Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 171–180
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180
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भाष्यभूमिका " अग्नि - वायु - ग्रादित्य से ही प्रजापति ने विश्वयज्ञस्वरूपसञ्चालन के लिए ऋक् - यजुः - सामलक्षण– सनातन त्रयीब्रह्म का दोहन किया " इत्यादिरूप से स्पष्ट ही वेदत्रयी की तत्त्वरूपता प्रमाणित हो रही है । ५०- सर्वसृति, और त्रयीवेद-( सर्ववेदः ) – ( ५२ ) —चातुवर्ण्यं त्रयो लोकश्चिच्चारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भवद् भविष्यं च सर्व्वं वेदात् प्रसिद्धति ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्म्मतः ॥
- मनुः - १२ ६७, ६८, ॥
“ नित्यसिद्ध ब्रह्म - क्षत्र - विटू - पौष्णरूप सर्वपदार्थव्यान्त चातुर्वर्ण्य, पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - नामक तीनों लोक, क्रत्वर्थज्ञानात्मक ब्रह्मचर्य्याश्रम, पुरुषार्थकर्मात्मक गृहस्थाश्रम, कत्त्वकर्मात्मक वानप्रस्थाश्रम, पुरुषार्थज्ञानात्मक संन्यासाश्रम, ये चारों प्राकृतिक मानवाश्रम, भूत - भवत् - भविष्यत् मत्र कुछ वेद से ही संसिद्ध है । शब्द - स्पर्श - रूप - रस - गन्ध - ये पाँच तन्मात्राएँ ( विकारक्षरभूत - गुणभूत ) प्रकृत्यनुत्रांन्धनी प्रसूति के गुण - कर्म्म -भेद से वेद से ही उत्पन्न हुए हैं " इत्यादि मनुवचन विस्पष्ट रूप से तत्त्वात्मक वेद का ही समर्थन कर रहे हैं । ५१ - सम्वत् रप्रजापति, और त्रयीवेद-( गायत्रीमात्रिकवेदः ) -५३ - १ - - तस्मादण्डाद्विनिर्भिन्नाद् ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । ऋचो बभ्रुवुः प्रथमं प्रथमाद्वदनान्मुने! ॥
२ – जवापुष्पनिभाः सद्यस्तेजोरूपा ह्यसवृताः ।
पृथक पृथग् विभिन्नाश्च रजोरूपा महात्मनः ॥
३ – यजूंषि दक्षिणाद् वक्त्रानिवद्धानि कानिचित् ।
यादृग्वर्णे तथा वर्णान्यसंहतिचराणि वै ॥
४ - पश्चिमं द्विभोक्त्रं ब्रह्मणः परमेदिनः ।
आविर्भूतानि सामानि ततः कुन्दभितान्यथा ॥
५– — अथर्व्याणामशेषेण भृङ्गाञ्जनचयप्रभम् ॥ घोराघोरस्वरूपं तदाभिचारिकशान्तिमत् ॥
६ - उत्तरात् प्रकटीभृतं वदनाचत्तु वेधसः ।
मुखं सच्चतमःप्रायं सौम्यामौम्यस्त्ररूपवत् ॥
७ – ऋचो रजोगुणः, सर्व्वं यजुपाञ्श्च गुणो मुने! तमोगुणानि सामान तमःसत्त्वमथव्वसु । १३६
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द्वितीयखण्ड
८ - एतानि ज्वलमानानि तेजसाप्रमितेन वै ।
पृथग् पृथगत्रस्थानं भाञ्जि पूर्व्वामवाभवत् ॥
६- ततस्तदाद्यं यचज प्रोमित्युक्त्वाभिशस्यते तस्यानुभावादृक्तेजस्तमांस्यावृत्य संस्थितम् ॥ १० – यथा यजुर्म्मयं तेजो यच्च सान्नां महामुने! एक चमुपयातानि परतेजसि संश्रयात् ॥
११ – शान्तिकं पौष्टक व तथा चैवाभिचारिकम् ।
ऋगादिषु लयं ब्रह्म स्त्रितयं त्रिष्वथागमत् ॥
१२ — ततो विश्वमिदं सद्यस्तमोनाशात् सुनिर्म्मलम् ।
भावती विप्रर्षे! * तिरश्चाध्व मघस्तथा ॥
१३ - ततस्तन्मण्डलीभूतं छान्दसं तेज उत्तमम् ।
परेण तेजसा ब्रह्मन्! एकत्रमुपगम्य तत ॥
१४ - आदित्य संज्ञामगमदादावेव यतोऽभवत् ।
विश्वस्यास्य महाभाग! कारणश्चाव्ययात्मकम् ॥
१५ - प्रातर्म्मध्यन्दिने चैव तथा चैत्रापराह्निके ।
पति सा काले ऋग्यजुःसामसंज्ञिता ॥
4 १६ B ऋचस्तपन्ति पूर्वाह्न मध्याह्ने च यजूंषि वै । सामानि चापराह्न तु तपन्ति मुनिसत्तम! |!
