Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 181–190

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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भूमिका ३ - श्रयं वेदः पृथिवीमन्वविन्दद् गुहा सतीं गहने गरेषु । स विन्दतु यजमानाय लोकमच्छिद्रं यज्ञं भूरिकर्म्मा करोति " ( तै ० ब्रा ० ३७ ६ १३ ) ।

४ -- अयं यज्ञः समसदद्धविष्मान्नृचा साम्ना यजुषा देवताभिः ।

तेन लोकान्तो जयेम इन्द्रस्य सख्यममृचमश्याम् ॥

( तै ० वा ०३ / ७ / ६ / १३, १२५ ) १ ५-- ५ - - इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः । अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम । ( ऋक् सं ० २१।१६४ | ३५ | ) | ६ - वेदेन वै देवा असुराणां वित्तं वेद्यमविन्दत । तवेदस्य वदस्त्रम् । असुराणां वा इयमग्र आसीत् । ( तै ० प्रा ० ( २ राहा ) । भूमिरेव वेदिः । सा वा इयं सर्वैव वेदिः । एतागतो नै पृथिवी, यावतो गेदिः । यावती वेदिस्तावती पृथिवी ॥ ( संग्रह )

७ —— यत् पर्य्यपश्यत् सरिरस्य मध्ये उन्नींमपश्यञ्जगतः प्रतिष्ठ।म् ।

तत् पुष्करस्यायतनाद्धि जातं पर्णं पृथिव्याः प्रथनं हरामि ॥

( तै ० प्रा ० ११२ ११ ) । ८ - " प्राजापत्यो वै वेदः । यज्ञो वै प्रजापतिः । प्रजापतिः सर्वा देवताः । यज्ञो वै भुवनम् । श्रग्निर्वै देवानां यष्टा " । ( तै ० ब्रा ३ । ३ । ७ । ) । ३ - सम्वत्सराग्नि का मूलरूप— प्रजापति के उक्त चारों पर्वों में से प्रकृत प्रकरण में प्रजापति, और वेट इन पर्वों का ही निरूपण करना मुख्य लक्ष्य है | वेदि, और यज्ञ, इन दो पर्वों का विचार विशेषरूप से अपेक्षित नहीं हैं । प्रजापति, तथा वेद, दोनों के विचार से ही वेदि - यज्ञ का स्वरूप गतार्थ बन जाता है । दोनों लक्ष्यों में से ' प्रजापति ' का स्वरूप ही प्रथम विचारणीय है | ' सम्वत्सराग्नि ' को ही ' प्रजापति ' कहा जाता है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । इस सम्वत्सराग्नि को हम ' वाम, मध्यम, घृतपृष्ठ ' इन तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं । सत्र से पहले हमें यह देखना है कि, जो अग्नितत्त्व सम्वत्सर रूप में परिणत होता है, जिस सम्वत्सराग्नि के आगे जाकर ' वाम - मध्यादि ' तीन अवान्तर भेद हो जाते हैं, उस प्राजापत्य अग्नि का १४६

