Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 241–250

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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द्वितीयखण्ड करता है, पानी बुद्बुद् स्वरूप में परिणत हो जाता है । वतु'लाकार बुद्बुद् के गर्भ में प्रविष्ट तिसहवागे " यु बुद्धुमण्डल के त्रुटित होने से पहिले पहिले ही अन्य पानी के आक्रमण से नियत समय में फेन ( भाग ) रूप में परिणत हो जाता है । परि वायु की मूर्च्छितावस्था ही फेन है । फेन आगे जा॒र इसी श्रग्नि - वायु के व्यापार से क्रमशः मृत् ( क्षार मिट्टी ) - सिकता ( चिकनी मिट्टी ) - शर्करा ( चालू मिट्टी ) - अश्मा · ( पात्राणविशेष ) - यः ( लौह और पाषाण के मध्य का मृरमाणुप्रधान कच्चा लौह ) - हिरण्य ( धातुमात्र ). रूप में परिणित होता हुआ भूपिण्डरूप में परिणित हो जाता है । इसप्रकार क्रमिक चिति से चित्य ( २०२ की टिप्पणी का शेषांश ) दयत् । ता वा एता नत्रसृष्टयः । इयमसृज्यत इयं ह्यग्निः अस्यै हि सर्वोऽग्निश्चियते । अभूद्वा इयं प्रतिठा । तद्भूमिर भवत् । तामप्रथयत्, सा पृथिव्यभवत् " - ( शत ० ६ | १ | १ | ) । ( २ ) - प्रजापतिर्वा दमग्र आसीत्, एक एव । सो कामयत - स्यां प्रजायेय - इति । सोऽश्राम्यत्, स तपोऽप्यत । तस्माच्छ्रान्तः तेनात्- '. प ( १ ), ' अम्रुज्यन्त । तस्मात् पुरुषात् तप्तादापो जायन्ते । आपोऽब्रुवन -कत्र वयं भवामेति I । तप्यध्वमित्यब्रवोत् । ता अतप्यन्त, ताः ' फेन ( २ ' मसृजन्त । तस्मादपां तप्तानां फेनो जायते । फेनोऽत्रत्रात्-क्वाहं भवानीति ० । स ' मृदमसृजत ( ३ ) । एत फेनस्तप्यते यदप्स्वा वेष्टमानः प्लवते, स यदो - पहन्यते, मृदेव भवति । मृदब्रवीत् । सा ' मिकता ( ४ ) ' श्रसृजत । एतद्व ै मृत् तप्यते, यंद॑नां विक्रुषन्ति । तस्माद्यद्यपि सुमात्ने त्रिपन्ति, सकर्तामिचैव भवति । एतान्नु तत्, यत् - क्वाहं भवानि — इति । सिकनाभ्यः ' शर्करा ( ५ ) ' मसृजत । तस्मात् सिकताः शकरेंत्रा-ततो भवति । शर्कराया ' अश्मानं ( ६ ) ', तस्माच्छक राश्मैवान्तता भवति । यश्मनः-' क्रयः ( ७ ) ' । तस्मादश्मनोऽयो धमन्ति । अयसो ' हिरण्यम् ( ) ८ ' । तद्यदसृज्यत, अक्षरत्तत् । यदक्षरत् — तस्मादक्षरम् । यदष्टौ ऋच्चोऽक्षरत, सैवाष्टक्षरा गायत्र्यभवत् । अभूद्वा इयं प्रतिष्ठेति, तद्भूमिरभवत् । तामप्रथयत् सा विच्यभवत् ” । ( शत ० ६ । १ । ३ । १ –जुं ( ३ ) – “ तस्यामस्यां प्रतिष्टायां भूतानि च भूतानां च पतिः सम्वत्सरायादीचत । भूतानां? पतिगृहपतिरासीत्, उषाः पत्नी । तयानि तानि भूतान, ऋतव ॥ अथ यः स भूतानां पतिः, सम्वत्सरः सः । अथ या सोषाः पत्नी, चौरसीसा । तानीमानी भूतान च भूतानां पतिः सम्बत्सरऽउपसि रेतोऽसि चद् " ( शत ० ६।५।३३।७–८ ) । २: ३

