Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 231–240

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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भूमिका श्रादित्य कहनाने लगता है । अग्नि वायु आदेत्य तीनों में गतिभाव उपनच्च होता है । उवर गतिभाव जत्र एकमात्र वायु का ही धर्म्म है, तो हन कर सकते हैं कि, वायु ही अग्नि है, वायु ही आदित्य है । फलतः ‘ वायु-देवाग्निः ' । इस्रो शाकापनि - मन का दिन कराते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ( १ ) - अशा उपनिग्ाम् । ' वायुरग्नि ' रिति शाकायनिन उपासते । " अथ हम्माह श्रौमत्यो वा हालिङ्गचा वा वायुरेवा ग्नः । तम्माद्यदैवाध्वग्यु रुत्तमं कर्मति, तवाप्येति ' इति । ( शत ० १०।४।५।१ । ) । १७- हिरण्यगर्भऋषि का अग्नि-हिरण्मयाण्डलक्षणा हिरण्यगर्भविद्या के प्रथम आविष्कर्ता महर्षे ' हिरण्यगर्भ ' की सम्प्रदाय के अनुयायी किन्नें एक विद्वानों का कहना है कि, वस्तुतः ' आदित्य ' ही अग्नि है । इनके इमपक्षपात का कारण है - ' प्रथमज अग्नि ' । पारमेष्ठ्य ग्रापोमय समुद्र में सर्वस्यानमसृज्य तस्यादयिः, अमिरेवाग्निः पराक्षेण ' के अनु-सार सर्वप्रथम हिरवा विकत होते वाना नारायणान ही आदित्याग्न है । इमी आदित्याग्नि ( सौरग्नि ) के पार्थिव अन्नदान का प्रादुर्भाव हुआ है । यही पार्थिव ग्रग्नि त्रैलोक्यस्तोमों में वितत होता हुआ क्रमशः अग्नि वायु - आदित्यावस्थात्रयी में परिणत हो गया है । अन्नाद, अग्नि, वायु, श्रादित्यादि यच्चयावत् अग्निविवर्त्त श्रादित्यलक्षण, अग्रजन्मा, प्रथमज, नारायणाग्नि के ही विवर्त्त हैं । अतः हम इसे ही मुख्य ‘ अग्न ' कहेंगे । इसी द्वितीय मत का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहतो है— ( २ ) — " आदित्योऽग्नि ' रित्यु हैक आहुः " ( शत ० १०।४।५।१३ ) । १८- शाट्यायन का अग्नि-' शाट्यायन ' का इस सम्बन्ध में यह कहना है कि, हमें प्रकृत में सृष्टि के केवल उस विवर्त्त का विचार करना है. जिसका केवन पार्थिव चित्याग्नि से सम्बन्ध है । श्रादित्याग्नि प्रथमज है, इसमें कोई सन्देह नहीं | परम्परया वही मर्चाग्निविवर्ती का मूल है, यह भी निःसंदिग्ध है । परन्तु उसका सौग्ब्रह्माण्ड से सम्बन्ध है । अतर्व पार्थित्र ब्रह्माण्ड में उसकी गणना अनपेक्षित है । नहीं, तो फिर सर्वम्नभूत स्वायम्भुव ब्रह्माग्नि को ही मुख्य अग्नि मानना चाहिए । क्योंकि स्वयं आदित्याग्नि ( नारायणाग्नि ) का विकास स्वायम्भुव ब्रह्माग्नि से हुआ से है | श्रुत ' तत्त्वतः हमें उस अग्नि का विचार करना चाहिए, जो ' चयनयज्ञ ' का स्वरूपसमपर्क बन रहा है । स्वत्र पार्थिव चयनयज्ञ की दृष्टि से हम ' अग्नि ' पदार्थ का अन्वे करने लगते हैं, तो उस समय ' सम्बत्मर ' ही हमारे सम्मुख उपस्थित होता है । संवत्मगग्नि के गर्भ में ' अग्नि- वायु- श्रादित्य ' नामक तीन खण्डाग्नियाँ प्रतिष्ठित हैं । त्रश्न यह है कि, इन तीनों में मुख्य ' अन्न ' किसे कहा जाय? | इस प्रश्न का एकमात्र समाधान ' संवत्सराग्नि ' ही हो सकता है । " वायु अग्नि बन जाता है, वायु श्रादित्य बन जाता है, इसलिए वायु हो अग्नि है " यह उक्ति पदार्थविद्या की दृष्टेि मे प्रौरिवादमात्र है । फिर तो उस सर्वव्यापक ब्रह्म को होन कहना पड़ेगा, जो कि परम्परया अग्नि - इन्द्र- वरुणादि सत्र का मूलात्मा बना हुआ है । उस श्रात्मदृष्टि से १६४

