Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 211–220

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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भाष्यभूमिका पाशुकाग्निग्निवंश में सातवीं हैं । यदि इमे वृद्धातिवृद्ध प्रपौत्र स्थानीय माना जाता है, तत्र तो पूर्व-कथनानुसार सर्वमूलभूत ब्रह्माग्नि ' बिता ' ही रहता है । यदि पाशुकाग्नि को पुत्र ( प्रजापति का प्रजासर्ग ) -स्थानीय माना जाता है, तो उस दशा में ब्रह्माग्नि ' वृद्वातिवृद्वप्रपितामह ' स्थानीय वन जाता है । इन सात बंश में से सम्वत्सर लक्षण पार्थिव वसु, ग्रान्तरिक्ष्य रुद्र, दिव्य श्रादित्य मनुष्य तपितरों के पितामह भी मानें गए है *,, जिनका कि सुविशद वैज्ञानिक निरूपण ' श्राद्धविज्ञान ' नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ में देखना चाहिए । अग्निवंशपरिलेख: - ( सापिण्ड्यं सात गैरुपम् - सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते ) । ४ | १ - ब्रह्मारित: ( स्वायम्भुवः - ऋषिमूर्तिः ) * बीजी- पिता । ( वृद्धा तिवृद्ध पितामहः ) ६ - देवा ग्नः ( पारमेष्ठयसमुद्र प्रतिष्ठितः सौरः ) पुत्रः । ( अतिवृद्ध पितामहः ) पिण्डभाजः | ३ - अन्नादाग्निः ( पृथिवी - केन्द्रस्थः सन् पार्थिवसामपन्तं व्याप्तः ) । पौत्रः । ( वृद्ध-४ - सम्वत्सराग्निः ( सौम्यत्रिलक्यां व्याप्तः, अग्निवाश्वादित्यरूतः ) । प्रत्रः प्रपितामहः ) ( प्रपितामहः ) ५ – कुमाराग्निः ( भूगर्भम्थश्चित्यः ) वृद्धप्रपौत्रः ( पितामहः ) ३ लेपभाजः ६ - चित्राग्निः ( चित्यः, श्रोषधिवनस्पतयः ) श्रतिवृद्धप्रपौत्रः ( पिता ) शुकाग्निः पार्थिवप्राणिरूपः ) वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रः ( पुत्रः ) —x: x: x: x— ६ - व्याहृति, और पश्चाक्षर रहस्य-पाशुकाग्नि के प्रपितामह, एवं ब्रह्माग्नि के प्रपौत्र चौथे सम्वत्सराग्नि की ही गाथा प्रक्रान्त है, एवं इस गाथा का मूल नायक बना हुआ है, पाशुकाग्नि वा वृद्ध प्रपितामह, एवं ब्रह्माग्नि का पौत्र तीसरा अन्ना-दाग्नि, जो कि अन्नादाग्नि पाशुकाग्नि के प्रतिवृद्धप्रपितामह, तथा ब्रह्माग्नि के पुत्रस्थानीय, नारायण मूर्ति, हिरण्मय | एडल क्षण, परमेष्ठी - समुद्रगर्भित देवाग्नि का ही ( सौर अग्नि का ही ) प्रवर्ग्यभाग है । प्रवर्ग्यानक

* वसु रुद्रा - ऽदितिसुता पितरः श्राद्धदेवता: ।

प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितृ न् श्राद्धेन तर्पिताः ॥१ ॥

