Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 51–60
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड है?, एवं स्वयं सावित्राग्नि का मौलिक स्वरूप क्या है? । इन प्रश्नों के समाधान के लिए हमे ग्रह नामक ' प्रति-पन ' भाव, एवं उपग्रह नामक ' अनुचर ' भाव के इतिवृत्त का ही अन्वेषण करना पड़ेगा, जो कि इतिवृत्त उक्त प्रश्नों का यथावत् समाधान कर रहा है । ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य, शतपथवज्ञानभाष्य, गीता विज्ञानभाष्यभूमिका श्रादि पूर्व प्रकाशित निबन्धों में, विशेषतः ईशभाष्य प्रथमखण्ड में विश्वात्मा के परात्पर, ईश्वर, उपेश्वर, जीव, श्रादि श्रात्मविवत का, विश्व के स्वयम्भू, परमेष्ठी, श्रादि विश्वपर्वो का सुविशद निरूपण किया जा चुका है । जिन्हें इस दोनों विवर्तों के क्रमिक - संस्थान की जिज्ञासा हो, उनसे यही निवेदन किया जायगा कि, वे इस वेदस्वरूप का यथापूर्व समन्वय करने के लिए एक बार उन विवर्त्तो को अवश्य ही देखने का कष्ट करें । क्योंकि वैदिक साहित्य तन्तुरूप नहीं है, श्रपितु पटरूप है । एक भी तन्तु के ग्रहण से जैसे सारा पट गृहीत हो जाता है, एवमेव तन्तुम्थानीय प्रत्येक वैदिक विषय का उपक्रम करते ही पटस्थानीय सम्पूर्ण विश्वविज्ञान हमारे सामने उपस्थित हो पड़ता है । जब तक आत्मयुक्त विश्वविज्ञान को लक्ष्य नहीं बना लिया जाता, तब तक आप अणु से अणु, एवं महान् महान, किसी भी वैदिक विषय का पूरा पूरा स्पष्टीकरण नहीं कर सकते । वैदिक विषयों के परिज्ञान के सम्बन्ध में यही एक ऐसी जटिलता है, जिसने परिभाषाज्ञान के अभाव से सर्वथा सुगम भी इन विषयों को क्लिष्ट बना रक्खा है । और इसी क्लिष्टता को लक्ष्य में रख कर, विस्तारक्रम को असामयिक समझते हुए भी, प्रत्येक विषय के उपक्रम में हमें उस महाविज्ञान का थोड़ा - बहुत दिग्दर्शन कराना ही पड़ता है । क्योंकि बिना ऐसा किए हम वर्त्तमान-युग की जनता का किसी भी प्रतिपाद्य विषय से सन्तोष नहीं करा सकते । वेदस्वरूप भी एक ऐसा ही विषय है । इसके इत्तिवृत्त के साथ भी उस महाविश्वविज्ञान का घनिष्ठ सम्बन्ध है । यदि इस सम्बन्ध मे यह भी कह दिया आय, तो भी कोई अत्युक्ति न होगी कि, त्रिना उसके परिज्ञान के इसका समन्वय कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । इसीलिए हमनें यह निवेदन करना आवश्यक समझा है कि, प्रकृत वेदस्वरूप का यथापूर्व समन्वय करने के लिए वेदप्रेमियों को एक बार ईशादि में प्रतिपादित महाविश्वस्वरूप पर दृष्टि डाल ही लेनी चाहिए । प्रतिपादित्त श्रात्म - विश्वविज्ञान के अवलोकन से पाठक इस निष्कर्ष पर पहुँचेगे कि, सर्वत्रलविशिष्ट-रऩमूर्ति ‘ परात्पर ' ही अनन्त ब्रह्म है । इस अनन्त, असीम, विश्वातीत परात्परब्रह्म के गर्भ में सीमाभाव-सम्पादक अनन्त ( असंख्य ) मायात्रल अपनी व्यक्त, अव्यक्त अवस्थाओं से क्रीड़ा किया करते हैं । प्रत्येक मायाचल जाया, धारा, ग्रापः, श्रभ्व, यक्ष, मोह, श्रादि गर्भभूत इतर १५ बलकोशों से युक्त रहता हुआ व्य।पक परात्पर के श्रंशों को सीमित बनाता रहता है । इस सीमा से माया पुरात्मक विश्व का उद्गम होता रहता है । जिस समय मायात्रल व्यक्तावस्था को छोड़कर श्रव्यक्तावस्था में खा जाता है मायी विश्व भी लयावस्था में परिणत हो जाता है । कत्र किस मायाबल से किस विश्व का उद्गम होता है?, कब किस का लय होता है?, नियति की दृष्टि से यह सत्र कुछ व्यवस्थित होता हुआ भी मानवीय ज्ञान के लिए अतीत है, श्रगम्य है । इस सम्बन्ध में मानवीय ज्ञान केवल यह अनुमान ही लगा सकता है कि, जब उसमें ग्रनन्त मायाबल हैं, एवं प्रत्येक मायात्रल से व्यक्तावस्था में जब स्वतन्त्र ब्रह्माण्ड का उदय होता है, तो अवश्य ही अनवच्छिन्न परात्परवह्मधरातल में अनन्त ब्रह्माण्ड आविभूति तिरोभूत होते रहते होंगे । मायाबल वेढ को, किंवा वेदमूर्ति ब्रह्म को अग्रणी बना कर ही ब्रह्माण्डोदय का जत्र कारण बनता है, तो इन अनन्त ब्रह्माण्डों के द्वारा हमें बेड़ के श्रानन्त्य की सत्यता पर भी विश्वास करना ही पड़ता है । एक एक मायाचल, और एक एक त्रयीवेट, १७
