Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 251–260

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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द्वितीयखण्ड उक्त दो कारणों के अतिरिक्त मध्यस्थ ' बृहत्प्राण ' खःस्वस्तिक, अधः स्वस्तिक, उदयन्त्रिन्दु, अस्तन्त्रिन्दु, सप्तग्रहोरात्र, ग्रादि अन्यान्य भावों की अपेक्षा सम्वत्मरमण्डल का अध्यक्ष बन रहा है । सम्वत्सरमण्डलव्याप्त सभ्वत्मरम् ६ रूपम्म्पादक, अतएव रम्वत्सरात्मक, ३६० यजुष्मती इष्टकाओं तथा ३६० परिश्रतों मे ७२० संख्यात्मक ज्योतिः- पर्वों से युक्त रहता हुआ । सौराग्नि, तथा चान्द्रसोम से अपनी स्वरूपनिष्पत्ति करता हुआ बृहती प्राग ही वह प्रजापति है, जिसे वेदों का व्यूहन करना है । प्रजापति के इन्हीं पर्वों का दिग्दर्शन कराती हुई वाजिश्रात कहती है । “ तस्य वा " तम्य सम्वत्सरस्य प्रजापतेः सप्त च शतानि विंशनिश्चाहोरात्राणि ज्योतींषि ता इष्टकाः । षष्टिश्च त्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्यः । सोऽय सम्बन्सरः प्रजापतिः सर्वाणि भूतानि ससृजे, यच्च प्राणि, यच्च ( प्राण-मुभयान् देवमनुष्यान् ” ( शत ० १० | ४ | २ | २ | ) । २६ — चतुर्द्धा व्यूहन— अग्निविकासलक्षण जिस व्यूहन प्रक्रिया के आधार पर आगे के प्रकरण में तात्त्विक वेद की अवान्तर शास्त्राओं का विचार करना है, वह व्यूहन प्रक्रिया एक ( १ ), दश ( १० ), शत ( १०० ), सहस्र ( १००० ) 2 व भेद से चार भागा में विभक्त है । केन्द्रम्थ प्राण आरम्भ में एकाकी रहता है । यह एकत्वभाव इसका पहिला प्रातिश्विक मूलस्वरूप है । इसका प्रथम विकास विरारूप से होता है । विराट् दशाक्षरछन्द है, यही दशधा विकास है । आगे जाकर प्रत्येक पर्व का दशधा - दशधा विकास होता है, १०० विकास हो जाते हैं । प्रत्येक प्राण का शतधा - शतधा विकाम होता है, सम्भूय यह तीसरा विकास सहस्रधा बन जाता है । यहाँ कर विकामावस्था का निधन है । मूल उक्थ प्राण का उत्तरोत्तर ( सूक्ष्म अवस्था में परिणत होते हुए ) बृहद्रूप में परिणत हो जाना ही विकास है । यह विकासभाव क्योंकि सहस्र पर समाप्त है, इसी आधार पर ' सहस्र ' शब्द को पूर्णार्थक मान लिया गया है, जैसा कि - " पूर्ण वै सहस्रम् " - " सहस्र वै पूर्णम् " इत्यादि निगम-वचनो से स्पष्ट है । सौरसम्वत्सरमण्डलकेन्द्रस्थ - बृहती छन्दोऽवच्छिन्न बृहत्प्राण मूलात्मना एक है । इसका प्रथम विकास अपने प्रातिश्विक रूप से ३६ भागों में विभक्त है । बृहतीछन्द नवाक्षर बतलाया गया है । ६ अक्षर का एक चरण है । सम्भूय चार चरणों के ३६ अक्षर हो जाते है । बृहत्प्रारणावच्छिन्ना त्रिंशदक्षरा ( ३६ ) यही बृहती है, जिसे कि हम प्रथम विकास कहेंगे । ग्रागे जाकर प्रत्येक बृहतीप्राण दश दश संख्याओं में विकसित होता है, ३६ विभाग ३६० संख्याओं में परिणत हो जाते हैं, यही बृहती का दशधा विकास है । प्रत्येक क । पुनः शत शत संख्याओं में विकास होता हैं, ३६० विभाग ३६०० ( छत्तीस सौ ) संख्याओं में परिणत हो जाते हैं, यही बृहती का शतधा विकास है । प्रत्येक का पुनः सहस्र - सहस्र संख्याओं में विकास होता है, ३६०० विभाग ३६००० ( छतीस हजार ) संख्याओं में परिणत हो जाते हैं ।यही सर्वान्त का सहस्रा विकास है । यहाँ पर बृहती - प्राण का विकास अवरुद्ध । २१३