पृष्ठ 182

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द्वितीयखण्ड मूलरूप क्या है? | अग्नितत्त्व के इस मूलरूप का अन्वेषण करते हुए हमें श्रापोमय- परमेष्ठीमण्डल का आश्रय लेना पड़ेगा । कल्पना कर लीजिए, अभी विश्व में न तो अग्नितत्त्व का ही विकास हुआ है, एवं न तन्मूलक सम्वत्सर का हो जन्म हुआ है । उस दशा में विश्व का क्या स्वरूप था? इस प्रश्न का एकमात्र समाधान है, “ आपोमय पारमेष्ठ्य समुद्र " । आपोमय पारमेष्ठ्यसमुद्र की उत्पत्ति किससे हुई?, इस प्रश्न का उत्तर है, “ ब्रह्मनिःश्वसितवेदावच्छिन्न स्वयम्भूप्रजापति ", जैसा कि प्रथम प्रकरण के “ अनन्तवेद का विज्ञेय इतिवृत्त " नामक परिच्छेद में विस्तार से बतलाया जा चुका है । ऋषिप्राणकृतमूर्ति, सप्तपुरुष-पुरुषात्मक, स्वयम्भूप्रजापति के यजुर्म्मय वाक् - भाग से सर्वप्रथम भृग्वङ्गिरोमय ' अप्तत्त्व ' का ही विकास होता है । स्वायम्भुवी, अनादिनिधना, बेदमयी ( यजुर्म्मयी ) वाक् ही अपने प्रत्यंश से द्रुत होकर अब्रू - रूप में परिणत होती है | आपोमय परमेष्ठी ही वाक्तत्त्व का प्रथमावतार है । स्वयं वाक्तत्त्व सत्यात्मक था, एवं इससे उत्पन्न होने वाला यह तत्त्व ' ऋतरूप ' है । अतत्व का ' इराभाग ' ( रसभाग ) अपने इसी ऋतभाव के कारण क्योंकि संसरणशील है, स्वप्रतिष्ठाशून्य बनता हुआ परप्रतिष्ठासापेक्ष है, अतएव इस अपतत्त्व को हम ' सरिर ' कह सकते हैं । यही सरिर - शब्द परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में ' सलिल ' नाम से प्रसिद्ध है । यद्यपि आज प्रत्यक्ष रूप से दिखलाई देने वाले सम्वत्सर- अग्नि का मूल यही श्रापोमय पारमेश्व समुद्र है । किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि, वस्तुतः इस ग्रग्नि का मूल स्वायम्भुव ' वाकूतत्त्व ' ही है, जिसे कि वैज्ञानिक लोग ' वेदाग्नि ' - ' सत्याग्नि ' - ' सार्वयाजुषाग्नि ' - ' ब्रह्माग्नि ' ' स्वायम्भुवाग्नि ' - ' ऋषि ' ' सप्तपुरुषपुरुषात्मकप्रजापति ' - ' पुरुष ' इत्यादि नामों से व्यवहृत किया करते हैं । इसी सत्याग्नि ( वागग्नि - यजुरग्नि ) का प्रथमावतार ऋतात्मक यह श्रापोमय समुद्र है, जैसा कि ' सो s पोऽसृजत, वाच एव लोकात् वागेव साऽसृज्यत ' ( शत ० ६ | १ | १ | ६ | ) इत्यादि वचन से स्पष्ट है । वाग्नि सत्यलक्षण है, एवं सत्य का प्रथमावतार ऋतात्मक तत्त्व है, इसी प्राथमिक स्थिति का स्पष्टीकरण । करसी हुई श्रुति कहती है— " तद्यत् - तत् सत्यं, आप एव एत । आपो हि वै सत्यम् । तस्माद्येनापो-यन्ति तत्सत्यस्य रूपमित्याहु: । य एव तस्य ( सत्यस्य ) सर्वस्याग्र-मकुर्वन् । तस्माद्यदवाते यन्ति, अथेदं सव्वें जायते यदिदं कि ” । - शत ० ना ० ७ | ४ | १ | ६ | श्रापः को हमने ' सरिरभव ' के कारण ऋत बताया है, इवर श्रुति श्रापः को सत्य बतला रही है । सहृदय — सशरीरभाव सत्य ही है, अहृदय - अशरीरभाव ही ऋत है । तत्त्व अपने प्रातस्विक हृदयशून्य, स्वाकागभाव के कारण जहाँ ऋत है, वहाँ उम वेदस्त्य को अपने गर्भ में रखने के कारण सत्यात्मक भी बना हुआ है | ' स त्रय्या विद्यया सहाषः प्रावेरात्, ता एडं समवर्त्तत ' ( शतः ६ । २ । १७ | ) के अनुसार त्रयीमूर्त्ति सत्यस्त्रयग्भू प्रजापति अपने सत्यवागग्नि मे इस ऋत तत्त्व को उत्पन्न कर स्वयं सबै. गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है । इसी सत्यप्रवेश से श्रुत ने आप को सत्य बतला दिया है । इस सत्य-१४७

पृष्ठ 183

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भाष्यभूमिका प्रवेश का फल है ' ग्राण्डसम्पत्ति ', और ' नियतिभाव ' । पानी की चिन्दु वतुल होती है । यह वर्तलता हो आण्डसम्पत्ति है, एवं इसका एवमात्र कारण सत्यभाव ही है । इसके अतिरिक्त आपो बिन्दु को जिस प्रदेश में भी डाल दिया जाता है, वत ' लवृत्त बन जाता है । यही वत्तु लता सत्यभावात्मक आडभाव है । पानी जिस प्रदेश में डाल दिया जायगा, वहाँ से निम्न प्रदेश की ओर उसकी ऐसी सीधी - सच्ची गति होगी, मानों कोई शक्ति पानी के गर्भ में प्रतिष्ठित रद्द कर पानी को नियत मार्ग से ले जा रही हो । यही नियतिभाव नियतिः सत्य है, जिसका कि एकमात्र उसी अन्तर्यामी, गर्भीभूत सत्याग्निरूप प्रजापति की सत्यनियति से हो सम्बन्ध है । प्रसङ्गोपात्त एक दूसरी विप्रतिपत्ति का निराकरण और कर लीजिए । पूर्व श्रुति ने जहाँ व्ययः को सत्यरूप बतलाया है, वहाँ श्रत्यन्तर ने श्राप से सत्य की उत्पत्ति मानी है । दोनों विरुद्धाथों का समन्वय करने के लिए हमें स्वायम्भुव ब्रह्मनिः श्वसितवेद, तथा सौर गात्रीमात्रिक वेद का आश्रय लेना पड़ेगा । दोनों हीं सत्य वेदात्मक हैं, जैमाकि- " तद्यत तत्सत्यं, त्रयी सा विद्या " ( शत ० ६५ | १ | १८ | ) इत्यादि वचन से प्रमाणित है । दोनों ही सत्य अग्निरूप हैं । दोनों में अन्तर यही है कि, स्वायम्भुव सत्यवेट एवं प मत्याग्नि प्रारणात्मक है, अपौरुषेय है । एवं सौर सत्यवेद, एवं तद्रूप सत्याग्नि देवात्मक है, पीरुषेय है । स्वायम्भुव सत्य पहिली त्रयीविद्या है. एवं सौर सत्य दूसरी त्रयीविद्या है । दूसरे शब्दों में स्वायम्भुव ऋषिप्राण-लक्षण सत्याग्नि पहिला सत्य है, एव सौर - देवप्राणलक्षण सत्याग्नि दूसरा सत्य है । प्रथम सत्याग्नि से ब्रह्म निःश्वसित वेदलक्षगा ' ब्रह्म ' का ( वेद का ) विकास हुआ है । प्रथम सत्यवेद तत्त्वका जनक बनता हुआ को सत्यरूप प्रदान कर रहा । द्वितीय सत्यवेद पतत्त्व में व्याप्त अङ्गिराऽग्नि के द्वारा आविर्भूत होता हुआ अप् से उत्पन्न माना गया है । प्रथम सत्यवेद अपूका पिता है, द्वितीय सत्यवेद ग्रुप का पुत्र हैं । प्रथम सत्यवेद एवं द्वितीय सत्यवेद, परमार्थत: अभिन्न होते हुए भी सृष्टिधारा - क्रम की दृष्टि से सर्वथा पृथक पृथक ही माने जायेंगे । निम्नलिखित श्रुतिवचन इसी पार्थक्य का स्पष्टीकरण कर रहे हैं— त्रननिःश्वलितवेदः - स्वायम्भुवः - " सोऽयं पुरुषः प्रजापतिर कामयत, भूयान्त्स्यां, प्रजायेयेति । सोऽश्राम्यत् " स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ' ब्रह्म'व ' प्रथममसृजत, त्रयामेत्र विद्याम् । सैवास्मै प्रतिष्ठाभवत् । तस्मादाहुः - ‘ ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' इति । तस्मादनुच्य-प्रतितिष्ठति । प्रतिष्ठा ह्येषा, यद्ब्रह्म ( ब्रह्म निःश्वसितवेदः ) ” ( शत ० ६ | १ | १ || ) । गायत्रीमात्रिकवेदः - सौरः- “ तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेवास्य सा सृज्यत । सेदं सव्यंमाप्नोत् " यदिदं किश्च । यदाप्नोत्, तस्मादपः । यदष्षृणोत् तस्मात् - वाः ( वारि ) । सोऽकामयत, आभ्योऽदृद्भ्योऽधि प्रजायेयेति । सोऽनया त्रय्या-१४८