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Satta भूमिका एक एक त्रयीवेट और एक एक ब्रह्माण्ड, अनन्त मायाबल, इमीलिए अनन्तवेद, अतएव अनन्त ब्रह्म एड | अनन्त के इम अनन्त इतिवृत्त का अनुगमन करते हुए ही महर्षिगण अनन्तपद के अधिकारी बने हैं । श्रनन्त के इस अनन्त इतिवृत्त का विश्लेषणा करने मे ही वेदज्ञान अनन्त बना है । अनन्त को उपासना करने वाली आर्यप्रजा की यही अनन्तता है, यही इसका शाश्वतधम्मांनुगमन है, एवं यही उस अनन्त, सनातन, पगत्पर का अनन्त मनातन सनातनधर्म है, जोकि ऋषिदृष्ट होने से ' आर्यधर्म्म ' नाम मे प्रसिद्ध हुआ है | १२ अनन्त वेद का दुर्विज्ञेय इतिवृत-बेद क्यों कैसे अनन्त हैं? इस प्रश्न का परात्परगर्भ में रहने वाली वेदावच्छिन्ना महामायायों के श्रानन्त्य की दृष्टि मे एक समाधान किया गया । सर्वथा अविज्ञेय परात्पर, सर्वथा अविज्ञेय उसके अनन्त मायाचल, एवं सर्वथा विज्ञेय मायामय अनन्त वेद, इन श्रविज्ञेयभावों की चर्चा छोड़कर केवल एक उस मायाचल पर दृष्टि डालिए, जिसका हमारे ब्रह्माण्ड मे मम्बन्ध है । जिस मायामय महाब्रह्माण्ड के गर्भ में चर - अचर प्रजावर्ग प्रतिष्टित है, उस महाब्रह्माण्ड का, ब्रह्माण्ड के उन असंख्य उपग्रहों का, जनता का, अनुचरों का एकाकी अधिष्ठाता, ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् कौन? यह प्रश्न उपस्थित होता है, जिसका कि समाधान निम्न लिखित श्रुतियाँ कर रहीं हैं-१ – ब्रह्मग्नं, ब्रह्म स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनमा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥ - तेंत्तिरीय ब्राह्मण ।
२ – यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चियस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥
- श्वेताश्वतरोपनिषन ३५।३।५ । ३ – ऊर्ध्वमूलोऽनाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्र ं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्व्वे तंदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ - कठोर्शनपन ६ | १ |
४ – ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वन्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यरतं वेद, स वेदवित् ॥
- गीता १५५१ | उपनिषद् - भूमिका प्रथमखण्ड के ' वैज्ञानिक वेदनिरुक्ति ' नामक प्रकरण में ( पृ ० सं ० १ मे ६ पर्यन्त ) यह स्पष्ट किया जा चुका है कि एक एक मायाबल से सम्बन्ध रखने वाला एक एक वृक्ष है, एवं उस परात्पर में अनन्त मायाबलों की अपेक्षा से अनन्त वृक्ष है । इन अनन्त ब्रह्माण्डोपलक्षित अनन्त वृद्धों को १८
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड अपने अनन्त धरातल पर प्रतिष्ठित रखने वाला विश्वातीत अनन्त परात्पर ही ' ब्रह्मवन ' है । इस ब्रह्मवन ( परात्पर ) के एक प्रदेश में प्ररोहित एक मायात्रल से सम्बन्ध रखने वाला अव्यय, अक्षर, क्षरमूर्ति, महा-मायी, ' षोडशीपुरुष ' ही एक वृक्ष है, यही एक महाब्रह्माण्ड की इयत्ता है । वृक्षात्मक यही पुरुष सम्पूर्ण भुवनों का, उपग्रह, जनता, अनुचरों का एकाकी अधिष्ठाता, ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् है । प्रथम श्रुति का — ' ब्रह्माभ्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् " यह वाक्य इसी प्रतिपत्, वृक्षब्रह्म का स्पष्टीकरण कर रहा है | अपने मायामय महाविश्व में न तो इस मायी ब्रह्म से कोई पर है, न कोई अवर है । सापेक्षवादशून्य इससे न कोई छोटा है, न बड़ा है । यही पर है, यही पर है, यही अणोरणीयान् है, यही महतो महीयान् हे । अपने विश्व में यही सर्वस्व बना हुआ है । यह वृक्षवत् ( वृक्षस्थूणवत्, न तु