Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 141–150

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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बी हरीण, तानि यजुषां रूपम् । सैषा त्रयीविद्या यज्ञः । तस्या एतच्छिल्पमेष वर्णः । तद्यत् कृष्णानं भवति, यज्ञ-स्यैव सर्वत्वाय । तस्मात् कृष्णाजिनमधिदीक्षन्ते, यज्ञस्यैत्र सर्वत्वाय । तस्मादध्यवहननमधिपेपणं भवति, अस्कन्नं हरिसदिति । तद्यदेवात्र तण्डुलो वा पिष्टं वा स्कन्दात्, तद्यज्ञे यज्ञः प्रतिष्ठात् । तस्मादध्य वहननमधिपेषणं भवव " । - शतः ब्रः १।११४ | १-२-३ कं ० | * | " एक समय यज्ञपुरुष देवताओं से निकल गया । वह काला हरिण बन कर विचरने लगा । देवताओं नैं उस का पता लगा कर उनके चर्म को उड़ कर अपने यज्ञ में उसका समावेश कर लिया । इस कृष्गमृग-च के शुक्ल - कृष्ण लोम ऋचाओं एवं सामों के रूप थे । जो नुक्लवर्ण के लाम थे, वे सामों के रूप थे, एवं जो कृष्णवर्ण के लोम थे. वे ऋचाओं के रूप थे । अथवा उलटा समझिए । जी हां कृष्णवर्ण के लो थे, वे सामों के रूप थे, एवं जो ही शुक्लवर्ण के लोम थे, वे ऋचाओं के रूप | जो मटमैले हरितवर्ण के लोम थे, वे यजुत्रों के रूप थे । कृष्णमृगचर्म्ममयी, वर्णत्रयात्मिका यह वेदत्रयी ही यज्ञ है । इस वेदत्रयी का ही यह शिल्प ( कारीगरी ) है, जो कि यह वर्ण है । यज्ञ की सर्वता के लिए ही कृष्ण । जिन का ग्रहण होता है । इसी यज्ञ की सर्वता के लिए कृष्णाजिन पर बैठ कर दीक्षा लेते हैं । यज्ञिय हवि यज्ञमीमा के बाहिर न गिर जाय, इसी अभिप्राय से कृष्णाजिन पर ही हवि कूटा जाता है, एवं इसी पर हवि पीसा जाता है । कुट्टन, तथा पेषण कर्म्म मे हवि का जो भाग उछटे, वह यज्ञात्मक तण्डुल तथा पिष्ट भाग यज्ञ में ही प्रतिष्ठित रहे, इसी प्रयोजन के लिए यज्ञात्मक कृष्णाजिन पर ही हवि का कुट्टन - पेषण होता है " । काले हरिण का चमड़ा, और उसके शुक्ल - कृष्ण - हरितरूप क्रमश: साम, ऋक्, यजुर्म्मय, कृष्ण-मृगचर्म्म साक्षात् वेदत्रयी की प्रतिमा, कैसा आश्चर्य है । वेदशब्द से शब्दात्मक वेदों का ही अभिनिवेश रखने वाले महानुभाव कृष्णाजिन को कैसे वेदत्रयी मानेंगे, यह एक जटिल समस्या है । फिर भी क्योंकि श्रुति स्पष्ट शब्दों में यह जटिलता उनके सामने रख रही है, अतः विवश होकर इसे मान लेने में ही शास्त्रनिष्ठा सुरक्षित रह सकेगी । श्रत्र संक्षेपसे यह भी विचार कर लीजिए कि, श्रुति के अक्षरों का रहस्यार्थ क्या है? | सौर – सम्वत्सरमण्डल देवप्राणघन है, क्योंकि सौर प्रारण को ही देवता ( देव ) माना गया है, जैसा कि, चित्रं देवानामुद्गात् ' ( यजुः सं ० १३ | ४६ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । सौरसम्वत्सरात्र -च्छिन्न सावित्र अग्नि, किवा साम्वत्सरिक ग्रग्नि ही पारमेष्ठ्य - सोमाहुति के सम्बन्ध से ' यज्ञ ' है । सावित्राग्नि एवं पारमेष्ठय सोम की सम्मिलितावस्थारूप यही साम्वत्सरिक यज्ञ सौर- प्राणदेवताओं की प्रतिष्ठा है । ज्योतिर्मय सौर प्राण ही देवलक्षण देवता हैं । एवं जत्र तक सावित्राग्नि में सोमाहुति होती रहती है, तभी तक " त्वां * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन शतपथ हिन्दी विज्ञान भाष्यान्तर्गत ' कृष्णाजिन ब्राह्मण ' में देखना चाहिए । १०६

