Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 151–160
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160
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मायभूमिका में रहने वाले कपालद्वय हैं । देवयोनिरूप अग्नि में डाली जाने वाली आहुति ही रेत ( शुक्र ) है । इस प्रकार यज्ञकर्त्ता यजमान इस देवयोनिरूप अग्नि में आहुति डालता हुआ आहुतियों से दैवात्मारूप से जन्म लेता है - ( जो कि दैवात्माकर्षण इसके मानुषात्मा को यावत्संस्कारस्थितिपर्यन्त स्वर्ग में प्रतिष्ठित रखता है ) । ( इस घर्म्मयाग से यह यज्ञकर्ता यजमान ) ॠनय, यजुर्मय, साममय, वेदमय ( अथर्वमय ) ब्रह्ममय ( क्षरमय ) अमृतमय ( अक्षरमय ) बनता हुआ देवस्थान को प्राप्त हो जाता है । जो ऐसा जानता है, उसे भी देवगति प्राप्त होती है । सूर्य के प्रवर्ग्याश से पृथिवी बनी । पृथिवी के प्रवर्ग्याश से हमारा स्वरूपनिर्माण हुआ । इस प्रकार परपम्रया हम उसी दिव्यविभूति के प्रवर्ग्याश मान जायँगे । परन्तु पार्थिवभूतमात्रा को प्रधानता से हमारी अध्यात्मसंस्था का यह दिव्यभाव प्रावृत हो रहा है । अतएव हम दिव्यलोकों से वञ्चित रह जाते हैं । हमें वह दिव्य प्रवर्त्यांश प्राप्त हो, दूसरे शब्दों में जन्म से ही प्राप्त वह दिव्य प्रवयश भूताकर्षण से मुक्त होकर, अपने दिव्याकर्षण से आकर्षित होकर हमें ( शरीरपरित्यागानन्तर ) दिव्यलोकों का भोक्ता बनावे, इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए वैज्ञानिकों ने घर्म्मयाग का आविष्कार किया है, जो कि धर्म्मयाग - ' छिन्न शीर्षयाग ' ' प्रवर्ग्ययाग ' ' महावीरोपासना ' इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । प्रवर्ग्य दिव्याग्नि गायत्राग्नि है, जिसे कि पूर्व में हमने अङ्गिरसोऽग्नि कहा है । ' एति च प्रेति चान्वाहु ' के अनुसार यह गायत्राग्नि दिव्यलोकों से सम्बन्ध करता रहता है । यह प्रवर्ग्याग्नि स्वयं विकृतिरूप है, जिसके कि ऋक् – साम - यजुः - अथर्व, ये चार विवर्त हैं । इन चारों विकृतिभावों की प्रतिष्ठा ब्रह्मात्मक क्षर है. ज़र की प्रतिष्ठा अमृतमय अक्षर है । प्रवर्ग्याग्निसंस्कार से यज्ञकर्त्ता का मानुषात्मा विकृतिरूपा वेदचतुष्टयी के संस्कारों से, तदभिन्न क्षरब्रह्म से, एवं तदभिन्न अमृताक्षर से युक्त होता हुआ दिव्यलोकानुगामी बन जाता है । यह एक रहस्यपूर्ण विषय है कि, श्रुति के द्वारा अथर्वतस्व ही वेदशब्द से सम्बोधित हुआ है । कारण इसका यही है कि, अग्निवेद का नाम जहाँ वेदत्रयी - ( ऋक् - यजुः सामवेद ) है, वहाँ सोमवेद का नाम अथर्ववेद है । साथ ही अग्नि में जब तक अथर्वलक्षण सोमवेद की ग्राहुति नहीं होती, तब तक अग्निवेद का विकास ही असम्भव है | मण्डल अर्चि अग्निभाव सोमाहुति पर ही प्रतिष्ठित है । इसी रहस्य को सूचित करने के लिए श्रुति ने जहाँ तीनों अग्निवेदों को ऋक् - यजुः - साम शब्दों से व्यवहृत किया है, वहाँ वेदत्रयी के प्रतिष्ठारूप अथर्ववेद को ' वेदमय ' माना है | श्रुतिद्वारा प्रकृत में बतलाना यही है कि, संस्कारात्मिका यह वेदचतुष्टयी विशुद्धरूप से तत्त्वात्मिका वेदचतुष्टयो से हो सम्बन्ध रखती है । २१ -ब्रह्म - क्षत्र - और ऋक्साम-( ब्रह्मक्षत्रवेदः ) -- ( २० ) – “ भूर्भुवः स्वरोममोऽहमस्मि स त्वं स त्वमसि । मोऽहम् । योरहं, पृथिवी त्वं । सामाहं, ऋकत्वम् तात्रैव संवहाव है, पुराण्य-स्मान्महाभयात् । तन्नूरसि तन्वं मे पाहि " । ऐ ० ब्रा ० ४० | ५ | २७ || ११६