पृष्ठ 252

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भूमिक इस प्रकार विकामचतुष्टयी मे बृहतं प्रारण ( ३६ अक्षरावच्छिन्न सौर प्रारण ) * बृहतीसहस्र ( बृहती ३६. सहस्र - पत्रिंशत्महन्त्र ) मख्या में परिणत हो जाता है । एतत् संख्पायुक यही बृहतीप्राण प्राणि-श्रप्राणि जगत् का श्रायुःम्वरूपममर्पक बना हुआ है । बृहतीप्राण क्योंकि ' वृहतीमहल ' है, अतएव हमें इतने ही प्रापुःसूत्र प्राप्त होते हैं । बृहतीमहन्त्र ( ३३००० ) अहारात्रियों के शत ( १०० ) वर्ष होते हैं । “ शता'व पुरुषः शतवीय्यः " के अनुसार हमारा ग्राम्मान बृहतीमहत्र के मम्बन्ध मे शतवर्ष परिमित हो माना जायगा । यह श्रायुः प्राण कितनी संख्याओं में विभक्त होकर हमारी अध्यात्मसस्था में प्रविष्ट होता है?, पहिले इसी प्रश्न की मीमांसः कीजिए । २१ – प्रजापति को सात अभिव्यक्तिया — मनः- प्राण- वाङमय प्रजापत में मनःपर्व सर्वप्रवान है । इस दृष्टि मे यह मन ' सत् ' है, इसलिए तो इमे ‘ असत् ’ नहीं कहा जा सकता । चनदृ ष्टे से यह ' सत् ' है, इसलिए इमे ' सत् ' भी नहीं कहा जा मकता | ' अस्ति ' मूला इस भावना मे जहाँ इसके लिए ' ग्रामात् ' कहा जा सकता है, वहाँ ' नाति ' भूला बलभावना से इसके लिए ' नवःमीत् ' भी कहा जा सकता है । ऐसे मदात्मक ( श्रतएव ' उभयात्मकं मनः ' नाम से प्रसिद्ध ) ' मीदव नेवासीत् ' वाक्य मे अभिनीयमान, सर्वमूलभूत प्राजापत्य मन की शनाया मे ही आगे जाकर क्रमशः ' मन ', बाकु ', प्रा. चक्षु ', श्रात्र ', कम्र्म्म ', अग्नि इन ७ अवान्तर तत्त्वों का विकास होता है | यह प्राजापत्य मन वाकू तथा प्राण से अविनाभूत है । अतएव प्रजापतिलक्षण आत्मा मनः-प्राणवाङ्मय ' कहलाया है, जं. कि यहाँ मनः कला की प्रधानता से केवल ' मन ' नाम मे ही व्यवहृत होगा । जिस अन्नादाग्निलक्षण प्रजापति का पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है, वही अंशरूप से हमाग भूतात्मा बन रहा है । मन: प्राणवाङमय इसी भूतात्मा के आधार पर उक्त सात पत्र का विकास हुआ है । ' अनिरुक्तो घँ प्रजापतिः ' के अनुसार यह भूतात्मा श्रनिरुक्त है, अमूर्त है । इसकी ये सातों अभिव्यक्तियाँ निरुक्ता हैं, मूर्त्तभावापन्ना हैं । स्वयं प्रजापति उस बृहतीप्रारणावच्छिन्न सम्वत्सरप्रजापति का अंश रहता हुआ बृहती महस्र-सम्पत्तिसे है । बीजरूप से इस तम्पत्ति को अपनी महिमा में प्रतिष्ठेत रखने वाले इस मनोमय प्रजापति ( अनिरुक्त मनःप्राणवाङ्मय प्रजापति ) से ही क्योंकि उक्त सात निरुक्त भावों का विकास हुआ । इन सातों मूर्त ' - निरुक्त पर्वों की अपेक्षा से यही अशी है, अंश अशी के धर्मों से युक्त रहता है ' । अतएव जो बृहत सहस्र सम्पत्ति उसमें है, इन सातों में प्रत्येक में भी उस सम्पत का यथानुरूप क्रमशः विकास होता है । सप्तधा विभक्त निरुक्तसृष्टि के मूलाधिष्ठा सदसन्मूर्ति ( रस - बलमूर्ति, ज्ञानक्रियामय, विद्याकर्म्ममय ) इसी मनोमय ( मनःप्रधान मनःप्राणवाङ्मय ) प्रजापति का स्वरूप व्यक्त करती हुई श्रुति कहती है--* ' बृहती ' क्योंकि पत्रिशदक्षरा ( ३६ ) है, अतएव श्रागे जाकर बृहती शब्द ३६ संख्या का वाचक बन गया । इसी आधार पर ' पट्त्रिंशत् महस्र ' ( छतीस हजार ) संख्या का अभिनय ' बृहतीसहस्र ' शब्द सेहोने लगा । जहाँ वेद को छत्तीस हजार संख्या का अभिनय करना होगा, वहाँ वह ' बटू त्रिशत्सहस्र ' न कह कर ' बृहतीसहस्र ' कहेगा । २१४

