Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 191–200

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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अथैनमेतद् भूय एव शमयति । सर्वतो विकर्षति । सर्वत एवैनमेतच्छमयति " । - शत ० ६।११२ / २० मातरिश्वा वायु की नोदना से होने वाली घृताहुति ( भार्गव सामाहुति ) से अतिशयरूप से प्रज्वलित होने वाले उम्र - उग्रतम सौर अग्नि ने उत्पन्न होने के साथ ही विश्व को जला क्यों नहीं डाला?, अथवा अत्युग्र सौर अग्नि आज विश्व को क्यों नही जला डालता?, वैज्ञानिकों के सामने जब यह प्रश्न उपस्थित होता है, तो उत्तर में वे ‘ मण्डक - अत्रका - वेतसशाखा ' ये तीन शब्द हमारे सामने रखते हैं । एवं जब हम इन तीनों शब्दों का तात्त्विक अर्थ जान लेते हैं, तो हमारी उक्त जिज्ञासा शान्त हो जाती है । दद्दुर- भेक वर्षाभृः-आदि नामों से प्रसिद्ध जलीय प्राणिविशेष ही ' मण्डूक ' ( मेंढक ) नाम से लोक में प्रसिद्ध है । अवरुद्ध जलाशयों में उत्पन्न होने वाले हरितवर्णाकृति सूक्ष्म - स्थूल, जलाशयपृष्ट को श्राच्छादित रखने वाले शैवाल ( सिंवाल ) ही ' अत्रका ' नाम से प्रसिद्ध हैं । एवं इसी जलपृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले, गन्धपुष्प वाले, कोमल-मञ्जरी वाले, दीर्घपत्र वाले, ' सा ' नाम से प्रान्तीय भाषा में प्रसिद्ध होने वाले, लम्ब - लम्बायमान, ' घन - नम्र भावापन्न लताविशेष ही ' वेतस ' नाम से प्रसिद्ध हैं । मण्डूक - अवका - वेतम, तीनों जल में ही उत्पन्न होत है, आाप्यद्रव्य से हो इनका पोषण होता है, अतएव इन तीनों को ही जलीय पदार्थ माना जा सकता है । प - तत्त्व ही इनकी मूलप्रतिष्ठा है । यह तो हुआ इनका लौकिक स्वरूप | अब इनके अलौकिक स्वरूप का विचार कीजिए । अलौकिक भाव का विचार करने पर हमें इस निश्चय पर पहुँचना पड़ता है कि, ग्रापोमय पारमेष्ट्य समुद्र के गर्भ में सोमाहुति से उत्पन्न सौर - अग्नि से सम्बद्ध जो ग्राग्नेय जलभाग था, वही क्रमशः ' मण्डूक-अवका - वेतस ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । दूसरे शब्दों में घनाग्नि का प्रवशभूत श्राप्य - नारायणाग्नि ही प्रशिक तारतम्य से इन तीन स्वरूपों में परिणित हुआ । ग्रग्नि समुद्र के गर्भ में प्रतिष्ठित था, ग्राज भी प्रतिष्ठित है | फलतः चारों और व्याप्त रहने वाला पानी इस पर निरन्तर आक्रमण करता रहता है । इसी ग्रवाक्रमण से उम्र सौर अग्नि शान्ति बना रहता है । इसी शाति से इसकी उग्रता विश्व को दग्ध नहीं कर पाती । जो श्राप्यभाग अग्निपुञ्ज से सम्बन्ध करता है, वह स्वयं भी आग्नेयधर्म्म से युक्त हो जाता है । श्राग्नेय से युक्त होकर ही यह पानी कापस लौटता है । गायत्रीमात्रिकवेदमूर्ति सौर उग्राग्नि को शान्त करने वाले जो बानी इसके संसर्ग में आकर आग्नेय बनते हुए वापस लौट आते हैं, उन परावर्तित श्राग्नेय पानियों का ही नाम ( जिनमें अग्नि का प्रवर्ग्यभाग प्रतिष्ठित हो जाता है ) ' मण्डूक ' है । प्राणिसृष्टि में जिस प्राणी के उपादान - द्रव्य में इस मण्डूक नामक आग्नेय पानी की प्रधानता रहता है, वही प्राणियों में ' मगडूक ' ( मेंढक ) कहलाया है । यह स्मरण रखने की बात है कि, गर्भीभूत अग्नि से टकरा कर, उछल कर इस ओर गिरा हुआ ग्राग्नेय बानी ही क्योंकि मण्डूक है, एवं इसी से मण्डूक प्राणी की उत्पत्ति हुई है । अतएव प्रभवगुणममानधम्मां इस मग में भी यही प्लुतिभावं प्रतिष्ठित रहता है, जैसा कि वैयाकरणों के ' मण्डूकप्लुतिन्याय ' से प्रसिद्ध है । प्राकृतिक - पारमेष्ठ्य मण्डूकप्राण से जैसे मण्डूक प्राणी उत्पन्न होता है, एवमेव इसी प्राण से जलीय अश्व ( दरियायी घोड़ा ) उत्पन्न होता है, एवं इस अश्व पशु की यति में भी मण्ड़क्क्त ही ' लति रहती है I १५६

