वृणा इति । वृणीष्वेति । स एतमेत्र वरमवृणोत - पशूनामाधिपत्यम् । तदस्यैतत् पशुमान्नाम । तम-म्यायत्याविध्यत् । स बिद्ध ऊर्ध्व उद प्रपतत् । तमेतं मृग इत्याचक्षते । य उ एव मृगव्याधः, स उ एव सः । या रोहित सा रोहिणी । या उ एवेषुरित्रकाण्डा, सा उ एवेषुस्त्रिकाण्डा " इति । ( ऐतरेयत्रा ० १: अ ० १० ख ० ) । ८३
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भूमिका कर्म्म करूँगा, तो मैं पशुपति माना जाऊँगा " यह सन्धा ठहराते हुए रुद्र ने शर चला कर प्रजापति को बींध डाला । प्रजापति का मस्तक कट कर पृथक् जा गिरा । वही ' मग ' ( मृगशिरा ) नाम से प्रसिद्ध है । स्वयं रुद्रदेवता ' मगव्याध ' ( मृग को मारने वाले शिकारी ) नाम से प्रसिद्ध है । रोहिणी ही प्रजापति की दुहिता है । त्रिकाण्ड नक्षत्र ही रुद्र के हाथ से निकला हुआ शर ( तीर ) है " । नक्षत्रसंस्था को पहिचानने वाले पाठकों को यह विदित होगा कि, द्यु प्रदेश में ' कृत्ति ' के आकार का ( नापित के छुरे का आकार का ) सुप्रसिद्ध आग्नेय ' कृत्तिका नक्षत्र ' है । इस कृतिका नक्षत्र से पूर्व ' लुब्धक ’ नाम से प्रसिद्ध नीलकण्ठ महादेव से पश्चिम, शशलानलक्षण ' चन्द्रमानक्षत्र ', तथा श्याव - शबल नामक श्वाननक्षव ' से उत्तर, ' पुनवसु ' नामक दो नक्षत्रों से उत्तर, इतने द्य प्रदेश में जितने वान्तः नक्षत्र हैं, उन सबको आधार बना कर ही पूर्वाख्यान की सृष्टि हुई है, य प्रदेश से उपलक्षित सुप्रसिद्ध रोहिणी नक्षत्र को लेकर भी इस कथा का समन्वय किया जा सकता । एवं उषःकालोपलक्षित ' औषसी ' को लेकर भो समन्वय किया जा सकता है । इसी आधार पर श्रुति ने कहा है – ' दिवमित्यन्ये आहुः, उपसमित्यन्ये ' | कृत्तिका नक्षत्र से ( कुछ ही ) पूर्वदिशा में शकटाकार ( इंग्लिश के A अक्षर जैसा ) रक्तवर्णात्मक, पञ्चतारात्मक एक नक्षत्र है । रोहित ( लोहित ) वर्ण होने से ही इसे ' रोहिणी ' कहा जाता है । तन्त्रशास्त्र के मतानुसार यहो दशमहाविद्याप्रकरण की ' कमला ' ( लक्ष्मी ) है । इसके दर्शन से भाग्यवृद्धि मानी गई है | अभ्युत्थानलक्षण आरोहणधर्म से भी इसे ' रोहिणी ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । इस रोहिणी नक्षत्र से ठीक षड्मान्तर पर ( १८० अंश पर ) समसम्मुख दक्षिणाकाश में वृश्चिक राशि से सम्बन्ध रखने वाला एक ज्योतिर्म्मय नक्षत्र और है, जो कि ' ज्येष्ठा ' नाम से प्रसिद्ध है । तन्त्रशास्त्र ने इसी को ' धूमावती ' ( लक्ष्मी ) माना है । यही अवरोहिणीलक्षण नितिदेवता है, ढंरिद्रा है । इसका दर्शन अशुभ माना गया है । जो इस नक्षत्र में उत्पन्न होता है, वह भाग्यहीन माना गया है । रोहिणी नक्षत्र से ईशानकोण की ओर ' ब्रह्महृदय ' नामक जो नक्षत्र है, वह प्रजापति का भग्नशरीर है । रोहिणी नक्षत्र से पूर्वम्थ मृगपशुमस्तकाकृतिरूप मृगशिरा नक्षत्र प्रजापति का भग्न मस्तक है । इस मस्तक. रूप मृगशिरा नक्षत्र में तीन तेजस्वी तारों का सम्बन्ध हो रहा है । वही रुद्र के हाथ से निकला हुआ शर है । रोहिणी नक्षत्र से पूर्व अग्निकोण की ओर महातेजस्वी, नीलवर्ण का जो एक चमत्कारपूर्ण नक्षत्र है वहो ' लुब्धक ' नाम प्रसिद्ध है । यही नीलकण्ठ महादेव हैं । सूर्य्यताप जिस वस्तु को २४ घण्टे में द्रुत करता है, लुब्धकताप उसे क्षणमात्र में भरमसात् करने की शक्ति रखता है । दुर्भाग्य से यदि सूर्य्य कहीं लुब्धक सन्निकट पहुँच जाय, तो सूर्य्य क्षणमात्र में बाष्परूप बन कर उत्क्रान्त हो जाय । जिस प्रकार उदुम्बरफल ( गूलर ) में सम्पूर्ण ओषधियों का तत्त्व संगृहीत है, एवमेव लुब्धक नक्षत्र में भचक्रस्थ सम्पूर्ण नन्नत्रों का तत्त्व संगृहीत है । अतएव इसे ' पशुपति ' कहना ग्रन्वर्थ बनता है । इस प्रकार य प्रदेशोपलक्षित रोहिणी नक्षत्र के आधार पर प्रतिष्ठित यह नाक्षत्रिक आख्यान आदर्श शिक्षा के साथ साक्ष नक्षत्रविद्या का भलीभाँति स्पष्टीकरण कर रहा है, जिसका कि विशद क विवेचन अन्यत्र
