Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 41–50

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50

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द्वितीयखण्ड पूर्वापर प्रकरणसमन्वय वञ्चित रहतीं हुई वेदार्थसम्बन्ध में अनुपयोगिनीं हीं सिद्ध हुई । हमारा तो इन मन्त्रसंहिताओं के सम्बन्ध में आज भी ऐसा विश्वास है कि, ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषदों के अति-रिक्त मन्त्रसंहिताओं के स्वतन्त्र भाष्य से कभी मन्त्रों के तात्त्विक अर्थ अवगत हो ही नहीं सकते । संहिता पटित असंख्य ऐसे पारिभाषिक शब्द हैं, जिनका अर्थ व्याकरण के बल पर नहीं लगाया जा सकता । ऐसी असंख्य परिभाषाएँ हैं, जिनका विश्लेवण केवल मन्त्रों के अक्षरों के आधार पर नहीं किया जा सकता । इनके सम्यक् बोध के लिए ब्राह्मणनिरुक्तियों के आधार पर स्वतन्त्र ग्रन्थाध्ययन हीं अपेक्षित है । बिना परिभाषाज्ञान के एक वेदभाष्य तो क्या, सहस्र वेदभाष्य भी मन्त्रार्थपरिज्ञान में यथावत् सहायक नहीं बन सकते । सायणाचार्य के सम्बन्ध में दूसरी विप्रतिपत्ति है- “ व्याकरणबलप्रयोग " । मन्त्रों में असंख्य शब्द ऐसे पठित हैं, जो अपना अर्थ जहाँ आप प्रकट रहे हैं, वहाँ व्याकरणत्रलप्रयोगद्वारा धातु-प्रत्यय की अर्गला लगा देने से वे अपना अर्थ खो बैठते हैं । इन सत्र विषम समस्याओं को देखते हुए एक वेदार्थपरिशीलनप्रेमी के सामने अवश्य ही यह प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि, वह अपनी वेदार्थविष-यिणी जिज्ञासा शान्त करने के लिए ऐसे कौन - से उपाय का आश्रय ले, जिससे उसका अन्तर्जगत् वस्तुगत्या वेद के वास्तविक तात्पर्य्य की ओर अनुगत बन सके? । ५- वेदार्थपरिशीलन साफल्योपाय-उक्त प्रश्न का सिवाय इसके और क्या उत्तर हो सकता है कि, परम्परागत वेदव्याख्याओं को हो अपने स्वाध्यायकर्म की मूलप्रतिष्ठा बनाना चाहिए । जो अर्थ परम्परानुगति से सम्बन्ध नहीं रखता, षह वेदार्थपरिशीलनकर्म में कभी उपोलक सिद्ध नहीं हो सकता । अत्र इस उत्तर के सम्बन्ध में यह प्रतिप्रश्न शेष रह जाता है कि, वे परम्परागत वेदव्याख्याएँ कौन सी हैं, जिनका अनुगमन तत्त्वज्ञान का सहायक बनता है? | इस प्रतिप्रश्न का एकमात्र उत्तर है - " आपरम्परा " - " ऋषिसम्प्रदाय " । समस्त-ब्राह्मणग्रन्थ, समस्त आरण्यकग्रन्थ, समस्त उपनिषद्ग्रन्थ इसी परम्परा की प्रतिमा माने जायँगे । मन्त्रा-त्मिका संहिता के पारिभाषिक शब्दों की जैसी व्याख्याएँ इस ब्राह्मणात्मक वेदभाग में हुई हैं, वैसी अन्य अनार्ष ( मानुष ) व्याख्याओं में सर्वथा अनुपलब्ध हैं । * सन्तमत से सम्बन्ध रखने वाली जिस साम्प्रदायिक दृष्टि ने हमारी बुद्धि को अष्टष्टि से पृथक् कर दिया है, ऐसी अनार्षदृदृष्टि से अनार्षव्याख्याओं को एकमात्र अवलम्ब बनाते हुए कभी वेद के तत्त्वार्थपरिशीलन में हम सफल नहीं बन सकते । वैदिकसाहित्य दृष्टि से पूत, धर्म के अन्यतम प्रतिष्ठापक महामहर्षियों के द्वारा दृष्ट ईश्वरीय सहज ज्ञाननिधि है । सम्भव है, हमारी बुद्धि प्रयास करने पर इसके तट पर पहुँच सके । परन्तु इतना निश्चित है कि, जब तक हमारी बुद्धि कृत्रिमज्ञानप्रधाना बनती हुई बुद्धिगम्य वेदव्याख्याओं का अनु गमन करती रहेगी, तब तक हम कभी उस सहजज्ञानसागर के अन्तस्तल में निमज्जन नहीं कर सकेंगे । इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए, स्वतः प्रमाण वेद के मन्त्रभाग का यथावत् परिज्ञान प्राप्त करने के लिए तो * गीताविज्ञानभाष्यभूमिका तृतीयखण्डान्तर्गत ' वैदिककर्म्मयोग ' नामक प्रकरण के ' अधर्म, एवं सन्तमत ' नामक अवान्तर प्रकरण में इस विषय का विशद विवेचन देखना चाहिए ।

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भाष्यभूमिका श्रादृष्टि के विकास हमें सम्प्रदायवादशून्य, का प्रयत्न करते हुए स्वतः प्रमाणभूत वेद के ब्राह्मणभाग का ही अनुगमन करना पड़ेगा । " स्त्रयम्प्रकाशाः स्वतः सिद्धाश्च भवन्ति वेदार्थाः ” इस सूक्ति को एक तथ्यपूर्ण ( मानते हुए स्वयं वेदशास्त्रपरम्परा को ही वेदार्थ में प्रमाण मानना पड़ेगा । जिन तात्विक विषयों का स्पष्टीकरण परम्परा सिद्ध स्वयं ब्राह्मणग्रन्थ कर रहे हैं, जी तात्त्विकं अर्थ स्वयं मन्त्रों से बिना किसी खैंचातानी के स्वतः अभिव्यक्त हो रहे हैं, उनकी उपेक्षा कर वेदार्थबोध के लिए परतः प्रमाणभूत अन्य व्याख्याग्रन्थों का आश्रय लेना, परम्परा का परित्याग कर अनार्षपरम्परा का अनुगमन करना किसी भी धर्मानुयायी को शोभा नहीं देता । इसी आदृष्टि को, ग्रादृष्टेद्वारा दृष्ट परम्परा को प्रमाण मानते हुए ही वेद का स्वरूपविचार प्रकान्त है । मौलिक वेद के जिस तात्त्विक स्वरूप का