Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 121–130
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130
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भाष्यभूमिका
३ – ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयन् गिरः ।
सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञ े वीरुधां पतिः ॥
- ऋक् सं ० ६१ ९ ४।२ यदि मनुष्य - ऋषि ही वेदमन्त्रों के कर्ता हैं, तो ' अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा इत्यादि स्मृतियों का समन्वय कैसे होगा? इस प्रश्न की विशद मीमांसा । गे के प्रकरणों में यथास्थान होने वाली है । प्रकृत में केवल यही वक्तब्य है कि, जिन मनुष्यविध, आप्त, महर्षियों ने तत्त्वात्मक वेद का साक्षात्-कार • किया, अथवा जो नित्यवेद स्वयं जगदीश्वर की प्रेरणा से इन तपःपूत महर्षियों के पवित्र अन्तःकरणों में प्रस्फुटित हुआ, वही वेदतत्त्व ऋषि दृष्ट वेद कहलाया, एवं इसी अभिप्राय से इन्हें ' ' मन्त्रद्रष्टा ' कहा गया । निम्नलिखित श्रुति - स्मृतिवचन इसी द्रष्टृलक्षण ऋषि का स्पष्टीकरण कर रहे हैं--१-- तद्वा ऋषयः प्रतिबुबुधिरे, य उ तर्हि ऋषय आसुः ।
२ – ये समुद्रान्निरखनन् देवास्तीक्ष्णाभिरभ्रिभिः ।
सुदवो श्रद्य तद्विद्याद् यत्र निर्वपणं दधुः ॥
३ – अजान् ह वै पृश्नीन् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भू अभ्यानर्षत् । तद् ऋषीणां ऋषित्त्वम् । ४ - यज्ञ ेन वाचः पदवीमायंस्तामन्त्रविन्दन् ऋषिषु प्रविष्टाम् ।
५ - युगान्तेऽन्तहितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥
जो जिस विषय का साक्षात्कार कर लेता है, वह उस विषय का ' द्रष्टा ' मान लिया जाता है । इसी को ' प्राप्त ' ( विषयप्राप्त, पहुँचवान ) कहा जाता है । विषयविभाग स्वयं दृष्ट दृष्ट भेद से दो भागों में निभक्त है । जिन विषयों को हम अपनी इन्द्रियों से देख सकते हैं, वे सत्र लौकिक विषय ' दृष्ट - अर्थ ' हैं । एवं श्रात्मा, परमात्मा, म्वर्ग, ऋषि, पितर देवता, आदि जिन विषयों का ( भूतमर्य्यादा से प्रतीत होने के कारण ) हम अपनी इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं कर सकते, वे सत्र अतीन्द्रिय विषय अलौकिक, किंवा पारलौकिक बनते हुए ' अदृष्ट - अर्थ ' हैं । क्योंकि पदार्थ दो जातियों में विमक हैं, अतर द्रष्टा भी दो भागों में ही विभक्त मानने पड़ते हैं । लौकिक विषयों के द्रष्टा जहाँ ' लौकिक ' कहलाते हैं, वहाँ अलौकिक विषयों के द्रष्टा ' ऋषि ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । द्रष्टा के दृश्य प्रपञ्च को ‘ भौतिक, दैविक, अतीन्द्रिय ' भेद से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है । जो मनुष्य इन्द्रियों के द्वारा भौतिक पदार्थों के द्रष्टा बनते हैं, भौतिक विज्ञान के अन्वेषक बनते हैं, उन्हें ' आाप्त ' अवश्य कहा जा सकता है, परन्तु ऋषि नहीं माना जा सकता । वे ही प्राप्त द्रष्टा ऋषि कह-लाएँगे, जो आर्यदृष्टि से दैविक, तथा अतीन्द्रियभावों का प्रत्यक्ष करते हैं । यही आर्षदृष्टि ' ऋषिदृष्टि ' ८ ÷