पृष्ठ 184

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द्वितीयखण्ड विद्यया सहापः प्राविशत् । तत आण्डं समवर्चत । ततो ब्रह्मव प्रथममसृज्यत, त्रग्येव विद्या । तस्मादाहु: -- ' ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रथम-. जम् ' इति 1 । अपि हि तस्मात् पुरुषात् ( ब्रह्मनिःश्वसितवेदगर्भान्म-परमेष्ठिप्रजापतेः ) ब्रह्मत्र ( गायत्रीमात्रिक वेद एव ) पूर्वम-सृज्यत । तदस्य तन्मुखमे त्रासृज्यत " । ( शत ० ६ १२६, १०,। ) । “ उस ( स'तपुरुषपुरुषात्मक ) पुरुषप्रजापति ने कामना की कि, मैं बहुत बनूँ, प्रजा उत्पन्न करूँ । उसने श्रम किया, तप किया । श्रम से श्रान्त, तप से तात उस प्रजापति ने सर्वप्रथम त्रयीविद्यारूप ब्रह्म ही उत्पन्न किया । यही त्रयीविद्या इस प्रजापति की प्रतिष्ठा बनी । यही कारण है कि ( लोक में ) वेदानुवचन से ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है । यह प्रतिष्ठा ही है, जोकि ब्रह्म ( ब्रह्मनिःश्वसितवेद ) है " । " इस प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होकर प्रजापति ने ( पुनः ) तप किया । इस तप प्रजापति ने अपने ( प्रतिष्ठावेद के यजुर्लक्षण ) वाकू - लोक से ही पानी उत्पन्न किया । इस प्रजापति की यह वाक् ही! अशा -त्मना ) अब्रू - रूप में परिणत हुई । ( अपने स्वाभाविक ऋतधर्म से ) इस पतत्त्व ने सब को अपने गर्भ में व्याप्त कर लिया, किंवा स्वयं सर्वत्र व्याप्त हो गया, अतएव ( इस प्राप्तिलक्षण व्याप्तिधर्म्म से ही ) यह ऋतत्तत्त्व ' आप ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । अपि च, इसने ( अपने इसी प्राप्तिधर्म से ) सबका संवरण कर लिया, अतएव यह ' वाः ' ( वारि ) नाम से भी प्रसिद्ध हो गया । ( इस प्रकार अपने वाकू भाग से अप् - तत्त्व उत्पन्न कर ) प्रजापति ने कामना की कि, मैं इन पानियों से ( मिलकर ) प्रजननकर्म ( मैथुनी सृष्टि का साधक कर्म्म ) करूँ । ( अपनी इस इच्छा को कार्य्यरूप में परिणत करने के लिए प्रजापति स्वप्रतिष्ठा लक्षण उस ( पूर्वोक्त ) त्रयीविद्या के साथ इस श्रापोमय समुद्र के गर्भ में प्रविष्ट हो गए । ( परिणाम इसका यह हुआ कि, अत्र तक सत्यप्रतिष्ठा से वञ्चित जो अपूतत्त्व विशुद्ध ऋतमूर्ति बना हुआ इतस्ततः दन्द्रम्यमाण था, वही इस सत्यप्रवेश से ) आण्डरूप में परिणत हो गया ( जोकि आपोमय अण्ड ब्रह्मप्रवेश से ही आज सर्वसाधा-रण में ' ब्रह्माण्ड ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है ) । ( एडगर्भ में प्रतिष्ठित, दूसरे शब्दों में श्रापोमय समुद्र के गर्भ में प्रतिष्ठित, स्वप्रतिष्ठालक्षख ब्रह्मनिःश्वसित वेद से युक्त ) उस प्रजापति ने ( पोमय समुद्र में ऋतरूप से व्याप्त अङ्गिरा - कणों का अपने सत्यधर्म्म से संघात कर, इन के द्वारा ) सर्वप्रथम त्रयीविद्यारूप ब्रह्म ( गायत्रीमात्रिक वेद ) ही उत्पन्न किया । इसी ( द्वितीयवेद ) को लक्ष्य में रखकर कहा जाता है कि, " ब्रह्म ( गा ० सौरवेद ) ही सबसे पहिले उत्पन्न होने के कारण ' प्रथमज ' है । वास्तव में उस गर्मीभूत पुरुषप्रजापति से ब्रह्म ही सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ । यह उस प्रजापति का मुख ही उत्पन्न हुआ । " । उक्त बच्चनों से यह स्पष्ट हो रहा है कि, ' प्रतिष्ठा वेद ' पहिली त्रयीविद्या है, इसका प्रादुर्भाव पूतत्त्व से पहिले हुआ है । एवं ‘ प्रथमजवे ' दूसरी त्रयीविद्या है, इसका प्रादुर्भाव त्रयीमूर्तिप्रजापति की कामना से, १४६