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द्वितीयखण्ड " " भूः भुवः स्वः, नाम से प्रसिद्ध व्यष्ट्यात्मक तीनों लोक, श्रोङ्कारात्मिका समष्टिरूपा त्रिलोकी, एवं इनं के अभिनानी पुरोवान - वायु प्रादित्य - प्रजापति नामक देवता ही ब्रह्मक्षत्रवत की प्रतिष्ठा हैं । इस प्रतिष्ठातत्त्व का स्मरण करता हुआ, अपने ब्रह्म पुरोहित का वरण करता हुआ राजा कहता है कि, हे पुरोहित! मै ‘ अम ' हूं, तुम ‘ स ' हा । मैं यो हूं, तुम पृथिवी हो । मैं माम हूँ, तुम ऋ हो । ऐपे ऋकू - सामरूप तुन-हम ( ब्रह्म - क्षत्र ) मिल जावें, मिलकर महाभय से इन पुरों की रक्षा करें । हे पुरोहित! आप मेरे राष्ट्र के शरीरस्थानीय हैं । आप इस राष्ट्रशरीर की रक्षा करें । प्रकृत श्रुति ने मूलप्रभव लक्षण उक्थात्मक ब्राह्मण को ऋग्वेद माना है, एवं अर्फत दश विभूतिमण्डलात्मक क्षत्रिय को साम माना है । ब्रह्म - क्षेत्र के ये ऋकू – सामभाव तत्त्ववेद का ही समर्थन कर रहे हैं । २२ - इन्द्र, और ऋक् - साम— ( इन्द्रवेदः ) – ( २१ ) — “ हरियाँ इन्द्रो धाना असु, पूरान् करम्भं सरस्वतीवान्-भारतवान् परिवार इन्द्रस्यापूप इति हविष्पङक्त्या यजति । ऋक्सामे वै इन्द्रस्य ही " – ऐ ० ना ० ८ | ६ | २४ || “ हरि नामक दो अश्वों ( घोड़ों ) पर आरूढ़ होने से ' हरिवान् ' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र धान खाय । पूत्रा देवता मे युक्त, ग्रतएव ' पूपवा २ ' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र करम्भ खाय । सरस्वती, तथा भारती से युक्त, अतएव ' सस्त्रीवान, तथा भारनीवान् ' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र परिवाप खाय । चौथी आहुति प है । पाँचवीं आहुति पयस्मा है । इन पाँचों की समष्टिरूप ' हविष्पङक्ति ' से इन्द्र का यजन करता है । ऋक्साम ही इन्द्र के हरि ( श्व ) हैं " । ऋक् – साम का प्रत्यक्ष विकास सूर्य्यमण्डल है । सौर इन्द्रप्राण इन्हीं ज्योतिर्म्मय, वयोनाधलक्षण ऋकू - सामों के आधार पर प्रतिष्ठित रहता है । अतएव सौर मत्रा इन्द्र को ' हरिवान् ' कहा जायगा । पार्थित्र-प्राण ' पूषा ' नाम से प्रसिद्ध है । तद्युक्त पार्थिव इन्द्र ' वास ' नाम से प्रसिद्ध है । इ े ही ' पूषण्वान् ' कहा जायगा । पारमेष्ठ्य अ / पोमय मण्डल से वाकूतत्त्व के आधार पर अर्थ, तथा शब्द नाम की दो स्वतन्त्र धारा निकलतीं हैं । शब्दधारापेक्षया वहो वाकतत्त्व ' भारती ' है, एव अर्थधारापेक्षया वही वाकतत्त्व सरम्वती है, जिसका कि ऋग्वेद के ‘ आम्भृणीसूक्त ' में ' आम्भृणी ' नाम से निरूपण हुआ है । वाङ्मय इन्द्र इन दोनों वागूधाराओं से युक्त रहता हुआ सरस्वतीवान् भी है, एवं भारतीवान् भी है । प्रकृत में कहना केवल यही है कि, श्रुति ने ऋ - साम को इन्द्र का हरि बतलाया है । ये ऋक्साम तत्त्वात्मक ही हो सकते हैं । यजुः प्राण-भाग है, यही वयोलक्षण इन्द्र है, जिसका कि प्रथम प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । यजुम्मूर्त्ति, प्राणात्मक, वयोलक्षण इन्द्र ऋ - सामलक्षण वयोनाधरूप छन्दों के आधार पर ही स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । छन्द को ही अश्व कहा जाता है । इसी अभिप्राय से - " ऋक्सामे वै इन्द्रस्य हरी " यह कहा गया है । ११७
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भाष्यभूमिका २३- दिक् - काल- देश - वर्ण, और वेदत्रयी-( दिग्वेदः ) - ( २२ ) - ऋचां प्राची महती दिगुच्यते—
दक्षिणामाहुर्य जुपामपराम् ।
अथव्यंणामङ्गिरसां प्रतीची-साम्नामुदीची महती दिगुच्यते ॥ १ ॥
( कालवेदः ) ( २३ ) –ऋगभिः पूर्वान्हे दिवि देव ईयते-यजुर्वेदे तिष्ठति प्रध्येऽन्हः । सामवेदेनास्तमये महीयते--वेद्रशधैस्त्रिभिरंति सूर्य्यः ॥ २ ॥
( देश ं दः ) ( २४ ) —ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः— सर्वागतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्व तेजः सामरूष्यं ह शश्वत् – सर्व हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥ ३ ॥
