Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 31–40
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40
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विषयसूची ( ४ ) - ' अपौरुषेय वेद का तात्विक इतिवृत्त ' नामक चतुर्थस्तम्भान्तर्गत अवान्तरपरिच्छेद-१ - प्रजापति, और वेद २७३ | २८ - पार्थिव, एवं सौर सामत्रयी ३२२ २ - सूर्य्य, और वेदत्रयी २७४ २६ - सामों का अतिमानसम्बन्ध ३२५ ३ - वेदत्रयी का सामान्य परिचय २८० ३० - चाक्षुषसाम, और प्रोता बिन्दु ३२५ ४ - विज्ञानदृष्टि, और त्रिउटी विवर्त्त २८५ ३१ - विष्कम्भ का वितान ३२७ ५ - ज्ञानधारा के दो विभिन्न दृष्टिकोण २ = ६| ३२ - ' प्रत्यक्ष ' विज्ञान ३२८ ३३ - अन्तर्जगत्, और बहिर्जगत् ३२६ ३४- सूर्यरश्मि, और सहस्र २६१ सू ३३० २६२ ३५- तात्कालिक विषयप्रत्यक्ष ३३१ २६३ ३३२ ३३३ ६- मूर्खतापूर्ण सहजज्ञान, और ऋषिदृष्टि २६ ७ – जड़चेतनात्मक रहस्यबाद् २६० । - श्रात्मा और जीव का पार्थक्य ' - सामान्या वेदत्रयी १०- ऋग्लक्षण छन्दोवेद ११ - ऋग्वेद के दो दृष्टिकोण १२- प्रतिष्ठात्रयी का मौलिक रहस्य १३- प्रतिष्ठात्रयी, और वेदत्रयी १४ - छन्द्रोवेदमयीं ऋग्वेद परिभाषाएँ १५ - छन्दो वेदमयीं यजुःपरिभाषाएँ. १६- छन्दोवेदमयीं सामपरिभाषाएँ १७ - वस्तु के तीन प १८- केन्द्र - व्यास - परिधि - भाव ३६ - चित्र की चित्रता २६४ | ३७ - परोक्षप्रिय देवता २६७ | ३८ - परोह्वयः, पर उ: - रहस्य ३३३ २६६ | ३६ - अभिप्लव, एवं पृष्ठयस्तोमविज्ञान ३३४ ३०५ || ४० - सामवेद में वेदत्रयी का उपभोग ३३६ ३०६ | ४१ —– रसलक्षण यजुर्वेद का उपक्रम. ३४० ३०७ ४२ - प्रवर्ग्य का आदान - प्रदान ३४१ ३०७ || ४३ - प्राणवायु और यजुर्वेद ३४२ ३०८ | ४४ - सूच्यप्र- सूचीमुख - ऋजुभावापन्न यजु ३४४ ४५ - ( क ) बास - व्युत्क्रम - स्वरूप- ' ३१५ भेदभिन्न अग्नि ३४५ १६ - हृदय - विष्कम्भ - परिणाह, और वेदत्रयी ३१५ २०- ' साम ' लक्षण वितानवे दोपक्रम २१ - मूर्ति का मण्डलरूप में वितान २२ - प्रजापति की सहस्रायु २३ - प्रजापति के प्रस्कन्धभाव २४- सहस्र के सहस्रधा महिमानः ' सहस्र वितान २५ - हृदयबिन्दु का परितः वितान २६- सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी - शब्दों की परिभाषा २७ - कूटस्थ व्यास के आधार पर भूतव्यासों का वितान ३१६ | ४६ - व्युत्क्रमण - विक्रमरण, एवं ३१८ उत्क्रमण ३४७ ३१६ ४५ ( ख ) अग्निपरिभाषा ३४८ ३१६ ४८ - त्रयीभावों का समन्वय ३५० ३२० ४६ - सामव्यूह नहस्य ३५० ३५६ ३५८ ३६१ ३६२ ५० - यजुर्वेदत्रयी का मौलिक रहस्य ३२१ ५१ - शस्त्र - स्तोत्र, एवं ग्रह - स्वरूपविज्ञान ५२ - मह् दुक्थ - महाव्रत, एवं पुरुष " ३२२ । ५३- पुरुषलक्षणा यजुर्वेदत्रयी उपरतश्चायं चतुर्थस्तम्भः ४ २८