पृष्ठ 242

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भूमिका अनादाग्नि ' अपांशर ' का सहयोग प्राप्त कर पिण्डस्वरूपसम्पादक पार्थिव ' एषवराह * ' के अनुग्रह से भूपिण्ड का प्रभु बन जाता है । भूपिण्ड बन गया । पुनः उसी काम - तप- श्रम - लक्षण सृष्टयनुग्न्धत्रयी का व्यापार प्रारम्भ हुआ । इस सन्ताप लक्षण संघर्ष से भूगर्भस्थित अमृतलक्षण रसाग्नि का प्राणरूप से वितान हुआ । बाहिर की ओर वितत इसी रसाग्नि के घनादि भेदं से अग्नि वायु - आदित्य नामक तीन विवर्च हो गए । तीनों अग्नियों से त्रयीवेदका, वेदाधार से यज्ञ का, यज्ञ के द्वारा पार्थिव प्रजा का विकास हुआ । इस सम्पूर्ण प्रपञ्च को अपने गर्म में रखने वाला त्रैलोक्य व्यापक यही प्राणाग्नि ' सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध हो गया । इसप्रकार अन्नादाग्नि का मर्त्यभाग भूपिण्डात्मक चित्य प्रजापति बन गया, एवं इसी का अमृतभाग ( रसभाग ). भूमहिमात्मक सम्वत्सर प्रजापति बन गया । पार्थिव सृष्टि के इन्हीं दोनों दिव का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-1 १- ' नेव्ह किञ्चन।ग्रऽआसीत् । मृत्युनै वेदमावृतमासीदशनायया । अशनाया हि मृत्युः । तन्मनोऽङ्कुरुत — श्रात्मन्वी स्याम् - इति । सोऽर्च्चन्नचरत् । तस्यार्चत आपोऽजायन्त । अर्चते मे कमभृत् - इति तदेवार्क्सस्यार्कचम् । आपो वाऽर्कः । तद्यदपां ' शर ' आसीत्, तत् ममन्यत सा पृथिव्य भवत् " ॥ २– “ तस्यामश्राम्यत् । त॒स्य भ्रान्तस्य सप्तस्य तेजोरसो निरवर्त्तताग्निः । स त्रेघात्मानं.. व्यकुरुत - आदित्यं तृतीयं, वायु तृतीयम् । स एष अप्सु प्रतिष्ठितः । " ३- " सोऽकामयत - द्वितीया मात्मा जायेतेति । स मनसा वाचे मिथुनं समभवद-शनायाम् । मृत्युस्तद्रेत आसीत् । स सम्वत्सरोऽभवत् । न ह ततः पुरो सम्ब-न्सर यास । तमेतावन्तं कालम बिभु - यात्रा नृत्यम्वत्सरः । तमेतावतः कालक्ष्य परस्तादसृजत । ” ४ – “ स तया वाचा, तेनात्मना सर्वमसृजत, यदिदं किश्च ऋचो, यजुषि सामानि, छन्दांसि, यज्ञान, प्रजां, पशून् । स यद्यदेवासृजत, तवदत्तुमधियत । सर्वं वा चीति, तददितेरदितिच्चम् । सर्वस्याचा भवति, सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेत-ददितेरदितित्त्वं वेद । ” ( शत ० १०।६।६ । ) । - Xxxxx * ( १ ) – “ अथ वराहविहतम् । ' इयत्य आसीत् ' इति । इयती ह वाऽइयमग्रे पृथिव्यास, प्रादेशमात्रो । तामेमृषवराह उज्जघान । सोऽस्याः पतिः प्रजापतिः । तेनदेन-तन्मिथुनेन प्रियेण धाम्ना समर्द्धयति ". ( शत ० १४।१।२।११ । ) । ( २ ) - " स ६ वराहो रूपं कृत्वा उपन्यमजत् " ( तै ० ब्रा ० १।३।६ । ) । २०४

