Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 161–170

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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भाष्यभूमिका ३१ - व्याहृतित्रयी, और वेदत्रयी-( ब्याहृतित्रेदः, - ( ३३ ) --‘- भूर्भुवः स्वरित्येता वा व्याहृतय इमे त्रयो वेदाः । भूरित्येव ऋग्वेदः, भुव इति यजुर्वेदः, स्वरिति सामवेदः । तन्नर्चा, न यजुषा, न साम्ना, " प्रत्यक्षात् प्रतिपद्यते । नच, न यजुपो, न साम्न एत " । - ऐ ० ० १ २ १० | स्पर्थ | ३२ – अजपृश्नि, और ब्रह्मश्वतिवेद— ( ब्रह्मवेदः ) – ( ३४ ) – “ अजान् ह वै पृथ्नीसवपस्यमानान्: ह्म ' स्वयं स्वयम्भ्वभ्यानर्पत् । तद्ऋपयोऽभवन् । तद्ऋपाणां ऋषिच्यम् । तां देवतामुपातिष्ठन्त यज्ञकामाः । त एतं ब्रह्मयज्ञमपश्यन, तमाहरन्, तेनायजन्त " । -- तैः आः २२६ | " जपृरिन नामक ऋषियों ने तप किया । तप करते हुए इन ऋषियों में स्वयम्भूब्रह्म ( ब्रह्मनिःश्वसित-लक्षण ब्रह्मत्रेद ) स्वयं प्रकट हुआ । इस ऋषिप्राणात्मक स्वायम्भुव ब्रह्मवेद के साक्षात्कार से ही ये अजपृश्नि ऋषि कहलाए । यही ऋषियों का ऋषित्त्व है । श्रादृष्टि से प्रादुर्भूत इस वेदब्रह्म का यज्ञकामना से इन्होंनें श्राश्रय लिया ( श्रन्वेषण किया ) । इसी ब्रह्म के ( वेद के ) आधार पर इन्होंने ब्रह्मयज्ञ ( सर्वकृत नामक स्वाय-यज्ञविद्या ) का साक्षात्कार किया । उसे अपने ज्ञानजगत् में प्रतिष्ठित किया, एवं उसके आधार पर वैध सर्वहुत यज्ञ करते हुए तद्द्वारा उसकी पूर्णता प्राप्त की " । स्पष्ट ही अजनुश्नि के द्वारा दृष्ट स्वयम्भूवेद की तत्त्वरूपता प्रकृत नति से प्रमाणित है । ३३- महाव्रत, और वेदत्र I ( आत्मवेदः ) –३५ -- ‘ ‘ अथो इन्द्रस्यैप आत्मा, यन्महाव्रतम् । तस्मादेनत् परस्मै न शंसेत् । नेदि द्रस्याऽऽत्मानं परम्मिन् दधानीति । अथो यमेवैतमृङमयं, यजुम्मेयं, साममयं पुरुषं सं दुर्गन्ति, तप श्रात्मा, यन्महाव्रतम् " ( शाः आः १ । १ । ) । “ यह इन्द्र का ग्रात्मा है, जो कि महाव्रत है । इसलिए इमे दूसरों को नहीं बतलाना चाहिए । ' हम इन्द्र के आत्मा को दूमरों के अधिकार में प्रतिष्ठित न कर दें, इसीलिए महाव्रत का अधिकारियों के सामने बखान नहीं करना चाहिए । जिस ऋङ्मय, यजुर्म्मय, साममय, पुरुष का संकार करते हैं, वही इन्द्र का श्रात्मा है, जो कि ' महाव्रत ' नाम से प्रसिद्ध है " । बृहतीसहस्र से सम्पन्न, आयुर्लक्षण, प्रज्ञा - प्राणात्मक इन्द्र ही हमारा अत्मा है । इस ग्रात्मेन्द्र का प्रतिष्ठा रूप अशीति - लक्षण अन्न महाव्रत है । इसी महाव्रतान्न से क्योंकि इन्द्र की स्वरूपरा होती है, अतएव १२६