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विषयसूची ( ५ ) अग्निविकास रहस्य, और वेदशाखाविभाग ' नामक पञ्चमस्तम्भान्तर्गत अवान्तरपरिच्छेद १ - शास्त्र वेद, और ब्रह्मवेद ३६६ | १३ - अग्नीषोमात्मक शिव - शक्ति - भाव ३६४ २ - वैदिक इतिहास दृष्टि ३७० | १४ - वेदशाखाविभागोपपत्ति ३६८ ३ - मूल, एवं तृलवेद ३७२ १५ - वेदचतुष्टयी के उपक्रममन्त्र, ' ४ - शाखाविभाग, और प्राचीन दृष्टि ५ - वेदसंख्यान ३७३ और तात्त्विक वेदस्वरूप ४०३ ३७३ | १६ - विषयसन्दर्भसमन्वय ४०६ ६ - मन्त्रब्राह्मणात्मक तात्त्विक वेद -अदितिस्वरूपपरिचय - संहिता के विविध रूप ३७५ १७ - शून्य, एवं पूर्ण - भाव ४०७ ३७५ १८- ' अप् ' तत्त्व का पञ्चधा विकास ४०८ ३७७ ६ - व्यासदेव की वेदसंहिता, १६- ' अप् ' तत्त्व का चतुर्द्धा विकास ४१० २०- नवसंख्यावितान ४१२ और पुराणसंहिता ३८३ २१- शून्यबिन्दुवितान ४१५ १०- अदितिसंहिता के चार पर्व ३८६ २२- वेदानुबन्धी वितान ' ' ४१६ ११ - अथ का अभाव ३८७ | २३ - अग्निसोम - स्वभावानुबन्धी १२ – मन्त्रब्राह्मणात्मक अपौरुषेय ॠण - धन - भाव ४२३ ताकि वेद ३८६ ४२६ * -प्रकरणोपसंहार उपरतश्चाय पञ्चमस्तम्भः ५ * - परिशिष्टविभागः ' ** ' सर्वान्त में उपरता चेयं उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डस्य संक्षिप्ता - विषयसूची २३
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श्रीः उपरता चेयमुपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीय खण्डस्य संक्षिप्ता - विषयसूची
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत ' वेद का मौलिकस्वरूप ' प्रथम -स्तम्भ १ नामक
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श्रीः * न तत्सद् ब्रह्मणे नमः उपनिपद्विज्ञानभाष्यभूमिका द्वितीयखण्ड * १- मांगलिकसंस्मरण-नि षु सीद गणपते! गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च ॥ १ ॥
एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनुप्रभृतः । ' " एकैवोपाः सर्वमिदं विभाति - " एकं वा इदं विबभूव सम् " ॥ २ ॥
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे. वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः । * धानीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥ ३ ॥
चागक्षरं प्रथमंजा ऋतस्य वेदानां मानाऽमृतस्य नाभिः ।
सा नों जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेरतु ॥ ४ ॥
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । " तं देवमात्मबुद्धि प्रकाशं मुमुक्षु वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ ४ ॥
अग्निर्जागर तमुचः कामयन्ते श्रग्निजगार तमु सामानि यन्ति अग्निर्जागर तमयं सोम यह तवाहमस्मि सख्ये न्योः ॥ ६ ॥
I
सहस्रघा पञ्चदशान्युक्या यावद्यावापृथिवी तावदिचत् ।
सहस्रभा महिमानः ' सहस्त्र ' यावद् ब्रह्मविष्ठितं तावती बाक् ॥ ७ ॥
ओष्ठ । पिधाना नकुल दन्तैः परिवृता पविः ।
सर्वस्यै वाच ईशान । चारु मामिह वादयेत् ॥