शाखा, प्रशास्त्रा, वृन्त, पत्रादिवत् ) सर्वथा अचल है । इसी पूर्ण पुरुष से यह मायामय महाब्रह्माण्ड परिपूर्ण है । इसी वृक्ष को वैज्ञानिकों नें ' अश्वत्थ ' ( ब्रह्माश्वत्थ ) नाम से व्यवहृत किया है, जिसका कि मूल ऊर्ध्व ( केन्द्र ) है, जो मायासीमा से सीमित, अतएव सादि - सान्त रहता हुआ भी मायोपाधिविरहितदशा से अपने प्रातिस्विकरूप सनातनपरा: पररूप बनता हुआ सनातन है, वही ' शुक्र ' - ब्रह्म ' - अमृत " ( क्षर ' - अक्षर ' -अव्यय 3 ) अपने इन तीन रूपों में परिणत होता हुआ ' विकृति ' - प्रकृति - पुरुष 3 भावों का स्वरूपसमर्पक बन रहा है । सम्पूर्ण लोक ( पञ्चपुण्डीराप्राजापत्या सहस्र बल्शाएँ ) इसी में प्रतिष्ठित हैं । ऊर्ध्वमूल, तथा अवःशाख इसी अश्वत्थ को उपनिषद्रहम्यवेत्ता ' अव्यय ' नाम से व्यवहृत किया करते हैं । वेद ही इस अश्वत्थ वृक्ष के पत्ते हैं । जो इस अश्वत्थ को, अश्वत्थ की शाखाओं को, अश्वत्थ के पत्तों को जान लेता है, वैज्ञानिक लोग उसे ही ' वेदवेत्ता ' कहा करते हैं । महाब्रह्माण्ड की महा उपनिषत्, महाग्रह, महा इन्द्र, महाप्रतिपत् - लक्षण इस महामायी महेश्वर के ' उक्थ, अर्क, अशीति ' भेद से तीन संस्थाविभाग हो जाते हैं । उक्थरूप से ( बिम्बरूप से ) यह उस महा-मायापुर के केन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ ' विश्वात्मा ' बन रहा है । ग्रर्करूप से ( रश्मिरूप से ) विश्वप्रवर्तक बनता हुआ महामायापुर के केन्द्र से परिधि तक व्याप्त होता हुआ ' विश्वोपादान ' बन रहा है । एवं अशीति ( अन्न ) रूप से विश्वस्वरूप में परिणत होता हुआ ' विश्वमूर्त्ति ' बन रहा है । ग्रशीतिलक्षण विश्व उसी का क्षरप्रधान, विकृतिरूप ' शुक्र ' रूप है । अलक्षण विश्वोपादान उसी का अक्षरप्रधान, प्रकृतिरूप ' ब्रह्म ' रूप है । एवं उक्थलक्षण, विश्वात्मा उसी का अव्ययप्रधान, पुरुषरूप ' अमृत ' रूप है, जैसाकि - ' तदेव शुक्र, तद्ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते ' इत्यादिरूप से पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । महामायी के ये तीनों रूप इसके अमृत - ब्रह्म - शुक्र, इन तीनों भावों से युक्त हैं । केवल गर्भभाष में अन्तर है । ब्रह्म - शुक्रगर्भित अमृतभाग श्रमृतात्मा है, यही अव्यय है, यही पुरुष है । श्रमृत - शुक्रगर्भित ब्रह्मभाग ब्रह्मात्मा है, यही अक्षर है, यही प्रकृति है । एवं अमृतब्रह्मगर्भित शुक्रभाग विश्व है, यही क्षर है, यही विकृति है । वही पुरुष है, वही प्रकृति है, वही विकृति है । पुरुष भी पुरुष - प्रकृति - विकृतिमय है, प्रकृति भी पुरुष - प्रकृति - विकृतिमयी है, एवं विकृति भी पुरुष - प्रकृति - विकृतिमयी है । ' तत् ' के वितानरूप तीनों हीं विवर्त्त ' तत् ' रूप हैं । और ' एतद्वै तत् ' का यही मौलिक रहस्य है । १६
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' तत् ' - वितानपरिलेख: — भाष्यभूमिका महामायावच्छिन्नः - षोडशीपुरुषः - अश्वत्थः १ – पुरुषः ( प्रकृति - चिकृतिगर्भितः -- पुरुषः, अव्ययः - श्रमृतम् ) – उक्थं - ' विश्वात्मा ' ( विश्वेश्वरः ) । २ – प्रकृतिः ( पुरुष - विकृतिगर्भिता - प्रकृतिः, अक्षरः - ब्रह्म ) - की: - ' विश्वोपादानम् ' ( विश्वकर्ता ) ३ – विकृतिः ( पुरुष - प्रकृतिगर्भिता — विकृतिः, क्षरः - - शुक्रम् ) - शीतयः ' विश्वम् ' ( विश्वम्भरः ) इसके उक्त तीनों रूपों में उक्थरूप, केन्द्रस्थ, अव्ययभाव एकाकी है क्योंकि मूलविम्ब सदा एक ही हुआ करता है । इस मूलत्रिम्बरूप उक्थलक्षण अव्ययात्मा से निकलने वाले रश्मिरूप अर्क अनन्त हैं, क्योंकि एक मूलबिम्ब से निकलने वालीं रश्मियाँ अनन्त ही हुआ करतीं हैं । रश्मिरूप लक्षण अक्षरात्मा से परिग्रहीत विश्वरूपा अशीतियाँ भी अनन्त हैं । इन अनन्तरश्मियों का वैज्ञानिकों ने ' सहस्र ' ( १००० ) संख्या पर पर्य्यवसान माना है । सहस्र का पारिभाषिक अर्थ है - ' पूर्ण ', जैसा कि - ' पूर्ण वै सहस्रम् ” ( शत ० ४ | ६ | १ | १५ | ) इत्यादि निगमवचन से स्पष्ट है । सूर्यबिम्ब से निकल कर सौर बृहन्मण्डल में सर्वत्र व्याप्त होनें बाली रश्मियों को हम इसलिए पूर्ण कह सकते हैं कि, बृहन्मण्डल का कोई प्रदेश इन सौर रश्मियों से नहीं है । वाकू, वेद, लोकसाहस्त्रियों से सम्बन्ध रखने वाले ' वपटकार ' स्वरूप के समन्वय के लिए, वैज्ञानिकों नें इन अनन्त, पूर्ण रश्मियों के सहस्रभाव मान लिए हैं, एवं एकमात्र इसी दृष्टि से सहस्र शब्द पूर्णार्थ का, एवं पूर्णशब्द सहस्रभाव का सूचक बन गया है । वस्तुगत्या सहस्र का अर्थ ' पूर्ण ' ही माना जायगा । परन्तु व्यवहारभाषा में विषय समन्वय की दृष्टि से सहस्र को महासंख्यापरक लगाया जायगा । इसी संख्या-भात्र को प्रधान मानते हुए उस उक्थविश्वात्मा से चारों ओर वितत होने वाली अर्करूपा सहस्ररश्मियों का विचार कीजिए । ' अर्चश्चरति ' इस निर्वचन के अनुसार प्राणनापाननव्यापार से ही इन उक्थविनिर्गत रश्मियों को प्राग़ारूप ‘ अर्क ' कहा गया है । प्राणनापानन दोनों प्राण के स्वाभाविक व्यापार माने गए हैं । यागे बढ़ना ‘ प्राणन ' है, पीछे हटना ' अपानन ' है । एवं ये दो व्यापार ही सृष्टिमात्र के सामान्य अविनाभूत अनुबन्ध हैं । कर्म्ममात्र की स्वरूपनिष्पत्ति इन्हीं दोनों व्यापारों के सहयोग पर निर्भर है । सूर्यरश्मि को ही लीजिए । प्रत्येक सूर्य्यरश्मि पीछे हटती हुई ग्रागे सर्पगा करती है, जिसका कि छाया, और आतप ( धूप ) की सन्धि में प्रत्यक्ष किया जा सकता है । छायाभाग अपानन है, यात भाग प्राणन है । इन दोनों का स्वाभाविक व्यापार ही इस ब्रह्म की तपश्चर्य्या हैं, जैसाकि ‘ छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति ' ( कठोपनिषत् ११३ | १ | ) इत्यादि वचन से स्पष्ट है | श्वास प्राणन है, यही अमृत है, निःश्वास अपानन है, यही मृत्यु है । अमृत इन्द्र है, यही ऋतु है । मृत्यु वरुण है, यही दक्ष है । क्रतुदक्षात्मक, इन्द्रवरुणरूप, श्वासप्रश्वास ही श्राध्यात्मिक कर्म की मूलप्रतिष्ठा माने गए हैं, जैसाकि २०
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय ays श्रन्यत्र मैत्रावरुणग्रहविज्ञानों में विस्तार से निरूपित है । इसी प्राणनावाननव्यापार की दृष्टि से सूर्य्यरश्मि के लिए कहा जाता है — ‘ अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणदपानती ' ( ऋक्सं ० १० | १८६।१ । ) । आरणनापाननलक्षण अर्क ही गतितत्त्व है, गति ही क्रिया है, क्रिया ही सृष्टि का मूलत्रीज है । यह मूल-बीजज्ञान, एवं अर्थ का सहयोग लेकर ही विश्ववृक्षरूप में परिणत होता है । जैसाकि पूर्व में बतलाया गया है, उक्थश्रात्मा अव्यय है, अर्क अक्षर है, एवं अशीति क्षर है । अव्ययात्मा सर्वमूलभूत ब्रह्म है । इसके विद्या, कर्म्म, नामक दो धातु हैं | श्रानन्द, विज्ञान, अन्तर्मन की समष्टि विद्याधातु है, यही मुक्तिसाक्षी भाग है । मनः- प्राण-चाकू - समष्टि कर्म्मधातु है, यही सृष्टिसाक्षी है । यह सृष्टिसाक्षी कर्मात्मा जहाँ कर्म्माश्वत्थ की मूल प्रतिष्ठा बनता है, वहाँ मुक्तिसाक्षी विद्यात्मा ब्रह्माश्वत्थ का स्वरूपसमर्पक बनता है । ब्रह्माश्वत्थलगा विद्याव्यय ' वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठति ' के अनुसार जहाँ अचल है, यविचाली है, विचलित सृष्टिमर्यादा से बहिर्भूत है । वहाँ कम्र्म्माश्वत्थलक्षण कमव्यय चल है, विचाली है, चलसृष्टि मर्यादा का साक्षीरूप से सञ्चालक है । चलाचल की समष्टि लक्षण वही ब्रह्म चलाचललक्षण विश्वरूप में परिणत हो रहा है । स्थिति चलभाव है, यही विद्याव्यय है । गति चलभाव है, यही कर्म्माव्यय है । दोनों के समन्वितरूप का ही नाम वह ( आत्मा ) है, एवं दोनों के समन्वितरूप का ही नाम यह ( विश्व ) है । केवल ' चल - चल ' के अनुगमन से ( गतिभावानुगमन से ) भी काम नहीं चल सकता, एवं केवल ' अचल - अचल ' के अनुगमन से ( स्थितिभाव के अनुगमन से भी काम नहीं चल सकता, अपितु लोकप्रसिद्ध ' चलाचल, चलाचल ' वाक्य ही सिद्धि का अन्यतम द्वार है । चलमार्ग कर्म्मनिष्ठा है, योगनिष्ठा है । अचलमार्ग ज्ञाननिष्ठा है, एवं ' एकं साख्यं च योगं च यः - पश्यति स पश्यति ' के अनुसार दोनों के समन्वय से कृतरूप ज्ञानकम्मभियात्मिका बुद्धियोगनिष्ठा ही अव्ययनिष्ठा, किंवा भगवना है, जिसका कि बुद्धियोगशास्त्र ( गीताभाष्य ) में विस्तार से उपबृंहण किया जा चुका है । मनःप्राणवाङ्मय कर्म्मात्मा का मनोभाग ज्ञानमय, प्राणभाग क्रियामय, एवं वाग्भाग अर्थमय है । इन तीनों का क्रमशः अव्यय, अक्षर, चर, इन तीन वित्तों में वर्गीकरण हो रहा है | स्वयं अव्यय मनःप्रधान बनता हुआ ज्ञानघन है, अव्यय के प्राणभाग से युक्त अक्षर क्रियामय है, अव्यय के बागभाग से अनुग्रहीत क्षर अर्थमय है । इन तीनों में क्रियामय अक्षर ही ' अर्क ' बतलाया गया है । यह उस ओर से तो अव्यय के ज्ञानघन मन से, इस ओर से क्षर की अर्थमयी वाकू से युक्त होकर मनःप्राणवाङ्मय बन जाता है । मनोऽव-च्छेदेन सर्वज्ञ बना हुआ, प्राणावच्छेदेन सर्वशक्तिमान् बना हुआ, एवं वागवच्छेदेन सर्ववित् ( सर्वार्थमय ) चना हुआ यह मध्यस्थ, अर्करूप अक्षर ही वेद, यज्ञ, प्रजासृष्टि का मूलप्रवर्त्तक बनता है | अर्करूप अक्षर का गनोऽनुगत भाग ज्ञानाधिकरण है, यही वेदविवर्त्त है । प्राणानुगत भाग क्रियाधिकरण है, यही श्रादानविसर्गात्मक यज्ञविवर्त्त है । एवं वागनुगत भाग अर्थाधिकरण है, यही प्रजाविवर्त्त है । वेद ज्ञानमूर्ति है, यज्ञ कियामूर्ति है, प्रजा अर्थमूर्ति है । अक्षर त्रिमूर्ति है, त्रिमूर्ति अक्षर ही अर्क है, जिसके कि सहस्रभाव मायामय ब्रह्माण्ड में रश्मिरूप से व्याप्त हो रहे हैं । २१
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सर्वमूलभूतः - अव्ययात्मा अश्वत्थः ( १ ) — १ - आनन्दः ( २ ) - २ - विज्ञानम् -- विद्याधातुः - विद्यात्मा - अचलः - ब्रह्माश्वत्थो मुक्तिसाक्षी ( ३ ) —३ — मनः - * ( ३ ) – १ - मनः ( ४ ) – २ - प्राणः ( ५. ) – ३ – वाकू - कर्म्मधातुः - कर्मात्मा - चलः कर्माश्वत्थः सृष्टिसाक्षी a सदेकमयमात्मा, आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्रयम् १ -- मनः श्रव्ययविकासभूमितश्चाव्ययो मनोमयः -- ज्ञानघनः - - उकथम् २ - प्राणः - अक्षर विकासभूमित्रातश्चाक्षरः प्राणमयः -- क्रियामयः – अर्काः ३ - वाक्तरविकासभूमिः - श्रतश्च नरो वाङ्मयः - श्रर्थमयः - शीतयः प्राणमयः - अक्षरः- -अर्का : -१ — मनसानुग्रहीतः - व्ययानुगृहीतः - - मनोमयो ज्ञानमय: - अक्षरः सर्वज्ञः २ -- प्राणेनानुगृहीतः स्वानुगृहीतः - प्राणमयः क्रियामयः- अक्षरः सर्वशक्तिमान् ३-- वाचानुगृहीतः --- चरानुगृहीतः - - वाङ्मयोऽर्थमयः --- अक्षरः सर्ववित् सर्वज्ञः - अक्षरः - ज्ञानाधिकरणम्- मनोरूपम् ( तत्र मनसि वेदः प्रतिष्ठितः ) । सर्वशक्तियुतः - अक्षरः - क्रियाधिकरणम् - प्राणरूपम् ( तत्र प्राणे यज्ञः प्रतिष्ठितः ) । सर्ववित् - अक्षरः --- अर्थाधिकरणम् वाम् ( तत्र वाक्ति प्रजा प्रतिष्ठिता ) । २२
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड १-- वेदो ज्ञानमूर्त्तिः - वेदो ज्ञानमयः २ --- यज्ञः क्रियामूर्तिः-: -- यज्ञः क्रियामयः ३-- प्रजा श्रर्थमूर्तिः-ः प्रजा वाङ्मयी | २ " सैषा प्रजापतेरीश्वरस्य सर्वा मुनिः ” अत्र यह स्पष्ट करने की विशेष श्रावश्यकता नहीं रह गई कि, अश्वत्थवृक्ष के उक्थ - अर्क - शीति, स्थानीय अव्यय - अक्षर - क्षर ही क्रमशः विश्वात्मा, चिश्वोपादान, एवं विश्व है । विश्वात्मलक्षण अव्यय, एवं विश्वोपादानलक्षण अक्षर दोनों विभाग तो कारणकोटि में निविष्ट हैं, एवं स्वयं विश्व ' कार्य्यं ' है । कार्य्य के प्रति आलम्बन, निमित्त, उपादान, इन तीन कारणों की कारणता मानी गई है । स्वयं व्यय ( विश्वात्मा ) विश्वालम्बन है, श्रालम्बनकारण