( वर्णवेदः ) – ( २५ ) —म्रुग्भ्यो जातं वैश्यवर्णमाहुः—
यजुर्वेदं क्षत्रियस्या ssg निम् ।
सोमवेदो ब्राह्मणानां प्रभूतिः-पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतद्नुः ॥। ४ ॥
- तेः ब्रा ० ३ | १२ | ६ | भूमि का प्रथमखण्ड के ' दिग्वेदनिरुक्ति - कालवेदनिरुक्ति - देशवेदनिरुक्ति- धर्णं वेदनिरुक्ति ' नामक प्रकरणों में उक्त चारों मन्त्रों का विशद निरूपण किया जा चुका है । " पूर्वादि । दशाएँ, पूर्वाह्नादिकाल, मूत्यादि -प्रदेश, एवं वैश्यादिवर्ण वेदात्मक हैं, वेदरूप हैं " मन्त्रों का यही संक्षिप्त तात्पर्य है । एवं यही तात्पर्य्य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, तत्त्वात्मक वेद सर्वथा भिन्न वस्तु है, एवं इस तत्त्वात्मक वेद का प्रतिपादन करने वाला शब्दात्मक वेद सर्वथा विभिन्न पदार्थ है । २४ - द्यावापृथिवी, ( लोकत्रेदः ) - ( २३ ) 1 औरऋक्साम --- " साम वा असौ लोकः, ऋगयं ( लोकः ) । यदितः साम्ना यन्ति, स्वर्ग लोकमारभ्य यन्ति । यच्चा पुनरायन्ति, अस्मिन् लोके प्रति-११ ब
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द्वितीयखण्ड तिष्ठन्ति । यत् सामावसृजेयुः, अथ स्वर्गलोकात् पद्येरन् ।
यद्यचमनुसृजेयुर, नश्येयुरस्माल्लोकात् ” ।
- ताण्डय ० म ० ब्रा ० ४ ३ ५, ६ ॥
प्रकृत साम श्रुति ' अभीवर्त्त ' नामक ' ब्रह्मसाम ' को लेकर प्रवृत्त हुई है । इस सामप्रयोग में ( सामगान में ) साम से आरम्भ होता है, ऋचा पर सामगान का पर्यवमान होता है । इस विपर्य्यय का क्या कारण?, प्रकृत श्रुति ऋकू - सामों के तात्त्विक स्वरूप द्वारा इसी प्रश्न का समाधान करती हुई कहती है कि- “ साम द्युलोक है. ऋक् पृथिवीलोक है । सो जो कि ( उद्गाता लोग ) सामगान से प्रारम्भ करते हैं, वे स्वर्गलोग से ही चलना आरम्भ करते हैं । साम से प्रारम्भ कर जो ऋ से पुनः नीचे की ओर जाते हैं, इस कर्म्म सेवे पृथिवीलोक में ही प्रतिष्ठित होते हैं । यदि ऐसा न कर ये साम से अवसान कर दें, तो स्वर्गलोक से गिर जायँ1 यदि ऋक से उपक्रम कर डालें, तो इस लोक से इनकी सत्ता उखड़ जाय " । सर्वश्री सायणाचार्य ने श्रुति की व्याख्या करते हुए यह बतलाया है कि, " ऋक् यजुः - साम, तीनों में प्रथम - द्वितीय - तृतीय, यह क्रम है । उधर पृथिवी - अन्तरिक्ष - यौ, इन तीनों लोकों में प्रथम - द्वितीय- तृतीय, यह क्रम है । ऋङ्मन्त्रों का पहिला स्थान है, साममन्त्रों का तीसरा स्थान है । इधर पृथिवी का पहिला स्थान है, द्युलोक का तीसरा स्थान है । केवल इसी साम्य को लेकर श्रुति ने पृथिवी को ऋक्, तथा द्यौ को साम कह दिया है " * । कहना न होगा कि, सायणाचार्य की यह सङ्गति सर्वथा महत्त्वशून्य है । श्रेणि - समता का प्रयास करना इसलिए सर्वथा व्यर्थ है कि, पृथिवी - अन्त रे - द्यौ, तीनों लोक स्वयं अपने रूपों से ही क्रमशः ऋक् यजुः - साममय हैं । ऋङ्मय पार्थिव अग्नि की प्रतिकृति ऋङ्मन्त्र हैं, एव साममय दिव्य श्रादित्य की प्रतिकृति साममन्त्र हैं । जैसा संस्थानक्रम तत्त्ववेद का है, ठीक वैसा ही संस्थानक्रम शब्दवेद का है 1 । यदि यहाँ विपर्य्यय हो जाता है, तो वहाँ भी विपर्य्यय निश्चित है । यहाँ सामावसान से स्वर्गप्रतिष्ठा से विच्युति हो बाती है, ऋगुपक्रम से पृथिवी प्रतिष्ठा की च्युति निश्चित है । इस प्रकार प्रकृत श्रुति लोकात्मकवेद के साथ शब्दात्मक वेद का साम्य बतलाती हुई - ' प्रकृतिर्वाद्वकृतिः कर्त्तव्या ' को ओर ही यज्ञकर्त्ताओं का ध्यान आकर्षित कर रही है । २५- लोकचतुष्टयी, और वेद चतुष्टयी-( स्तौम्यवेदः ) – ( २७ ) – “ ऋचामनिर्देवतं पृथिवीस्थानम् । यजुषां वायुर्देवतं अन्तरिक्ष-स्थानम् । साम्नामादित्यदैवतं द्यौः स्थानम् । व्यथव्यां चन्द्रमा-दैवतमापः स्थानम् " । ( गो ० ब्रा ० ) * " यदिदं साम, तदसौ स्वर्लोकः । ऋग्यजुरपेक्षया साम तृतीयं भवति, खर्लोकथा पृथिव्यन्तरिक्षापेक्षया तृतीयः । अनयोः स्थानसाम्यादिभेदेन व्यपदेशः " ११ - तां ० म ० सायणभाष्य, ४३५ ॥