विषयोपक्रमः -भूमिकाप्रथमखण्डे का सिंहावलोकन ——— 17 " " क्या उपनिषत् वेद है? ”, यह विषय प्रक्रान्त है । भूमिका के प्रथमखण्ड ' में इस प्रश्न से सम्बन्ध रखने वाले ' दार्शनिक विचार ' - ' वैज्ञानिक वैदनिरुक्ति ', इन दो विषयों का विवेचन हुआ हैं । इन दोनों
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भाष्य भूमिका विषयों में से वैज्ञानिक वेदनिरुक्ति मे सम्बन्ध रखने वाली मूलवेट, ग्रात्मवेद, सच्चिदानन्द वेद, वेद - विद्या-ब्रह्मवेद, उक्थ - ब्रह्म - सामवेद, ८ र्ववेद, भावनावेद, भाववेद, कालवेद, दिग्वेद, देशवेद, वर्णवेद, आदि १७ वेदनिरुक्तियों का प्रथमखण्ड में स्पष्टीकरण हो चुका है । अत्र स्वतन्त्र रूप से वेद के मौलिक स्वरूप का विचार उपक्रान्त है । हमारा विश्वास है कि, प्रथमखण्ड में वेद की जो निरुक्तियाँ बतलाई गई हैं, एवं प्रस्तुत प्रकरण में वेद का जो तात्त्विक स्वरूप बतलाया जाने वाला है, उसके सम्यक अवलोकन करने के अनन्तर वेशशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले चिरकालिक ' वेद पौरुषेय हैं, अथवा अपोरुषेय? ” इस प्रश्न का यथावत् समाधान हो जायगा । एवं इसी वेदस्वरूप के आधार परदार्शनिक दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले उन मतवादों का भी पूरा पूरा समन्वय हो जायगा, जो कि विभिन्न मतवाद वेद के तात्त्विक स्वरूप — ज्ञान के अभाव से वेदशास्त्र की अपौरुषेयता, पौरुषेयता के सम्बन्ध में विविध भ्रान्तियों के कारण बने हुए हैं । ३ - वेदव्याख्याता यास्काचार्य की आलोच्या निर्वचनशैली -मौलिक ' वेदपदार्थ ' का परिज्ञान हमें उपलब्ध होने वाले सायण, महीधर, हरिहरादि के वेद भाष्यों से हो सकता है, अथवा नहीं?, इस ग्रप्रिय चर्चा से यथासम्भव हमें इसलिए बचना चाहिए कि, जिस श्रद्धातिरेक का प्रथमखण्ड में विश्लेषण किया जा चुका है, उस प्रचलित श्रद्धा का विघात करना हमें कदापि इष्ट नहीं है । कर्म्मकाण्ड के नाते सायण - महीधरादि वेदभाष्यकारों के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलियाँ समर्पित करते हुए, इन महापुरुषों के प्रति समस्त बेदभक्तों की ओर से कृतज्ञता प्रकट करते हुए, तथा इनके यश को अणुमात्र भी कम न करते हुए इस सम्बन्ध में केवल यही स्पष्टीकरण पर्याप्त होगा कि, स्वतःप्रमाण वेदशास्त्र के सम्बन्ध में सायणादि व्याख्याताओं के द्वारा बुद्धिपूर्वक जो व्याख्याएँ हुई हैं, वे कर्म्मकाण्ड से सम्बन्ध रखने वालीं इतिकर्तव्यताओं का जहाँ अक्षरशः अनुगमन कर रहीं हैं, वहाँ वेद के मौलिक स्वरूप की दृष्टि से, वेदशास्त्र में प्रतिपादित पारिभाषिक शब्दों के तात्त्विक अर्थसमन्वय की दृष्टि से उनकी वे व्याख्याएँ अधिकांश में व्यर्थ ही प्रमाणित हुई हैं । यास्काचार्य से प्राचीन ' कौत्स ' नामक वेदव्याख्याता के - " * विस्पष्टार्थत्त्वात्, अनथकत्त्वात्, विप्रतिषिद्धार्थत्वाच्च विधिमन्त्रयोर्वेदार्थप्रत्ययाय शास्त्रारम्भो निरर्थकः " इस हेतुवाद की उपेक्षा करते हुए, “ न ४ ह्येष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति, पुरुषापराधः स भवति ” इस न्याय x ÷ देखिए, उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड, अन्तिमप्रकरण के १ पृष्ठ से १०२ पृष्ठ पर्य्यन्त । * “ वैदिक शब्दों के अर्थ स्पष्ट नहीं हैं - इसलिए वैदिक शब्दों के कोई निश्चित अर्थ नहीं किए नासकते । इसलिए वैदिक शब्दों के अर्थ एक दूसरे शब्दार्थों से प्रामाणिक बन रहे हैं । अतएव विधिमन्त्रात्मक वेद के वोध के लिए वेदव्याख्या करना निरर्थक है । " × “ यदि एक अन्धा मनुष्य स्थाणु से टकरा जाता है, स्थाणु उसे नहीं दिखाई देता है, तो यह स्थाणु का अपराध नहीं है, अपितु यह स्वयं उस अन्धे मनुष्य का ही अपराध है । इसी प्रकार यदि किसी को वेद-शब्दार्थों में सन्देह है, तो यह सन्देह करने वाले का ही अपराध माना जायगा । २
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द्वितीयखण्ड को लक्ष्य में रखते हुए सुप्रसिद्ध वेदव्याख्याता यास्काचार्य्य ने वेदार्थ के लिए प्रयास किया, जिसके फल-स्वरूप ‘ यात्कनिरुक्त ' नामक ग्रन्थ श्राज विद्वत् समाज में सम्मानार्ह बन रहा है । यास्काचार्य्य के इस सम्मान को अणुमात्र भी कम न करते हुए हमें इनके सम्बन्ध में भी इस अप्रिय सत्य का आश्रय लेना ही पड़ रहा कि, जहाँ सायणमहीधरादि भाष्यकारों के भाष्य कर्म्मकाण्ड ( पद्धति ) से सम्बन्ध रखने वालों सम्पूर्ण जिज्ञासाओं है के पूर्ण परितोषक बन रहे हैं, वहाँ यास्काचार्य का निरुक्तग्रन्थ वैदिक पदार्थों की वैकल्पिक निरुक्ति सन्देहनिवृत्ति के स्थान में ' एकस्मिन् धर्म्मिणि विरुद्ध नाना कोट्यवगाहिज्ञानं संशयः ” के करता अनुसार हुआ सन्देहदृढ़ता का ही कारण बन रहा है । यास्काचार्य्यं के वेदशब्दनिर्वचनों में हमारी सत्र से बड़ी विप्रतिपत्ति यही है कि, इन्होंनें ब्राह्मणप्रन्थोक्त शब्दनिर्वचनों की एक प्रकार से उपेक्षा कर अपने स्वतन्त्र दृष्टिकोण से ही शब्दों का निर्वचन किया है! कहना न होगा कि, ब्राह्मणग्रन्थों के निर्वचन जहाँ हमें एक सर्वथा निर्णीत तात्त्विक अर्थ का बोध कराते हैं, वहाँ यास्काचार्य के निर्वचन विस्पष्टार्थसूचक ही बनें हुए हैं लिए समतुलनदृष्टि से कुछ एक शब्दों का विचार करना अप्रासङ्गिक न होगा । इन्द्र, अग्नि, वरुण । उदाहरण , के बृहस्पति, अन्तरिक्ष, सम्वत्सर, इत्यादि शब्दों के जो निर्वचन यास्काचार्य्य ने किए हैं, उन्हें भी वैश्वानर दृष्टि के, सामने रखिए, एवं स्वयं वेद ने जो निर्वचन किए हैं, उन्हें भी लक्ष्य बनाइए, और फिर दोनों का समतुलन ' कीजिए । स्थिति का स्पष्टीकरण हो जायगा -१- इन्द्रः-" इन्द्रः - इरां णाति, इति वा " । -- या ० नि ० १०/८/२१ “ स योऽयं मध्ये प्राणः, एष एवेन्द्रः । तानेव प्राणाम् मध्यत इन्द्रियेण -ऐन्द्ध । यदैन्द्ध, तस्मादिन्धः । इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षम् ” । २- अग्नि: -३-- मृत्युः-" अग्निः कस्मात् १, अग्रणीर्भवति ” T --शत ० त्रा ० ६।