है । अक्षर का ज्ञानसहकृत क्रियाभाग निमित्तकारण है, एवं तरानुग्रहीत, अतएव लन्मत्र वाम्भाग उपादानकारण है । क्योंकि अक्षर का क्षररूप यह वागुपादान प्राण से अभिन्न है, प्रास मन से अभिन्न है, अतएब इस अक्षरानुमता क्षरवाक को हम प्राणमयी भी कह सकते हैं, मनोमयी भी कह सकते हैं । मनोऽत्रच्छेदेन यही वागुपादान वेदमय है, प्राखावच्छेदेन यही वागुपादान यज्ञमय है, एवं स्वाब-च्छेदेन यही वागुपादान प्रजाम है | इसी दृष्टि से निमित्तकारणभूत अक्षरवेद को हम वाङ्मय मानते हुए इसे ( वेद को ) ' बिश्वोपादान ' कह सकते हैं । वाङ्मय, अर्करूप, अक्षरावच्छिन्न यही वेद मौलिक वेद है, जिसके कि अपने महिमामण्डल में सहस्र वितान हैं । महामायामय महाब्रह्माण्ड के केन्द्र में उक्थरूप से प्रतिष्ठित विद्याधातुगर्भित कर्म्मधातुमूर्ति विश्वात्मा से निकलने वालीं, ‘ अर्च श्चरत्ति ' भाव से युक्त मनः प्राण - वाङ्मयी रश्मियाँ हीं अर्क है, यही वेद है | मन: -प्राणगर्भिता, वेदमयीं ये रश्मिय एक सहस्र हैं । प्रत्येक रश्मि वाङ्मयी है, प्रत्येक रश्मि वेदमयी है, फलतः इस एक ही महामायामण्डल में अनन्त ( एकसहस्र ) त्रयीवेदों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । त्रयीवेदना प्रत्येक रश्मि उस ऊर्ध्वमूल, उक्थरूप अश्वत्थ वृक्ष की एक एक बल्शा ( टहनी, शाखा ) है । ऐसी उसमें एक सहस्र त्रल्शा है, अतएव उस महामायी को ऋग्वेद ने – ' सहस्रबल्श: ' नाम से व्यवहृत किया है, जैसाकि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है— वनस्पत! ( अश्वत्थ! ) शतबल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम 1 यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय ॥ - ऋक् सं ० ३।८।११ । सहस्रवल्शा अक्षर का ही वितान है, अतएव सहस्रार्कभेद से अक्षर भी एक सहस्र हो जाते हैं । यही अर्क वेद है, वही इस अश्वत्थ वृक्ष के पर्ण हैं, अतएव पर्ण भी एक सहस्र हो जाते हैं । वह एक द्रष्टा सहस्रभाव से सहस्रद्रष्टा बन रहा है । इन्हीं विविध साहस्रियों का स्पष्टीकरण करते हुए निम्नलिखित मन्त्र हमारे सामने आते हैं -२३
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भाष्यभूमिका
१ – गौरी र्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।
अष्टापदी नवपोषी " सहस्राक्षरा " परमे व्योमन् ॥
- ऋक्सं ० २।१६४१४१ | २ -- शतब्रघ्न इषुस्तत्र “ सहस्रपर्ण " एक इत् यमिन्द्र चकृषे युजम् । —ऋक्सं ० ८ | ७७ | ७ |
३ – सहस्रधा पश्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदिसत् ।
सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्टितं तावती बाक् ॥
- ऋक्सं ० १० ११४ || महामायावच्छिन्न एक ब्रह्माण्ड का एक अधिनायक अश्वत्थवृक्षात्मक षोडशी प्रजापति, यही ग्रह, यही इन्द्र, यही प्रतिपत् । एक सहस्र शास्त्रारूप अर्कभाव ही वेद, ये ही उपग्रह, ये ही जनता, अनुचर । एवं ये ही यही उस अनन्त वेद का दूसरा अनन्त इतिवृत्त । परात्पर के गर्भ में प्रतिष्ठित, अपने अपने गर्भ में श्रनन्त-अनन्त ( सहस्र - सहस्र ) वेदों को प्रतिष्ठित रखने वाले अनन्त मायामय ब्रह्माण्ड यदि उस अनन्त परात्पर का पहिला अनन्त विज्ञेय इतिवृत्त माना जायगा, तो केवल एक ही मानागर्भ में प्रतिष्ठित, परात्पराविनाभृत अश्वत्थपुरुष का यह दूसरा अनन्त इतिवृत्त कहा जायगा । एवं वह यदि विज्ञेय था, तो यह दूसरा इतिवृत्त दुर्विज्ञेय कहलाएगा, जिसकी कि ओर सामान्य मनुष्यों का ध्यान सहसा याकर्षित नहीं होता । अतएव इस दूसरे आनन्त्य को भी छोड़कर किसी ऐसे वेदेतिवृत्त की ओर चलना पड़ेगा, जो न तो विज्ञेय हो, न दुर्विज्ञेय हो, अपितु सुविज्ञेय, अथवा कम से कम विज्ञेय अवश्य हो । मुविज्ञेय वेद का विचार पीछे कीजिए । पहिले विज्ञेय वेद की ही मीमांसा कीजिए । १३ - अनन्तवेद का विज्ञेय इतिवृत्त -महामायामय महाविश्व के साथ हमारा सम्बन्ध तो अवश्य