१७ - शान्तिकं ऋत्र पूर्वाह्णेो यजुः स्वनृत्रपौष्टिकम् ।
अपरा स्थितं नित्यं सामस्त्रेवाभिचारिकम् ॥
* तिरचीनो विततो रश्मिरेपामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा श्रासन् महिमान आसनत्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥
( ऋक्सं ० २० | १२६ | ५ | नासदीय सूक्त ) - 1 " सेषा त्रय्येव विद्या तपति ( सूर्य्यः ) " ( शत ० १०।५।२।२ । ) ।
" ऋगभिः पूर्वाह्न दिवि देव इयते, यजुर्वेदे तिष्ठतिः मध्येऽह्नः ।
सामवेदेनास्तमये महीयते, वैदैर रोषस्त्रिभिरति सूर्य्यः ॥
१३७ ( तै ० प्रा ० ३११२२० ) ।
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भाय भूमिका
१८ - सृष्टौ ऋङमयो ब्रह्मा, स्थितौ विर्यजुम्मेयः ।
रुद्रः साममयोऽन्ते च तस्मात्तस्याऽऽशुचिर्ध्वनिः ॥
१६ - " तदेव भगवान् भास्वान् बेदात्मा वेदसंस्थितः । वेदविद्यात्मकश्चैव परः पुरुष उच्यते ॥ "
२०- - स्वगेस्थित्यन्त हेतुः स रजःसच्चादिकैगुणैः ।
ब्रह्मविष्ण्वादिसंज्ञामभ्येति शाश्वतः ॥
२१ – वेदैः स वेद्यः स तु वेदमृत्तिं --मूर्तियोऽखिल विश्वमूर्त्तिः ।
विश्वाश्रमं ज्यातिरवेद्यवर्मा--धम्मविदातः परमः परेभ्यः ॥
( मार्कण्डेयपुराण, सूर्य्यमाहात्म्यान्तर्गत, सूर्योत्पत्ति - अध्याय ) ' हे मुने! उस हिरण्मयाण्डरूप अव्यक्त जन्मा ब्रह्ममुख से सर्वप्रथम ऋचाएँ हीं प्रादुर्भूत हुईं ( १ ) । वे ऋचाएँ जवापुष्प समान कान्तिबालीं थीं, तत्काल प्रकट तेजोमयीं थीं, रजं. गुणमयी थी, एक दूसरी का स्वरूप पृथक् पृथक् था ( २ ) ब्रह्म प्रजापति के दक्षिण मुख से परस्पर असम्बद्ध ऋतभावात्मक तने ही यजु: उत्पन्न हुए । सब यजुः स्व - स्व वर्णस्वरूप से संहित सम्बद्ध - ऋतभावापन्न ही उत्पन्न हुए ( ३ ) । ब्रह्मपरमेष्ठी प्रजापति का जो पश्चिम मुख था, उससे कुन्दपुष्पसम कान्तियुक्त साम उत्पन्न हुए ( ४ ) । ब्रह्मप्रजाप.त के उत्तरमुख से घोराङ्गिरा, अथवा रूप से द्विधा विभक्त अथर्व उत्पन्न हुए, ( जिनका कि अथर्वाङ्गिरारूप जहाँ मणिमन्त्रौषधिरूप शान्तिकर्म का आधार बनता है, वहाँ घोराङ्गिरारूप अभिचारप्रयोग में उपयुक्त होता है ) । यह उत्तरमुख सत्त्वतमोगुणात्मक ही माना गया है । अथर्वाङ्गिरोमय अथर्व सत्त्वगुणात्मक है, एवं घोराङ्गिरोमय अथर्व तमोगुणात्मक है ( ५-६ ) । हे मुने! ऋचाएँ रजो-गुणात्मिका हैं, यजुः सत्त्वगुणात्मक है, साम तमोगुणात्मक है, एवं अथर्वो में सत्त्वतमोगुण प्रतिष्ठित है ( ७ ) ये चारों वेद अपने अप्रतिम तेज से प्रज्वलित रहते हुए पृथक पृथक रूप से विभक्त – व्यवस्थित हो हैं ( ८ ) ये चारों ही ( तत्त्वात्मक ) वेद अपने आदिभूत ओंकारात्मक तेज से ही श्रभिस्तुत हैं, प्रवृक्त हैं । अर्थात् मनःप्राणवाङ्मय श्रोङ्कारात्मक ब्रह्मप्रजापति ही इनकी प्रवृत्ति का मूलाधार है ( E ) । हे महामुने! यजुर्म्मय तेज, सामों का तेज, ( एवं ऋक - श्रथर्वों का तेज ) ओङ्कारात्मक परतेज में ही प्रतिष्ठित है ( १० ) । शान्तिक – पौष्टिक, तथा आभिचारिक, सम्पूर्ण भाव इन्ही वेदा में विलीन हैं । अर्थात् सत्र कुछ इन्हीं वेदों पर अवलम्बित है | तमोलक्षण अन्धकार के विनष्ट हो जाने पर सौर वेदमूर्त्ति आदित्य की रश्मियाँ सहस्रधा महिमानःसहरूरूप से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो जातीं है, जो कि हिरण्मय वेदमूर्ति श्रादित्यपुरुष सत्र का अव्ययात्मक कारण बना हुआ है ( ११-१२-१३-१४-१५ ) । प्रातः - मध्याह्न - सायं, तीनों कालों में हिरण्मयाण्डरूप सौर आदित्य प्रजापति के गायत्रीमात्रिक-लक्षण तीनों वेद तप रहे हैं । त्रयं वेदरूप से ही सूर्यनारायण तप रहे हैं । पूर्वाह्नकाल में इसकी ऋचाएँ १३८
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द्वितीयखण्ड तबती हैं, मध्याह्न में यजु: तपते हैं, एवं अपराह्न में साम तपते हैं । पूर्वाह्न में ऋचाओं के आधार पर शान्तिकर्म होता है. मध्याह्न में यजुत्रों के आधार पर पौष्टिक कर्म होता है, एवं अपराह्न में सामों के आधार पर ग्राभिचारिक कर्म होता है । सर्ज्जनकाल में ब्रह्मा ऋङ्मय बन जाते हैं, स्थिति ( पालन ) काल में विष्णु जुन जाते हैं, एव लयकाल ( संहारकाल में रुद्र साममय ( अवसानमय ) बन जाते हैं । इसप्रकार भगवान् सूर्य्यनारायण वेदात्मा हैं, वेदसंस्थित ( वेद में ही प्रतिष्ठित ) हैं, वेदविद्यात्म हैं, परपुरुषात्मक हैं । इत्थंभूत वेदमूर्ति भगवान् भास्वान् सत्त्व - रजः - तमोगुणात्मक ब्रह्म - विष्णु - रुद्र - रूप से सम्पूर्ण विश्व के उत्पादक - पालक - संहारक बने हुए हैं । वे भावान् वेदों से वेद्य हैं, क्योंकि वे स्व्यं वेदमूर्ति हैं, विश्व के आश्रय हैं, ज्योतिर्म्मय हैं, स्वप्राणरूप से अविज्ञेय हैं, सम्पूर्ण परभावों से भी पर हैं, धर्मस्वरूप हैं ( १६ से २१ पर्य्यन्त ) ” – इत्यादि पुराणवचन भगवान् सूर्य्यनारायण के स्वरूप वर्णन माध्यम से जिस वेद का स्वरूप प्रतिपादन कर रहे हैं, वह वेद विम्पष्ट रूप से अपनी तत्त्वरूपता का ही निनाद कर रहा है । सूर्य्यनारायण वेदात्मक हैं, इसका यह अर्थ कौन करेगा कि, सूर्य वेदग्रन्थात्मक है । इसीलिए तो हमें कहना और मानना पड़ा कि, तत्त्वात्मक वेद पृथक तत्त्व है, एवं तत्प्रतिपादक शब्दात्मक वेद पृथक तत्त्व है । मंहिता, ब्राह्मण, ग्रारण्यक, एवं उपनिपल्लक्षण श्रुतिशास्त्र से, तथा स्मृतिशास्त्र और पुराणशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले जो प्रमाण प्रकृत परिच्छेद में उद्धृत हुए हैं, उनके सम्यगवलोकन से पाठकों को इस निश्चय पर अवश्य ही पहुँच जाना पड़ेगा कि, शब्दात्मक वेदों, किवा वेदग्रन्थों से अतिरिक्त अवश्य हो कोई तत्त्वरूप वेद-पदार्थ भी है, जिससे कि यज्ञद्वारा सम्पूर्ण विश्व, विश्वप्रजा, एवं प्रजासम्पत् का विकास