पृष्ठ 185

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भाष्यभूमिका अङ्गिरा के द्वारा अपूगर्भ में हुआ है । यही बीजावस्थापन्न द्वितीय वेद ग्रागे जाकर प्रात्यन्तिक संघात में परिणत होता हुआ ग्रापोमय समुद्रगर्भ में ' सूर्य ' रूप से प्रकट होता है, जोकि सूर्य हिरण्यगर्भ * नाम से प्रसिद्ध है, जिसे कि प्रकृत प्रकरण में ' तम्वत्सरप्रजापति ' कहा जाने वाला है । इस साम्वत्सरिक - सौर- अग्नि का विकास चतलाते हुए प्रक्रान्त शातपथी श्रुति श्रागे जाकर कहती है-“ अथ यो गर्भोऽन्तरामीत्, सोऽग्रिम सृज्यत 1 । स यदस्य सर्वस्य अग्रमसृज्यत, तस्मा-दग्रिः । अग्रि वै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम् । परोक्षकामा इव हि देवाः " - शत ० ६ | १ | १ | ११ | प्रथम सत्यवेद से उत्पन्न अनत्त्व ' सत्य नित ' है. द्वितीय सत्यवेद की दृष्टि से अतत्त्व सत्यजनक है, यहीवक्तव्य | प्रथमदृष्टि को लेकर जहाँ - " तयत्, तत्सत्य, आप एव तत्? यह कहा जाता है, वहाँ द्वितीय सत्यवेद को लक्ष्य में रखकर श्रति कहती है- I, " “ तद्वै तदेतदेव तदास सत्यमेव । स यो हैवमेतन्महद्यनं ' प्रथमज ' वेद ' सत्यं ब्रह्म ेति ', जयनीमाँल्लोकानू, जित इन्नु - असौ - प्रमत्, य एवमेतन्महद्यक्षं प्रथमज वेद- ' सत्यं ब्रह्म ेति । सत्यं ह्य ेव ब्रह्म " ( शत - १४ || ५ | १ | ) - श्राप एवेदमग्र आसुः । ता आपः सत्यम-सृजत, सत्यं ब्रह्म, ब्रह्म प्रजापति, प्रजापतिर्देवान् । ते देवाः सत्यमित्युपासते " " वह प्रजापति वही था, जोकि सत्य है । म़ो जो इस मध्यक्ष, प्रथमज ( ब्रह्म ' रूप ' से जान लेता है, वह इन तीनों ( सम्वत्सर के गर्भ लेता है । उमने इन लोकों को जीत ही लिया, उसके लिए ये प्रथमज ब्रह्म को सत्यब्रह्म रूप मे जान लिया । - शत ० १४ । १६ | | गायत्री मात्रिक वेद ) को ' सत्य-में प्रतिष्ठित पृ ० अन्त ० यौ ) लोकों को जीत लोक जित ( स्वायत्त ) बन ही गए, जिसने ( इस प्रथमज सत्यविकास के पहिले ) ' ग्रापः ' ही थे । इन किया, ब्रह्म ने प्रजापति उत्पन्न किया, प्रजापति ने देवता • पानियों से सत्य उत्पन्न हुआ, सत्य ने ब्रह्म उत्पन्न उत्पन्न किए, देवता सत्य की ही उपासना किया करते हैं ” । तात्पर्य यही हुआ कि ब्रह्मनिः श्वमित सत्यवेद मे उत्पन्न ग्रापोमय समुद्रगर्भ में अपतत्त्व के अङ्गिराभाग से सूर्य्यात्मक सत्यवेद का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे कि वैज्ञानिक लोग ' गायत्रा मात्रिक ' नाम से व्यवहृत करते है | { इस सत्यब्रह्म से एक ' ब्रह्म ' ( वेट ) और उत्पन्न हुआ, जिसका कि मौलिकरूप ' यज्ञ ' माना गया है । मत्य-बेदात्मक सौरसत्याग्नि के आगे जाकर ' अग्नि- वायु- ग्रादित्यं ये तीन विभाग हो जाते हैं । इन तीनों पर्वों से