पृष्ठ 243

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द्वितायखण्ड २२ - बृहतीद्वन्द का वितान, और चयनेयज्ञरहस्य-T ' प्राजापत्य वेदमहिमा ' से सम्बन्ध रखने वाले प्रजापति के स्वरूप प्रदर्शन के लिये क्रमशः सम्वत्सर प्रजापति, सम्वत्र अग्न, इन दों तत्त्वों का आश्रय लिया गया । बिना ऐसा किए प्रजापति की वेदमहिमा का स्पष्टीकरण कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव था । पूर्वप्रतिपादित सम्वत्सर अग्नि को ( जिस अग्नि के गर्भ में सोम प्रतिष्टित है, अतएव जिस प्रजापति को ' अग्नीषोमात्मक ' माना जा सकता है ) लक्ष्य में रखिए, एवं इस अग्नि के ( अग्नि - सोम के ) आधार पर वितत प्राजापत्य - वेदमहिमा के दर्शन कीजिए 1 जिस ' सम्वत्सरप्रजापति ' की गाथा का अत्र तक विभिन्न रूप से यशोगांन हुआ है, उस सम्वत्सर के अग्न्यात्मक तथा चक्रात्मक, दो भेद हैं । अग्न्यात्मक ( अग्नि - सोमात्मक ) सम्वत्सर की जैसी स्थिति है, जो अययवविभाग हैं, कालात्मक चक्रसम्वत्सर की भी ठीक वैसी ही स्थिति है, वे ही अवयवविभाग हैं । प्रकृत में यनादि जिन पर्वों के आधार पर वेटमहिमा का स्वरूप बतलाया जाने वाला है, उन का मुख्य लक्ष्य अग्न्यात्मक सम्वत्सर ही समझना चाहिए । यह बतलाया ही जाचुका है कि, ' अयन ऋतु - मास पक्ष अहो-रात्र -मुहूर्त्त, आदि शब्द प्रधानतः श्रग्नि - सोम खण्डों के ही वाचक हैं । आगे जाकर इन शब्दों का कालवाचकता में भी उपयोग होने लग गया है, एवं इस उपयोग का एकमात्र कारण अग्न्यात्मक सम्वत्सर के साथ होने वाली चक्रात्मक सम्वत्सर की समानस्थिति ही है । अग्न्यात्मक सम्वत्सर वह अग्निमंडल है, जिसके ' त्रिवृत्- पञ्चदश- एकविंश ' स्तोमभेदसे क्रमशः पृथिवी-अन्तरिक्ष - द्यौ ' ये तीन विवर्त्त हैं । इन तीनों में क्रमशः अग्नि वायु आदित्य नामक तीन प्रारणदेवता प्रतिष्ठित हैं । प्रत्येक पदार्थ में ‘ ज्ञान - क्रिया अर्थ ' भेद से तीन शक्तियों का समावेश रहता है । दूसरे शब्दों में शक्तित्रयी की समष्टि का नाम ही ' पदार्थ है । पदार्थ का अर्थभाग ( भूतभाग- दृश्य पिण्ड भाग ) त्रिवृत्स्तो मावच्छिन्न अर्थशक्ति घन पार्थिव अग्नि से सन्बन्ध रखता है । पदार्थ का क्रियाभाग ( आदान विसर्गात्मक व्यापार ) पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न, क्रियाशक्तिप्रवान ' श्रान्तरिक्ष्य वायु से सम्बद्ध है । एवं पदार्थगत ज्ञानमात्रा का एकविंशस्तोमावच्छिन्न, ज्ञानशक्ति-प्रधान दिव्य आदित्य ( इन्द्र ) से सम्बन्ध है । इस प्रकार सम्वत्सर प्रजापति के अवयवरूप तीनों देवता अपनी अपनी विभिन्न शक्ति से भौतिक पदार्थों के सर्वस्व बन रहे हैं । अग्नि वायु - इन्द्र के सन्निवेश तारतम्य से ही पदार्थवर्ग ' असंज्ञ - अन्तः सज्ञ - ससंज्ञ ' भेद से तीन भागों में विभक्त हैं | जिन में अर्थशक्तिप्रधान अग्निरूप वैश्वानर का प्राधान्य है, वे सत्र ( जड़पदार्थ - धातुसृष्टि ) तमो-विशाल'असंज्ञपदार्थ ' ( असंज्ञजीव ) हैं । जिनमें क्रियाशक्तिप्रधान, वायुलक्षण तैजस भाग का प्राधान्य है, वे सत्र श्रद्ध'चेतन श्रोषधि वनस्पतिवर्ग ' तमोविशाल ' अन्तः संज्ञपदार्थ [ श्रन्तः संज्ञजीव ] ' मानें गए हैं । जिनमें ज्ञान-शक्तिप्रधान आदित्य [ इन्द्र ] लक्षण ' प्राज्ञ ' भाग की प्रधानता है, वे सब [ चेतनजीव कृमि, कीट, पक्षी, पशु, मनुष्य, भेदभिन्न पञ्चविध रजोविशाल तिर्य्यक जीव, एवं यक्ष - राक्षस - पिशाच - गन्धर्व - पैत्र्य - ऐन्द्र-प्राजापत्य - ब्राह्म - भेदभिन्न अष्टविध सत्त्वविशाल ऊर्ध्व जीव ] ससंज्ञपदार्थ [ ससंज्ञजीव ] कहलाए हैं । इस प्रकार ग्रूपनी स्थिति के तारतम्य से ये तीनों देवता चतुर्दशविध भूतसर्ग के सर्वेसर्वा बने हुए हैं । अर्थमूर्ति अग्नि की विकासावस्था ही ' ऋग्वेद ' है । क्रियामूर्ति वायु की विकासावस्था ही ' यजुर्वेद ' है । एवं ज्ञानमूर्ति ' आदित्य की विकासावस्था ' ही ' सामवेद ' है । ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आप: ' । के अनुसार, एवं २०५

