Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 221–230

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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उपनिषद् भूमिका - द्वितीयखण्ड ( १८४, तथा १८५ के मध्य में ) -( चक्र सम्वत्सर प्रतिकृतिरियम ) विष्वद्वृत्त वृ सूर्य्य: भूर्पिष्ठः श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, दुर्गापुरा ( जयपुर ) , II II न्ति IIII क्रा ( २ ) - सर्वत्स रात्मक - सम्वत्सरमण्डल परिलेख: -

पृष्ठ 222

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द्वितीयखण्ड ' प्रश्न ' नामक मध्यम भ्राता है । पचदशस्त मोपल'दत अन्तरिक्ष को अपनी प्रधान प्रतिष्ठा बनाकर स्वगति-धर्म से त्रैलोक्य में व्या ( संचरण ) रहने से ही यह आन्तरिक्ष्य वायुमूर्ति मध्यम भ्राता ' अश्रुः ' कहलाया है । यही मध्यम भ्राता यजुर्ष्मय है, आध्वर्यव क का प्रवर्तक है । वामहोता का तीसरा भ्राता ' घृतपृष्ठ ' नाम मे प्रसद्व है । अपनत्व ही घृत है, जैसा कि - ' आदिद्युतेन पृथिवी व्युद्यने ' ( ऋक् सं ० १।१६४।४७ । ) इत्याद मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । जिस प्रकार सौर अग्नि पारमेय सरस्वान् समुद्र मे परितः घिरा हुआ है, एवं-मेव यह पार्थिवाग्निसम्वत्सर ' अर्णव ' नामक रोदमी समुद्र मे परितः ग्राहत है । क्योंकि अग्नि वायु - श्रादित्य तीनों भ्रःताओं में आदित्य भ्राता के साथ ही अत्र समुद्र का सम्पर्क है, अतः इसे ही ' घृतपृष्ठ ' ( पानी है पृष्ठ में जिसके ) कहना श्रन्वर्थ बनता है । इसी तृतीय भ्राता के आगे जाकर विश्वाते नामक दक्ष-प्रजापति की कन्मा अदिति के द्वाग कश्यप से सात पुत्रों का ग्राविर्भाव होता है, जिन्हें कि ' पश्यन्ति सप्तः सर्वे ' के अनुसार इस पृथिवी पर बैठे बैठे हम देखा करते हैं । सम्वत्सरात्रि ताकीरूपा महापृथिवी ( यज्ञय पृथिवी ) चारों ओर से घृत ( पानी - अर्णवसमुद्र ) से श्रावृत है, इस सम्बन्ध में निम्नलिखित वचना पर दृष्टि डालनी चा.हेए ~ -१ – ‘ ' यत् पर्यग्श्यन् सरिरस्य मध्ये उन्नमपश्यज्जगतः प्रतिठाम् । तत् पुष्करस्यायतनाद्धि जातं पणं पृथिव्याः प्रथनं हरा म ॥ " ( ० ब्राशशश ) । २ - आपो ह यद्द् बृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम् । ( ऋक्रमं ११३१ || ) । ३ - अप मसि योनिरग्नेः समभितः पिन्वमानम् । मानो महाँ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिष्णा त्रथस ” । ( यजुः सं ० १५२६ ) । ४ - " अयं वै लोको गार्हपत्यः आपः परिथितः । इमं तं लोकमद्भिः परितनोति । समुद्रण हैनं तत्परितनोति सतः । तस्मादिमं लोकं सर्वतः समुद्रः पति ” ( शत ० ७ । १ । १ । १३ । ) । घृतपृष्ठ नामक यह तृतीय भ्राता की श्राहित्य है । यही साममय बनता हुआ पार्थिव यज्ञ का उद्गाता है, एवं यही श्रीद्गात्रकर्म्मका सञ्चालक है । इस प्रकार पलितवाम, अश्न, घृतपृष्ठ, नामक उपनामों से प्रसिद्ध, * श्रग्नि - वायु - आदित्य नामक ऋङ्मय, यजुर्म्मय, सामनय, होता - अध्वर्यु - उद्गाता - लक्षण, * अग्नि वायु - रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्धधर्थमृगयजुःसामलक्षणम् ॥ ( मनुः ) १८५

पृष्ठ 223

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भाष्यभूमिका “ होत्र - श्राध्वर्य्यव - श्रौद्गात्रकर्म्म के द्वारा पार्थिव सम्वत्मरयज्ञ के स्वरूपसम्पादक ये तीनों ' अग्निभ्राता ' हीं पार्थिव - स्तौम्य त्रिलोकी के सर्वेसर्वा बन रहे हैं । सम्वत्सरस्वरूपमर्ति इन्हीं श्रग्निभ्राताओं का स्वरूप बतलाते हुए निम्नलिखित ऋङ्मन्त्र पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रहे हैं—

१ - अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्यश्नः ।

तृतीया भ्राता घृतपृष्ठो अस्यात्रापश्यं विश्वनिं सप्तपुत्रम् ॥

( ऋकमं ० १. ६४ | १ ) । २ - ज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरोवादृधुः युवा पिता स्त्रपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदना मरुद्भ्यः ॥ ( ऋकसं ० ५। ९ ०५ । ) ।