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द्वितीयखण्ड अतएव इस अश्व को भी ' मण्डूक ' नाम से ही व्यवहृत किया जाता है । ' अप्सु योनिर्वा श्वः ' - ' वारुणो हि देवतया अश्वः ' के अनुसार अश्वप्राण भी प्राप्य माना गया हैं, एवं मण्ड्वकप्राण भी प्राप्य ही माना गया है । दोनों प्रारण उसी पारमेयमण्डल में प्रतिष्ठित हैं । दोनों के स्वरूप में अन्तर यही है कि, मण्डक नामक मण्डुकप्राण में सौर अग्नि का अग्निभाग प्रधान रहता है, एवं मण्डूक नामक अश्वप्राण में सौर-श्रग्निगत ज्योतिर्लक्षण इन्द्रप्राण की प्रधानता रहती है । अतएव अश्व को ऐन्द्रपशु भी मान लिया गया है । मण्डूकप्राणात्मक इसी ऐन्द्र श्वपशु का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है— A " वो दिल्हा सुखं रथं हसमानामुपमन्त्रिणः । शेपो रामवन्तौ भेदौ वारिन् मण्डूक इच्छति । इति - इन्द्रायेन्द्रो परिस्रव " ( यास्कनि ० ६ | ३ | २ | ) | ( ऋक् सं ० ६।११२।४ । ) । अश्वप्राण की अपेक्षा मण्डूकप्रारण के साथ ' वर्षा ' का विशेष सम्बन्ध माना गया है । कारण यही है कि, ' अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीर यांत ' - ' आदित्याज्जायते वृष्टिः ' इत्यादि श्रुति - स्मृति के अनुसार पर्जन्यवायु-महचारी यादित्याग्नि ( सौराग्नि ) ही वृष्टि का जनक बनता है । एवं पूर्वकथनानुसार अश्वप्राण की अपेक्षा मण्डूकप्राण में हीं सौरप्रवर्ग्याग्नि की प्रधानता रहती है । प्राकृतिक मण्डूकप्राण के व्यापार से ही पर्जन्य का सञ्चार होता है, वायुगत इन्द्रप्राण अन् अवरोधक नमुचिप्राण को शिथिल करता है, वृष्टि हो पड़ती है । जिस समय प्राकृतिक मण्डूकप्राण में वृष्टयनुबन्धी व्यापार प्रारम्भ होने लगता है, उसी समय जलाशयों में प्रतिष्ठित तत्समानधर्म्मा मण्डूकप्राणियों में सजातीय प्राणोद्रेक से उल्लासभाव उदित हो जाता है । इसी उल्लास से इनके कण्ठ से ध्वनि निकलने लगती है, एवं उस ध्वनि के आधार पर वैज्ञानिक प्रावृष्टि का अनुमान लगा लिया करती है । महर्षि वसिष्ठ ने वर्षों की कामना से पर्जन्य की स्तुति की, मण्डकप्राण ने पर्जन्य का उद्बोधन कराया, की स्तुति के व्याज वृष्टि हो पड़ी । वसिष्ठ प्रसन्न होकर मण्डूकप्राणकृतमूर्ति मण्डुकप्राणी से उस श्राधिदैविक, वर्ष मण्डूकप्राण का यशोगान करने लगे । देखिए! " वसिष्ठो वर्षकामः पजन्यं तुष्टाव । तं मण्ट्टका अन्वमोदन्त । स मुरकान नुमोदमानान् दृष्ट्वा तुष्टाव — कि! वर्षमा बद तादुरि । .मध्ये हृदस्य वस्त्र विगृह्य चतुरो पदान् ॥ " । * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेश्वन गीताविज्ञान भाष्यभूमिका प्रथमन्यण्डान्तर्गत ' आवश्यक निवेदन ' नामक प्रकरण में देखया चाहिए । A " तत्र तित्तिरिकल्माषान् मण्डूकाख्यान् हयोत्तमान् " । ( मा ० २ | २८ | ६! ) | १५७

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भाष्यभूमिका आप्य जीवों में जो स्थान मण्डूक प्राणी का है, वायव्य जीवों में वही स्थान मनुष्य का है । इस समानता का एकमात्र कारण ' आप्यभाग ' हो है । मण्डूक पशु जहाँ ग्राम्य अग्निमय है, वहाँ मनुष्य नामक पुरुषपशु भी आप्य श्रग्निमय हो माना गया है, जैसा कि छान्दोग्य उपनिषत् की — " इति तु पञ्चभ्यामाहुता-वापः पुरुषवचसो भवन्ति ” ( छा ० उप ० ५ | १ | | ) इत्यादि रूप से उपवर्णित, श्रद्धा- सोम - पर्जन्य वृष्टि-अन्न- ऐतारूपात्मिका पञ्चाग्निविद्या मे प्रमाणित है । इस समानता का परिणाम यह है कि, ग्रस्थि- सन्निवेश, गणना - स्वरूप आदि के सम्बन्ध में मण्डूक- और मनुष्य अधिकांश में समतुलित है । अवश्य ही आज की भाँति हमारे श्रुतीत वैज्ञानिक युग के वैज्ञानिक भी अपनी विज्ञानशालाओं में अस्थिम्वरूपपरिचय के लिए मण्डूकप्राणी का उपयोग करते होंगे । परन्तु हम अपनी उस वर्तमान युग की हीनदशा का क्या वर्णन करें, जिसमें तत्त्वप्रतिपादक वेदमन्त्रों के पारायणमात्र से ही कृतकृत्यता मान ली जाती है । प्राकृतिक, आधि-दैविक मण्डूकप्राण के क्या क्या धर्मं हैं?, क्या क्या कर्म्म हैं?, एवं इनके अन्वेषण, प्रचार, उपयोग से क्या क्या लाभ उठाए जा सकते हैं?, नेत्र विस्फारित कर निम्नलिखित वैज्ञानिक वचनों पर दृष्टि डालिए । एवं साथ ही अपने उस प्रतीत वैज्ञानिक गाम्भीर्य की स्मृति के द्वारा उद्बोधन प्राप्त कीजिए!

