Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 131–140
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140
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भाष्यभूमिका अग्निर्जागार तमयं सोम आह--तवाहमस्मि सख्य न्योकाः ॥ --ऋक् सं ० ५।४५।१५ । “ अग्नि जग पड़ा, ऋचाएँ इस की कामना करने लगीं । साम इसके अनुगत होने लगे । अग्नि बग-पड़ा, उसी समय सोम ने इस अग्नि से कहा कि, हे अग्ने! मैं तुम्हारा नीची श्रेति का मित्र हूँ " । तात्त्विक अर्थ का विचार पीछे कीजिए । पहिले सायण भाष्यसम्मत अर्थ की मीमांसा कर लीजिए । प्रकृत मन्त्र का भाष्यकार कोई अर्थ नहीं किया है । इस मन्त्र से पहिले प्रश्नगर्भित एक मन्त्र और पठित है । उसी के अर्थ से श्रीसाग ने द्वितीय मन्त्र को गतार्थ मान लिया है । देखिए -यो जागार तमृचः कामयन्ने यो जागार तर सामानि यन्ति । यो जागार तमयं सोम यह तत्राहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥ —ऋक् ॰ ५ | ४४।१४ । " यो देवो जागार सर्वदा विनिद्रो जागरूको गृहे वर्त्तते, तमुत्रः सर्वशास्त्रात्मिकाः कामयन्ते । यश्च जागार तमु तमेत्र सामानि स्तोत्ररूपाणि यन्ति प्राप्नुवन्ति । यो जागार समयमभितः सोम श्राह वक्ति मां स्वीकुरु इति । हे अग्ने तव सख्ये ममानख्याने हितकरणे न्योका नियतस्थानोऽहं श्रस्मि भवामि " ( सायणभाष्य ) - " अग्निर्जागारेति पञ्चदशी पूर्वमेत्र निगदितव्याख्या, य इत्यस्य स्थाने श्रग्निरिति विशेषः " । भाष्यप्रेमियों की श्रद्धा को अणुमात्र भी विचलित न करते हुए जब हम सायगणभाष्य का समन्वय करने आगे बढ़ते हैं, तो सहसा गत्यवरोध हो जाता है । भाष्यकार का अभिप्राय यह है कि, – ' यो जागार ० ' इत्यादि मन्त्र घर में सड़ा जाग्रत रहने वाले गृहपति अग्नि का अनिरुक्त रूप से निरूपण कर रहा है, एवं ' अग्निर्जागारः ' इत्यादि मन्त्र निरुक्तरूप मे इसी अग्नि का स्पष्टीकरण कर रहा है । ऋच: का अर्थ सवं-शास्त्रात्मक ऋङ्मन्त्र है, सामानि का अर्थ उद्गाता नामक ऋत्विक के द्वारा होने वाला स्तं त्रपाठ ( सामगान ) है, एव सोम का अर्थ आहुति के लिए सोमलताओं से निकाला हुआ ४० ग्रहपात्रों में विभक्त मर्यादा से प्रतिष्ठितं रहता हुआ सोमरस है । फलतः मन्त्र का अर्थ होता है - " जो देवता ( घर में प्रतिष्ठित अग्नि ) सर्वदा जागता हुआ घर में प्रतिष्ठित रहता है, ( सायंप्रातः अग्निहोत्र के समय ) ऋङ्मन्त्र इस ( गृहपति ) न की कामना किया करते हैं । स्तोत्ररूप साम ( स्तुतियाँ ) इमी अग्नि को प्राप्त होतीं हैं । इसी जाग्रत · अग्नि से अभिश्रुत ( सोमवल्ली को कूट कर निकाला हुआ ) सोम कहता है कि, आप ( आहुतिरूप से ) मुझे स्वीकार कीजिए | हे अग्ने! आपकी छत्रछाया में मैं प्रतिष्ठायुक्त बन रहा हूँ, नियंत स्थान वाला बन रहा हूँ ” । ६
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द्वितीयखण्ड इसमें कोई सन्देह नहीं कि, अग्निहोत्रमाधक अग्नि याज्ञिकों के घरों में गृहपतिरूप से ग्रहोरात्र प्रति-ष्ठित रहता हुआ जागरूक है । यह भी निर्विवाद है कि, यह अग्नि ही गृहस्थी की प्रतिष्ठाभूमे है । किन्तु प्रकृत के दोनों मन्त्रों को इस गृहपति अग्नि का निरूपक मानना किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होना । गृहपति अग्नि के लिए न तो सोम का श्रमिषव ही है. ता, एवं न सोमग्स की इस गृह्याग्नि में ग्राहुति ही होती । ऐसी दशा में - " नमयमभिपुन सोम आह " कहना कथमपि सङ्गत नहीं बनता । इसके अतिरिक्त ' तमयं मोम ' आह ' वाक्य को एक स्वतन्त्र वा भ्य मानना, ' मां स्वीकुरु ' का अभ्याहार करना, ' तवाहमा स्म सख्ये न्योकाः ' को स्वतन्त्र वाक्य मानते हुए अग्नि का अध्याहार करना, ये सभी बातें शब्दमर्थ्यादा की दृष्टि मे, प्रसङ्ग, हेतुना, बमर, उपोद्यान, निर्वाहकैक्यवाक्यता