पृष्ठ 162

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द्वितीयखण्ड महाव्रत को इन्द्रात्मा का आत्मा ( प्रतिष्ठा ) कहा जा सकता है । यह प्राणात्मक इन्द्र स्वयं यजुर्मूर्त्ति है, एवं ऋकू - साम से नित्य बुक रहता हुआ ऋक्साममय है । वैध यज्ञद्वारा इसी वेदत्रयमूर्ति इन्द्र का संस्कार किया जाता है । ' महात्रत ' नामक ' अभिवाक्यमहः ' में होने वाला कर्म इन्द्र के त्रयीभाग को ही पुष्ट करता है । त्रयीभाग इसकी अपनी प्रतिष्ठा है । अतएव इसका उपयोग ऐसे पात्र में नहीं होना चाहिए, जो कि अनधिकारी है । प्रकृत श्रुति का इन्द्रात्मा को वेदमय बतलाना एकमात्र तत्त्ववेद से ही सम्बन्ध रखता है | ३४ – चतुष्पाद साम, और वेदचतुष्टयी -( सूर्च्छवेदः ) —– ३६– “ स होवाच प्रजापतिः -- अग्निर्वै देवा इव सर्व विश्वा भूतानि । प्राणा वा इन्द्रियाणि, ' शत्रोन अमृतं सम्राट् - स्वराट् - विराट् । तत्माम्नः प्रथमं पादं जानीयात् । ऋग्यजुः - सामा -१ -थर्वरूपः सूर्योऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः । तत् साम्नो द्वितीयं पादं जानीयात् । योषधीनां प्रभुभवति, ताराधिपतिः सोमः, तत् साम्नस्तु॒तोयं पादं जानीयात् । स ब्रह्मा, स शिवः, स हरिः, सेन्द्रः, सो - क्षरः परमः स्वराट् । तत् साम्नश्चतुर्थं पादं जान यत । या जानीते, सोऽमृतत्वं गच्छति ” । ( नृ ० पू ० १ | ४ | ) | " प्रजापति कहने लगे कि मि ही सम्पूर्ण ( ३३ ) देवता है, यही सम्पूर्ण ( ५ ) भूत है । प्राण ही इन्द्रियाँ हैं, पशु अन्न हैं, अमृत ही सम्राट् स्त्रराट् विराट् है । इसी को साम का प्रथम पर्छ जानना चाहिए । ऋक - यजुः साम अथर्वरूप सूर्य्य. सूर्य केन्द्र में प्रतिष्ठित हिरण्मय पुरुष ही साम का द्वितीय पर्व । इसी को साम का तृतीय है I । जो प्रोधियों का पति है, नक्षत्राविपति है, वही सोन ( चन्द्रमा ) पर्व जानना चाहिए | वही प्रजापति ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र है । वही अक्षरात्मक परम स्वराट् है । एवं इसी को साम का चौथा पर्व जानना चाहिए । जो साम के इन चारों पर्वों को जानता है, वह अमृतत्व प्राप्त कर लेता है " । प्रकृतश्रुति ने सप्तवितस्तिकायात्मक विश्वसाम के चारों पादों का ही स्पष्टीकरण किया है । सम्पूर्ण -विश्व को ' प्रजापते. अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा ' इन चार पर्वो में विभक्त किया जा सकता है । स्वयम्भू, तथा परमेष्ठी इन दोनों अव्यक्तों की समष्टि एक अव्यक्त पर्व है, इसी को प्रजापतिपर्व कहा जा सकता है । सूर्य्य एक पर्व है, चन्द्रमा एक पर्व है, एवं अग्निमयी पृथिवी, किंवा पार्थिव अग्नि एक पर्व है । महाविश्वसोमात्मक महासाम के ये ही चार पाद, किंवा चार पर्व हैं । इन चारों पत्र का दिग्दर्शन कराते हुए श्रुति ने द्वितीय पाद-लक्षण सूर्य्य को जिन चार वेदों से युक्त बतलाया है, वे चारों वेद विशुद्ध तत्त्ववाद से ही सम्बन्ध रखते हैं । १२७