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द्वितीयखण्ड ' तमेकं सन्तं विप्रा बहुध वदन्त्य न यमं मातरिश्वानम् ' इत्यादिरूप से स्वयं श्रुति ने भी उसी को सर्वरूप माना है । परन्तु यहाँ अध्यात्मविद्यानुगत आत्माद्वैतभाव का प्रकरण नहीं है । प्रकरण है खण्डम्बण्डा मिका; तत्तत्पदार्थभेदेन सर्वथा विभक्ता पदार्थविद्या का । पदार्थवेद्य में ' अग्नि- वायु - श्रादित्य ' तीनों सर्वथा विभन्न हैं, गुणरूप हैं, अवयवात्मक हैं । ' गुणानां च परार्थत्त्वात असम्बन्धः समत्त्वात् ' न्यायानुसार गुण सदा परार्थ हे ते हैं, इनमें परःपर जन्य - जनकभाव नहीं हुआ करता । बाक्- प्राण - चक्षु श्रादि इन्द्रियाँ ' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिद-मुपासते ' ( केनोपनिषत् ) के अनुसार उस एक प्रज्ञानब्रह्म के लिए अभिन्न हैं, वही बाक़ बना है, बही प्राणादि बना है । परन्तु वाक प्राण बनी हो, अथवा प्राण चक्षु बना हो, यह असम्भव है । वही वाक है, वही प्राण है, वही चक्षुरादि है । परन्तु ' वाक् ही प्राण है, प्राण ही वाक् है, प्राण ही चक्षु है ' इस गुणमम्बन्ध का कौन वैज्ञानिक समादर करेगा । टीक यही परिस्थिति यहाँ समझिए । ' अग्नि- यायु- श्रादित्य ' रूप अग्निखण्ड प्रजापति के पुत्र माने गए हैं । ये उसके अवयवरूप हैं, सर्वथा विभक्त तत्त्व है, इनमें परस्पर जन्य - जनक-भाव अनुपपन्न है । फलत: वायु की अग्नि मान कर इसमे अग्नि वायु आदित्य का, किंवा आदित्य को अग्नि मान कर इससे अग्नि - वायु का संग्रह करना पदार्थविज्ञानदृष्टि से नितान्त अशुद्ध है । तीनों में कोई भी मुख्य नहीं हैं, तीनों समान श्रेणियों में प्रतिष्ठत हैं । बस्तुतः मुख्य अग्नि वह माना नायगा, जो कि इन तीनों का प्रभव बनता हुआ तीनों का अवारपारीण प्रतिष्ठाधरातल बन रहा है । वह है भूगर्भ से श्रारम्भ कर २१ स्तं मपर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला प्रजापतिलक्षण सम्बत्सगग्न, जिसके अभिन्न अङ्मय धरातल पर तीन भिन्न - भिन्न ग्रग्नि भिन्न - भिन्न स्तामप्रदेशों में प्रतिष्ठित हैं । मम्वत्सरान वह ग्रग्नि जिसक । वसन्त ऋतु मुख है, ग्रीष्म दक्षिणपक्ष है, वर्षा उत्तरपक्ष है, शरदऋतु मध्यभाग है. हेमन्त शिशिर पुच्छ-प्रतिष्ठा है, त्रिवृदग्न जिसकी वा गिन्द्रिय है, पञ्चदशस्थ वायु जिसकी प्राणेन्द्रिय है, एकावश ग्रादित्य जिसको चतुरिन्द्रिय हैं, चन्द्रमा जिसका मन है, दिक्मोम जिसकी श्रोत्रेन्द्रिय है, अपूतत्त्व जिसको पत्नी है. तपः ( संतापलक्षण श्रग्निव्यापार ) जिसकी प्रतिष्टा ( स्वरूप रक्षक ) है, द्वादशमास जिसके पर्व ( पशु आदि शरीरा-वयव ) हैं, २४ पक्ष जिसकी नाड़ियाँ हैं, ७२० ग्रहः, ७२० रात्रियाँ जिसके चाँदी सोने के ( अन्नप्रतिष्ठा रूप पात्र हैं, इन पात्रों में प्रतिष्ठित सोमान्न मे जो स्वयं भी तृप्त रहता है, एव अपने पुत्र अग्निप्रमुख यज्ञिय देवताओं को भी जो तृप्त किया करता है । यही सम्वत्सराग्नि मुख्य अग्नि है । ‘ सम्वत्सर ' का अर्थ है— “ सम् वस् - त्सरः " । ' सर्वतोऽत्सारिषम् ' - सर्वतः त्सरन् सन् गच्छति'-‘ सम् - घसन् - त्सति ' तीनं ' निर्वचनों का क्रमशः अग्न्यात्मक, चक्रात्मक, उभयात्मक सम्वत्सरों से सम्बन्ध है । सम्वत्सराग्नि प्रजानिर्माण में सर्वात्मना रिरिचान ( रिक्त ) हो जाता है, अतएव ' सर्वतोऽत्सारिषम् ' निर्वचन को अग्न्यात्मक सम्वत्सर का ही वाचक माना जायगा । चक्रात्मक ( कालात्मक ) सम्वत्सर की बिन्दु - चिन्तु कुटिल है, अतएव ' सर्वतः त्सरन् - गच्छति ' निर्वचन को इसका वाचक माना जायगा । प्रकृत प्रकरण का ' सम - वसन् - त्सरति ' निर्वचन दोनों का संग्राहक माना जायगा | स्थितिभाव का घनाग्नि से सम्बन्ध है, ग. तभाव का तरलाग्नि ( वायु ), तथा विरलाग्नि ( आदित्य ) से संबन्ध है । अपने स्थितिधर्म्म से यही संवत्सराग्नि सद्रूप त्रिवृदग्नि का प्रभव बन रहा है, एवं गतिभाव से तद्रूप वायु आदित्य का प्रवर्तक बन रहा है । १६५