इस प्रकरण में सक्षेप से स्पष्टीकरण होने वाला है, प्रचलित परम्परा के अनुयायी विद्वानों के लिए वह सर्वथा नवीन बात होगी | उपलब्ध सायण - महीधर - याम्कादि व्याख्याग्रन्थों की परम्परा से वे इसका समर्थन प्राप्त नही कर सकेंगे । इस वेदस्वरूप का समर्थन उन्हें स्वयं वेदशास्त्र में हीं उपलब्ध होगा, जो कि समर्थन परतःप्रमाणभूत इतर शास्त्रों की अपेक्षा सर्वात्मना प्रामा एक माना जायगा । यही प्रकृत प्रकरण का उपक्रम है, एवं इसी के अव्यवहितोत्तरकाल में पाठकों का ध्यान वेद के तात्त्विक स्वरूप की ओर आकर्षित किया जा रहा है । ६- मौलिक वेद का इतिवृत-इति - विषयोपक्रमः -:: महामायावच्छिन्न, सर्वेश्वर, सगुण, सर्वधर्मोपपन्न प्रजापति जिस तत्व के सहयोग से विश्वनिर्मा में समर्थ हुए हैं, उसे । तत्त्व का नाम ' मोलिक वेद ' है । जिस तत्त्व के सहयोग से प्रजापति यज्ञवितान में समर्थ होते हैं, वही तत्त्व मौलिकवेद ' है । जिस तत्त्व के आधार पर प्रजापति प्रजातन्तुवितानद्वारा अपने ' प्रजापति ' नाम को सार्थक करते हैं, वही तत्त्व ' मालिकवेद ' है । जिस तत्त्व के आधार पर सर्वज्ञ प्रजापति त्रैलोक्य में अपना ज्ञानकला का प्रसार करते हैं, वही तत्त्व ' मालिक वेद ' है । जिस तत्त्वाश्रय से सर्वशक्ति-.मान् प्रजापति रोदसी ब्रह्माण्ड में अफ्नो क्रिया का विस्तार करते हैं, वही तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस तत्त्वानुगति से सर्ववत् ( सर्वार्थयन ) प्रजापति अर्थप्रपञ्च के अध्यक्ष बने हुए हैं, वही तत्र ' मौलिक वेद ” हैं । जिस प्रतिष्ठातत्त्व के आधार पर प्रजापतेि ऋत, अतएव प्रतिष्ठाशून्य आपोमय समुद्र के गर्भ में प्रविष्ट होकर प्रतिष्ठित होते हैं, वही प्रतिष्प्रतत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जो प्रतिष्ठातत्व सप्तपुरुष पुरुषात्मक " चित्य प्रजापति को प्रतिष्ठा प्रदान करता है, वही प्रतिष्ठा तस्व ' मौलिकवेद ' है । जिस प्रतिष्ठातस्व के आधार पर गुणभूत, अणुभूत, रेणुभूत, मह, भूत, सत्त्वभूत, इन पाँच भूतवर्गों का विकास होता है, वही प्रतिष्ठातत्त्व ' मालिकवेद ' है । जिस प्रतिष्ठातत्त्व को आधार बनाकर प्रजापति ' विदद्यते ' लक्षण अस्तिभाव से युक्त हो रहे हैं, सत्तात्मक, तास्वरूपसम्र्पक वही प्रतिष्ठाभाव ' मौलिकवेद ' है । जिसे प्रतिष्ठा बनाकर प्रजापति ' वेत्ति ' लक्षण विद्भाव से युक्त हो रहे हैं. चिदात्मक, चित्स्वरूपसमर्पक वही प्रतिष्ठाभाव ' मौलिकवेद ' है । जिसके सहयोग से प्रजापति ' विन्दति ' लक्षण रसभाव ( आनन्द ) से युक्त हो रहे हैं, रसात्मक, रसस्वरूपसमर्पक वही प्रतिष्ठाभाव ' मौलिक वेद ”

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द्वितीयखण्ड है । जिस मौलिक तत्त्व से सर्वव्यापक कालचक्र के भूत - वर्तमान भविष्यत् ये तीन सोपाधिक खण्ड हो जाते हैं, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्व के आधार पर ब्रह्म, क्षेत्र, विटू, शूद्र - भावापन्न दिव्य - वीर - पशु - मृत् - भावमय अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेव, पूषा, नामक चार वर्णदेवताओं का विकास हुआ है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस मौलिक तत्त्वधरातल पर अग्निमय पृथिवीलोक, वायुमय अन्तरिक्ष-लोक, आदित्यमय द्युलोक, तथा आपोमय चतुर्थलोक का वितान हुआ है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिन मौतिक तत्त्व के सहयोग से विशकलित क्षरपरमाणु संत्ररूप में परिणत होते हुए ' मूर्ति ( पिण्ड ) भाव में आ जाते हैं, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व के अनुग्रह से मूर्तिभावापन्न ( पिण्डा-तुमक ) पदार्थों में श्रादान, विसर्गात्मक गतिभाव का सञ्चार हुआ करता है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक उक्थतस्य श्रपनें तुलरूप अर्क ( रश्मि ) भावों के वितान से मूर्तिभावापन्न पदार्थों की अभ्यन्तर प्राणमूर्ति को केन्द्र बनाते हुए बड़ी दूरतक वियन्मण्डल में अपना एक स्वतन्त्र तेजोमण्डल बनाने में समर्थ होता है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व के ग्राश्रय से एकांशु सूर्य्य सहस्रांशु बनता हुआ अनन्तांशु बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेट ' हैं । जो मौलिक तत्त्व अपने सल्लक्षण असद्रूप से ' ऋषि ' नाम प्रसिद्ध होता हुआ । सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापत्ति का जन्मदाता बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक-वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व केन्द्र - विष्कम्भ - परिणाहभावों में परिणत होता हुआ पिण्डों का स्वरूपसंरक्षक अन रहा है, वही