३ - प्रति मन्ये पितरमग्निमापिमग्नि भ्रातरं सदा॑मत् सखायम् ।

अग्नेरनीकं बृहतः सपर्य्यं दिवि शुक्र यजतं सूर्य्यस्य ॥

४- अग्नेः पूर्वे भ्रातरो अर्थमेतं ठस्पाद्भिया वरुण दूरमायं गारो परिच्छेदारम्भ से अत्र तक के कथन का निष्कर्ष यह निकला कि, ( ऋक्सं ० १०॥ । ) ।

रवीवाध्वानमन्वावर वुः ।

न क्षेप्नारविजे ज्यायाः ॥

( ऋक्सं ० २०१५१.६ । 1 महाविश्व वेदात्निका, संगती - क्रन्दमी-रोदसीत्रिलोकं रूपा महा प्रतिष्ठा के अन्त में प्रतिष्ठित रंदमी त्रिलोकी ही प्राजापत्यवेद की मनप्र तष्टा है । रोमीत्रिलोकी का पार्थिव विवर्त्त ' ही अन्नादाग्निविवर्त्त है । अन्नादाग्नि ही प्रजापति है । त्रिवृत् - पञ्चदश-एकविंशस्तोमात्मका यज्ञिया पृथिवी, अग्नि वायु - आदित्यात्मक यज्ञिय देवता, छन्दः -रम - वितानात्मक यज्ञियत्रेद हो इस प्रजापति की महिमा हैं । चक्र ( काल ) अग्न ( वस्तुतत्त्व ) भेद से इम सम्वत्सर प्रजापते के दो विवर्त हैं, एवं दोनों वित्र अभेदरूपेण व्यवहार में आए हुए है । कालात्मक चक्रमग्वतसग-वच्छिन्न तत्त्वात्मक अग्निमम्वत्सर का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । अत्र आगे के परिच्छेदों में इस सम्वत्सराग्नि की चिति - ( चयन ) - प्रक्रिया से सम्बन्ध रखने वाली वेदमहिमा का ही संक्षिप्त स्वरूप पाटको के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । १३ - सुत्या एवं - चित्यः कर्म सचमुच यह एक आश्चर्यमय घटना है कि, जो हिग्मयाण्ड ( सौर अग्नि ) भूगर्भ में श्राकर मूलोकामिका ( प्रवर्ग्यरूप से ) पार्थिव संस्था का आत्मा बनता हुआ आरम्भ में केवल ' प्रजापति ' नाम मे व्यवहुत हुआ था, वही आगे जाकर त्रैलोक्य में वित्तत होता हुआ ' अग्निभ्रातरः ' नाम का पात्र बन गया, ए १८६

पृष्ठ 224

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द्वितीयखण्ड सर्वान्त में काल ( चक्र ) सम्वत्सरावच्छिन्न ' अग्निसम्वत्सर ' रूप में परिणत होकर आज पार्थिव प्रजा का सर्वम्त्र बन रहा है । वह ऐमी कौनसी प्रक्रिया थी, जिसके प्रभाव से गर्भाग्नि ' सम् + त्सराग्नि ' बन गया?, वह कौनसा उत्कृष्ट पथ था, ‘ जिसके अनुगमन से " जापति त्रैलोक्य में व्याप्त हो गए?, वह कौनमा बज्ञविधान था, जिसके अनुष्ठान से प्राजापत्याग्नि सम्वत्सराग्नि ( त्रैलोक्याग्नि ) रूप में परिणत हो गया? | हम देखने कि, पूर्व प्रतिपादित इन सत्र आश्चर्यमयी घटनाओं का समाधान पूर्वप्रतिपादित ' सम्वत्सर ' स्वरूपपरिचय से गतार्थ नहीं हो रहा । इसलिए यह आवश्यक हुआ कि, सम्वत्सराग्नि के इस आश्चर्य्यमय व्याप्तिरहस्य को व्यक्त करने के लिए उस ' अॅग्नरहस्य ' का आश्रय लिया जाय जिसके परिज्ञान से ब्राह्मण वर्ण का ब्राह्मणत्र अन्वर्थ बना करता है, एवं जिसके ज्ञाता को प्रजा ' साग्निः ' जैसे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित करती है । इसी अग्निरहत्य के स्पष्टा करण के लिए संक्षेप से ' अग्निविति ' का स्वरूप पाठकों के सम्मुख रखा जाता है । आशा है, वे कृपा कर थोड़े विशेष अवधान से निम्न लिखित प्रकरण पर ध्यान देने का अनुग्रह करेंगे— प्रजोत्पादक यज्ञकर्म्म को वैज्ञानिकों ने ' सुत्या - चित्या ' भेद से दो भागों में विभक्त किया है । सुत्यात्मक यज्ञकर्म्म ' सवन ' नाम मे प्रसिद्ध है, एवं चित्यात्मक यज्ञकर्म ' चयन ' नाम से प्रसिद्ध है । तेज: - स्त्रेस्नेतत्त्वों के रासायनिक मिश्रण से ' सुत्या ' लक्षण ' सवन ' का स्वरूप सम्पन्न होता है, एवं तेजोभावों की सर्पिति ( संघात सम ष्ट ) से चित्यालक्षण ' चयन ' की स्वरूपनिष्पति होती है । अन्न अन्नाद का अन्तर्याम यांग सवनयज्ञ है, अन्नादभावों की चिति चयनकर्म है । सोमाग्नि के सनत्वय से ' सवन ' होता है, अग्नि- अग्नि के संघात से ' चयन ' होता है । श्रग्नीषोमात्मक मिश्रण सवन है, अग्नियश चयन है । एवं सवन, तथा चयन की ये ही कुछ एक सामान्य परिभाषाएँ हैं, जिन के श्राधार पर सुत्या - चित्या - क व्यवस्थत हुए हैं I न में सोम सुत ( श्राहुत ) होता है, तो वह ( सोम ) अपने अन्नधर्म से अन्नादलक्षण ग्न के रूप में ही परिणत हो जाता है । ग्रग्नि में हुत सोम क्योंकि अग्निरूप में परिणत हो जाता है, अतएव उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र मत्ता नहीं रहती । यही कारण है कि, अग्नीषोमात्मक इस सवनक से यज्ञ-प्रजापति के श्रायतन की वृद्धि नहीं होती । उदाहरण के लिए मनुष्य की उम अवस्था को सामने रखिए, जिसमें चयनकर्म समाप्त हो जाता है, एव केवल जीवनोपयिक सवनकर्म्म प्रक्रान्त रहता है । यंत्र तक चयन कर्म प्रक्रान्त रहता है, तत्र तक तो स्थि - मांस - मज्जा आदि शारीर धानुत्रों के आयतन में वृद्धि होती रती है । युवावस्था की चरमता पर यह वृद्धि रुक जाती है । इसका एकमात्र कारण यही है कि, इस अव था में श्राकर श्रायतनवर्द्धक अग्नलक्षण चयन कर्म्म बन्द हो जाता है । स्वयं अन्नाद है । अग्नि यह अन्नटेम को तो अवश्य ही आत्मसात् कर सकता है, परन्तु ग्रन्नादाग्नि को आत्मसात् नहीं कर सकता । समानजातीय इष्टका ( ईटों ) को जब ऊपर नीचे रखा जाता है, तो एक दीवाज़ खड़ी हो जाती है । ईटे पर पर में एक - दूसरी ईंट का निगरण नहीं कर सकतीं । ठीक इसी भाँति जत्र एक अग्नि के साथ इत श्राग्न का सम्बन्त्र होता है, तो प्रथमाग्नि की आयतनवृद्धि हो जाती है । क्योंकि स्वयं अग्नि एक अग्नि को श्रात्ममात् ( हजम ) नहीं कर सकता । प्रारम्भ से २५ वर्ष तक चितिलक्षण इसी अग्निकर्म्म ( अग्निचयन ) का धान्य रहता है, अतएव यहाँ तक ( २५ तक ) आयतन वृद्धि होती है । प्रश्न हो सकता है किं, २५ तक ही क्यों अग्निचयन की प्रधानता रहती है?, उत्तर इन्द्राविष्णु की प्रतिस्पर्द्धा है । १८७