पृष्ठ 233

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भूमिका ' सभित्येकी भात्रे ' के अनुसार ' मम् ' शब्द एकीभाव का द्योतक है । एक स्थिति में रहना ही ' सम् ' है । फलतः ‘ सम् ’ शब्द ‘ स्थिति ' व ' का सूचक बन रहा है, जिसकी कि पुष्टि - ' वसन् ' से हो रही है । ' सम् - एकत्र — बसन् - स्थितो भवन् ' अग्नि गतिभाव का भी प्रवर्तक बन रहा है, ' त्सरति ' इसी गतिधर्म्म को व्यक्त कर रहा है । स्थितिधर्म से ही ' मनसोऽपि जवीय: ' है । स्थिति - गतिधर्मावच्छिन्न केन्द्रम्थ प्रजापति ही ' सम् - वसन् - सन् -सरति ' के अनुसार ' संवत्सर ' है । स्थिति - गति तत्त्वों की समष्टि ही ' संवत्सरान्नि ' है । इस संवत्सरमूर्ति प्रजापति अग्नि का पहिला आक्रमण स्वलोकरूप भूपिण्ड पर होता है । भूलोकात्मक चक्र इसी संवत्सराग्नि के आक्रमण मे स्वयं भी संवत्सर बन रहा है । भूपिण्ड प्रतिक्षण विचाली है, परन्तु अन्य दृष्टिसे एकक्षण के लिए भी विचाली नहीं है । क्रान्तिवृत्त नामक स्थिरमार्ग को भूपिण्ड कभी नही छोड़ता, यही इसका स्थितिभाव है । साथ ही क्षणमात्र के लिए भी यह एकविन्दु पर स्थिर नहीं रहता । यही इसका गतिभाव है । क्रान्तिवृत्त को न छोड़ना - ' सम् - वमन् ' है, एवं ' त्सरति ' क्रान्तिवृत्त पर ( स्वाक्षपरिभ्रमण करते हुए ) परि-क्रमा लगाना है । इम प्रकार अग्निवत् संवत्सर शब्द ' अलातचक्र ' नाम से प्रसिद्ध कालचक्र का भी बाचक बनता हुआ उभयवाचक बन रहा है । संवत्मरपक्षपाती शाट्यायनि के कथन का निष्कर्ष यही हुआ कि, भूगर्भस्थ अन्नादाग्नि ही संवत्मर है. कालयुक्त संवत्सराग्निं ही मुख्य अग्नि है, यही चित्यप्रजापति है, चयनयज्ञ की मूल-प्रतिष्ठ | रूप अग्नि गही संवत्सराग्नि है । इसी सिद्धान्तपक्ष का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-( ३ ) – “ शाट्यायनिरु हस्माह - ' सम्वत्सर एवाग्निः । तस्य वसन्तः शिरः, ग्रीष्मो दक्षिणः पक्षः, वर्षा उत्तरः ( पक्षः ), शरद् ऋतुमध्यमान्मा, हेमन्तशिशिरा-वृत् पुच्छं प्रतिष्टा, वार्गाग्निः प्राणो वायुः, चचुरादित्यः, मनश्चन्द्रमाः, श्रोत्रं अर्धमासा दिशः, आपो मिथुनं तपः प्रतिष्ठा, मासाः पर्व्वाणि, नाढ्यः, अहोरात्राणि रजत - सुवर्णानि पात्राणि । स एवं देवानप्यांत ” । ( शत ० १०४५२ ) । इसप्रकार शाकायनि, श्रीमत्य, हालिङ्ग, आदि ऋषियों के वायुपक्ष का, हिरण्यगर्भानुयायियों के आदित्यपक्ष का, एवं शय्यायनि के संवत्मरपक्ष का, तीनों का स्पष्टीकरण कर तीनों के संबन्ध में सिद्धान्तपक्ष स्थापित करते हुए, शाट्यायन के पक्ष को ही सिद्धान्तपक्ष मानने का आदेश करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— “ सम्वत्सरोऽग्निः ” -इत्यु हैव विद्यात् । एतन्मयो भवतीति त्वेव विद्यात " । ( शत ० १० | ४ | ५ | २ ) । १६ - सम् - वसन और संम्वत्सर-: “ स्थिति - गतिभात्रात्मक तत्त्वविशेष ही ' सम् - वसन्त्सरति ' निर्वचन से ' संवत्सर ' नामक श्रग्नि है, जिसका आगे जाकर दक्षिणोत्तरादि पक्षरूप से विकास होने वाला है " । संवत्सराग्नि के इस तात्त्विक स्वरूप के आधार पर पाठकों का ध्यान अवश्य ही वे तत्त्व की ओर आकर्षित हुआ होगा । त्रयीवेद का दिग्दर्शन कराते हुए हमने कई बार यह स्पष्ट किया है कि, स्थितिलक्षण जू, गतिलक्षण यत् की समष्टि ही ' यज्जू: ' है । यज्जू; ह्रीं ' १६६