आयुः प्रजां धनं, विद्यां, स्वर्ग, मोक्षं, सुखानि च ।

प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ॥२ ॥

e' ( याज्ञवल्क्यस्मृति: आचाराध्यायः, २६६, २७० ) । १७६

पृष्ठ 212

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द्वितीयखण्ड इस अन्नादाग्नि से पाँच अक्षरों के आधार पर पृथिव्यादि तीन लोकों का विकास बतलाया गया है । जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है, प्रजापति ने ' भूः भुवः स्वः ' नामक अक्षरों का उच्चारण करते हुए ही इन तीनों लोकों को उत्पन्न किया है । यद्यपि सृष्टिक्रमानुसार पार्थिव - अन्नादाग्नि - लक्षण प्रजापति में ' अग्नि-सोम ' नामक दो अक्षरों की ही प्रधानता है । तथापि त्रिवृद्भाव के कारण इस एक पाथिव - स्तौम्यत्रिलोकी में भी पाँचों अक्षरो का भोग सिद्ध हो जाता है । ब्रह्माक्षर स्वतन्त्र बतलाया गया है । इस एक अक्षर से पार्थिक, एकविंशम्तोमावच्छिन्न, द्यु लोक का विकास हुआ है । इन्द्र - विष्णु, दोनों सयुक् हैं । इन दो अक्षरों से पञ्चदश ' ते मावच्छिन्न अन्तरिक्षलोक का विकास हुआ है । अग्नि - सोम, दोनों सयुक् हैं । इन दो अक्षरों से त्रिवृत्स्तोमार्गाच्छन्न पृथिवीलोक का विकास हुआ है । इन पाँच अक्षरों के अभिनय के लिए ही श्रुति ने ‘ भूः - भ वः - स्वः ' से तीनों का विकाम बतलाया है । शब्दाक्षग्द्वाग श्रुति तत्त्वाक्षरों की ओर ही हमारा ध्या श्राकर्षित कर रही है । इन तीन व्याहृतियों के स्वरात्मक पाँच अक्षर हो जाते हैं । ' भूः ' में - ‘ भू - उ - उ -: - ’ ये चार विभाग हैं । ' भुत्रः में ' म् उत्र् अ-: - ' ये पाँच विभाग हैं । एवं ' ' स्वः ' में ‘ स् - य् - अ -: - ' ये चार विभाग हैं । वर्णपरिभाषा के अनुसार सम्भूय वर्ण जहाँ १३ है, वहाँ - " स्वराऽक्षरं, सहाय व्यञ्जनैः ” इस प्रातिशाख्योक्त स्वरविज्ञान के अनुसार तीनों व्यहृतियों में स्वरात्मक अक्षर - उ ' - 3 - उ ' –अ * - N " इस क्रम से पाँच हीं मानें जायँगे । क्योंकि ब्रह्माक्षर एकाकी है, स्वतन्त्र है, अतएव तद्वाचक ' स्व: ' में एक ही स्वर ( अ ) है । यही ब्रह्माक्षर द्युलोक की प्रतिष्ठा बनता है । इन्द्र - विष्णु दोनों हैं पृथक् - पृथक् अक्षर । पग्न्तु दोनों साथ रहते है, दोनों का सहचरसम्बन्ध है । अतएव तद्वाचक ' भुवः ' में दो स्वतन्त्र स्वर ( उ - अ ) रक्खे गये हैं । यही द्वयक्षरमूर्त्ति इन्द्राविष्णु अन्तरिक्षलोक की प्रतिष्ठा बनते हैं । अग्नि - सोम, दोनों अक्षर भी इन्द्राविष्णु की भाँति सयुक् हैं । परन्तु इनके और उनके सायुज्य में अन्तर है । इन्द्राविष्णु का जहाँ सहचरलक्षण वहिर्य्याम सम्बन्ध है, वहाँ ग्रग्नि - सोम का ग्रन्धिबन्धन ( चिति ) लक्षण अन्तर्य्याम सम्बन्ध माना गया है । अग्नि से गृहीत सोम ग्निरूप में परिणत होता हुआ अपनी स्वतन्त्र सत्ता खो देता है, जैसाकि - ' त्ते वाख्यायते नाद्यम् ” ( शत ० १० | ६ | ३ | ११ ) इत्यादि बचन से स्पष्ट है । इसी अन्तर्य्याम सम्न्ध को व्यक्त करने के लिए ' भू: ' को अग्नि - सोम का वाचक माना गया है । ' उ ' भेद से अक्षर दो हैं, परन्तु दोनों मिलकर ' ऊ ' इस एकाक्षररूप में परिणत हो रहे हैं । द्वयक्षरगर्भित एकाक्षरमूर्ति यही अग्न - सोमाक्षर पृथिवीलोक की प्रतिष्ठा बनता है । कौन अक्षर किसका संग्राहक, है?, यह भी विचार कर लीजिए । ब्रह्माक्षर असङ्ग है, निर्लेप है । उधर वर्णसृष्टे में ‘ अकार ' निर्लेप माना गया है । अतएव प्रकार को ब्रह्मा का संग्राहक माना जायगा । इन्द्र -विष्णु, दोनों में विष्णु सोमवंशी बनता हुआ ससंग है, सलेप है । इन्द्र विकासधर्म्मा बनता हुआ सङ्ग है, निर्लेप है । अन्तरिक्ष में व्याप्त वायु में जितना सोमांश है, वह विष्णुसम्बन्धी है । एवं जितना प्राणांश है, वह इन्द्रानुत्रन्धी है | प्राण स्वयं श्रसंग है । इसी समानधर्म्म से अकार को इन्द्रका वाचक माना जायगा । वर्णसृष्टि में उकार संकोचलक्षण सखङ्गभाव का द्योतक है । उकारोच्चारण में दोनो श्रोष्ठपुट संकुचित हो जाते हैं । श्रतएव उकार विष्णु का वाचक माना जायगा । यद्यपि अग्नि श्रपने तेजोधर्म के कारण स्वस्वरूप से असंग है, परन्तु सोमसाहचर्य्य से यह ससङ्ग बन जाता है । फलतः ग्रग्नि - सोम दोनों संसग बने हुए हैं । समुङ्गभावद्योतक उकार ही इन दोनों का वाचक बना हुआ है । १७७