हुआ है । सर्वाधिष्ठाता प्रजापति अपने इसी तत्त्वात्मक, नित्य, अपौरुषेय, प्राजापत्यवेद के आधार पर पहिले यज्ञ का वितान करते हैं । अनन्तर यज्ञद्वारा प्रजोत्पत्ति करते हुए अपने ' प्रजापति ' नाम को ग्रन्वर्थ बनाते हैं । वेदमूर्ति प्रजापति का क्या स्वरूप है?, इनके प्राजापत्यवेद का क्या स्वरूप है?, एवं इस प्राजापत्यवेद के आधार पर वितत होने वाले यज्ञ का क्या स्वरूप है?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए ही आगे का ' प्राजापत्यवेदमहिमा ' नामक तृतीय स्तम्भ वेदप्रेमियों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका – द्वितीयखण्डान्तर्गत -" ताधिकवेद, और प्रमाणवाद " नामक द्वितीय स्तम्भ उपरत २ १३६
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' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका- द्वितीयखण्डान्तर्गत " तात्त्विक वेद, और प्रमाणवाद ” नामक द्वितीयस्तम्भ - उपरत
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानमाष्यभूमिका- द्वितीयखण्डान्तर्गत-" प्राजापत्य - वेदमहिमा ” – नामक तृतीयस्तम्भ m
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१- वनुष्कलप्रजापति-" प्राजापत्यवेदमहिमा " “ प्राजापत्यवेदमहिमा ” के सम्बन्ध में ' प्रजापति ' - ' वेद ' - ' महिमा ' ये तीन वस्तुतत्त्व ज्ञातव्य है । इन में क्रमप्राप्त पहिले ' प्रजापति ' के ही संक्षिप्त स्वरूप का विचार अपेक्षित है । प्रजापतिशब्द की असंख्य - व्याप्तियों में से प्रकृत में ' सम्वत्सर प्रजापति ' लक्षणा व्याप्ति ही गृहीत है । सम्वत्सरप्रजापति के ' सौरसम्वत्सर, पार्थिवसम्वत्सर, चान्द्र सम्वत्सर ' भेद से तीन विवर्त हैं । तीनों के साथ ही ' अहोरात्र ' का सम्बन्ध है । इधर प्राजापत्यवेद के साथ हमें ' अहोरात्र ' लक्षण ' लोकम्पृणा ' इष्टकाओं का समतुनन करते हुए वेदमहिमा का दिग्दर्शन कराना है । अतएव प्रकृत प्रकरण में ' सम्वत्सरप्रजापति ' से सौर - पार्थिव - चान्द्रसम्बत्सरसमष्टि-लक्षण प्रजापति का ही ग्रहण किया जायगा । एवं इसी आधार पर सम्वत्सर प्रजापति से, किंवा सम्वत्सरप्रजा पति के अहोरात्र से सम्बन्ध रखने वाले वेद को ' सौरवेद - पार्थिववेद - चान्द्रवेद ' इन तीनों हीं नामों से व्यवहृत किया जा सकेगा । इसी मूलदृष्टि को लक्ष्य में रखते हुए निम्नलिखित प्रजापति- विवर्त की मीमांसा में प्रवृत्त होना चाहिए । ' प्रजापति, वेदि, वेद, यज्ञ ' मेद से प्राजापत्यसंस्था को चतुष्कल माना जा सकता है, एवं ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' ( शास्वायनमा ० ३ २ ) इस अनुगमवचन से इसका समर्थन भी सम्भव है । प्रजापत मुख्य श्रात्मा है, वेदि इस की प्रतिष्ठा है, वेद इसके श्मश्रु हैं, एवं यज्ञ इसकी महिमा है । इन्हीं चारों के सम्बन्ध में दूसरी दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि, प्रजापति श्रात्मा है, वेदि इस का शरीर है । जिस प्रकार श्रात्मा, तथा शरीर, दोनों मिल कर एक ' जीवात्मसंस्था ' कहलाते हैं, एवमेव शरीरस्थानीया वेदि, एवं श्रात्मस्थानीय प्रजापति, दोनों की समष्टि को एक ' प्रजापति ' कहा जा सकता है । जिस प्रकार शरीराग्नि से उत्पन्न लोम शरीर के चारों ओर व्याप्त हो जाते हैं, एवमेत्र प्राजापत्याग्निरूप प्रजापति के शरीर से उत्पन्न होनें वाले बेद प्रजापति - शरीर के चारों ओर व्याप्त हो जाते हैं । इसी श्मश्र - सादृश्य से वेदों को हम प्रजापति के ‘ श्मश्रु ' ( लोम ) कह सकते हैं, जैसा कि - " प्रजापतेर्वा एतानि श्मश्रूणि यद्वे दः ” ( तै ० ब्रा ० ३।३।६।११ ) इत्यादि वचन से स्पष्ट है | ' यज्ञं कृत्वा इदं सत्यं तनवाम है ” ( शत ० ६ | ५ | १ | १८ ) के अनुसार यज्ञ के द्वारा ही श्मश्रु रूप सत्यवेद का वितान होता है । इसा वेदवितान से महिमाभाव का उदय होता है, एवं इसी महिमा का प्रातिश्विक रूप ' विश्वदानि ' नाम का विश्वयज्ञ है ।
* वेदेन वेदिं विविदुः पृथिवीं, सा पप्रथे पृथिवी पार्थित्राति ।
गर्भ बिभर्त्ति भुवनेष्वन्तः, ततो यज्ञो जायते विश्वदानिः ॥
—तैत्तिरीयब्राह्मण ३ । ३ । ६ । १० । १४२
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[ द्वतायखण्ड सौरसम्वत्सराग्नि प्रजापति है । इस प्रजापतिरूप अग्नि का प्रतिष्ठारूप सौर अग्निमण्डल ही महावेदि है, सौर वेदत्रयी ही वेद है । एवं सम्वत्सरमण्डल में प्रतिष्ठित अग्नीषोमात्मक ऋतु - यज्ञ ही ' यज्ञ ' है यही महिमा है । अग्नि, तथा सोम के समन्वय से उत्पन्न अग्नीषोमात्मक जो एक सांयौगिक अपूर्व तत्त्व उत्पन्न होता है, वही ' यज्ञ ’ है । इसप्रकार सम्बत्सराग्नि, अग्निप्रतिष्ठामण्डल, वेदत्रयी, एवं यज्ञ, भेद से सौर सम्वर के ' प्रजापति - वेदि - वेद-यज्ञ ' ये चार पर्व हो जाते हैं । पूर्वोक्त आत्म - शरीरपरिभाषा के अनुसार प्रजापति - वेदि, दोनों ' प्रजापति ' है, वेद वेद है, यज्ञ महिमा है । ' प्रजापति - वेद - महिमा ' तीनों पर्वो की समष्टि ही ' प्राजापत्यवेदमहिमा ' है, जिसकी कि प्रकृत प्रकरण में मीमांसा करनी है । श्रात्मा के लिए जहाँ ' प्रजापति ' शब्द नियत है, वहाँ ' वेदि ' के लिए ' पृथिवी ' शब्द नियत है । भूपिण्ड का ही नाम पृथिवी नहीं है, अपितु भूतपिण्ड मात्र का नाम पृथिवी है । ' अदप्रथयत्, सा पृथिव्यभवत् ' इस ब्राह्मण - निर्वचन के अनुसार जो आत्मप्रतिष्ठाप से वितत रहे, वही पृथिवी है । जीवात्मा की पृथिवी पाञ्चभौतिक शरीर है, चन्द्रमा की पृथिवी चान्द्रमण्डल है, सूर्य की पृथिवी सौरमण्डल है 1 । प्रत्येक भौतिक पिण्ड के गर्भ में आत्मरूप से प्रतिष्ठित प्रजापतियों की पृथिवियाँ तत्तद्भूत-पिण्ड हैं । मण्डलावच्छिन्न पिण्ड ही पृथिवी है । मण्डलात्मिका पृथिवी को याज्ञिक परिभाषा में ' महावेदि ' कहा जाता है, एवं पिण्डात्मिका पृथिवी को ' वेदि ' कहा जाता है । सूर्य्यपिण्ड वेदि है, सौरमण्डल महावेदि है । भूपिण्ड वेदि है, भूमहिमामण्डल महावेदि है । शरीर वेदि है, शरीरमहिमामण्डल महावेदि है । भचक्र में प्रतिष्ठित यच्चयावत् नक्षत्रपिण्ड इसी परिभाषा के अनुसार वेदि - महावेदि से युक्त रहते हुए पृथिवी - रूप हैं । तात्पर्य्य कहने का यही है कि, अणु से अणु, तथा महान् से महान्, किसी भी पदार्थ को ले लीजिए, आप प्रत्येक में केन्द्रस्थप्रजापति, पिण्ड - महिमात्मिका वेदि. विष्कम्भ - परिणाह - गर्भात्मक वेद, एवं अग्नि- सोमात्मक यश, इन चारों पर्वों को प्रतिष्ठित देखेंगे । चारों पर्वों की समष्टि ही पदार्थका वच्छेदक है, यही पदार्थत्त्व है । ' अयमस्ति, इदमस्ति इयमस्ति ' इयादिरूप से ( अस्ति - है - रूपसे ) हमें जो भी पदार्थ उपलब्ध होते हैं, सर्वत्र इन्हीं चारों पर्वों का समन्यय समझना चाहिए, जिन अस्ति नास्तिभावों का प्रथमखण्डान्तर्गत ' उपलब्धिवेद-निरुक्ति ' प्रकरण ( भा ० भू ० १ खण्ड, वेदनिरुक्ति, पृष्ठ सं ० ४१ ) में ' उपलब्धि - बेद ' की दृष्टि से समन्वय किया था, उन्हीं दोनों भावों का अत्र प्रजापति - विवर्त्त की दृष्टि से समन्वय कीजिए । २ - अमृतमर्त्यप्रजापति-" अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीद्ध ममृतम् ” के अनुसार संवत्सराग्निरूप प्रजापति को ' अमृत - मर्त्य ' भेद से दो अवस्था हो जाती हैं । अमृतप्रधान संवत्सराग्नि को ' वागग्नि ' कहा जाता है, एवं मर्त्यप्रधान संवत्सरानि ' भूताग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । वागग्नि मूलरूप से पिएड के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' प्रजापति ' कहलाता है. एवं यही वागग्नि पिण्ड तथा पिण्डमहिमा में तूल रूप से वितत होता हुआ ' देवता ' कहलाने लगता है । पिण्ड तथा महिमास्वरूपसम्पादक मर्त्याग्नि ही तीसरा भूताग्नि है । इस प्रकार एक सम्बत्सर प्रजापति के आरम्भ में ' वागग्नि- भूताग्नि ' दो भेद होते हैं, वागग्नि के मूल - चूल भेद से ' प्रजापति - देवता ' ये दो भेद हो जाते हैं । इनमें देवाग्नि अग्नि- वायु - आदित्य, भेद से तीन भागों में विभक्त है | इन्हीं तीनों देवाग्नियों की प्रतिष्ठा के भेद से भूताग्निरूप महिमालोक के पृथिवी - अन्तरिक्ष - यौ, ये तीन श्रवान्तर लोक हो जाते हैं । पृथिव्यवच्छिन्न अग्निरूप देवाग्नि से ऋग्वेद का, अन्तरिक्षावच्छिन्न वायुरूप देवाग्नि से यजुर्वेद का, एवं द्युलोकावच्छिन्न श्रादित्यरूप देवाग्नि से सामवेद का विकास होता है । १८३