पृष्ठ 142

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द्वितीयखण्ड ज्योतिषा वितमो वबर्थ ” ‘ - श्रधात्सूर्ये ज्य. तिरिन्दुः ' इत्यादि ऋग्वर्णन के अनुसार सावित्राग्नि ज्योतिम्र्म्मय ना रहता है । तएव हम अवश्य ही इस साम्वत्सरिक यज्ञ को देवताओं की प्रतिष्ठा कह सकते हैं I | इसी आधार पर यज्ञ को — “ यज्ञो वो ( देवानां ) अन्नम् ” ( शत ० २/४ | २ | १ | ) इत्यादिरूप से देवताओं कान्न ( जीवन हेतु ) माना गया है । इसी यज्ञाग्नि का समर्थन करते हुए निम्नलिखित निगमवचन पाठकों केस मुख उपस्थित हो रहे हैं— १ - - " सम्वत्सर एवाग्निः " | ( शत ० ब्रा ० १० | ४ | ५ | २ | ) । २ -- “ सा या सा ( सौरी ) वाक् - आसीत्, सोऽग्नरभवत् " ( जै ० उ ० ब्रा ० २।२।१ । ) । ३ – अग्नि ज्योती रक्षोहा " ( शत ० प्रा ० ७।१।३४ । ) । ४ – ' एप उ वै यज्ञो, यदग्निः " ( शत ० २ । १ । ४ । १६। ) । ५ – “ सम्बत्सरो यज्ञः " ( शत ० ११ | २ | ७ | १ । ) । ६ – “ एप वाव सावित्रः, य एप तपति " ( तैः ब्रा ० ३।१०।६।१५ । ) । ७ – “ यज्ञो वै स्वरहर्देवाः सूर्यः " ( शत ० १ १ २ २१। ) । ८-- " सूर्योऽग्नेर्योनिरायतनम् ” ( तै ० ३।८।१२।२,३ । ) । विज्ञानवेत्ताओं को यह विदित है कि, पृथीवी इसी यज्ञात्मक सूर्य्य का उपग्रह है, जैसा कि प्रथम प्रकरण के ' प्रोपग्रहभाव ' परिच्छेद में विस्तार से बतलाया जा चुका है । १५ वीं श्रुति में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि, यह ज्योतिर्मय सौर - सावित्राग्नि महोक्थ - महाव्रत - पुरुष ( त्रिम्ब - रश्मि - अग्नि ) रूपये ऋक्-साम - यजुर्म्मय है । वेदत्रयीरूप यह यज्ञाग्नि ( सौर - साम्वत्सरिक अग्नि ) आगे जाकर ' ब्रह्मौदन ', तथा ' प्रवर्ग्य ' भेद से दो भागों में विभक्त होता हुआ क्रमशः शुक्ल कृष्णरूपों में परिणत हो जाता है । जो सौर-सम्वत्सगग्नि अन्तर्य्याम ( ग्रन्थिबन्धन - चिति - ) सम्बन्ध से सूर्य्यसंस्था का स्वरूपरक्षक बनता हुआ । ज्योति-रूप से प्रकाशित हो रहा है, हम सत्र पार्थिव प्राणियों की दृष्टि का विषय बन रहा है, प्रत्यक्षदृष्ट यही ज्योतिर्मय यज्ञाग्न सूर्य्यब्रह्म का ( स्वरूपरक्षक ) ओटन ( अन्न ) बनता हुआ ' ब्रह्मोदन ' है । एवं सूर्य्यसंस्था से पृथक होकर जो सौर – यज्ञाग्नि भूत - मर्त्यभाव में परिणत होकर पृथिवीरूप में परिणत हो गया है, वही पृथग्-भाग प्रवर्ग्य ', किंवा उच्छिष्ट है । प्रवर्ग्यभाव पन्न यज्ञाग्नि का क्योंकि पारमेष्ठ्य - सोम की अजस्त्र धारा से सम्बन्ध टूट जाता है, अतएव यह प्रवर्ग्याग्निलक्षणा पृथिवी सोमाहुति से उत्पन्न होने वाली ज्योति से वञ्चित होती कृष्ण बनी रहती है । पृथिवी में, पार्थिव ओषधि - वनस्पतियों में प्रतिष्ठित प्रवर्ग्य यज्ञाग्नि ही ‘ गायत्र ' नाम से प्रसिद्ध है | यह गायत्राग्नि ही पार्थिव विवर्त्त की मूल प्रतिष्ठा है । गायत्राग्नि के सम्बन्ध से ही यह पृथिवी ' या वैसा गायत्री आसीदियं वै सा पृथिवी ' ( शत ० ६ । ४ । १ । ३५ । ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार ' गायत्री ' कहलाती है । सौर ज्योतिर्मय अग्नि ' आदित्य ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं पार्थिव कृष्ण अग्नि ' अङ्गिरा ' नाम से प्रसिद्ध है | सौर - श्रादित्याग्नि सूय्य से निरन्तर ( ' नौघस ' - साम के आधार पर ) पृथिवी की ओर छाया करता है, एवं पार्थिव अग्नि पृथिवी से निरन्तर ( ' श्यैत ' - साम के आधार पर ) द्युलोकोपलक्षित सू १०७

पृष्ठ 143

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भाष्यभूमिका की ओर जाया करता है, जिसका कि विशद विज्ञान - ' आदित्यानामयन ' तथा ' अङ्गिरसामयन ' नामक यज्ञ-विद्याओं में प्रतिपादित है । सूर्य से चलकर पृथिवी पर आने वाला प्राणात्मक आदित्याग्नि पृथिवी से टकरा कर प्रतिफलन-प्रक्रिया से वापस लोक की ओर जा रहा है । इस जाते हुए आदित्याग्नि से ही उस सुप्रसिद्ध ' अश्वमेध का स्वरूप सम्पन्न होता है, जिसका कि - ' उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः ' इत्यादि उपनिपच्छुतियों में विस्तार से निरूपण हुआ है । इस से यह निष्कर्ष निकला कि, ब्रह्मोदनलक्षण सौर आदित्याग्नि भी पृथिवी से द्युलोक की ओर जा रहा है, एवं सौर श्रादित्याग्नि का प्रवर्ग्य अग्नि भी पृथिवी का प्रातस्विक ( ब्रह्मोदन ) अग्नि बनता हुआ, अङ्गिरा नाम धारणा करता हुआ द्युलोक की ओर जा रहा है । दोनों गन्तायों में ' वयं पूर्वं यानः वयं पूर्व ' लक्षणा प्रतिस्पर्द्धा हो रही है । और इस प्रतिस्पर्द्धा में विजयश्री मिनती है सौर-आदित्य को । कारण यही है कि, प्रतिफलित सौर आदित्याग्नि प्राणप्रधान बनता हुआ अपेक्षाकृत सत्रल रहता है! उधर केवल पृथिवी केन्द्र से ऊपर की ओर जाने वाला सुबर्णरूप अङ्गिरा भूतप्रधान बनता हुआ अपेक्षाकृत र्निबल रहता है । निम्नलिखित श्रुतियाँ आदित्य, तथा अङ्गिरा की इसी प्रतिस्पर्द्धा का स्पष्टीकरणा कर रहीं हैं—

१- इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यारुहन् ।

प्र भूर्जयो यथापथा द्यामङ्गिरसा ययुः ॥

- सामसं ० पू ० १।१०।२ । १ - + आदित्याश्च ह वा अङ्गिरसश्च स्वर्गे लोकेऽस्पर्द्धन्त - वयं पूर्वं एष्यामो वयमिति । ते हाऽऽदित्याः पूर्वे स्वर्गं लोकं जग्मुः, पश्चैवाङ्गिरसः, पष्टयां वा बर्षेषु ” । - ऐत ० वा ० १८ | ३ | १७ | | * असौ वा आदित्य एषोऽश्वः " ( शत ० ६ । ३ । १ । ३१ । ) । + श्रादित्याश्चाङ्गिरसश्च सुवर्गे लोकेऽस्पर्द्धन्त, वयं पूर्वे सुवर्ग लोकमियामः, वयं पू इति । त आदित्या एतं पञ्चहोतारमपश्यन् । तं पुरा प्रातरनुत्राकादाग्नीध्रे ऽजुहवुः । ततो वै ते पूर्वे सुवर्ग लोकमायत् । यः सुवर्गकामः स्यात्, स पञ्चहोतारं पुरा प्रातरनु -वाकादाग्नीध े जुहुयात् । सम्वत्सरो वै पञ्चहोता, सम्वत्सरः, सुत्रर्गो लोकः " । ( तैः प्रा ० २२२३५ - ६ ) १०३

पृष्ठ 144

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द्वितीयखण्ड A श्रीसायणाचार्य के मतानुसार " आदित्य देवता हैं, अङ्गिरा ऋषि हैं । दोनों पृथिवीलोक में रहने वाले मनुष्य हैं । दोनों स्वर्ग की ओर गमन करते हैं । दोनों में से आदित्य तो तत्क्षण स्वर्ग पहुँच जाते हैं । ऋषियों में शक्ति - अनुसार कोई तो ६० वर्ष में स्वर्ग में पहुँचता है, कोई ६० वर्ष से पहिले " । उधर वैज्ञानिकों की दृष्टि में श्रुति के आदित्य, तथा अङ्गिरा क्रमशः सौर- पार्थिव अग्नि है | आदित्याग्नि प्राण-प्रधान बनता हुआ पार्थिव श्राकर्षण से मुक्त है, अङ्गिरोऽग्नि भूतप्रधान बनता हुआ पार्थिवं आकर्षण बद्ध है । पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि जब तक पृथिवी का ब्रह्मोदन बना रहता है, तत्र तक यह प्रवर्ग्य नहीं बन सकता । जब तक यह प्रवर्ग्य नहीं बन जाता, तब तक यह श्रादित्याग्नि ( दिव्याग्नि ) रूप में परिणत नहीं हो सकता । श्रादित्याग्निरूप में परिणत हुए बिना यह द्युलोक का ब्रह्मौंदन नहीं, जन सकता । एवं पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि के प्रवर्ग्यरूप में परिणत होने के लिए पञ्चयुगात्मक एक महायुग पेक्षित है । द्वादश ( १२ ) द्वादश वर्ष का एक एक युग माना गया है, जो कि युग इद्वत्सर, अनुवत्सर, परिवत्सं— रादि नामों से प्रसिद्ध हैं । इन द्वादशवर्षात्मक पाँच युगों का एक महापार्थिव युग होता है । इन्ही पाँच अवान्तर युगों के सम्बन्ध से सम्वत्सर को ' पञ्चहोता ' ( तै ० ब्रा ० २२३५६ ) माना गया है । षष्टिवर्षा-त्मक ( ६० ) इस एक महासम्वत्सर में ही ( पृथिवी की पाँच परिक्रमाओं के अनन्तर ) पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि पृथिवी से पृथक् होकर आादित्यरूप में परिणत होता हुआ द्युलोक में गमन करता है । आदित्याग्नि ही स्वर्ग क्का अन्यतम अधिकारी माना गया है, जैसा कि -- " तं ( सावित्राग्निविवमादित्यानं ) स ( भरद्वाजः ) बिदित्त्वा अमृतो भूत्त्वा स्वर्ग लोकमियाय, आदित्यस्य सायुज्यम ” ( तै ० ब्रा ० ३ | १० | ११ | ५ | ) इत्यादि ब्राह्मण - श्रुति से स्पष्ट है । भूतप्रधान अङ्गिरोऽग्नि को आादित्यरूप में परिणत होकर आदित्यलोक के साथ ( सोरसम्वत्सरः कै साथ ) सायुज्यभाव प्राप्त करने में जहाँ ६० वर्ष लगते हैं, वहाँ प्राणप्रधान आदित्याग्नि एक मुहू मैं तीन बार सम्पूर्ण पृथिवी की परिक्रमा कर लौट जाता है, जैसा कि निम्नलिखित ब्राह्मंश्रुति से स्पष्ट है--१ - - " त्रिह ' वा एष ( मघवा - इन्द्र: - आदित्यः - सौर प्राण: ) एतस्या मुहूर्त्तस्येमां पृथिवीं समन्तः पति " ( जै ० ना ० उ ० ११२४।६ । ) ।