मौलिक तत्त्व मौलिकवेद है । जो मौलिक तत्त्व प्रस्ताव, उद्गीथ, निधन - भावों में परिणत होता हुआ वस्तुमात्र के उपक्रम, मध्य, उपसंहार - भावों का प्रवत'के बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व उक्थ, ब्रह्म, सामरूप से पदार्थमात्र का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण बनता हुआ आत्मा बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व हृद्यपृष्ठ, त्राह्यपृष्ठ, पारावतपृष्ठरूपों में परिणत होता हुआा पदार्थमात्र की साहसी के वितान का कारण चन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व पार्थिव श्यैत, नौवसभावों का प्रतिमान करता हुआ द्यावापृथिवी के परिणय का कारण बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है 1 । जो मौलिक तत्त्व अपने वितानभाव से बृहत्, वैराज, रैवत- सामों में परिणत होता हुआ सूर्यपिण्ड को प्राणात्मना लंका-लॊक पर्य्यन्त व्याप्त किए हुए है, वही मौलिक तत्र ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व अपने वितानभाव से रथ-न्तर, वैंरूप, शाक्वर - सामों में परिणत होता हुआ । भूपिण्ड को प्राणात्मना सूर्य्यपिण्ड से भी ऊपर तक व्या'त किए हुए है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेट ' है । जो मौलिक तत्त्व ' स्वयम्भू ' नाम से प्रसिद्ध ' आभूप्रजापति ' का निःश्वास बनता हुआ ' ब्रह्मनिः श्व-सित ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व मायी पुरुषस्वरूप के भी विकास का कारण बनता हुआ स्वयं ' अपौरुषेय ' बन रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व भृग्वङ्गिरोरूप से पडूब्रह्म बनता हुआ पारमेष्ठ्य मण्डल की प्रतिष्ठा बन ' सुब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व गायत्रतेज में परिणत होता हुआ सौरमण्डल का तिष्ठावा बनकर ' गायत्रीमात्रिक ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्व ‘ मौलिकवेद ' हैं । जो मौलिक तत्त्व सम्वत्सर, अयन, मास, पक्ष, ग्रहोरात्र, मुहर्त्त, घटिका, पल, श्वास, आदि

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भूमिका कालखण्डों में विभक्त होकर चान्द्रसम्वत्सर का स्वरूपसमर्पक बनता हुआ ' चान्द्रवेद ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जो मौलिक तत्त्व वसन्तादि ऋतुसमष्टिरूप पार्थिवमम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप समर्पक बनता हुआ ' यज्ञमात्रिक ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व नें अपने सहस्र ( अनन्त भाव से प्रत्येक वस्तु में सहस्र ' उक्थ ' उत्पन्न कर, प्रत्येक वस्तु में सहस्र ' व्रत ' उत्पन्न कर, प्रत्येक वस्तु में सहस्र ' अग्नि ' धारा उत्पन्न कर ऋकममुद्रलक्षण ‘ मह।क्थ’, सामममुद्रलक्षण ' महाव्रत ', एवं यजुः समुद्रलक्षण ' पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद: है । जो मौलिक तत्व शस्त्र, स्तोत्र, ग्रहभावों के द्वारा शंसन, उद्गान, याज्या - कम्मों का सञ्चालक बना हुआ है, वही मौलिक तत्त्व ' मोलिकवेद ' है । जिस मोलिक तत्त्व ने अपने शस्त्रभाव से प्राणाग्नि को हौत्रकर्म्म का, ग्रहभाव से प्राणवायु को ध्वकर्म्म का, एवं स्तोत्रभाव से प्राणादित्य को श्रद्गात्र-कर्म्म का अध्यक्ष बना रखा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेट ' है । जिस मौलिक तत्त्व ने प्रातःसवन के द्वारा गायत्री का, माध्यन्दिनवन के द्वारा त्रिष्टुप् का एवं सायंसवन के द्वारा जगती का नियन्त्रण कर, इन नियन्त्रित छन्दों के द्वारा त्रयस्त्रिंशत् यज्ञिय प्राणदेवताओं का नियन्त्रण कर रक्खा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकचेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व नें अपने पान - च्यान - समान - रूप में परिणत होते हुए अपानद्वारा त्रस्तिगुहा का, ब्यानद्वाराउदरगुहा का, समानद्वारा उरोगुहा का नियन्त्रण कर हमारी अध्यात्मसंस्थाओं को सछन्दस्का बना रखा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व ने अपने वाङ्मय शरीर को पश्यन्ती, परा, मध्यमा, वैखरी - रूप में परिणत करते हुए वाङ्मय प्रपञ्च पर अपना अनन्य शासन प्रतिष्ठित कर रक्खा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व ने अपने शुक्ल, कृष्ण एवं बभ्रूणीव हरीणि रूपों से कृष्णमृग को यज्ञस्वरूप प्रदान कर रक्खा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व के श्राधार पर त्रैलोक्यव्यापक प्रजापति यज्ञसाधनभूता वेदि - स्वरूपसम्पत्ति सम्पादन करने में समर्थ होते हैं, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जो मौलिक तत्त्व अपने ऋण धन भावों से ११३१ धाराओं