पृष्ठ 253

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द्वितीयखण्ड अनिरुकप्रजापतिः- “ नेत्र वा इदमग्रे ऽमदासीत् नेत्र मदामी | आसीदित्र वा इदम, नेवासीत् । तद्रु तन्मन एवास । तस्मादेतद् ऋषिणाभ्यनूक्त'- ' नास-दासान्ना सदासीत्तदानाम् ' इति । नेत्र हि सन्मनो नेवासत् " ( शत ० १० | ५ | ४ | ४,२ ) । इस प्राजापत्य अनिरुक्त मन में सृष्टिकामनारूप अशनाया - धर्म्म का उदय हुआ । अशनाया मृत्यु था, मृत्यु निरुक्त था । अतएव इसके उदय में वही अनिरुक्त मन संकल्प विकल्प लक्षण मृत्युभाव से युक्त होता हुआ निरुक्त बन गया, मूर्त्त बन गया । यही उस अनिरुक्त का पहिला निरुक्तावतार हुआ । इस निरुक्त मन ने जत्र अपने आत्मा ( मूलरूप निरुक्त प्रजापति ) को ढूँढा, तो इमे विदित हुआ कि, उसमे बृहतीगहस्र-सम्पत्ति प्रतिष्ठित है । फलतः स्वविकाम के लिए इसने उम सम्पत्ति को अपना लिया, जो कि उसमें थी । एवं ऐसा करने से यह भी बृहतीमहल बन गया । इभी प्रकार मन से वाक् का, वाकू से प्रारण का, प्राण से चक्षु का, चक्षु से श्रंत्र का, श्रोत्र से कर्म्म का, कर्म्म मे अग्न का विकाम हुआ । सब में पूर्व पूर्व की बृहती सहस्रसम्पत् अनुस्यूत होती गई । इन सात विद्याचि तयों से श्राध्यात्मिक पुरुष ' विद्याचित ' नाम मे प्रसिद्ध हो गया । इन्हीं सातों चितियों का क्रमिक निरूपण करते हुए निन्नलिखित वचन हमारे सामने आते हैं--मनः– ( १ ) — “ तदिदं मनः सृष्टमा बिरबुभूषत् निरुक्ततरं मूर्ततरम् । तदात्मानमन्यै-च्छत् । तत्तणेऽनध्यत, तत् प्रमुच्छत् । तत् पट वंशं शतं सहस्राण्यपश्यत्, अत्मनान मनामवान्, मनचितः । ते मनसैवाधीयन्त, मनमा ची-यन्त । तद्यत् किंनेमानि भूतानि मनमा मंकल्पयति, तेनमंत्र मा कृतिः । एतावनी है मनमो विभूतिः । एतावती सृष्टिः सहस्रः ण्यग्नयोऽर्काः । तेषामेकैक ए 4 तान् प्राणः - ( २ ) — " तन्मनो वाचमसृजत । सेयं चाक ० । मा तपो । एतावन्मनः - पत्रिंशत्-, यावानसौ पूः " । ( शत ० १० || ४ | ३ ) । सा पटत्रिंशतं ० । तद्यत् किञ्चेमानि भूतानि वाचा वदन्ति तेषामेत्र सा कृति: । एतावती वै बानो विभूतिः । एतावती विसृष्टिः । एतावती वाक् पत्रिंशत् • । ते मेक एव ० ० " ( शतः १० | ५ | ४ | ३ | ) | बाकू ( ३ ) —– सा वाक् प्राण. मसृजत । सोऽयं प्राणः ० । स तयो ० । स पत्रिंशतं ० । तद्यत् किञ्चेमानि भूतानि प्राणेन प्राणन्ति तेषामेव सा कृतिः । एतादती नै प्राणस्य विभूतिः, एतावती विसृष्टिः । एतावान् प्राणः - पट्त्रिंशत् । तेषामे-कैक एव ० " ( १० | ५ | ४ | ५ श ) । २१५