२ – रूपं रूप मघवा भोभवोति मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम् ।

त्रिय्येद्दिवः परिमुहूख मागात् स्वैम्मन्त्र रेनृतुपा ऋतावा ॥

- ऋक मं ० ३।५३ | ८ || A - इदानीमादित्यशब्देनाभिधेया देवाः, अङ्गिरः शब्देनाभिया ये वर्षयस्ते -द्विविधा अपि हैवाऽऽसन् भूमावेव । पूर्व ष्टौ मनुष्यरूपेणावस्थिताः । - ऐ ० त्रा ० ३।५ | १६ | सा ० भा ० ।

पृष्ठ 145

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भाष्यभूमिका प्रसङ्गोपात्त यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, जिम प्रकार पार्श्वित्र श्रङ्गिरोऽग्नि को ग्रादित्यरूप में परिणत होने के लिए पाँच सम्वत्सर अपेक्षित हैं, एवमेव सौर दिव्याग्नि को सूर्यमण्डल से प्रवृक्त होकर पृथिवी की प्रातिविक वस्तु ( ब्रह्मोदनलक्षण पार्थिव निरोऽग्नि ) बनने में केवल एक वर्ष लगता है । सम्वत्सरानन्तर प्रवृक्त आदित्याग्नि प्रथम ' कुमाराग्नि ' रूप में परिणत होता है, कुमाराग्नि के अवान्तर आठ विवर्त ' हो जाते हैं, अष्टविध इमी कुमाराग्नि को चयनवित् ' चित्राग्नि ' नाम से व्यवहृत करते हैं । यही चित्राग्न पार्थित अङ्गिरोग्नि है, जिसे कि पार्थिव - भूतमात्रा के सम्बन्ध - तारतम्य से ग्रागे जाकर ' पुरुष-अश्व - गो- अवि - अज ' भेदभिन्न पञ्चविध, भूतप्रधान ' पाशुकाग्नि ' उत्पन्न होता है । सर्वमाधारण जिसे अग्नि कहते हैं, वह षाशुक अग्नि है । इसका पिता ङ्गिगेऽग्नि है, जो कि अङ्गिरोऽग्नि सौर मण्डल से पृथक् होकर अपने ज्योतिर्म्मय शुक्लभाव को ग्वोता हुआ तमोमय कृष्णभाव में परिणत हो रहा है । देवमण्डल में प्रतिष्ठित रहने वाले, कालान्तर में वहाँ से प्रवृत होकर पार्थिवरूप में परिणत होने वाले, ज्योतिरूप मे तमोरूप में आने वाले इसी पार्थिव - यज्ञाग्नि को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है – “ यज्ञो वै देवेभ्योऽपचक्राम, स कृष्णो भूत्त्वा चचार ” । जैसे सौरसावित्राग्नि प्रत्यक्ष में तपता हुआ दृष्टि का विषय बन रहा है, वैसे पार्थिव गायत्राग्नि को हम तब तक नहीं देख सकते, जब तक कि इमे साधनविशेषों मे प्रज्वलित नहीं कर लिया जाता । काठ में अग्नि सुप्त है, काष्ठको प्रज्वलित किया, अग्नि ( भूताग्नि - निरोऽग्नि ) प्रकट हो गया । तत्क्षण उसने स्वर्लोक ( लोक ) की ओर गमन आरम्भ कर दिया । क्योंकि पार्थिव अग्नि # सुप्त है, श्रतएव इमे अवश्य ही ' कृष्ण ' कहा जा सकता है । याज्ञिक लोग मन्थनप्रक्रिया के द्वारा इसे खोजते हैं, अतएव यह मृग्यमाण ( ढूँढा जाने वाला ) अग्नि अवश्य ही ' मृग ' कहला सकता है । हरिण का नाम मृग नहीं है, अपितु पार्थिव कृष्ण अग्नि का नाम ( मृग्यमारण होने से ) मृग है । मृगशब्द का मुख्य वाच्य वह पार्थिव अग्नि ही माना गया है, जो ि मृग्याग्नि वेदात्मक, किंवा यशात्मक सौर श्रादित्याग्नि का प्रवर्ग्य भाग होने से स्वयं भी वेदात्मक, तथा यज्ञात्मक है । ब्रह्माग्नि ( वेदाग्नि ) - मयी पृथिवी मृा है, इसका बाह्य पुष्ट मृगचर्म है, जिसके आधार पर पार्थिव भूतयज्ञ प्रतिष्ठित है । कृष्णाजिन के इसी तात्त्विक स्वरूप को लक्ष्य मे रख कर श्रुति कहती है— १ – “ ब्रह्म वै कृष्ण जिनम् " ( कौषीतकि ब्रा ० ४।११ । ) । २ – ' ब्रह्मणो एतद्र पं, यत् कृष्णाजिनम् " ( ० ब्रा ० २ । ७ । १ । ४ । ) । ३– “ ब्रह्मणो वा एतद् ऋक्सामयारूपं, यत् कृष्णाजिनम् ” ( तै ० २ । ७ । ३ । ३ ) । * १ - शेषे वनेषु मात्रोः सन्त्वा मर्त्तास इन्धते । अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि ॥ ( ऋक्सं ० ८६०।१५ )

