Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 201–210

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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भाष्यभूमिका त्रिलोकी है, रोदसी त्रैलोक्य रौद्रः त्रिलोकी है । विश्व के पाँचों पर्वों में उत्तर - उत्तर के पर्व में पूर्व - पूर्व पर्वका अन्तर्भाव है । भूपिण्ड सत्र अन्त का पर्व है. अतएव इसमें शेष सभी पर्वों का अन्तर्भाव सिद्ध हो जाता है । फलतः जो त्रैलोक्य- त्रिलोकी विभाग उस पञ्चपर्यात्मक महाविश्व में है, उन तीनों त्रिलोकयों की सत्ता एक-मात्र भौमविव में भी सिद्ध हो जाती है । इसी व्याप्तिभाव को लक्ष्य में रखकर हमनें पार्थिवप्रजापति को सुरादि व्याहृतियों को तीन संस्थानों में विभक्त किया है । पहले ब्रह्माक्षरानुवन्धिनी संयती त्रिलोकी का ही उपभोग देखिए । अग्नि सोमाक्षरानुग्रहीत भूपिण्ड भूरूपा पृथिवी है । भूपिण्ड से प्रारम्भ कर ३३ वें अहर्गण पर्य्यन्त इन्द्रा - विष्णु अक्षरानुगृहात, पार्थिव प्रदेश मुद-ल्लक'त्मक अन्तरिक्ष है । एवं ३३ से आरम्भ कर ४८ वें अहर्गण पर्य्यन्त ब्रह्माक्षरानुगृहीत पार्थिव प्रदेश स्वर्लोकात्मक द्युलोक है | यही ब्रह्मप्रधाना ' पार्थिव - संयंती त्रिलोकी ' है, जिसे कि वैज्ञानिक लोग ' मही ' नाम से व्यवहृत किया करते हैं । इसी मही पृथिवी के आधार पर ' छन्दोमायज्ञ ' का वितान हुआ है, जो कि छन्दोमायज्ञ ‘ गायत्री - त्रिष्टुप् जगती ' भेद से तीन छन्दोमर्यादाओं से युक्त होता हुआ पृथिवी के ४८ बैं अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त माना गया है । भूपिण्ड से २४ पर्य्यन्त गायत्री है, भूपिण्ड से ४४ पर्य्यन्त त्रिष्टुप है, एवं भूपिण्ड से ४८ पर्य्यन्त जगती है । इसी जगती सम्बन्ध से इस श्रष्टचत्वारिशद हर्गर्णात्मका मही ' नाम की संयती त्रिलोकी को ' जगती ' भी कहा जाता है, जिसमें कि सम्पूर्ण पार्थिव जगत् प्रतिष्ठित है । अत्र क्रमप्राप्त दूसरी इन्द्रा - विष्णु - अक्षरानुबन्धिनी क्रन्दसी त्रिलोकी के स्वरूप पर दृष्टि डालिए | अग्नि- घोमाक्षरानुगृहांत भूपिण्ड भूरून पृथिवी है । भूपिएड से आरम्भ कर २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त इन्द्राक्ष-रानुगृहीत पार्थित्र प्रदेश भुत्रात्मक अन्तरिक्ष लोक है । एवं २१ वें अहर्गण से आरम्भ कर ३३ वै अहर्गण पर्य्यन्त विष्णु - श्रन्नरानुगृहीत पार्थिव प्रदेश स्वर्लोकात्मक द्युलोक है । यही विष्णुप्रधाना ' पवि क्रन्द्रसोत्रिलोको ' है, जिसे कि वैज्ञानिक लोग ' सागराम्बरा ' नाम से व्यवहृत किया करते हैं । इसी सागराम्बरा पृथिवी के आधार पर ' गोसव ' नाम के वैष्णवयज्ञ का वितान हुआ है, जो कि गोसवयज्ञ गं लोकनाथ विष्णुतत्त्व की सर्वव्याप्ति का कारण बन रहा है जिसके कि सम्बन्ध से क्षीरशायी आयोमय विष्णु ' गोल कनाथ ' नाम से पुराणों में उपवर्णित हैं । ' इटू - ऊर्क - गौ - न्न - भोग - पशु ' आदि विविध पदार्थ इसी गोसवयज्ञ कीं महिमा 1 सर्वान्त में क्रमप्राप्त अग्नि - सोमानानुबन्धिनी रोदसी त्रिलोकी के स्वरूप का विचार अपेक्षित है । चित्याग्निमोममय भूपिण्ड भूरूपा भूः, एवं चितेनिधेयाग्निमय त्रिवन् स्तोमपर्यन्त व्याप्त रहने वाला पार्थिव प्रदेश, दोनों की समष्टि भूलोकात्मिका ' पृथिवी ' है । ६ वें अहर्गण से आरम्भ कर १५ वें अहर्गण पर्य्यन्त पार्थित्र पशत्र्याग्नि से अनुग्रहीत पार्थिव प्रदेश भुवर्लोकात्मक अन्तरिक्षलोक है । एवं १५ वें अहर्गण से आरम्भ होकर २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त पार्थिवादित्याग्नि से अनुगृहीत पार्थिव प्रदेश स्वर्लोकात्मक द्युलोक है । यही सोमगर्भिताग्निप्रधाना ' पार्थित्र रोदसी त्रिलोकी ' है, जिसे वैज्ञानिक लोक ' उख्यात्रिलोकी'-' सम्बत्मरत्रितोको’- ‘ यज्ञिया पृथिवी ' - ' महावेदि ' - ' कुरुक्षेत्र ' - ' देवयजनो ' इत्यादि नामों से ब्यवहृत किया करते हैं । इसो यज्ञिया पृथिवीं के आधार पर ' उयोतिष्टोम ' नामक सम्वत्सरयज्ञ का वितान हुआ है, बो कि ज्योतिष्टोमयज्ञ नाचिकेत स्वर्ग की मूलप्रतिष्ठा बन रहा है । यज्ञिय देवता, असुर, पार्थिव श्रोषधिक बनस्पतिवर्ग, चतुर्दशविध ब्रह्मादिस्तम्ब पर्य्यन्त भूतसर्ग, सब कुछ इसो सम्वत्सरयज्ञ की महिमा है । १६६