पृष्ठ 244

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भाष्यभूमिका पूर्वप्रतिपादित लेमवितानविद्या के अनुसार एकविशस्थ ( २१ वे अहर्गण पर स्थित ) आदित्य से ऊपर ( परितः ) भृग्वङ्गिरोमय तत्व प्रतिष्टित है । यही चांथा पोलोक है । श्रापोमय [ साममय ] मृग्वङ्गिरा की विकामावस्था ही ' अथर्ववेद ' है । इन विकासों का क्या स्वरूप है? इस प्रश्न का विशद विवेचन अगले प्रकरणों में होने वाला है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में यही जान लेना पर्य्याप्त होगा कि, सम्वत्सराग्नि के तीन पर्वो से [ अग्नि वायु - ग्रादत्य से ] विकसित होने वाली ऋक यजुः - सामात्मिका वेदत्रयी त्रिवी है, एवं भृग्वङ्गिरो नामक चौथे [ सोम ] पर्व से विकसित होने वाला अथर्ववेद सोमवेद है । इस प्रकार अपने अग्नि-सोमपर्वो से चनुर्वेद विकास का कारण बनता हुआ सम्वत्सरप्रजापति वेदसृष्टि का अधिष्ठाता चन रहा है । पार्थिव अग्नि गार्हपत्याग्नि है, ग्रान्तरिक्ष्याग्नि ( वायु ) अन्वाहाय्यंपच नाग्नि है, दिव्याग्नि ( आदित्य ) श्राहवनीयाग्नि है । स्वयं अग्नि वायु ग्रादित्य ही इस यज्ञ के होता - अध्वर्यु - उद्गाता हैं । इन के अर्थ-क्रिया- ज्ञान- प्रसारलक्षण कर्म्म हीं होत्र - प्राध्वर्यव - श्रौद्गात्रकर्म हैं । ऋक - यजुः सामात्मक तत्त्व ही इन ऋत्विजों के कार्य्यमाधक वेदमन्त्र हैं । परिणाम इस यज्ञ का है - सम्वत्सरप्रजापति का पुनः सन्धान, जो कि सम्वत्सरप्रजापति अग्नित्रयः - वेदत्रयी - लोकत्रयी आदि साम्वत्सरिक भावों के निर्माण में अपनी मात्रा खर्च कर देन से विहस्त बन जाया करता है । बिस्रस्त ( शिरचान ) पिता - सम्वत्सर - प्रजापति की क्षतिपूर्ति इन देवताओं के द्वारा इसी यज- प्रकिया में होती है । सचमुच सृष्टि विद्या से सम्बन्ध रखने वाला विधि का यह एक विचित्र विधान है कि, जिम पिता ने ' अग्नित्रात ' लक्षण पुत्रों का उत्पन्न कर इनके लालन - पालन में अपने शरीर ( अग्निमात्रा ) की भी आहुति देते हुए अपने आपको सर्वथा रिरिवान बना लिया, उसी को अन्त में अपने पुत्रों की सहायता की अपेक्षा हुई । वे ही पुत्र प्राज उपलब्ध त्रै तोक्य सृष्टि में ) पिता का श्रामन ग्रहण किए हुए हैं । पिता के साम्राज्य का श्रामन इन पुत्रों नें ग्रहण कर रक्खा है, जिस अग्नि-वायु - इन्द्रसाम्राज्य का केनोपनिषत् में विस्तार से निरूपण हुआ है । इसी प्राकृतिक चित्य प्रक्रिया का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है-१ – प्रजापतिरेव विस्रस्तो देवानब्रवीत् - ' सं मा घत्त ' इति I । ते देवा अग्निमब्रुवन्-' वयं मं पितरं प्रजापतिं भिषज्याम ' इति । स वाऽश्रहमेतस्मिन्त्सवस्मिन व विशानिति तथेति । तस्मादेतं प्रजापति सन्तमग्निरित्याचक्षत । " २ - तं देवा अग्नावाहुतिभिरभिपज्यन् । ते यां यामाहुतिमजुहवुः, सा सैनं पक्वेष्टका भृत्वाप्यायत । तद्यदष्टान् समभवन् तस्मादिष्टकाः । सोऽब्रवीत्-यावद् - यात्रद्व ै जुहुथ, तावत्तावन्मे कं भत्रतोति । तद्यदस्माऽइष्टे कमभवत्, तस्माद्व वेष्टकाः ” ।

* " ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिज्ञे । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा महीयन्त ।

तु ऐचन्त - अस्माकमेवायं विजयः अस्माकमेवायं महिमा, इति ॥

( केनोपनिषत् ३ | १ | ) ।

पृष्ठ 245

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द्वितीयखण्ड ३ – “ स एप पिता - पुत्रः । यदेषो ( प्रजापति: ) अग्निम सृजत, ते पोऽग्नेः पिता । यदे मग्निः ( पुत्रः ) समदधात्, तेतम्याग्निः पिता । यदेष देनानसृजत, तेप देवानां पिता ' यदेतं देवाः समदधुः, तेनतस्य देवाः पितरः । उभयं हैत-द्भवति - पिता च, पुत्रश्च । प्रजापतिश्च, अग्निश्च । श्रग्निश्च प्रजापतिश्च । प्रजापतिश्च, देवाश्च । देवाश्च प्रजापतिश्च य एवं वेद " । ( शत ० ६।६।२।२१ - २७ ) । चयनयज्ञरहम्यवेत्ता विद्वानों को विदित है कि, चयनयज्ञ का स्वरूप जिन इष्टकाओं से सम्पन्न होता है, वे ' यजुष्मती ' -- ' लोकम्पृणा ' भेद से दो भागों में विभक्त है । इन दोनों इष्टकाओं के अतिरिक्त इष्टकाओं के सीमा - बन्धन के लिए ' परिश्रित ' और विहित हैं । इन इष्टकाओं में यजुष्मती इष्टका प्रधान हैं, लोकम्पृणा इष्टका गौण हैं । इन से छिदपूर्ति होती है, सम्पूर्ण सम्वत्सरमण्डल ( सम्वत्मरलोक ) परिपूर्ण हो जाता है, श्रतएव इन्हें ' लोकम्पृणा ' कहन । अन्वर्थ बनता है । इष्टकाओं के परस्पर संधान के लिए ' पुरीष ' का संग्रह और होता है । जैसा कि चयन प्रकरण का उपक्रम करते हुए बतलाया जा चुका है, प्रासादभवन निर्माण-प्रक्रिया में जो जो द्रव्य समाविष्ट हैं, हमारे इस चयनयज्ञ में भी उन सत्र उपकरणों का संग्रह है । जिन ईटों से दीवार खड़ी होती है, उनके स्थान में यहाँ यजुष्मती इष्टका हैं । जिस गारे से ईटों को परस्पर संहत चिपकाया ) किया जाता है, उसके स्थान में यहाँ पुरीष ' है । ईटों में जो छिद्र रह जाते हैं, उन्हें बन्द करने के लिए छोटे - छोटे ईंटों के टुकड़े रिक्त स्थानों में भर दिए जाते हैं । इन्हीं के स्थान में लोकम्पृणा इष्टका है । जब दीवार बन कर खड़ी हो जाती है, तो इसके चारों ओर पलस्तर कर दिया जाता है । इसी के स्थान में यहाँ ' परिश्रित ' हैं । त्रैलोक्य व्यापक साम्वत्सरिक देवता इस चयन - प्रासाद के निर्माता चतुर शिल्पी हैं । ' विकर्णी ' नामक वायु इन शिल्पियों का वह औजार है, जिससे ये ईंटों को ठोकते हैं, नीचे - ऊपर गारा त्रिछाते हैं, परिश्रितरूप पलस्तर लगाते हैं । इस प्रकार दोनों प्रक्रियाओं में यथानुरूप समतुलन हो रहा है । अब हमें देखना यह है कि, चयनयज्ञ - स्वरूप - समर्पक परिश्रितादि का क्या स्वरूप है?, एवं इनका ' वेदमहिमा ' से क्या सम्वन्ध है? | सम्वत्सरप्रजापति की वेदमहिमा का विचार प्रक्रान्त है । वेदमूर्ति इस सम्वत्सर के ' सौर- पार्थिव - चान्द्र ' मेद से तीन विर्त्त हैं, तीनों का परस्पर अतिमानसम्बन्ध है, जैसा कि पूर्व में परिलेख द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है । यही कारण है कि, विषयारम्भ में हीं हमने सम्वत्सर शब्द से इन तीनों को ही अपना लक्ष्य बनाया है । जिन इष्टकादि पवों का विचार होने वाला है, उनका समन्वय मौर - सम्बत्सर की दृष्टि से ऋजु पड़ता है । अतः प्रकृत की वेदमहिमा में सौरसम्वत्सर मण्डल को मुख्य लक्ष्य बनाते हुए ही मीमांसा की जायगी । सौर सम्वत्सर भी आग्नेय है, पार्थिव सम्वत्सर भी आग्नेय है । अतएव इन दोनों का तो ' अग्नि ' शब्द से ग्रहण किया जा सकता है । तीसरा चान्द्र सम्वत्सर सोमप्रधान बनता हुआ । सौम्य है, अतएव २०७