में विभक्त हो रहा है, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । अनन्त ब्रह्माण्डों की अनन्त मायाश्रों के सहयोग से अनन्त बने हुए जिम मौलिक तत्त्व ने देवेन्द्र के वरप्रदान से अनुग्रहीत भरद्वाज महर्षि को अपने आंशिक स्वरूप से कृतार्थ किया, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व का ं श्वरीय प्रेरणा से ब्रह्मादि - ऋषिपर्यन्त प्राप्त महापुरुषों के अन्तःकरणों में प्रादुर्भाव हुआ, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । अन्तःकरणों में प्रस्फुटित जो मौलिक तत्त्व ( विद्यातत्त्व ) अनादि-निधना सत्या वाकू के द्वारा शब्दरूप मे प्रजा के सर्वाभ्युदय के लिए प्रवृत हुआ, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक-वेद ' है । जो शब्दशास्त्र जिस मौलिक तत्त्व ( विद्या तत्त्व ) के प्रतिपादन से ' वेदशास्त्र ' नाम से प्रसिद्ध हुआ, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिकवेद ' है । जिस मौलिक तत्त्वप्रतिपादन से अनित्यशब्दात्मक भी वेदशास्त्र स्वतः-प्रमाणशास्त्र माना गया, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । महर्षि कश्यप वभिष्ठ - भृगु -ग्रङ्गिरा-बृहस्पति- आदि भौम महर्षियों ने अपने तपःपूत जीवन का जिम मौलिक तत्त्व की आराधना-प्रचार, प्रसार में उपयोग करते हुए अपने आपको धन्य बनाया, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस मौलिक तत्त्व के रासायनिक सम्मिश्रण से भारतवर्ष के प्राचीन वैज्ञानिकों ने सूर्य्यसदन, हर्यश्व, स्कम्भ, यज्ञ १०

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द्वितीयखण्ड ( वैवयज्ञ ), गो, नौका, चमस, विमान, ग्रह, ज्योति, विद्युत्, आदि आविष्कारों से संसार को चमत्कृत किया, वही मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जहाँ के भूसुरों ने जिस मौलिकविद्या के बल से सैनापत्य, राजदण्ड, लोकनीति, समाजनीति, नागरिकनीति, राष्ट्रनीति, अर्थनीति, कामनीति, मोक्षनीति, शिल्प, कला, त्राणिज्य, श्रादि में परपारदर्शिता प्राप्त करते हुए अपने आपको ' जगद्गुरु ' की उपाधि से विभूषित किया, ही मालिक ' मालिकवेद ' है । और सर्वान्त में - घातक सम्प्रदायवाद से स्वस्वरूप से श्रावृत होने वाले जिस मौलिक तत्त्व की विस्मृति से प्रजा ने अपना सर्वस्व वैभव नियति के जिस विपुलोदर में आहुत कर दिया, वही विस्मृत मौलिक तत्त्व ‘ मौलिकवेद ' है । जिस विमृत मौलिक तत्त्व ने शब्दराशिरूप जिस वेदशास्त्र को केवल पारायण की वस्तु बना डाला, वही विस्मृत मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है । जिस विस्मृत मौलिक तत्त्व को स्मृति के चिना प्रजा का समुद्धार सम्भव है, वही विस्मृत मौलिक तत्त्व ' मोलिकवेद ' है । जिस ि मौलिक तत्त्व की स्मृति के लिए सम्प्रदायवादशून्य विशुद्ध दृष्टि का अनुगमन अपेक्षित है, वही विस्मृत मौलिक तत्त्व ' मौलिक वेद ' है, जिसके कि कुछ एक स्मृतिचिन्हों का प्रकृत प्रकरण में संक्षेप से दिग्दर्शन कराया जा रहा है | यही हमारे इस विस्मृत, तात्त्विक, मौलिक वेद का अथ से इति पर्य्यन्त का संक्षिप्त, इतिवृत्त है । इसी इतिवृत्त को सामने रखते हुए हमें मौलिकवेदस्वरूप की मीमांसा में प्रवृत होना है । ७ वेदार्थ की समस्यापूर्णा जटिलता वेदशास्त्र में प्रतिपादित अनन्त विषयों में यदि कोई सत्र से जटिल विषय है, तो वह एकमात्र यहाँ ' वेदपदार्थ ' है । वेद के ( वेदशास्त्र के ) वेद को ( वेदपदार्थ को ) जिसने जान लिया, वही सर्ववित् बन.... गया । और जिसने वेद के वेद को नहीं जाना, ' न स वेद, न स वेद ' । प्रस्तुत प्रकरण में इस वेदपदार्थ के सम्बन्ध में हम जो कुछ कहेंगे, वेदप्रेमी पाठक उसे अटपटा - सा समझेंगे, एक काल्पनिक वस्तु मान लेने का भ्रम कर बैठेंगे । क्योंकि जिस शैली से, जिस दृष्टिकोण से वेद का जो तात्त्विक स्वरूप हम बतलानें चले हैं, उसकी उपलब्धि वर्त्तमान युग में उपलब्ध होने वाले वेदभाष्यों, वेदव्याख्याओं में सर्वथा अनुपलब्ध है । और इसी भ्रान्ति के निराकरण के लिए प्रकरणारम्भ से पहले ही ' विषयोपक्रम ' में हमें इस स्थिति का, इस जटिलता का स्पष्टीकरण करना पड़ा है । श्रान्तां तावत् ' निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु ' को अपना श्राराध्य मन्त्र बनाते हुए सर्वथा नवीनदृष्टि से, नहीं नहीं प्राचीनतमदृष्टि से वेद का मौलिक स्वरूप पाठकों के सम्मुख रखा जा रहा है । सौ, दो सौ वर्षों मे प्रचलित रूढ़िवादों को ही ' परम्परा ' नाम से व्यवहृत करने वाले, इत्थंभूत परम्परा-नुगामी अर्थात्मक अर्थों से हो सन्तुष्ट होने वाले, वैदिक साहित्य के तात्त्विक परिशीलन से सर्वथा अति-क्रान्त जो महानुभाव ‘ परम्परा सिद्ध अर्थ ही मान्य है ' इस वाक्य का उद्घोष किया करते हैं, उनका समाधान श्रांशिकरूप से तो पूर्व प्रकरण में किया ही जा चुका है । इसके अतिरिक्त स्वयं श्रुतिप्रमाण के आधार पर परम्परा सिद्ध जिस वेदार्थ का स्वरूप आगे बतलाया जाने वाला है, यदि शुष्क तटस्थ समालोचना को छोड़ते हुए दोषदृष्टि से भी इस वेदस्वरूप पर वे दृष्टि डालने का समय निकाल सकेंगे, तो हमें आशा ही नहीं, अपितु दृढ़ विश्वास है कि, चिरकाल से विलुप्तप्राय वेदपरम्परा के तात्त्विक स्वरूप ११