पृष्ठ 213

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भाष्यभूमिका तीनों व्याहृतियों की वर्णसंख्या का भी समन्वय कर लीजिए । सम्भूय १३ वर्ण हैं । अन्नादाग्निरूप पार्थिवप्रजापति के जगत् की व्याप्ति लोक पर्य्यन्त मानी गई है । पार्थिव अग्नि ( अग्नि ) गायत्र है, आन्तरिक्ष्य अग्नि ( वायु ) त्रैष्टुभ है, दिव्य अग्नि ( आदित्य ) जागत है । तीनों के साथ क्रमशः अष्टाक्षरा गायत्री, एकादशा-क्षरा त्रिष्टुपू, द्वादशाक्षरा जगती का समन्वय हो रहा है । सर्वान्त में द्वादशाक्षर जगतीछन्द की प्रतिष्ठा है । जगती छन्द के गर्भ में पार्थिव त्रिलोकीरूप पार्थिव जगत् प्रतिष्ठित है । जगतीछन्दोलक्षणा पृथिवी का यज्ञिगभाग यद्यपि द्वादशाक्षर जगतोछन्द से छन्दित श्रादित्यमय द्युलोक पर्य्यन्त ही है, परन्तु अभी इसके ऊपर त्राप्य लक्षण सागराम्बगभाग, प्राणलक्षण महीभाग और हैं । अतः केवल द्वादशाक्षर पर ही इसका अवसान नहीं किया जा सकता । यही आधिक्य सूचित करने के लिए जगती पृथिवी के वाचक वर्णों को १३ विभागों में विभक्त किया है । १२ वर्ण त्रैलोक्यात्मिका द्वादशाक्षरा जगती के सूचक हैं, एक अक्षर आधिक्यभाव का सूचक है । प्रकृत में वक्तव्यांश यही है कि, प्रजापति ने ' भूः भुवः स्वः ' रूप त्रयोदशवर्णात्मक, पञ्चाक्षरात्मक तत्त्वों से त्रैलोक्य - सृष्टि की । पञ्चाक्षरों से त्रैलोक्यसृष्टि कर पाँच अक्षरों से वसन्तादि पाँच ऋतुओं का विकास किया । पञ्चत्तु ' मूर्ति यही प्राजापत्याम्गि ' सम्वसरप्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी सृष्टिविज्ञान को लक्ष्य रहा है--में रखकर निम्नलिखित वाक्प्रपञ्च पाठकों के सम्मुख उपस्थित * — " द्वादशाक्षरा वै जगती " ( ऐ ० ना ० ३।१२ ) - " माम्नामादित्या देवतं, तदेव ज्योतिः, जागतं छन्दः, द्यौः स्थानम् " ( गो ० ब्रा ० पू ० ११२६। ) । – “ तदिदं सर्वं जगदस्थां, तेनेयं ( यज्ञिय । पृथिवी ) जगत् ' ( शत ० ११ = | २ | ११ | ) – “ इयं वै जगती, अस्यां हो सर्व जगत् ” ( शत ० ६ | २ | १ | २६ । ) । १७३

पृष्ठ 214

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द्वितीयखण्ड १– “ स्वः ” —स् - ब् - अ -ः—— ' स्वः ' ब्रह्मात्तरः, ततो द्युलोकविकासः । २- “ भुत्रः ” –भू - उ - व् - अ -: - ' भुवः ' - इन्द्रा विष्वक्षरौ, ततः - तरिक्ष लोकविकास. । ३- “ भूः ” —भू - उ -3 -: — ‘ भूः ' - श्रग्नीषोमाक्षरौ, सतः - पृथिवी – लोकविकासः । - XXXX-१ २ ३ ४ ५६७८६ १ २ ३ ४ १२३४ ५ १० ११ १२ १३ २ ३ ४ ‘ भू - उ —३ —:( भूः ) —- भू - उ - व् - श्र ( भुवः ) सू— व् - अ -: -- ( स्वः ' ) - त्रयोदश वर्णाः १ २ १ ४ ५ पादरा उ उ उ श्र श्र अग्निः सोमः विष्णुः इन्द्रः ब्रम r भूभुवः स्वः ( पृथिवी ) अन्तरिक्षम् 8 सैना - प्राजापत्य त्रिलोकी स्वौम्या PIE