पृष्ठ 202

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द्वितीयखण्ड ' भूः भुवः स्वः ' की व्याप्ति का दूसरा चमत्कार देखिए । सम्पूर्ण पार्थिव विवर्त्त ' भः ' है, सम्पूर्ण सौर विवर्त ' भुवः ' है, एवं सम्पूर्ण स्वायम्भुव विवर्त्त ' स्व: ' है । स्वायम्भुव स्वः विवर्त्त ब्रह्माक्षरानुगृहीत है, सौर भुवः विवर्त्त इन्द्राविष्णु - अक्षरानुग्रहीत है. पार्थिव भू त्रिवर्त्त अग्नि - सोमाक्षरानुगृहीत है । प्रत्येक महा-व्याहृति में तीन - तीन लोकों का उपभोग हो रहा है । फलतः भूः भुवः स्वर | त्मिका, महाविश्वात्मिका, मदा-व्याहृातेत्रपी के गर्भ में तीन ताक्य विवर्ती की सता सिद्ध हो जाती है । दृष्टिक्रमानुसार पहिले भू नाम की महाव्याहृति मे सम्बन्ध रखने वाली त्रिलोकी का ही विचार कीजिए । भूपिण्ड अग्नि - सोमाक्षरानुगृहीत पृथिवी लोक है, सूर्य्यपिण्ड ब्रह्माक्षरानुगृहीत द्युलोक है, एवं भूः - सूर्य के मध्य का सम्पूर्ण प्रपञ्च इन्द्रा - विष्णु-च्चा हरानुदृद्दीत ( अन्तः – ईक्षते के अनुसार ) अन्तरिक्षक है । तोनों की समष्टि एक ' भू ' व्याहृति का वितान है । यही पहिली ' रोदसी त्रिलोकी ' है । भूपिण्ड, भू - सूर्य्य मध्यस्थ सर्व प्रपञ्च को गर्भ में रखने वाला सौरमण्डलावच्छिन्न सूर्य्यपिण्ड अग्नि-सोमाक्षरानुगृहीत पृथिवीलोक है । श्रापोमय परमंत्री मण्डल विष्णुवक्षरानुगृहीत द्युलोक है । सूर्य पिएड, तथा परमेष्ठी, दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित सर्व प्रपञ्च इन्द्रा - विष्णु अक्षरानुगृहीत अन्तरिक्षलोक है । तीनों को समष्टि एक ' भुवः ' याहृति का वितान है । यही दूसरी ' क्रन्दसी त्रिलोकी ' है । सूर्य्यसिड, सूर्य्य तथा परमेठी के मध्य में प्रतिष्ठित सम्पूर्ण प्रपञ्च को अपने गर्भ में रखने वाला, पारमेष्ठ्य मण्डलाबच्छिन्न परमेष्ठी पिण्ड श्रग्नि - सोमाक्षरानुगृहीत ( भृग्वङ्गिरोऽनुगृहीत ) पृथिवी लोक है । प्राणमय स्वयम्भूमण्डल ब्रह्माक्षरानुग्रहीत द्य लोक है । परमेष्ठी पिण्ड तथा स्वयम्भू, दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित सर्व प्रमुख इन्द्रा - विष्णू अक्षर से अनुगृहीत अन्तरिक्ष लोक है । तीनों की समष्टि एक ' स्वः ' व्याइति का वितान है । यही संगती त्रिलोकी है । यद्यपि उक्त त्रैलोक्यवितान पाठकों की रुचि का कारण बन रहा है । परन्तु बिना इसके यथावत् स्वरूपपरिचय प्राप्त किए परिच्छेदलक्षीभूत ' सम्वत्सरप्रजापति ' की ओर दृष्टि नहीं जा सकती । श्रतएव त्या हमें अरुचि भाव का आश्रय लेना पड़ रहा है । एक प्रजापति की तीन महाव्याहृतियाँ, तीन से नौ का विकास, नौ के आधार पर अनन्त का विकास, यही तो प्रजापति की अनन्त महिमा है । इसीलिए तो प्राजापत्य के ' प्राजापत्यवेद महमा ' नाम का अधिकारी बन रहा है । इसी के स्पष्टीकरण के लिए तो हमें इस लोक-महिमा का यशोगान करना पड़ रहा है । ऋतु, अत्र विषयसमन्वय की ओर ध्यान आकर्षित कीजिए । उक्त त्रैलोक्यविज्ञान के आधार पर एक नवीन रहस्य यह निकाला कि, ' वेद ' त्रिवृत् हुआ करता है । त्रिवृत् का अर्थ है ' नवसंख्या ' ( ६ ) । तीन महाव्याहृतियों के तीन वेद, प्रत्येक में तीन तीन वेदों का उपभंग फलतः तीन के ६ वेद हो जाते हैं । इस नववेदसमष्टि को ही ' त्रिवृद्वेद ' कहा जायगा, एवं इसे ही ‘ विश्ववेद ' किवा ' प्राजापत्यवेद, माना जायगा, जैसा कि निम्नलिखित परिलेखों से स्पष्ट है ।

पृष्ठ 203

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भाष्यभूमिका त्रिवृद्वदपरिलेखाः- ( त्रैलोक्यत्रिलोकी वितानपरिचयात्मकाः ) । म् सत्यानिविवर्त नारायणानिविवत्तम् वेब वामाग्नि पलित r ** १ – ब्रह्म निःश्वसितवेदात्मिका संयती त्रिलोकी - ' ब्राह्मो " - ( ब्रह्माक्षरानुगृहीतां ) । १ -- स्वयम्भूः —— { ब्रह्माक्षरानुगृहीतः — लोकः —- { ऋक् ( स्वः ) ] २ – मध्याः इन्द्राविष्ण्वरानु ० - अन्तरिक्षलोक: २ यजुः ( भुव ) | २ ' स्वः " -'ऋक् " ३ - सम: हमपरमेष्ठी / ग्रग्नीषोमाक्षरानु ० -- पृथिवीलोकः - ) साम ( भूः ) ( ब्रह्मनिः श्वसितवेदः ) २. – गायत्रीमानिकवेदात्मिका क्रन्दसी त्रिलोकी " वैष्णवी " – ( इन्द्राविष्णवक्षरानुगृहीता ) । १ - परमेष्ठ - - वानरानुग्रहीत: - लोकः २ ऋक् ( स्वः ) २ — मध्यस्थभावाः २ इन्द्राविष्यवक्षरा ० - अन्त०--० - २ यजुः ( भुवः ) ३ – समहिमसूय्र्यः २ श्रग्नीषोमाक्षरानु ० - पृथिवी ० १ साम ( भूः ) २ २ २ “ भुवः ” - ' यजुः ' ( गायत्रीमात्रि कवेदः ) ३ – यज्ञमात्रिकवेदात्मिका रोदसी त्रिलोकी “ शैवी " - ( अग्नीषोमाक्षरानुगृहीता ) १ — र्य्यः —— २ ब्रह्माक्षरानुगृहीतः - द्युलोकः २ ऋकू ( स्वः ) ] २ — मध्यस्थभावाः { इन्द्राविष्णवक्षरा ० - अन्त ० - २ यजुः ( भुवः ) । ३ - सम हिमभूपिण्डः २ अग्नीषोमाक्षरा ० -- पृथिवी ० १ साम ( भूः ) ३ “ भूः ” - “ साम ” " " " साम ' ( यशमात्रिक वेदः ) १६४