पृष्ठ 225

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भाष्यभूमिका अध्यात्मसंस्था के संचालक ' इन्द्र - विष्णु ' नामक दो देवता माने गए हैं । इन दोनों की मुजप्रतिष्टा ब्रह्मान्तर है । स्थितिलक्षगा ब्रह्माक्षर पर प्रतिष्ठित गतिलक्षण इन्द्र तथा गतिलन्गा विष्णु की प्रतिर्द्धा से यध्यात्मिक यज्ञ की उद्ग्राभ - उदगीथ - निग्राम - पलित भेद मे चार अवस्था हो जातीं हैं । जीवन के १०० वर्षों को २५ के क्रम मे चार भागों में विभक कर दीजिए । इन चारों में क्रमशः इन चारों अवस्थाओं का भंग हो रहा है | आरम्भ की पञ्चविंशति में श्रादानलक्षण विष्णु मक्ल रहते हैं, विमर्गलक्षण इन्द्र निर्बल रहते हैं । अतएव शारीराग्नि को बाहिर निकलने का अवसर बहुत कम मिलता है । अतएव २५ तक ग्रग्नि उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, यही श्रायतनवृद्धि का मुख्य कारण है । यही आध्यात्मिक यज्ञ की उद्द्याभावस्था ( चढ़ाव ) है । आगे जाकर ५० तक इन्द्राविष्णू दोनों का समान बल रह जाता है । जितनी ग्रामद, उतना खर्च । न चनवृद्धि, न बनह्रास, किन्तु समानभाव । यही उद्गीथावस्था है । ५० से ७५ तक इन्द्र बलवान् चन जाते हैं विष्णु निर्बल जाते हैं । फलतः ग्राय की अपेक्षा व्यय अधिक होने लगता है । फलतः शक्तियाँ क्षीगा होने लगतीं हैं । यही निमाभावस्था ( उतार ) है! ७५ से ग्रागे विष्णु एकान्ततः प्रतिमूर्च्छित हो नाते हैं । रुद्रात्मक पलितवाम ( रुद्राग्नियुक्त इन्द्र ) का साम्राज्य हो जाता है । यही चौथी पालिता-दग्थ है । १४ - पां को वै यज्ञः तात्पर्य्यं कहने का यही है, कि याध्यात्मक यज्ञ में नत्र तक सवन के साथ साथ अग्निचयन होता रहता है, तब तक तो श्रायतनवृद्धि होती रहती है । एवं जब चयन प्रक्रिया उपरत हो जाती है, तो श्रायतनवृद्धि रुक जाती है । अन्नात्मक जितनी, जो सोमाहुति अन्नादात्मक शारीगग्नि में बहुत होती है, उसका अग्नि में ( अग्निस्वरूप की रक्षाम त्र में ) ग्रात्मसमर्पण हो जाता है । चयनकर्म में अग्नि की प्रधानता इस प्रक्रिया का " श्रग्नियज्ञ " कहा जाता है । सनक है, में मामाहुति का प्राधान्य है, श्रतएव इमे ' मोमया ' नाम से व्यवहृत किया है, जा कि यज्ञवारेमावा में ' ज्यातिष्टोम ' नाम मे भा प्रसिद्ध है । ज्योतिष्टोमयज्ञ यज्ञ का उनकारक बनता है । सच पूछिए तो ज्योतिष्टाम ही यज्ञ की प्रतिभूम बनता है । यही कारण है कि सुप्रसिद्ध वैव चयनयज़ में ज्योतिष्टोम का भी अनुगमन करना पड़ता है, ना कि ब्राह्ममन्थरतिनादितपत्रले स्पष्ट है । स्वयं मम्वत्सरयज्ञ अग्नि की अपेक्षा से अग्नियज्ञ बनता हुआ संमाहुति की दृष्टि में जातिष्टम भी बन रहा है । इमं लिए सम्वत्सर को ' ज्योतष्टोम ' नाम से भी व्यवहुत कर दिया गया है । ज्योतिष्टोम यज़ में ' अग्नि- मोम ' दोनों का समन्वय है । श्रम ज्योति है, सोम तम है । इन दोनों तत्त्वों के समन्वय मे मम्वत्सर के गर्भ में अयन ऋतु- पक्ष - ग्रहो -रात्र - भेद से चार अवान्तर यज्ञों का प्रादुर्भाव हो जाता है । अहः अग्निप्रधान है, रात्रि सोमप्रधाना है, दोनों के समन्वय मे ही ' अग्निशेत्र ' का विकास होता है । पज्ञयज्ञ ' दर्श - पूर्णमास ' नाम से प्रसिद्ध है । ऋतुयज्ञ ' चातुर्मास्य ' नाम से एवं ' पशुबन्ध ' नाम से प्रसिद्ध है । ग्रग्निहोत्रलक्षण अहोरात्र पज्ञ मे दर्शपूर्णमासतज्ञापत्रयन का पयज्ञ मे ऋतुयज्ञ का, ऋतुपज्ञ में अयनयज्ञ का स्वरू सम्पन्न होता है । इन चारों के समन्वय से अग्नीषोमात्मक सम्वत्सरयज्ञ ( ज्योतिष्टोम ) की स्वरूप निष्पत्ति हुई है । क्योंकि बिना उन चारों के सम्वत्सर की स्वरूप निष्पति असम्भव है, अतएव उन चारों को ' प्राकूसौमिक ' कहा जाता । इन प्राकसौमिक अग्निहं त्रादि के समन्वय से कृतरूप सम्वत्सरयज्ञ पाहूक्त १८६