पृष्ठ 163

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३५ – उद्गीथ, और वेदत्रयी भाष्यभूमिका ( उद्गीथवेदः ) – ३७–– ‘ ' अथ खजूद्गीथाक्षराण्युपासीत ' उद्गीथ ' इति । प्राण एव ' उत् ' । प्राएं न ह्य् चिति । वाक - ' गी ' । वाचो ह गिर-इत्याचक्षते । अन्न ं ‘ थम् ' । न हीदं सर्व स्थितम् I । द्यौरेव-' उत् ’ - अन्तरिक्षं - गीः ’ - पृथिवी ' थम् ' | आदित्य एव ' उत् ' -: - ' गो ' - अग्निः ' थम् ' । सामवेद एव ' उत् ' - यजुर्वेदो-' गी ' - ऋगेदः ' यम् ' | दुग्धेऽस्मै वागदोहं, यो वाचादोहः । अन्नवान्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्ग. थाक्षराण्युपास्ते-' उद्गीथ ' इति ” ( छान्दोग्योपनिषत् | ३ | ७ | ) वायु: - ' “ निश्चयेन ( त वोपासक को ) उद्गीथ के ' उन्- गी - थन् ' इन अक्षरों की उपासना करनी चाहिए | प्राण ही ' उत् ' है, क्योंकि प्राण से ही ( सम्पूर्ण भूतों का ) उत्थान ( अभिव्यक्ति ) होता है । वाकू ‘ गीः ’ है । ( इसीलिए तो ) वाक को ' गिर ' कहते हैं । अन्न ' थम् ' है । अन्नाधार पर ही सम्पूर्ण भूतप्रपञ्च प्रतिष्ठित है | आदित्यही ' उत् ' है, वायु ' गो: ' है, अग्नि ' थम् ' है । ( आदित्य से भिन्न ) सामवेद ही ' उत् ' है, ( वायु से अभिन्न ) यजुर्वेद ' गी ' है, एवं ( अग्नि से अभिन्न ) ऋग्वेद ' थम् ' है । उस ( उपासक तत्त्वद्रष्टा - ) के लिए वागदोह ( वारस ) का दोहन कर देता है ( यह उद्गीथ ), जो कि वाकू का दोह ( रस ) प्रसिद्ध है ”, यह भ्रुति उद्गीथात्मिका जिस त्रयीवेद का सङ्केत कर रही है, वह निश्चयेन तत्त्वात्मक ही है । ” ३६ - देवमधु, और वेदत्रयी-( मधुवेदः ) – ३८ – क - सौ वा आदित्यो देवमधु । तस्य ये प्राचो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः ऋच एव मधुकृतः, ऋग्वेद एव पुष्पम् । ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः । एनम् वेदमभ्य-तान् । तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमग्नद्यं रसोऽ-जायत । तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य राहितं रूपम् । ख- अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मघु नाड्यः, यज्ष्येव मधुकृतः, यजुर्वेद एव पुष्पम् । ता अमृता आपः । तानि वा एतानि यजूंषि । एतं यजुर्वेदमभ्यतपन् । तस्याभितप्तस्य यश ० । तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् । १२८

पृष्ठ 164

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द्वितीयखण्ड ग- अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः, सामान्येव मधुकृतः, सामवेद एव पुष्पम । ता अमृता आपः, तानि वा एतानि सामान । एतं सामवेदमभ्यतपन् । तस्याः-भि ० । तद्वा एतद्यदेतद् । दित्यस्न कृष्णं रूाम् । - छान्दो ० ३ | १ | क— “ वह आदित्य ही ' देवमधू ' ( प्राणरूप मधु का कोश ) है । उसकी जो पूर्वदिगनुगता रश्मियों हैं ही इसकी पूर्वदिगुरूपा मधुनाडियाँ हैं । तदनुगता ऋचाएँ हीं मधुकृत ( मधुग्राहक भ्रमर ) है । ( ऋचाओं की समष्टरूप ) ऋग्वेद ही पुष्प ( मधुरसपरिपूर्ण कोश ) है । वे रस आपः ( पारमेष्ठ्य सौम्य श्रापः ) हीं है, जो कि अमृत भावापन्न है, ये ही तो ऋचाएँ हैं । इस ( मथुरूप ) ऋग्वेद को लक्ष्य बनाकर रूप किया गया ( प्रजापति ने तप किया ) । मधुरमरूप ऋचाओं के अभितात रूप से यश ( प्राण ) रूप इन्द्रिय वीर्थ्यात्मक अन्ना ( भोग्य ) रस उत्पन्न हुआ । वह यही तो है, जो कि आदित्य के हिरण्यसंकाशात्मक रूप से प्रत्यक्ष दृष्ट है " । ख - " उस ग्रादित्य की जो दक्षिण दिगनुनता रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी दक्षिणदिगुरूपा मधुनाड़ियाँ है । -: ही भ्रमर है, यजुर्वेद ही पुष्ष है ( शेषपूर्ववत् ) । प्रत्यादृष्ट आदित्य का शुक्लरूप ( श्रालोकरूप ) यही ( यजुर्वेद ) है ” | ग— " उस श्रादित्य की जो पश्चिम दिगनुगता रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी पश्चिम दिगूरूप मधुनाड़ियाँ है, साम ही भ्रमर हैं, सामवेद ही पुष्प है ( शेष पूर्ववत् ) । श्रादित्य का मौलिक कृष्ण रूप यही ( सामवेद ) है * " । उक्त अक्षरार्थ से समन्विता छान्दोग्य ति ने मधु - भ्रमर - मधुनाड़ी - आदि का स्वरूपविश्लेषण करते हुए जिस त्रयीवेद की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, निश्चयेन वह तत्त्वात्मक वेद ही है, जिसका केवल शब्दात्मक वेद के माध्यम से कथमपि समन्वय नही किया जा सकता । ३७ – अमृत स, और वेदत्रयी— ( रसवेदः ) – ( ३६ ) — “ तं वा एते रमानां रसाः । वेदा हि रमाः । तेषामेते रसाः तानि वा एतान्यमृतानि, अमृतानाममृतानि । वेदा मृताः तेपामेतान्यमृतानि ” ( छां ० ] उप ०३ ) ।