* हिरण्यगर्भः समग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।

सदाधार पृथिवीं द्यमुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

—यजुःसंः १३ | ४ | १५०

पृष्ठ 186

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द्वितीयखण्ड ( यज्ञस्वरूपसिद्धि के लिए ) क्रमशः ( भूताग्निप्रधान ) ' ऋ - यजुः साम ' वेदों का आविर्भाव और होता है, जैसाकि ' अग्नि- वायु - रविभ्यस्तु ' इत्यादि मानवसिद्धान्त से प्रमाणित है । इन तीनों वेदों मे क्योंकि सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप सम्पन्न होता है, अतएव इस वेदयत्री को - ' यत्रमा त्रेकत्रेद ' कहा जाता है । भूतमात्रा की प्रधानतासे इसे हो ' पार्थिववेद ' माना गया है । इस पार्थिववेदलक्षण ब्रह्म से यज्ञप्रजापति का विकास होता है । यज्ञप्रजापति से वसु - रुद्र- आदित्यादि उन ३३ यज्ञिय देवताओं का विकास होता है, जोकि यज्ञियदेवता मूलभूत उस सौर- सत्य - वेद की उपासना किया करते हैं । इम्र सृष्टिवाराक्रम से ग्रत्र हमें इस निष्कर्य पर पहुँच जाना पड़ा कि, सर्वमूलभूत स्वायम्भुव वेदाग्नि से श्रापोमय समुद्र का, आपोमय समुद्रगर्भ में श्रङ्गिराभाग से सौरवेदाग्नि का, सौग्वेदाग्नि से पार्थिव भूतान का हुग्रा विकास है । ब्रह्माग्नि स्वायम्भुवाग्नि, प्राणाग्नि, सार्वयाजुषाग्नि, इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध प्रथम सत्याग्निं ही पहिला ' ब्रह्मनिःश्वसित वेद अपौरुषेय " है । देवाग्नि, सौराग्नि, अग्रि, इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध दूसरा सत्याग्नि ही दूसरा ' गायत्री मात्रिकवेद पौरुषेय " है । एवं भूताग्नि, पार्थिवाग्नि, यज्ञाग्नि, आदि विविध नामों से प्रसिद्ध तीसरा सत्याग्नि ही तीसरा ' यज्ञमात्रिक व पौरुषेय " है । पार्थिव सृष्टि का मूल गायत्रीमात्रिक वेद है, एवं सर्वमूल ब्रह्मनिःश्वसितवेद है । ब्रह्माग्नि सत्यप्रवान है, देवाग्नि देवप्रधान है, भूताग्नि भूतप्रधान है | अग्नित्रयी ही वेदत्रयी है, एवं सान्ध्य सोमद्वयी ही अथर्ववेद है, जिसका कि अन्नभाव से दलक्षण त्रयोद में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । ४ - प्राजापत्यवेद के दर्शन -उक्त तीनों प्राजापत्य वेदों का हम प्रत्येक पदार्थ में प्रत्यक्ष कर रहे हैं । जैमाकि पूर्व के ' चतुष्कल प्रजा-पति ' नामक़ परिच्छेद में, बतलाया जा चुका है, नाम - रूप - कर्मानक प्रत्येक पदार्थ में रहने वाला सर्वसाधरणा-नुभूत, जो ' अस्तित्त्व ' है, वही पहिला ब्रह्मनिःश्वसित स्वायम्भुववेद है । प्रतिष्ठा ही इसका प्रातिश्विक स्वरूप है । प्रतिष्ठालक्षण अस्तभाव के द्वारा इस वेद के हम साक्षात् दर्शन कर रहे हैं । मनःप्राणवाङ्मय प्रतिष्ठा-लक्षण इस ग्रमृतवेद ( अमृतप्रजापति ) के आधार पर नाम रूप - कर्म्ममय पदार्थ प्रतिष्ठित हैं । इन तीनो को हम ' नामरूप'- तथा ' कर्म्म ' भेद से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं । नामरूप से पदार्थ का ग्रहण होता है, ज्ञान होता है, यही भातिलक्षण ज्योतिर्भाग है, यहां गायत्रीमात्रिक सौवेद के साक्षात् दर्शन हैं । सौर-मूर्ति इन्द्र चतुगत वणरूपों ( शुक्ल - कृष्ण - हरितादि रूपों ) का अधिष्ठाता है, एवं सौर वेदमूर्ति, ' लंष्टा ' नामक श्रादित्यप्राणविशेष त्राकाररूपों का अविता है । एवमेव ऐन्द्रीवाक ही नामप्रपञ्च की अधिष्ठात्री है । इस प्रकार मौर गा ० वेद ही नाम रूपों का प्रवर्त्तक बन रहा है । तीसरा कर्म्मभाग ' आदान- विसर्ग ' भेद से दो भावों में विभक है । श्रादान मोम का होता है, विमर्ग यांग्त का हाता है । दोनों के समन्वय का ही नाम यज्ञकर्म है । एवं यह यज्ञकर्म ही तीसरे यज्ञमा त्र - भौतेकवेद के प्रत्यक्ष दर्शन हैं । इस प्रकार ब्रह्मलक्षण प्रतिष्ठा ( ग्रतित्व ), नामलक्षण ज्योति ( भाति ), कर्म्मलन्नण अन्न ( यज्ञ ) रूप से तीनों वेटों का प्रत्येक भो तक पदार्थ में हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं, एवं यडीयां बाघ विद्यायां सर्वाणि भूतान्वपश्यतु " की अर्थता है । इस त्रयीवेट, एवं तद्ा ब्रह्म नामरूप - ग्रन्त्र की पवृत्ति उसी सर्वज्ञ सर्वशक्ति- सर्व वित अक्षरप्रवान घोड़शीप्रजापति से हुई है, जैसाकि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है— " १५१