पृष्ठ 226

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द्वितीयखण्ड ( सम्वत्सर ' - श्रयन ' - ऋतु ३ - पक्ष - ग्रहोरात्र " - भेट मे ) पञ्चावयव बन जाता है । इसी साम्वत्सरिक, अग्नी-घोमात्मक, सुत्यालक्षण, सवनयज्ञ के लिए " पाइको वै यज्ञः " यह कहा गया है । पाङक्त सोमयज्ञ के अतिरिक्त विशुद्ध अग्निचिति से सम्बन्ध ग्ग्वने वाला ग्रग्नियज्ञ भी इसी सम्वत्र प्रजापति का स्वरूपसमर्थक बन रहा है । सोमयज्ञ में जैसे अग्निहोत्रादि पाँच पर्व हैं, एवमेव इस अग्नियज्ञ में पाँच चितियाँ होती हैं, जैसाकि वेदमहिमाप्रकरण में ही स्पष्ट होने वाला है । मोमयज्ञरूप सवनकर्म्म से सम्वत्सर - स्वरूप की रक्षा हो रही है, अग्नियज्ञरूप चयनकर्म से सम्वत्सराग्नि की ग्रायतन-वृद्धि हुई है । केन्द्रस्थ प्राजापत्याग्नि कैपे द्युलोक तक फैल गया? इस प्रश्न का समाधान इसी चयन कर्म्म पर अत्रलम्बित है, जोकि चयनका ' सृष्टिविद्या का महामूलस्तम्भ माना गया है । जिस चयनकर्म मे केन्द्रम्थ प्राजापत्य अग्नि एकविंशस्तोम तक व्याप्त हो रहा है, उस चयनकर्म का क्रमबद्ध निरूपण न तो यहाँ सम्भव ही, एवं न उपयोग ही । प्रकृत में केवल वही अंश निरूपणीय होगा, जिसका कि वेदम हेमा से विशेष सम्बन्ध रहेगा । भवननिर्माणप्रक्रिया का जैग स्वरूप है, ठीक वही स्वरूप इस चयनयज्ञ का है । इसनें भी प्राकृतिक ( प्राधिदैविक ) नित्य चयनयज्ञ के आधार पर वितत होने वाले विकृतिलक्षण वैध ( मनुष्यकृत ) चयनयज्ञ की भवनप्रक्रिया से सर्वथा समतुलन हो रहा है । भवन-निर्माणप्रक्रिया में जो जो उपकरण काम में लिए जाते हैं, वे सब उपकरण यहां ज्यों के त्यों संग्रहीत हैं । शिल्पी ( कारीगर ), ईंटें, गारा ( चूना - मिट्टी ), करणी ( चूना लगाने का साधनभूत औजार ), आदि का टीक टीक यहाँ भी समन्वय हो रहा है । जिस प्रकार भवनार्थ सदी ईटों में ( इटों के परस्पर के ग्रन्थिबन्धन के लिए ) विशेष प्रकार के चिन्ह ( गढ्ढा ) त रहते हैं, एवमेव चयनयज्ञ में संग्रहीत इष्टकाओं में भी विशेष चिह्न अङ्कित रहते हैं । चूना गारे के स्थान में ' पुरीष ' काम में लिया जाता है । पुरुष - अश्व - गो- अवि - श्रज, इन पाँच प्राकृतिक अमृतप्राणों के संग्रह के लिए प्राणप्रधान पाँचों प्राणियों का आलम्भन होता है । इनके मस्तक तो सुरक्षित रख दिए जाते हैं । कबन्धों को जलालुन भूमि में गाड़ दिया जाता है । एक वर्ष की अवधि में कबन्ध और मिट्टा संशिनष्ट वा जाते ह । इसी पराय मिट्टा से ऋषिलोग ईंट बनाते हैं । इन ईटों मे सुपर्ण ( गरुड़ ) पत्नी के ग्राकार के चचूतरे बनाए जाते हैं । सर्वप्रथम बृहत् उस पर पहिले से छोटा फिर छंटा, इस क्रम मे पाँच चतो बनते है । मन की इकान्विति पर उत्तरवेदि बनती है । उसमें ग्राहवनीय अग्नि प्रतिष्ठित होता है | उस प्रदेश में पाँच पशुओं के शिरो भागों की चिति होती है । इसके अतिरिक्त कुर्म्म, रुक्म, आदि मंद से अनेक वि. तेयाँ और होता हैं । इन चितियों में कूम्र्म्मादे जो जो पदार्थ संग्रहीत हैं. उन सत्र का प्राकृतिक पर्वो के साथ यथानुरूप समतुलन हैं, जैसा कि प्रकरणोपसंहार में स्पष्ट किया वाला है । प्रकृत सम्बत्सराग्नि- प्रकरण में इस मम्बन्ध में बतलाना यह है कि, भूपिण्ड से प्रारम्भ कर