यादि की दृष्टि मे कथमनि समन्वित नहीं हो सकती । ' यो जागार तमयं सोम श्राह, तवाहमस्मि मख्ये न्यं काः ' यह समानार्थक एक प्रकरण है । स्वयं सोम ही ग्रग्न से कह रहा है कि, मैं पका मित्र हूँ । अग्नि - सोम का सख्यभाव इन्द्रा - विष्णु की भाँति सुप्रसिद्ध है । जिस प्रकार दो मित्रों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है, एवमेव श्रन्नादलक्षण अग्नि, एवं अन्नलक्षण सोम का घनिष्ठ सम्बन्ध है | अग्नि - सोम की मैत्री का क्या परिणाम होता है?, प्रकृतमन्त्र यही बतला रहे हैं । 6 गैर सावित्राग्नि को ही उदाहरण बनाइए । पारमेष्ठ्य सोम की आहुति से पहिले यह मात्रित्राग्नि सर्वंथा सुप्त था, जैसा कि - ' प्रसुप्तमित्र सर्व नः ' इत्यादि मानवीय सिद्वान्त से स्पष्ट है । पारमेष्ठ्य - सोमाहुति से पहिले की स्थिति का अनुमान लगाते हुए हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि, उस समय न तो सावित्राग्नि महदुक्थभाव ( सूर्य्यपिण्डभाव ) मे ही युक्त था, न ग्रर्चिर्लक्षण रश्मियों का ही प्रसार था । अपितु ऋतरूप से सावित्राग्निपरमाणु श्रापोमय पारमेष्ठ्य समुद्र इत ततः ही दोलायमान थे । प्रजाकामुक स्वयम्भू प्रजापति की कामना से इस दाहक अग्नि में टाह्य मोम की आहुति हुई, आहुति से अग्नि में बलाधान हुआ, बलाहित श्राग्नेयपरमाणु समुचित होकर महदुस्थलक्षण सूर्य्य पेण्डरूप में परिणत हो गए । चारों ओर रश्मियों का प्रसार हो गया । इसी प्रकार सोमाहुति क कृपा मे सुप्त ( ऋतभावापन्न ) अग्नि जागृत ( सत्यभावापन्न ) बनकर ' अ'ग्न, पिण्ड, राममण्डल ' हुन तीन संस्थाओं में परिणत हो गया । श्वयं अग्निपुरुष यजुर्वेद कहलाया, महदुक्थलक्ष्ण सूर्य्य. पण्ड व कम्द्र वहलाया. एवं महाव्रतल क्षण चिर्म्मण्हल ( सहस्ररश्मिरूप प्रभामण्डल ) सामवेद बहलाया । इस प्रकार सोमाहुति मे जागृत बजुमूर्ति अग्नि ऋचाओं से, तथा सामों से युक्त हो गया । एक मित्र के सहयोग से अग्नि त्रयीमूर्ति बन गया । मित्र कैसा?, ' न्योकाः ' । ' ओक ' शब्द स्थान का वाचक है, एवं ' नि ' निम्नश्रेणि का सूचक है । ग्रन्नादग्नि भोक्ता है, अन्नसोम भोग्य है । दोनों के समतुलन में भोग्यलक्षण, अन्नात्मक मोम की श्रेणि वर ही मानी जायगी । भोग्यमोम भोक्ता अग्नि में ग्रात्म-समर्पण कर अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्त्व उमी प्रकार खो देता है, जैसे कि दुग्ध ग्रन्नादि शरीराग्नि में ग्राहुत होकर अपनी स्वतन्त्र सता खो देते हैं । अग्नि में आहुत सोम अग्निरूप में परिगत हो जाता है । अग्निमित्र की जागृति के लिए, विकास के लिए सोन का ग्रात्मबलिदान कर देना मैत्री का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है । इसी सोम का स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि ने कहा है- " अग्निजगार तमयं सोम श्रह, तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥ १ - यज्ञप्रजापति, और त्रयीवेद -( सर्व हुतवेदः, ३ – तम्मा यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुम्तस्मादजायत ॥ --ऋक्सं ० १ ९ ८६०१६ ६७
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भाष्यभूमिका यह मन्त्र ' पुरुषसूक्त ' का नवीं मन्त्र है । सृष्टिकामुक प्रजापति से काम - तप- श्रम से जिन सर्गों का उद्भव हुआ है, पुरुषसूक्त में उन्हीं सर्गों का निरूपण हुआ है । प्रधानतः यह सूक्त ' वैश्वानरपुरुष ' लक्षण विराट् -पुरुष से सम्बन्ध रखने वाले सर्गों का ही निरूपण करता है । सोमाहुति से अग्नीषोमात्मक ' यज्ञप्रजापति ' का श्राविर्भाव हुआ, जो कि विराट्पुरुष सम्वत्सररूप में परिणत होता हुआ रोदसीत्रैलोक्य, तथा त्रैलोक्य में रहने बाली प्रजासृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । अग्नि - सोमात्मक सौरसम्बत्सर ही पार्थिवप्रजा का ' सर्वहुत ' यज्ञ है । मम्पूर्ण पार्थिवप्रपञ्च उसमें आहुत हो रहा है, वह हम में बहुत हो रहा है । ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' -‘ प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्य: ' - ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' इत्यादि श्रुतियाँ इसी सौरयज्ञ का स्पष्टी-करण कर रही हैं । इसी यज्ञ से सर्वप्रथम उक्थामदलक्षण ऋचाओं का, महाव्रतलक्षण सामों का, गायत्र्यादि अन्दों का, एव यजु का विकास हुआ है । इस यज्ञेश्वर से प्रादुर्भूत होने वाली यह वेदत्रयी ही अपने वितानभाव मे प्रजासृष्टि की प्रतिष्ठा बनती है । एवं प्रकृत श्रुति इसी तत्त्वात्मिका वेदत्रयी का इतिवृत्त बतला रही है । ५ - पाञ्चजन्य अग्नि, और त्रयीवेद-( चयन वेदः ) ( ४ ) — ऋनो नामास्मि यजूंषि नामास्मि सामानि नामास्मि ।
ये अग्नयः पाञ्चजन्य । अस्यां पृथिव्यामधि ।
तेषामसिलमुत्तमः प्रनो जीवातवे सुत्र ॥
— यजुः सं ० १८ | ६ | यज्ञकत्त यजमान चयनयज्ञ के द्वारा पञ्चचितिक अग्नि का अपने आत्माग्नि में श्राधान करता हुआ आध्यात्मिक वेदत्रयी का भी प्राधान करता है । वैवयज्ञद्वारा दिव्यत्रयी का प्रधान ही चयन का सर्वोत्कृष्ट फल है । प्रकृत मन्त्र इसी आध्यात्मिक वेदत्रयी का स्पष्ट करण करता हुआ । कह रहा है कि - " ऋचाएँ मेरा नाम है, यजु मेरा नाम है, साम मेरा नाम है " । अर्थात् यज्ञ से संस्कृत बना हुआ मेरा मनः प्राणवाङ्मय भूतात्मा आज ऋक् - यजुः — साममय बन गया है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, औौ, २ सन्धियाँ, इस प्रकार पाँच भागों में विभक्त, अतएव ‘ पाञ्चजन्य ' नाम से प्रसिद्ध जो चिताग्नि स्तोम्यत्रिलोकीरूपा महापृथिवी पर प्रतिष्ठित है, इन पाँचों की अपेक्षा अमृतलक्षण चितेनिधेयाग्नि ( प्राणाग्नि ) सर्वश्रेष्ठ है । उसी से प्रार्थना की जाती है कि, " आप सबमें श्रेष्ठ हैं, जीवनसत्ता की अन्यतम प्रतिष्ठा हैं, अतएव आप मुझे दीर्घकाल पर्य्यन्त जांवित रखिए " । मन्त्रार्थ के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होता है कि, आत्मा की तीन कलाओं में से कौन कौन ऋक यजुः साम हैं? | इसी प्रश्न का समाधान करता हुआ एक दूसरा मन्त्र उपस्थित होता है । ६– - मनः प्राणवाङमय आत्मा, और त्रयीवेद-( आत्मवेदः ) ( ५ ) - ऋचं वाचं प्रपद्ये, मनो यजुः प्रप । * आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः भत्रत्यस्य जगत् कृत्स्नं - सदेवासुरमानुषम् " साम प्राणः प्रपद्ये । - यजुः सं ० ३६।१ । - वायुपुः ५३ श्र ० । ३४ श्लो ० । ६८
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द्वितीयखण्ड ७ – सर्वेन्द्रियमन, र त्रयीवेद-६६ — यजुः सं ० ३ ॥५ ॥
साम, - यजुः सं ० १८ | ४३ | -- यजुः ३४ | ३ | - यजुः ३४ | ६ | “ मैं ऋगूरूप वाक् का आश्रय लेता हूँ, यजुरूप मन का आश्रय लेता हूँ, प्राणरूप साम का आश्रम लेता हूँ ” इस महीधरभाष्य का तात्पर्य यही है कि, ग्रात्मा का वागू भाग उक्थ बनता हुआ ऋक्रममुद्र है, मनोभाग ब्रह्म बनता हुआ यजुः समुद्र है, एवं प्राणभाग पृष्ठ बनता हुआ सामममुद्र है । इस प्रकार प्रकृत श्रुति स्पष्ट शब्दों में अध्यात्मसंस्था को त्रयीविद्यामयी बतलाती हुई यह सिद्ध कर रही है कि, त्रयीविद्या तत्त्वात्मिका है । जिन की दृष्टि में वेदग्रन्थ ही वेद हैं, वे कैसे इस श्रुति का समन्वय करेंगे?, यह उन्हीं वेदग्रन्थ-भक्तों से प्रष्टव्य है । ( प्रज्ञानवेदः ) ( ६ ) –यस्निन्नृत्रः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः । यस्मिंश्वितं सर्वमतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ " जिस प्रकार रथनाभि में यारे प्रतिष्ठित रहते हैं, एवमेव