है, परन्तु उस सम्बन्ध की गाथा परामुक्ति से सम्बन्ध रखती है । इधर हमें अभी सृष्टि का विचार करना है । और सृष्टि - विचार के सम्बन्ध से महाविश्व की सहस्र शाखाओं में से केवल एक वेदशाखा ही हमारा सर्वस्व बनी हुई है । अतः ६०६६ वेदशाखाओं की छोड़ते हुए, केवल एक शाखा से सम्बन्ध रखने वाले त्रयीवेद, एवं इस एक त्रयोद से सम्बन्ध रखने वाले योगमायावच्छिन्न एक विश्व का ही विचार सामयिक, तथा उपादेय है । वेदवाङ्मयी इस एक शाखा का उस समय क्या नाम था, जबकि सप्तलोकात्मक, महाव्याहृतित्रयात्मक, योगमायावच्छिन्न विश्व का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था? इस प्रश्न का समाधान करते हुए भगवान् वेदमहर्षि कहते हैं— " असद्वा इदमग्र आसीत् । तदाहु: - किं तदसदासीत्? इति । ऋषयो वाच तदग्रेोऽसदासीत् । तदाहुः - के ते ऋषयः? इति । प्राणा वा ऋषयः । ते यदस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा पिन्, तस्माद् ऋषयः " ( शत ० ० ६ । १ । १ । १ । ) । २४
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है, योगमायावच्छिन्न विश्वोत्पत्ति से पहिले उस महामायी अश्वत्थ की, एवं अश्वत्थ के अर्करूप सहस्र वाङमय वेदों की ही सत्ता है । ये वेद अक्षररूप हैं, अक्षर प्राणमूर्ति है । प्राणमूर्ति अक्षर, किंवा बेदमूर्त्ति अक्षरप्राण ' सामान्ये सामान्याभाव: ' इस नियम के अनुसार ( सद्रूप होता हुआ भी ) ' असत् ' कहलाया है । विश्वोत्पत्ति से पहिले इसी वेदप्राण का, इसी सल्लक्षण असत्प्राणु का साम्राज्य था । यही प्राण अपने अव्ययानुगत मन की कामना से, स्वानुगत प्राण के तप से, एवं वागनु-गत श्रम से काम, तपः, श्रम के द्वारा आगे जाकर विश्वनिर्माता बना । इसने ( वेदमूर्ति प्राण ने ) सृष्टि के लिए गमन किया, प्रवृत्ति की, अतएव यह प्राण ही वेद ही ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध हो गया, जिस ऋषिप्राण का कि वैज्ञानिक लोग-- “ ऋषिर्वेदमन्त्रः " इत्यादिरूप से विश्लेषण किया करते हैं । वेदात्मक यह ऋषिप्राण अनन्त जातियों में विभक्त है । इन संख्यऋषिप्राणों में से सृष्टि की प्रथम प्रवृत्ति जिस वेदर्पिप्राण से हुई है, वह ' सप्तर्षि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसे ही ' साकञ्ज प्रारण ' भी कहा गया है ।
* - विरूपास इऋषयस्त इद् गम्भीरवेपसः ।
तेऽङ्गिरसः सूनवस्तेऽग्नेः परि जज्ञिरे ॥
—ऋग्वेद १०।६२।५ मन्त्र का अक्षरार्थ यही है कि, ऋषि ( मौलिक प्राणतत्व ) निश्चयेन विरूप ही है । ( विविधरूपास: -चिरूपासः – के अनुसार असंख्य प्रकार के हैं ) । इनका वेब ( मूलरहस्य- मौलिक स्वरूप ) सचमुच निश्चय से ही बड़ा गम्भीर है | ( अर्थात् इन मौलिक ऋषिप्राणों का स्वरूप वास्तव में बड़ा ही दुर्बोध्य है ) । सम्पू ( स्वायम्भुव ) ऋषिप्राण ( क्योंकि पारमेश्य ऋतधर्म्मा अङ्गिराजा के द्वारा व्यक्त होते हैं, ) अतएव ये श्रङ्गिरा के पुत्र मान लिए गए हैं । ये ( स्वायम्भुव ) ऋषिप्राण भूताग्नि के महिमात्मक प्राणमण्डल में ह्रीं प्रतिष्ठित रहते हैं । ( अतएव यज्ञात्मक अग्नि के माध्यम से इन ऋषिप्राणों का स्वरूपबोध प्राप्त किया जा सकता है ) ।
- - साकञ्जाजानां सप्तथमाहुरंकजं षडिजमा ऋपयो देवजाः ।
तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ॥
- ऋकसं ० २ | १ | ६४ | १५ | मन्त्र का अक्षरार्थ यही है कि, " एक साथ ही व्यक्त होने के कारण ' साकञ्ज ' ( साथ ही उत्पन्न व्यक्त होने वाले ) नाम से प्रसिद्ध सात ऋषिप्राणों ( आध्यात्मिक ' साकञ्ज ' नामक ऋषिप्राणों ) में सातवाँ ऋषिप्राण ' एकज ' है, अर्थात् एकाकीरूप से व्यक्त होने वाला एकाकीरूप से ही रहता है । शेष ६ ऋषिप्राण तो ‘ यम ' ही हैं । अर्थात् युग्मरूप से साथ रहने वाले हैं । ये आध्यात्मिक प्राणऋषि ( अग्नि - वायु - इन्द्र-त्र्यादि प्राणदेवताओं के द्वारा व्यक्त होने के कारण ) ' देवजाः ' ( देवदेवताओं से उत्पन्न ) कहलाए हैं । इन सातों देवज ऋषिप्राणों ( इन्द्रियप्राणों ) के इ ( विषय ) स्व - स्वस्थान से सर्वथा नियत हैं । ये ( शेष पृष्ठ २६ पर देखिए ) २५