पृष्ठ 215

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भाष्यभूमिका “ स सम्बत्सरे व्याजिहीर्षीत् । स ' भूः ' इति व्याहरत् सेयं ' पृथिवो ' अभवत् । ' भुत्र: ' इनि, तदिदं - ' अन्तरिक्ष ' मभवत् । ' स्वः ' इति, मानौ ' द्यौः अभवत् । तानि वा एतानि पञ्चाक्षराणि । तान् पञ्च न कुरुत । तऽ इम पञ्चत्तं वः । स एव ममान् लोकान् जातान् सम्बत्सरे प्रजापतिरभ्युदतिष्ठत् " । ( शत ० ब्रा ० ११।१।६।४–५– ) १२ - सर्वत्सर, और सम्वत्सर-पार्थिवन्नाग्नि के अमृत - लक्षण अक्षरमूर्ति ग्रग्नि - सोम के आधार पर प्रतिष्ठित मर्त्य - लक्षण क्षरमूर्त्ति अन्नाद अन्न के प्रवर्ग्य भागों के समन्वय से ही ' ऋतु ' का विकास हुआ है । चग्नि, प्रवर्ध सोन, दोनों ऋत हैं । दोनों ( ऋतसोम ऋताग्नि ) के समन्वय से उत्पन्न ऋतुएँ ' वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा - शरत्-* हेमन्तशिशिर ' इन पांच भावों में परिणत हो जाती हैं । ये ऋतुएँ अग्निमामनयी हैं, तन्मय सम्वत्र भी अग्नि- सोमात्मक ही है । इस सम्वत्सरप्रजापति के आगे जाकर ' दिति - अदिति भेद मे दो विवर्त हो जाते | सोप्राणानुगृहीता पृथिवी अदिति है, तदनुचन्धी सम्वत्सर अदितिरूप है, अदितिगर्भ में प्रतिष्ठित है । सौर प्रारणाननुगृहीता पृथिवी दिति है, तदनुत्रन्धी सम्वत्सर दितिरूप है । यदिति नम्बर सौर- ज्योति के सम्बन्ध से ज्योतिष्मान् है, दितिमम्वत्सर ज्योति के प्रभाव से तमः प्रवान है । ज्योतिष्मान् माम्वत्मरिक अग्नि ' देवदूत ' नाम से प्रसिद्ध है, तमोमय साम्क्त्सरिक अग्नि ' सहरक्षा ' नाम मे प्रसिद्ध है ( शत ० १०४ | १ | ३४ | ) | देवदूत अग्नि ज्योतिर्लक्षण ' प्राण ' है, यही पार्थिव अन्ना प्रजापति का ' ऊ गए ' है । सहरक्षा अग्नि तनोज क्षण ' अपान ' है, यही पार्थिव अन्नादप्रजापति का ' वाङमा ' है । ऊर्ध्वप्राणलक्षण ज्योतिर्मय प्रदितिरूप साम्वत्सरिक त्राग्नेय प्राण के अग्नि - वायु - आदित्य विवतों का ही नाम ' देवता ' है । श्रवाङ्गा गलक्षण, तमोमय, दितिरूप साम्वत्सरिक आग्नेय पान के वृत्रत्रलादि भावों का ही नाम ' असुर ' है । इन अदिति - डिंति-रूप दिव्य - त्रासुरप्राणाग्नियों के समन्वय से ही दिव्यासुरभावयुक्त पार्थिव जड़चेतन पदार्थ 1 पाशुकाग्निमय ) उत्पन्न हुए हैं । इस प्रकार वह अन्नादाग्नि प्रजापति क्रमशः अपने ग्रग्निमोम - भावों को मूलद्वार बनाता हुआ त्रैलोक्य, पञ्चत्तु ', ज्योति, तम, देवता, असुर, पार्थिवप्रजा आदि भावों में परेत होता हुआ अपनी अग्नि-सोम मात्राका उपादानरूप से इन पार्थिव प्रपञ्चों के निर्माण में व्यय करता हुआ ' मत्सर ' बन रहा है । इसी सर्वरभाव से यह ' सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध है । ग्रहः ग्रग्निप्रधान तत्व है, रात्रि समाधान -तत्त्व है | इन दोनों तत्त्वों के परिप्तओं का ही नाम तचालक सम्वत्सर है, जैसा कि आगे स्पष्ट होने वाला । इसी साम्वत्सरिक सृष्टिविज्ञान को लदा में रख कर चुकी है -( १ ) — " सोऽञ्छाम्यंश्च चार प्रजाकामः । स आत्मन्येव प्रजातिमधत्त । स आस्ये-नैत्रदेव सृजत । ते देवा दिवमभिपद्या सृज्यन्त । तद्देवानां देवच्वं यद्दिवमभिपद्यामृज्यन्त । तम्मै सतृानाय दिवेवास । तद्वदेव देवानां देवत्वं, यदस्मै ससृजानाय दिवेवास । अथ योऽयमत्राङ्प्राणः, तेनासुरान सृजत । * " हेमन्तशिशिरयोः समासेन? | ( श्रुतिः ) १८०