११११२१ - या ० निः ७ | १४ | ४ || " स यदस्य सर्वस्याग्रमसृज्यत, तस्मादग्रिः । अग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम् " । “ मृत्युर्मारयतीति सतः ” - या ० नि ० ११ | ६ | २ | --शत ० ० ६ | १ | १ | ११ || 1774 “ स समुद्रात् अमुच्यत । स मुच्युरभवत् । तं वा एतं मुच्यु ं सन्तं मृत्युरित्या -चक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः " । -- गोपथ त्रा ० पु ० १।७ ।
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४- वरुण: -भाष्यभूमिका " वरुणो वृणोतीति सतः " । - याः निः १० | ५ | २ | " आप: - यच्च दृग्वाऽतिर स्तद्वरणोऽभवत् । तं वा एतं बरणं सन्तं ' वरुण ' इत्याचक्ष परोदंण । परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्षद्विपः " -गोः ब्रा ० पू ० १७ | ५ - दैश्वानरः – वैश्वानरः कस्मात् १ विश्वान्नरान्नयति ” । - या ० नि ०७ | २२ | ५ | “ स यः स वैश्वानरः - इमे स लोकाः । इयमेत्र पृथिवी विश्व, अग्निर्नरः । अन्तरिक्षमेव विश्वं वायुनंरः । धौरेव विश्व, आदित्यो नरः । ( विश्वेभ्यो नरेभ्यः —अग्निवाय्वादित्येभ्यः – संघर्षादुत्पत्रस्वापलचणस्त्र लोक्यव्यापको यौगिका ग्निरेव वैश्वानरः ) ” । ६ – बृहस्पतिः– -शत ० प्रा ० ६३ | १३ | " बृहस्पति हतः पाता वा, पालयिता वा " । - या ० नि ० १०।१२।६ । " बाम्बे बृहती,, तस्या एष पतिः, तस्मादु बृहस्पतिः ” । ७- अन्तरिक्षम् -- शत ० ब्रा ० -१४ | ४ | १ | २२ | | ' ' अन्तरिक्ष ं स्मात् १, अन्तरा क्षान्तं भवति, अन्तरेमे इति वा, ३ रीरेष्वन्तर-सर्यामिति वा " । - या ० नि ० २ | १० | ४ | " " सह मावळे लोकावासतुः । तयोर्वियतयोर्योऽन्तरेणाकाश-श्रामीत् तदन्तरिक्षमभवत् । ईक्षं हैतन्नाम ततः पुरा । अन्तरा वाऽइदमीक्षमभून्, इति तस्मादन्तरक्षम् " " -सम्वत्सरः-“ सम्वसरः ——– सम्बसन्तेऽस्मिन् भूतानि ” । - शत ० प्रा ० ७।१।२।२३ । - याः नि ० ४।२७ । ' ' स ' ऐक्षत प्रजापति: - ' सर्व ' वाऽअत्सारिषं य इमा देवता असूतीति ' । स सर्व त्सरोऽभवत् । सर्व त्सरो ह वैनामैतयत्- ' सम्वत्सर ' इति ” । ४ - शत ० प्रा ० १२ | १ | ६ | १२ |
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द्वितीयखण्ड इसके अतिरिक्त याम्काचार्य के श्रमख्य विक पभाव ( वा - वा - भाव ) भो हमें पदे पदे लक्ष्यन्युत करते रहते हैं । उदाहरण के लिए यास्क के ' देवतावाद ' को ही लीजिए । देवताओं के सम्बन्ध में यास्क ने प्रश्न उठाया है कि, देवता स्वरूपधारी हैं?, अथवा तत्त्वात्नक? | आगे जाकर इन प्रश्नों की मीमांसा करतें हुए रुद्धार्थप्रतिपादक वेदवचनों के आधार पर यह बत नाने की चेष्टा की गई है कि, देवता शरीरधारीं भी हो सकते हैं, अथवा तत्त्वात्मक भी हो सकते हैं । इस प्रकार विविध पक्षों को उद्धृत करते हुए अन्त में यास्काचार्य्यं वही संदिग्ध निर्णय