१ - सम्वत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः ।

वाचं पज्जन्यजिवितां प्र मण्डूका अत्रादपुः ॥१ ॥

२ - दिव्या आप अभि यदेनमायन् दृतिं न शुष्कं सरसी % यानम् ।

गयामह न मायुर्वत्सिनीनां मण्डूकानां वग्नुरत्रा समेति ॥२ ॥

३- - अन्यो अन्यमनु गृभ्णात्येनोरवां प्रसर्गे यद मन्दिषाताम् । मका कनिष्कन्पृश्निः सम्पृक्ते हारतेन वाचम् || ४ || "..

४ - - ब्राह्मणाो अतिराने न सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्तः ।

सम्वत्सरस्य तदहः परि ष्ठ यन्मण्डूकाः प्रादृषीणं बभूव ॥७ ॥

५- गोमायुरदादजमायुरदात् पृश्निरदाद्धरितो नो वसूनि ।

गवां मण्डूका ददतः शतानि सहसाने प्र तिरन्त आयुः ॥ १० ॥ - ॥

( ऋक् सं ० ७। १०३ सू ० ) * मण्डूकप्राण अग्निप्रधान है, ' अग्ने! व्रतपते व्रतं चरिष्यामि ' के अनुसार अग्नि ही व्रताध्यक्ष है । इन्हीं अग्निधम्मों को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति ने मण्डूकों को व्रतचारी ब्राह्मण कहा है । श्रपिच वेदव्रत का अनुष्ठान करने वाले ब्रह्मवारी अपने मुत्र से वेदवाणी का जो उच्चारण करते हैं, उनका यह उच्चारण भी मण्डूकोच्चारण ही माना गया है । इस समानता से भी मण्डूकों को बतानुगामी ब्राह्मण कहना ग्रन्वर्य बनता है । मण्डूकप्राण स्वयं त्रयीविद्यामूर्ति है, जैसा कि पाठक श्रागे चल कर देखेंगे । मण्डूकध्वनि साक्षात् तत्त्ववेदात्मिका वेदध्वनि है । अतएव ब्रह्मचारियों की वेदध्वनि को मण्डूक-ध्वनि माना जा सकता है । १५८

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द्वितीयखण्ड ६ - शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति । मण्डूक्यासु संगम इमं स्वग्नि हर्षय ॥ ( ऋक् सं ० १०।१६।१४ । ) ।

७- * योगक्षेमं व आदायाहं भूयासमुत्तम श्रा वो मूर्द्धानमक्रमीम् ।

अधस्पदान्म उद्वदत मण्डूका इवादकान् मण्डका उदकादिव ॥

( ऋक्सं ० १०।१६६।५ । ) । मण्डूकचर्चा समाप्त हुई, अत्र ' अवका ', तथा ' वेतस ' का विचार अपेक्षित है । तीनों हीं यद्यपि श्रापोमय हैं, एवं तीनों हीं सौरवेदाग्नि के प्रवर्ग्याश बनते हुए अग्निरूप हैं, अतएव तीनों हीं समानधर्म्मा हैं । तथापि अभूतत्त्व के अवस्थाभेद से तीनों के स्वरूपों में अपेक्षाकृत कुछ अन्तर हो जाता है । आापोमय परमेष्ठी भृगु, तथा अङ्गिरामय बतालया गया है । इन दोनों तत्त्वों की घन - तरल विरलावस्था भेद से आगे नाकर तीन तीन अवस्था हो जातीं हैं । भृगु की वे तीनों अवस्थाएँ क्रमशः ' आपः - वायुः - सोमः ” इन नामों से, एव अङ्गिरा की तीनों अवस्थाएँ क्रमशः ' अग्निः - वायुः - ग्रादित्यः ' इन नामों से व्यवहृत हुई हैं । ग्रग्नि-वायु ( रुद्रवायु- रूनवायु ) - श्रादित्य की समष्टि तो स्वयं गर्भीभृत सौर तिरोऽग्निपिड ( सू ) है । एवं इसके चारों ओर पहिले सोम का, अनन्तर वायु ( शिववायु - स्निग्ववायु ) का, सर्वान्त में ग्रापः का स्तर है । इस त्रिविध ग्रापः का उस त्रिमूर्ति सौर अग्नि पर आक्रमण होता है । आक्रान्त ग्रग्नि परावर्तित होता है । परावर्तित श्राप्य अग्नि की भी ये ही तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं । सौर अग्नि के प्रवर्ग्य श्रग्निभाग को प्रधान आलम्बन बनाने वाला, भार्गव तत्त्व के सोमभाग से ग्वस्वरूप का निर्माण करने वाला ' अग्नि- सोममयप्राण ' ही ' वेतस ' है । सौर अग्नि के प्रवर्ग्य वायुभाग को प्रधान आालम्बन बनाने वाला, भार्गव तत्त्व के वायुभाग से स्वस्वरूप का निर्माण करने वाला .. * एक बार प्रवास के समय एक सम्मान्य पुरुष ने प्रसङ्ग में एक आश्चर्य्यप्रद घटना सुनाई थी । " एक पश्चिमी विद्वान् भारत - भ्रमण करने आए । यहाँ किंवदन्ती के आधार पर उन्होंने यह सुना कि, जब मण्डूक बोलने लगते हैं, तो भारतीय लोग दृष्टि का अनुमान लगा लेते हैं । एकमात्र इसी आधार पर उन्होंने मण्डूक की परीक्षा आरम्भ की । परिणामतः वे इस तथ्य पर पहुँचे कि, यदि मरुप्रान्तों में किसी उपाय से मर इक-प्राणिकुल प्रतिष्ठित कर दिया जाय, तो समानाकर्षण से वे प्रान्त अवश्य ही जलीय बनाए जा सकते हैं । अपने इसी उद्दे श्य की पूर्ति के लिए वे यहाँ से कुछ मण्डूक ले भी गये थे । " इस घटना से प्रकृत में हमें यही कहना है कि, जिन भारतीय किंवदन्तिों के आधार पर जिज्ञासु पश्चिमी विद्वान् तत्त्वान्वेषण में प्रवृत्त हो जाते हैं, उन किंवदन्तियों की बातें तो छोड़िए । हमारे भारतीय शिक्षकों की दृष्टि में तो तत्त्ववाद का प्रतिपादक स्वोत्कृष्ट वेदशास्त्र भी स्वातन्त्र्य का बाधक बन रहा है । अपने आपको नीरक्षीर विवेकी मानने वाले कई सम्मान्य बुद्धिवादियों ने ं ‘ वैदिकसाहित्य का इस युग में कोई उपयोग नहीं " ये उद्गार प्रकट करने का अनुग्रह किया है । इधर हमारा पण्डितसमाज तत्त्वदृष्टि से इतना दूर चला गया है कि, केवल हाथ हिलाकर पाठ कर देने के अतिरिक्त इसकी दृष्टि में वेद का कोई महत्त्व ही शेष नहीं रह गया है | भगवान ही जाने. हमारी यह विद्या कब दूर होगी । ९ ५६