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द्वितीय ars द्रष्टव्य है । प्रकृत में वक्तव्यांश यही है कि, नक्षत्रों में रहने वाले प्राण भी सृष्टिप्रवर्तक ऋषि ही मने गए हैं । इन नाक्षत्रिक ऋषिप्राणों में से सुप्रसिद्ध ' सप्तर्षिमण्डल ' तो प्रसिद्ध ही है, जो कि ध्रुव के चारों ओर अहोरात्र में एक परिक्रमा लगा लेता है । इन्हीं सप्तर्षियों को ( भालू की प्रकृति से युक्त रहने के कारण ) ' ऋक्ष ' ( रींछ - भालू ) नाम से भी व्यवहृत किया गया है । जिस समय श्राग्नेय कृत्तिका नक्षत्र पर अयन - सम्पात था, उस समय इन कृत्तिकानक्षत्रों को ( जो कि संख्या में सात हैं ) सप्तर्षिगण की पत्नी माना जाता था, जैसा कि निम्नलिखित ब्राह्मण - श्रुति से प्रमाणित है -“ एकं, द्व े , त्रीणि, चचारीति वाऽन्यानि नक्षत्राणि । अथैता एव - भूयिष्ठाः, यत् कृत्तिकाः । एता ह वै प्राच्यै दिशो न च्यवन्ते । सर्वाणि ह वाऽन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्च्यवन्ते । ऋक्षाणां ह वाऽएता अग्रे पत्न्य आसुः । सप्तर्षी नु ह स्म वै पुरर्त्ता इत्या-चक्षते । श्रमी ह्युचरा हि सप्तर्षय उद्यन्ति, पुर एता: " । --शत ० ब्रा ० २/२ | १ | ३ | इस सप्तर्षिमण्डल के अतिरिक्त एक दूसरा छोटा सप्तर्षिमण्डल और है, जिसका कि ध्रुवसप्तक से सम्बन्ध है | यह सप्तर्षिगण ' सप्तमाता ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यही ध्रुव की पहिचान है । इन सातों में ६ नक्षत्र तो घूमते रहते हैं, एक नक्षत्र घूमता प्रतीत नहीं होता । श्रतएव इसे ' ध्रुव ' कह दिया जाता है । वस्तुत: ध्रुव किसी नक्षत्र का नाम नहीं है । अपितु ध्रुव तो एक निराकार वह विद्युत्प्राण है, जिसके आकर्षण से आकर्षित भूपिण्ड स्वाक्षपरिभ्रमण के द्वारा दैनंदिनगति का प्रवर्तक बन रहा है । यह विद्युतप्राण पार्थिव विष्वद्-वृत्त की आधारभूमि बनता हुआ नाकस्थ विष्णु के चारों ओर परिक्रमा लगाया करता है । एवं इसकी यह एक परिक्रमा २५ हजार वर्ष में समाप्त होती है । जिस समय जिस स्थान पर यह ध्रुव विद्युतप्राण प्रतिष्ठित रहता है, वहाँ के स्थूल नक्षत्र को ( परिचय के लिए ) ध्रुव नाम दे दिया जाता है । इसी सामान्य परिभाषा के अनुसार ग्राज हमने ध्रुवनक्षत्र नाम से एक नक्षत्र की कल्पन्न कर रक्खी है । वस्तुतः ध्रुवनक्षत्र इन सातों से भिन्न, सातवें नक्षत्र से उपलक्षित ध्रुवप्राण है, जिसकी कि उपासना का द्वार सातव स्थूलनक्षत्र बना हुत्रा है । यदि नियमपूर्वक ध्रुव की उपासना की जाती है, तो हमारी मेधा, श्री, सम्पत् सब की अभित्रृ द्धे हो जाती है । नियमशः ध्रुवदर्शन करना ही घ्र वोपासना है, जिसका कि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्टीकरण हो रहा है—
जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये ।
यं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा ॥
– सामसंहिता पूः २।१ । ७ इनके अतिरिक्त जमदग्नि, अपांवत्स, नारद, तुम्बुरु, याम्यमत्स्य, भृगु, अङ्गिरा, आदित्य, अग्नि, वरुण, यम, निॠ'ति, बृहस्पति, सविता, श्रादि नाक्षत्रिक अनन्त ऋषिप्राण और हैं, जिनका भिन्न भिन्न सृष्टिक्रम्मों में व्यवस्थित रूप से उपयोग हो रहा है । यही रोचनालक्षण - ऋषि का दूसरा विभाग है । एवं ऋषिशब्द की यही दूसरी व्याप्ति है । ८५
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भाष्यभूमिका ( ३ ) – द्रष्टृलत्क्षण ऋषि — ( ३ ) - नित्यसिद्ध वेदतत्त्व के द्रष्टा ऋषि ही सुप्रसिद्ध द्रष्टा ऋषि हैं । भूमिका - प्रथम खण्ड ' वेद-विद्यत्र मलड़कृत वेदनिरुक्ति ' प्रकरण में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सर्वज्ञ - सर्ववित्- सर्वशक्ति, श्रव्ययक्षरानुगृहीत अक्षरप्रजापति विषय, संस्कार, शब्दोपाधि के भेद से ब्रह्म - विद्या - वेद, भावों में परिणत हो रहा है। देवता प्राण,, भूत, भौतिकादि पदार्थों का नियत कार्य कारणभाव ही ' विद्या ' है । नियतिः सत्य का यथार्थ स्वरूपपरिज्ञान ही विद्या है । गृहीत पूर्वाहित संस्कार से अभिनय में आने वाला ( व्यक्त होने वाला ) वही नियतिः सत्य विद्या है, गृह्यमाण धर्म ( विषय ) से व्यक्त होने वाला वही नियतिः सत्य ' ब्रह्म ' है, एवं वाकू से व्यक्त होने वाला वही नियतिः सत्य वेद है । संस्कारवछिन्न वही सत्यज्ञान विद्या है, विषयावच्छिन्न वही सत्यज्ञान ब्रह्म है, एवं शब्दावच्छिन्न वही सत्यज्ञान वेद है, जैसा कि प्रथमखण्ड में विस्तार से बतलाया जा चुका है | अक्षरप्रजापति के इन तीनों विवत्तों में से प्रकृत में शब्दावच्छिन्न वेदविवर्त्ता की ओर ही पाठकों का ध्यान कर्षित करना है । यद्यपि सर्वसाधारण की दृष्टि में वेद, और मन्त्र शब्द परस्पर पर्याय बने हुए हैं । इसी साधारण दृष्टि के आधार पर मन्त्रसमष्टिलक्षण संहिताग्रन्थ को ' वेद ' माना जा रहा है । परन्तु वस्तुतः वेदशब्द संज्ञी है, एवं मन्त्रशब्द संज्ञा है । वेद मन्त्र नहीं है, अपितु वेद का नाम मन्त्र है । जिन मन्त्रों में जो देवता-विज्ञान प्रतिपादित है, वह नित्यसिद्ध विज्ञानतत्त्व वेद है । एवं इस देवताविज्ञान का स्पष्टीकरण करने वाली शब्दराशि मन्त्र है | शब्दात्मक मन्त्र वाचक है, तत्त्वात्मक वेद वाच्य है । इस प्रकार संज्ञा - संज्ञी भेद से यद्यपि मन्त्र, तथा वेद शब्द भिन्न भिन्न अर्थों में व्यवस्थित हैं, तथापि दोनों के ( शब्दार्थ के ) तादात्म्य-सम्बन्ध को लक्ष्य में रखकर मन्त्र को वेद कह दिया जाता हैं, को मन्त्र शब्द से व्यवहृत कर दिया जाता है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है-प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एतं