जिस ( प्रज्ञान ) मन में ऋचाएँ, तथा यजु प्रतिष्ठित हैं, जिस ( सर्वेन्द्रियलक्षण अतीन्द्रिय ) मन में प्राणियों के ( महत् - रूप ) चित्त संलग्न हैं, वहन शुभ संकल्पवाला बने " | मनःप्राणवाङ्मय आत्मा में मन ही आत्मा का प्रधान स्वरूप माना गया है । इस मन की अन्तर्म्मन, वहिन, भेद से दो अवस्था हो जातीं हैं । अन्तर्म्मन ‘ श्व वसीयसू ’ नाम से प्रसिद्ध है, एवं इसका ' आनन्द - विज्ञान - मनो ' रूप से विकास होता है । यही मुक्तिसाक्षी आत्मा है । बहिन ' प्रज्ञानमन ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं इसका रस चलचिति के तारतम्य से ' मनः प्रारण वागू ' रूप से विकास होता है । यमी सृष्टिसाक्षी ग्रात्मा है । यजुर्वेदीय ' मनः सूक्त ' में इसी बहिर्मन का प्रतिपादन हुआ है, जो कि चहिर्म्मन सब इन्द्रियों का संचालक बन रहा है * । मनः प्राणवाङ्मय श्रात्मा का मन भी मनो-मय है, प्राण भी मनोमय है, एवं वाक भी मनोमयी है । मनोमय मन यजुःसमुद्र है, मनोमय प्राण स. मसमुद्र है, एवं मनोमयी वाक् ऋकममुद्र है । तीनों वेद समष्टिलक्षण इसी प्रज्ञानमन में अर्पित हैं । ८ - मनोमय गन्ध, और ऋ सामरूपा अप्सरा-( मनं वेद ) ( ७ ) -प्रजापतित्रिंश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य ऋक्सामान्य'सरस एष्टयो नाम ।
* यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।
यस्मान्न ऋते किञ्चन कम्मं क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥१ ॥
सुषारथिरवानिव यन्मनुध्यान्नेनायतेऽभीषुभिर्वाजिन इव ।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ २ ॥
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भाष्यभूमिका " मनःप्राणवाङ्मय, यजुमूर्ति, मनःप्रधान प्रजापति ही विश्वकर्मा ( सर्वकर्म्मप्रवर्त्तक ) है । यह यजुरूष प्राजापत्य मन गन्धर्व है, एवं वाङ्मयी ॠ, तथा प्राणमय साम इस गन्धर्व को अभीष्ट फल देने से ' एष्टयः ' नाम से प्रसिद्ध अप्सरा हैं " । ऋक सामलक्षण बाबू प्राण के आधार पर ही यजुम्मूर्त्तिमन विश्वकर्म्म में समर्थ बनता है । स्वस्वरूप मे कामना करता है, प्राणद्वारा तपःकर्म्म का प्रवर्त्तक बनता है, एवं वागद्वारा श्रम का अधिष्ठाता बनता है । यदि ऋक साममय वाक - प्राण न हों तो मन की कोई कामना सिद्ध न हो । बजुम्मन अपनी कामना सिद्धि के लिए ऋक् - सामम वाकू - प्राण से ही सतत यह कामना करता रहता है कि, मेरा यह काम पूरा हो, वह काम पूरा हो । ब्राह्मण त्रुति ने इसी अर्थ का यों स्पष्टीकरण किया है— " मनोह गन्धर्व ऋकसामैरप्सरोभिर्मिथुनेन सहोच्चक्राम, एष्टयो नाम । श्रकू सामानि वा एष्टयः । ऋक् सा मैाशासते - इति नोऽस्तु, इत्थं नाऽस्तु " - शत ० ब्रा ० ६ | ४ | १ | १२ | ६ - गरुत्मान् सुपर्ण, और त्रयीवेद – ( गायत्रवेदः ) ( ८ ) -सुपणोंऽसि गरुत्मान्, त्रिदृत्ते शिरः. गायत्रं चक्षुः, बृहद्रथन्तरे पक्षौ । स्तोम आत्मा, छन्दांस्यङ्गानि, यजूंषि नाम, साम ते तनूः ।
वामदेन्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं, धिष्ण्याः शफाः ।
सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ, स्त्रः पत ॥
- यजुः सं ० १२ | ४ | भूकेन्द्र से निकल कर पार्थिव एकविंश स्तोमपर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला पार्थिव गायत्राग्नि ही पारमेसोम का अपहरण करने वाला सुपर्ण है, जिसका कि ब्राह्मणग्रन्थोक्त सुपर्णाख्यानों में विस्तार से निरूपण हुआ है । भूपृष्ठ मे प्रारम्भ कर २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाले इसी सुपर्ण का तात्त्विक स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, हे गायत्राग्ने! आप गरुड़ पक्षी के समान श्राकार वाले हैं । वासवा -ग्न्यवच्छिन्न त्रिवृत्स्तोम आपका मस्तक