पृष्ठ 195

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भूमिका ' वायुमय प्राण ' ही ' मण्डूक ' है । एवं सौर अग्नि के प्रवर्ग्य आदित्यभाग की प्रधान बनाने वाला, भार्गव अप -तत्त्व के आपोभाग से स्वस्वरूप का निर्माण करने वाला ' आदित्य - पोमय प्राण ' ही ' अ ' हैं । वेतस अग्निप्रधान सोममय प्राण है, मण्डूक वायुप्रधान वायुमय प्राण है, एवं अबका आदित्यप्रधान पोमय प्राण है । * अग्नि बनस्पति है, वेतस प्राण में इसी की प्रधानता है, अतएव श्रुति ने वेतस को ' वनस्पति ' कहा है । वायु ही- ' वायुर्वै वृष्टया ईशे ' - ' भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति ' - ' मरुतः सुप्रान्नयन्ति ' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार वृष्टिका अधिष्ठाता है, वायु ही गतिप्रधान है । अतएव तन्मय मण्डूक प्राण, एवं मण्डूक प्राणी में वायव्य-धर्मोका ही विकास रहता है । अवका ग्राम्यप्रधान है, अतएव कुरूप श्रादित्य की अन्तिम सीमा पर श्रापोमय इन्हीं अवका आप्य प्राणों का वेष्टन माना गया है । अतएव वैध चयनयज्ञ में कूर्म्मरूप यादित्य की प्रतिकृतिरूप कूर्मपशु ( कछुआ ) की चिति में भी इसके दोनों ओर प्राकृतिक, आपोमय अवकाप्राण की प्रतिकृतिरूप अवका ( शैवाल ) ही लगाए जाते हैं, जैसाकि निम्नलिखित श्रुति से प्रमाणित है— " स यः स कूम्मः, असौ स आदित्यः 1 । मुमेतदादित्यमुपदधाति " ( शत-७ | ४ | १।१५ । ) – “ अत्रका अधस्ताद् भवन्ति, अवका उपरिष्टात् । आपो वा अवकाः । अपामे-वैनमेतन्मध्यतो दधाति ” ( शत ० ७ | ४ | १।११ । ) । इसप्रकार अवका की आदित्यप्राणात्मकता अनुरूपता उक्त वचन से स्पष्ट ही सिद्ध हो रही है । मण्डूक की वायुप्राणात्मिका वायुरूपता का स्पष्टीकरण पूर्व में किया ही जा चुका है । शेष रहता है अग्नि-प्राणात्मक सोमरूप ‘ वेतस ' । वेतस अग्निप्रधान सौम्यप्राण है, इस सम्बन्ध में निम्नलिखित मन्त्र- श्रुति ही प्रमाण है, और सौभाग्य से स्वयं भाष्यकार ने भी - ' हिरण्मयो वेतसः, असम्भवोऽग्निर्वैद्य तः, आसा-माँ मध्ये वर्त्तते इति शेषः " इत्यादि रूप से गर्भित अग्निप्राण को ही वेतस माना है—

“ एता अर्षन्ति हृद्यात् समुद्राच्छतव्रजारिपुणा नावचक्षसे ।

घृतस्य धारा अभि चाकशीमि हिरण्यो वेतसो मध्ये आसाम् " ॥

वेतस - मण्डूक - अवका स्वरूपपरि लेख: -१ - आग्नेयप्राणः ( अन्तः - श्रग्निः १ --( ऋक्सं ० ४।५ ३ ५। ) । - वेतसप्राण: - अग्निप्रधानः- ततः वेतसभूतोत्पत्तिः २ - सौम्यप्राणः ( बहिः - सोमः १ ) * ' अग्निर्वै वनस्पतिः ' ( कौ ० ब्रा ० १० । ६ । ) । १६०