विदन्ति वेदेन तस्मादस्य वेदता ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, भेद से प्रमाज्ञान के तीन साधक माने गए हैं । जहाँ प्रत्यक्ष, तथा अनुमान-प्रमाण की गति अवरुद्ध हो जाती है, ऐसे प्रतीन्द्रिय तत्त्वों के सम्बन्ध में तीसरे शब्दप्रमाण ( श्राप्तप्रमाण ) का ही आश्रय लिया जाता । उक्त वचन ' एत विदन्ति वेदेन ' से इस शब्दप्रमाण का ही दिग्दर्शन करा रहा है । इस प्रकार यहाँ का वेदशब्द शब्दरूप मन्त्रप्रमाण के अभिप्राय से ही प्रयुक्त है । यह सब कुछ ठोक होने पर भी यह सिद्धान्त पक्ष है कि, शब्दोपपादित देवताविज्ञान ' वेद ' है, एवं देवताविज्ञानोपपादक शब्द मन्त्र है । इसी भेददृष्टि को लक्ष्य में रखकर द्रष्टृलक्षण - ऋषि का विचार प्रस्तुत है । जिस प्रकार वेदशब्द मन्त्राभिप्राय से प्रयुक्त होता है, एवमेव मन्त्रशब्द वेदाभिप्राय से भी प्रयुक्त हुआ है, जैसा कि " ऋपिर्वेदमन्त्रः ' इत्यादि व्यवहारों से प्रमाणित है । " ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः " - " सात्तात-* देखिए उप ० वि ० प्र ० ख ० वैज्ञानिक वेदनिरुक्ति ८६
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द्वितीयखण्ड कहलाती है, जो कि सर्वसाधारण में नहीं हुआ करती । पूर्वजन्म के तपोऽनुष्ठान से, अथवा ऐहिक तपोनुष्ठान से यह ऋषेदृष्टि स्वतः प्रादुर्भूत होती है । इसी को अलौकिक कहा जाता है । मनुध्येतर प्राणियों में ऐन्द्रियकज्ञान का अभिमान करने वाला साधारण प्राणी ईश्वर - प्रदत्त दृष्टि से ( ततद्विशेत्र प्राणियों में भी यह अलौकिकदृष्टि देवो- सुनी जाती है । मनुष्य जिन कतिग्य अतीन्द्रियभावों का अनुभव करने में असमर्थ है, उनका अनुभव, तथा प्रदर्शन करते देखे गए हैं । केवल सुसूक्ष्म गन्धादि के आधार पर चौर को ढूंढ निकालना, विश्वसंपृक्तान्न को पहिचान लेना श्वान का गुण देखा गया है । नकुल ( न्यौला ) विषनाशक औषधि परिज्ञाता है । होने वाली वृष्टि का मण्डूकों को परिज्ञान हो जाता है । श्वान - शृगाल - काक - विङ्गलादि भावी अर्थ के परिज्ञाता, तथा सूचक माने गए हैं । श्रारण्यपशु अपने अपने रोगों की औषधियाँ पहिचानने में स्वयं समर्थ हैं । जिस प्रकार इन प्राणियों में ये विचित्र गुण स्वभावतः पाए जाते हैं, एवमेव पूर्व सर्वथा श्रतीन्द्रि यार्थजनक धर्म्म कितने एक विशेष मनुष्यों में भी देखा गया है । ऐसे अतीन्द्रियार्थ --द्रष्टात्रों के लिए भूत-भविष्यदर्थ वर्त'मानवत् त्रने रहते हैं । ऐसे श्रतीन्द्रियार्थद्रष्टा अलौकिक प्राप्त पुरुषों को ही द्रष्टा ऋषि कहा जाता है, एव यही ऋषिशद की दृष्टलक्षणा तीसरी प्रवृत्ति है । क्योंकि ये द्रष्टा ऋषि ही वेदशास्त्र के प्रवर्त्तक हैं, अतएव इन्हें ‘ वेदप्रवर्त्त ' क ' भी कहा जा सकता है ।
त्रिभूतप्रकाशानामनभिप्लुतचेतसाम् ।
अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥ १ ॥