२ – यत् कृष्णो रूपं कृत्वा प्राविशस्त्वं वनस्पतीन् ।

तस्त्वामेशविघा सम्भरामि सुसंभृता ॥

११० ( तै ० ब्रा ० ३ || ४ | ) |

पृष्ठ 146

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द्वितीयखण्ड ४- " तस्य ( अग्नेः ) एष स्त्रो लोको, यत् कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६'४।२।६ । ) । ५ -- " इयं ( पृथिवी ) कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६ । ४ । १।६ । ) । ६ – “ यज्ञो वै कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६।४।१।६ । ) । ७- -'यो हि कृष्णः ( मृगः ), स यः स यज्ञस्तत् कृष्णाजिनम् ” ( KITS EIRIZIRSI ) I यों तो पृथिवीपृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले सभी प्राणियों का मूल उपादान मृग्यमाण यही पार्थिव कृष्ण-मृग ( पार्थिव अग्नि ) बन रहा है । परन्तु कितने एक प्राणियों में इसकी विशेषमात्रा रहती है । जिन प्राणियों में इसकी प्रधानता है, वे अग्नि की प्रातिस्त्रक प्रतिमा माने जायँगे, एवं पृथिवी के जिस प्रदेश में, जिस भूखण्ड में स्वभावतः इन अग्निप्रधान प्राणियों का विकास रहेगा, वह पार्थिव खण्ड ( अग्निप्रधान होने से ) यज्ञिय प्रदेश माना जायगा । खु. ( मूषक ), अश्वत्थ ( पिप्पल ), रक्त अश्व ( लाल घोड़ा ), कृष्णमृग ( काला हरिण ), ये पदार्थ अग्निप्रधान माने गए हैं । सौर- देवमण्डल से प्रवर्ग्यरूप से प पार्थिव अग्नि की, अग्निरूप यज्ञ की इनमें प्रधानता मानी गई है । श्राखु, अश्वत्थ, अश्व, मृग, ये चारों ही यज्ञाग्नि के नाम है । जिन पदार्थों में, जिन प्राणियों में इस यज्ञाग्नि की प्रधानता है, वे भी आगे जाकर इन्हीं नामों से प्रसिद्ध हो गए हैं । निम्नलिखित श्रुतियाँ अग्नि के इन्हीं प्रातिश्विक प्रवर्ग्यरूपों का समर्थन कर रही हैं -१ - " अग्निर्देवेभ्यो निलायत, आखूरूपं कृत्वा । स पृथिवीं प्राविशत् " । - ( त ० प्रा ० १११ | ३ | ३ | ) | २- " अग्निर्देभ्यो निलायत, अश्वोरूपं कृत्वा । सोऽश्वत्थे मम्वत्सरम तिष्ठत् ” । - ( तैः • ब्रा ० १ | १ | ३ || ) | ३ - " रोहितो दाग्नेरश्वः ” ( शत ० ६ | ६ | ३ | ४ | ) । श्रग्नि के उक्त चारों प्रवर्ग्य - रूपों में मृगपशु को ही अग्नि की नेटिए प्रतिमा माना जायगा । कारण इसका यही है कि, अग्नि यं त्रयीमूर्ति है, ब्रह्म ( वेद ) रूप है । उधर आखू, ग्रश्वत्थ, रक्ताश्व, कृष्णमृग, इन चारों में से मृगपशु में ग्रग्नि के साथ साथ शुक्ल कृष्ण - बभ्रु रूप से वेदत्रयी के वर्णों का भी विकास है । यही कारण है कि, पूर्व में जिन सात श्रुतियों का उल्लेख हुआ है, उन में सर्वत्र ' कृष्णाजिन ' शब्द ही प्रयुक्त हुआ है, एवं उसे ब्रह्म - यज्ञ रूप बतलाया गया है । जिस भूप्रदेश में वेदत्रयी की प्रतिमारूप यह कृष्णमृग स्वच्छन्द विचरण करेगा, वही भूप्रदेश प्रकृत्या यज्ञिय प्रदेश कहलाएगा, वहीं वेदप्रदेश माना जायगा. बहीं वेदधर्म्म का उद्गम होगा, जो कि वेदधर्म्म ' सनातनधर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके कि प्रचार - प्रसार का श्रेय एकमात्र भारतवर्ष को ही है । भारतवर्ष की इसी वैदिकता का स्पष्टीकरण करते हुए, मगवान् मनु ने कहा है-१११

