Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 61–70

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70

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द्वितीयखण्ड ( १ ) - " स योऽयं मध्ये प्राणः, एष एवेन्द्रः ( ग्रहः, प्रतिपत् ) । तानेष प्राणान् मध्यत इन्द्रियेणैन्द्व । यदैन्द्ध, तस्मादिन्धः । इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षम् । त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृज्यन्त । तेऽब्रुवन्- न वोऽइत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजनयितुम् । इमान् सप्तपुरुषानेकं पुरुषं करवाम इति । तएतान्त्सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन् । यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्, यदवाङ्नाभेस्तौ द्वौ, पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः, प्रतिष्ठैक आसात् ” । ( २ ) - " अथ यैतेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः, यो रस यासीत्तमूर्ध्वं समुदौहन् । तदस्य शिरोऽभवत् । यत् प्राणा अश्रयन्त, तस्मादु प्राणाः श्रियः । स एष पुरुषः प्रजापतिरभवत् ” । ( ३ ) - " सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत - भूयान्त्स्यां प्रजायेय - इति । सोऽश्राम्यत्, स तपोऽतप्यत । त श्रान्तस्ते पानो " ब्रह्मैव प्रथमममृजत - त्रयीमेव विद्याम् " । सैवास्मै प्रतिष्ठाभवत् । तस्मादाहु: - ' ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' इति । तस्मादनूच्य प्रतितिष्ठति । प्रतिष्ठा ह्य ेषा यद्ब्रह्म " । - शतः ब्रा ० ६।१।१ । ब्रा ० । ( १ ) उक्त ब्राह्मणश्रुतिवचनों का अक्षरार्थसमन्वय यही है कि – इन सातों प्राणों में जो केन्द्रस्थ मध्यमं प्राण प्रतिष्ठित है, वही ' इन्द्र ' है । मध्यस्थ प्राण इतर प्राणों को अपने मध्यभावात्मक केन्द्रबल से ही समिद्ध - प्रज्वलित करता रहता है । क्योंकि यह इतर प्राणों को प्रज्वलित करता है, स्फूर्ति प्रदान करता है, श्रतएव यह अपनें इस इन्धन - प्रज्वलनकर्म से ' इन्धः ' नाम से प्रसिद्ध है । ' इन्ध ' नामक यही प्राण परोक्षत्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । परिधिमण्डल में युक्त यच्चयावत् प्राणों को प्रदीप्त करते रहने वाला केन्द्रस्थ मध्यप्राण ही इस समिन्धनकर्म से ' इन्ब ' बनता हुआ ' इन्द्र ' कहलाया है, यही तात्पर्य है । प्रत्येक वस्तु का केन्द्रीय प्राण ही ' इन्द्र ' है, यही निष्कर्ष हैं । मध्यस्थ इन्द्रप्रागा से इद्ध - समिद्ध- प्रदीप्त बन जाने वाले इन सातों प्राणोंने अपने इस प्रचण्ड-उद्दीप्त गतिभाव से सप्त - सप्त- प्राणात्मक सात चित्य प्राणसप्तक व्यक्त कर डाले । इन्हें व्यक्त कर ये कहने लगे कि, अरे! इन सातों सन्तकों को पृथक पृथक रखते हुए अपन कदापि संसृष्टिलक्षण - समष्टयात्मक-समन्वयात्मक - प्रजनन कर्म्म में सफल नही हो सकते । अपने को इन सातों को एकपुरुषरूप में हीं परिणत कर देना चाहिए | संकल्पानुसार तप और श्रम के द्वारा इन्होंने अपने इन सप्त सप्तकों को ' एकपुरुष ', समग्र्यात्मक एक सप्तकरूप में परिणत कर डाला 1 सातों को एक बनाकर नाभि से ऊपर दो भाग, नाभि से नीचे दो भाग व्ययस्थित कर दिए । एक भाग दक्षिणपक्षरूप से, एक भाग वामपक्षरूप से, एवं एक भाग २७