एकविंश-स्तोमपर्यन्तव्यात रहने वाले सम्वत्मग्प्रजापति में जिन तत्त्व प्रतिष्ठित हैं, वैव चयनयज्ञ के द्वारा उन सबका संस्कार ( आधिभौतिक पदार्थों के माध्यम से ) आध्यात्मिक ग्रग्न में प्रतिष्ठित किया जाता है! उस संस्कार से उस महासुपर्णरूप सम्बत्सरप्रजापति के साथ हम तुद्रसुपर्णरूप जीवात्मा का ग्रन्थिबन्धनसम्बन्ध हो जाता है । फलतः सम्वत्सम्वत् य अमृतभाव को प्राप्त हो जाता है । यह पञ्चचितिक सम्वत्सराग्नि वही अग्नि है, जिसका कठोपनिषत् में " स्वर्याग्नि " नाम मे उप हा हुआ है, एवं नचिकेता सम्बन्ध से जो अग्नि'त्रिणाचिकेत ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । इस वय्यक्तिक फल के अतिरिक्त चयनपत्र १८६

पृष्ठ 227

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भूमिका के सम्पर्क - परिज्ञान मे त्रैलोक्य की पदार्थविद्या का परिज्ञान हो जाता है । इस विश्वविज्ञान के श्राघार पर प्रकृति पर विजय हो जाता है । विजयप्राप्ति के द्वारा ' सर्व ' भविष्यन्तां मन्यन्ते मनुष्याः ' ( शत ०१० । ) । परिगणित चयन पर्वो का मौलिक रहस्य तो चवनरहस्यप्रतिपादक ब्राह्मणग्रन्थों में ही देखना चाहिए । यहाँ हमें केवल सम्वत्सराग्नि का हो वितान बतलाना है । इस वितानभाव के लिए सर्वप्रथम ' प्रजापति ' शब्द की ही पाटकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । पूर्व प्रकरणों में प्रजापति का ' आत्मा - प्राण पशुममड़ि ' लक्षण किया गया है । इस लक्षण का हम “ प्रकृतिविशिष्टत्त्वं प्रजापतित्त्वम् ” लक्षण पर पवमान मान सते हैं । प्रकृतिविशिष्ट पुरुष को हो प्रजापति कहा जायगा । प्रजापति के ' प्रकृति ' भाग की ग्रागे जाकर " प्रकृति - विकृति ' भेद मे दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । इस प्रकार पुरुष - प्रकृतिपर्वा ( द्विपर्वा ) प्रजापति ( पुरुष - प्रकृति - विकृतिं पर्वा ( त्रिपर्वा ) चन जाता है । पुरुष पर्व सङ्ग श्रात्मा है, यही ' अमृत ' नाम से प्रसिद्ध है । जिसका जन्म -स्थिति- भङ्गभावों कोई सम्पर्क नही है, अतएव जो ' अन ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रकृतिपर्व ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है, यही ' जन्माद्य य यतः ' इस व्यामसिद्धान्त के अनुसार जन्मादि का कारण बनता है । यही सुप्रसिद्ध ' प्राण ' पर्व है । तीसरा विकृतिपर्व ' शुक्र ' नाम से प्रसिद्ध है । यही जन्मादिरूप में परिणत होने वाला मर्त्यं पर्व. है । यही सुप्रसद्ध ' पशु ' पर्व है । इस प्रकार श्रात्मा - प्राण- पशुलक्षण अमृत - ब्रह्म - शुक्र मूर्ति त्रिपर्वा प्रजापति श्रात्मलक्षण श्रमृतपर्व से जगदाधार बन रहा है, प्राणलक्षण ब्रह्मपर्व से जगतकर्त्ता बन रहा है, एवं पयुलक्षण पर्व से जगत् बन रहा । उसमें ( अमृतपर्व में ) जगत् है, वह ( ब्रह्मपर्व ) जगत्कर्त्ता है, वही ( शुक्रपर्व ) जगत् है इन सभी विरोधी व्यवहारों का इस प्राजापत्यसंस्था में निर्विरोध समन्वय हो रहा है- तत्तु समन्वयात् ' । आत्मा I प्राणः पशुः पुरुष: प्रकृतिः विकृतिः श्रमृतम् ब्रह्म शुक्रम अजः जन्महेतुः जन्यम् जगदाधारः जगत्कर्त्ता जगन तदेवामृतम् तद्ब्रह्म तदेव शुक्रम् विः प्रजापति: " वचु समन्वयात् " I जा