करते दिग्बलाई देखते हैं, जैसा कि सन्देहात्मक निर्णय अस्मदादि साधारण मनुष्य पहिले से ही किए बैठे हैं । देखिए! ( १ ) — " * अपि वा उभयत्रिधाः स्युः ” । - या ० निः ७ = | | | ( २ ) — " पि वा पुरुषविधानानेव सतां कर्मात्मान-एते स्युः, यथा यज्ञो यजमानस्य " । — या ० नि ० ७5 | 5 | हम अपने वेदप्रेमी पाठकों से पूछते हैं कि, देवतावाद - सम्बन्धिनी जिस जिज्ञासा का लेकर वे यास्काचार्य्यं की शरण में पहुँचते हैं, क्या वहाँ उन की जिज्ञामा का पूरा पूरा समाधान हो जाता है? | क्या वे यास्क के ' अपि वा उभयविधाः स्युः ' इस सन्देहात्मक उत्तर से सन्तुष्ट हो जाते हैं? । इसके अतिरिक्त यास्कनिरुक्त खूब हम आदि से अन्त तक अध्ययन करते हैं, तो हमें ऐमा प्रतीत होता है कि, मानो यास्काचार्य की दृष्टि में वैदिक अनन्त तत्त्ववाद मेघ, जल, सुय्यकिरण, इन में भी विशेषतः मेघ पर ही विश्रान्त है । यास्क की इस संदिग्ध व्याख्याप्रणाली से थोड़ी देर के लिए तो हमें यह भी भ्रम हो जाता है कि, बहुत सम्भव है यास्क के नाम मे किसी अर्वाचीन पण्डित ने ही गत शताब्दियों में इस ग्रन्थ का निर्माण कर डाला हो? । कारण इस भ्रम का यही है कि. शाकपूणि, काशकृत्स्न, क्रोष्टुकि. कात्थक्य, श्रनाभ, चम्र्मशिरा, आदि जिन निरुक्तकारों के निर्वचन उदाहरणरूप से यत्रतत्र उपलब्ध होते हैं, उन निर्वचनों के समतुलन में प्रचलित यास्क निरुक्त सर्वथा प्रढिवादग्रहन्त - सा प्रतीत हो रहा है । ग्रस्तु इस प्रिय सत्य के साथ ही कृतज्ञता के नाते हमें यह भी मान हीं लेना पड़ता है कि, जब लोगों की वेदार्थ की ओर प्रवृत्ति नही है, वेदार्थ में स्वप्रतिभा से श्रम करने वाले विद्वानों का प्रभाव - सा है, तो हमारी इस प्रारम्भिक दशा में यास्कनिरुक्त की निर्वचनशैली से भी लाभ उठाया ही जा सकता है । परन्तु इसके साथ ही वेटप्रेमियों से यह निवेदन किए बिना भी नहीं रहा जा मकता कि, याः षनिर्वचन, एवं ब्राह्मण निर्वचन में जहाँ कुछ भी विरोध प्रतीत होता हो, कुछ भी सन्देड़ रहे, वहाँ ब्राह्मणा निर्वचन को ही प्रधानता देनी चाहिए । एक एक शब्द के अनेक वैकल्पिक अर्थों का अनु-गमन करने वाले ये यास्कीय निर्वाचन कभी निश्चितार्थप्रतिपादक वैटिक मन्त्रों का तत्त्वविश्लेषण नहीं कर सकते । " यह भी हो सकता है, वह भी हो सकता है " यह तो एक प्रकार का संशयवादमूलक वैसा स्याद्वाद है, जिससे * देवनावाद से सम्बन्ध रखने वाला विशद वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथ हिन्दी विज्ञान ' भाष्यान्तर्गत " अष्टविधदेवतानिरूपण " नामक प्रकरण में देखना चाहेए । J
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भाष्यभूमिका सन्देहनिवृत्ति के स्थान में उत्तरोत्तर सन्देहवृद्धि ही होती है । हमें तो वैसे विद्वान् का आश्रय अपेक्षित है, जो वा - वा के प्रपञ्च में न डालकर हमें एक निर्णीत निश्चित ' इदमित्थमेव, नान्यथा ' लक्षण अर्थ का बोध करावे । स्वयं श्रुति भी ऐसे विद्वान् के आश्रय का ही समर्थन कर रही है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से