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भाष्यभूमिका 9 चित्य पिण्ड मे सम्बद्ध चितेनिधेया महापृथिवी के ' त्रिवृत, पञ्चदश, एकविंश त्रयस्त्रंश ', स्तोम-मैद से चार प्रधान लोक माने गए हैं । ये चारों स्तोम - लोक क्रमशः ' पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आप: ", नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चारों लोकों के क्रमशः ' अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा ' ये चागें देवता ग्रावा मानें गए हैं । इन्हीं चारों के साथ क्रमशः ' ऋक्, यजुः, साम, अथर्व ' नामक चारों वेदों का सम्बन्ध है | चारों में ‘ ऋकू - नाम - यजुर्वेद ' अग्निवेद हैं, चौथा अथर्ववेद सोमवेद है । पृथिवी के त्रिवृत् ( ६ ) स्तोमपर्यन्त श्रग्निदेवतामय ऋग्वेद प्रतिष्ठित है, पञ्चदश ( १५ ) स्तोमपर्यन्त वायुदेवतामय यजुर्वेद प्रतिष्ठित है, एकविंश ( २१ ) स्तोमपय्र्यन्त श्रादित्यदेवतामय सामवेद प्रतिष्ठित है | एवं त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) स्तोमपर्यन्त संमदेवतामन थर्ववेद प्रतिष्ठित है । इसी पार्थिव वेट चतुष्टयी को विज्ञानभाषा में ' यज्ञमात्रिकवेद ' कहा जाता है । प्रकृत गोपथश्रुति तत्त्वात्मिका इसी वेदचतुष्टी का विस्पष्ट शब्दों से स्पष्टीकरण कर रही है, जिसका कि शब्दात्मक वंद्र से कोई सम्बन्ध नहीं है । १ त्रिवृन्स्तोमः ( ६ ) | पृथिवी अग्निः ऋग्वेदः २ पश्र्चदशस्तोमः ( १५ ) | अन्तरिक्षम् वायुः यजुर्वेदः ३ एकविंशस्तोमः ( २१ ) आदित्यः सामवेदः ४ त्रयः शरतोमः ( ३ ) आपः चन्द्रमाः अथर्ववेदः । स्तामची । लोकचतुष्यी । देवचतुष्टयी वेद २६ - भृग्वङ्गिरा, और वेदत्रयी— ( भृग्वङ्गिरोवेदः ) – ( २८ ) - आपो भृग्वङ्गिरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।
सर्वमापोमयं भूतं सर्वं भृङ्गिमनम् ।
अन्तरैते त्रयो वेद । भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः ॥
- गो ० ना ० पू ० २।३६ । " पारमेष्ठ्य अपूतत्त्व ( अपने स्नेहगुण से ) भृगुरूप है, एवं ( तेजोगुण से ) अङ्गिरोमय है । ये आप, भृग्वङ्गिरोमय हैं । सम्पूर्ण भूतप्रपञ्च क्योंकि श्रापोमय है, अतएव सत्र मृग्वङ्गिरोमय है । इस मृग्वङ्गिरोमय आपःसमुद्र ( पारमेष्ठ्य समुद्र ) के गर्भ में तीनों वेद ( अग्निमय ऋक्, वायुमय यजु:, तथा श्रादित्यमय सम्म-बेद ) प्रतिष्ठित हैं । एवं ये तीनों वेद भृगुवङ्गिरा के ही अनुयायी बनें रहते हे ” । १२०
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द्वितीयखण्ड सूर्य्यत्रेद ही भृगवङ्गिरोवेद है । त्रयीवेटघन सूर्य भृगवङ्गिरोमय पारमेष्ठ्य पममुद्र के गर्भ में ही प्रतिष्ठित रहता है, जैसाकि – “ अपां गम्भन् सीद " ( यजुः सं ० १३ | ३० ) - “ कंस्त्रिद्गर्भ प्रथमं दध आपः " ( ऋकुमं ० १०।८२।५ । ) इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट है । ग्रापोमय भृगूत्र ङ्गरोवेद ही अथर्ववेद है । तद्गर्भीभूत ऋगादि ही त्रयीवेद है । एवं इस वेदचतुष्टयी का विशुद्ध तात्त्विकवेद से ही सम्बन्ध है, जिसका कि केवल शब्दवेद के आधार पर प्रयत्नसहस्रों से भी समन्वय नहीं किया जा सकता । २७- प्राजापत्यसृष्टि, और वेदत्रयी -( प्राजापत्यवेदः ) - ( २६ ) -- " प्रजाप तस्तरोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा प्राणादेवेमं लोक प्राबृहत्, अनादन्तरिक्षलोकं, व्यानादमुं लोकम् । स एतांस्त्रीं-ल्लोकानभ्यतप्यत । सोऽग्निमेवास्नाल्लोकादसृजन, वायुमन्तरिक्ष-लोकात् आदित्य दिवः । स एतानि त्रीणि ज्यानष्यभ्य-तप्यत । सोऽग्निरेचर्चोऽसृजत, वायोयजूंषि, आदित्यात् सामानि " । ( का ० ब्रा ० ६।