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भाष्यभूमिका प्रतिरूप से व्यवस्थित हो गया । इस प्रकार सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त सप्तपुरुषात्मक एकपुरुष मध्य के घड़ में ४ भागों मे ( चत्वारः - श्रात्मा ), वामपादहस्त - दक्षिण पादहस्त रूप से दो भागों से, तथा त्रिकास्थि-युत प्रतिष्ठा प्राणरूपेण एक भाग मे प्रतिष्ठित हो गया । ( और यही श्राध्यात्मिक सुपचिति कहलाई ) । ( २ ) - इस प्रकार अपनें विशकलित सातों सप्तकों को यो एकपुरुषरूप से समन्वित कर तदनन्तर इमी सप्तपुरुषपुरुषात्मक ऋषिप्राणरूप प्रजापति ने अपने इन सातों पुरुषों का ( सप्त सप्तकों का ) जो ' श्री ' भाग श्रा, रम ( ग्रमृत ) भाग था, उसे ( मन्धनद्वारा ) ऊर्ध्वरूपेण पृथक् निकाल लिया । यही इसका शिरोभाग ( रसात्मक मस्तक भाग ) चना ( जिसमें कि - " तस्मिन यशो निहितं विश्वरूपम् ' के अनुसार अमृतात्मक प्रज्ञारम परिपूर्ण है ) । सप्तपुरुषपुरुषात्मक मातों चित्य - मर्त्यप्राण क्योंकि इस ऊर्ध्वं चितेनिधेय अमृत रसात्मक प्रारण के ही श्राश्रित है । अतएव सातों मयों से पृथक भूत अमृतप्रागाम तक अवश्य ही इस मत्यांश्रय-प्रदानधर्म से ' श्री ' कहला सकते हैं । यों अपने इन मर्त्य - अमृतात्मक सप्तकों से पुरुष ' प्रजापति ' रूप में परिणत हो गया ( मर्त्यभाग से यही ' प्रजा ' बना, एवं अपने अमृतरूप श्रीभाग से यही ' पति ' बन गया, आश्रयभूमि बन गया । एवं दोनों प्रजापति इन भावों की समष्टि ही ' प्रजापति ' कहलाने लग पड़ी, यही निष्कर्ष है ) । ( ३ ) - अमृतमर्त्यभावापन्न सप्तपुरुषपुरुषात्मक इस प्रजापति ने ग्रागे चलकर यह कामना की कि, मैं बहुत्त्वभाव का ( बहुत्त्वलक्षणा ' भूतभौतिकी सृष्टि ' का ) अनुगामी बनूँ, अपनें इस मूलरूप से, भूतसृष्टिरूप से प्रजननधर्म का अनुगामी बनूँ । कामनानुसार प्रजापति ने तप ( प्राणव्यापार ) किया, श्रम ( वागू-व्यापार - भूतव्यापार ) किया । तपसा तेपान, एवं श्रम से श्रान्त इस प्रजापति ने सर्वप्रथम ' ब्रह्म रूपा त्रयीविद्या ही उत्पन्न की । यही ऋक्सामयजुर्लक्षणा ब्रह्मरूपा त्रयीविद्या ( वेदत्रयी ) प्रजापति के लिए ( भूतभौतिक सृष्टिकर्म के लिए ) मूल प्रतिष्ठा बनी । इसी आधार पर यह सिद्धान्त व्यवस्थित हो पड़ा कि, — " त्रह्म ( वेद ) ही इस सम्पूर्ण भूतभौतिक प्रपञ्च की प्रतिष्ठा है " । ( यही कारण है कि, इस तत्त्वात्मक प्रतिष्ठावेद के स्वरूप विश्लेषक ) शब्दात्मक वेदशास्त्र का अनुवचन करने वाला वेदवित् विद्वान् लोक में प्रतिष्ठित बन जाता है । प्रतिष्ठा ही तो यह है, जो कि ब्रह्म ( वेट ) है । ( उमे ही तो वेदवित् ने प्राप्त किया है, फिर क्यों न वह प्रतिष्टित बने ) । ठीक इसी श्रौत अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए, वेदप्रजापति के अव्यक्त व्यक्त दोनों स्वरूपों का विश्लेषण करते हुए भगवान् मनु कहते हैं—

( १ ) - आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

अप्रतर्क्यमनिद्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥

( २ ) - ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।

महाभूतादि वृतौजाः प्रादुरासीतमोनुदः ॥

( ३ ) - योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।

सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ ॥

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द्वितीयखण्ड

( ४ ) - तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कम्र्म्मभिः ।

मनश्वावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम् ॥

( ५ ) - तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम् ।

सूक्ष्माभ्यो मूर्त्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाद् व्ययम् ॥