पृष्ठ 246

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भाष्यभूमिका इसका ' सोम ' शब्द से ग्रहण किया आ सकता | द्विविध अग्निसम्वत्सर, सौम्य चान्द्र सम्वत्सर, तीनों की समष्टि को एक ‘ प्रजापति ’ मानते हुए तीनों में सौर सम्वत्सर पर विशेष लक्ष्य रखते हुए ही विचार आरम्भ होता है । सुप्रसिद्ध वेदज्ञ " राजस्तम्वायन " नें त्रिमूर्ति इसी सम्वत्सर के आधार पर वेद-महिमा का स्वरूप जाना था । स्वयं प्रजापति ने अपनी वेदमहिमा का स्वरूप राजस्तम्बन के सामने -' उतो त्वस्मै तन्वं विसखे ' न्याय से स्पष्ट कर दिया था । प्रकृतिमण्डल स्वयं हमारा गुरु है । अनन्य-मां से प्राकृतिक तत्त्वों का अनुशीलन करनेवाले तपस्वियों के अन्तःकरण में प्रकृति का गुप्त रहस्य अपने आप प्रकट हो जाता है । राजस्तम्बन ने भी इसी अनन्ययोग से स्वयं सम्वत्सरप्रजापति के स्वरूपा-न्वेषण के द्वारा ही वेदमहिमा का ज्ञान प्राप्त किया था । देखिए! “ सम्बत्सरो वै प्रजापतिरग्निः - सोमो राजा चन्द्रमाः । स ह स्म्यमेवात्मानं प्रोचे यज्ञवचसे राजस्तम्बायनाय - “ यावन्ति वाव मे ज्योतींषि, तानत्यो मऽइष्टकाः ”, इति । ” –शत ०१०४ | २ | १ | " २३ - प्रतिष्ठा यज्ञ और काल-— " प्रतिष्ठा यज्ञ - काल ” भेद से प्राजापत्य विवर्त को तीन भागों में विभक्त माना बा सकता है 1 सृष्टि का आधारभूत, श्रतएव ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध ब्रह्माक्षर मूर्ति ' प्रतिष्ठापुरुष ' ही ' प्रतिष्ठा प्रजापति ' । सृष्टिप्रवर्तक, सत को सद्भाव में परिणत करने वाला, विष्णवक्षारमूर्ति, ' अन्न ' नाम से प्रसिद्ध ' यज्ञपुरुष ' ही ' यज्ञप्रजापति ' है । सृष्टिसंहारक, मत्- को असत् भाव में परिणित करने वाला ( नामरूपात्मक ) ' ज्योति ' नाम मे प्रसिद्ध, इन्द्राक्षरमूर्ति कालपुरुष ही ' काल प्रजापति ' है । इन्हीं तीनों विवर्त्तो का पूर्वप्रकरणों में-' प्रतिष्ठा, ज्योति, यज्ञ ' रूप से विश्लेषण करते हुए ' ब्रह्म - नामरूप - श्रन्न ' - भावों के द्वारा स्पष्टीकरण हुआ है । रु - प्रतिष्ठाप्रजापतिः – प्रतिष्ठापुरुषः- ब्रह्मात्रः ( ब्रह्मा ) - श्रधारः -ब्रह्म- ( प्रतिष्ठा ) । २ – यज्ञप्रजापतिः -यज्ञपुरुषः - विष्णवक्षरः ( विष्णुः ) - प्रवर्त्तकः - श्रन्नम् ( यज्ञः ) । २ – कालप्रजापतिः – कालपुरुरुषः - इन्द्राक्षरः ( महादेवः ) संहारक: -नामरूपे ( ज्योतिः ) । इन्हीं तीनों को पूर्व के अग्निप्रकरण में क्रमशः ब्रह्माग्नि ( सत्याग्नि ), देवाग्नि ( नारायणाग्नि ). मृताग्नि ( पलितवामाग्नि ) नामों से व्यक्त किया गया है । इन तीनों में काल, तथा यज्ञ नामक दो प्रजा । पतियों का ही विचार अपेक्षित है । सोमाग्नि ' ' कालाग्नि ' है, इसकी शक्ति ' महाकाली ' है । ससीमाग्नि यज्ञाग्नि है, इसकी शक्ति योगमायावृता महामाया है । कालाग्निलक्षण कालप्रजापति ही महामाया के सम्बन्ध से परिच्छिन्न यज्ञाग्निरूप में परिणित होता हुआ “ सम्वत्सरप्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध होता है । इस सम्वत्सरयश की स्वरूपनिष्पत्ति के प्रधान द्वार सौर - अग्नि, तथा चान्द्र सोम ही हैं । सूर्य्य और चन्द्रमा के योग से ही सृष्टयवच्छिन्न, यज्ञपुरुषात्मक कालपुरुष की स्वरूप निष्पत्ति हुई है । सौर अग्नि सत्य है, चान्द्र सोम ऋत है । ऋत- सत्य के सम्वन्वय से ही सम्वत्सर, एवं सम्वत्सर के पर्वरूप अहोरात्रों का आविर्भाव हुआ: २०६