पृष्ठ 196

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द्वितीयखण्ड १- रुद्रवायु प्राणः ( अन्तः - वायुः २ ) २- शिवत्रायुप्राणः ( बहि: - वायुः २ ) १ - आदित्य प्राण: ( अन्तः - श्रादित्यः ३ ) - मण्डूकप्राणः - वायुप्रधानः - ततः - मण्डूकप्राण्युत्पत्तिः २ - आध्यप्राण: ( वहि: - आपः ३ ) -अबका प्राणः- आदित्यप्रधानः- ततः शैवालोत्पत्तिः -: *:: * — सौर अग्नि का अग्निभाग ऋङ्मय है, अतएव तद्रूप वेतसाग्नि को ऋङ्मय माना जायगा । सौर अग्नि का वायुभाग यजुर्म्मय है, अतएव तद्रूप मण्डूकवायु को यजुर्म्मय कहा जायगा । एव सौर अग्नि का श्रादित्यभाग साममय है, अतएव तद्रूप अत्रका आदित्य को साममय कइना न्यायसङ्गत होगा । त्रयीवेदलक्षणं, श्रापोमय ( अप् - वायु - सोममय तथा आदित्य - वायु - अग्निमय ) इन अवका - मण्डूक - वेतसंरूप शान्तिमय प्राणों से ही वह तैर रुद्राग्नि ( जिसकी कि मूनप्रतिष्ठा स्वायम्भुव वेदमूर्ति ऋषिवाण बतलाया गया है ) शान्त बना रहता है । इसी शान्तिभाव के लिए इस वैवयज्ञ में सञ्चित रुद्राग्नि की शान्ति के लिए इसके चारों ओर एक वंश ( बाँस ) में मण्डूक ( मेंढक ), अवका ( शैवाल ), एवं नैतस शाखा, इन तीनों को बाँधकर विकर्षण किया जाता है । इसी उक्त रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है यद्वेचैनं विकर्षति — एतद्व ै यत्रेतं प्राणा ऋपयोऽग्रेऽग्नि समस्कुर्वन, तमद्भिरेत्रो -क्षन् | ता आपः समस्कन्दन् 9 ते मण्ड्वका अभ.न् । ताः प्रजापतिमत्र बन्- ' यद्वै नः कमभृत, अवाक् तद्गात् ' इति । सोऽब्रवीत् - ' एप वै एतस्य वनरपतिर्देत्तु ' इति । संत्रेच सोऽद्वै तं ' वेतन ' इत्याचक्षते परोक्षम् । परोक्षकामा हि देवाः । अथ यदन वन् - ' अवाड् नः कनगात् ' इति, ता अवाक्का अभवन् । अवाक्का ह नैता ' अवका ' इत्याचक्षते परो-क्षम् । परोक्षकामा हि देवाः । " ता हैतास्त्रय्य अपः, यन्मएको कावेत सशाखा: । एताभिरेनैनमेतत् त्रयीभिरद्भिः शमयति । " ( शतः ॥ २।२२ । ) । ७ - यज्ञप्रजापति और लोकवितान— उम्र - उम्रतम मौर - हिरण्मय अग्नि ने विश्व को जला क्यों नहीं डाला? इस प्रश्न के प्रसङ्ग में ' शान्तरुद्रिय ' लक्षण शतरुद्रिय प्रकरण से सम्बन्ध रखने वाले विकर्षणविज्ञान का दिग्दर्शन कराना पड़ा । अत्र गुनः प्रकृत की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ग्रापोमय समुद्रगर्भ में सौर निका पूर्ण विकास हो चुका है | इससे आगे क्या होने वाला है?, यही विचार प्रक्रान्त है । इस प्रक्रान्ति के साथ ही आगे के सम्वत्सरस्वरूप - निरूपण से पहिले यह भी स्मरण रखना श्रावश्यक है कि, समुद्रगर्भस्थित सौर न ( नारायणाग्नि ) ही आगे जाकर त्रैलोक्य का जनक बनता हुआ सम्वत्सररूप में परिणत होने वाला है, १६१