पृष्ठ 187

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भाष्यभूमिका

यः सर्व्वज्ञः सर्व्ववित्, यस्व ज्ञानमयं तपः ।

तस्मादेतद् ब्रह्म, नामरूपमन्नं च जायते ॥

वेदविवर्त्तपरिलेख: --- मुण्डकोपनिषत् १ । १० -प्रतिष्ठा १ - ब्रह्म निःश्वसितवेदः ( १ ) — श्रग्निवेदः - ब्रह्माग्निः — ब्रह्म – प्र * भृग्वङ्गिरोवेदः ( २ ) — सोमवेदः - - श्रम्भःसोमः २ - गायत्रीमात्रिकवेदः ( ३ ) – अग्नि वेदः - देवाग्निः - नामरूपे - ज्योतिः २ – त्रयीवेदः H - अथर्व्यवेदः ( ४ ) - सोमवेदः - - भास्वरसोमः ३- यज्ञमान्त्रिकवेदः ( ५ ) - श्रग्निवेद: -: - -भूताग्निः - श्रनम् - - ~ यज्ञः 3 ब्रह्माग्नि से ‘ स्वयम्भू ” पर्व का श्रम्भः सोम से ' परमेष्ठी " पर्व का, देवाग्नि से ' सूर्य ' " पर्व का, मास्वरसोप से ' चन्द्र ' " पर्व का एवं भूताग्नि से ' पृथिवी " पर्व का विकास हुआ है । इन पाँचों पर्वों में ' ब्रह्मा - विष्णु - शिव ' इन तीन देवताओं का उपभोग हो रहा है । इन तीनों देवविवत का, तथा पूर्वोक्त वेदविवर्त्तो का प्रथम प्रकरणान्तर्गत- ' ' अनन्तवेद का विज्ञेय इविवृत्त ' तथा ' प्रतिपदनुचर -' भाव ' नामक परिच्छेदों में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में हमें यही कहना है कि, स्वायम्भुव ब्रह्मनिःश्वसित वेदलक्षण ब्रह्माग्नि ' ब्रह्म ' से अनुगृहीत रहता हुआ ' सत्य ' नाम से प्रसिद्ध है | सौर - गायत्री मात्रिक वेदलक्षण ' देवाग्नि ' विष्णु से अनुग्रहीत रहता हुआ ( ' नार ' नाम से प्रसिद्ध श्रापोमय परमेष्ठीमण्डल में प्रतिष्ठित होने से ) ' नारायण ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं पार्थिव गायत्री -मात्रिऋवेदलक्षण भूताग्नि शिव से अनुगृहीत रहता हुआ अपने रुद्रभाव से वाम ( वक्र ) बनता हुआ ' बामदेव ' नाम से प्रसिद्ध है । स्वायम्भुव ब्रह्मा सत्याग्निमूर्ति है, सौर विष्णु नारायणाग्निमूर्ति है, पार्थिव -शिव वामाग्निमूर्ति है । यही वामाग्निमूर्ति पार्थिव शिव हमारे प्रकृत प्रकरण के सम्बत्सर - प्रजापति के स्वरूप-ममर्पक बनने वाले हैं, जिनके कि वाम स्वरूप के स्पष्टीकरण के लिए प्रकरण के मध्य में ही हमें उक्त वामचर्चा का आश्रय लेना पड़ा है । प्रासङ्गिक चर्चा समाप्त हुई । अव प्रक्रान्त विषय की ओर चलिए । विषय यह चल रहा था कि, प्राजापत्य अग्नि ( सम्वत्राग्नि ) का मूल कौन? । वहीं यह समाधान हुआ था कि, आपोमय पारमेय समुद्र ही इसका मूल है । क्योंकि इस अप समुद्र का मूल स्वायम्भुव सत्यग्नि था, श्रतएव प्रसङ्गवश उसका, एवं उस से सम्बन्ध रखने वाले सौर - पार्थिव वेदों का भी दिग्दर्शन कराना पड़ा । अभी न तो सूर्य ही उत्पन्न हुआ है, न सौर सम्वत्सरचक्र का ही उदय हुआ है । हाँ, स्वायम्भव वेदाग्नि से पतत्त्व अवश्य उत्पन्न हो गया है । इस अप्व के - ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापा भृग्वङ्गिरोमयम् ” इस श्रथर्व ब्राह्मण-सिद्धान्त के अनुसार ' भृगु - निरा ' नामक दावभाग हैं । दोनों की समन्वित अवस्था ही ' आप ' है । १५२