पृष्ठ 234

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द्वितीयखण्ड ‘ यजुः ’ है, एर्व ‘ ऋक् - मामे बजुरपीतः " के अनुसार यजु ऋक्साम में पीत है । यत् वायु ( प्राण ) है, जू आकाश ( वाक् ) है, दोनों का आलम्बन ब्रह्मप्रजापति का मनोभाग है । मन के आधार पर प्रतिष्ठित स्थितिलक्षण ( अ ) काशलक्षण, ग्रायतनलक्षण ) वागूरूप जू तत्त्व, तथा गतिलक्षण ( वायुलक्षण प्राणलक्षण ) यत्तत्त्व, दोनों की समष्टि ही यज्ञमात्रिक ' संवत्सराग्नि ' है । आगे जाकर इसी अग्नि ( वाहमय प्राण ) का वितान होने वाला है । २० - रूप प्राण - शे - त्रिवर्त-जैमा कि पूर्व श्रुति में स्पष्ट किया जा चुका है, ' आपो मिथुनम् ' ( शत ० १० | ४ | ५ | २ ) के अनुमार अपतत्त्व ही इस मम्वत्सराग्नि का मिथुनभाव है । स्वयं सम्वत्सराग्नि वृषारूप पुरुष है, इसके चारों ओर व्याप्त शुक्रात्मक ‘ अपनत्त्व ' योषारूप स्त्री है । इन दोनों के दाम्पत्यलक्षण मिथुनभाव से ही भूपिण्ड का स्वरूपा निर्माण होने वाला है । निष्कर्ष यही हुआ कि, अमृतात्मा के आधार प्रतिष्ठित बह्म प्रजापति के आयतन में अपनी स्वरूपप्रतिष्ठ । एबने वाना, ऋक्साम से छन्दित, आपःशुक्र से वेष्टित गितिलज्ञण यजुर्मूर्त्ति प्रागणमय वागलक्षण तत्त्वविशेष ही सम्वत्सराग्नि है, जिसमें बीजरूप से ' अग्नि - वायु - आदित्य - नामक तीनों प्रतिष्ठित हैं । रमत्रयमूर्ति इस आपोमय सम्वत्सराग्नि के प्रथम व्यापार से क्रमशः अग्निभाग से प्राण का, वायु-भाग मे शरीरभाव ( पिण्डभाव ) का, एवं आदित्यभाग से रूप का विकास होता है । यही प्रथम व्यापार ' अग्निहोत्र ' कहलाया है । इस अग्निहोत्र व्यापार मे उत्पन्न रूप - शरीर - प्राण की सांयोगिक, आपोमयी अव था का ही नाम ' गाँ ' तत्त्व है । यद्यपि ' गौ ' तत्त्व में तानों ही देवताओं का भाग समाविष्ट है, परन्तु यह श्रग्नि की ही मुख्य सम्पत्ति माना गया है । इसी रहस्य को व्यक्त करने के लिए कहा जाता है कि, जब अग्नि-हं त्र मे गी उत्पन्न होई, तां तीनों ' यह मेरी है, यह मेरी है ' कहते हुए प्रजापति के समीप पहुँचे । प्रजापति ने यही निर्णय किया कि - " गौ की उत्पत्ति अग्निहोत्र मे हुई है, अग्नि ने अपने प्राणों की आहुति दी है, अतः अग्नि का ही प्रातिम्बिक सम्पत्ति मानी जायगी " देखिए! “ अग्नि प्राणानहाषीत् । तस्यैतस्य हुतादजनि, तस्माद्गौरग्निहात्रम् * ” । * प्राणभागः - अग्नेः ", शरीरभागः - वायोः, रूपभाग: - आदित्यस्य । तानृनप्त्र-कर्म्मणा तिस्रो देवताः सङ्गता भवन्ति, ततश्च रूप -- शरीर - प्राणसंयोगात् पिण्डोत्पत्तिः । प्रतिपिण्डे प्राणः, शरीरं, रूपमिति त्रयो भावा भृशं विद्यन्ते । त्रय एवैते भावा वस्तुस्वरूप निर्मापकाः । रूप- शरीर -- प्राणसंयोगादुत्पन्नस्तच्चविशेष एव विज्ञानशास्त्रे " गौः ' नाम्ना ) प्रसिद्धः । सैंपा गौः सर्वेषां भूतानां मूलजननी । तस्यामस्यां गांव उपय्यु नाग्तित्रो ( शेष पृष्ठ १६८ पर देखिए ) १६७