पृष्ठ 197

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भाष्यभूमिका जिम सम्वत्मर को ' यज्ञप्रजापति ' कहा जाता है, जिसे कि पौराणिक भाषा में ' शिव ' नाम से व्यवहृत किया गया है । “ जहाँ तक सम्वत्सर की वेला है, ( मम्वत्सरखेलोद्गम से पहले ) हिरण्मय पुरुष वहाँ तक व्याप्त था । एक सम्बत्सर में उसके मुग्व ( अग्नि ) भाग से ' भू: ' यह अक्ष ' निकला, ' भुव: ' निकला, एवं ' स्वः ' निकला । इन तीनों व्याहृतियों मे क्रमशः ' पृथ्वी - अन्तरिक्ष- द्यौ ' नामक तीन लोक ( रोदसी त्रैलोक्य ) उत्पन्न हा गए । + + + + । प्रजापति के मुख से इस प्रकार ' भूः भुवः स्वः ' की समष्टरूप पाँच अक्षर निकले । इन पाँच अक्षरों के आधार पर प्रजापति ने पाँच ऋतुएँ उत्पन्न की । इस प्रकार इन लोकों के उत्पन्न हो जाने पर प्रजापति उठ खड़े हुए । उन्होंनें अपनी ग्रायु के एकसहस्र वर्ष प्राप्त किए । जिस प्रकार एक व्यक्ति नदी के इस ओर बड़ा हुआ नदी के उस पार की अन्तिम सीमा का बखान किया करता है, एवमेव प्रजापति ने इस ओर ( हृदयस्थान में ) प्रतिष्ठित होकर नदीस्थानीय वायुके सहस्रवें ( हजारवें ) वर्ष के उस पार ( महिमामण्डल के अन्तिम साम पर ) दृष्टि डाली । प्रजाकाम प्रजापति ने ( लोकरूपा सृष्टि ) को अपने ऊपर ही प्रतिष्ठित कर लिया । उसने अपने ग्रास्य ( स्थानीय प्राण ) से ही देवताओं को उत्पन्न किया । वे देवता द्य लोक ( उपलक्षित प्राण ) का आश्रय लेकर ही उत्पन्न हुए । क्योंकि ब्रुका आश्रय लेकर उत्पन्न होने से ही देव देव कहलाए, यही देवों का देवत्त्व है । जिस समय प्रजापति इन्हें उत्पन्न कर रहे थी, उस समय दिन ही था । प्रजापति का अवाप्राण ( रूप जो श्रपानप्राण था उस ) से प्रजापति ने असुरों को उत्पन्न किया । ये असुर इस पृथिवी को मूल बना कर ही उत्पन्न हुए । असुरोत्पत्तिकाल में तम का ही साम्राज्य था । + + + + देवखष्टि आधारभूत द्युभाग को प्रजापति ने ' ग्रह: ' - रूप में परिणत किया, एवं अनुत्सृष्टि - आधारभूताः पुषि को ' रात्रि ' रूप में परिणत किया । इस प्रकार कु, तथा पृथिवी से अहोरात्र की सृष्ट ं हुई । ( इस प्रकार तीन लोक, देवता, असुर, ग्रहः, रात्रि आदि की सृष्टि कर ) प्रजापति ने यह देखा कि, मैनें अपनी ( अनिमात्रा ) सारी खर्च कर डाली, जो कि इन सृष्टियों का निर्माण कर डाला । बस ' सर्वं वाऽप्रत्सारिषंम् ' इसी भावना से वे प्रजापति ' सर्वत्सर ' बन गए । ' सर्वत्सर ' शब्द ही देवताओं की परोक्षभाषा में ' सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । जो वैज्ञानिक सर्वत्सर के इस सर्वत्सरत्व को ( प्राजापत्यष्सृष्टि विज्ञान को ) ज्ञानता है, उस वैज्ञानिक के प्रति यदि कोई दुष्टबुद्धि बुरा विचार रखता है, तो इस सर्वत्सर वेत्ता की कोई हानि नहीं होतो । अपितु टीक इसके विपरीत यह सर्वत्सरनेत्ता विद्वान् जिसके लिए अनिष्टभावना कर लेता सचमुच उसका अनिष्ट हो ही ( ह ) जाता है " । जिस ' सम्वत्सरप्रजापति ' के स्पष्टीकरण के लिए प्रकृत परिच्छेद का आरम्भ हुआ था, उसका नाम पाठकों ने यहाँ आकर सुना है । परन्तु केवल नाम श्रवण से ही तत्र तक पूरा सन्तोष नहीं हो सकता; बचतक कि, उक्त ' सम्वत्सरगाथा ' का तात्त्विक दृष्टि से समन्वय नहीं कर लिया जाता । इस समन्वयदृष्टि के लिए सर्वप्रथम ' श्रमभ्रातरः ' की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । एक मातापिता के दाम्पत्यभाव से उत्पन्न कई पुत्र परस्पर में भाई भाई कहलाते हैं । जिन तीन अग्नियों का प्रकृत में दिग्दर्शन कराया जाने वाला है, वे तीनों अग्नि एक ही माता - पिता के सहोदर पुत्र हैं । अतएव इन तीनों अ॒ग्नियों को हम ‘ अग्निभ्रातरः ' ( अग्नि नामक तीन भाई ) कह सकते हैं । इनमें तीनों क्रमश: ज्येष्ठ, मध्यम, कनिष्ठ भ्राता हैं । एवं तीनों क्रमशः ' भूतानांपतिः- भुवनपतिः - भूपतिः ' नामों से प्रसिद्ध हे एवं १६२