( ६ ) -सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक पृथक ।

वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक संस्थाश्च निर्ममे ॥

- मनुः १ अध्याय । उक्त मनुवचनों का अक्षरार्थमात्रसमन्वय यही है कि, ( १ ) - प्रत्यक्षरूप से आज दृष्ट - स्पृष्ट – श्रुतोपश्रुत यह् सम्पूर्ण चर - अचरप्रपञ्च सृष्टि से पूर्वदशा में सर्वथा अनुपाख्य नामक उस तम से ही अभिभूत था, जो कि श्रनुपाख्य तम अज्ञात था, अलक्षण था, तर्कसीमा से बहिर्भूत था, अङ्ग लिनिद्देश से पृथक् था, और यों मत्र कुछ घोरघोरतमा मुत्रुति ( निद्रा ) में ही निमग्न था उस विश्वातीता अव्यक्तावस्था में । ( २ ) -इत्यंभूता घोरघोरतमा तमोलक्षणा अव्यक्तावस्था को व्यक्तरूप में परिणत करते हुए वे भगवान् स्वयम्भू प्रजापति ही व्यक्त हुए, जो स्वस्वरूप से की अव्यक्त थे, सम्पूर्ण भूतों के आदिभूत ( आकाशात्मा ) थे, वृत्तौजा ( परिपूर्णशक्तिसमन्वित ) थे, एवं अव्यक्तान्धकार का भेदन करने वाले थे || ( ३ ) -- जो स्वयम्भू अव्यक्त प्रजापति अपने अव्यक्तधर्म से इन्द्रियातीत हैं, इन्द्रियों से जिनका ग्रहण सम्भव नहीं है, जो अपने प्राणधर्म्म मे सुसूक्ष्म हैं, अतएव अव्यक्त हैं, अतएव च सनातन ( नित्यधर्म्मा ) हैं, सर्वभूताधारत्वेन श्राकाशात्मा सर्व-भूतमय अचिन्त्य ( सीमित मानसिक चिन्तन की सीमा से बहिर्भूत निश्चितभावसमन्वित ) ऐ स्वयम्भू ही स्वयं अपनी ही प्रेरणा से व्यक्त हो पड़े ॥ ( ४ ) - महत् प्रकृति के अनुग्रह से महद्भावापन्न बने हुए, अतएव ‘ महाभूत ' नाम से प्रसिद्ध हो पढ़ने वाले सम्पूर्ण भूत अपने अपने नियत भूतभौतिक कम्मों से इमी आदि महाभूतात्मा आकाशात्मा स्वयम्भू के गर्भ में समाविष्ट हैं । अविनाशी, अतएव ' श्रव्यय ' नाम से प्रसिद्ध इस स्वयम्भू प्रजापति में, जो कि सम्पूर्णं भूतों का मूलप्रवर्तक होने से ' सर्वभूतकृत् ' नाम से प्रसिद्ध है, जो कि कामनामय होने से ' श्वोवसीयस् मन ' नाम से प्रसिद्ध है, अपने प्राणात्मक सूक्ष्म अवयवों से सम्पूर्ण प्रपञ्च का आधार बना हुआ है । ( ५ ) - सप्तभाणकृतमूर्ति सप्त - सप्तकात्मक पुरुषों के प्रदीप्ततम ओ, तदनुगता रूप - रस - गन्ध — स्पर्श - शब्दरूप सुसूक्ष्म पवितन्मात्राओं से इसी स्वयम्भू प्रजापति ने अपने अव्यक्तरूप से व्यक्तात्मक विश्व को अभिव्यक्त किया || ( ६ ) - इस प्रकार उस स्वयम्भू प्रजापति ने अपने सतपुरुषपुरुषात्मक प्रजापतिस्वरूप से अपनी प्रतिष्ठारूप वेदब्रह्म की शब्दतन्मात्राओं के माध्यम से ही सम्पूर्ण भूतभौतिक प्रपञ्चों के नाम - रूप-कर्म्म व्यवस्थित किए, एवं भूः- भुवस्वः – महत् -- तपः- जनत् - सन्यं - रूप से सप्तलोकसंस्थान व्यवस्थित किए । ' स्वयम्भू ' नाम से प्रसिद्ध वेदमूर्ति उस ब्रह्मने किस प्रकार अपनी सृष्टिकामना चरितार्थ की?, सर्वप्रथम क्या उत्पन्न किया?, यह भी दो शब्दों में जान लेना चाहिए । और इस से पहिले यह भी स्पष्ट कर लेना चाहिए कि, पूर्व शतपथश्रुति ने जिस त्रयीविद्या को सप्तपुरुष पुरुषात्मक इस ब्रह्म की प्रतिष्ठा बतलाया है, यह वेदत्रयी पुरुषप्रजापति से पूर्व ही अपनी सत्ता रखने के कारण ' अपौरुषेय ' है, एवं अक्षरधर्म्मावच्छिन्न होने २६