१० । ) " मापति ने तप किया । तपश्चर्या के द्वारा अपने प्राणभाग मे पृथिवीलोक, अपानभाग से अन्तरिक्ष-लोक, एवं व्यानभाग से द्युलोक उत्पन्न किया । ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राचिरात् ' हस सिद्धान्त के अनुसार इन तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर प्रजापति ने तीनों लोकों को अपने तपोबल से युक्त किया । ( इस द्वितीय तप-कर्म से ) प्रजापति ने पृथिवीलोक से अग्नि, अन्तरिक्षलोक से वायु, एव द्युलोक से ग्रादित्य को उत्पन्न किया । आगे जाकर इन तीनों ज्यातियों को आधार बना कर तप का अनुगमन किया । ( इस तृतीय तपःकर्म्म से ) प्रजापति ने अग्नि से ऋचाएँ उत्पन्न कीं, वायु से यजुः उत्पन्न किए, एवं ग्रादित्य से साम उत्पन्न किए ” । प्राण, पृथिवी, अग्नि, ऋक्, चारों समानधर्मा हैं । अपान, अन्तरिक्ष, वायु, यजुः, चारों समानधर्म्मा हैं । एवं व्यान, द्यौ, आदित्य, साम, ये चारो समानधर्म्मा है । यही प्राजापत्यसृष्टि का संक्षिप्त इतिवृत्त है, जिसका कि विशुद्ध तत्त्ववाद पर ही पर्य्यवसान है । २८ - त्रैलोक्यरस, और वेदत्रयी-( उपलब्धिवेदः ) -३०– “ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाजयत्, यस्येद ं जितं तत् । स ऐक्षत्र, इत्थं चेद्वा अन्ये दवा अनेन वेदेन यक्षन्ते इमामेव ते जितिं जेभ्यन्ति, येऽयम्मम । हन्त त्रयस्य वेदस्य रसमा-ददा इति । स भूरित्येवम्र्भेदस्य रसमादत्त, सेऽय ' पृथिव्य-भवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत्, सोऽग्निरभवद्रसस्य रसः | भुव इत्येव यजुर्वेदस्य रसमादत्त, तदिदमन्तरिक्षमभवत् । १२१
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भूमिका तस्य यो रसः प्राणेदत्, स वायुरभवद्रस्य रसः । स्वरित्येव सामवेदस्य रसमादच साऽद्यौरभवत् । तस्य या रसः प्राणेदत्, स आदित्योऽभवद्रसस्य रसः " - जै उ ० ब्रा ० १११११-५ ॥ " प्रजापति ने तीनों वेदों से वह सब कुछ जीत लिया ( प्राप्त कर लिया ), प्रजापति का जो जित भाग श्राज विश्वरूप से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा है । ( तीनों वेदों के आधार पर यज्ञवितान कर तद्वाग प्रजापति ने सत्र कुछ अपने अधिकार में कर ) विचार किया कि, यदि इसी प्रकार अन्य देवता भी इस वेदत्रयी से यजन करेंगे, तो वे भी इसी जिति को ( विश्ववभव को ) प्राप्त कर लेंगे, जो कि मेरी जिति है । क्यों नहीं मैं इन तीनों वेदों के रस ( तत्त्वभाग ) का ग्रहण कर लूँ । ( यह विचार कर ) प्रजापति ने ' भू ' रूप से ऋग्वेद का रस ग्रहण कर लिया, वही भ्रू पृथिवी बनी । ऋग्वेद का जो रस पृथिवी में प्रतिष्ठित हुग्रा, वह अनि कहलाया, जो कि इसका ( ऋग्वेद का ) भी रस है । ' भुव: ' रूप से यजुर्वेद का रस ले लिया, वही भुत्रः अन्तरिक्षलोक बना । यजुर्वेद का जो रस अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित हुआ, वह वायु कहलाया, जो कि रस का ( यजुर्वेद का ) भी रस है । ‘ स्त्र ' रूप से सामबेद का रस लिया, वही स्वः द्युलोक बना । सामवेद का जो रस द्युलोक में प्रतिष्ठित हुआ, यह श्रादित्य कहलाया, जो कि इसका ( सामवेद का ) भी रस है " । व्याहृतित्रयी, लोकत्रयी, देवत्रयी, एवं वेदत्रयी का वैज्ञानिक इतिवृत्त बतलाने वाली प्रकृत ७ ति के द्वारा स्पष्ट ही वेद का तत्त्वात्मकत्व प्रमाणित हो रही है । भूः भुवः