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भाष्यभूमिका की ओर उनका ध्यान आकर्षित हो सकेगा । इस सामयिक उद्गार की श्रावश्यकता यह हुई कि वेदप्रचार-सम्बन्धिनी प्रतीत यात्राओं में कई बार यह सुनने का अवसर मिला कि, " उपलब्ध वेदभाष्यों में जब ऐसा अर्थ उपलब्ध नहीं होता, तो इसे कैसे परम्परासम्मत कहा जाय " । यही नहीं, एक बार भारतवर्ष के एक सम्मान्य, सम्पन्न, गृहस्थ के यहाँ होने वाली वेदव्याख्या के सम्बन्ध में - ' वेद अनन्त हैं ' इस वाक्य को लेकर वहाँ उपस्थित, गृहस्थ के सम्पर्क में आए हुए एक वेदभक्त महाशय ने परोक्ष में बड़े उपहास के साथ अपने ये उद्गार प्रकट किए कि, “ लो, आजतक सनातनधर्मी वेद की ११३१ शाखा मानते थे, स्वामी दयानन्द ने ' चार ही वेद मान थे, परन्तु अत्र तो वेद अनन्त हो गए " । क्यों कि ये महाशय उस गृहस्थ के किसी एक प्रमुख व्यक्ति की दृष्टि में वेदों के परपारदर्शी थे । अतएव उनका उक्त कथन ही इस बात में दृढ़ प्रमाण बन गया कि, " सचमुच हम वेदार्थ के सम्बन्ध में जो कुछ कहते हैं, वह एक सारहीन भ्रान्त कल्पनामात्र है । और ऐसे भ्रान्त साहित्य के प्रचार - प्रसार में हमें कोई सहयोग नहीं देना चाहिए । " उक्त निदर्शन से अभिप्राय केवल हमारा यही है कि, वैदिक साहित्य का परिज्ञान स्वाध्यायवैमुख्य से हम से कितना पीछे हट चुका है?, इसके लिए यह एक ही निदर्शन पर्याप्त है । जो वैदिक साहित्य से प्रेम नहीं रखते, उनकी बात तो जाने दीजिए । परन्तु जो अहर्निश वेदभक्ति का डिण्डिमघोष करते हैं, उन के लिए भी जब ' अनन्ता वै वेदा: ' वाक्य एक उपहास की सामग्री बन जाता है, तो अवश्य ही वेदना का आविर्भाव हो पड़ता है । क्योंकि हमारे इस वेदस्वरूप से अनन्तता का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिए, एवं साथ ही भ्रान्त पथिकों की भ्रान्ति के निराकरण के लिए भी प्रसङ्गोपात्त वेद की अनन्तता प्रतिपादन करने वाला स्वयं वेद - का ही एक आख्यान सर्वप्रथम वेदप्रेमियों के सामने रखा जा रहा है । ८- महर्षि भरद्वाज के अनन्तवेद— " सुप्रसिद्ध वेदनिष्ठ महर्षि भरद्वाज ने अपनी वेदस्वाध्यायविषयिणी जिज्ञासा पूरी करने के लिए आयु: -प्रवर्त्तक इन्द्र की उपासना की । इन्द्र ने प्रसन्न होकर इन्हें ३०० वर्ष की आयु प्रदान की । अपनी आयु के इन ३०० वर्षों में अनन्ययोग से वेदस्वाध्याय किया । अन्त में समय खाने पर भरद्वाज का शरीर सर्वथा जीर्ण-शीर्ण हो गया, वृद्धावस्था ने घर कर लिया, भरद्वाज ने शय्या का आश्रय ले लिया । भरद्वाज इस जीर्णावस्था ' से शय्या में पड़े हुए अन्तिम समय की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि, सहसा एक दिन इन्द्रदेवता आ पहुँचे, और भरद्वाज से कहने लगे कि, भरद्वाज! यदि मैं तुम्हें १०० वर्ष की श्रायु और प्रदान करदूं, तो इस प्राप्त " आयु का उपयोग तुम किस कार्य में करोगे? वेदानन्यभक्त भरद्वाज के मुग्न से यही निकला कि, मैं आप से प्राप्त इस आयु में भी वेदस्वाध्याय ही करूँगा, ( क्योंकि अभी मेरा वेदज्ञान अपूर्ण है ) | ( मन ही मन हँसते हुए इन्द्र ने भरद्वाज की इस तृष्णा का निराकरण करने के लिए ) भरद्वाज की दृष्टि के सामने पर्वताकार वेद के वैसे तीन विशाल स्तूप रक्खे, जिन्हें कि इस दिन से पहिले भरद्वाज ने कभी न देखे थे । उन तीनों वेदपर्वतों में से इन्द्र ने एक एक मुट्ठी भर वेद लिया, और भरद्वाज को सम्बोधन कर कहने लगे कि, भरद्वाज! देखते हो, मेरी मुट्ठी में क्या है?, ये वेद हैं । भरद्वाज! " वेद अनन्त हैं " । अपनी आयु के भुक्त तीन सौ वर्षो मे तुमने इन तीन मुट्ठियों जितना वेदतत्त्व प्राप्त किया है । अभी वह अनन्त पर्वताकार अनन्त वेद तुम्हारे लिए अविज्ञात ही पड़ा हुआ है । इसलिए यह आशा छोड़ दो कि, १०० वर्ष और मिल जाने से मैं सम्पूर्ण वेद जान जाऊँगा ” । १२