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द्वितीयखण्ड तीनों में महिमारूप से व्याप्त उक्थरूपमे स्वतन्त्र, विभक्त, अविभक्त वहीं सुप्रसिद्ध नारायणाग्नि प्रजापति है । पारमेष्ठ्य, हिरण्मय नारायणाग्नि पिता है, पारमेष्ठ्य पूतत्त्व ( सोम ) माता है, दोनों के दाम्पत्यभाव से ही ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए हैं । पाठकों को स्मरण होगा कि, पूर्व में हमने पञ्चपर्वा विश्व में ' ब्रह्मा - विष्णु - शिव ' नामक तीन देवताओं का भोग बतलाया था. एवं तीनों को क्रमशः ब्रह्मनिः श्वमितवेट, गायत्री मात्रिकवेद, यज्ञमांत्रिकवेद-मूर्ति तीनों को क्रमशः " सत्याग्नि, नारायणाग्नि, वामाग्नि ", नामों से व्यवहृत किया बतलाते हुए था । यह वामाग्नि ही शिवस्वरूप का समर्पक है । यज्ञावस्था में वामाग्नि शिवरूप में परिणत रहता हुआ अपने त्रैलोक्य की रक्षा का कारण बनता है, एवं यज्ञभ्वंसावस्था में वही विशुद्ध रुद्ररूप में परिणत होता हुआ विश्वसंहार का कारण बन जाता है । इसके इसी वाम ( विरुद्ध कुटिल ) धर्म को लक्ष्य में रख कर इसे ' वाम ' नाम से व्यवहृत किया गया है । शिवस्वरूप इसो वाम की शिवातनू मानी गई है, जो कि योग नाम से भी प्रसिद्ध है । एवं रुद्रस्वरूप इसी वाम की ' घोरातनू ' मानी गई है, जैसाकि - " अग्निर्वा रुद्रः, तस्यैते तन्त्र घोराऽऽन्या च, शिवाऽऽन्या च " इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । ब्रह्मानुत्रन्धी ब्रह्मनिःश्वसित वेद ' ऋग्वेद ' है, विष्णवनुबन्धी गायत्रीमात्रिक वेद यजुर्वेद है, एवं शिवानुत्रन्धी यज्ञमात्रिकवेद सामवेद है । मूलप्रभवस्थान को ' उक्थ ' कहा जाता है, उक्थं ही प्रस्ताव ( उपक्रम-श्रारम्भ ) है | इसी साजत्य को लक्ष्य में रख कर हाकलण, स्वायम्भुवी ब्रह्मनिःश्वर दत्रयी को “ ऋग्वेद ” कहा जा सकता है । उपसंहारलक्षण अवसानभूमि ही निधनभाव है, निधन ही पृष्टभाव है, पृष्ठ-भाव ही नाम है | इसी समान धर्मं को लक्ष्य में रखते हुए भूतानिलक्षणा, पार्थिवी, गायत्रीमा त्रिंकवेदत्रयी को ‘ सामवेद ' कहना अन्वर्थ बन सकता है । प्रस्ताव स्थानीय उक्थ, तथा निघनस्थानीय पृष्ठ इन दोनों सें युक्त रहने वाला. मध्यस्थ ' उद्गीथ ' भाव ही यजनात् ' बजुः ' है । इसी समानता के आधार पर स्थानीय ब्रह्मनिश्वसित वेद, पृष्ठस्थानीय यज्ञपात्रिक वेद, दोनों के मध्य में दोंनों से योग करने वाली उद्गीथस्थानीया, देवाग्निलक्षणा, सौरी, गायत्री मात्रिकवेदत्रयी को अवश्य ही ' यजुर्वेद ' कहा जा सकता है । ऋवेदात्मक ब्रह्माग्नि-लक्षण, सत्याग्नि ' पितामह ' है । यजुर्वेदात्मक, देवाग्निलक्षण, नारायणाग्नि ' पिता ' है । एवं साम-वेदात्मक, भूताग्निलक्षण, वामाग्नि ' पुत्र ' है । तीन वंशों में अग्निवंश समाप्त है । पितामह के यश का विकास तत्पुत्र, पितृस्थानीय नारायणाग्नि ने किया । अपने पिता नारायणाग्नि का वंश सम्पूर्ण त्रैलोक्य में इसके वामाग्नि रूप तीनों भाइयों ने व्याप्त कर दिया । साथ ही इतना और स्मरण रखिए कि ब्रह्माग्नि की मूलप्रतिष्ठा ' स्वयम्भू ' है । देवाग्नि की मूलप्रतिष्ठा ' सूर्य ' है । एवं भूतान की प्रतिष्ठा ' पृथिवी ' ( भूपिण्ड ) है । तीनों पुर त्रिपुरभाव मे श्राक्रान्त हैं । अतएव स्वयम्भूपुर भी एक त्रैलोक्य है, सूय्यंपुर भी एक त्रैलोक्य है, पृथिवीपुर भी एक त्रैलोक्य है, जो कि तीनों त्रैलोक्य क्रमशः ' संयंती, क्रन्दसी, रोदसी ' नामों से प्रसिद्ध हैं, जिनका प्रथम स्तम्भान्तर्गत ' अन्नत वेद का विज्ञेय इतिवृत्त ' नामक परिच्छेद में दिग्दर्शन कराया खा चुका है ।

* सृष्टौ ऋङमयो ब्रह्मा, स्थितौ विष्णु जुर्म्मयः ।

रुद्रः साममयोऽन्ते च तस्मात्तस्याऽऽशुचिनिः ॥

१६३ – मार्कण्डेयेपुराण, सूर्यमाहात्म्य ।

पृष्ठ 199

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 199 का मूल पृष्ठ
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- ) ( क -सत्याग्निः -ग्निः ब्रह्म . --स्वयम्भूविवर्त्तम् -- ऋषिपतिः ब्रह्ममूर्त्तिः -प्राणाग्निः -) । संयती । ( पितामहः ) -वेदत्रयी ( ब्रह्मनिःश्वसित -ऋङ्मयः ) । ( क्रन्द्रसी । पिता ) — वेदत्रयी मात्रिक ( गायत्री यजुर्म्मयः पितृपतिर्देवपतिश्च विष्णुमूर्त्तिः -घागग्निः -नारायणाग्निः -देवाग्निः २ --सूर्यविवर्त्तम्-भूविवर्णम्--। ) ( रोदसी । पुत्रः ) -यज्ञमानिकवेदत्रयी ( साममयः . ------ भूतपतिः *** - शिवमूर्त्तिः अन्नादाग्निः -ग्निः वामा -भूताग्निः -३--- ) प्रक्रान्तरेण ( ) --ख ( ॥ सर्वमूलभूतः यज्ञमूलभूतः प्रतिष्ठितः प्रतिष्ठितो ' मद्दामहिम्नि महामहिम्न ' परमाकाशे स्वायम्भुवे ब्रह्माग्निर्ब्रह्मनःश्वसितवेदलक्षणः १ – ' ' समुद्रे पारमेष्ठ्ये : -वेदलक्षण मात्रिक देवाग्निर्गायत्री - २ । पार्थिवसृष्टिमूलभूतः प्रतिष्टितः महामहिम्नि ' ' इलादे पाथिर्वे -वेदलत्तगः भूताग्निर्यज्ञमात्रिक ३-