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भाष्यभूमिका से ' ब्रह्मनिःश्वसित ' है । इस स्पष्टीकरण की आवश्यकता यही है कि, ग्रागे जाकर एक दूसरे त्रयीवेद का अवतार और होने वाला है, जोकि इस चित्यपुरुष के व्यापार से प्रादुर्भूत होने के कारण ' पौरुषेय ' कहलाएगा, एवं विज्ञानभाषा में जिसे ' गायत्रीमात्रिक वेद ' कहा जायगा । जैसाकि पूर्वोक्त ( १ ) प्रथम श्रुति में बतलाया गया है, सप्तपुरुषपुरुषात्मक चित्य प्राजापत्य संस्था के मध्य का सर्वोत्कृष्ट, प्रदीप्त प्राण ही ' यदैन्द्ध ' के अनुसार ' इन्द्र ' है । इन्द्र ग्रह है, प्रतिपत् है । ग्रह कभी उपग्रहों के बिना अपना स्वरूप सुरक्षित नहीं रख सकता, इन्द्र कभी जनता के बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकता, एवं प्रतिपत् कभी अनुचरों के बिना सुशोभित नहीं हो सकती । तीनों ही सापेक्ष हैं । जब तक यह वेदात्मक ऋषिप्राण अपनी अव्यक्तावस्था में था, तब तक तो अमर्यादित सीमऋतभाव के कारण सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र चनता हुआ न तो यह ग्रह ही था, न इन्द्र ही था, न प्रतिपत् ही था । अतएव उस अवस्था में इसे उपग्रह, जनता, अनुचरादि की कोई अपेक्षा न थी । परन्तु जब यह व्यक्तावस्था में आकर वेदत्रयीरूप से एक प्रतिष्ठित, सीमित, सत्यरूप गृहमेधी ( गृहस्थ ) बन गया, गृह्यसंस्था में प्रविष्ट हो गया, त्रयीवेदचर्य्या समाप्त कर स्नातक बनता हुआ । गृहस्थाश्रमोपलक्षित विश्वमर्यादा में आ गया, एवं इसी मर्य्यादा के अनुग्रह से जब यह ग्रह, इन्द्र, प्रतिपत् बन गया, तो इसे उसी प्रकारउ पग्रहादि भावों की अपेक्षा हो बड़ी, जैसेकि वेदव्रत समाप्त कर गृह्यधम्मों में प्रविष्ट होने वाले गृहस्थी को उपग्रहादिस्थानीय पत्नी प्रजा - वित्तादि की कामना होने लगती है, एवं अपनी इस कामना के लिए यह गृहमेधी प्राप्त वेदज्ञान के आधार पर सृष्टि - कर्म में प्रवृत्त होता है । " एकाकी न रमते, तद्वितीयमैच्छत् - पतिश्च पत्नी च " जब यह स्वाभाविक कामना उसी के अंशभृत, कार्य्यरूप अस्मदादि में पाई जाती है, तो क्या कारणभूत अशीरूप उसमें प्रारम्भ में इस कामना का उदय न हुआ होगा? । अवश्य हुआ होगा । उसी कामना से तो दाम्पत्यभावभूता मैथुनी सृष्टि का विकास हुआ है । इसी मैथुनी सृष्टि की कामना से भावसृष्टि ( ऋषिप्राण समष्टिरूपा, विशुद्ध प्रजापतिलक्षणा मानसी सृष्टि, अव्ययसृष्टि ) मूर्त्तिं उस प्रजापति ने एकाकी रमण करने में अपने आप को असमर्थ पाते हुए अपने जैसा ही एक रमणसाधन ( अतएव ' रमणी ' नाम से लोक में प्रसिद्ध ) उत्पन्न करने की कामना की । आज हमें तो इस साधन में विशेष कष्ट नहीं उठाना पडता । प्रजापति के अनुग्रह से ग्राज ' पति - पत्नी ' ( वृषा - योषा ) दोनों भाव सुव्यवस्थित हैं । हम मुगमता से ' तद्वितीयमै छन्, पतिश्च पत्नी च ' अपनी यह इच्छा पूरी कर लेते हैं । कल्पना कीजिए, यदि संसार में स्त्रियां न हों, और उस काल्पनिक काल मं पुरुष जब रमणसाधन की इच्छा करे, तो क्या दशा हो । सम्भव है, प्रजापति की प्रारम्भ में यही दशा हुई हो । क्योंकि उस समयं त्रयीवेदमूर्ति प्रजापतिपुरुष के अतिरिक्त, वृषाप्रारण के अतिरिक्त सौम्य योषाप्राण का कहीं पता भी न था । सत्यकाम, सत्यसंकल्प, सत्यमूत्तिं प्रजापति ने उस दशा में भी कोई चिन्ता प्रकट न की । चिन्ता प्रकट क्यों करते, जबकि चिन्तानिवृत्ति के अमोघसाधन कामानुगामी तप, श्रम नाम के दो साधन विद्य-मान थे | चिन्ता वे कापुरुष किया करते हैं, संकल्प उन कर्म्मयों के व्यर्थ जाया करते हैं, जो केवल बड़ी बड़ी इच्छाएँ करना तो जानते हैं, काल्पनिक जगत् के सौन्दर्य का अभिनय तो करना जानते हैं, किन्तु प्राणव्यापारलक्षण ग्राभ्यन्तरकर्म्म, एवं वाग्व्यापारलक्षण बाह्य ( शारीर ) कर्म्मो से कोसों दूर भागते हैं । करुणावरुणालय दयार्द्रा ' पिता प्रजापति ने ऐसे कुपूतों पर दया करके ही अपनी ओर से इन रमणसाधनों को उत्पन्न कर दिया है । परन्तु साथ ही प्रजापति परोक्षविधि से इन्हें यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि, योपाप्राण-३० I