पृष्ठ 204

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– स्वः प्रक् -यौः - स्वयम्भः ) १ ( १ ) ब्रह्मनिःश्वसितवेदः ( । ) - क्रक् स्वः-( संयती -1 — द्यौः परमेष्ठी १ -* - स्वः ऋक - भुवः यजुः ० -श्रन्त ० -मध्य २ -) ( ४ २ ७ - भ ः साम ० – - पृ ० सूर्य्य - स ) ३ ( ५ विष्णुः ) जोक्यत्रिलोकी सैपात्र ( ) वेद मात्रिक गायत्री ( ) । - यजुः - भुवः ( क्रन्दसी २ - स्वः ऋक् ---द्यौः —-सूर्य्यः १ -* वः - भु यजुः ० -श्रन्त - -० -- मध्य २ ) ६ ( - भः साम ० — पृथि भ पिण्डः स ० ३ -) ( ७ ३ -: शिव दः यज्ञमात्रिक ( ) - साम भू ( रोदसी { विश्वम् मद्दा तदिदं वः - भः - भु साम - यजुः ० -अन्तः ० पृथि ब्रह्मा ० -परमेष्ठी मध्यस्थ स ० २- ३ -) ) ( २ ३( १५८— यदपस्नुधेथाम् विष्णू इन्द्रश्च " ". वेदा त्रिवृतो इमे वा त्रयो " ” लोकाः त्रिवृतो इमे वा त्रयो " ” वितदैरयेथाम् सहस्र त्रेधा स क्रमः परमाकाशमूर्त्तिः समुद्रमूर्त्तिः इलानंदमूर्त्तिः द्वितीयखण्ड

पृष्ठ 205

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भाष्यभूमिका उक्त तीनों त्रिलोकियों में से तीसरी सर्वान्त की ' र. दसीत्रिलोकी ' की ओर ही पाटकों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करना है I । मध्यत्रिलोकी के अधिष्ठाता ' नारायणा ग्न ' से रोदसीत्रिलोकी के अधिष्ठाता पलितत्रामाग्नि ( पार्थिव अन्नादाग्नि ) का ग्राविर्भाव बतलाया गया है । जैसा कि, पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है, मही, सागराम्बरा, यज्ञिया, भेद से केवल गेदसीत्रिलोकीरूपा इस महापृथिवी ववर्त में भी उन सब विश्व -भावों का अन्तर्भाव हो रहा है, जैसा कि निम्नलिखित परिलेखों से स्पष्ट है— त्रिष्टछेदपरिलेखा: – ( रोदसी त्रैलोक्यवितानपरिचयात्मकाः ) । म् पार्थिवाग्निविवत्त ' म् नविवत्त अन्तरिक्ष्य ' म् विवर्त ग्न दिव्या १ – ब्रह्मनिःश्वसितवेदात्मिका संयती त्रिलोकी पार्थिवी " ब्राह्मी " ( ब्रह्माक्षरानुगृहीता ) । १-४८ - स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी – ब्रह्माक्षरानुगृहीतः - द्युलोकः -- ऋक् ( स्वः ) १ { " स्त्र: ” -" ऋक् " * २-३३ – स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी - इन्द्राविष्वक्षरा ० --अन्तरिक्ष लोकः ( यजुः ( भुवः ) १ ३-१२ - स्तोमावच्छिन्नो भूपिण्डः - श्रग्नीषोमाक्षरा ० -- पृथिवीलोक: - २ साम ( भूः ) | ( ब्रह्मनिः श्वेसित-वेदः ) २ - गायत्रीमात्रिकवेदात्मिका क्रन्दसी त्रिलोकी पार्थिवी “ वैष्णवी " ( इ - द्राविष्वक्षरानुगृहीता ) । १- ३३ - स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी - ब्रह्माक्षर । नुगृहीतः – लोक: - २ ऋक् ( स्व:) २-२१ - रतोमावच्छिन्ना पृथिवी - इन्द्रा विष्ण्वक्षरा ० - अन्त ० - २ यजुः ( भुत्रः ) | “ भुवः ’ - “ यजुः ” ३ - * - चित्यभूपिण्ड: - - श्रग्नीषोमाक्षरानु ० - पृथिवी ० / साम ( भूः. २ २ ( गायत्री मात्रिकवेदः ) ३– यज्ञमान्त्रिकवेदात्मिका रोदसी त्रिलोकी पार्थिवी " शैर्व ” ( अग्नीषोमाक्षरानुगृहीता ) । १–२१ –- तोमावच्छिन्ना पृथिवी - ब्रह्माक्षरानुगृर्हतः - श्रादित्यप्रधानःद्य लोकः ऋक् ( स्व:) ४२ - १५ - स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी - इन्द्र विष्ण्वक्षरानु ० - वायुप्रधानः - श्रन्त ० - यजुः ( भुवः ) ३ - ६ - स्तोमावच्छिन्नो भूपिण्डः श्रग्नीषे माचरा ० -- अग्निप्रधानः - पु ० - साम ( भूः ) ३ " साम'-( यज्ञमात्रिक ' वेदः ) ( I