स्वः, तथा पृथैवो अन्तारेक्ष- द्यौ का जन्य - जनक • भाव देखकर पाठकों को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए । क्योंकि वास्तव में इन दोनों त्रिकों का संस्थान भिन्न-भिन्न है । भूः भुवः स्वः, ये तीनों रसात्मक हैं, अमृतात्मक हैं, एवं पृथिवी अन्तरिक्ष - यौ ये तीनों भूतात्मक हैं, मर्त्यात्मक हैं । रसात्मक स्वः ‘ प्रतिष्ठारस ' है, रसात्मक भुत्रः ' गतिरम ' है, एवं रसात्मक भू ‘ आगतिरस ’ है । आगतिरस प्रजापति के विष गुप से, गतिरम प्रजापति के इन् पत्र से एवं प्रतिष्ठारस प्रजापति के ब्रह्मपर्व से सम्बद्ध है । इन तीनों हृद्य देवताओं की ममष्टे ही ' प्रजापति ' है, जो कि ब्रह्म ेन्द्र विष्णु कृतमूर्त्तिव्यचर प्रजापति-' प्रजापतिश्चरति गर्भेऽन्तरजायमानः ' ( यजुः सं ० १३ | १६ | ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार प्रत्येक भूतपिण्ड के केन्द्र पें प्रतिष्ठित रहता हुआ, प्रतिष्ठा, विसर्ग, आदानभावों का प्रवर्त्तक बनता हुआ ' अन्तर्य्यामी ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । भूरस विश्वात्मक है, भुवः रस इन्द्रात्मक है, स्वः रस ब्रह्मात्मक है । मूलकेन्द्र में स्वरसात्मक, ब्रह्ममय सामरस प्रतिष्ठित है । इसके चारों ओर भुवः रसात्मक, इन्द्रमय यजुरस की व्याप्त है । इसके चारों ओर भूः रसात्मक, विष्णुमय ऋगूरस व्याप्त है । इस प्रकार भूः भुवः स्वगत्मक त्रयीरस से युक्त प्रजापति भूपिण्ड में प्रतिष्ठित हो रहे हैं, जिनके कि इन तीनों वेदरसों के संस्थान का क्रमशः ' स्वः – भुत्रः - भूः ' यह स्वरूप है । अमृतमृत्युलक्षण इस प्रजापति के मर्त्यभाग का अमृताधार पर वितान होता है । ऋगूरूप भूस वितत होकर पृथिवी कह नाया है, यजुरूप भुवः रस वितत होकर अन्तरिक्ष कहलाया है, एवं सामरूप स्व: रस वितत होकर द्युलोक कहलाया है । इन तीनों लोकों को ' महिमालोक ' कहा जाता है । तीनों में क्रमशः अग्नि - वायु-II
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द्वितीयखण्ड आदित्य नाम के तीन देवता प्रतिष्ठित हैं । इनमें अग्निदेवता भूरसरूप ऋग्वेद का रस है, वायुदेवता भुवः रसरून यजुर्वेद का रस है, एवं ग्रादित्यदेवता स्वः रूप सामवेद का रस है । इस प्रकार प्रजापति के गर्भ में प्रविष्ट तीनों रसवेदों का तीनों देवताओं में उपभोग हो रहा है । केन्द्रस्थ स्वः, तथा परिधे के ग्रन्त में प्रवेष्ठत लोक दोनों में जन्य - जनक भाव हैं, दोनों समान है । स्वः का उत्तरवर्त्ती भुत्रः तथा द्यलंक मे अधोवर्ती अन्तरिक्ष, दोनों समान हैं । भुत्रः का उतरवर्ती भूः, तथा अन्तरिक्ष से अधोवर्ती पृथिवीलोक समान हैं । ६ ओं का स्त्रः- भुत्रः- भूः पृथिवी अन्तरिक्ष - यो: ' इस रूप से स्थान है, जैसा कि पाठक आगे आने वाले ' रस वेदप्रकरण ' में विस्तार से देखेंगे । २६ - माता - पिता, और ऋक्रू - साम— A ( मातृपितृवेदः ) - ३१ - " ऋग्वै माता. साम पिता, प्रजापतिः स्वरः । तद्यान्य क्त व्याख्यायन्ते, मातृतस्तान्याख्यायन्ते । अथ यानि सामत श्राख्यायन्ते, पितृतस्तान्याख्यायन्ते । श्रथ यानि स्वरत श्रख्यायन्ते, प्रजापतितस्तान्याख्यायन्ते ” । १० ब्रा ० २।२३, २४, । " ऋक माता है, माम पिता है, स्त्रर प्रजापति है । जो ऋक मे कहे जाते हैं, वे मातृभाव को मान कर कहे जाते हैं । जो साम मे कहे जाते हैं, वे पितृभाव को प्रधान मान कर कहे जाते हैं । जो स्वर से कहे नाते है, वे प्राजापत्यभाव को प्रधान मान कर कहे जाते हैं " । प्रकृत श्रुति ' सामप्रकरण ' से सम्बन्ध रखती है । “ यथान्नरतमानि सर्वाणि त्राह्माणि सामानीति सर्वान्तरतमानि, अथोपनिषत् ” ( दै ० ब्रा ०२।