पृष्ठ 228

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द्वितीयखण्ड प्रकरणोपसंहार में जिन पाँच चितिपत्र की परिगणना की जायगी, उनका उक्त प्राजापत्यसंस्था के साथ समन्वय कीजिए । प्रथम चिति के श्रात्मपर्व से प्रारम्भ कर सत्यसाम नामक पर्व पर्य्यन्त ' अमृत ' नामक प्रथम प्राजापत्यपत्र का भोग है । पुरुकरपर्ण नामक पर्व मे आरम्भ कर ' चित्रसाम ' नामक पर्व पर्यंत ' ब्रह्म '. नामक द्वितीय प्राजापत्य पत्र का भोग है । एवं प्रथम चिते के ही ' सर्व ' नामक पर्व मे प्रारम्भ कर पाँचवीं चिति के सर्वान्त के ‘ म्वयमा तृष्णा ' ( द्यौः ) नामक अन्तिम पर्व पर्य्यन्त ' शुक्र ' नामक तीसरे प्राजापय पर्व. का उपभोग हो रहा है । भूपिएड केन्द्रस्थ आत्मा पञ्चचितरूप में परिणत होता हुआ अपने इन तीनों पर्वों से युक्त होकर ' चित्यप्रजाशते ' नाम को साथक कर रहा है, जैसा कि निम्न लिखित परिलेख से स्पष्ट है -- आत्मा श्रमृतम् ब्रह्मप्राणाः पशमः -शुक्रम् ( १ ) - आत्मा - अभ्ययः साक्षरः नरः पुरुषः आत्मा । ( २ ) -अग्नि: --क्षरब्रह्मणि प्राणे वाचावाशरूषो यजुर्ब्रह्माग्निः । ( ३ ) १ - सत्यं साम -- तस्मिन्नग्नौ भृग्वङ्गिरोरूपपब्रह्ममय्य आपः । ( १ ) २ – पुष्कर एम् बृहत्सामान्ताऽयमपां घनोभावो लोकत्रयरूपप्रदेशः ( २ ) ३ - रुक्मः - पुष्करपर्णमण्डलस्य गर्भे दृष्टः सूर्यविम्बः । ( ३ ) ४ - पुरुषः - सूर्य्यविम्बाच्चतुर्दिक्षु व्याप्नुवन्नग्निः प्राणो रश्मिरूपः । ( ४ ) ५ - चित्रसाम - नानाविधबर ग्राममयी भृतज्योतिर्म्मण्डलरूपा रश्मि संस्था । ( १ ) ६ - सपनाम - परितः प्रमद्भिस्त्रिभिर्लोकः सूराश्म एडलस्य देशभेदेन स्पर्शभेदाः । ( २ ) ७- अग्नीन्द्रौ- प्रधस्तादग्निनाधेया श्राज् मयास्तेजोरसाः, उपरिष्टादि- द्रेणा घेया दधिमया श्रोजोरसाः । ( ३ ) ८ - स्वयमातृण्णा - प्रथमा ( अग्निः ) अनया प्राप्तौ अन्नानि, प्रारणा, अग्निश्चात्मा श्रधीयन्ते तेन प्राजात्याग्निस्त्रिलोकीमयः संस्कृतो भवति । ( ४ ) ६ - व्याहृतिसाम - भूर्व्याहृतिः । एतेन साम्ना भूलोकस्वरूपसंस्थानं कृतं भवति । ( ५ ) १८ दूर्वेष्टकातः - प्राणभृत्पर्यन्ता प्रथम चितिः ( ६ ) ११ - अश्विनीत: - पराव्या पर्य्यन्ता द्वितीया चितिः ( ७ ) १२ = म्बयमातृण्णातः - बालखिल्या पर्जन्ता तृश् ( ८ ) १३ - प्रारणतः - सृषुपर्यन्ता चतुर्थी चितिः ( ६ ) १४ - असपत्नातः स्वयमातृष्णापय्र्यन्ता पञ्चमी पश्त्रोऽग्निः पाशुकः । तैः सहितः पृथिव्यग्निः त्रिलोका-धिष्ठाता ( मुपैति ।