पृष्ठ 216

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द्वितीयखण्ड तऽइमामेव ( दितिं ) पृथिवीमभिपद्या सृज्यन्त 1 तस्मै ससृजानाय तम इवास । सोऽोत् पाप्मानं वाऽप्रक्षि, यस्मै मे सजानाय तम इवाभून् - इति तांस्तत एव पाप्मनाविध्यत् । तत एव पराभवन् ” । ( शत ० ११।१२।६।७ - ३-६ )! ( २ ) - " सयद स्मं देवान्त्ससृजानाय दिवेवास, तत् - ' ग्रहः ' यदस्माऽसुरान्त्स सृजानाय तम इदास, तां ' रात्रिं कुरुत अकुरुत । अथ । तेऽअहोरात्रे " । ( शत ० १ ९ | १ | ६ | ११ । ); । ( ३ ) – “ स ऐन्नत प्रजापतिः - सर्व वाऽअत्सारिपं य इमा देवता असृक्षीति, स सर्वत्सरोऽभवत् । सर्वत्सरो ह वै नामैतत् यत् ' सम्वत्सर ' इति । स यो हैवमेतत् सम्वत्सरस्य सर्वत्सरत्वं वेद, यो हैनं पाप्मा मायया त्सरति, न हैनं सो ऽभिभवति । अथ यमभिचरति, अभि हेवेन भवति य एवमेतत् सम्वत्सरस्य सवत्सरत्वं वंद " । ( ११ । १ । ६ । १२ । ) । * १-२-३ संख्यात्रों की श्रुतियों का अक्षरार्थं पृष्ठ सं ० १ ४ में प्रतिपादित है | सम्वत्सर प्रजापति का जो स्वरूप अत्र तक बतलाया गया है, वह तटस्थ लक्षण से ही प्रधान सम्बन्ध रखता है । अत्र इसके स्वरूपनन्ना का विचार श्रारम्भ होता है । सर्वसाधारण का यह प्रत्यय है कि, जिसके दिन - रात - शुक्ल - कृष्ण - पक्ष- द्वादश माम - षट् ऋतुएँ -उर - दक्षिणायन यादि पर्व है, वही ' वर्ष ' नाम से प्रसिद्ध सम्वत्सर है । सर्वसाधारण की इस मान्यता का विरोध तो इ लिए नहीं किया जा सकता कि, श्रा विज्ञान ने चक्रात्मक सम्बत्मारूप मे कातरूप ( वर्ष रूप ) सम्वत्सर की भी ' भाति ' स्वीकार की है । इसी दृष्टि से सम्वत्सर को हम ' चक्रत्मक - अध्यात्मक ' अग्नीषोमात्मक ) भेद से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं । इनमें चक्रात्मक सम्वत्सर विशुद्ध भातिसिद्ध पदार्थ है । जिन्हें हम अपने व्यवहारकाण्ड में दिन - रात - पक्ष-मास - ऋतु - अयन वर्ष कहते हैं वे सब केवल भातिसिद्ध हैं, सत्तामिद्ध नहीं । २४ घन्टे का अहोरात्र होता है, १५ दिन का पत्र, ३० दिन का माम, १२ माम का वर्ष, ये सब विभिन्न प्रतीतियाँ मात्र हैं । दूसरा अग्न्यात्मक सम्वत्भर घिशुद्ध मत्तामिद्ध पदार्थ है, जिसका कि पूर्वप्रकरण में निरूपण हुआ है । इस सतासिद्ध सम्वत्सर के भी ग्रहोरात्रा? पत्र हैं । परन्तु ये ग्रहोरात्रादि तत्त्वात्मक हैं । ग्रहः अग्नितत्त्व है, रात्रि सोमतत्त्व है । जितने समय में रूप अग्नि का गत्रिरूप गेम का भोग होता है, वह समय भी गौणविधि से: रात्रि नाम मे व्यवहृत होने लग गया है । ताल यड़ो हुआ कि, ग्रहः - रात्रि - मास - पक्ष - सम्वत्सर आदि शब्दों की मुख्य व्याप्ति तत्त्वरूप मतामिद्ध अहोरात्रादि मे सम्बन्ध रखती है । ये ही शब्द आगे जाकर व्यवहार-मात्रा में गोगारूप मे ' काल ' वाचक भी बन गये हैं । एवं इसी कालदृष्टि से कालात्मक भातिसिद्ध सम्वत्सर का व्यवहार प्रचलित हो गया है । १८१