२१,२२,। ) इत्यादि रूप से सामतत्त्व का अनादित्त्व प्रतिपादन करने के अनन्तर प्रकृन श्रुति सामभेद से देवताभेद का प्रतिपादन कर रही है । यज्ञायज्ञीय, वारवन्तीय, आदि सामों में ऋक् की प्रधानता रहती है, अतएव इन छामतत्त्वों को पार्थिवसाम माना जायगा । क्योंकि ऋरु पृथिवी - स्थानीया है, पृथिवी ही माता है । यौधाजय प्रभृति सामतत्त्वों में साम की प्रधानता रहती है, अतएव इन्हें दिव्यसाम माना जायगा । क्योंकि साम स्थानीय है, लोक ही पिता है । वामदेव्यादि सामों में स्वर की प्रधानता रहती है, अतएव इन्हें प्राजापत्य ( ग्रान्तरिक्ष्य ) साम माना जायगा । कहना न होगा कि सामतत्त्व से सम्बन्ध रखने वाले ये ऋक् - साम - स्वरभाव विशुद्ध तववाद के ही समर्थक बन रहे हैं । ३० – यज्ञभषज्य, और वेदत्रयी-( भैषऽप्रसाधकत्रेदः ) –३२– प्रपत्र इमाँत्रीन् वेदानसृजत । त एनं सृष्टानाधिन्दः स्तानभ्यपी यत् । तेभ्यो भूर्भुवः स्वरित्यतरत् । भूरित्य-गृभ्योऽक्षरत् सोऽयं लोकोऽभवत् । भुवरिति यजुर्भ्यो-शरत्, साऽन्तरिक्ष लोकोऽभवत् । स्वरिति सामभ्यो-१२३
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भाष्यभूमिका ऽक्षरत, सः स्वर्गोलोकोऽभवत । यदि ऋक्त उल्वणं क्रियंत, गाहहत्यं परेत्य भूः स्वाहेति जुहुयात । अयं वै लोको गार्हपत्यः अयं लोक ऋग्वेदः । तद्वा इमञ्च लोकं, ऋग्वेदञ्च स्वेन रसेन समर्द्धयति । अथ याद यजुष्ट उल्वणं कियेत, अन्वाहार्य्यपचनं परत्य भुव: स्वाहेति जुहू-यात् । अन्तरिक्षलोको वा अन्वाहार्यपचन, अन्तरिक्ष-लोको यजुर्वेदः । तद्वा अन्तारचलोकञ्च यजुर्वेदञ्च स्वैरसेन समति । अथ यदि सामत उल्वणं क्रियेत, आहवनीयं परेत्य स्वः स्वाहेति जुहुयात् । स्वर्गो धै लोक आहवनीयः, स्वर्गो लोकः सामवेदः । तद्वै स्वगञ्च लोकं, सामवेदञ्च स्वेन रसेन समर्द्धयति । तद्वा आत्मानञ्च, यजमानञ्च स्वेन रसेन समर्द्धयति " । - पडू वंश ० ब्राः १ । ५ । " प्रजापति ने ( यज्ञसिद्धि के लिए ) ऋक् - यजुः - साम नाम के तीन वेद उत्पन्न किए । प्रजापति से उत्पन्न होने वाले इन वेदों ने प्रजापति को तृप्त न किया । ( यह देवकर तृप्तिकामुक ) प्रजापति ने इन तीन को पीड़ित किया । ( प्रजाति के ताप मे संतन ) इन वेां से भूः भवः स्वः नामक रस ब्रह निकला । भूरस ऋग्वेद से निकला, यही भूरस पृथिवीलोक बना । भुवःरस यजुर्वेद से निकला, यहो भुवःरस अन्तरिक्षलोक का जनक बना । स्वरस सामवेद से निकला, यही स्वःरस द्युलोक का जनक बना । य द ऋक् कर में न्यूनाधिक हो जाय, तो गार्हपत्य में ' भूः स्वाहा ' बोलते हुए आहुति देनी चाहिए । पृथिवीलोक गार्हपत्य है, पृथिवीलोक ऋग्वेद है । ( गार्हपत्य में आहुति देता हुआ ) पृथिवलोक, तथा ऋग्वेद को ही इनके अपने रस से पूर्ण बनाता है । यदि यजुः कर्म में न्यूनाधिक हो जाय तो दक्षिणाग्नि में भुव: स्वाहा ' बोलते हुए आहुति दे | अन्तरिक्षलोक दक्षिणाग्नि है, अन्तरिक्षलोक यजुर्वेद है । ( दक्षिणाग्नि में ग्राहुति देता हुआ ) अन्तरिक्षलोक, तथा यजुर्वेद को हो इनके अपने रस से समृद्ध बनाता है । यदि सामकर्म में न्यूनाधिक हो तो श्राहवनीयाग्नि में ' स्त्रः स्वहा ' बोलते हुए आहुति देनी चाहिए । द्युलोक आहवनीय है, लोक नाय, सामवेद है । ( आहवनीयाग्नि में आहुति देता हुआ ) द्युलोक, तथा सामवेद को ही इनके अपने रस से समृद्ध करता है । इस समृद्धिकर्म्म से यह ऋत्विक् अपने आत्मा को एवं यज्ञकर्त्ता यजमान को स्वरस से समृद्ध करता है " | पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, ये तीनों लोक प्राधिदैविक प्राकृतिक नित्य यज्ञ के क्रमशः गार्हपत्य अन्वाहार्य-पच श्राहवनीय कुण्ड हैं । इनमें प्रतिष्ठित गायत्राग्नि धिष्ण्याग्नि - सावित्राग्नि, क्रमशः गार्हपत्य न - अवा-हार्य । चग्न आहवनीयाग्नि है । तीनों लोकों के प्रतिष्ठावा श्रग्निवायु - आदित्य, ये तीन अग्नेय देवता १२४