पृष्ठ 229

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भाष्यभूमिका मृत - शुकालक प्रजापते ही मुख्य प्रजापति है । इस प्रजापतिगर्भ में आगे जाकर जितने भी सामान्य - विशेष प्रजापतियों का आविर्भाव होता है, प्रत्येक के मून में मुख्य प्रजापति के अमृतादि तानों पर्न प्रतिष्ठित रहते हैं । प्रकृत में हमें विश्वात्मक महाप्रजापति के गर्भ में ( प्राजापत्य त्रैलोक्य के पलितवामा-ग्निमय स्तीभ्य त्रैलोक्य में ) प्रतिष्ठित सम्वत्सर प्रजापति का ही विचार करना है । पहिले मुख्य प्रजापति के ही दर्शन कीजिए । मुख्य प्रजापति का ग्रात्मलक्षण अमृत पर्व श्रानन्द - विज्ञान- मनोमय बनता हुआ त्रिकल है । यह त्रिकताना पार्थिव दहराकाश में प्रतिष्ठित है । इसके आधार पर इसी प्रदेश में अधामच्छद रूप से मन - प्राण - वाङ् ग्य, ब्रह्म - इन्द्र - विष्ण्ववक्षरसहकृत दूर रा प्राणलक्षण ब्रह्म पर्न प्रतिष्ठित है । इसके आधार म इसी प्रदेश में ब्रह्मानुचन्वी ब्रह्मनिः श्वमितवेद, इन्द्रानुत्रन्धी ग यत्रीमात्रक वेद, विष्ण्ववनुबन्धी यज्ञमात्रिक वेःयुक्त, वाक् - श्रापः - ग्र ग्नमय, पशुजक्षण तीसरा शुक्रपर्व प्रतिष्ठित है । इन तीनों पर्वों की समय ' पार्थिव ' प्रजापति ' है । इसी प्रजापति के ( प्रजापति के श्रात्मपर्व के ) ग्राधार पर इसी प्रजापत के मुख्य द्वारा ( प्रजापति के प्राणपर्ग द्वारा ) इसी प्रजापतिरूप उपादान से ( प्रजापति के पशुरूप उपादान से ) पार्थिव सृष्टि का उद्गम होने वाला है । तीनों प्राजापत्य पर्वों में मध्यस्थ ' ब्रह्म ' नामक पर्व मनः प्राण - वाङ्मय बतलाया गया है । ' एको S हं प्रज्ञायेय ' इस स्वाभाविक सृष्टिकामना से दहराकाशस्थ यह ब्रह्मप्रजापति ( प्रजापत का ब्रह्मपर्व ) बहु स्याम्, पार्थिव सृष्टि की ' कामना ' करता है । इसी कामना का ( चित्यसृष्टिमूला कामना का ) वैज्ञानिक लोग-‘ चेत्यध्वम् ' शब्द से अभिनय किया करते हैं । कामनानन्तर ब्रह्म के प्राणभाग का व्यापार हो पड़ता है, जो कि ' तप ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए ' तप्यध्वम् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है | तप के अव्यवहितो-तरकाल में वाग्व्यापार प्रक्रान्त हो पड़ता है, जो कि ' म ' नाम से प्रसिद्ध है । ' यजध्वम् ' से ही इसका श्रभिनय हा है । इस प्रकार अपने मनोभाग से चितिरूपा कामना का, प्राणभाग से अन्तर्व्यापार लक्षगण तप का, तथा बागूभाग से बहिर्व्यापारलक्षण श्रम का प्रवर्तक बनता हुया मध्यस्थ ब्रह्मप्रजापति पार्थिव सृष्टि-कामना को चरितार्थ करने के लिए सर्वप्रथम वाक् ग्रापः - अग्निमय शुक्र के वाकू भाग को पहिले ग्रापः रूप में, आप को अपरूप में परिणत कर डालता है । वागावारेण प्रतिष्ठित ग्रापः शुक्र में गर्भीभूत यह अग्नि ( शुक्राग्नि ) वही पूर्वप्रतिपादित सुप्रसिद्ध ' अन्नादाग्नि ' है, जो कि बीजरूप से प्रतिष्ठित हो । हुआ उसी प्राजापत्य व्यारत्रयी ( कामना - तप - श्रभ ) का अनुगमन करता हुआ आगे जाकर तृतरूप में ( सम्वत्सररूप में ) परिणत होने वाला है । प्रजापति ने जब देवताओं को उत्पन्न किया, तो वैभवप्रातिकामुक देवताओं ने पिता प्रजापति से प्रश्न किया कि, हे प्रजापते! आप किस कर्न से त्रैलोक्य में व्याप्त हो गए?, आपका वैभव इतना विशाल क्योंकर हो गया? । उत्तर में प्रजापति ने देवताओं के सामने –'चेत व म् ' -' तं यध्वम् ' - ' यजध्वम् ' ये तीन आदेश वाक्य रक्खे । इन वाक्यों का तात्पर्य यही है कि, वैभव प्रत्येक व्यक्ति को पहिले दृढ मानस - संकल्प करना चाहिए, अनन्तर तदनुरूप अन्तर्व्यापार ( प्रयत्न- कोशिश ) कग्ना चाहिए, सर्वान्त में तदनुरूप बहिर्थ्याचार ( क्रिया - हाथ पैर हिलाना ) का अनुगमन करना चाहिए । इन तीन साधनों की अनन्य निष्ठा से कुछ भी दुर्लभ नहीं है । ' चेतो, प्रयत्न करो, हाथ - पैर हिलाओ ' सब कुछ सिद्ध है । १६२