पृष्ठ 254

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भाष्यभूमिका चक्षुः ( ४ ) —— स प्राणश्चक्षुभ्सृजत । तदिदं चक्षुः ० । तत्तपो ० । तता त्रिशतं । तद्यत् किञ्च ेमानि भूतानि चक्षुषा पश्यन्ति तेषामेव सा कृतिः, एन | बता नै चक्षुषा विभूतिः, एतावता विसृष्टिः एतावचक्षुः - पटत्रिंशत ० तेषामेक एव ० " । ( १० | ५ | ५ | ६ | ) । श्रोत्रम् ( ५ ) — “ तच्चक्षुः श्रोत्रमसृजत । तदिदं श्रोत्र ं I । तत्तो ] ० । तत्पत्रिंशनं ० । तद्यत् किञ्चमानि भृतानि श्रोत्र ेण शृण्वन्ति तेषामेव सा कृतिः, एतावती ने श्रोत्रस्य विभूतिः, एतावती विसृष्टिः । एतावच्छात्र - पत्रिशतं ० " । ( १: ॥४।७ । ) । कर्म ( ६ ) — " तच्छोत्र ं कर्म्मासृजत । तदिदं कर्म्म ० । तत्त रो ० तत पटत्रिंशतं । तद्यत् किञ्चेमानि भूतानि कम्मं कुवते, तंत्रामेव सा कृतिः, एतावती के कर्म्मणों विभूतिः, एताती विसृष्टिः । एताववत् क्रम्मं षटत्रिंशत ० " । ( ५४ ) | अग्निः ( ७ ) — “ तत कर्म्माग्निमसृजत । सोऽयमग्निः ० । स तपो ० । स पत्रिंशतं ० । तद्यत् किञ्चेमानि भूतानि, अग्निमिन्धते, तेषामेव सा कृतिः । एताती अग्नंविभूतिः, एतावती विसृ:: । एतावानग्निः - पटत्रिंशत ० ' ( १०२।५ शः.।११ । ) । सर्वप्रजापतिः- “ ते हैते विद्याचित एव । तान् हैतानेवंविदे सर्वाणि भूतानि चिन्वन्ति आप स्वपते । विद्यया हैवैत एवं विपश्चिता भवन्ति । " ( १० | ५ | ४ | २२ ) । उक्त वचनों का समन्वय प्राजापत्यविज्ञान पर निर्भर है । प्रजापति के अनिरुक्त, सर्वभेद से दो रूप मानें गए हैं । महामहिमामय विश्वकेन्द्र में ( सम्वत्सरात्मक विश्वकेन्द्र में ) प्रतिष्ठित मनः - प्राण - वाङ्मय अमूर्त सम्वत्सरप्रजापति ' अनिरुक्तप्रजापति ' है । दृष्टिपथ में आने वाला सम्वत्सराग्निमय भौतिक त्रैलोक्य उसो का निरुक्त रूप है, यही ‘ निरुक्त प्रजापति ' है । अनिरुक्त सम्वत्सर आत्मा है, निरुक्त सम्वत्सर ( विश्व ) इस श्रात्मा का शरीर है, विशिष्टभाव एक आधिदैविक - प्राजापत्यसंस्था है । इस संस्थाके निरुक्तरूपों का पूर्वप्रतिपादित श्रग्निस्वरूपप्रकरण में ( शाट्यायनिमतानुसार; दिग्दर्शन कराया जा चुका है । त्रिवृत्स्तोभावच्छिन्न ' व्यग्नि १, पञ्चदश स्तोभावच्छिन्न ' वा ', एकविंशस्तो भावच्छिन्न ' आदित्य ', सम्वत्सर-मण्डलमध्यवर्ती ‘ चान्द्र ' नामक ' भास्वरसाम ', सम्वत्सरमण्डलव्याप्त ' दिशः ' नामक ' दिक्सोम ", २१६

पृष्ठ 255

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factars समष्टिलक्षण ' सम्वत्राग्नि ", प्रतिष्ठा लक्षण ' तप ' ही उस आधिदैविक निरुक्तप्रजापति के क्रमशः [ " - ' प्राण २१_ " - ' चक्षु " - ' मन ' - ' श्रोत्र ' ' ' अग्नि ' ' कर्म्म " ये सात निरुक्त पर्व हैं । ' वाकू ”. २८ आध्यात्मिक प्रजापति -इसी प्रकार अध्यात्मख्या में समन्वय कीजिए । हृय भूतात्मा उस हृद्य भूतात्मा का श्रंशरूप अग्निरुक्त प्रजापति है । पाञ्चभौतिक शरीर, पाँच इन्द्रियाँ, शारीरिक कर्म्म, इनकी समष्टि ही उसका श्रंश -भूत प्रजापति है. दोनोंकी समष्टि ही प्राध्यात्मिक प्राजापत्यसम्था है । पूर्वोक्त वचनोंके द्वारा इसी के सात पर्वोंका स्पष्टीकरण हुआ हैं | मनोमय प्रजापति भूतात्मा है, यहा अनिरुक्तप्रजापति है । मनः - प्राण - वाक् - चक्षु-श्रोत्र - इन पांचों प्राणों को पञ्चेन्द्रियवर्ग माना गया है । इनके कर्म्म हीं कर्म नाम की ६ ठी विभूति है । चित्याग्निमय भौतिक शरीर ही ' अग्नि ' नाम का सातवाँ पर्व है । सातों की समष्टि ही ' विद्याचित ' नामक सर्वप्रजापति है । मूल आत्मा बृहतीप्राणमय है, अतएव इसके सातों मूलरूपों में बृहतीप्राण का माहस्रीमाव प्रतिष्ठित रहता है | इस क्रम मे यद्यपि बृहत सहस्र की प्राठ संस्था हो जाती हैं । परन्तु क्योंकि इन आठों में उत्तर उत्तर का बहतीसहस्र पूर्व पूर्व के बृहती महस्र पर चित है, अतएव अन्ततोगत्वा केवल एक बृहतीसहस्र पर ही श्राटों का पर्यवसान हो जाता है, एव यही हमारा वेदोक्त * आयुर्भोगकाल है । एक ', एक मन: क्ला ", एक प्रारणकला, एक वाककला, एक चक्षुः कला, एक श्रोत्रकला ', श्रात्मकला ' एक कर्म्म कला ", एक अग्न कला इन आठ कलाओं की समष्टि रूप, ग्रहारात्रलक्षण एक बृहतीप्राण का हम एक अहोरात्र में ( दिन रात में ) भोग कर लेते हैं । ३६००० दिन में बृहतीसहस्र का भोग समाप्त हो जाता है | यही हमारा ' आयुर्विज्ञान ' है, जिसका बृहतीसहस्रके सम्बन्ध से, साथ ही उस आधिदैविक सम्वत्सर से इस श्राध्यात्मक सम्वत्सर की तुलना करने के लिए दिग्दर्शन कराना पड़ा 1 * मनः प्राणवाङमय भूतात्मा नाम के प्राकृतात्मा ( सप्तदश राशियुक्त कर्म्मभोक्ता जीवात्मा देहाभिमानी भोक्तात्मा ) के आयुः सूत्र सौरसम्वत्सर - प्रजापति के उस कोश से ही सम्बद्ध है, जिस कोश का श्रायुः - प्रदाता मनःप्राणवाङ्मय बार्हतप्राण बृहतोसहस्र ( ३६००० ) संख्या में विभक्त है । इसी आधार पर मानव का आयुःकाल ' शतायुः ' माना गया है, जैसा कि, -- “ वेदोक्तमायुर्त्यानामाहुर्वर्षशतानि वै ” इत्यादि से प्रमाणित है । ६१७