पृष्ठ 235

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भाष्यभूमिका १ - आदित्यस्यादित्ये - हवनात् । रूपनिष्पत्ति: २ – बाययो हान् शरोर निष्पत्तिः | २ " अग्निहोत्रम् " ३- अग्ने रग्नौ हवनात् २ प्रारण निष्पत्तिः प्रत्येक पिण्डभाव की स्वरूपनिष्पत्ति ' रूप- शरीर - प्राण ' लक्षण गौतत्त्व पर ही अवलम्बित है । केन्द्रस्थ प्रजापति के इन्द्रभाग से होने वाले विक्षेपणव्यापार मे, विष्णु द्वारा होने वाले प्रशनाया लक्षण-प्रागतिधर्म्म मेषामय - गीरूप - सम्वत्सराग्नि ही बिएड एवं पिण्डमहिमारूप में परिणत होता है, जैसा कि -“ इन्द्रश्च विष्णू यदपम्पृधेथां, त्रेधा सहस्र वितदेर येथाम् ' - ' इमे लोकाः, इमे वेदा:, अथो वागिति च यात् " इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । स्वय गीतत्त्व एक महस्र है । ३३३ शुक्न गौतत्त्व अग्न्यनुबन्धी हैं. ३३३ कृष्ण गौतत्त्व वाय्वनुत्रन्धी हैं. ३३३ पृश्नि गौतत्त्व श्रादित्यानुत्र - धी हैं । ' कामगवी ' ( कामधेनु ) नाम से प्रसिद्ध सर्वमूलभूत कृष्ण - शुक्ल - पृश्निभावात् कि एक गीतत्त्व प्रजापत्यनुबन्धी है । इन एक सहस्र गौतत्त्वों का अपू भाग के द्वा । ऊर्ध्ववितान होता है । क्योंकि गौतत्व एक सहस्र हैं, अतएव तदनुत्रन्धी वाकू - लोक - वेद मावों को भी क्रमशः वाकुमाहसी, लोकमाहसी बेटसाहसी, रूप से साहसी भावों में हीं परिणत होना पड़ता है । यह सहस्र गौतत्त्व ही तो पार्थिव प्रजापत की आयु के सहस्र वर्ष हैं, जिनका निम्नलिखित श्रुति से स्पष्टी-करण हो रहा है-“ स सहस्रायुर्जुज्ञ े । स यथा नहीं पारं परापश्येत्, एवं स्वस्यायुषः पारं पराचख्या " ( शत ० ११।१६।६ । ) । सर्वमूलभूता कामगवी - पृश्निशुक्ल कृष्ण भावायोपेता गौ: - ( १ ) १ – पृश्निगः– आदित्य प्रधाना – रूपाधिष्ठात्री ( ३३३ ) २ - कृष्णा गौः - वायु प्रधाना-- --शरीराधिष्ठात्री ( ३३३ ) ' ततो वस्तुस्वरूपनिष्पत्तिः ' ३ – शुक्ला गौः – अग्नि प्रधाना - - प्राणाधिष्ठात्री ( ३३३ εεε ( १६७ की टिप्पणी का शेषांश ) देवताःस्त्र - स्त्र दायादस्थापनार्थ प्रतिस्पर्द्धां चक्रुः । तत्र परम प्रजापतिरुवाच - प्राण एव शरीरधिर्त्ता, प्राण एव रूपप्रतिष्ठा, तस्मात प्राण एव मुख्यः । प्राणश्चाग्नेयभागः 1 यातश्च सैषा गौरेशग्निहोत्रम् । अग्निरेब वायुः, अग्निग्वादित्यः, अग्निः सर्वा देवताः, इति हि वैज्ञानिका आहुः । श्रतश्च गौरग्नेरेव प्रातिस्विकं धर्नामिति राद्धान्तपतः । १६८