पृष्ठ 206

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स्वः भुवः -भूः - ऋक् - यजुः ० - साम - द्यौः त ० -- —-पृथि तोमः ब्रह्मा श्रष्टाचत्वारिशस्तोमः - त्रयस्त्रिंशत् एकविंशरमः ---१ - २ – ३ ) ) ) ( १ ( २ ( ३ ' प्रथिवी ' मही २ स्वः ऋक् — द्यौः -त्रयस्त्रिशस्तोमः १ -* ) त्रिलोकी पार्थिवी सैषा ( १७२ * " वेदाश्च , लोकाः त्रिवृतो इमे वा ह त्रयो " , इयमका । पृथिव्यः इमाः वा तिले “ ) २१ | ३ | १ | ५ ० शत ( " पर द्वेऽस्याः २ भुवः - ु - भूः यजुः साम ० - ० -श्रन्त - पृथि मः. --एकविंशस्त भूपिण्डः २ ३- ) )( ४ ५ ( विष्णुः ' - द्यौः— स्तोमः , एकविंश ' सागरचरापृथिवी - १ २ * स्वः क वः - भु -: यजुः ॰ -ग्रन्त -- पञ्चदशस्तोमः २ ) ( ६ ३ - भूः सामः - पृथि०- रुद्रः - त्रिवृत्स्तोमः ) ३ ७ ( विश्वम् पर्थिवं तदिदं द्वितीयखण्ड छन्दोमायज्ञमूर्त्तिः गोसवयज्ञमूर्त्तिः यज्ञमूर्त्तिः सम्वत्सर