अतीन्द्रियानसंवेद्यान् पश्यन्त्यार्षेण चतुषा ।
ये भावा वचनं तेषां नानुमानेन बाध्यते ॥ २ ॥
( ४ ) - वलक्षण ऋषि— ( ४ ) –मान्त्रवर्णिक ऋषि को ही ' वक्तृलक्षण ऋषि ' कहा जाता है | शब्दात्मक मन्त्र जिसका वाक्य है, वह उस मन्त्र का ऋषि है एवं मन्त्र में जिस देवता ( तस्त्र ) का प्रतिपादन होता है, वह उस मन्त्र का देवता है । जिन ऋषियों ने तात्रिक अर्थ को दृष्टि से देख कर वाक्यरूप से शब्दात्मक मन्त्र का उपदेश दिया है वे ही उन वाक्यात्मक मन्त्रों के प्रवक्ता माने गए हैं । क्योंकि ऋषियों ने ही इन मन्त्रों का उपदेश दिया है, अतः वे ही इन मन्त्रों के वक्ता ऋषि माने गए ह । कहीं कहीं अनृषियों को भी ऋषि मान लिया गया है । और इसका कारण है विवक्षा । किसी ने मन्त्र कहा नहीं है, परन्तु यह मान लिया गया है कि, अमुक अमुक मन्त्र का वक्ता है । इस विवक्षामात्र से अनृषि भी ऋषि नाम से सुने गए हैं । ' बृहद्द ' वता ' के अनुसार मन्त्रवर्ग ' देवस्तव - संवाद - आत्मस्तव - भाववृत्त भेंद से चार मागों में विभक्त हैं । यदि माववृत्त - वर्ग का देवस्तववर्ग में अन्तर्भाव मान लिया जाता है, तो नहीं रह जाते हैं ।
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भाष्यभूमिका अमल्लक्षण, अतएव सदात्मक * प्रागारूप ऋषितत्त्व ही मौलिकवेद का स्वरूपलक्षण है । दूसरे शब्दों में प्रारूप ' ऋषि ' तत्त्व ही मौलिकवेद है, जिसके विज्ञेय - दुर्विज्ञेय - विज्ञेय एवं सुबेय - चिरन्तन इतिहासों का पूर्व - परिच्छेदों में क्रमशः दिग्दर्शन कराने की चेष्टा हुई है । मायातीत, अतएव विश्वातीत परात्पर परमेश्वर से ग्रभिन्न ग्रनन्तभावापन्न वही मौलिक वेद विज्ञेय वेद है । मायामय, अतएव सहस्रत्रत्शेश्वरात्मक अश्वत्थब्रह्मलक्षण महेश्वर मे भिन्न सहस्रभावापन्न वही मालिक वेद दुर्विज्ञेयवेद है । योगमायावच्छिन्न, अतएव एकत्ररूराःवरात्मक अश्वत्थ - शास्त्रात्मक उपेश्वर से भिन्न वही मौलिकोट विज्ञेयत्रेद है । एवं भूतमायावच्छिन्न, अतएव बल्शात्रभागात्मक अश्वत्थशास्त्रानुगत सुपर्णानुगत ईश्वर से भिन्न वही मौलिक वेद सुविज्ञेयवेद है । इन चारों वेदस्थानों में से अन्तिम चतुर्थ विज्ञेयवेद का मौलिक स्वरूप ही भरद्वाजमहर्षिद्वार । दृष्ट वह ' सावित्राग्नि ' है, जिसके परिज्ञान से, उपासना मे वेदस्वरूप गतार्थ बन जाया करता है । यही चतुर्द्धा विभक्त मौलिक वेद का संक्षिप्त चिरन्तन इतिवृत्त है, जिसकी मौलिकता उस ' ऋषि ' पदार्थ पर ही प्रतिष्ठित है, जो कि वेदात्मक ऋषि-पदार्थ असत् - राचना - द्रष्टृ - वक्तृ - भेद से चार संस्थानों से परिगृहीत है । १ - जायातील -रमेश्वर: - सर्वातीतः सर्वगः - तदभिन्नः - ' अभिज्ञेयवेदः ' । - महेश्वरः - - सहस्रत्रल्शेश्वर: - तदभिन्नः -- ' दुषि ज्ञेयवेदः ' । २ - मायामयः - म ३ - प्रागमायो - उपेश्वरः - - एकवल्शेश्वरः -- तदभिन्न: - -'विज्ञेयत्रेदः ' । ४ – भूतमायी -- ईश्वरः --- वल्शाप्रतिष्ठितः -- तदभिन्नः -- ' सुविज्ञेयवेदः ' । * १ – सल्लक्षण - ऋषिः – वेदतत्त्वस्वरूपः - तत्त्वर्षिः २ - रोचनाज्ञक्षण - ऋषिः - वेदतत्त्वस्वरूपः -- तत्त्वर्षिः ३ - द्रष्टृलत्तण - ऋषिः - - वेदतत्त्वद्रण - - मानव ऋषिः ( तत्त्यर्पिनाम्ना प्रसिद्धः ) ४ - बक्तृलक्षण - ऋषिः - - वेदतत्त्ववक्ता- --मानव ऋषिः ( तत्त्वर्षिनाम्ना प्रसिद्धः ) सनातन या निष्ठा से अनुप्राणित अपौरुषेय वेद से सम्बन्ध रखने वाले मौलिक वेद का इतिवृत्त वेदप्रेमियों के सम्मुख उपस्थित किया गया । यद्यपि स्वयं वेद का मौलिक इतिवृत्त ही वेदतत्त्व की पौरुषेयता * सामग्रआसीत् । तदाहु: - ' किं तदसदासीत् ' इति?, ' ऋषयो ' वाव तेऽग्र-ऽमदासोत् । तदाहुः - ‘ के तऽऋषयः ' इति १, प्राणा वाऽऋषयः । ते यत् पुरास्मात् सर्व-मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा ' अरिपन् ', तस्मात् —'ऋषयः ' । - शतत्राः ६ | १ | १ | १ |
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द्वितीयखण्ड में स्वतःप्रमाण प्रमाणित हो रहा है । जिस तत्त्वात्मक अपौरुषेय वेदप्रमाण्य से सत्र - कुछ प्रमाणित है, उसे प्रमाणित करने के लिए यद्यपि किसी अन्य प्रमाण की यत् किञ्चित् भी अपेक्षा नहीं है । तथापि लक्षणैकचक्षुष्क ग्रास्तिक भारतीय मानव की ' शब्दप्रमाणका वयम् । यदस्माकं शब्द श्रह, तदस्माकं प्रमाणम् ' इस प्राप्तोपदेशशब्दात्मिका सहज प्रमाणनिष्ठा के अनुरोध से मौलिकवेद से सम्बन्ध रखने वाले श्राप्तप्रमाणों का भी अनुगमन अनिवार्य्यकोटि में हीं समाविष्ट हो रहा है । इसी अनिवार्य्यता की पूर्ति के लिए ' तात्त्विकवेदानुगत प्रमाणवाद ' रूप मे द्वितीयस्तम्भ पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका - तीयखण्डान्तर्गत-' वेद का मौलिक स्वरूप ' नामक प्रथमस्तम्भ - उपरत - १ -६१
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श्रीः ' उपनिषद्रिज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत ' वेद का मौलिकस्वरूप ' नामक प्रथमस्तम्भ - उपरत
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत-" तात्त्विक वेद, और प्रमाणवाद ” द्वितीयस्तम्भ २ नामक
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श्रीः २ - तात्त्विकवेद, और प्रमाणवाद - लित - श्रद्धा विश्वास और प्रमाणवाद-सनातन धर्मावलम्बी श्रास्तिक जन के परितोष के लिए वेद के वैज्ञानिकेतिवृत्त - प्रतिपादन से पहिले स्वयं सनातनधर्मावलम्बी होने के नाते हमारा आवश्यक कर्तव्य हो जाता है कि सर्वसाधारण में प्रचलित श्रद्धा - विश्वास के सर्वथा विपरीत जाने वाले वेद के तात्विक स्वरूप के समर्थन के लिए प्रमाणवाद का श्राश्रय लिया जाय । पूर्वप्रकरण से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, वेदग्रन्थ भिन्न वस्तु है, एवं वेदतत्त्व भिन्न बस्तु है | वेदतत्त्व नित्य है, कूटस्थ है, पौरुषेय