पृष्ठ 236

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द्वितीयखण्ड रूप · प्राण — शरीर — भावात्मक एक सहस्र गौतत्त्व के समन्ध मे महस्रायु बना हुया. अपूतत्त्व मे वेष्टिन, श्रग्निवायु प्रादित्य की चीजावस्था मे युक्त, प्रमय वागग्न ही अन्नाद्वाग्नि है, यही चित्य प्रजापति है, यही अग्निचयन की मूनप्रनिष्ठा है, इसी पर आगे जाकर पाँच चितियाँ प्रतिष्ठित होने वालीं हैं । सम्वत्मरमण्डल इसी पर चित होता है, इमी संत्र - संस्कार से प्रजापति का चितिभाव ' सञ्चिति ' नाम से प्रसिद्ध होने वाला है, जो कि सञ्चितिभाव सञ्चितिब्राह्मणों में ' रुद्र ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके लिए कि देवता लोग शान्तरुद्रिया का अनुष्ठान किया करते हैं. - । पूर्व निरूपित मृत - ब्रह्म - शुक्र - विवतों में से शुक्रवित्रर्त पर दृष्टि डालिए । शुक्र की व्याख्याकरते हुए बताया गया है कि, ' वाकू - आपः अग्निः ' का ही नाम शुक्र है । अमृत - मृत्यु की सामान्य व्याप्ति के आधार पर वाक्- ग्राप: - ग्रग्निमय शुक्ररूप इस चित्य प्रजापति ( अन्नाटाग्निप्रजापति ) के भी मृतात्मा, मत्येशुक्रात्मा भेद मे दो त्रिवर्त्त हो जाते हैं । अमृतशुक्रात्मा ' श्रमृनाग्नि ' है, इमे ही चनपरभाषा में ' चितेऽग्निर्निधीयते ' निर्वचन से ' चितेनित्रेय ' कहा जाता है । मर्त्यशक्रात्मा ' मत्यग्न ' है, यही चयन यज्ञ का ' चिनो भवति, संचितश्च भवति ' परिभाषा से पचत्याग्नि ' है । चितेनिधेयाग्नि-लक्षण अमृत शुक के ‘ वाक् आपः - अग्नि: ' इन तीन विवर्त्तो मे महिमालक्षणा - अष्टाचत्वारिंश ( ४८ ) स्तोमाता ' मह ' पृथिवी का वितान हंता है । एवं चित्यान्निलक्षण मर्त्यशुक्रत्रयी से पिण्डपृथिवी की स्वरूप-निष्पत्ति होती है । इसप्रकार तीन के ६ शुक्र हो जाते हैं, जिनका विशद वैज्ञानिक स्वरूप ' ईशोपनिषद्वि-ज्ञानभाग्य ' प्रथमखण्डान्तर्गत ' शुक्रनिरुक्ति ' प्रकरण में प्रतिपादित है । २१ कृष्णाजिन और पुष्कप-बाकू ' - आप ' -अग्निः -'- अग्निः - श्रापः * - बाकू ' इस क्रम से इन दोनों शुक्रविवत का वितानहुश्रा है । भूपिण्ड के केन्द्र में वाक्शुक्र प्रतिष्ठित है, इसके आधार पर आप स्तर प्रतिष्ठित है, इसके आधार पर अग्निस्तर प्रतिष्ठित है । मर्य - वाक - आपः अग्निः की समष्टि ही भूपिण्ड है । यही भूपिण्ड चयन परिभाषा में ' कृष्णा'जन ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका तात्त्विक विवेचन पूर्व ' के ' प्रमाणवाद ' प्रकरण के * " अथातः शतरुद्रियं जुहोति । श्रप सर्वोऽग्निः संस्कृतः । स एषोऽत्र रुद्रो देवना । तस्मिन देवा एतदमृतं रूपम दधुः । स एषोऽत्र दीप्यमानोऽतिष्ठत् - अन्नमिच्छमानः । तस्माद ेवा अभियुः, यहाॅ नोऽयं न हिंस्यात् इति । तेऽब्रुवन् अन्नमस्मै सम्भगम, तेनॅनं शमयामेति । तग्माऽएतदन्नं सममरञ्चान्तदेवत्यम् । तेनैनमशमयन् । तद्यदेतं देव-मेतनाशमयन्, तस्माच्छान्तदेवत्यम् । शान्तदेवत्यं ह वै तच्छतरुद्रियमित्याचचते परोक्षम् " ( शत ० | १ | १ | १-२ । ) । 4 " ज्ञो वै कृष्णाजिनम् । इयं वै कृष्णाजिनम् । इयम्मु वै यज्ञः । अस्यां हि यज्ञस्तायते " ( शत ० ६ । ४ । २ ॥ ) ।

पृष्ठ 237

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भाष्यभूमिका कृष्णाजिनपरिच्छेद में किया जा चुका है । अमृत - अग्नि, आप: - वाकू की समष्टि ही ' महिमापृथिवी ' है । यही माहमापृथिवी चयनपरिभाषा में ' पुष्करपर्ण ' नाम से व्यवहृत हुई है, जैसा कि निम्नलिखित बाजि श्रुति से प्रमाणित है --१— योनिर्यै पुष्करपर्णम् । अपां पृष्ठममि योनिरुनेरिति । अपां ह्य ेतत् पृष्ठ ं , योनि-ह्येतदग्नः । समुद्रो ह्य ेतदभितः पिन्वते । वर्द्धमानो महायस्व पुष्करे । द्यौः पुष्करपणम् । आपो वै द्यौः । आपः पुष्करपणेम् ” ( शत ० ६ | ४ | ०७-६-६- ) । २ – “ प्रतिष्ठा वै पुष्करपर्णम् । इयं वै पुष्करपर्णम् । इयमु वै प्रतिष्ठा । यो वाऽअभ्याम-प्रतिष्टिता s पि दूरे सन्, अप्रतिष्ठित एव सः । रश्मिभिर्वाऽएपोऽस्यां प्रतिष्ठतः । श्रस्यामेवैनमेतत् प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापर्यात " । ( शत ० ७ । ४ । १ । १।३ । ) । ३ – “ इन्द्रो दृत्रं हत्वा नाग्तृपाति मन्यमानोऽपः प्राविशत् ता श्रवीत् विभवै, पुरं भे कुरुत इति । स योऽपां रस आसीत, तमू समुदाहन् । तमग्म पुग्मकुवन । तद्यदस्मै पुरम कुर्वन् तस्मात् पुःकरम् । पुःकरं ह वै तत् पुष्कर-मित्याचक्षते पराक्षम् । तद्यत. पुष्करपर्णे उपदधाति, यमेवास्तमापो रसं समुदौ-हन्, यामस्मै पुरमकुत्रंन्, नस्मिन्ननैनमेतत् प्रतिष्ठापयांत " । ( शत ० | ७ ४ | १ | १३ | ) । कृष्णाजिन ( भूपिण्ड ), पुष्क पर्ण ( भूमण्डल ) का निर्माता सम्वत्सराग्नि अन्नाद नाम मे उपश्रुत है । अन्नग्रहण करना इसका प्रातिश्विक धर्म है । वही अग्न्यन्न सोम नाम से प्र. सद्ध है । इमप्रकार अन्नादाग्नि के स्वरूप में अन्नसोम का भी अन्तर्भाव सिद्ध हो जाता है! पिण्डनिर्माण में अग्नगर्भित सोम का सहयोग है, एवं महिमा वितान में सामगर्भित अग्नि का सहयोग है । सोमसमन्त्रित गौतत्व मे भूपिण्ड की, तथा अग्निसमन्वित गौतत्त्व से भूम ' हेमा की स्वरूप निष्पत्ति हुई है, यही तात्पर्य है । सोम संकोचधर्म्मा है, श्रतएव तत्प्रधाना पिण्डपृथिवी सकोचलक्षण वनभाव से युक्त है । अग्नि विकासशील है, अतएव तत्प्रधाना महिमापृथिवी ं विकास ( वितान ) भात्र से युक्त है । श्रादित्यसमन्वित पृश्नि गौ से वाकशुकद्वारा ' मही ' पृथिवी की, वायुसमन्वित कृष्णा गौ मे श्रापः शुक्रद्वारा ' सागराम्बरा ' पृथिवी की, एव अग्निसमन्वित शुक्ला गौ से अग्निः शुक्रद्वारा ' यशिया ' पृथिवी की स्वरूप निष्पत्ति हुई है । इन्ही तीनों पार्थिव विवर्णों के आधार पर “ छन्दोमा, गासब, सम्वत्सर " नामक तीन यज्ञों का वितान हा है, जैसा कि पूर्व के त्रैलाक्य - त्रिलोकी-स्वरूपपरिचयप्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । भूकेन्द्र से ४८ व अहर्गण पर्य्यन्त ' वाकू ' नाम का शुक व्याप्त रहता है, यही ' वाङ्मयी ' महापृथिवी है । छन्दोमायज्ञ के सम्बन्ध से यही ' छन्दोमा - मण्डल ' २००