पृष्ठ 188

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द्वितीयखण्ड इनमें भृगुलक्षण असोम ( स्नेहतत्त्व ) के संसर्ग से अङ्गिरा लक्षण दाहक अग्निकरण क्रमशः शनैः शनैः समुद्रगर्भ में प्रतिष्ठित प्रजापति की शनायामूला हृदय - शक्ति ( ग्राकर्षण बल ) से आकर्षित होते हुए घन बनते जाते हैं । इस घनावस्था से पहिले पहिले तो ग्रापोमय भृगुभाव से नित्य संश्लिष्ट आपोमय निराकरण ऋत रूप से इतस्ततः उस समुद्र में अव्यवस्थित रूप से ही संचार करते रहते हैं । ' अम्भोवाद ' मूला इसी प्राथमिक स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् यज्ञवल्क्य ने कहा है-" आपो वा इदमग्र सलिलमेवास " - शत ० १२।१ रादार आगे क्या हुआ?, इन बानियों ने यह विचार किया कि, अपन कैसे, किस उपाय से प्रजारूप ( सृष्टिरूप ) में परिणित हों । ( अन्ततोगत्वा अपने इस विचार को कार्य्यरूप में परिणात करने के लिए ) पानियों ने श्रम किया, तप किया । इस तप से सन्तप्त पानियों में एक सुनहरी अण्डा उत्पन्न होगया । इस समय पर्य्यन्त सम्वःसर उत्पन्न न हुआ था । अपितु याज सम्वत्सरमण्डल की जो अन्तिम सीमा है, वहाँ तक वह सुनहरी अण्डा घूम रहा था ' । ५- सम्वत्सरवेला और हिरण्मयाण्ड– तात्पर्य्य यह हुआ कि, भार्गव सोम के ' सम्बन्ध से पहिले अतिरोऽग्नि भी सर्वथा कृष्ण था, जैसा कि पूर्वके प्रमाणवाद में ' कृष्णाजिनश्रुतिप्रकरण ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अग्नि को “ हिरण्यरेता ” बतलाया गया है । हिरण्यभाव तापयुक्त ज्योतिर्भाव है, एवं यह ज्योतिभांव, तथा तापधर्म भार्गव सोमसम्पर्क पर अवलम्बित है । यद्यपि भार्गवसोम, तथा श्राङ्गिरम अग्नि दोनों का सम्बन्ध नित्य है, । परन्तु जबतक ' मातरिश्वा ' नामक श्रण्डभावोत्तेजक वायुविशेष की नोदना के द्वारा दोनों का अन्तर्य्याम सम्बन्ध नहीं हो जाता, तत्र तक अङ्गिरोऽग्नि में न संताप होता, न हिरण्यलक्षण ज्योति का आविर्भाव होता । मातरिश्वा से पहिले पहिले तो ग्रापोरूप भृगु, एवं पोरूप अङ्गिरा दोनों विशुद्ध रूप में परिणत रहते हुए ‘ सलिल ' ही बने रहते हैं । मातरिश्वा की प्रेरणा से ही महोबललक्षण, हिरण्योत्पादक चल का श्राविर्भाव होता है । इसीबल से ऋत अतिराणों में घनता आती है, एवं हिरण्यभाव का उदय होता है । इसप्रकार सलिलरूप वह श्रापस्तत्त्व कालान्तर में हिरण्यमयरूप में परिणत हो जाते हैं । परन्तु अभी तक पूरा संघठन नहीं हुआ है । अपितु वे अग्निपुञ्ज उल्कारूप से उस समुद्रमें बड़े वेग से अप्रतिष्ठित - अव्यवस्थितरूप से घूम रहे हैं, जिन उल्काओं को वैज्ञानिक ' धूमकेतु ' नाम से व्यवहृत किया * मातरिश्वा वायु क्या काम करता है?, यह अण्डसृष्टि का प्रवर्त्तक वि.स आधार पर माना गया?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए " ईशोपनिषत् - हिन्दी- विज्ञानभाष्य प्रथमखण्ड का " तन्नस्मिपो मातरिश्वा दधाति " इत्यादि मन्त्रभाव देखना चाहिए । १५३

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करते हैं, एवं जिनके एकसहस्र भेद माने जा रहे हैं । A इन एक सहस्र अग्निपुत्रों में से केवल एक ही श्रग्निपुञ्ज हिरण्मयाण्डरूप में परिणत होता हुआ सूर्य्यरूप में परिणत होता है । सौराग्नि जब लयावस्था में परिणत हो जाता है, तो पुनः श्रहःकाल में धूमकेतु का वही सृष्टिक्रम आरम्भ हो जाता है । इस प्रकार धूमकेतुलक्षण हिरगमयाण्ड, हिरण्मयाण्ड से सूर्य, सूर्ख से अन्य उपग्रह, लयभाव, पुन: हिरण्मयाण्ड-विकास, पुनः वही क्रम इत्यादि धारावाहिक रूप से सञ्चर प्रतिसञ्चर होता रहता है, जिसका ' धाता यथापूर्वमक-ल्पयत्, दिवंच पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' इत्यादि रूपसे अभिनय किया जाता है । अस्तु, छोडिए सृष्टि के इन विस्तारक्रमों को । यहाँ केवल यही वक्तव्य है कि, आपोमय समुद्रगर्भ में मातरिश्वा की प्रेरणा ' मृगु का अङ्गिरा के साथ अन्तर्य्याम सम्बन्ध हुआ, एवं इसपे अङ्गिराभाग हिरण्मयाण्ड बन गया । अत्र तत्त्व से विकसित होने वाली इसी प्रथमसृष्टे का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-" ता अकामयन्त, कथं न प्रजायेमहीति । ता अश्राम्यन्, तपो-ऽतप्यन्त । तासु तप्यमानासु हिरण्मय. एडं सम्बभूव । तोह तर्हि सम्वत्सर आस । तदिदं हिरण्मयाण्ड याव-त्सम्वत्सरस्य वेला, तावत् पय्ये प्लवत " । - शत ० ११ | १ | ६ | १ | आगे क्या हुआ?, उत्तर स्पष्ट है । अग्निपुञ्जरूप हिरण्मयाग्नि का गर्भ में सघात होने लगा । होते होते जब गर्भस्थ अग्निपुञ्ज प्रात्यन्तिकरूप से संघातभाव को प्राप्त होगया, तो सहसा वह घन - ग्रग्निपिण्ड प्रश्वलित हो पड़ा । वही प्रज्वलित अग्निपिण्ड " सूर्य्य " नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसे कि पूर्व में हमने