पृष्ठ 207

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भाष्यभूमिका न केवल पृथिवी में ही, अपितु पृथिवीगर्भ, तथा पृथिवीपृष्ठ पर रहने वाले छोटे, बड़े, जड़, चेतन, सच पार्थिव पदार्थों में ( प्रत्येक में ) ठीक यही त्रैलोक्य- त्रलोकीरूप सस्था विभाग प्रतिष्ठित है । यही अदः ( उस की ), और इदं ( इस ) की पूर्णता है । जैसा वह है, वैसा सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण पदार्थं हैं । व्यापक का अशा श व्यापक धम्मों से आक्रान्त है । किसी भी एक पदार्थ का पूरा - पूरा रहस्य जान लीजि, सत्र कुछ विज्ञात है । शोपासना से शो की उपासना गतार्थ है । भौतिक उपासना या धदैविक उपासना का द्वार है, जैसा कि ' गीताविज्ञान भाष्यभूमिकान्तर्गत ' - ' भक्तियोगपरं क्षा ' नामक तृतीय खण्ड के ' विराडुपासना ' नाम के अवान्तर प्रकरण में विस्तार से निरूपित है । इसी पूर्ण विज्ञान को लक्ष्य में रख कर वेटपुष्ष ने कहा है - " एकेन विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं भवत, ब्रह्म वेदं सर्वम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किन ” । ६- अग्निश्रताः इस त्रैलोक्यत्रिलोकीरूपा पार्थिव संस्था में सर्वान्त की जो पार्थिवसंस्था है, एकमात्र उसी के साथ ' अग्निभ्रातरः ' का सम्बन्ध है । पूर्वश्रुति ने जिस प्रजापति से भूरादि पञ्चाक्षरों का, एवं पञ्चाक्षरों के द्वारा पृथिव्यादि तीन लोकों का उद्गम बतलाया है, वह प्रजापति इन तीनों अग्निभ्राता का आधारभूत पार्थिव अन्नादाग्नि ही है । इसका भूभागरूप पृथिवीलोक त्रिवृत्स्तोम है, भुवः भागरूप अन्तरिक्षलोक पञ्चदशस्तोम है, एवं स्वर्भागरूप द्युलोक एकविंशस्तोम है । एकविंश - अहर्गणावलिन्ना स्तौम्पत्रिलोकी ही इस प्रजापति का व्या. ' तस्थान है । इसीमें इस एक के ' अग्नि- वायु- श्रादित्य ' नामक तीन रूप प्रतिष्ठित हैं । श्रग्निरूप पार्थिव है, वायुरूप अन्तरिक्ष्य है, एवं श्रादित्यरूप दिव्य है । इन तानों रूपों में ग्नरूप ' भूप ' ते ' नाम का कनिष्ठ भ्राता है । भूपिएडगर्भावस्थित भूपिण्डयुक्त त्रिवृन् स्तोमावाच्छिन्न अग्नि ही भूपति ' है । वायुरूप ' भुवनपत ' नामक मध्यम भ्राता है । पार्थिव जड़ - चेतन - प्रजाशरीरों के गर्भ में व्याप्त रहने वाल । श्रान्तरिक्ष्य अग्नि ही ' भुवनपति ' है । श्रादित्यरूप ' भूतानांपतिः ' नामक ज्येष्ठभ्राता है । यही संवत्सर की अन्तिम सीमा हैं, अतएव - ' अथ यो भूतानांप तः सम्वत्सरः सः, ” इत्यादि रूप से इसे ' सम्वत्सर ' कह दिया जाता है । यह संवत्सरलक्षण दिव्याग्नि वही भूतानां पतिः - है, जिसके प्रवर्ग्य भाग से भूपति के गर्भ में कुमाराग्नि उत्पन्न होता है # । १०- अग्निवंश की सपिण्डता प्रसङ्गोपात्त अग्निवंश का भी समन्वय कर लीजिये । सर्वमूलभूत सत्यलक्षण ब्रह्माग्नि, परमेष्ठिगर्भस्थ नारायणलक्षण देवाग्नि, पार्थिव अन्नादाग्नि, इन तीनों को क्रमशः पूर्व में ' पितामह - पिता - पुत्र ' * तद्यानि तानि भूतानि ऋतवस्ते । श्रथ यः स भूतानां पतिः सम्वत्सरः सः । अथ या सोषाः पत्नी, औषसी सा । तानीमानि भूतानि च, भतानां च पतिः सम्वत्सरऽउषसि रेतोऽसिञ्चन् स सम्वत्सरे कुमारोऽजायत ” । ६७२ - शत ० ६ | १ | ३ ||