* श्री कृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्य च ।

हिरण्मयेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यत्रम् ॥

यजुः सं ० ३३ | ४३ | | १२६

पृष्ठ 165

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भाष्यभूमिका " रोहित - शुक्ल - कृष्ण - वर्णात्मक आदित्य प्राण रसों के भी रस हैं । वेद ही रस हैं । उन के ये प्रारण हैं । येादित्या अमृतभावापन्न हैं, ( अमृतरसात्मक वेदो के रस बनते हुए ) अमृतों के भी मुत हैं । वेद निश्चयेन मृत हैं । इन के ये प्राण अमृत हैं ", इत्यादि श्रुति जिस अमृतवेदत्रयी का हष्टकरण कर रही है, वे तत्त्ववेद के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं? ३८ - अधिदेवत, और वेदत्रयी-( श्रधिदैवतत्रेदः ) – ( ४० ) — " इयमेव ऋक, अग्निः साम | तदेतस्यामृचि श्रध्यूढं माम । तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते । इयमेव ' सा ' ',, - -अग्नि: - ' श्रमः ', तत् साम ( १ ) । अन्तरिक्षमेत्र - ऋक् वायुः साम ( २ ) । धरेव ऋक् आदित्यः साम ( ३ ) | नक्षत्राण्येवऋक्, चन्द्रमाः साम ( ४ ) । अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः, सैत्र ऋक् । अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम ( ५ ) । इत्यधि-दैवतम् " ( छा ० उपशमा ) । " यह पृथिवी ही ऋक है, अग्नि साम है । सो इस पृथिवीरूपा ऋक में साम ध्यूढ ( ऊपरि प्र'तष्ठत ) है । इसीलिए ( शब्दात्मक - मन्त्रात्मक कम्पों में ) ऋक् पर अध्यूढ ही साम का गान करते हैं ( अर्थात् ऋमन्त्र के आधार पर साममन्त्र का गान होना है । क्योंकि तत्त्वात्मक वेद की तत्रात्मिका ऋक् पर ही तत्त्वात्मक साममण्डल का विस्तारात्मक गान हो रहा है ) । यह पृथिवी ही ' सा ' है, तद्गर्भीभूत अग्नि ' श्रमः ' है, दोनों की समष्टि हो ' साम ' है । अन्तरिक्ष ही ' ऋ ' है, वायु ' साम ' हे । श्री ही ' ऋ ' है, श्रादित्य ' साम ' है | नक्षत्रगोलक ही ऋक् है, चन्द्रमा ' साम ' है । सो जो कि श्रादित्य ( सूर्य ) का शुक्ल तेज ( प्रकाश ) है, वही ‘ ऋक ' है, एवं प्रकाशमण्डल के चारों ओर व्याप्त परस्थानीय ( पारमेष्ठ्य ) जो नील कृष्णमण्डल ( आकाश मण्डल ) है, वही ' साम ' है । और यह विडल का स्वरूपपरिचय है " इत्यादे रूप से छान्दोग्यश्रुति ने जिन ऋक् सामों का स्वरूपविश्लेषण किया है, वे तत्त्वात्मक ही हो सकते हैं | शब्दात्मक ऋक् – साम के आधार पर कथमपि इस श्रुति का समन्वय नहीं किया जा सकता । ३६ - अध्यात्म, और वेदत्रयी-( अध्यात्मवेदः ) ( ४१ ) — “ अथाध्यात्मं वागेव ऋक्, प्राणः सामः । तदेतदेतस्या-मृज्यध्यूढं साम । तस्माद्यच्यधृढं साम गीयते । वागेव ' सा ' -प्राणाऽमः, तत् साम ( १ ) । चतुरेव ऋक्, आत्मा साम ( २ ) । श्रोत्रमेव ऋक्, मनः साम ( ३ ) । अथ यदेतदच्णः शुक्लं भाः सैव ऋक् । अथ यीलं परः कृष्णं, तत् साम । १३०