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भाष्यभूमिका तीनों देवाग्नि ही क्रमशः होता - अध्वर्यु - उद्गाता बनते हैं, तीनों स्थानों के प्राणाग्नि ही क्रमशः गार्हपत्याग्नि-विष्वाग्निश्राहवनीयाग्नि बनते हैं । तीनों भूतलोक ही क्रमशः गार्हपत्यकुण्ड - धिष्ण्यकुण्ड - आहवनीयकुण्ड बनते हैं । तीनों देवताओं के ऋ - यजुः - सामानुबन्धी कर्म्म ही क्रमशः होत्र - आध्वर्यव, श्रौद्गात्रकर्म्म बनते है | एवं स्वयं वागग्निलक्षण हृद्यप्रजापति ही इस यज्ञ के यजमान बनते हैं । इस यज्ञ का फल विश्व, तथा विश्वप्रजा रूप से हमारे सामने है । त्रयीविद्यामय यज्ञ के गर्भ में प्रजापति सम्पूर्ण भूत- मौतिक सृष्टि का अन्तर्भाव कर लेते हैं, इससे उत्कृष्ट यज्ञ का फल और क्या होगा । अवधानपूर्वक विचार करने पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि, ' प्रजापति - वेदि ( लोक वेद - यज्ञ, ' चारों पर्वों का एकमात्र ' प्रजापति ' स्वरूप में ही अन्तर्भाव है । प्रजापतिलक्षण सम्वत्सगग्नि ही अमृतरूप से प्रजापति बनता है, मर्त्यरूप से वेदि ( लोक ) बना है, हृद्य अमृतरूप से प्रजापति ही प्रजानति है, तूल अमृतरूप से प्रजापति ही देवतात्रयी है, देवतात्रयीरूप से प्रजापति ही वेदत्रयी है, वेदत्रयीरूप से प्रजापति ही परम्परया यज्ञमूर्ति बन रहा है । जो कुछ उत्पन्न हो चुका है, जो कुछ उत्पन्न हो रहा है, भविष्य में जो कुछ उत्पन्न होगा, वह सत्र प्रजापति ही प्रजापति है । चतुष्फल, अमृत मृत्युमूर्ति प्रजापति की इसी सर्वात्मकता, तथा सर्वरूपता का स्पष्टीकरण करती हुई यजुःश्रुति कहती है-१ - प्रजापते! न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव । यत् कामास्ते जुहुमस्तनो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ( यजु ० सं ० २३।६५ । ) । २ - - " प्रजाप तस् वेवेदं सर्व, यदिदं किंच " ( शत ० ६।४।२।५ । ) । , ३ – “ यद्व ै किञ्च प्राणि, स प्रजापतिः ” ( शत ० ११ १।६।१७ । ) । ४ - ' सर्वमुह्य वेद प्रजापतिः " ( शत ० ब्रा ० ५ १ । १ । ४ । ) ।
५ – " यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा ।
प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्राणि ज्यातोंपि स तेस पोडशी ॥
( यजुःसं ० ८ | ३३ | ) । मुकेन्द्र में रहने वाले अमृतप्रधान प्रजापति को ' वागग्नि ' रूप बतलाया गया है । यह वागग्नि, किंवा अग्निरूपा वाक् अपने अभिन्न सहयोगी प्राण तथा मन से नित्य युक्त रहती है । फलतः प्रजापति, अतएव ' आत्मा ' नाम से प्रसिद्ध प्रजाति को वाङ्मय के साथ साथ प्राणमय, तथा मनोमय भी माना जायगा । इस प्रकार ' वाङ्नयप्रजापति ' वाक्यका ' मनः प्राणगर्भित वाङ्मयप्रजापति ' वाक्य पर पर्य्यवमान मानना पड़ेगा | मनःप्रणवाङ्मय यह् प्रजापति अमृतप्रधान बतलाया गया है । कारण इसका यही है कि, पदार्थों में नाम - रूप - कर्म के अतिरिक्त जो एक सामान्य - सत्तारस उपलब्ध होता है, जिसका कि लोकभाषा में ' अस्त - अस्त ( है - है ) रूप से अभिनय होता है, वह सबमें समानरूप से प्रतिष्ठित रहता है । भावात्मक पदार्थ १४४