पृष्ठ 147

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भाष्यभूमिका

* कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।

स जेथे यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ॥

- मनुःः २ | २३ | कृष्णमृग - चर्म्म अग्नि की प्रतिमा है, पूर्व निरूपण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है । अत्र यह देखना है कि, यह कैसे तो त्रयीमूर्ति है?, एवं किस आधार पर इसे यज्ञस्वरूप माना गया है? । सौरवेद को ' गायत्रीमात्रिक ' वेद कहा जाता है, जिसका कि १४-१५ है श्रुतियों में दिग्दर्शन कराया जा चुका | सूर्य्यविम् महोक्थ बनता हुआ ऋक् है, सौरज्योतिर्म्मण्डल ( रश्मिमण्डल ) महाव्रत बनता हुआ साम है, एवं इन दोनों वयोनाधों से सीमित सन्धिगत सौर अग्नि ( सावित्राग्नि ) यजु: है । ऋगुरूप सूर्य्यबिम्ब स्वस्वरूप से कुष्णवर्ण है, सामरूप सूर्यमण्डल स्वस्वरूप से शुक्लवर्ण है, सान्ध्य अग्निरूप यजुः श्रूरूप है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, ऋचाएँ कृष्णवर्णमयीं हैं. साम शुक्लवर्णमय हैं, एवं यजु ' बभ्रूलीव ह्रीणि ' हैं । यह तो है प्राकृतिक स्थिति । अत्र दृश्य स्थिति के अनुसार वेदवर्णों की मीमांसा कीजिए । स्थिति के अनुसार जहाँ ऋक कृष्ण, तथा साम शुक्ल माना जायगा, वहाँ दृष्टि के अनुसार ऋक् शुक्ल, एवं साम कृष्ण माना जायगा । ज्योतिर्म्मण्डललक्षण, अतएव शुक्लवर्णोपेत साम हमारी दृष्टि का विषय नहीं बनता । दृष्टिका विषय बनता है साममण्डलगर्भ में प्रतिष्ठित सूर्य्यविम्ब । ऋगुरूप सूर्य्यविम्व हमारी दृष्टि का विषय बनता हुआ ( दृष्टि की अपेक्षा से ) जहाँ शुक्ल माना जायगा, वहीं सामरूप सूर्य्यमण्डल दृष्टि से तत रहता हुआ ( दृष्टि की अपेक्षा से ) कृष्ण ही कहा जायगा । इसी आधार पर स्थितिभाव को प्रधान मान कर जहाँ श्रुति ने— “ मनि शुक्लानि, ता.न साम्नां रूपं, यानि कृष्णानि, तानि - ऋचाम् ” यह कहा है, वहाँ दृष्टिभाव को प्रधानता देते हुए - " यदि वेतरथा । यान्येव कृष्णानि तानि साम्नां रूपं, यान्येव शुक्लानि ताभ्यृचाम् " यह कहने में भी कोई आपत्ति नहीं समझी है । कृष्णमृगचर्म्म में इन तीनों वेदवर्णों का प्राजापत्य शिल्परूप से यथावत् सन्निवेश हुआ । सृष्टिकर्त्ता प्रजापति ने इस के चर्म में बड़े शिल्प के साथ तीनों वेदवरणों का समन्वय किया है । एवं इसी वर्णत्रयी के आधार पर इस कृष्णामृग चर्म्म को अवश्य ही वेदत्रयी की प्रतिमा माना जा सकता है ऋ - अग्निमय है, यही गार्हपत्याग्नि ( पार्थिव अग्नि ) की प्रतिष्ठा है । यजुः वायुमय है. यही धिष्ण्याग्नि ( आन्तरिक्ष्याग्नि ) की एतिष्ठा है । साम श्रादित्यमय है, एवं यही आहवनीयाग्नि ( दिव्याग्नि ) की प्रतिष्ठा है । इन तीनों अग्नियों की समष्टि ही ' वितानयज्ञ ' है । वेदत्रयी के आधार पर इस यज्ञाग्नि का वितान ( व्याप्ति ) होता है । अतएव हम अवश्य ही वेदत्रयी को यज्ञात्मिका कह सकते हैं । क्योंकि कृष्णमृग वेदत्रयीरूप है, अतएव इसे भी सादृश्यभाव की अपेक्षा से अवश्य ही यज्ञात्मक माना जा सकता है । आहुति के लिए तण्डुलों को कूट - पीस कर जो पुरोडाश बनाया जाता है, वह भी यज्ञमाधक होने से यज्ञरूप ही माना गया है । याज्ञिक विद्वानों का यह सिद्धान्त है कि, यदि यज्ञ का कोई भी यज्ञिय पदार्थ यज्ञभूमि से, यज्ञ-* इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' गीताविज्ञान भाप्यभूमिका ' द्वितीयखण्ड ' ख ' विभाग के ' कम्र्म्मयोगपरीक्षा ' न्तर्गत ' वर्णव्यवस्थाविज्ञान ' नामक प्रकरण में देखना चाहिए । ११२