पृष्ठ 166

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द्वितीयखण्ड अथ य एपोऽन्तरक्षिण पुरुषो दृश्यते, सैव ऋक्, तत् साम, तदुक्थं, तद्यजुः, तदेव रूपं, यदमुष्य तद्ब्रह्म । तस्यैतस्य रूपम् । यावमुष्य गेष्णौ, तौ गेष्णौ । यन्नाम, तन्नाम । " ( छा ० उपः ॥ ) । " यह अध्यात्मविवर्त्त है - बाकू ही ' ऋक ' है, प्राण ' साम ' है । सो इस वागूरूपा ऋतू में प्राणरूप ' साम ' ग्रध्यूढ है । अतएब ऋमन्त्र में अनूढ़ होकर माममन्त्र गाया जाता हैं । वाकू ही ' सा ' है, प्राण ' श्रमः ' है, दोनों की समष्टि ' साम ' है । श्रोत्र ही ' ऋक है, मन ( प्रज्ञानमन ) ' साम ' है । सो जो कि नेत्रगोलकों का शुक्लपटल है, वही ' ऋक ' है । श्वेतपटल से परस्थ जो कृष्णनीलमण्डल है, वह ' साम ' है, वह “ यजुः ' है, वह ब्रह्म ( प्रतिष्ठा ) है । इसका वही रूप है, जो कि विदैवत का रूप है । जो श्रधिदैवत के वितानभाव हैं, वे ही इस अध्यात्म के वितानभाव हैं । जो अधिदैवत के नाम है, सो हो इस अध्यात्म के नाम हैं " इत्यादि श्रुते के चाक्षुत्र पुरुषात्मक ऋक् - यजुः साम क्या शब्दात्मक वेद हैं?, नहीं, कदापि नहीं । केवल शब्दवेद पर ही अपनी वेदनिष्ठा समाप्त कर वेन वाले वेदभक्तों को मुकुलितनयन बन कर स्वयं ही इस प्रश्न की मीमांसा करनी चाहिए । ४० - सर्वोङ्कार, और वेदत्रयी --( प्रणत्रवेदः ) ( १२ ) — “ प्रजापति तोकानन् । तेभ्योऽमिततेभ्यस्त्रयीविद्या सम्प्रा-स्रवत् । तामभ्यतपत । तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रा-रुवन्त - भृभुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत । तेभ्य ऽभितप्तेभ्य श्रोङ्कारः सम्प्रास्रत्रत् । तद्यथा शङ्कना सर्वाणि पर्णानि सन्दू-णानि, मोङ्कारेण सर्वा वाक् सन्तृणा । श्रोङ्कार एदें सम् ” ( छा ० उप ० २।२३।१-२ । ) । 19 " प्रजापति ने तीनों लोकों को तपाया । उन अभितात - सन्त'त तीनों लोकों से त्रयीविद्या प्रस्रुत हो पड़ी ( चू पड़ी ) । इस त्रयीविद्या को ( भी ) प्रजापति ने तपाया । इस ग्रभितात - सन्तप्त त्रयीविद्या मे भूः - भुव-स्वः - नामक तीन अक्षर प्रस्तुत हो पड़े ( चू पड़े ) । प्रजापति ने इन तीनों अक्षरों को ( भी ) तपाया । इन श्रभित'त - सन्तास तीन अक्षरों से श्रङ्गार प्रस्तुत हो पड़ा ( चू पड़ा ) । सो जैसे कि एक शंकु से सम्पूर्ण पत्रराशि वारपारीणरूप से विद्ध हो जाती है ( विध जाती है ), तथैव पत्रराशिस्थानीया ( क्षरभूतकूटस्थानीया ) सम्पूर्णा वाक् ( वाङमय सम्पूर्णा भूतप्रपञ्च ) काररूप शंकु से श्रदारपरीणरूप से विद्ध हो गई है ( इसी लिए तो यह कहा और माना जा सकता है कि ), ' ओङ्कार ' ही यह सब कुछ है, " इत्यादि श्रुति ने जिस प्राजापत्य प्रणवात्मक वेद का दिग्दर्शन कराया है, वह तत्त्वात्मक वेद ही है । १३१