पृष्ठ 256

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† I I I I I * : -अनिरुक्त केन्द्रस्थो सम्वत्सर * आधिदैविकप्रजापतिपरिलेखः-- १ । : ) सर्व एव , स एवानिरुक्तः य ( सहस्रयुक्तः - बृहती प्रतिष्ठा सर्वेषां , मनोमयोऽनिरुक्तप्रजापतिः ३६० . बस्तोमस्थः त्रि १ -, श्रन्नाहुतिरूपः निरुक्तः – चान्द्रसोमः -अथर्ववेदमयः ३६ ( ( , गाईपत्यलक्षणः निरुक्तः -पार्थिवाग्निः , – ऋग्वेदमयः : -उद्गीथ ,,, अन्वाहार्यलक्षणः आहवनीयलक्षणः परिश्रितलक्षणः ,,, ,, त्रिवृत्स्तोमस्थः पञ्चदशस्तोमस्थः एकविंशस्तोमस्थः त्रयस्त्रिशस्तोमस्थः प्रतिष्ठालक्षणं - ६-२- ३ ४- ५-६ ३ ३ ३६ ३६ ( ( ( ( : निरुक्तः - निरुक्तः निरुक्त निरुक्तम् , आदित्यः आन्तरिक्ष्यवायुः दिव्य दिक्सोमः , -- -, ---यजुर्वेदमयः सर्वमयः सामवेदमयः , श्रमगर्भितं काममथं-, - तपः : --सर्व , रलक्षणः सम्वरम ७-, -समष्टिलक्षणः * , त्रलोक्यव्यापकः : -चित्य ( निरुक्तः , त्रैलोक्याग्निः -६० , अष्टपर्वोपेतः सर्वप्रजापतिः--गायत्रब्रह्ममयः ) । अनिरुक्तः एव , स सर्वः एव य ( ३ - ( २१८

पृष्ठ 257

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-: माध्यात्मिकप्रजापतिपरिलेख २-) । सर्वः एव , स निरुक्तः एवा य ( --: अनिरुक्त शीरकेन्द्रस्थो - * संप्रतिष्ठित ब्रह्मरन्ध्रे - १ ६३ ३६ ( --क्तः बृहतीसहस्र -मनोमयोऽनिरुक्तप्रजापतिर्भूतात्मा निरुक्तम्--मनः चान्द्रं संकल्पविकल्पात्नकमैन्द्रियकं निरुक्ता--बाक् आग्नेयी व रसग्राहिका शब्दप्रपञ्चप्रवर्त्तिका . या, थान जिह्वा चक्षुर्गोलस्थं - २ ४---- निरक्कः प्राणः व्यः वा गन्धग्राहकश्च , आदित्यात्मकं दिक्सोममयं , श्वासप्रश्वासप्रवर्त्तकः नासारन्ध्रस्थानीयः ३-२१६ द्वितीय उद्गाथः-, श्रोत्रगोलस्थं ५ -सवः , रूपग्राहक , शब्दग्राहकं बलाधायक , पञ्चेन्द्रियव्यापारलक्षणं ६-व्याप्तो श्रनखाग्रेभ्यो आलोमभ्य ७-, -समष्टिलक्षणः * , अपर्वोपेतः ३ ( निरुक्तम् --चक्षुः ५ ) --( - निरुक्तम् श्रोत्रम् ( निरुक्तम् --- कर्म्म शारीरं ( निरुक्तः --- अग्निः वैश्वानरलक्षणः सर्वप्रप्रजापतिः ---गायत्रब्रह्ममयः ) । एवानिरुक्तः , स सर्वः एव य (