पृष्ठ 148

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द्वितीयखण्ड सीमा से इतर यज्ञिय स्थान में जा गिरेगा, तो वह सपत्नों का भाग बनता हुआ यज्ञकर्त्ता यजमान के शत्रुओं की वृद्धि का कारण बनेगा । इसी विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए इस दर्शेष्टि में कृष्णाजिन गृहीत हुआ है | यह क्योंकि स्वयं यज्ञरूप है । अतएव कुटते - पीसते समय जो भाग उछट कर इस पर गिरेगा, वह यज्ञ-प्रतिष्ठा में हीं प्रतिष्ठित माना जायगा । उक्त ' कृष्णाजिनश्रुतिसमन्वय ' से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, कृष्णाजिन के वणों को वेदात्मक, एवं ज्ञात्मक बतलाना तभी सुसङ्गत बन सकता है, जबकि शब्दात्मक वेद की भक्ति के साथ साथ तत्त्वात्मक वेद को भी अपना उपास्य बना लिया जाता है । क्योंकि बिना तत्रात्मिका वेदसत्ता स्वीकार किए कथमपि प्रकृत श्रुति का समन्वय नहीं किया जा सकता । १८- आत्मसमुद्र, और वेदत्रयी-( आध्यात्मिकवेदः ) – ( १७ ) — “ त्रयो ह वै समुद्राः । अग्निर्यजुषां महाव्रतं साम्नां मह-दुक्थमृचाम् । स य एतानि परम्मै करोति, एतान् ह स समुद्रा-ञ्छोपयते, ताञ्छुष्यतोऽन्वस्य छन्दांसि शुष्यन्ति, छन्दांस्यनु लोङ्कः, लोकमन्वात्मा, आत्मानमनु प्रजाः पशवः । स ह श्वः श्व एव पापीयान् भवति य एतानि परस्मै करोति " । - शत ० ना ० ६ | ४ | ३ | १२ | | " ( तीनों वेदों के ) तीन समुद्र मानें गए हैं । अग्नि यजुत्रों का समुद्र है, महाव्रत सामों का समुद्र है, मेहदुक्थ ऋचाओं का समुद्र है । जो मनुष्य इन अपने तीनों ( प्राध्यात्मिक वेदसमुद्रों ) को दूसरे के लिए प्रकट कर देता है, वह अपने इन तीनों समुद्रों का शोषण कर लेता है । वेदममुद्रों के सूत्र जाने से इस के छन्द सूख जाते हैं, छन्दों केसूब जाने से लोक, लोक के शोषण से श्रात्मा, श्रात्मशुष्कता से प्रजा और पशुमम्पत्ति शुष्क हो जाती है । ऐसा व्यक्ति दिन दिन अवनति की ओर अग्रेसर होता जाता है, जो कि अपने वेदसमुद्रों का दूसरों के प्रति अवदान कर देता है " । अग्नि- महाव्रत - महदुक्थों को क्रमश: यजुः साम - ऋचाओं का समुद्र किस आधार पर बतलाया गया?, इनका आध्यात्मिक स्वरूप क्या है?, इन का शोषण कैसे हो जाता है?, इत्यादि प्रश्नों का विशद - वैज्ञानिक समाधान तो आगे के परिच्छेदों में यथावमर किया जायगा । प्रकृत में वक्तव्यांश यही है कि, आध्यात्मिक. अग्नि, महाव्रत, महदुक्थ को यजुः साम - ऋचाओं का समुद्र बतलाना एकमात्र तत्त्वात्मिका वेदत्रयी से ही सम्बन्ध रखता है । चिना तत्त्ववेद को अपनाए इन त्रयीममुद्रों का समन्वय सर्वथा असम्भव है । समुद्रशब्द अनन्तता का ही सूचक है । शब्दात्मक वेदग्रन्थ जहाँ सादि - सान्त हैं, वहाँ तत्त्वात्मक वेद समुद्रात्मक बनते हुए अनन्त हैं, जिनका कि महर्षियों ने सुतीक्ष्ण अनि स्थानीय बुद्धियों से अन्वेषण किया है- “ ये समुद्रा-निरखनन् देवास्तीक्ष्णभिरभ्रिभिः ” । ११३

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१६- सा ' ' - ' म ' और सामवेद-भाष्यभूमिका ( दाम्पत्यत्रेदः ) ( १८ ) – “ क्र. च वा इदमत्र साम चा स्ताम् । सैत्र नाम ऋगासीत्, अमो नाम साम । सा वा ऋक् सामोपावदन् - ' मिथुनं सम्भवात्र प्रजात्या ' इति । नेत्यत्रवीत् साम । ज्यायान् वा अता मम महिमा इति । ते द्व े भूत्वोपावदताम् । तेन प्रतिवचनं समवदत । तस्रो भूत्त्वोपावदन् । तत्तिसृभिः समभवत् । यत् तिसृभिः समभवत्, तस्मात् तिसृभिः स्तुवन्ति, तिसृभिरुद्गायन्ति । तिसृभिर्हि साम सम्मितम् | तस्मादेकस्य बह्वचो जाया भवन्ति, नकस्यै बहवः सह पनयः । यद्वैतत् सा चामश्च समभवत्, तत् सामाभवत्, तत्

साम्नः सामच्यम् ” ।

-- ऐतरेय ब्रा ० १२।१२।२३ ॥

" ( किसी समय ) ऋकू और साम दोनों पृथक पृथक थे । ' साम ' शब्द का ' सा ' अक्षर ऋकू था, ' श्रम ' यह नाम रखने वाला तत्र साम था । ' सा ' रूपा ऋकू ने साम से कहा कि, अपन दोनों प्रजोत्पत्ति के लिए ' दाम्पत्यभाव ' में परिणत हो जायँ । सामने उत्तर दिया कि नहीं, यह कभी सम्भव नहीं है । तुम्हारी ( ऋक की ) अपेक्षा मेरा महत्त्व बहुत बड़ा है | ( सामका यह उत्तर सुन कर ) दो ऋचाओं नें साम से दाम्पत्यभाव की प्रार्थना की । सामने तदपि ऋचात्रों की प्रार्थना अम्वीकृत कर दी । अन्त में तीन ऋचाओं मैं साम से दाम्पत्यभाव की प्रार्थना की । साम तीनों ऋचाओं से दाम्पत्यमाव को प्राप्त हो गया । क्योंकि साम सीन ऋचाओं से दाम्पत्यभाव को प्राप्त हुआ, यही कारण है कि, ( वैधयज्ञकर्म में ) तीन ऋचात्रों से ही ( उद्गाता लोग ) स्तोत्रिया करते हैं, तीन से ही सामगान करते हैं । एक साम तीन ऋचात्रों जितना है । यही कारण है कि, एक पुरुष के एक - साथ बहुत - सी खियाँ अवश्य रह सकती हैं, किन्तु एक स्त्री के अनेक पति नहीं हो सकते । जो कि ' सा ' और ' अमो ' लक्षण ऋक्साम मिल गए, इसी सम्मेलन से साम का स्वरूप निष्पन्न हुआ । यही साम का सामत्व है " " एकं साम तृवे क्रियते स्तोत्रियम् " इस श्रीतसिद्धान्त के अनुसार तीन ऋचाओं का एक साम-मन्त्र माना गया है । चात यथार्थ में यह है कि, पद्यात्मक मन्त्र ' क ' कहलाता है, एवं गानात्मक मन्त्र साम कहलाता है | इस सम्बन्ध में यह प्रश्न किया जा सकता है कि यज्ञकर्म में होने वाला स्तोत्रकर्म्म, एवं उद्गान ( सामगान ) कर्म्म तीन तीन ऋचाओं से क्यों किया जाता है? । प्रकृत ऐतरेयश्रुति तत्त्वात्मक ऋकू-श्याम के तात्त्विक स्वरूप के आधार पर इसी प्रश्न का समाधान कर रही है ।1 पृथिवी माता है, द्युलोकोपलक्षित, श्रादित्यप्राणात्मक कश्यप प्रजापति पिता है । माता पृथिवी ‘ इयं ' है, पिता कश्य - ' सौ ' है । ' इयं ' शब्द स्त्रीभाव का द्योतक है, ' असौ ' शब्द पुम्भाव का द्योतक है । पृथिवी ऋकू है, द्यु साम है । क्योंकि ऋगूरूपा पृथ्वी स्त्री है, पत्नी है, अतएव इसे स्त्रीभावद्योतक ' इयं ' - ' सा ' ११४