पृष्ठ 167

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भाष्यभूमिका ४१ - विस्रस्तप्रजापति, और गयीवेद--( भैषज्यवेदः ) – ( ४३ ) – “ प्रजापतिलोकानभ्यतपत । तेगं तप्यमानानां रसान् प्राबृहत्-अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षात् आदित्य दिवः । स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् । तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहत् - अग्नेऋचः, वायायंजूंषि, सामान्यादित्यात् । स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् । तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहत्-भूति ऋभ्यः, भुवरिति यजुः स्वरित सामभ्यः ।Xxx । एवमेषां लोकानां आसां देवतानां, अस्यास्त्रय्या विद्यया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्ट संदधाति । भेषजकृतो ह वा एष यज्ञा, यत्रैवं विद्वान् ब्रह्मा भवति " ॥ ( हां उप ० ४।१७ ) । " प्रजापति ने तीनों लोकों को तपाया । उन तीनों तप्यमान लोकों के तीनों रसों को प्रजापति ने बहाया — अग्निरस को पृथिवी से, वायुरस को अन्तरिक्ष से, एवं आदित्य रस को द्युलोक से; आगे चल कर प्रजापति ने रसात्मक इन तीनों देवां को तपाया । उन तीनों तप्यमान देवरसों के तीनों रसों को प्रजापति ने बहाया - ऋगूर को अग्नि से, यजुः रस को वायु से, एवं सामरस को आदित्य से । श्रागे चल कर प्रजापति ने इस रसस्य रसात्मिका त्रयीविद्या को भी तपाया । उस तप्यमाना त्रयीविद्या के तीन रसों को प्रजापति ने बह'या - ऋगूग्स से ' भू: ' व्याहृति रस को, यजु: - रस से ' भुव: ' व्याहृतिरस को, एवं सामरस से ' स्व: ' व्याहृतिरस को । इ प्रकार इन तीनों लोकों के, तीनों देवताओं के यज्ञात्मक स्वरूप के दुरिष्ट को त्रयीविद्यात्मक वीर्य्यं से संहित करता है ( ब्रह्मा नामक ऋत्त्विकू ) । जहाँ इस रसतत्त्व का परिज्ञाता विद्वान् ब्रह्मा ब्राह्मकर्म्म में नियुक्त रहता है, उस यज्ञकर्म में यजमान का यज्ञ भेषजकृत ( नीरोग - प्रकृतिस्थ ) बना रहता है, " इत्यादि श्रुति में प्रतिपादिता रसात्मिका त्रयीविद्या क्या शब्दात्मक वेद है? | कदापि नही । यह तो स्पष्टरूपेण तत्त्ववेद की और ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है । ४२ — वाङ्मय भूतात्मा, और त्रयीवेद--( वाग्वेदः ) ~~ ४४ – ' स एक्षत, यदि वा इममभिमस्टे, कनीयोऽन्नं करिष्ये इति । स तथा वाचा, तेनात्मना, इदं सर्वम पुजत, यदिदं किञ्च । ऋचों, यजू ंषि, सामानि, यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत, " * ३२ संख्या की पूर्व श्रुति, एवं ४३ संख्या की प्रकृत श्रुति, दोनों समानार्थ का प्रतिपादन कर रही है । १३२

पृष्ठ 168

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द्वितीयखण्ड ततदत्तुमधिवत । सर्व्वे वा अतीति तद् दितेरदितित्वम् । सर्वस्यै-तस्याचा भवति, सर्व्वमस्यान्नं भति, य एवमेतद दितेर दि तिच्यं वेद " ( बृ ० उप ० १२२२५२ ) । “ ( अमृताक्षरगर्भित मृत्युमय क्षरात्मक ) प्रजापति ने ( अपने से उत्पन्न शब्दायमान कुमाराग्नि को लक्ष्य बना कर ) विचार किया कि, यदि मैं इसे ( कुमाराग्नि को ) अपना ( मृत्यु का ) लक्ष्य बना लूँगा, तो मैं अपने लिए बहुत स्वल्प अन्न, सो अपेक्षा ग्रन्न ही बना सकूँगा । ( अपेक्षित है मुझे अपरिमित । इसीलिए ) प्रजापत ने अपनी उस मनःप्राणगर्भिता कुमाराग्निमात्र से सम्पन्न हो नहीं सकती ) वाक् से, मनःप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी आत्मा से ( कुमाराग्निमाध्यम द्वारा ) यह सब कुछ उत्पन्न कर डाला, जो कि ( उत्पन्न वैभव ) ऋक - बजुः - साम - छन्द - यज्ञ - प्रजा - पशु - नामों से प्रसिद्ध है । इस प्रन्नाद प्रजापति ने जो-जो उत्पन्न किया, उस उस को ही अपना अन्न बना लिया ( महिमामण्डल में प्रतिष्ठित कर लिया ) । यह प्रजापति ( अमृतगर्भित मृत्युमय सौर सम्वत्सर प्रजापति अपने महिममण्डल - सौर प्रालोकमण्डल में क्योंकि ) ऋगादि पश्वन्त सत्रको अन्नरूप से प्रतिष्ठित रखता है, अतएव यही इस ' अदिति ' ( आलोकमण्डल ) का दितित्त्व है । जो अदिति के इस अदितित्त्व रहस्य को जान लेता है, वह सम्पूर्ण त्रैलोक्य का अत्ता भोक्ता बन जाता है, यह सब कुछ उसका अन्न बन जाता है ” इत्यादि बृहदारण्यकश्रुति ने मृत्युमय जिस प्रजापति से त्रयीवेद की अन्न रूप से उत्पत्ति बतलाई है, वह तत्त्वात्मक वेद नही है, तो और क्या है? | ४३ - महन्मूर्त्तिख्यय, और त्रयीवेद-( ब्रह्मवेदः ) – ( ४५ ) — “ यजूदर: सामशिरा अमावृङ्मूर्त्तिख्ययः । सति स विज्ञेय ऋषि झमयो महान् ॥ ( कौ ० उप ० १७ | ) | “ जिसका उदर यजु: है, साम जिसका मस्तक है, ऐसा वह अव्ययमूर्ति ( चिदात्माधिष्ठाता ) महान् अव्यय ( श्रव्ययरूप महान् ) ऋमूर्ति ( ऋ - शरीरी ) है । वही ब्रह्म ( प्रतिष्ठा ) है ( उपादान है ), वह विज्ञेय ( विषयावच्छिन्न ) है, ऋषि ( अव्यक्तप्राणमूर्ति ) है, ब्रह्ममय ( क्षरानुगत ) है, महान् है ( पारमेष्ठ्य तत्त्व है ) ” इत्यादि कौषीतक्विचन जिस महानात्मब्रह्म को वेदमय बतला रहा है, वह वेदपदार्थ तत्त्वात्मक जायगा, जिसका कि शब्दात्मक वेद से कोई सम्बन्ध नही है । ४४- अमितौजा पर्यङ्क, एवं त्रयीवेद -( पर्य्यङ्कवेदः ) - ( ४६ ) —– “ स आगच्छत्यमितौजसं पर्यङ्कम् । स प्राणः । तस्य भूतं च, भविष्यच्च पूर्वौ पादौ । श्रीश्चेरा चापरौ । बृहद्रथन्तरे अनूच्चे । भद्र - यज्ञ यज्ञीये शीषेण्यम् । ऋचश्च सामानि च प्राचीनातानम् । १३३