पृष्ठ 258

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भाष्यभूमिका बृहतीसहस्रात्मक सम्वत्सर का, और हमारा पितापुत्रात्मक मध्बन्ध है । एवं पिता वै जायते पुत्रः ' अनुसार पिता ही शात्मना पुत्ररूप में परिणत होता है । ऐसी दशा में हमें मान लेना पड़ेगा कि, पितुः स्थानीय आधिदैविक सम्वत्सरप्रजापति का जो स्वरूप है, उसमें जो पर्व - विभाग हैं, पुत्रस्थानीय आध्यात्मिक सम्वत्सरप्रजापति का भी वही स्वरूप है, एवं इसमें भी वही पर्व - विभाग । बृहत महस्र-पर्वो का पूर्व में समतुलन किया गया । अत्र छन्दोमय सात पत्र की दृष्टि से समतुलन कीजिए । पूर्व में बतलाया जा चुका है कि, सौर सम्वत्सर में गायत्र्यादि सात छन्दों का भोग हो रहा है । जिज्ञासु प्रश्न कर-सकता है कि, पुरुषशरीर में सातों छन्द कहाँ, कैसे प्रतिष्ठित हैं?, एवं इनका क्या स्वरूप हैं? इसी जिज्ञासा की शान्ति के लिए पुरुषानुवन्धी छन्दों का संक्षिप्त विवरण उपस्थित हो रहा है । ' वाकू ' - प्राण ' - चक्षु ' – श्रोत्र ४ - मन " पूर्वोक्त इन पाँच इन्द्रियप्राणों को लक्ष्य में रग्विए । इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त एक ' प्रजननप्राण ' ( उपस्थप्राण ) है, एक मूलाधारस्थ, ब्रह्मग्रन्थिलक्षण ' अपानप्राण " है । इस दृष्टि से पुरुषसंस्था में सात प्राण हो जाते हैं । ये सात प्राण ही प्राध्यात्मिक सात छन्द हैं । छन्दः क्रमानुसार इन सातों प्राणों का- – ' “ प्रारण ', चक्षु ', वाकू ', मन, श्रोत्र ", प्रजननप्राण, अपानप्राण " यह क्रम रक्खा जायगा, एवं इन्हीं को क्रमशः " गायत्री ', उष्णिक ", अनुष्टुप् ३, बृहती, पंक्ति ", त्रिष्टुप् ६, जगती " माना जायगा । सातों प्राण ' सहस्र ' सम्पत्ति से युक्त हैं । सत्र में ' पद - पुनः पद ' भेद से दो दो विभाग हैं । उक्थरूप पद है, मण्डलरूप पुनः पद है । यही मण्डलरूपा ' साहस्री ' है । प्रत्येक प्राण उक्थ - अर्क ( चिम्व, रश्मि ) भेद से प्रतिष्ठित होता हुआ अवश्य ही सहस्र सम्पत्ति से युक्त है, जो कि सहस्रसम्पत्ति पूर्वोक्त बृहती के सम्बन्ध से बृहती सहस्ररूप में परिणित हो रही है । उसके साथ इसका छन्दोरूप यही समतुलन है, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथविज्ञान भाग्य ' में द्रष्टव्य है निन्नलिखित वचन इसी समतुलन का समर्थन कर रहे हैं - -१ - " प्राणो गायत्री, चतुरुष्णक, वागनुष्टुप, मनो बृहतो, श्रोत्र ' पंक्तिः, य एवायं प्रजननः प्राणः- एष एव त्रिष्टुप, योऽयमवाङ् प्राणः एष एव जगती । तानि वा एतानि सप्त छन्दांसि चतुरुत्तराण्यग्नौ क्रियन्त " । ( शत ० १ । ३ । १।१ ) । २ - तानि वा एतानि सप्त छन्दांसि चतुरुतराण्यन्योऽन्यस्मिन् प्रतिष्ठितानि । सप्तेमे पुरुषे प्राणा अन्योऽन्यस्मन् प्रतिष्ठिताः । तद्यावन्तमेव विच्छन्दसां गणमन्वाह छन्दसः, छन्दसो हैवास्य सोऽनूतो भवति, तो वा, शस्तो वा, उपहितो. वा EL? । ( शत ० १० | ३ | १ | ६ | ) १. २२०