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 230 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयखण्ड १- मनसा - चेत पत्रम् - ( कामः - मनोव्यापारः ) २- प्राणेन - तप्यध्वम्- ( तपः ३ - वाचा - यजध्वम्- ( श्रमः -प्राणव्यापारः ) वागूत्र्यापारः 1 - व्यापारत्रय संयोगात् सर्वमुत्पद्यते यदिदं किस १५ - गौजनक अग्निहोत्र -हाँ तो, हम कह रहे थे कि मुख्य प्रजापति की इस व्यापारत्रयी से ' वाक - श्राप: - अग्निमय ' पार्थिव शुक्र का व्यक्तीभाव हो गया । इन तीनों में अग्नि नामक अन्त के शुक्र से सर्वप्रथम ' अग्निहोत्र ' नाम की प्रक्रिया - विशेष का आविर्भाव हुआ, जो कि प्रक्रिया ' गीतत्त्व ' की जन्मदात्री बनने गर्ल ' है, जिम गौतत्त्व के सम्बन्ध मे पृथिवी ‘ गोरूपधरा ' नाम मे प्रसिद्ध होने वाली है । बीजावस्थापन्न इस अन्नादाग्निलक्षण अग्नि-शुक्र का जाकर ' अग्नि वायु - आदित्य ' रूप से विका होता है । अतएव बीजरूप आग्न को हम आम्भ से ही इन तीन विकारों के मूलों ( बीजरूप ) से युक्त मान सकते हैं । बीजत्रयभावापन्न अग्नि ही अग्नि है । ' आग्नर्वै प्राणानहाँषीत् ' इस श्रौत सद्वान्त के अनुसार बीजावस्थापन्ना इम अग्नित्रयी में स्वयं अपने आप की ही आहुति होती है । इस स्त्रात्माहुति मे अग्नि के अग्निलक्षण बीज से ' प्राण ' का, आग्न के बायुलक्षण बीज से ' शरीर ' का, एवं अग्नि के आदित्य नक्षण बीज मे ' रूप ' का विकाम होता है । तानूनप्त्र कर्म से एक कार बनी हुई यह देवतात्रयी अपने अत्रि मे सर्वप्रथम ' प्राण शरीर - रूप ' भावत्रयी के विकास का ही कारण बनती है | रूप - प्राण - शरीर के संयोग से उत्पन्न ज्योतिः ( रश्मि ), प्राण ( प्राणदपानत् किया ), शरीर ( किया-धारभूता प्रतिष्ठा ) लक्षण सांयोगिक तत्त्व - विशेष ही विज्ञानभाषा में " गौ " नाम मे प्रसिद्ध है । यह गौतत्त्व हो पिण्डभाव की मूलप्रतिष्ठा, मूलप्रभव, मूल प्रवर्त्तक बनता है, जैसा कि - गात्रः सर्वेषु भूतेषु - मूर्ध्नि ' इत्यादि एतिवचन से भी स्पष्ट है । १६- शाकायनि का अग्नि-प्रश्न हमारे सामने यह है कि, जिस अग्निहोत्र पे प्राण - शरीर - रूपात्मक गौतत्त्व उत्पन्न होता है, वह ' अग्नि ' है क्या पदार्थ? | प्रश्नममावि के लिए श्रुति की हो शरण में जाना चाहिए । सुप्रसिद्ध वैज्ञा-निक ' शाकार्यान ' के मतानुसार ' वायु ' ही अग्नि है । न अपने स्वाभाविक तेजोधम्मं से विशकलनधर्म्मा है, विकामोन्मुख है | संकोच भाव जहाँ स्थितिभाव का उपोलक है, वहाँ विकासभाव गतिभावानुत्रन्धी माना गया है । गतितत्त्व ही वायु है, दूसरे शब्दों में गति वायु का ही प्रातिस्थिक धर्म है । इसी गतिभाव के कारण हम वायु को ही अग्नि कह सकते हैं । अग्नि की अग्नि, आदित्य नाम की जो दो अवस्था और सुनी बाती हैं, उनका भी इस मध्यस्थ वायुभाव में ही अन्तर्भाव है । वायु हो क्रमश घनता में परिणत होता हुआ पाग्निरूप में परिणत हो जाता है, जिसे कि ' अग्नि ' ( वायु की घनावस्था ) कहा जाता है । अग्निज्वाला वायुका संघातमात्र है, वायु ही इसका प्रभव है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, अर्चि का अन्तिम परिणाम वायु ही होता है । लयभाव स्वप्रभव से संबन्ध रखता है । जिस प्रकार निम्नगामी बनता हुआ वायु ' ' अग्निरूप में आता है, एवमेव वही वायु ऊर्ध्वावस्था में जाकर बाष्यावस्था ( विरलावस्था - धरुणावस्थों ) में आकर १६३