पृष्ठ 208

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द्वितीयखण्ड स्थानीय बतलाया गया था । अत्र मापिण्डय की दृष्टि से समन्वय देखिए । ब्रह्माग्नि सर्वमूलभूत बनता हुआ गेकी सन्तानधारा के लिए वह ' बीजी ' है, जिसका सात धाराओं में वितान होता है । पिता को ही ' बीजी ' कहा गया है । अतएव इस म्वायम्भुव सत्यमूर्ति ब्रह्माग्नि को अवश्य ही ' पिता ' कहा जा सकता है, जैसा कि - " यो नः पिता जनिता ' इत्यादि वचन मे भी प्रमाणित है । पितृ स्थानीय इस ब्रह्माग्न से श्रापोमय समुद्र के गर्भ में सौर - नारायणमूर्ति देवाग्नि का विकास हुआ है । यही दूसरी ' पुत्र ' " धारा है । पुत्रस्थानीय इस देवाग्नि मे सौर हिरण्मयाण्ड के गर्भ में वाममूर्ति अन्नादाग्न का विकास हुआ है । यही तीसरी पात्र " धारा है । पौत्रस्थानीय अन्नादाग्निधरातल पर भू - भुवन - भूतपतिलक्षण पार्थिव त्रैलोक्यव्यापक ' मवत्सराग्नि ' का विकास हुआ है । यही चौथी ' प्रपौत्र ४ धारा है । प्रपौत्रस्थानीय सम्वत्मराग्नि के प्रवर्ग्यभूत श्राग्नेय रेत की पार्थिव उपायोनि में आहुति होती है । आहुत प्राजापत्य रेत एक सम्बत्मर में ' कुमाराग्नि ' रूप में परिणत हो जाता है । यही पाँचवीं " वृद्धप्रपोत्र " " धारा हैं । वृद्धप्रपौत्रम्थानीय कुमाराग्नि ग्रागे जाकर अष्टविध चित्राग्नि ' ' रूप में परिणत होता है, जो कि श्रष्टमर्ति चित्राग्नि चितित्राह्मणों में ' अमूर्त्तिशिव ' नाम से प्रसिद्ध है । यही छठी ' अतिवृद्धप्रपात्र " धारा है । चित्राग्नि से सर्वान्त में पुरुष - अश्व - गौ - अवि - ज ' - लक्षण " पाशुक अ ग्न " का विकास होता है । यहीं आकर प्रजापति कृतकृत्य होते हैं । यही सातवीं ' वृद्धातिवृद्धप्रपत्र ७ धारा है | यहाँ पर अग्निवंश समाप्त है । जिये सर्वसाधारण ' अग्नि ' कहते हैं, वह इन सातों से पृथक पाशुक अग्नि का विकृत रूप है, जिसका कि ऋग्वेद ने - " अग्नितं मन्ये अस्तं यं यन्ति धेनवः ” ( ऋक् सं ० ५.६११ | ) इत्यादिरूप से स्पष्टीकरण किया है । प्रमाणवादियों के परितोष के लिए सातों अग्निवंशों के समर्थक कुछ-एक वचन प्रकृत में उत कर देना समाचीन होगा-१ - ब्रह्माग्निः ( सत्याग्निः स्वायम्भुवः ) - “ पिता ” — १ - " मेमुळे त्रय्यै विद्यार्थी तेजरसं प्राबृहत् तेन ब्रह्म ब्रह्मा भवति " I कौ:: ब्रा ० ६।११ ) | २ - ' ब्रह्म ब्रह्माऽभवत् स्वयम् " ( तै ० प्रा ० ३ । १२ ॥ ३ । ) । ३ - " अग्निपैं ब्रह्मा " ( पड्शत्राः १ । १ । ) । ४ - " प्रजापति ब्रह्मा " ( गो ० ब्राः कु ० ५। ६ । ) । ५ - " अग्निब्रह्मा, अग्निर्यज्ञः " ( शत ३।२।२ । ७ । ) । ६– “ तस्यै वाचः सत्यमेत्र ब्रह्म " ( शत ० २ । १ । ४ । १० । ) । ७- “ सत्यं गु ” ( शत ० १४ | ३ | ५ | १ | ) । -X: X: X-१७३

पृष्ठ 209

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भाष्यभूमिका १ - देवाग्निः ( नारायणाग्निः - सौरः ) - " पुत्रः ” — १ - ' स यदस्य सर्वस्याग्रमसृज्यत तस्मादग्निः । श्रग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम् ” ( शत ० ६।१।९ ।१५ ) । २-- ' ' तद्वानमेतदग्रे देवानामजनयत, तस्मादग्नि " ( शत ० २२ । ४ ॥ ) । ३ - स ग्नमब्रवीत्, लं मे ज्येष्ठः पुत्राणामसि, त्वं प्रथमो वृणीष्व इति " ( जै ० उ ० ब्रा ० ११५१ । ) । ४ - " पुरुषं ह वै नारायणं प्रजापतिरुवाच " - ( गो ० पू ० ५।१५ । ) । ५- “ पुरुषो ह नारायणः सर्वाणि भूतानि, इदं सर्वमभवत् ” ( शत ० १३।६।१।१।- ) । ६- " योऽयमेतह्यग्निः, स भीषा निलिल्ये । सोऽपः प्रदिदेश " | ( शत ० १२२ | ३ | १ । ) । ७- " कंस्विद्गर्भ दध आपः ” ( ऋक्सं ० ) -X: X: X: X-३- अन्नादाग्निः ( वामाग्निः - पार्थिवः ) - " पौत्रः ” १ - “ प्रजापतेर्या - अन्नादा तनूः - तदग्नः " ( ऐ ० ब्रा ० ५।२५ । ) । २– “ अग्निर्वै देवानामन्नादः ” ( ते ० ब्रा ० ३।१।४।१ । ) । ३ – “ अन्न दाऽग्निः ” ( शत ० २ | १ | ४ | २८ | ) | ४ - " इयं ( पृथिवी ) वा अनादी " ( कौ ० ब्रा ० २७ ५। ) । ५- " अन्नादो वा एषोऽन्नपतिर्यदग्निः " ( ऐ ० ब्रा ० १८। ) । ६- " अग्निरन्नादोऽन्नपतिः " ( हैं ० ० २।५।७।३ । ) । ७ – ' अस्य वामस्य पलितस्य होतुः " ( ऋक्सं ० १६।४।१ । ) । -: X: XX: X: -४- सम्वत्सराग्निः ( यज्ञाग्निः - ३३ देवतामयः, स्तौग्यत्रैलोक्ये व्याप्तः ) - ' प्रपौत्रः " -१ - यः स भूपानांपतिः सम्वत्सरः सः " ( शत ० ६ | १ | ३ | ८ । ) । २ - " स एष प्रजापतिरेव सम्वत्सरः " ( शत ० १।६।३।३५ । ) । ३- “ सम्वत्सरो वै यज्ञः प्रजापतिः " ( शत ० १२२ ।५।१२ । ) । १७४