पृष्ठ 217

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भाष्यभूमिका प्रजापति का सामान्य लक्षण है - ' आत्मा पशुसमणिः प्रजापतिः । श्रत्मा पद है, प्राणमण्डल पुन: पद है | प्राण- ग्रात्मगर्भित यच्चयावत् वस्तुभाव पशु हैं । पद उक्थ है, पुनःपद अर्क है, पशु अर्श।ति है । सूर्य्यचित्र पदलक्षण श्रात्मा है, अर्क ( रश्मि ) रूप अग्निमण्डल ( मण्डलात्मक अग्नि ) पुनः पदलक्षण प्राण हैं, एवं अन्तरालवर्त्ती भाव ग्रशीति ( अन्न ) लक्षण पशु हैं । भूपिण्ड पढलक्षण ग्रात्मा है, पार्थिव श्रग्नि-मण्डल पुनःपदलक्षण प्राण है, मध्यस्थभाव अशीतिलक्षण पशु हैं । सौग्संस्था अग्न्यात्मक सोरसम्वत्सर-प्रजापति है, पार्थिव संस्था अग्न्यात्मक पार्थिवसम्वत्मरप्रजापति है । मध्यस्था चान्द्रसंस्था सोमात्मक चान्द्रसम्वत्सर प्रजापति है । तीनों का परस्पर अतिमानसम्बन्ध है । इसी आधार पर प्रकरणारम्भ में हमने ' सम्वत्सर ' शब्द की इन तीनों प्रजापतियों का संग्राहक मानते हुए ही प्रकृत प्रकरण की ' प्राजापत्यवेदमहिमा ' का उपक्रम किया है । महाकालमष्टिरूप भातिभाव पदलक्षण आत्मा है, भातिलक्षण कालमण्डल पुनः पदलक्षण प्राण है. एवं कालावयवरूप ग्रहः ज्ञादि शांतिल क्षण पशु है । इस परिभाषा के अनुसार महाकालरूप चक्रा-त्मक सम्वत्सर, तथा ग्रग्न्यात्मक सम्वत्सर, दोनों का हा प्रजापतित्व सिद्ध हो जाता हैं । ग्रग्न्यात्मक सभ्वत्सर त्रेधा विभक्त है, अतएव तदनुबन्धी चक्रात्मक सम्वत्सर की भी तीन ही संस्था हो जाती हैं । दोनों सम्वत्सरों को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें प्राजापत्य वेदमहिमा का विवार करना है । प्रजापति अमृतमृत्युनय माने गर हैं । इस दृष्टि से अग्न्यात्मक तथा चक्रात्मक, दोन । सम्वत्सरी, के दादा भेद हो जाते हैं । श्रवयवशून्य, समाष्टलक्षण अग्न्यात्मक सम्वत्सर अमृतलक्षण ग्रग्न्यात्मक सम्वत्सर है । एवं श्रवयवयुक्त, खण्ड - खण्ड - लक्षण व्यष्टयात्मक अग्निसम्वत्सर मृत्युलक्षण है । अमृतसम्वत्सर अविनाशा है, मर्त्यसम्व सर परिवर्तनशील है, विपारेणामी है । एवमेव खण्डकालात्मक, महाकाल वरूप चक्रसम्वत्सर अमृतप्रधान है, एवं युग- सम्वत्सर - अयन - मासादि लण्डभावरूप, खण्डकालात्मक चक्र सम्वत्सर मृत्युप्रधान है । अमृतमृत्युमय ग्रग्निसम्वत्सर, एवं श्रमृतमृत्युमय चक्रसम्वत्सर दोनों समतुलित हैं । जैसा, जो कुछ भाग अग्यात्मक सम्वत्सर में हैं, ठीक वैसा वही अवयवविभाग चक्रात्मक संवत्सर में है । इस समान मर्य्यादा का परिणाम यह हुआ है कि, समय ( काल ) और तदवच्छिन्न बस्तुतत्त्व ( श्रग्नि ) दोनों के लिए लोक में अभेद व्यवहार प्रचलित हो गया है । ' समय में समय पर वस्तु उत्पन्न होती है, इसक साथ साथ ' समय ही सबका उत्पादक है ' यह व्यवहार भी देखा गया है । ' काजः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ' इत्यादि श्रुति भी इसी व्यवहार का समर्थन कर रही है । परन्तु पदार्थविद्या का विचार करते हुए हमें यह विवेक कर लेना चाहिए कि, पदार्थों का उपादान - द्रव्य सदा श्रग्न्यात्मक संवत्सर ही बना करता है, जो कि व्यवहार सौकर्य के लिए कालात्मक सम्वत्सर के द्वारा अभिनय में आता है । क्रान्तिवृत्त भूपरिभ्रमणवृत है । क्रान्तिवृत्त के मध्य में बृहतीछन्दो नामक विष्वद्वृत पर सूर्य्यं प्रतिष्ठित है । इस पार्थित्र परिभ्रमणमण्डल का ही नाम ' चात्मक ' ( काज्ञात्मक ) संवत्सर है । एवं इस क्रान्तिवृत्ता-वच्छिन्न मण्डल में व्याप्त तत्व ही अग्न्यात्मक सम्वत्सर है । इस संवत्सराग्नि का भोग कालात्मक संवत्सर में ही होता है । का तात्नक संवत्सरचक्र के १ - युग, २- मंत्रत्सर, ३ - श्रयन, ४- मास, ५- पक्ष, ६ - अहोरात्र, ७- मुहूर्त, सातव होते हैं, वहाँ अग्न्यालक संवत् के भा ' सप्त पुत्रासो अदितेय जातास्तन्वॅ सार ' के अनुसार सात ही विवर्त मान गर हैं । १८२