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द्वितीयखण्ड प्रधान यह रमणसाधन ( स्त्रियाँ ) मैंने बड़े तपः - श्रम से, अपने ही यावे अङ्ग से उत्पन्न किया है । इम ग्मणसाधन से मैं पूर्ण बना हूँ, सृष्टिकर्म में सफल हो सका हूँ, यदि तुम पूर्ण बनना चाहते हो, कृतकृत्य बनना चाहते हो, तो इस रमणसाधन को अपना ही ग्राधा ( समान ) ग्रङ्ग समझो, सृष्टिकर्म में इसका नहयोग प्राप्त करो, इनकी प्रतिष्ठा करो, समादर करो । परमपुरुषार्थी प्रजापति के वैभव को देखकर आश्चर्य्या-न्वित तत्पुत्र देवताओं नें जब जब प्रजापति से यह प्रश्न किया कि, भगवन्! आपने यह वैभव कहाँ से, कैसे प्राप्त कर लिया?, हमें भी कृपा कर वह उपाय बतला दीजिए!, तो उत्तर में तत्र तत्र ही प्रजापति ने इनके सामने यही रहस्य रक्खा कि, मैंने भृगु - अङ्गिरा के तप का अनुगमन किया है, श्रम किया है, चिति की है, सदा चिन्मय रहा हूँ -‘भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम, चेतयध्वम्, चितिं वात्र इच्छथ ' । याज प्रजापति अपनी सृष्टिकामना को पूरी करने के लिए उसी तपः - श्रम का अनुगमन कर रहे हैं । जैसा कि कहा गया है, वेदमूर्ति प्रजापति से अतिरिक्त और कोई ऐसा दूसरा माधन न था, जिसमे प्रजापति अपनी ' एकाकी न रमते ' वाली कामना को पूरी कर लेते । फलतः उनके इस तपः - श्रम से स्वयं वे ही रमासाधनरूप में परिणत हुए । तात्यर्य्य यह हुआ कि वेदत्रयी के ' ऋक, यजुः, साम ' नामक तीनों पर्वों में ऋक् – साम ये दो पर्व तो वयोनाध हैं, छन्दोरूप हैं, जैसाकि पाठक आगे बतलाए जाने वाले ' छन्दोवेद-निरूपण ' प्रकरण में देवंगे । मध्य का यजु ' यत - जू ' भेद से दो भागों में विभक्त है । ' यत् ' - तत्त्व वही सुप्रसिद्ध इन्द्रलक्षण गतिमत् “ ऋषिप्राण " है, एवं तदभिन्न ' जू ' - तत्त्व वही सुप्रसिद्ध स्थितिमत् क्षर वाक्तत्त्व है, जिसके कि समन्वय से ऋपिप्राग्गलक्षण यह वेद वाङ्मय बना हुआ है । प्राण ' वायु ' ( प्राणात्मक सबिता वायु, सावित्राग्नि ) है, वाकू ' आकाश ( इन्द्रपत्नीलक्षण मर्त्याकाश ) है । सृष्टिकामना से प्राजापत्य संस्था में क्षोभ उत्पन्न होता है | चोभ मे प्राणतत्त्व क्षुब्ध हो पड़ता है । प्राणक्षोभ से बागग्नि