A १ - दर्शनमस्तमयो वा न गणितविधिनास्य शक्यते ज्ञातुम् ।

दिव्यान्तरिक्षभौमास्त्रिविधाः स्युः केतवो यस्मात् ॥ २ ॥

२- हुताशेऽनल रूपं यस्मिंस्तत् केतुरूपमेवोक्तम् । खद्योत पिशाचलय मणिरत्नादीन परित्यज्य ॥३ ॥

३ - ध्वजशस्त्रभवन तरुतु गकुञ्जराद्यष्यथान्तरिक्षास्ते दिव्या नक्षत्रस्था भौमाः म्युरतोऽन्यथा शिखिनः ॥४ ॥

४ - शत में काधिक के वरूपमेकमेव प्राह ५ —–शुक्ल विपुलैकतारा नव एवं केसह १५४ सहस्रमपरे वदन्ति

के तूनाम् ।

मुनिर्नारदः केतुम् ॥ ५ ॥

विदिशां केतवः समुत्पन्नाः ।

विशेषमेषामतो वक्ष्ये ॥ २८ ॥

- बृहत्संहिता केतुचाराध्याय ११ ।

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द्वितीयखण्ड " नारायण ". किंवा नारायणाग्नि नाम से व्यवहृत किया है । पिण्डभाव का ही नाम ' पुर ' है । हिरण्मयाण्ड भी यद्यपि ' पुर ' था, किन्तु अभी इस पुर में पिण्डस्वरूपसमर्पिका घनता का पूर्ण विकास न था । अतएव तदवस्थापन्न पिमान हिरण्यमयाग्नि को ' पुरुष ' नही कहा जा सकता था । किन्तु जत्र पिण्डभाव के उदय से पुरभाव का पूर्ण विकास हो जाता है, तो तदवन्छित्र पिण्डात्मक यही हिरण्याग्नि ' पुरि शेते'-' पुरिशयः ' इत्यादि निर्वचनों से ' पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । यह पुरुष, और पूर्वश्रुतियों में प्रतिपादित ' प्रथम ' नामक ' त्रयीत्रह्म ' दोनों समतुलित हैं । वहाँ श्रुति ने इसे ' त्रयीब्रह्म ' नाम से, एवं यहाँ ' पुरुष ' नाम से व्यवहृत कर दिया है । उस हिरण्मयाण्ड को इस पुरुषात्मिका पिण्डावस्था में परिणत होने में कितना समय लगा?, इम प्रश्न का उत्तर प्रजापति के पुत्रों से पूछना चाहिए । स्त्री- बड़वा - गौ आदि एक वर्ष में ( चान्द्रसम्वत्सर में ) गर्भ को गर्भाशय के बाहिर डालती है । इस ग्राध्यात्मिक चरित्र के आधार पर ही उस धिदैवत पुरुष के सम्बन्ध में भी एक सम्वत्सर की व्यवस्था माननी पड़ेगी । हिरण्मयाण्ड को पिण्डरूप में परिणत होने के लिए एक वर्ष का समय अपेक्षित है, यही तात्पर्य है । इसा पुत्र दृष्टेि नाम की दूसरी बारा का स्वष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-ततः सम्बत्सरे पुरुपः समभवत् । स प्रजापतिः । तस्मादु सम्ब-त्सरे एव स्त्री या, गौर्या, वड़वा वा विजायते । सम्वत्सरे हि प्रजापतिरजायत " । - सम्वत्सर और विकर्षणविज्ञान — - शत ० ११।१।६।२ फिर क्या हुआ?, इस प्रश्न को थोड़ी देर के लिए छोड़ कर एक नवीन प्रसङ्ग की ओर चलिए । श्रग्निचयनकर्म ' चिति संचिति " भेद से दा भागों में विभक्त है । इनमें सञ्चितिकर्म ही ' शतरुद्रियहोम ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसकी इतिकर्तव्यता शतपथ नवमकाण्ड में विस्तार से निरूपित हैं । चित अग्नि को जत्र सञ्चित बना लिया जाता है, तो वह सञ्चित अग्नि उग्र रूप में आता हुआ. ' ' द्रु ' रूप में परिणत हो जाता है । इस रुद्राग्नि की उग्रता शान्त करने के लिए ही ' विकर्षण ' नामक कर्म्मविशेष किया जाता है, जैसा कि निन्नलिखित वाजिश्रुति से स्पष्ट है -" अथैनं त्रिकर्षति मण्डूकेनात्रक या वतसशाखया । तद्वा-S एनं देवाः शतरुद्रियेण चाद्भिश्च शमयित्वा शुचमस्य पाप्मानमपहत्य, अथैनमेतद्भूय एवाशमयन् । तथ्थयैनमयमेत-च्छतरुद्रियेण चाद्भिश्च शमविचा शुचमस्य पाप्मानमपहत्य, * सौर हिरण्मय पुरुष का स्वरूपसम्पादक सम्वत्सरात्मक ( वर्षात्मक ) काल दिव्यभाव से ही सम्बद्ध है, जिस एक दिव्य सम्वत्सर के मानुष सम्वत्सर अनेक कोटि ( करोड़ों ) भावों में परिणत हो जाते हैं । १५५