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श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, दुर्गापुरा ( जयपुर ) उपनिषद्भूमिका - द्वितायखण्ड ( २०१, तथा २०२ के मध्य में ) ( ४ ) वागापोऽग्निः शुक्र त्रयवितान परिलेख: -छन्दोमा ) ( ४८ वाक ' ' मही गोसवः ) ३३ : ( आप ' सागराम्बरा ' . ) सम्वत्सरः २१ . ( ' अग्नि ' यज्ञिया bil:: ble अग्नि वाक्

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द्वितीयखण्ड है. यही ' मही ' पृथिवी है । भूकेन्द्र से प्रारम्भ कर ३३ अहर्गण पर्य्यन्त ' श्राप: ' नामक शुक्र व्याप्त रहता है, यही ' आपोमयी ' पृथिवी हैं, गोसवयज्ञ के सम्बन्ध से यही ' गोसवमण्डल ' है, जिसका ' व्रजं गच्छ गंःष्ठानम् ' ( यजुः सं ० १ । २५ ) इत्यादि रूप से वर्णन हुआ है, यही ' सागराम्बरा ' पृथिवी है । भूकेन्द्र से आरम्भ कर २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त श्रग्निः शुत्र की व्याप्ति है । यही अग्निमयी है, सम्वत्सरयज्ञ के सम्बन्ध से " यही ' सम्वत्सरमण्डल ' है, यही ' यज्ञिया ' पृथित्री है, यही प्रकृत प्रकरण का मुख्य लक्ष्य है । इस-प्रकार मर्त्यशुकत्री से ' कृष्णाजिन ' लक्षण भूपिण्ड की स्वरूप निष्पत्ति हुई है, एवं श्रमृतकत्रयो से पुष्करपर्स लक्षण महापृथिवी का वितान हुआ है, जैसा कि निम्नलिखित परिलेख से स्पष्ट है— १ - श्वग्निगर्भितया, सोमसमन्वितया, आदित्यानुगतया, पृष्ण्या गवा - रूपत्रिकासः । नगर्भिता, सोमसमन्वितया, वाय्वनुगतया, कृष्णया गया - शरीरविकासः । ३- अग्निगर्भितया, सोमसमन्वितया, अग्न्यनुगत्तया, शुक्लषा गवा - प्राणविकासः । १ – रूपात्मकेन मर्त्यत्राक् -शुक्रेण - भूकेन्द्रोदयः २- शरीरात्मकेन मर्त्यापेः - शुक्र - भूपृष्ठोदयः ३ - प्रागात्मकेनं मत्यग्नि - शुक्रं - पिण्डभावोदयः । - भूपिण्डः तदि: ' कृष्णाजिनम् ' १ - सोमगर्भितया, अग्निसमन्वितया, आदित्यानुगतया. वृष्णया गवा - रू विकासः । २- सोमगर्भितया, अग्निसमन्वितया, वाध्वनुगतया, कृष्णया गवा - शरीरविकासः । ३- सोमगर्भितया, अग्निसमम्त्रितमां, अग्न्यनुगतया, शुक्लया गवा - प्राणबिकासः । १- रूपात्मकेन- श्रमृतवाक्- शुक्र ए -४६ स्तोममण्डल विकासः ) २- शरीरात्मकेन - अमृतापः शुक्रे ए -३३ स्वोममण्डल विकासः - भूमहिमा दिर्द ' पुष्करपर्णन ' ३- त्रागात्मकेन - अमृताग्निशुके - २१ स्तोममण्डलधिकासः * भूकेन्द्र से ४८ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाली त्रैलोक्यत्रिलोक रूपा, मही सागराम्बरा यशिया - भेद से त्रिःपृथिव्याति का महापृथिवी का एकविरा स्तोमावच्छिन्न जो अग्नि मण्डल है, उसे ही हम इस प्रकरण में २०१