है, गायत्रतेज आप का चक्षु है, एकविशस्तोमावच्छिन्न रथन्तरसाम, तथा आप के राथन्तरमण्डल में ( अतिमानसम्बन्ध से ) प्रविष्ट सौर बृहत्साम आप के दोनों पक्ष हैं । मध्यस्थानीय पञ्चदशस्तोम आपका आत्मा ( मध्याङ्ग - धड़ ) है । गायत्र्यादि सात छन्द ( सात पूर्वापरत आपके शरीरावयव हैं, रमात्मक यजुरूप से क्योंकि आपका नमन होता है, गमन होता है, अतएव आप ( अग्नि ) यजुर्नाम से प्रसिद्ध हैं । वयोनाधात्मक ( बाह्य आकारात्मक ) साम ही श्राप का शरीर ( बाह्य पृष्ठ ) है । बामदेव्य, और यज्ञायज्ञिय, नाम के दो विशेष साम आपकी पुच्छ है । अन्तरिक्ष में रहने वाले आाट नाक्षत्रिक सर्पों से भागों में विभक्त, मार्जालीय, अच्छावाकादि नामों से प्रसिद्ध धिष्ण्याग्नियाँ ( नाक्षत्रि-का.ग्नर्थों ) आपके शफ ( खुर ) हैं । इस प्रकार आप इन पक्षि - सम श्रवयवविशेषों से सचमुच गरुत्मान् सुपर्णं बन रहे हैं । आप अपने इसी रूप से उधर तो पार्थिवमहिमा की अन्तिम परिधिरून द्युलोक पर्य्यन्त व्याप्त हैं, एवं इधर भूपिड के केंन्द्ररूप स्वर्लोक पर्य्यन्त व्याप्त है ” । १००
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-द्वितीयखण्ड प्रकृत श्रुति के - " यजूंषि नाम, साम ते तनूः ” वाक्य की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । त्रैलोक्यव्यापक गायत्राग्नि का नाम तो यजुः है, एवं शरीर साम है । अवश्य ही ये यजुः - साम तत्त्वात्मक हैं | शब्दात्मक यजुः, तथा साममन्त्रों के द्वारा कथमपि मन्त्रार्थ का समन्वय नही किया जा सकता । १० - नवाहयज्ञ, और त्रयीवेद-( नाइयज्ञ ( दः ) - ( ६ ) - यत्र ऋायः प्रथमजा ऋवः साम यजुही । एकर्षिर्यस्मिन्नार्पितः स्कम्भं त ब्रूहि कतमः स्त्रिदेव सः ॥ - अथर्व सं ० १० | ७ | १४ | “ जिसमें प्रथमज ऋषि अर्पित हैं, ऋक - साम - बजु अर्पित हैं, मही ( महापृथिवी ) अपित है, एकर्षि ( सूर्य्य ) अर्पित है, उस स्कम्भ का स्वरूप बतलाओ कि वह कै । है?, इस अथर्व मन्त्र के साथ वेदत्रयी का सम्बन्ध बतलाया गया है | पृथिवी के १७ वें अहर्गण से आरम्भ कर २५ वें अहर्गण पर्यन्त ( - -१४३०-१-२३-२५-२४-३६ ) ' नवाह यज्ञ ' प्रतिष्ठित है । इस नवाह यज्ञ का सत्रहवाँ अहर्गण ' ब्रह्म-विषुप् ' है, इक्कीसवाँ अहर्गण ' विष्णुविष्टुप् ' है, एवं पच्चीसवाँ अहर्गण ' इन्द्र बिष्टपू ' है । विष्णुविष्टपात्मक एकविंश अहर्गण पर सूर्य्य प्रतिष्ठित है । १७ से २५ पर्य्यन्त सौर - तेज प्रखररूप से व्याप्त है । नवाहयज्ञात्मक यही तेज़ोमण्डल ‘ स्कम्भ ' ( स्तम्भ - बम्भा ) है, जिसका कि अथर्ववेद की ' स्कम्भविद्या ' में विस्तार से: निरूपण हुआ है । साकञ्ज सप्तर्षिप्राण, महः क्थरूप ऋचाएँ, महाव्रतरूप साम, पुरुषलक्षण यजुः, पारावतपृष्ठात्मिका मही पृथिबी, सूर्य्यात्मक एकर्षिप्राण, सत्र - कुछ इसी स्कम्भ के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । इस स्कम्भ से सम्बन्ध रखने बाली वेदत्रयां आपके वेदग्रन्थ नहीं है, यह मान लेने में सम्भवतः आपको कोई विप्रतिपत्ति न होगी । ११ - दिव्यस्कम्भ, और त्रयीवेद -( स्कम्भवेदः ) - ( १० ) –यस्मादृचो पातक्षन्, यजुर्यस्मादपाक्रपन् ।
सामानि यस्य लोमानि, अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ।
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥
- अथर्वसं ० १० || २० | “ अपने सुप्रसिद्ध ' शस्त्र ' - कर्म से जिससे ऋचाओं का विनिर्गम हुआ, जिससे यजुः निकले, साम जिसके लोम चर्ने, श्र वर्वाङ्गिरोलक्षण अथर्ववेद जिसका मुख बना, उस स्कम्भ का स्वरूप बतलाइए, कि, वह कैसा है? ” इस मन्त्र में प्रतिपात, स्कम्भ से सम्बन्ध रखने वाली वेदचतुष्टयी का भी विशुद्ध तात्त्विकं वेद मे ही सम्बन्ध मानना पड़ेगा । १२ – अध्यात्मसंस्था, और