पृष्ठ 259

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द्वितीयखण्ड जब समतुलन का ही विचार करने लगे, तो सम्वत्सर - सम्बन्धी अयन - पक्ष - माम- अहोरात्रादि की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती । अवश्य ही इन अहोरात्रादि पर्वों का ममतुजन भी आवश्यक रूप से अपेक्षित बन जाता है । इस तृतीय समतुलन को थोड़ी देर के लिए छोड़कर पहिले मौरचान्द्र - रसमूर्ति प्रजापति के उस व्यूहनकर्म्म का विचार कर लीजिए, जिससे वह स्वयं अहोरात्रादिरूप में परिणित हो रहा है । “ ३६० यजुष्मती इष्टका, तथा ३६० परिश्रित, सम्भूय ७२० ज्योतियों के द्वारा सम्वत्सरप्रजापति ने अपने प्रातिविक वृहती सहस्र रूप से देवभूतादि सर्वविध प्रजावर्ग का निर्माण किया, अपनी सम्वत्सरमात्रा इस निर्माण प्रक्रिया में हुत कर दी " यह पूर्व में कहा जा चुका है । अपनी मात्रा से भूत - भौतिक सृष्टि का निर्माण कर प्रजापति ने अपने आपको रिक्सा माना । प्रजापति ने यह अनुभव किया कि, मैं रिक्त - सा हो गया हूँ । पूर्णता अमृतभाव है, रिक्तता मृत्युभाव है । इस मृत्युलक्षण रिक्तभाव मे पूर्णलक्षण प्रजापति में भय का संचार होना स्वाभाविक ही था । दौर्बल्य - लक्षगा इस मृत्युभय से त्राण पाने के लिए प्रजापति ने यह विचार किया कि, यदि मैं इन सम्पूर्ण भूतों को पुनः अपने आप में ग्राहित करलूँ, इन सब का आत्मा बन जाऊँ, तो मेरी रिक्तता पुनः पूर्णभाव में परिणत हो सकती है । इस उपाय के साथ ही प्रजापति के सामने ' कथं ' का प्रश्न भी उपस्थित हुआ । तत्काल प्रजापति की दृष्टि व्यूह्न - प्रक्रिया की ओर गई । उसी प्रक्रिया के आश्रय से प्रजापति पुनः पूर्णभाव में परिणत हो गए । २६ - हयज्ञ तात्पर्य कहने का यही है कि, सम्वतसराग्नि का जो भाग प्रजानिर्माण में उपयुक्त हो जाता है, वह व्यूहनप्रक्रिया के द्वारा इसी प्रकार पुनः प्रजापति में मञ्चित हाता रहता है, जैसे राष्ट्र का धन राष्ट्रपति क कोश में परम्परया पहुँचकर राष्ट्रपति को पूर्ग ( मबल ) बनाए रखता है । प्रथम - उत्तम - मध्यमादि श्रेणि वर्गों के द्वारा परम्परया प्रदान होता है । इस प्रदान परम्परा के क्रमिक प्रत्यर्पणका अवसान राष्ट्रपति पर होता है | उदाहरण के लिए कृषक को ही लीजिए । कृषक से वहीं के सामान्य अनुचर ( पटेल - पटवारी ) ' करते हैं । यहाँ से तहसील में जाता है, तहसील से बड़े राज्य में आता । ठीक यही प्रत्यर्पण कर्म वसूल यहाँ सगझयं । भौतिक सम्वत्सरमण्डल में सबमे छोटा विभाग मूहतों का माना गया है । इन मुहुत्ते में व्याप्त भूतमात्राओं. किंवा मुहुर्त्तलक्षणा भूतमात्राओं का प्रत्यर्पण अहोरात्र पर्वों में, इन का पक्षपयों में, इनका मासपर्वों में, इन का ऋतुपर्वो में, इनका अयनपवमं प्रत्यर्पण होते होते अनन्तोगत्वा सम्वत्सर में सबका ’ आत्मसमर्पणा हो जाता है । इसी प्रक्रिया को ' व्यूहनकर्म्म ' कहा जाता है । महा सम्वत्सर से आरम्भ कर मुहूर्न पर्य्यन्त एक गमनागमनद्वार है । वहाँ से मात्रा आ आ कर मुहूर्च पर्य्यन्ता सृष्टि का पोषणः रक्षण करती है, यही उसका रिरिचानभाव है, अपूर्णता है, दौर्बल्य है । परन्तु व्यूह्नकर्म के द्वारा मुहूर्त्त से आरम्भ कर पारम्परिक प्रत्यर्पण से उन श्रागत मात्राओ का पुनः उस रिरिचान प्रजापति में चयन होता रहता है । यही उस संहित का पुनःसन्धान है, रिक्त की पुनः पूर्णता है । आरम्भ में वह हमारे स्वरूप निर्माण के लिए अन्न बना था, उसके अंश - प्रत्यंशों को लेकर हमने अपनी ' स्वरूपसत्ता प्रतिष्ठित की थी । परन्तु आज वही हमें अन्न बना रहा है । हम यदि अपनी रक्षा के लिए प्राकृतिक मण्डलात्मक सम्वत्सर २२१