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द्वितीयखण्ड स्पष्ट ही ' अनन्ता वै वेदा: ' घोषणा के माध्यम से देवेन्द्र निम्नलिखित रूप से वेद की अनन्तता का समर्थन कर रहे हैं-" भरद्वाजो इ वै त्रिभिरायुभिर्ब्रह्मचर्य्यमुवास । तं ह जी., स्थविरं, शयानं - इन्द्र उपव्रज्य उवाच । भरद्वाज! यत्ते चतुर्थमायुदद्यां किमेनेन कुर्य्या इति? । ब्रह्मचर्यमेवनेन चरेयमिति होवाच । तं हृ त्रीन् गिरिरूपान ज्ञात निव दर्शयाञ्चकार । तेपां हैकैकस्मान्मुष्टिमाददे । स होवाच, भरद्वाजेत्यामन्त्र्य । वेदा वा एते । " अनन्ता वै वेदाः ” । एतद्वा एतैस्त्रिभिरायुर्भिरन्यवोचथाः । त्र्यथ त इतरदनूक्तमेव ' । ( तै ० ब्राः ३।१०।११ ) । 15 कृतयुग जैसे शान्तयुग के शान्त वातावरण में सतत ब्रह्मचर्य का अनुगमन करने वाले तपःपूत धावी भरद्वाज जैसे सर्वसमर्थ महर्षि ने निरन्तर तीन सौ वर्ष पर्यन्त वेदस्वाध्याय किया, और परिणाम में पर्वताकार अनन्त त्रयीवेदों में से वे मुट्ठी भर वेदज्ञान प्राप्त कर सके, उनको यह लालसा बनी ही रह गई । ऐमं दशा में कलियुग जैसे अशान्तयुग के अशान्त वातावरण में ब्रह्मचर्य्य, तपः, सत्य, आदि स्वाध्यायोपयिक साधनों से वञ्चित स्वल्पायु आज के द्विजाति के अन्तर्जगत् में स्वतएव इस भावना का उद्रेक सहज बन जायगा कि, जब कृतयुग में भरद्वाज जैसे महर्षि वेद का पूर्ण ज्ञान प्राप्त न कर सके, तो इस घोरयुग में हमारे जैसे हीन-वीर्य्यो का वेदस्वाध्याय की ओर प्रवृत्त होना ही निरर्थक है । प्रश्न होता है कि, जब वेद अनन्त हैं, उनका ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता, समस्त श्राश्रु लगाकर भी जिसका कणमात्र ही बोध होता है, ऐपे अनन्ववेद की प्रवृत्ति का आदेश ही श्रुति ने क्यों दिया? | क्योंकि बिना परिपूर्णता के किसी भी विषय में कौशल प्राप्त नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त अन्य श्रुतियों ने कई स्थलों में कई महर्षियों के लिए जब यह घोषित किया है कि, अमुक महर्षि वेद के परपारदर्शी है, अमुक वेदवित् हैं, अमुक सर्ववित् हैं । तो ऐसी दशा में उक्त तैत्तिरीय श्रुति के— “ वेदज्ञान की परिपूर्णता श्रसम्भव है " इस विरोधी सिद्धान्त का समन्वय भी कैसे किया जाय? | सचमुच तैत्तिरीय श्रुत्ति का उक्त आख्यान वेदस्वाध्यायप्रवृत्ति की ओर से हमें उदासीन ही बना रहा है | क्या कोई ऐसा भी उपाय है, जिसके अनुगमन मे हमें यह विश्वास हो जाय कि, ऐसा करने से की परिपूर्णता के हम भी अनुगामी बन जायेंगे? । है, और अवश्य है । जो तैत्तिरीय श्रुति अपने पूर्वा से वेदों की अनन्तता का बग्वान करती हुई हमें एक दृ ष्टेक ण मे निराश - सा करती है, वही तैत्तिरीय श्रुति श्रपने उत्त-राम से एक उपायविशेषद्वारा उपाधिभेद में अनन्तद को साद, सान्त बनाती हुई दूसरे दृष्टिकोगा से हमें यह शामय विश्वास भा दिला रही है कि उस उपाय मे तुम वेदवित् त्रन सकते हो, अमृतत्त्व प्राप्त कर सकते हो, सम्पूर्ण विश्व का वैभव प्राप्त कर सकते हो, कृतकृत्य बन सकते हो । श्रुति का वह उपाय है सुप्रसिद्ध ' सावित्राग्नि ', जिसके कि मौलिक स्वरूप परिचत्र मे सतृष्णा भरद्वाज अन्त में सन्तुष्ट हो गए थे, जिसके कि परिज्ञान से विश्वोपाधिक सादि मान्त वेदस्वरूप का परिपूर्णता गतार्थ है, जिसका कि संक्षिप्त स्वरूप - प्रदर्शन ही प्रवृत वेदस्वरूपनिरूपण - प्रकरण का मु य लक्ष्य है । १३

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भाष्यभूमिका ६ - सावित्राग्नि के तटस्थ लक्षण-सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसनें अपने मर्त्यरूप से जहाँ प्रजापति के मर्त्यभाग पर अपनी प्रभुता स्थापित कर रक्खी है, वहाँ अपने अमृतरूप से प्रजापति के अमृतभाग को स्वायत्त कर रक्खा है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसनें अपने मर्त्यभाग से वेदमूलक प्रवृत्तिलक्षण यज्ञ - तप - दानकम्मों के द्वारा लौकिक वैभव की रक्षा कर रक्खी है, एवं अपने अमृतभाग से वेदमूलक निवृत्तिलक्षण यज्ञ - तप - दानकों से आत्मवैभव को सुरक्षित कर रक्खा है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसनें अपने ज्योतिर्भाग से विश्वमर्थ्यादा का सञ्चालन करने वाले प्राणदेवताओं का स्वरूप सुरक्षित रख रखम्बा है, अपने गौभाग से विश्व के पाञ्चभौतिक वर्ग का स्वरूप-सम्पादन कर रक्खा है, एवं अपने प्रायभोग से चर - अचर की ग्रात्मप्रतिष्ठा बना हुआ है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसनें अपने ऊर्ध्वलक्षण श्रमृतभाग से ब्रह्मनिः श्वसित, एवं ब्रह्मस्वेदवेद को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित कर रकबा है, अपने प्रातिश्विक ( ग्रमृतमृत्युलक्षण उभयविध ) रूप से गायत्री-मात्रिकवेद को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित कर रक्खा है, एवं अधोलक्षण अपने मर्त्यभाग से चान्द्रवेद, तथा यज्ञमात्रिकवेद की स्वरूप रक्षा कर रक्खी है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसने अपने वाजिरूप से अपने उपासक महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्लयजुर्वेद का वर प्रदान किया है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसनें अग्निमयी पृथिवी, वायुमय श्रन्तरिक्ष, इन्द्रमय द्युलोक, बृहस्पतिमय बृहन्मण्डल प्रजापतिमय परमेष्ठीलोक, ब्रह्ममय स्वयम्भूलोक, इन ध्त्रों की स्वरूप- रक्षा करते हुए उस अनन्त वेदविभूति को इ प्रदूपर्वा विश्व में सीमित कर रक्खा है । सावित्राग्नि वह अग्नि है, जिसके ( चित्याग्नि की भाँति ) न तो पक्ष है, न पुच्छ है । अपितु पक्षपुच्छ वाला चित्याग्नि उसका मुग्व ( प्रवृत्तिद्वार ) है, प्रत्यक्षदृष्ट ग्रादित्य उसका मस्तक है । पूर्वोक्त ६ देवता उसी प्रकार इस सावित्राग्नि से ब्रद्ध हो रहे हैं, जैसे कि एक महावस्त्र में अन्य वस्तु सूची से सीं दी जाती हो | इसीलिए तो यह सर्वमूर्ति अग्नि ' सावित्र ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । सावित्राग्नि ही तो वास्तविक अग्नि है, अग्नि ही तो वश्व है, विश्व ही तो वेद है, इस वेदात्मक विश्व के सावित्राग्निरहस्य को जाने लेना हो तो वेद का मौलिक स्वरूप जान लेना है । सावित्राग्नि की इसी सर्वव्याप्ति का स्पष्टीकरण करते हुए इन्द्र भरद्वाज से कहते हैं— १ – " एहि! इमं विद्धि । अयं वे ' सर्वविद्या ' इति । तस्मै तमग्नि सावित्रमुवाच । तं सळ‘बदित्वा, अमृतो भूत्वा, स्वर्ग लोकमियाय - श्रादित्यस्य सायुज्यम् । अमृतो हैव भूत्वा स्वर्ग लोकमेति, आदित्यस्य सायुज्यं, य एवं वेद । " २ – “ एषा उ त्रयीविद्या । यावन्तं ह वै त्रय्या विद्यया लोकं जयति, तावन्तं लोकं जयति, य एवं वेद " । ३ – " अग्नेर्वा एतानि नामधेयानि । अग्नेरेव सायुज्यं सलोकतामाप्नोति, य ० । वायोर्वा एतानि नामधेयानि । वायोरेव सायुज्यं सलोकतामाप्नोति, य ० । इन्द्रस्य वा एतानि नामधेयानि । इन्द्रस्यैव सायुज्यं सलोकतामाप्नोति, य ० । १४

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द्वितीयखण्ड वृतं एतानि नामानि । बृहस्पतेरेव सायुज्यं लोग ताप्नोति य ० । प्रजापतेव एतानि नामवेयानि । प्रजापतेरेव सायुज्यं सलोकतामाप्नोति, य ० । ब्रह्मणो वा एतानि नामवेयानि । ब्रह्मण एव सायुज्यं सलोकतामाप्नोति, य ० । ” ४ – “ स वा एषोऽग्निरपक्षपुच्छो वायुरेव । तम्य - प्राग्नमुखं, असावादित्यः— शिरः । स यदेतं देव अन्तरेण तत्सर्व्वं सीव्यति । तम्मात् सावित्रः ” । — तैत्तरीयब्राह्मण ३ काण्ड । १०३ प्रपाठक । २१ अनुवाक । -१० - सावित्राग्निमूलक ग्रहोपग्रहभाव-यह तो हुआ सावित्राग्नि का तटस्थलक्षणदृष्टि से सामान्य विचार । अत्र स्वरूपलक्षणदृष्टि से इस का विशेष विचार करना चाहिए । जिस सावित्राग्नि ने श्रग्नि, वायु, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापत, ब्रह्म, इन ६ देवताओं को अपने में सौं रक्खा है, जो सावित्राग्नि स्वयं त्रयीविद्यामय बनता हुआ इन ६ त्रों वेदसंस्थाओं की प्रतिष्ठान रहा है, उस सावित्राग्नि का, और उस सावित्राग्नि का - जिसके कि परिज्ञान से भरद्वाज की प्रवृद्ध वेदतृष्णा शान्त हो जाती है, क्या स्वरूप है?, पहिले संक्षेप से इन प्रश्नों का विचार किया जायगा, अनन्तर क्रमशः इससे सम्बन्ध रखने वालीं ६ वेदस्स्थाओं का स्पष्टाकरण किया जायगा । ' सावित्राग्नि ' शब्द से ही यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि, इस अनिका और सविताप्राण का घनिष्ठ सम्बन्ध है । सत्रिताप्राण के सम्बन्ध से ही यह अग्नि ' सावित्र ' कहलाया है । अतएव इस के स्वरूपपरिचय के लिए हमें पहिले तदभिन्न, किंवा तद्रूप ' सविताप्राण ' का ही विचार करना पड़ेगा । एवं इसके लिए ' ग्रहोपग्रह वज्ञान ' का आश्रय लेना पड़ेगा । जो वस्तु पेण्ड अपने अनेक अनुयायियों को साथ लेकर स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है, उसे तो ' ग्रह ' कहा जाता है, एवं इस ग्रह के ही प्रवर्ग्याशों से उत्पन्न, इस ग्रह मे नित्य युक्त ग्रहानुयायी ‘ उपग्रड् ' ( ग्रह के समीप, अनुवर्ती ग्रह ) नाम से प्रसिद्ध है । ग्रह सदा एक होता है, उपग्रह सदा अनेक होते हैं । वैदिकविज्ञानपरिभाषा के अनुसार मुख्याधिष्ठातारूप ग्रह को ' इन्द्र ' कहा जाता है, एवं तदनुवर्त्ती उपग्रहों को ' जनता ' कहा जाता है । ' एके को वै जनतायामिन्द्रः ' ( तै ० ब्रा ० १/४ | ६ | १ | ) इस निगम-वचन के अनुसार उपग्रहभूता जनता ( समूह, राशि, ढेर, संघ ) में अवश्य ही एक एक ग्रहलक्षण इन्द्र हुआ करता है । बिना इन्द्र के जनता अप्रतिष्ठित है, बिना जनता के इन्द्र प्रतिष्ठित है । दोनों में परस्पर उपकार्य्य, उपकारक सम्बन्ध है । वैदिक यज्ञपरेभाषा के अनुसार मुख्याधिष्ठातारूप ग्रह को ' प्रतिपन् ' कहा