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भूमिका इस सप्तर्षिप्राण ने किया क्या?, यह प्रश्न विस्तारसापेक्ष महासृष्टिविज्ञान से सम्बन्ध रखता है । इमका विशद विवेचन तो शतपथविज्ञान भाष्य के तत्प्रकरण में ही देखना चाहिए । यहाँ प्रकरणसङ्गति के लिए इस सम्बन्ध में केवल वही जान लेना पर्य्याप्त होगा कि, आरम्भ में ये सातों वेदप्राण विशकलित थे, ऋतभावापन्न थे । आगे जाकर मानों मिल जुल कर एक पुरुषरूप में परिणत हो जाते हैं । सन्तपुरुषपुरुषात्मक यही प्राणसप्तक ' चित्यप्रजापति ' ( पिण्डप्रजापति ) कहलाने लगता है । प्राणात्मक त्रयीवेद ही इसकी प्रतिष्ठा है । अर्थात् यह अपने चित्यरूप मे पिण्ड बनता है, एवं चितेनिधेबलक्षगण महिमारूप से पिण्डप्रतिष्ठा बनता है | यही प्रतिष्ठा ' प्रथम जवह्म ' है, यही मौलिक, प्रतिष्ठालक्षण त्रयीवेद है । इसी त्रयीवेद पर प्रतिष्ठित होकर ( स्वमहिमा में प्रतिष्ठित होकर ) सप्तपुरुषपुरुषात्मक, सप्तर्षिकृतमूर्त्ति यह चित्य प्रजापति लोकसृष्टि के लिए सन्नद्ध होता है । अपने इस चित्यरूप से पहिले वह सर्वथा अमृतरूप था, ऋतरूप था. अप्रतिष्ठित था, अतएव सहृदया, सशरीरा सत्या विश्वसृष्टि में असमर्थ था । अव्यक्तरूपावच्छिन्न वह ऋषिप्राण, किंवा वेदप्राण सृष्टिकर्म्म में असमर्थ था । अतएव उसे सर्वप्रथम व्यक्तलक्षण चित्यरूप में आना पड़ा, ऋत से सत्यरूप में परिणत होना पड़ा । यही व्यक्तावस्थापन्न, सत्यात्मक, स्वयं प्रादुर्भूत, वेदमय चित्यपुरुष हमारे योगमायावच्छिन्न विश्व का पहिला व्यक्तरूप कहलाया, जिसे कि मन्वादिराजर्मियों ने ' स्वयम्भू ' नाम से व्यवहृत किया है । इमी प्रथम वेदावतार का दिग्यर्शन कराते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-( २५, पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) ( ऐन्द्रियक ) सप्तर्षिप्राण स्थितिभावापन्न, अतएव ' स्थाता ' नाम से प्रसिद्ध प्राणी ( जीवित प्राणी ) के लिए अपनी अपनी विकृतियां ( विकाररूप विषयों से समन्वित होते हुए अपने मौलिक प्राकृतिक प्रकृतिभाव मे स्वस्त्ररूपेणापि विकृतिभावापन्न बनते हुए तद्र प ) से स्व व रूपविभाजनपूर्वक ( रूपशः गतिभानापन्न ( नियतविषयापन्न ) बने रहते हैं " । दिकमोमदेवता से व्यक्त होने वाले मयुक् दो चतुःप्राण, अन्तरिक्ष्य वायुदेवता से व्यक्त होने वाले सयुक् दो चक्षुःप्राण, अन्तरिक्ष्म वायुदेवता से व्यक्त होने वाले मयुक् दो नासिकाप्राण, ये ६ सयुक्तागण एवं पार्थिय अग्निदेवता से सम्बन्ध रखने वाला वागिन्द्रियात्मक एकज प्राण, इन सातों आध्यात्मिक ऐन्द्रियक प्राणों का ही नाम आध्यात्मिक सत्तर्पिप्राण है, जिनका ' अर्वागविल-श्चमस ऊर्ध्वबुध्नः ' इत्यादि मन्त्र के ' तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे ' इत्यादि भाग से अन्यत्र स्पष्टोकरण हुआ है । ' अग्निर्वाग्भूत्त्वा मुम्वं प्राविशन, वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् आदित्यश्चतुर्भूत्त्वा , S क्षिणी प्राविशन् दिशः श्रोत्रं भूत्त्वा कर्णौ प्राविशन " ( ऐतरेयोपनिषत् २।४ । ) इत्यादि उपनिषच्छ्र ु ति भी इसी अर्थ का समर्थन कर रही है । ( १ ) - मुखं, ( २ ) – नासिके, ( २ ) - अक्षिणी, ( २ ) - कर्णी ), रूप स्पष्ट ही सात आध्यात्मिक देवज ( अग्नि - वायु - आदित्य - दिक्मोम से उत्पन्न ) सप्तर्षिप्रा संग्रहीत हैं । सागगणभाग्य की परम्परा को ही बेदार्थ की तात्त्विक? परम्परा मान बैठने के प्रवेश से आविष्ट भाष्णभक्त कृपया उक्त ऋग्वेदीय सायणभाग्य पर दृष्टिपात का अनुग्रह करें, जिसमें सर्वश्री साबा ने द्रविड़प्रागायामद्वारा सात ऋतुओं की कल्पनाकरते हुए मन्त्रार्थसमन्वय का आपातरमणीय प्रयास किया है । २६