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
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भाष्यभूमिका प्रजापति के पर्वों का उपभोग करते हैं, तो निश्चयेन हमारे सम्पूर्ण पर्व - ( भूतमात्रा ) अहरहः उसमें भी उपभुक्त हो रहे हैं । दोनों में अन्नादानविसर्गलक्षण अहरहर्यज्ञ हो रहा है * । ३० - अहोरात्रव्यूहनप्रक्रिया — विशोत्तरसप्तशतकलमूर्ति सम्वत्सम्प्राजापति ने मुहूर्त्तपर्य्यन्त व्याप्त होने के लिए अपने श्राप को कितनें व्यूहन कर्मों में विभक्त किया?, इस स्थिति का क्रमशः समन्वय कीजिए । सर्वप्रथम उसने अपने स्वरूप को ( ७२० संख्यात्मक एक समष्टि रूप को ) ' ३६० - ३६० ' भेद से दो भागों में विभक्त किया । यही इसका प्रथम व्यूहनकम्मं हुआ । इस मे काम न चला, तो अपने स्वरूप का ( ७२० को ) तीन - तीन - तीन ' अशी-तियों ( ८० ) में विभक्त करते हुए - ' २४०-२४०-२४० ' भेद मे तीन भागों में विभक्त कर दिया । इसमे भी काम न चला, तो अपने स्वरूप को ( ७२० को ) अशीतिशत ( १८० ) रूप से चार भागों में विभक्त किया । इस से भी काम न चला, तो अपने आत्मा को ( ७२० को ) चतुश्चत्वारिंश ( १४४ ) रूप से पाँच भागों में विभक्त कर दिया । इस से भी काम न चला, तो अपने आपका ( ७२० को ) विशतिशत ( १२० ) रूप मे ६ भागों में विभक्त किया । प्रजापति ने यहाँ पर्य्यन्त एक क्रम रख्खा, न तो उसने अपने स्वरूप के सात विभाग किए, न सप्त रूप से व्याप्त हुआ । अनन्तर इसने अपने छापको ( ७२० को ) नवती ( ६० ) रूप मे आठ भागों में विभक्त किया । इसमे भी काम न चला, तो अपने आप को ( ७२० को ) अशीति ( ८० ) रूस से नौ भागों में विभक्त किया । इस मे भी काम न चला, तो अपने आप को ( ७२० का ) द्वासप्तति ( ७२ ) रूप से दश भागों में विभक्त किया । यहाँ आकर प्रजातपति का दूसरा विक्रम समाप्त हुआ । श्रागे न तो इसने अपने आपको ग्यारह भागों में विभक्त किया, एव न इन में व्याप्त ही हुआ । अनन्तर इस ने अपने आप को ( ७२० को ) अष्टाचत्त्वारिशत् ( ४८ ) रूपये पन्द्रह भागों में विभक्त किया । इस से भी काम न चला, तो पञ्चचत्वारिंशत् ( ४५ ) रूप से सोलह भागों में विभक्त किया । यहाँ आकर चौथा विक्रम समाप्त हुआ । श्रागे न तो इसने अपने आप को सत्रह भागों में विभक्त किया, न इन में व्याप्त हुआ । अनन्तर चत्वारिंशत् ( ४० ) रूप से अपने आप को ( ७२० को ) अठारह भागों में विभक्त किया । यहाँ इस का पाँचवाँ व्यूहन समाप्त हुआ । आगे न तो इसने उन्नीस व्यूहन ही किया, एवं न इन में व्याप्त ही हुआ । आगे जाकर इसने अपने आप को षटूत्रिंशत् ( ३६ ) रूप से बीस भागों में विभक्त किया । यहाँ इस का ६ ठा व्यूहन समाप्त हुआ । आगे न तो इक्कीस - बाईस - तेईस विभाग हुए, न इन में व्याप्त हुआ । अनन्तर इसने अपने आप को ( ७२० को ) त्रिंशत् ( ३० ) रूप से चात्रीस भागों में विभक्त किया । यहाँ आकर यह ( पूर्वोक्त ) ' पञ्चदश ' व्यूह में प्रतिष्ठित हो गया । अर्थात् इस चतुर्विंशत् व्यूह का पञ्चदश व्यूह के साथ ग्रन्थिबन्धन हो गया । परिणाम

* श्रहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्योऽमृतस्य नाम ।

यो मा ददाति स इदेव मावत् -मन्नमन्नमदन्तमभि ॥

- सामसं ० पू ० ६ | ३ | २२२