पृष्ठ 247

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द्वितीयखण्ड है, जैसाकि “ सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयद्दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः " ( ऋकमं ० १८ | १६८।३ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन मे स्पष्ट है । क्योंकि सम्वत्र स्वरूपनिर्माण में अग्नि - सोम का स्हयोग है । अग्नि का योनिस्थान सूर्य्य है - ( " सूर्योऽग्नेर्यो रायतनम् ” तैः ब्रा ० ३।६।२१।२,३ । ) । सोम का योनिस्थान चन्द्रमा है ( " ष वै सं मं राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः " शत ० १ | ६ | ४ | ५ " ) | अतएव ‘ सम्वत्सरप्रजाप त ' के स्वरूप की व्याख्या करते हुए हमें ' सूर्य्य- चन्द्रमा ' को ही प्रधानता देनी पड़ेगी । साथ ही प्राजापत्यवेदमहिमा को व्यक्त करने के लिए चन्द्रगर्भिता सौरसंस्था को ही प्रधान आलम्बन मानना पड़ेगा । सौर- चान्द्रतत्त्वावच्छिन्न मम्वत्सरप्रजापति को अग्नि - सोम - समन्वय की दृष्टि से जहाँ ' यज्ञात्मक श्रग्निमम्वत्सर ' कहा जायगा, वहीं ' अहः, रात्रिः पक्षः, मासः ' इत्यादि कलाविभागों की दृष्टि से कालात्मक * ' चक्र सम्वत्मर ' भी माना जायगा । दोनों के सम्मिलित रूप को लक्ष्य में रखते हुए हूं । वेदगणना की जायगी । एवं इस गणना के समन्वय के लिए उस ' बुहतीछन्द ' की ओर ही पाटका का ध्यान आकर्षित कियाजायगा, जिसके आधार पर ' बृहती सहस्र ' रूप से ऋक - यजुः - साम - अथर्व - तत्त्वों का प्रजापति के द्वारा व्यूहन होने वाला है । २४ - बृहत्सूय्ये, और बृहतीछन्द-" सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' - ' बृहद्ध तम्यौ भुवनेष्व तः ' - ' विभ्रात् बृहत पिवत् सौम्यम्'-' आदित्यो बृहत् ” इत्यादि मन्त्र - ब्राह्मणश्रुतियाँ सूर्य्य को बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित बतलातीं हुईं स्वत्रं सूर्य को बृहत् ' मान रहीं हैं । सौर सावित्राग्निमय इन्द्रप्राण ही ' बृहत् ' है, जो ' विश्वामित्रप्राण ' अवस्था में आकर जड़ - चेतन पदार्थों के ३६००० ( छत्तीस सहस्र ) श्रायुःसूत्रों का प्रवर्त्तक बनता है - ( देखिए, ऐतरेय श्रारण्यक ३।२।२ । ) । इस बृहतप्राण के सम्बन्ध से ही सौग्मण्डलात्मक साम “ बृहत्साम ” कहलाया है । इसी बृहत्प्राण के समन्वय से ' बृहती ' छन्द ' बृहती ' कहलाया है । सौर बृहत्प्राण ' स्वरहरर्देवाः सूर्य: ' इस निगम के अनुसार ' स्वरात्मक ' है । स्वर ही क्षग्तत्व है । अक्षरमूर्ति, स्वरात्मक इस बृहत्प्रण की व्याप्तिनव चिन्दुत्रों में मानी गई है । मर्त्य वर्ण बिन्दुरूप हैं । ऐसे नां वर्ण एक स्वर के व्याप्तिस्थान चनते है, जैसा कि अन्यत्र शब्दसृष्टिविज्ञान प्रकरण में निरूपित है । नव बिन्दु पर्य्यन्त अपनी व्याप्ति रम्वने वाला यह सौर बृहत् प्राण अपने प्रतिष्ठारूप बृहतीछन्द को भी नौ अक्षरों में परिणित कर देता है । अतएव बृहतीछन्द ' नवाक्षर ' छन्द माना गया है । यही नवाक्षर बृहतीछन्द आगे जाकर बृहत्प्राण के व्यूहन - से आरम्भ में ४, पुनः ३६, सर्वान्त में ३६०००, इन तीन वितानभावों में परिणत होता हुआ. साथ ही अपने आधेय बृहत् प्राण को भी इन्हीं संस्थाओं में विभक्त करता हुआ वेद-महिमा का जनक बन रहा है । नवाक्षर बृहतीछन्द के प्रारम्भ में चार विक्रम होते हैं । वे ही चार विक्रम इसके चार चरण हैं । चारों चरणों के सम्मिलित ३६ अक्षर बृहती का प्रक्रम है । प्रत्येक बृहती अक्षर उस पाणण-* कालात्मकस्तत्त्वः कालः । अहोरात्रादयः कालस्येव कलाभाषाः, श्रवयवभावाः । २०६