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द्वितीयखण्ड हों, अथवा अभावात्मक, अस्ति हो, अथवा नास्ति, अस्ति सर्वत्र समरूप से प्रतिष्ठित है । ' घटोऽस्ति ' की भाँति ' घटो नास्ति ' इस वाक्य में भी ' अस्ति ' अव्यभिचार से विद्यमान है । नाम - रूप - कर्म बदलते रहते हैं, किन्तु ' अस्ति ' नहीं बदलती । न बदलना, सर्वदा एकरस बने रहना हो अमृत का श्रमृतत्व है । क्योंकि हृद्यप्रजापति अपने अस्तिरूप से सदा एकरस बना रहता है, अतएव इपे ' अमृत ' कहना सर्वथा अन्वर्थ बन जाता है । इसी आधार पर सत्ता का ' मनः प्राणवाचां संधानः सत्ता ' यह लक्षण मान लिया गया है । अमृतलक्षण अस्तिरूप इसी प्रजापति के मर्त्यभाग से भूतप्रपञ्च का विकास बतलाया गया है, जो कि भूतप्रपञ्च नाम - रूप-कर्म्म, इन पत्रों की समष्टि है । मर्त्यनाम का मृतावाक् मे, मर्त्यकर्म का अमृतप्राण से, एवं मर्त्यरूप का अमृतमन से बिकास हुआ है । क्योंकि भूतात्मक मर्त्यप्रपञ्च उसी अमृतप्रजापति के मर्त्यरूप का विकास है, अस्तिगर्भित मर्त्यभाग ही भूतोपादान वना है, अतएव इसके इस मर्त्यरूप को भी ' ग्रस्ति ' लक्षगा । ग्रमृतसीमा से पृथक नहीं किय । जा सकता । निष्कर्ष यही निकला कि, प्रजापति ने त्रयीविद्या के गर्भ में ही यज्ञ से समुत्पन्न, यज्ञात्मक भूतप्रपत्रव के दर्शन किए । इसी भूतानुप्राहिका प्राजापत्या वेदविद्या का स्पष्टीकरण करती हुई श्रति कहती है कि-“ अथ सर्वाणि भूतानि पर्णैतत् । स त्रय्यामेव विद्यायां सर्वाणि भूतान्यपश्यत् । यत्र हि सर्वेषां छन्दसामात्मा, सर्वेषां स्तोमानां सर्वेषां प्राणानां सर्वेषां देवानाम् । एतद्वा ‘ अस्ति ’ । एतद्धि - ‘ अमृतम् ’ । यद्भि - ‘ अमृतं ’, - तद्धि - ' अस्ति ' । एतदु तत्, यन्मर्त्यम् ” । ( शत ० १ ।४।२।२१ । ) । त्रयीवेद के प्रवर्त्तक प्रजापति इस प्रकार अपने मृत - मर्त्यरूपों के संनिवेश - तारतम्य से ' प्रजापति-वेद - वेदि - यज्ञ ' इन चार पर्वों में परिणत होते हुए सर्वरूप बन गए । चतुष्कल प्रजापति के ये चारों पूर्व-विभाग तदंशभूत प्रत्येक पदार्थ में ज्यों के त्यों प्रतिष्ठित है । केन्द्रस्थ प्रजापति, पिण्ड - महिमा लक्षण वेटि त्रिष्कम्भ - पःरणाह - केन्द्र लक्षणा - छन्दोवेदत्रयी, ग्रग्न - सोमात्मक विश्वदानि - यज्ञ, चारों पर्व प्रत्येक पदार्थ के, परमाणु परमाणु के स्वरूप - सम्पादक बन रहे हैं । प्रजापति के इसी यज्ञविवर्त का विश्लेषण करते हुए निम्न-लिखित वचन हमारे सामने आते हैं— १ -- वेदिदेवेभ्यो निलायत । तां वेदेनान्वविन्दन्-वेदेन विविदुः पृथिवीं सा प थे पृथिवी पार्थिवानि । गर्भ विभर्ति भुवनेष्वन्तस्ततो यज्ञा जायते विश्वदानिः ॥ ( नै ० १० प्रा ० ३२३२२८/१० ) ।
२ – वेदिं विविदुः पृथिवीं त्वया बजा जायते विश्वदानिः ।
अच्छिद्र ं यइमन्वेषि विहान त्वया होत मन्तनोत्यई मासान् ॥
( तः ब्रा ० ३४७१६। ) । १४५