पृष्ठ 169

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भाष्यभूमिका यजूंपि तिरश्चीनानि । सोमांशव उपस्तरणम् । उद्गीथ उपश्रीः । श्रीरुपबर्हणम् । तस्मिन् ब्रह्मास्ते ” । ( कौ: उप ० १।५ । ) । " ( क्रमगति का अनुगमन करता हुआ ) वह भूतात्मा अत्यन्त तेजस्वी पर्य्यङ्क ( पलँग ) स्थान पर पहुँचता है । वह पर्य्यङ्क ( सोर नवाह यज्ञात्नक चतुर्भुज ज्योतिर्म्मण्डल ) प्राणरूप है । भूत और भविष्यत्, ये दो इस पर्य्यङ्क के पूर्वादिगनुबन्धी पाद ( पाए ) हैं । श्री ( गायत्रतेज ), और इरा ( पृथिवी ), जे दो पश्चिमा दिगनुबन्धी पाद हैं । बृहत् और रथन्तर नामक ( और पार्थिव ) साम इस पर्य्यङ्क के अनूच्य ( दोर्घ-खट्वाङ्ग - ईस ) हैं । भद्र, और यज्ञा यज्ञीय नामक ( चान्द्र - भौम ) साम इस पर्यङ्क के शीर्षण्य ह्रस्व खट्वाङ्ग-सेरू ) हैं । ऋक् और साम इस पक के पूर्व - पश्चिम दिगनुगत श्रातान ( दावण ) हैं । यजुः इस पर्य्यङ्क के दक्षिण - उत्तर -- दिगनुगत श्रातान हैं । चान्द्ररश्मियाँ इसका उपस्तरण ( त्रिछावनी ) है । उद्गीथ इसकी उपश्री ( चद्दर ) है । ऐने इस पर्यङ्क पर ब्रह्मा ( हिरश्यगर्भ - प्रजापति - सौरसम्वत्सरप्रजापति ) विराजमान ( प्रतिष्ठित ) हैं ", इत्यादि श्रुति ने जिस पर्थ्य में श्रातानात्मक वेदों का सम्बन्ध बतलाया है, क्या वे वे शब्दात्मक हैं?, कदापि नहीं । ४५ - देवमानुष पित्र्यभाव, और वेदत्रयी.