पृष्ठ 218

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द्वितीयखण्ड अग्न्यात्मक ‘ संवत्सर ' स्व मात्रा को प्रजासर्गवितान में व्यय करने से ' संवत्सर ' कहलाया है, जैसाकि— ' सर्व ' वा अत्मारियं सर्वत्सरं ह वै सम्वत्सरमित्याचक्षते परोक्षेण ' इत्यादि रूप मे पूर्व में बतलाया जा चुका है । इधर चक्रात्मक संवत्सर किसी अन्य दृष्टि मे संवत्सर कहलाया है । भातिसिद्ध इस कालात्मक संवत्मर में - ' सर्ग वा अत्सारिपम् ' इस निर्वचन का सम्बन्ध नहीं बैठता । श्रतएव इसका निर्वचन होगा- ' सर्वतः त्सरन् - गच्छति - तस्मात् सर्वत्सरम् । सर्वत्सरं ह वै सम्वत्सरमित्याक्षते परोक्षेण ' | जिस चक्रात्मक क्रान्ति-वृत्त पर भूपिण्ड परिक्रमा लगाना है, वह क्रान्तिवृत वास्तव में सर्वत्र है । न केवल क्रान्तिवृत्त ही, पेतु संसार के वृत्तमात्र ही सर्वत्सर है । बिन्दुमात्र की कुटिलता मे ही ' वृत्त ' भाव का उदय होता है । किसी वृत्त को सामने रख कर उसकी वत्तु ' लता का विचार कीजिए । आप देखेंगे कि वृत्त की जितनी भी बिन्दुएँ ( ' वाइन्ट ) हैं, प्रत्येक ऋजुमार्ग ( सीधा मार्ग ) का ग्राश्रय न लेकर मग्गति ( छद्मगति - कुटिलगत ) का ग्राश्रय लिए हुए है । इसी छद्मता सेतु के वत्त ' लभाव का उदय हुआ है । भूपिगड एक बिन्दु मे चला । जिम बिन्दु से भूपिण्ड चला, ( एकदम सीधे ) मार्ग की ओर जाना चाहिए था । परन्तु उपे उस प्रदेश मे सर्वथा ऋजु ऐसा नहीं होता । मध्यस्थ सौरइन्द्रात्मक * यज्ञाकर्षण मे भूपिण्ड को वक्रगति का ही आश्रय लेना पड़ता है । जहाँ से भूपिण्ड वक बना, वहाँ मे सीधा न जाकर पुनः वक्र हो जाता है । इस प्रकार ग्रंथ से इति पर्यन्त सम्पूर्ण वृत्तवकगति मे युक्त हो रहा है । इस सर्वतः सर भाव ( ' त्सर ' छद्मगतौ ) से ही पार्थिव परिभ्रमणमण्डल बत्तुल बन रहा है, जैसा के मध्यस्थ परिलेखों से स्पष्ट है— निर्दिष्ट सम्वत्सरत्रयीपरिलेग्वों में पाठक देखेंगे कि, सौरसम्वत्सर विशुद्ध ज्योतिर्मय है । इसमें तमोमय श्रासुर प्राण का प्रभाव है । ग्रासुर प्राण का उद्गम केवल पार्थिव सम्वत्सर में ही होता है । जिस पार्थिव प्राण को प्रजापति का प्रवाङ् प्राण ( अपान प्राण ) बताया है, वही दितिष्ट श्रेवी में प्रतिष्ठित रहता हुआ श्मासुर प्राण का प्रवर्त्तक बनता है, जैग किया आए:, तेनासुरान नृजत त इमानेव पृथिव-मभिपवासृज्यन्त तम्मै मत गनाय तम इवान " ( शत ० ११ १६ ३ ) इत्यादि पूर्व श्रुति में स्पष्ट किया बा चुका है । इस आसुर प्राण का सत्र मे बड़ा यह है कि, इसे न तो सौर ज्योतिर्म्मय सम्वत्सर मण्डल में ही प्रवेश करने का अधिकार मिलत ', एवं न यह अदितिमण्डलात्मक पार्थिव सम्वत्सर में हीं प्रवेश पा सकता । बही लक्ष्य में रख कर कहा गया है " तान् प्रजापतिः पाप्ननाविध्यत् । ते तत एव पराभवन् ' ( शत ० १ १ | १ | ३ | ६ | ) | श्रुतियों में जहाँ देवासुर की प्रतिस्पर्द्धा का वर्णन आता है, उसका एकमात्र पार्थिव सम्वत्परमण्डल से ही सम्बन्ध है । पार्थिव सम्वत्सर में हीं अहोरात्र विभाग है, यहीं प्रदिति- दितिमूलक ज्योतिस्तमोलक्षण देवासुरों का साम्राज्य है । सौर मत्रवेन्द्र के साथ ता श्रासुर प्राण की स्पद्वां हो ही नही सकती । कारण वह सम का आत्यन्तिक प्रभाव है । व तुतस्तु पार्थ सम्वत्सर में भी ग्रासुर प्राण का समावेश एक प्रकार से अवरुद्ध ही है । हाँ पृथिवी के घूमने से यहाँ देवासुर में प्रतिस्पर्द्धा अवश्य ही होती रहती है । इसी प्राकृतिक * या इन्द्रमवर्द्धयत, यद्भूमिं व्यवत्त यत् । चक्र । ओपशं दिवि । ( ऋक्सं ०८।१४।५ । ) । १८३