वेद-( सांस्कारिकवेद. ) - ( ११ ) -विद्याथ वा अविद्याश्च यच्चान्यदुपदेश्यम् ।
शरीरं ब्रह्म प्राविशत् - ऋचः सामाथो प्रजुः ॥
- अथर्वसं ० ११२८ | २३ | १०१
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भाष्यभूमिका आध्यात्मिक संस्था का निर्माण कैसे हुआ?, इसमें किन किन तत्त्वों का समावेश हुआ?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान करने वाले अथर्ववेदीय प्रकरण में उक्त मन्त्र पटित है । तात्पर्य्य इसका यही है कि. “ अध्यात्मसंस्था में विद्या, अविद्या का प्रवेश हुआ, ऋक्साम - यजुः का प्रवेश हुआ " | शब्दात्मक वेद-भक्तों से इस सम्बन्ध में क्या यह नही पूँछा जा सकता कि, क्या प्राध्यात्मिक संस्था के स्वरूप निर्माण में शब्दात्मक मन्त्र प्रविष्ट हुए? । विवश होकर उन्हें तत्त्वात्मक वेदत्रयी का ही श्राश्रय लेना पड़ेगा । १३ – उदृढ त्रिलोकी, और त्रयीवेद-( उदूढ वेदः ) - ( १२ ) - सामाहरनि ऋहवं, धौरहं ताहि सम्भवाव प्रजामा पृथिवीत्वम् । जनबाव है || — अथर्वसं ० १४ | २ | ७१ ॥ " मैं साम हूं, तू ऋ है । मैं द्यौ, तू पृथिवी है । अपन दोनों दाम्पत्यभाव को प्राप्त हो । प्रजा उत्पन्न करें ” यहाँ भी स्पष्ट ही ऋक्साम की तत्त्वरूपता का ही विश्लेषण हुआ है । श्री पृथिवी का रूप माना गया है, पुरुष का रूप माना गया है । उधर पृथिवी ऋगात्मिका है, लोक साममय है । दोनों के दाम्पत्यभाव से ही प्रजोत्पत्ति सम्भव है । प्रकृत मन्त्र ने इसी ' तन्तुवितानविद्या ' का स्पष्टीकरण किया है । १४ - सम्वत्सरप्रजापति, और त्रयीवेद-( ब्रह्मनिः श्र्षा सतवेदः ) - ( १३ ) -( क ) — सम्वत्सरो वै प्रजापतिरग्निः + + + । अथ स सर्वाणि भूतानि पय्यैतत् । स त्रय्यामेत्र विद्यार्या सर्वाणि भूतान्यपश्यत् । अत्र हि सर्वेषां छन्दसामात्मा, सर्वेषां स्तोमानां सर्वेषां प्राणानां सर्वेषां देवानाम् । एतः अस्ति, एतद्धि अमृतम् । यद्धि श्रमृतं, तद्धि अस्ति । एतदु तद्यन्मर्त्यम् । स ऐक्षत प्रजापतिः - बाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि, हन्त त्रयीमेव विद्यामात्मानमभिसंस्करवा इति । ( ख ) - स ऋचो व्यौहत् - द्वादश बृहतीसहस्राणि । एतावत्योहऽच याः प्रजापतिसृष्टाः । तास्त्रिंशचमे न्युहे पंक्तिष्वतिष्ठन्त । ता यत् त्रिंशसमे व्यूहेऽतिष्ठन्त, तस्मात् त्रिंश-न्मासस्य रात्रयः । अथ यत् पंक्तिषु, तस्मात् पांक्तः प्रजापतिः । ता श्रष्टाशतं शतानि पंक्तयोऽभवन् । ( ग ) - श्रथैतरो वेदौ ब्यौहन्- द्वादशैव बृहती सहस्राण्यष्टौ यजुषां चचारि साम्नाम् | एतावद्धै योगेंदयोयत् प्रजापतिसम् । तौ त्रिशत्तमे व्यूहे पंक्तिष्वतिष्ठेताम् । तौ यत् e १०२
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द्वितीयखण्ड त्रिंशत्तमे व्यूहे ऽतिष्ठेतां, तस्मात् त्रिंशन्मासस्य रात्रयः । अथ यत् पंक्तिषु, तस्मात् पांक्तः प्रजापतिः । ता अष्टाशतमेव शतानि पंक्तयाऽभवन् । ( घ ) —ते सर्वे त्रयो वेदा दश च सहस्राण्यष्टौ च शतान्यश तीनामभवन् । स मुहूर्त्तेन मुहूर्त्तेनाशीतीन् प्राप्नात्, मुहूर्त्तेन मुहूर्त्तेनाशांतिः समपद्यत । स एषु त्रिषु लोकेषु -खायां योनौ रेतोभूननात्मानमास श्वन् - इन्दो नयं स्तोमनयं, प्राणमयं देवतामयम् । तस्याधमासे प्रथम आत्मा समस्क्रियत, दवयसि परः, दवयसि पर: । सम्वत्सरऽएव सर्वः कुःस्नः समस्क्रियत । - शत ० वा ० १०४२।