जाता है । उपग्रह इमो में प्रपन्न रहते हैं, ग्रह ही उपग्रहों की उपक्रमं मंहारभूमि है, अतएव इसे प्रतिपत् कहना ग्रन्वर्थ बनता है । एवं उपग्रहों को ' अनुचर ' कहा जाता है । ग्रह को मूल बनाकर ये उपग्रह इसी के अनुगन बनें रहते हैं, अतएव इन्हें ' ऋतुचर ' कहना अन्वर्थ बनता है । इस प्रकार ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत्, आदि नाम से व्यवहृत. मुख्याधिष्ठाता, एव उपग्रह, जनता, अनुचर, आदि नामों से प्रसिद्ध अनुयायी, इन दोनों के रूप का ही नाम ईश्वर है । यह ईश्वरमर्य्यादा इसी रूप मे ईश्वरीय गर्भ में प्रतिष्टित श्राधि-मौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिनाशिक, आधिनाक्षत्रिक, आदि यच्चयावत् विवत में ज्यों की त्यों व्यवस्थित है । १५

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भाष्यभूमिका एक गृहस्थ परिवार को ही लीजिए । गृहस्थ का वह वृद्धपुरुष, जो सम्पूर्ण गृह्यधम्मों का सञ्चालक है, जिस के आदेश पर गृहस्थ के अन्य व्यक्ति स्वस्वकम्मों में प्रवृत्त होते हुए इस वृद्धपुरुष के अनुगामी बने रहते हैं - ग्रह है, एव आदिष्ट पारिवारिक सत्र व्यक्ति उपग्रह हैं । वृद्धपुरुष इन्द्र है, प्रतिपत् है, पारिवारिक व्यक्ति जनता है, अनुचर है । जातीय व्यवस्थाओं का निर्णायक पञ्च ( चौधरी ) ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् है, तदनुगता सम्पूर्ण जाति उपग्रह, जनता, अनुचर है । ग्रामाध्यक्ष ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् है, तदनुगता ग्रामप्रजा उपग्रह, जनता, अनुचर है । कर्म्मात्मा ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् है, तदनुगत शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सब कुछ उपग्रह, जनता, अनुचर है । वाकू, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, बुद्धि, शरीर, सत्र एक एक स्वतन्त्र ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् हैं, एवं विविधभावापन्न शब्दप्रपञ्च, प्राणापानसमानव्यानोदानादि प्राणप्रपञ्च, विविधभावापन्न रूपप्रपञ्च, , 2 3 4 B ५ विविधभावापन्न सत् - असत् शब्दश्रुतियाँ, काम, संकल्प, विचिकित्सा, सुख, दुःखादि मानसप्रपञ्च, विद्या, अवित्वा, घृति, माल्व्य, आदि विविध बौद्धप्रपञ्च, एवं रसासृङ्मांसादि धातुप्रपञ्च, सत्र इन ग्रहों के क्रमशः उप-ग्रह, जनता, अनुचर हैं । ब्राह्मणवर्ण ग्रह, * प्रतिपत् इन्द्र है, इतर वर्ण उपग्रह, जनता, अनुचर है । राजा ग्रहादि है, प्रजा उपग्रहादि है । चक्रवर्ती ग्रहादि है, सामन्तराजागरण उपग्रहादि है । गुरु ग्रहादि है, शिष्यमण्डली उपग्रहादि है । भोक्ता ग्रहादि है, भोग्य उपग्रहादि है । शास्ता ग्रहादि है, शासित उपग्रहादि है । और इस प्रकार भोक्तृ - भोग्यलक्षण | यह ग्रहोपग्रहमर्थ्यादा न केवल मानवसमाज में हीं, अपितु चर - अचर सर्वत्र व्याप्त है । मधुमक्षियाँ जहाँ उपग्रह है, मधुकरराजा वहाँ ग्रह है । इसी प्रकार, पशु - पक्षी - कृमि - कीट - श्रोषधिवनस्पति - पर्वत - नद - नदी-नक्षत्र - आदि सर्वत्र सत्र जनता ( मण्डलियों ) में आप एक एक इन्द्र ( मुख्याधिष्ठाता ) का साम्राज्य देखेंगे । यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, यह इन्द्र जनता से कोई पृथक्, विलक्षण तत्त्व नहीं है । अपितु जनता का ही वह एक भाग, जोकि स्वबल - वीर्य्य - पराक्रमादि से उन्नत बना रहता है, इन्द्र बन जाया करता है । इन्द्र क्या बन जाया करता है, स्वयं जनता ही उसे नतमस्तक होकर इन्द्र मान लेती है । सिंह का किसने राज्याभिषेक किया?, अपितु वह अपने वीर्य्य से स्वयमेव अपने आपको जङ्गल का इन्द्र मनवा रहा है । सभी स्वात्मवीर्य्यविकास से इन्द्र बन सकते हैं, सभी का ऐन्द्रपद वीर्यपात से जनता के रूप में परिणत हो सकता है । अपेक्षया सभी इन्द्र ( भोक्ता - अन्नाद ) हैं, सभी जनता ( भोग्य - ग्रन्न ) हैं । ११ - अनन्त वेद का विशेष इतिवृत्त -विश्वप्रवत्तंक, किंवा सर्वप्रवर्त्तक मौलिकतत्त्व ही ' मौलिक वेद ' है, यह मौलिकवेद के इतिवृत्त से गतार्थं है । अत्र इस सम्बन्ध में हमें यह विचार करना है कि, जिस मौलिकवेद से विश्व का उद्गम हुआ है, उस विश्व का तो क्या स्वरूप है?, तत्प्रवर्त्तक मालिकवेद की अनन्तता का क्या स्वरूप है?, एवं यह श्रनन्तत्रेद सावित्राग्नि के द्वारा कैसे सादि - सान्त बनता हुआ बुद्धिग्राह्य बन जाता है? | सावित्राग्नि का ग्रहोपग्रहविज्ञान से क्या सम्बन्ध * पन्द्रह दिनों की प्रबत्ति जिस तिथि से आरम्भ होती है, उस तिथि को भी इसी परिभाषा के अनु-सार ' प्रतिपत् ' ( पड़वा ) कहा जाता है । इसी परिभाषा के अनुरोध से शेष तिथियों की ' अनुचर ' कहा जायगा । १६