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भूमिका स्थिति को लक्ष्य में रख कर ( सौरंसम्वत्सरावच्छिन्न मघवा नामक दिव्येन्द्र की अपेक्षा से ) श्रुति ने कहा कहा है-तस्मादेतद् ऋषिणाभ्यनूक -न त्वं युयुत्से कतमच्चनाहर्न तेऽमित्रो मघवन् कन्चनास्ति । मादत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाय शत्रु ं न पुरा युयुत्से - इति ॥ ( शत ० ११ १२६ | १० | ) । पाटकों को स्मरण होगा कि सम्वत्सर प्रकरण का आरम्भ करते हुए हमनें सम्वत्सराग्नि के ' वाम -मध्यम - घृतपृष्ठ ' नामक तीन विवर्त बतलाए थे । इसके अनन्तर अग्नितत्त्व के मूलान्वेषण के प्रसङ्ग में हमें स्वायम्भुवाग्निसम्बन्धी सृष्टप्रक्रियाया का दिग्दर्शन कराना पड़ा । स्वायम्भुवाग्नि- सम्बन्ध से तदनुत्रन्धी वेदविवर्तो का स्वरूप वतलाना पड़ा । श्रागे जाकर प्रसङ्गक्श ' मण्डूक - वेतस - श्रवका ' के तात्त्विक स्वरूप का विवेचन करना पड़ा । तत्पश्चात् प्रारम्भ में प्रतिज्ञात वामादि तीन साम्वत्सरिक अग्नियों का ' अग्निभ्रातरः ' रूप से सिंहावलोकन हुआ । ' श्रग्निभ्रातरः ' के स्वरूप प्रसङ्ग से प्राजापत्य व्याहृतियों का निरूपण करते हुए सवन्त में पूर्वोक्त रग्वत्प्रजापति पर चाकर पुनः उन्ही ' अग्निभ्राताश्रों ' की ओर पाटकों का ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता प्रतीत हुई । प्रकृत प्रकरण का मुख्य उद्देश्य है - ' प्राजापत्यवेदमहिमा ' स्वरूप दिग्दर्शन । इस वेदमहिमा का ‘ अहो-रात्र ' से सम्बन्ध रखने वाले बृहतीम वों से सम्बन्ध है । उधर अहोरात्रलक्षण प्रजापति एकमात्र ' पार्थिवसम्वत्सर ' प्रजापति ही है । श्रतएव इस प्रकरण में प्रजापति शब्द से उस सम्वत्सरप्रजापति का ही ग्रहण किया जायगा, जिसकी मूलप्रतिष्ठा भूकेन्द्रस्थ अन्नादाग्नि है, जो कि अन्नादाग्नि नामक सौर अग्नि का प्रवयश है । सम्पूर्ण सम्वत्सरजापते के त्रिर् पञ्चदश- एकत्रिंश भेद से तीन पर्व हैं । तीनों पर्वो में क्रमशः श्रग्निवायु आदित्य प्रतिष्ठित हैं । तीनों से क्रमशः ऋकू - यजुः साम वेदों का प्रादुर्भाव हुआ है । इनमें ऋग्वेद छन्दोवेद है, यजुर्वेद वेद है, सामवेद वितानवेद है । छन्दोवितान रसलक्षणा यह देवतामयी त्रयीविद्या ही स्वकर्म के द्वारा पार्थिवयज्ञ की प्रतिष्ठा बनी हुई है । इसी पार्थिव यज्ञ के सम्बन्ध से इस पार्थिव साम्वत्सरिक वेद को ' यज्ञमानिकवेद ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । यही प्राजा पत्यवेद है, जिसकी कि महिमा प्रकृत में मीमांस्य है । भूपृष्ठ से आरम्भ कर २१ स्तोम पर्यन्त एकरसरूप से व्याप्त सम्वत्सराग्नि को पिता मानिए । इन एक धरातल पर प्रतिष्ठित मम्वत्सराग्नि को अंशरूप अग्नि वायु- श्रादित्य देवताओं को पुत्र मानिए । इन्हीं ती लोकग्नियों को हम ' अग्निभ्रातरः ' कहेंगे । इन तीनों भ्राताओं का एकमात्र उसी वामाग्नि पर पर्य्यवसान मानना पड़ेगा, जिसे कि हमने ' अन्नादाग्नि ' कहा है, जो कि परम्परया पुरातन बनता हुआ पलितवाम ' ' नाम से प्रसिद्ध है । इस पलितवाम को ही हम प्रथम अग्नि कहेंगे, इसे ही रुद्र कहंगे, जो व्यवहारभाषा मे कनिष्ठ देवता बनता हुआ भी स्ववितान - महिमा से ' महान् देव ' ( महादेव ) बन रहा है । बही कामाग्नि होता है, यही ऋङ्मय है, यही पार्थिवयश के हौत्र कर्म्म का संचालक है । इसकी दूसरी अवस्था १८४

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उपनिषद् भूमिका - द्वितीयखण्ड ( १८४, तथा १८५ के मध्य में ) ( २ ) - सर्बत्स रात्मक - सम्वत्सरमण्डलपरिलेख: -वृ — ( चक्र सम्वत्सर प्रतिकृतिरियम ) विष्वद्वृत्त भूर्पिण्ठः श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, दुर्गापुरा ( जयपुर ) सूर्य्य: 5 106