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भाष्यभूमिका त्मक बृहत् अक्षर के गोरूप सहस्रभाव मे सहस्रभाव में परिणत होता हुआ मम्मिलितरूप मे ३६००० बन जाता है, एवं यही बृहती का अभिक्रम है । इसप्रकार विक्रमरूपा चतुष्टयी, प्रक्रमरूपा पत्रिंशत् ममष्टि, एवं अभिक मरूपा टूत्रिंशत् महरूममष्टि भेट से बृहतीछन्दोऽवच्छिल सौर सावित्रा ग्नप्राण के तीन संस्थाविभाग हो जाते हैं । इनमें ' बृहतीसहस्र ' भाव ही वेदव्यूहन की मूलप्रतष्ठा बनने वाला है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट हो जायगा । नवाक्षर बृहतीछन्द के अतिरिक्त सौर सम्वत्सरचक में क्रान्तिवृत्त के काटते हुए क्रमशः दक्षिण से प्रारम्भ कर उत्तर पर्यन्त षडक्षर गायत्रीछन्द्र सप्ताक्षर उष्णिक छन्द, अष्टाक्षर अनुष्टुप छन्द, दशाक्षर पंक्तिउन्ट, एकादशाक्षर त्रिष्टुप छन्द, एव द्वादशाक्षर जगतीछन्द के भेद से ६ छन्द और हो जाते हैं । इसप्रकार " सप्त व देवच्छन्दांसि ' के अनुसार सम्भूय सात छन्द हो जाते हैं । इन सातों को ही ' पूर्वापरवृत्त ' कहा गया है । अहोरात्र स्वरूप निम्रण के कारण ये ही रात्र " नाम मे मां प्रसिद्ध है । मार्तो अहोरात्रवृत्ती में मध्यथ बृहती ' नामक वृत्त ही शेष छन्दों की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । बृहतीछन्द के वितान से ही ६ श्री का वितान हुआ है । मध्यथ बृहत्प्राण उक्थरूप है, मम्बत्मरमरडलावच्छिन्न बृहतप्राण अर्करूप है । अर्कप्राणात्मक छन्द उक्थप्राणछन्द मे अभिन्न ही माने गये हैं । दूसरी दृष्टि से बृहती की सर्वव्याप्ति का विचार कीजिये । जैसा कि आगे की व्यूहनप्रक्रिया में स्पष्ट होने वाला है, बृहतीछन्द के सम्बन्ध से इतर ६ श्र छन्दों में ७२ संख्याओं का उटग होता है । यही ७२ संख्या आगे जाकर ब्यूहनद्वारा ७२० संख्याओं में परिणत हो जाती है । स्वयं बृहतीलन्द स्वरूप मे ७२० अहोरात्रात्मक है । ३६० बृहतीप्राण परिश्रितात्मक हैं, ३६० बृहतीप्रागा यजुरग्निलक्षण यजुष्मती इष्टका रूप है । परिश्रित प्राणों में ३६० रात्रियों का विकास होता है. एवं यजुष्मान् प्राण से ३६० ग्रहों का विकाम होता है । फलतः केवल बृहतीप्राण हो ७२० श्रहोगत्रस्वण्डों में परिणत होता हुआ सम्पूर्ण सम्वत्सर का प्रतिष्ठा बन जाता है । २५- सप्तछन्दोवितान-— ७२० संख्यात्मक वही बृहते प्राण ७२० अहोरात्रों का विभाजक बन कर शेत्र ६ त्र हो-रात्रवृत्तों का स्वरूप समर्पक बन रहा है । ६ त्रों में युग्म भेद से ७०० संख्याओं का भोग हो रहा है । बृहती हाँ स्वयं अपने स्वरूप से ७२० में विभक्त है, वहीं शेष ६ छन्द दो दो मिल कर ७२ – सम्पत्तियों सेयुक्तहोते हुए ७२० भागों के सहयोगी बन हैं । द्वादशाक्षर ( १२ ) जगती, षडक्षर ( ६ ) गायत्री दोनों का एक युग्म है । १२ + ४ गुणन से ४८ जगती के, ६ + ४ के गुणन से गायत्री के २४ अक्षर * लोकप्रसिद्ध गणितशब्दों के लिए वैदिकसाहित्य में निम्नलिखित शब्द प्रयुक्त हुए हैं-१ - संकलन – जोड़ । २ - व्यवकलन - बाकी । ३ - गुणन गुणा । ४- मागहर— भाग । २१०