पृष्ठ 200

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयखण्ड ८ - त्रैलोक्य त्रिलोकी, और वेदवितान-| == सौर अग्नि ' नारायणाग्नि ' है, यही हिरण्मयाण्डलक्षण प्रकृत प्रकरण का पुरुषप्रजापति है । इस-प्रत्यतिका प्रवर्ग्यभाग ही ' भू: ' लोक है, जिसकी उत्पत्ति का दिग्दर्शन प्रमाणवादप्रकरणान्तर्गत ' कृष्णमृगवेद ' नामक परिच्छेद में कराया जा चुका है । भूएिड सूर्य्य का ही उपग्रह है, यह सार्वजनीन प्रत्यय सर्वथ ' प्रामाणिक है । भूपिण्ड के केन्द्र में प्रवर्ग्यरूप मे प्रतिष्ठित रहने वाला सौर सावित्र ग्राग्न ही ' न ' रूप में परिणत होता हुआ अन्नादानि भूताग्नि, पार्थिवाग्नि, पार्थिवप्रजापति, इत्यादि विविध-नामों से व्यवहृत हुआ है । यही पार्थिव प्राजापत्याग्नि इस प्रकरण का ' वामा ग्न ' है. यही यामाग्नि इस प्रकरण का ' पतिवाम ' है । पुनाग्नि ही ' पलित ' है । यह पार्थिव अग्नि कहने को तो अर्वाचीन है, सूर्य्य से उत्पन्न होने वाला है । परन्तु नम्तुतः सौर नारायणाग्नि का प्रवर्ग्याश बनता हुआ, अतएव तद्रूप बनता हुआ यह राजापुरुष ही माना जायगा । पार्थिव अग्नि की परम्परा सिद्ध इस पलितता ( वृद्धत्व ) के अभिप्राय से ही इसे ' पलितवाम ' कहना अन्वर्थं बनता है । नारायणाग्नि को थोड़ी देर के लिए छोड़ कर यत्र तत्प्रवर्ग्यभूत इस पार्थिव पलितवामाग्नि के विवत्त की ही मीमांसा कीजिए | इस पलित वामाग्नि के ' मून ' - ' तूल ' भेद से दो विवत ' हो जाते हैं । भूनिएड के केन्द्र से आरम्भ कर पृथिवी के २१ वे ग्रहण पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला, वषट्कारमण्डल सम्पादक, सहस्र-मण्डलात्मक, पार्थिव अग्नि ही ' मूलाग्नि ' है । इसी का नाम ' पार्थिवप्रजापति ' है । इस प्रजापति के वाङ्मय वर्षांवार ध ात्ल के आधार पर ' भूः भुवः स्वः ' नाम की व्याहृतियों से क्रमशः पृथिवी, ग्रन्तरिक्ष, द्यौ नामक खीन लोक उत्पन्न ह ते हे । यही त्रैलोक्य विज्ञानभाषा में ' स्वौम्यपार्थिवत्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध है | पृथिवी ( भूविड ) के केन्द्र में प्रतिष्ठित प्रजापति ( ग्रन्नादाग्नि, पलितवाम ) ' ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र-श्रग्नि - मं.म ' इन पाँच ग्रक्षरों से नित्ययुक्त है । इन पञ्चाक्षरों के समन्वय से ही इस प्रजापति से भू: -भुवः-स्वः ( सुवः ) ' इन पाँच ग्रक्षरों का विकास हुआ है । पाँचों अक्षरों में प्रतिष्ठा लक्षण ब्रह्मा एकाकी है, स्वतन्त्र है । दानलक्षणं विष्णु तथा विसर्गलना इन्द्र, दोनो अक्षरों की समष्टि एक स्वतन्त्र विभाग है । एवं तेजो-लक्षण अग्नि, तथा स्नेहलक्षण सोम, दोनों अक्षरों की समष्टि एक स्वतन्त्र विभाग है । पारावतदृष्टात्मिका हाथी में ग्रहणों के भेद से इन पाँचों अक्षरों का भोग हो रहा है । स्वयं भूपिण्ड अग्नि - सोम नामक अक्षरों मे अनुग्रहीत है । भुवर्लोकात्मिका सागराम्बरा पृथिवी इन्द्रा - विष्णु नामक दो अक्षरों से अनुगृहीत है । एवं स्वर्लोत्रातिल का ' मही पृथिवी ' ब्रह्मा नामक अक्षर से अनुग्रहीत है । भूः भुवः स्वः ' नाम की प्राजापत्य व्याहृतियों के वितान का चमत्कार देखिए । पृथिवी के २१ वें अहर्गण पय्र्यन्न भी इन तीनों का भोग माना जा सकता है, ३३ वें ग्रहण पर्यंत भी इन तीनों का भोग माना ना सकता है, एवं पृथिवी के ४८ वें ग्रहण परर्य्यन्त भी इन तीनों का भोग माना जा सकता है । इस भोगत्रयी का एकमात्र रहत्य है - ' यदेवेह तदमुत्र, यमुत्र तन्विह ' - ' पूर्णमदः पूर्णमिदम् ' - ' यथाऽण्डे, तथा-' पिण्डे ' । पञ्चपर्वात्मक महाविश्व को ' संयंती - ब्रन्द्रसी - रोदसी ' भेद से त्रैलोक्य त्रिलोकियों में विभक्त बतलाया गया है, एवं वहीं यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि, संपतीत्रैलोक्य ब्राह्मीत्रिलोकी है, क्रन्दसीत्रैलोक्य वैष्णवी-१६५