स्पष्ट है-१ - सम्पूषन् विदुषा नय यो अञ्जसानुशासति ।
य एवेदमिति ब्रवत् ॥
२ – समुपूणा गमेमहि यो गृहाँ अभिशासति ।
इम एवेति च ब्रवत् ॥
३ – पूणश्चक्रं न रिष्यति न कोशोऽवपद्यते ।
नो अस्य व्यथते पविः ॥
-- ऋक्सं ० ६।५४।१-२-३ मन्त्र । ४- वेद भाष्यकार श्रीसायण - महीधराचार्य की आलोच्या भाष्यशैली-यही अवस्था सायण - महीधरादि श्राचाय्य की समझिए । इन श्राचाय्यों ने कर्म्मपरक जो वेदभाव्य लिखे हैं, उनके लिए प्रजा सदा इन की कृतज्ञ रहेगी । परन्तु वैदिक तत्त्वों के सम्बन्ध में इनकी का ओर भी से जो स्पष्टीकरण हुआ है, वह परस्पर तो विरोध का सूचक ही है । इस के अतिरिक्त यास्काचार्य्यसिद्धान्तों श्राचार्य सम्मान्य । ऐसी दशा में किनका कथन प्रामाणिक, एवं किन का पूर्ण विरोध हुआ है । दोनों हीं के सम्बन्ध में दो विप्रति-अप्रामाणिक माना जाय?, यह भी एक जटिल समस्या है । सायरामहीधरभाष्यों ' मुक्तकरूप से मन्त्रव्याख्या ' । जत्र पत्तियों को प्रधान स्थान दिया जा सकता है । पहिली विप्रतिपत्ति है- में क्रमबद्ध किसी विद्या का आप ऋक्संहिता पर दृष्टि डालेंगे, तो आपको विदित होगा कि, किसी भी सूक्त के कुछ मन्त्र प्रथम मण्डल के निरूपण नहीं हुआ है । उदाहरण के लिए वृष्टिविद्या ' को ही लीजिए । इस खगोलविद्या, कतिपय सूक्तों में मिलेंगे, कुछ मन्त्र दशममण्डल के विभिन्न सूक्तो में । इसी प्रकार यज्ञविद्या,, इन्द्रविद्या, कालचक्रविद्या, नक्षत्रविद्या, प्रवर्ग्यविद्या, प्रणवविद्या, श्रात्मगतिविद्या, प्रजातन्तुवितानविद्या, वरुणविद्या, श्रोषधिविद्या, वनस्पतिविद्या, सोमविद्या, वागूविद्या, प्राणविद्या, मनोविद्या, ब्रह्मविद्या, सदसद्विद्या इत्यादि यच्चयावत् विद्याओं का मुक्तक सूक्तों के मुक्तक मन्त्रों के द्वारा मुक्तकरूप से ही यत्रतत्र निरूपण ने हुआ जिस है । इस मुक्तकभाव का कारण यही है कि, भिन्न भिन्न सूक्तों के भिन्न भिन्न ऋषि द्रष्टा हैं । जिस ऋषि विद्या के सम्बन्ध में जिस विषय का जिस मन्त्र में स्पष्टीकरण कर दिया है, अन्य ऋषि ने उस विषय की छोड़ते हुएशेषांश पर ही प्रकाश डाला है । यही कारण है कि ऋग्वेद में जिन असंख्यात गुप्त विद्याओं का निरूपण हुआ है, उन्हें आप क्रमबद्ध प्राप्त नहीं कर सकते । प्रत्येक विद्या के यथावत् समन्वय के लिए आपको समस्त ॠग्वेद का मन्थन करना पड़ेगा, यत्रतत्र से अशात्मक विद्याविषयों का संग्रह करना पड़ेगा, तत्र कहीं आप अभीप्सित विद्याविषय को सर्वाङ्गीण बना सकेंगे । सायणमहीधर ने स्वभाष्यों में इस प्रकरण मर्य्यादा की उपेक्षा क्यों की १, यह प्रश्न तो प्रतिप्रश्न है । हाँ, उपेक्षा ग्रवश्य हुई है, यह सिद्धान्त मान्य है । इन्होंने मुक्तक रूप से ही वेदमन्त्रों की व्याख्या की, जो कि ६