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 150 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयखण्ड ' एषा ' इत्यादि शब्दों से व्यवहृत किया जा सकता है । द्यलोकोपलक्षित सामात्मक कश्यप, किंवा आदित्य पुरुष है, पति है, अतएव इसे पुम्भावद्योतक ' सौ - ग्रमः ' ' एषः ' इत्यादि नामों मे व्यवहृत किया जा सकता है । इन दोनों के ( द्यावापृथिवी के ) दाम्पत्यभाव से ही त्रैलोक्यप्रजा की उत्पत्ति हुई है । स्वय प्रजापति एक है, स्त्रीस्थानीया माता पृथिवी के अदिति, दिति, दनु, काला, आदि १३ अवान्तर भेद हो जाते हैं । स्तोम्यत्रिलोकीविज्ञान के अनुसार ' पृथिवी अन्तरिक्ष - यौ ' ये तीनों स्तौम्यलोक एक ही पृथिवी के तीन रूप हैं । श्रतएव ऋगूरूषा पृथिवी के तीन विवर्त्त मानें गए हैं, जैसा कि - " तिस्रो वा इमाः पृथिव्यः । मका, द्वेस्था. परे " ( शत ० ५।१।५ २१ ) इत्यादि से प्रमाणित है । पृथिव्यन्तरिक्षय रूषा इस महापृथिवी की ग्रन्तिम - सीमारूप द्युलोकात्मक परिमण्डल का ही नाम रथन्तरसाम है । इस सामपुरुष का स्वरूप पृथिवीरूपा तीन ऋचाओं से ही सम्पन्न हुआ है । ऋक ही साम बनता है । पिण्डावच्छिन्न विष्कम्भ ( व्याम ) ऋकू है, पिण्डावच्छिन्न परिणाह साम है । त्रिगुणित विष्कम्भ ही एक परिणाह है । क्योंकि ऋक् ही साम बनता है, इसी रहस्य को सूचित करने के लिए श्रुति ने ' साम ' शब्द के ' साम ' ये दो विभाग किए हैं । एवं ' सा ' को ऋक् माना है, तथा ' अम ' को साम माना है । साथ ही तीन ऋचायों ( विष्कम्भां ) से क्योंकि एक माम ( परिणाह ) का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, अतएव यज्ञकर्म में प्रयुक्त होने वाले शब्दात्मक साममन्त्र को तीन ऋचाओं से युक्त माना गया है । इन विष्कम्भादि भावों का आगे विस्तार से निरूपण होने वाला है । प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि, श्रुति ने जिस ऋण - साम का दाम्पत्यभाव बतज्ञाया है, वह दाम्पत्यभाव, तथा तदनुचन्धी ऋकू - साम शब्दात्मक वेद नहीं है, अपितु तत्त्रात्मक वेद है । बिना इसकी सता स्वीकार किए शब्दभक्ति रापण महानुभाव कथमषि ' ऋच्य रूढं - साम गीयते ' - ' तृचं साम ' इत्यादि वचनों का समन्वय नहीं कर सकते । २०- देवात्मा, और वेदत्रपी-( घर्मवेदः ) —— ( ११ ) —— ‘ तदेतद्द वमिथुनं यद्धर्मः । स यो धर्मस्तच्छिन्न, यौ शफौ तौ -शा, योपयमनी तेश्रोणि कपाले । यत् पयस्तद्रेतः । तदिदमग्नो देवयन्यां प्रजनने रेतः सिच्यते । अग्निवें देवयोनिः । सोऽग्न-र्देवयान्या आहुतिभिः सम्भरति । ऋङ्मया, यजुर्म्मयः, साममयो, वेदमयो, ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति य एव वेद,

यश्चैव विद्वानतेन यज्ञक्रतुना यजते " ।

- ऐ: ब्रा ० ४।६।२२ ॥

" वह यह देवताओं का मिथुनभाव है, जो कि धर्म ( प्रवर्ग्ययज्ञ से उत्पन्न होने वाला, यज्ञकतो यजमान के मानुत्रात्मा में संस्काररूप से प्रतष्ठित प्रवर्ग्ययज्ञातिशयरूप धर्म्म ) है । सो जो यह घर्म्म है, वह ( दैवात्मोत्पादक ) शिश्नेन्द्रियनीय है, ( उदुम्बर काष्ठ से निर्मित दो शफ ) इसके दो शब्क ( अण्डकोश ) हैं, ( उदुम्बर काष्ठ से निर्मित, शकाधारभूत ) ' उपयमनी ' नाम की दव श्रौणिद्वय के मध्य १.१५