है, अकृतक, किंवा ईश्वरकृत है । वेदग्रन्थ अनित्य है, पौरुषेय है, कृतक है, किंवा ऋषिकृत है । आस्तिक समाज वेद के सम्बन्ध में वेदतत्त्व, तथा वेदग्रन्थ का पार्थक्य स्वीकार करने के लिए सन्नद्ध नहीं है । उसकी दृष्टि में शब्दात्मक वेदग्रन्थ ही अपौरुषेय है । ऋषियों के अन्तःकरण में ईश्वरीय प्रेरणा से शब्दात्मक वेदमन्त्र आनुपूर्वी से स्वतः प्रकट हुए हैं । ऋषिगण शब्द-वेद के कर्ता ( रचयिता ) नहीं हैं, अपितु द्रष्टा - मात्र हैं । इस प्रचलित श्रद्धा - विश्वास के सर्वथा विपरीत जब हम यह कहने का साहस करते हैं कि, वेदग्रन्थ, किंवा शब्दात्मक वेदमन्त्र तो ऋषियों की बुद्धिपूर्वा वाक्य-कृति ( वाक्यरचना ) है, एवं तत्त्वात्मक वेदमन्त्र ऋषियों की दृष्टि है । दूसरे शब्दों में तत्त्वात्मक वेदमन्त्र ( वेदात्मक नित्य विज्ञान ) तो ऋषियों के अन्तःकरणों में स्वतः प्रादुर्भूत है, एवं शब्दात्मक वेदमन्त्र ( वेदग्रन्थ ) ऋषियों की रचना है, तो ग्रास्तिक समाज क्षुब्ध हो पड़ता है । इस क्षोभ - शान्ति के लिए हमारे प्रज्ञाकोष में एक-मात्र यही उपाय बच रहता है कि, " शब्दप्रमाणका वयं, यदम्माकं शब्द आह तदस्माकं प्रमाणम् " -" तस्माच्छास्त्र ं प्रमाणं ते कार्याकार्य्यत्र्व्यवस्थितौ " - लक्षणैकचक्षुष्का वयम् ” का निनाद करने वालों के सामने कुछ एक वैसे प्रमाण उपस्थित कर दिए जायँ, जो स्पष्टरूप से वेद के तात्त्विक रूप का समर्थन करते हुए यह सिद्ध कर सकें कि, शब्दात्मक वेदमन्त्रों के द्वारा प्रतिपादित नित्यसिद्ध, कूटस्थ, देवताविज्ञानात्मक तत्त्व ही वेदपदार्थ है । इसी दृष्टिकोण के स्पष्टीकरण के लिए प्रकृत प्रमाणवाद वेदभक्तों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । हमें विश्वास है कि, तात्त्विक वेदस्वरूपममर्थन के लिए यहाँ जो प्रमाण उद्धृत हुए हैं, उनके सम्यगवलोकन से आस्तिक समाज का दृष्टिकोण अवश्य ही परिवर्तित होगा ।
२ - ऋक्तत्व, और अग्नि-( अग्निवेदः ) १ -- यमग्नि मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि ।
तस्य प्रषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयाममि ॥
—ऋक्सं ० १।३६।११ । “ मेध्यातिथि नामक कण्व ऋषि ने ऋत से जिस अग्नि को प्रदीप्त किया, उस अग्नि से चारों ओर रश्मियाँ निकल पड़ीं । इस प्रदीप्त अग्नि को ऋचा नै प्रवृद्ध कर दिया । ऐसे इस प्रवृद्ध अग्नि को आज ६४
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द्वितीयखण्ड हम अपने यज्ञ में प्रवृद्ध करते हैं " । इस मन्त्र में आधिदैविक, तथा आधिभौतिक अग्नि के स्वरूप का स्पष्टीकरण हुआ है | सौर सावित्राग्नि आधिदैविक अग्नि है, जिसका कि पूर्वप्रकरणान्तर्गत सावित्राग्नि - स्वरूप-निरुक्तिपरिच्छेद में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । सौर सावित्राग्नि यद्यपि स्वस्वरूप से घोर कृष्ण है, ज्योति का आत्यन्तिक अभाव है । तथापि