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द्वितीयखण्ड क्रमशः इस नित्य यज्ञके होता, अध्वर्यु, उद्गाता, नामक ऋत्विक हैं । पार्थिव ऋग्वेदानुचन्धी हौत्रकर्म, आन्त-रिक्ष्य यजुर्वेदानुत्रन्ध्री श्राध्वर्यवकर्म्म, दिव्य सामवेदानुबन्धी श्रद्गात्रकर्म इस यज्ञकर्म के स्वरूपसम्पादक हैं । केन्द्र से लोक पर्य्य समष्टिरूप से व्याप्त मनःप्राणगर्भित, ब्रह्मन्द्रविष्णुकृतमूर्ति, वाङ्मय प्रजापति ही इस यज्ञ के यजमान हैं । ठीक इसी प्राधिदैविक यज्ञ की प्रतिकृति पर ( नकल पर ) द्विजातिवर्ग के द्वारा वितत होने वाले वैध-वितानयज्ञ का स्वरूप व्यवस्थित हुआ है । यहाँ के गार्हपत्य - अन्वाहार्यपचन - श्राहवनीय कुण्ड कमशः व के पृ ० - ० - द्यौ ० की प्रतिकृति हैं । यहाँ के तीनों अग्नि क्रमशः वहाँ के गा ० - वि ० सा ० की प्रतिकृति हैं । यहाँ के होता - अध्वर्ग -उद्गाता क्रमशः वहाँ के अ ० वा ० प्रा ० की प्रतिकृति हैं । यहाँ के ऋग्वेदी होता का होत्रकर्म्म, यजुर्वेदी अध्वर्यु ' का प्राध्वर्यवकर्म्म, सामवेदी उद्गाता का औद्गात्रकर्म वहाँ के अग्नि- वायु- श्रादित्य द्वारा होने वाले हौत्रानुचन्वी शस्त्रकर्म, आध्वर्यवानुत्रन्धी ग्रहकर्म्म, श्रौद्गात्रानुबन्धी स्तोत्रकर्म्म की प्रतिकृति हैं । यहाँ के ऋङ्ग्मन्त्र, यजुर्ष्मन्त्र साममन्त्र वहाँ के पार्थिव ऋकूतत्त्व ग्रान्तरिक्ष्य यजुस्तत्त्व दिव्यसामतत्त्व की प्रतिकृति हैं । जैसा वहाँ है, वैसा यहाँ है । प्राणदेवता जैसा कर रहें है, वैसा ही यहाँ किया जाता है । प्रकृति में जैसा दो रहा है, वैसा ही यहाँ हो रहा है । जैमा कि- ' प्रकृतित्र विकृतिः कत्तंव्या ' - ' यद्वै देवा अकुर्वस्तत् करवाणि'-‘ देवाननुविधा वै मनुष्याः " - " व्यृद्ध वै तद् यज्ञस्य - यन्मानुषं नेद् व्यृद्ध यज्ञ करवाणीति ” इत्यादि निगम वचनों से प्रमाणित है । याधिभौतिक अग्नि को साधन ( द्वार ) बनाकर इसके द्वारा यज्ञकर्त्ता यजमान के आध्यात्मिक अग्नि का आधिदैविक अग्निसंस्कार से ग्रन्थिबन्धन करा देना ही यज्ञकर्म का चरम फल है । इस महारम्भ यज्ञकर्म की स्वरूपनिष्पत्ति के लिए यज्ञकर्ता यजमान को दक्षि शाक्रीत ऋत्विजों का आश्रय लेना पड़ता है । असत्यसंहित मनुष्य से अज्ञात ज्ञात दोष हो जाना स्वाभाविक है । यह दोष न्यूनता, याविक्य भेद से दो भागों में विभक्त है । कमी कर जाना न्यूनतादोष है, अधिक होजाना आधिक्य दोष है । न्यूनभाग यज्ञसमृद्धि की पूर्णता का प्रतिबन्धक बन जाता है, आधिक्य दोष- ' यह यज्ञस्यातिरिक्तं तद्भ्राज्यम् ' के अनुसार यजमान के शत्रु का बलवर्धक बन जाता है । इस दोषचिकित्सा के लिए ही प्रकृत श्रुति ने भैषज्ययज्ञ का विधान किया है । ऋग्वेदी होता. यनुर्वेदी अध्वर्य्य, तथा सामवेदी उद्गाता के ऋक् - यजुः साममन्त्रप्रयोगों में यदि कुछ भी न्यून, अथवा अधिक हो जाता है, तो इन ऋत्रिजों का वेदत्रयीरूप आध्यात्मिक यज्ञ भी दोषावह बन जाता है । वेदत्रय रूप यजमान का आत्मा भी यज्ञसमृद्धि से वञ्चित रह जाता है, एवं विषममन्त्रप्रयोग से उस प्राकृतिक वेदात्मक यज्ञ का संस्कार भी यजमानात्मा के साथ नहीं हो पाता । इसी विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए यज्ञकर्म्मद्रष्टा ब्रह्मा को यथावसर गा ० अन्वा ० आ ० में आहुति देते हुए विरिष्टसंधान ( त्रुटिपूर्ति ) लक्षण प्रायश्चित करना पड़ता है । यहाँ के इस प्रायश्चित कर्म्म से वहाँ की समृद्धि पूर्णतया प्राप्त हो जाती है । साधिका यह मन्त्रत्रयी तत्त्वत्रयी की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है । १२५