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 210 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयखण्ड ४ - ' अग्निर्वाध सम्वत्सरः " ( तै ० ब्रा ० २।४।१० । ) । ५ - " सम्बत्सरो वै देवानां जन्म " ( शत ० ८७।३।२१ । ) । ६- " सम्बत्सरः खलु देवानां पृ: " ( तै ० ब्रा ० १।७।७५ । ) । ७- " अग्निः ( सम्वत्सरः ) सर्वा देवता: " ( ऐ ० ना ० १ । १ । ) । —: XXXX: — ५ - कुमारानि: ( पार्थिवाद्भिः - सम्वत्सर रे नोरूपः ) - " वृद्वरपौत्रः " -१ - " तानीमानि भूतानि च भूतानां च पतिः - सम्वत्सरेऽउपसि रेताऽ सञ्चत् । सम्बत्सरे-कुमारोऽजायत । सोऽरोदात् । यदरोदोत् तस्मात् रुद्रः " ( शतः ६।१।३.८-१८ । ) । —X: X: X: X— ६ – श्वित्राग्निः ( पार्थिवाग्नि: - कुमाराग्निविवर्त्त भावाः ) – “ अतिबृद्वप्रपौत्रः ” — १– “ अनिर्वै रुद्रः ( १ ), श्राने वै सर्दः ( २ ), ओषधया वे पशुपति: ( ३ ), वायुर्वा उग्र: ( ४ ), विद्या शनिः ( ५ ), पर्जन्यो वै भव: ( ६ ), प्रजापति महान देवः ( ७ ), आदित्यो वा ईशानः ( ८ ) । तान्येतान्यष्वग्निरूणि । कुमारो नमः । संवग्नेस्त्रिवृत्ता । एतानि हि रूपाण्यनुप्रानग्नि कुमारमिव पश्यन्ति । एनान्येवास्य रूणि सोऽयं कुमारो रूपाण्यनुप्राविशत् । तस्य चितस्य नाम करोति । पाप्मानमेवास्य तदपहन्ति । ' चित्र ' नामानं करोति, चित्रोऽसीति । सर्वाणि हि चित्राण्यग्निः ” -X: X: X: X-( शत ० ६।१।३ । ) । ७- पाशुकाग्निः ( पार्थिवाङ्गिः- चित्रात्रेयौगिक भावाः पशुविधाः - " वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रः ' १ - प्रजापतः ( सम्वमर: ) अग्निरूपाण्यभ्यध्यायत । स योऽयं कुमारो रूपाण्यनुप्रविष्ट आसीत्, तमन्त्रैच्छत । सोऽग्निरवेत् अनु वै मा पिता प्रजापतिरिच्छति । हन्त तद्रूप -मसानि, यन्म एप न वेद, इति । स एतान् पञ्चपशून पश्यत् - पुरुषं, अश्वं, गां, अभिं, अजम् । यदश्श्यत्, तस्मादेते पशत्रः । स एतान् पञ्च पशून् प्राविशत् । स ऐक्षत-इमे वा अग्निः " ( शत ० ६ | २ | ४ | १-२-३-४- ) । - *: * I १७५