सूर्य्यसंस्था से ऊर्ध्व भाग में अवस्थित पारमेष्ठ्य ऋतधर्म्मा, दाह्य. सोम की आहुति से यह दाहक सावित्राग्नि प्रदीप्त हो पड़ता है । सावित्राग्नि में जलते हुए ऋत सोम का ही नाम प्रकाश है, जैसाकि - " अजनयत् सूर्ये ज्योतिरिन्दुः " ( ऋक्सं ०६ | ७ | ४१ । ) - " त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ” ( ऋकसं १६१२२ ) इत्यादि अन्य मन्त्रवर्णनों से स्पष्ट है । इसी ऋतसोमाहुति से सूर्य्य ' अग्निहोत्र ' कहलाया है, जैसा कि - " सूर्यो ह् वाऽअग्निहोत्रम ( शत ० १ ३ | १ | १ । ) इत्यादि वाह्मणश्रुति से स्पष्ट है । जब दाहक सावित्राग्नि में ऋत सोम की आहुति होती है, तो यह सौर अग्नि प्रज्वलित होना हुआ महस्ररश्मियों से युक्त हो जाता है । सूर्य्य की सहस्र रश्मियाँ इसी सोमाहुति से उद्भूत हैं । रश्मियुक्त इस सावित्राग्नि की वृद्धि का एकमात्र कारण है ऋचाएँ । मूर्ति का ही नाम ' ऋ ' है, यही प्रस्ताव है, यहीं से मूर्तिधारात्मिका रश्मियों का विनिर्गम होता है, जैसा कि आगे के परिच्छेदों में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । प्रत्येक रश्मि सूर्य्य - पिण्डों की धारावाहिक - क्रमिक, उत्तरोत्तर ह्रस्वीभृत प्रतिमाएँ हैं । मूलपिण्ड महदुक्थ-रूप ऋकममुद्र है । मूलपिगड के केन्द्र को आधार बनाकर चारों ओर व्याप्त रहने वाली रश्मियाँ अनेक उक्थों ( तूलपिण्डों ) की समष्टि है, जो कि ऋगुरूप तूलपिण्ड ' उक्थामद ' नाम से प्रसिद्ध है । उक्थामदरूप इन्हीं ऋचाओं ( तूलपिण्डों ) के वितान से सूर्य्यविम्बावच्छिन्न सावित्राग्नि लोकालोकपर्यन्त व्याप्त हो जाता है । इस ऋङ्मय, साममय रश्मिरूप अधिदैवक सौर अग्नि का महर्षि कण्व ने मन्थनप्रक्रिया के द्वारा समुद्— भूत अपने विभौतिक ( याज्ञिक ) ग्राहवनीय अग्नि में ऋक्तत्व की प्रतिकृतिभूत मन्त्रों से प्रधान किया था । केवल कर्मकाण्ड का समन्वय करने वाले सर्वश्री सायणाचार्य ने प्रकृत मन्त्र के " तमिमा ऋच: " वाक्य का -- तमग्निमिमा अस्माभिः प्रयुज्यमाना ऋचो वर्धयन्तीति शेषः ( इस यज्ञाग्नि को हमारे -ऋत्विजों के मुख से निकली हुई ऋचाएँ प्रवृद्ध करती हैं ) यह अर्थ माना है । आधिभौतिक प्रपञ्च से मम्बन्ध रखने वाले कर्म्मकाण्ड के सम्बन्ध में सायणाचार्य का यह समन्वय सर्वथा आदरणीय है । किन्तु केवल कम्मैतिकर्तव्यता पर ही मन्त्र - ताल का विश्राम नहीं है । मन्त्रों का प्रधान लक्ष्य तो आधिदैविक वैज्ञा-निक तत्त्व ही है | एवं इस पक्ष में ' ऋचः ' का अर्थ तत्त्वात्मक, उक्थामदलक्षण उक्थ ही होता है । प्रदीप्त अग्नि से रश्मिर्यां निकल पड़ती हैं, एवं रश्मियाँ मृलोक्थ के तूलरूप ही हैं, जैमा कि- " अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते ” इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । ३ – अग्नितत्त्व, और ऋक्साम-( अग्निवेद ) २ – अग्निर्जागार तमुचः कामयन्ते -मुसामानि यन्ति ।