२१-२२-२३-२४-२५-२६ । ( क ) — " अग्नि ही सम्वत्सर प्रजापति था । उस सम्बत्सर प्रजापति ने सम्पूर्ण भूतों को चारों ओर से देखा । उसने तीनों वेदों के गर्भ में हीं सम्पूर्ण भूतों को देखा । इसी त्रयीवेद के गर्भ में प्रजापति ने सम्पूर्ण छन्दों का आत्मा देवा, सम्पूर्ण स्तोनों का ग्रात्मा देवा, सम्पूर्ण प्राणों का आत्मा देखा, सम्पूर्ण देवताओं का आत्मा देखा । यह त्रयीवेद ' अस्ति ' लक्षण है, यही मृत है । जो अमृत है, वही अस्ति ( सत्ता ) है । यही वह है, जो कि मर्त्य है । प्रजापति ने इस प्रकार त्रयीविद्या के गर्भ में छन्दस्तामादि का श्रात्मा प्रतिष्ठित देख कर संकल्प किया कि, " मैं इस त्रयोविद्या से ही अपने श्रात्माका संस्कार करूँ " | ( ख ) – ( अपने संकल्प को कार्यरूप में परिणत करने के लिए ) प्रजापति ने बारह बृहतीसहस्र संख्या से ऋचाओं का वहन किया । प्रजापति से उत्पन्न ऋचाओं की इतनी ही संख्या है । प्रजापति के द्वारा व्यूढ थे ऋचाएँ तीसवें व्यूह में पंक्तियों में प्रतिष्ठित हो गई । क्योंकि ये ऋचाएँ तीसवें व्यूह में प्रतिष्ठित हुई, अतएव एक महीने की तीस रात्रियाँ हुई । साथ ही ऋचाएँ पंक्तियों में प्रतिष्ठित हुईं, श्रतएव प्रजापति पांक्त ( पञ्चावयत्र ) बन गए । ये पंक्तियाँ आठ सौ संख्या में सम्पन्न हुई । ( ग ) – ( ऋग्व्यूहन के अनन्तर प्रजापति ने ) क्रमशः आठ बृहतीसहस्र संख्या में यजुः का, एवं चार बृहतीसहस्र संख्या में साम का व्यूहन किया । दोनों वेद तीसवें व्यूह में प्रतिष्ठित हुए । क्योंकि दोनों तीसवें व्यूह में प्रतिष्ठित हुए, अतएव एक मास की तीस रात्रियाँ होतीं हैं । यजुः साम पंक्तियों में प्रतिष्ठित हुए, अतएव प्रजापति पांक्त बन गए । ये पंक्तियाँ संख्या में आठ सौ हुईं । ( घ ) — इस प्रकार ऋ - यजुः साम, तीनों वेदों को मिलकर चौत्रीस बृहतीसहस्र संख्या हुई । प्रजापति एक एक मुहूर्त से एक एक अशीति को प्राप्त हो गए, एक एक मुहूर्त से एक एक अशीति क स्वरूप सम्पन्न हुआ | ( इस प्रकार त्रयीविद्या से अपने आत्मा का संस्कार कर ) प्रजापति ने इन तीनों लोकों में व्याप्त त्रैलोक्यात्मिका उखा योनि में तोरूप अपने उस श्रात्मवीर्य्य की आहुति दी, जो कि अत्मवीर्य्य छन्दोमय, स्तोममय, प्राणमय, एवं देवतामय था । इस सिक्त रेत का पक्ष पक्ष में संस्कार किया, आगे जाकर मास ऋतु - त्रयन, इस क्रम से उत्तरोत्तर प्रवृद्ध परिमाण से संस्कार करते करते प्रजापति ने सम्पूर्ण सम्वत्सर का संस्कार कर डाला । ” १०३
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भाष्यभूमिका उक्त श्रुतियों का तात्त्विक अर्थ तो पाठक आगे के परिच्छेदों में देखेंगे | अभी अक्षरार्थ के आधार पर केवल यही जान लेना पर्याप्त होगा कि, श्रुति ने अग्निमूत्तिं सम्वत्सरप्रजापति का सम्बन्ध जिस त्रयीविद्या से बतलाया है, एवं त्रयीविद्या का जो संस्था बिभाग बतलाया है, उसका एकमात्र तात्पर्य्य तात्त्विक वेदत्रयी से ही सम्बन्ध रखता है । आधिदैविक, नित्य वेद का, एवं नित्य वेद के वितान का ही श्रुति ने स्पष्टीकरण किया है, जिसका कि शब्दालक वेद के आधार पर प्रयत्न - सहस्रों से भी समन्वय नहीं किया जा सकता । १५ – स्वायम्भुवी वा, और त्रयीवेद -( गायत्रीमात्रिकवेदः ) - ( १४ ) -सा वा एषा वाक त्रेधा विहिता - ऋचो, यजूंषि सामानि । मण्डलनेत्रर्चः, अचिंः सामानि पुरुषो यजूंषि । अथैतदमृतं, यदेतदचिंर्दीप्यते । इदं तत् पुष्करपर्णम् । 1 -शत ब्रा ० १०।५।१।५ । “ वह यह वाक् ऋक् - यजुः - साम भेद से तीन भागों में विभक्त है । मण्डलात्मिका वाक् ऋचाएँ हैं. अर्चिरूपण वाक् साम हैं, पुरुषात्मिका वाक् यजुः हैं । यह जो ज्योतिर्म्मण्डल ( रश्मिमण्डल ) प्रदीप्त हो रहा है, वही अमृत है । इसी को ( यज्ञपरिभाषा में ) पुष्करपर्ण कहा गया है " । श्रुति ने जिस वाङ्मयी वेदत्रयी का दिग्-दर्शन कराया है, वह आदित्याग्निरूपा ही है । प्राण ' - आप- वाक् - अन्न अन्नाद ' भेद से पाँच भागों में विभक्त प्रकृति का क्रमशः ' स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य चन्द्रमा पृथिवी इन पाँच विश्वपुरों के साथ सम्बन्ध है । तीसरी ' वाकू ' प्रकृति हो सूर्य्यं की प्रतिष्ठाभूमि है । यह वाकतत्व वही सुप्रसिद्ध सौर - सावित्राग्नि है, जिसका कि पूर्व प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । सौरसावित्राग्नि ही इस वेदमयी वाक् की उपनिषत् है । वागु निषद्रपा इसी वाक् का ऋक्साम - यजुः - रूप से चयन होता है । यही नित्या वाक् इस चितिभाव के कारण आगे जाकर त्रयवेिदरूप में परिणत होती है, जैसा कि उक्त ब्राह्मण के निम्नलिखित वचनो से स्पष्ट है - -१- " तस्य वाऽएतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् । वाचा हि चीयते - ऋचा - यजुषा - साम्ना । इति नु दे ० " । ( शत ० १० ५ | १ | १ | ) | २ - ' ' सा वा एषा वाक् त्रेधा विहित ऋचो, बजूंषि, सामानि । तेनाग्निस्त्रेधा विहितः । एतेन हि त्रयेण चोयते ” । ( १०।५।१।२ ' ) । ३ - " साया सा वाक - असौ स आदित्यः । स एष मृत्युः । तद्यत् किञ्चार्वाचीन-मादित्यात्, सर्वं तन्मृत्युनाऽम् ” | ( १० | ५ | १ | ४ | ) । वागग्निरूप आदित्य को, किंवा ग्रादित्याग्निरूपा वाकू को त्रयीवेदमयी बतलाती हुई उक्त श्रुतियाँ यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, ऋक साम - यजुः, नामक वेदत्रयी विशुद्ध तत्त्वामिका है, ×
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द्वितीयखण्ड जिसका कि आधिदैविक संज्ञक प्रकृतिमण्डल से सम्बन्ध है । ' वाकू अग्नि है, अग्नि वेदमय है ', इस श्रौत सिद्धान्त का शब्दात्मिका वेदभक्ति के आधार पर कथमपि समन्वय नहीं किया जा सकता । १६ —सूर्य्यस्था, और त्रयीबेद— ( गायत्रीमात्रिकवेदः ) - ( १५ ) – यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थं, तो ऋत्रः, स ऋचां लोकः । अथ यदेतदचिदप्यते - तन्महात्रतं, तानि सामानि स माम्नां लोकः । अथ य एव एतस्मिन् मण्डले पुरुषः - सोऽग्निः, तानि यजूंषि, स यषां लोकः । सैपा ग्रयश्व विद्या तपते । तद्भूतदयवद्वांस आहुः - त्रयी वाऽएपा विद्या तपतीति । वाग्वैव तत् पश्यन्ती वदति । -- शत ० १० ५२।१–२– । 1 " ग्रह जो मण्डल ( सूर्य्यत्रिम् ) तप रहा है, वह महदुक्थ है, वे ऋचाएँ हैं, वह ऋचाओं का लोक है । यह जे रश्मिमण्डल प्रदीप्त हो रहा है, वह महाव्रत है वे साम हैं, वह सामों का लोक है । इस मण्डल में जो पुरुष ( अग्निरूप वस्तुतत्त्व ) है, वह अग्नि है, वे यजु हैं, वह यजुत्रों का लोक है । वह यह त्रयोविद्या ही तप रही है । उस ( वैदिक युग में ) सामान्य मनुष्य भी यह कहा करते थे कि, " देखो सू क्या तप रहा है, वेद्या तप रही है ” । प्रकृत श्रुति का “ तर्द्धं तदप्यविद्वांस आहुः " वाक्य बड़ा ही चमत्कारपूर्ण है । वर्त्तमान शताब्दी के विद्वान् भी जहाँ सूर्य्यपिण्ड का ऋग्वेदत्त्व, साररश्मिमण्डल का मामवेदत्त्व, एव सौरसावित्राग्नि का यजुर्वेदत्त्व स्वीकार करने में विचिकित्सा रखते हैं, वहाँ प्रतीत भारत के उस वैज्ञानिक युग में सर्वमाधारण भी पारस्परिक व्यवहारों में सूर्य के त्रयीविद्याभाव का यशोगान किया करते थे । सूर्य्य विद्याधन कैसे है? इसके लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । ' पश्यन्ता ' नाम मे प्रसिद्ध स्वय सौरी वाक ही अपने वेदस्वरूप का प्रत्यक्षवत् अभिनय कर रही है । प्रत्यक्षदृष्ट इसी वेदवाक को देख कर सर्व साधारण ने सूर्य्यवेद का साक्षात्कार कर रक्ला है, यही तालर्य्य व्यक्त करने के लिए " वाग्यैव त 1 पश्यन्ती वति " यह कहा गया है । १७ – कृष्णमृग ( काला हरिण ), और त्रयीवेद-( यज्ञमात्रिकवेदः ) – ( १६ ) - " यज्ञो ह वै देवेभ्योऽपचक्राम । स कृष्णो भूत्वा चचार । तस्य देवा अनुविद्य त्वचमेवा वच्छायाजहुः । तस्य यानि शुक्लानि च कृष्णानि च लोमानि तान्यृचां च साम्ना च रूपम । यानि शुवलानि तानि साम्नां रूपम् । यानि कृष्णानि तानि - ऋचाम् । यदि वेतरथा - यान्येव कृष्णानि, तानसाम्नां रूपम् । यानि शुक्लानि, तान्यृचाम् । यान्येव १०५