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द्वितीयखण्ड कृतधर्म्माण ऋपयो वभूवुः ” हत्यादि में पटित ' मन्त्र ' शब्द वेदात्मक विज्ञानतस्त्र का ग्राहक बन रहा है । ऋषियों ने वेदतत्त्व को देखा है, वेदतत्त्व का साक्षात् करने से ही वे ' प्राप्तऋषि ' कहलाए हैं । इस प्रकार वेदविद्या, तथा शब्दात्मक मन्त्र, दोनों में ( शब्दार्थ के तादात्म्य से ) सङ्करव्यवहार प्रचलित है । ग्रथवा स्वयं ' ‘ मन्त्र ' शब्द को ही शब्द और अर्थ, दोनों का वाचक समझते हुए एक दूसरी दृष्टि से विचार कीजिए । वर्णानुपूर्वीक्षण शब्द, तथा शब्दप्रतिपाद्य तात्त्विक देवताविज्ञानात्मक अर्थ, दनों के लिए मन्त्रशब्द नियत है । तत्त्व को भी मन्त्र कहा जा सकता है, तत्त्वप्रतिपादक शब्द को भी मन्त्र कहा जा सकता है । शब्दा-त्मक मन्त्र मग्त्रसंहिता रूप से प्रसिद्ध हैं । एवं तत्त्वात्मक मन्त्र का पूर्व के ' वेदविद्या के संस्थाविभाग ' प्रकरण में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । तत्त्व और शब्द दोनों में ' व्यासज्यवृत्ति ' से प्रतिष्ठित रहने वाला मन्त्रशब्द ' समुदाय दृशः शब्दा अवयवेष्व वत्तन्ते ' इस न्याय के अनुसार तत्त्ववेद का भी वाचक बन सकता है, एवं शब्दवेद का भी वाचक बन सकता है । दूसरे शब्दों में शब्दोपदिष्ट विज्ञान में निरूढ़ मन्त्रशब्द शब्द राशि के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है. एवं शब्दराशि - प्रतिपादित विज्ञान के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है | ' ब्रह्म वै मन्त्रः ' ( शत ० ७ | १ | १ | ५ ) के अनुसार मन्त्रसमानार्थक ही ' ब्रह्म ' शब्द है । एव यह ब्रह्मशब्द व्यासज्यवृत्त्या परलक्षण अर्थनपञ्च, तथा अपरलक्षण शब्दप्रपञ्च, दोनों से युक्त रहता हुआ । प्रत्येक के लिये भी प्रयुक्त होता देखा गया है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है--द्व े
ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
निष्कर्ष बट्टी हुग्रा कि वाक्यसंग्रह को भी मन्त्र कहा जा सकता है, एवं तत्प्रतिपाद्य विद्यातत्व को भी मन्त्र कहा जा सकता है । विद्यात्मक ( तत्त्वात्मक ) मन्त्रों का ऋषयों ने अपनी श्रादृष्टि से साक्षात्कार किया, इसी अभिप्राय से ये ' मन्त्रद्रष्टा ' कहलाए | एवं अपने दृष्ट अर्थ के आधार पर दृष्ट अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए उन्होंने बुद्धिपूर्वक वाक्यरचना की । इन वाक्यरचनात्मक मन्त्रों के अभिप्राय से इन्हें ' म त्रकृत् ' माना गया । जो ऋषि मन्त्रद्रष्टा ( तत्त्वद्रष्टा ) हुए, वे ही मन्त्रकृत् कहलाए, जिन्होंने मन्त्रों का ( शब्दात्मक मन्त्रों का ) तात्पर्य्यं भली भाँति समझ लिया, वे ' मन्त्रवित् ' कहलाए । एवं जिस मन्त्र में जिस ऋषिप्राण का निरूपण हुग्रा, यह प्राणात्मक ऋषे ' मन्त्रवनि ' कहलाया । इस प्रकार दर्शन, निर्माण, वेदन, आधिपत्यादि भावों के भेद से प्राणत्वैव तथा प्राणी -विव ऋषियों के ' मन्त्रद्रष्टा ' - मन्त्रकृत्'- ' मन्त्रपति ' - मन्त्रवित् ' श्रादे अनेक भेद हो गए, जिनका कि निम्नलिखित वेदमन्त्र सटीकरण कर रहे हैं ---१ – यामृषयो मन्त्रकृतो मनीषिण अच्छन् देवास्तपसा श्रमेण । तां देवीं वाचं हविषा यत्र महे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके ॥
२ - नमा ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यः ।
मा मा ऋपयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहुदेवीं वाचस् ॥
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