( त्रयोवेदः ) - ( ४७ ) -- ॠग्दो देवदत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः ।

सामवेदः स्मृतःपित्र्यस्तस्माद्यस्याशुचिर्ध्वनिः ॥

( मनुः – ४। २४। ) । " ( तीनों वेदों में ) ऋग्वेद देवदेवताअन्धी बेद है, यजुर्वेद मानुषभावापन्न है, एवं सामवेद पितृ-मावपन्न है । अतएव सामवेद की ध्वनि शुचि मानी गई है " । प्रकृत मनुवचन में देव, मानव, पितर, तीन भावों के साथ क्रमशः ऋक् यजुः साम- का सम्बन्ध बतलाया गया है । यह सम्बन्ध तत्त्ववेद से ही अनुप्राणित है । अन्यथा तीनों मन्त्रात्मक शब्दात्मक वेदों का इन तीनों सर्गों से कोई भी सम्बन्ध घटित नहीं होता । ४६ - प्राजापत्य त्रिवृद्भाव, और त्रयीवेद-( त्रिवृद्वेदः ) – ( ४८ ) –ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च । एप ज्ञेयत्रिवृद्व दो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ श्रद्यं यतरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता । स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्धं दो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ( मनु: -११।२६४,२६५ ) १३४

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयखण्ड ऋचाएँ, यजुः, एवं बृहत् - रथन्तर - वैरूप- वैराज - शाक्वर - यादि विविध साम, ये तीनों ही ( तत्त्वा-त्मक ) वेद ( मनःप्राणवाकू के त्रिवृद्भाव से ) त्रिवृ र ( नवभावापन्न ) हैं । जो इस त्रिवृद्भावापन्न वेद-रहस्य को जानता है, वही वेदवित् माना गया है । सृष्टिसाक्षी मनः - प्राण - वाक्-- भावों के वाचक प्रकार उकार-मकार इन तीन त्राद्य त्र्यक्षरों की समष्टि रूप जो अक्षरब्रह्म है. जिसमें कि ऋक यजुः - सामरूपा त्रयीविद्या प्रतिष्ठित है, वही यह गुह्य ( रहस्यात्मक तत्त्वात्मक ) त्रिवृद्वेद है । जो इसे जानता है, वही वेदवित् है । ४७ -सावित्री के तीन पाद, और त्रयीवेद-( सावित्र वेदः ) - ( ४६ ) – अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुह्द् भूर्भुवःस्वरितीति च ॥

त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादन दुदुहत् ।

तदित्यृचो ऽस्याः सावित्र्याः परनेष्टी प्रजापतिः ॥

( मनु: - २७६,७७, ) “ ( मनःप्राणवाङ्मय सम्वत्सर प्रजापति से अभिन्न भृग्वङ्गिरोमय परमेष्ठी ) प्रजापति ने वेदत्रय से अकार - उकार - मकार इन तीन अक्षरों को, तथा भूः भुवः स्वः - इन तीन व्याहृतियों को दुहा । इन ऋक · यजुः साम - नामक तीनों वेदों से पाद पाद रूप से परमेष्ठा प्रजापति ने सावित्री के ( सौर ' तेज के ) तीनों पा का दोहन कर लिया है ”, इत्यादि मानवीय सिद्धान्त सौर सावित्राग्निमय तत्त्वात्मक सम्वत्सरिक वेद की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित करा रहे हैं । ४८ - विश्वरं स्थाविभाग, और वेद-( संस्थात्रेदः ) – ( ५० ) —सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक पृथक् । वेदशब्देभ्य एवाद पृथक संस्थाश्च निम्मे ॥ ( मनुः - ११२१ | ) | “ त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित समयात्मक तथा व्यष्टयात्मक यच्चयावत् भूतभौतिक पदार्थों के विभिन्न नाम - रूप - कम्र्मों का प्रजापति ने शब्द तन्मात्रारूप वेदतत्त्व से ही पृथक् - पृथक् संस्था विभाग व्यवस्थित किया है ” इत्यादि मानवीय वचन का वेदश देभ्यः " " वेदवा गृभ्यः " का ही सूचक है, जैसा कि - ' वाचारम्भणं विकारो नामधेय मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' इत्यादि 9 ति से प्रमाणत है । वढवाकू, क्योंकि शब्द तन्मात्रा के द्वारा ही पश्चतन्मात्रारूप में परिणत होती हुई भृतसर्ग की जननी बनती है । अतएव इत्थंभूत वेदवाङ्मय वेदशब्द का तत्त्ववेद पर ही पर्य्यवसान प्रमाणित हो जाता है । ४६ - देवत्रयी, और यज्ञात्मकवेद--( यज्ञमात्रिकवेदः ) - ( ५१ ) -- अग्नि - वायु - रविभ्यस्तु त्र्यंब्रह्म सनातनम् | दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृग - यजुः - सामलक्षणम् ॥ १३५ ( मनुः - ११२३ | ) |