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द्वितीयखण्ड हो जाते हैं । ४८-२४ के संकलन मे ७२ हो जाते हैं । यही ७२ सख्या ७२० अहोरात्रसम्पत्ति है । एका.. दशाक्षरा ( ११ ) त्रिष्टुपू, साताक्षरा ( ७ ) उष्णि. कू., दोनों का एक युग्म है । ११ + ४ के गुणन से ४४ त्रिष्टुप् के, ७+ ४ के गुणन मे उष्णिक के २८ अक्षर हो जाते हैं । ४४ + ०८ के संकलन से ७२ हो बाते हैं । यही दूसरी अहोरात्रसम्पत्ति है । दशाक्षरा ( ० ) पंक्ति. अष्टाक्षरा ( ८ ) अनुष्टुप् दोनों का एक युग्म है । १० + ४ के गुण से ४० पंक्ति के, ८+ गुणन मे अनुष्टुपू के ३२ अक्षर हो बाते हैं । ४० + ३२ के संकलन से ७२ हो जाते हैं । यही तीसरी अहोरात्रसम्पत् है । यह संख्यावितान क्योंकि बृहतीप्राणसम है, तद्रूप है. तत्समतुलित है, अतः सातों को हम बृहती प्राणप्रधान हीं कह सकते हैं । “ को अश्वो वहति सप्तनामा ” ( ऋकमं ० ) इस मन्त्रभाग का भी यही रहस्य है कि, केवल बृहती नामक अश्व छन्द ) का ही इतर ६ छन्दों में नमन हुआ है । क्योंकि सातों अहोरात्रवृत्त की समष्टि सम्वत्सर, है सातो बृहती - प्राणात्मक हैं, अतएव सम्वत्सर का " बाहेत " ( बृहतीछन्द, तथा छन्दश्छन्दित बृहत्प्राणात्मक ) मान लिया गया है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से स्पष्ट है-( १ ) — " अथैषा बृहत्पुत्तना भवति । बृहत वाऽएष संचितोऽभि सम्पद्यते । या योनौ रतः सिच्यते, तादृग जायते । यद्यतेमग्र बृहतीं कराति, तस्मादेष संचितो बृहतीमभि - सम्पद्यते ” । -- शत ० ६ | ४ || ( २ ) -- “ ताः षट् मम्पद्यन्ते । ऋतवः सम्वत्सरः । सम्वत्सरोऽग्निः । यावानाग्नयत्रत्यस्य मात्रा तावद्भवति । यश्व सम्बत्सरमभिपद्यते, -तद् ' बृहती ' मभिमम्पद्यते । ' हती हि सम्वत्सरः । द्वादश पौर्णमास्यः, द्वादशाष्टकाः, द्वादशामात्रास्याः । तत् षट्त्रिंशत् । षट्त्रिंशदक्षरा वै हती ” । -शत ० ६।४।२।१० २११

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मप्त वै देवच्छन्दांसि भाष्यभूमिका ( १ - ) -७ - जगती - द्वादशाक्षरा ( १० + ४-४८ ) -४ अंश ( २ - ) - ६ - त्रिष्टुप् -एकादशाक्षरा ( ११ + १-४४ -अश ( १० + ४-४० - १२ अंश ( ३ ) -५ - पक्तिः - दशाक्षरा ( १ ) - ४ - बृहती - नवाक्षरा ( ६ + ४-३६ ) ( ३ ) -३ - अनुष्टुप् - अष्टाक्षरा ( २ ) - २ - उष्णिाक्- सप्ताक्षरा ( १ ) - १ - गायत्री - षडक्षरा ( १ ) १ - जगनी उत्तरमण्डलम् ( = + ४-३२ ) - १२ अंश -( ७४-०८ ) ६ श्रंश ( ६ + ४-२४ ) -४ श्रंश दक्षिणमण्डलम सर्वप्रतिष्ठा -७ ) - द्वादशाक्षरा - १२ + ४-४८ —४८ + २४–७२ ( ७२० अहोरात्रारिण ) ( २ ) २ - गायत्री ( दक्षिणा - १ ) - पडत रा —६ + ४-२४ * ( २ ) १ - त्रिष्टुप् ( उत्तरा - ६ ) - एकादशाक्षरा - ११ + ४-४४ ] ( ४ ) २- उष्णक् ( दक्षिणा - २ ) - सप्ताक्षरा – ७ + ४-२८ ( ५ ) १ - पंक्ति: ( उत्तरा - ५ ) - दशाक्षरा - १० + ४-४० ( ६ ) २ - अनुष्टुप् ( दक्षिणा - ३ ) अष्टाक्षरा - ८ + ४-३२ * J —४४ + २८-७२ ( ७२० अहोरात्राणि ) –४० + ३२-७२ ( ७२० अहोरात्राणि ) ( ७ ) १ – बृहती ( मध्यस्था -४ ) -नवाक्षरा —१ + ४–३६ } – ३६ + ३६०-७२० अहोरात्रारिण २१२