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भाष्यभूमिका ' सम्वत्मर ' प्रजापति कहेंगे । इस वत्सरप्रजापति की चिति उस ' सम् - वसन् ' लक्षण, स्थिति गत्यात्मक पिण्डावच्छिन्न, अन्नादाग्नि पर ही अवलम्बित है । उसी पिण्डाग्नि के आधार पर इस सम्बत्सर का वितान हुआ है, इसी चिति रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है – ' अग्निरेष पुरस्ताच्चीयते सम्वत्सरे ' ( शत ० १०।१।१।४ ) । 1 तात्पर्य श्रुति का यही है कि, अन्नादाग्नि के चयन से मर्त्य - वाक् " आपः अग्निः, शुक्रद्वारा पहिले पिण्डपृथिवी का जन्म होता है, अनन्तर इसी के आधार पर अमृत अग्नि ग्रापः - वाक् - शुक्रद्वारा त्रिधा विभक्त अग्नि वायु - त्र आदित्यात्मक त्रिवृत् ( ६ ) - पञ्चदश ( १५ ) - एकविंश ( २१ ) स्तोम भेद से -, महापृथिवीलक्षण सम्वत्सर का जन्म होता है । भूपिण्ड में प्रतिष्ठित अग्निरस ही उर्ध्व उत्क्रान्त होकर मण्डलाकार में परिणत होता हुआ त्रिदेवरूप से व्यक्त होता है । मर्त्यशुक्रमय मर्त्याग्नि भूतानि है, यही पिण्डपृथिवी का आत्मा बना हुआ है । २२ - आंप - शरः-जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है, अन्नादाग्निलक्षण पुरुष के साथ स्त्री का दाम्पत्यभाव होता है, एवं इसी दाम्पत्यभाव मे भूपिण्ड का जन्म हुआ है । इस भूपिण्डोत्पत्ति की आरम्भदशा का य विश्लेषण किया जा सकता है कि, जत्र भूपिण्ड उत्पन्न न हुआ था, तो उस समय अमृत - ब्रह्म गर्भित शुक्राग्नि का ही साम्राज्य था । इस स्थिति में इस अन्नादाग्नि प्रजापति में आदानलक्षण विष्णु के सहयोग से केवल “ को हं बहु स्याम् - प्रजायेय ", यह मृत्युलक्षणा शनाया ( सृष्टिकामनामयी बुभुक्षा- भूख ) वृत्ति ही जाग्रत थी । इस वृत्ति के आकर्षण से प्रजापतिलक्षण अन्नादाग्नि में क्षोभ उत्पन्न हुआ, क्षोभ से संघर्ष हुआ, सघर्ष से अग्निताप चरमसीमा पर पहुँचता हुआ ' अनू ' ( पानी ) रूप में परिणत होगया । यही आग्नेय पानी विज्ञानभाषा में ' अर्क ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस पूतत्त्व और अग्नितत्त्व को गतिलक्षण एमूत्र नामक वगहवायु का सहयोग प्राप्त हुआ । इस सहयोग से आग्नेय पानी घनभाव में परिणत हो गया । अपतत्त्व की यहा घनावस्था विज्ञानभाषा में ' शर ' ( थर - मलाई ) नाम से प्रसिद्ध हुई । इसप्रकार ' अग्नि ग्रुप - वायु ' तीनों के धारावाहिक व्यापार से यह ' पांश ' क्रमश: — ' आपः ' – फेन - मृत - सिकता * - शर्करा " - अश्मा ' - अय: ७ – हिग्ण्य ” इन श्राट अवस्थाओंों में परिणत होता हुआा कालान्तर में ( अष्टव्याहृतिरूप ) भूपिण्डरूप में परिणत हो गया * । आज भी पानी से इसी क्रम से मृण्मय भूभाग की अभिवृद्धि का हम साक्षात्कार कर रहे है । पानी में वायुप्रवेश * ( १ ) सोऽपोऽसृत बाच एत्र लोकात् I । सोऽकामयत - आभ्योऽद्भ्योऽधीमां प्रजा-येयमिति, तां संक्लिश्याप्सु प्राविध्यत् । सोऽकामयत - भूय एव स्यात्, प्रजायेगांत । सोऽश्राम्यत्, स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तपानः ' फेन ' मसृजत - ' मृदं ' - शुष्कापम्प -' सिक ं’– शंकरा - मश्मान - मयो - हिरण्य - मोषधिवनस्पत्य सृजत । तेनेमां पृथिवीं प्राच्छ / -( शेष पृष्ठ २०३ पर ) २०२