तुच्छ हो पड़ता है । यही क्षुब्ध वागग्नि क्षोभ की चरम सीमा पर पहुँच कर उसी प्रकार रूप में परिणत हो जाता है, जैसे कि तपः-श्रम से क्षुब्ध शारीराग्नि स्वेदलक्षण ( पसीना ) रूप में परिणत हो जाता है । चाकू ही ( यजुर्वाक ही ) जो कि प्रजापति का अपना शरीर था, अंशरूप से अनूरूप में परिणत हो गया । बागग्नि का यही शान्त, रूप वैज्ञानिक सम्प्रदाय में चौथा अन्नात्मक ' अथर्ववेद ' कहलाया । शिव! शिव!! सचमुच हम कैसा अनर्थ कर रहे हैं । वायु और आकाश का नाम यजुर्वेद, तो पानी का नाम अथर्ववेद, वह अनर्थ नहीं, तो और क्या है । स्वेद का नाम अथर्ववेद, यह तो विचित्र कल्पना है | परन्तु इस ग्रनर्थ से, इस विचित्र कल्पना से हमें सन्तोष इसलिए हो रहा है कि, स्वयं वेदशास्त्र हमारे इस अनर्थ " हमारी इस विचित्र कल्पना का अक्षरशः समर्थन कर रहा है । यजुर्वेद का नाम वास्तव में ' यजुर्वेद ' है, एवं यत् वायु है, जू ग्राकाश है, पहिले इसी कल्पना का समर्थन सुन लीजिए— १ - यं वा यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्न वेदं सर्वं जनयति, एतं यन्त-मिदमनु प्रजायते, तस्माद्वायुरेव ' यजुः ' । अयमेवाकाशो ज्ः ' यदिदमन्तरिक्षम् । एतं ह्याकाशमनु जवते । तदेतद्यजुर्वायुश्च, अन्तरिक्षं च यच्च, ज़श्च - तस्माद्यजुः । एष एव ' यत् ', एप ह्य ेति ( गच्छति ) । तदेतद्यजुः - ऋक्सामयोः प्रतिष्ठित, ऋक-साम वहतः " । - शत ० ब्रा ० १० कां ० / २० / ६ ब्रा ० १-२ कण्डिका । ३१

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भाष्यभूमिका यल्लक्षरण गतिमत् वायुभाग प्राण है, एवं जूलक्षण स्थितिमत् श्राकाशभाग वाकू है, इसका समर्थन सुन लीजिए -१ – “ वायुर्वै प्राण: " ( कांपीतकि ब्रा ० ८ । ४ । ) । २--- " प्राणो वै वायुः " ( शत ० ब्रा ० ४।४१।१५ ) । ३ - - " यस्स प्राणो, वायुस्सः " ( जै ० उप ० ब्रा ० १।२६।१ । ) । ४ - - " यो वै प्राणः, स वतिः " ( शत ० ब्रा ० ५ । २ । ४ । ६ । ) । ५ – “ प्राण एव सविता " ( शत ० १० | ४ | १ |: ३ ) । ६ – “ प्राणो वै सावित्रग्रहः " ( कौ ० ब्रा ० १६ २ २ ) । १ – “ वागिति द्यौः " ( जै ० उप ० ब्रा ० ४।२२।११ । ) । २ – “ सा या सा वाग्, ब्रह्म व तत् " ( जै ० उप ० २।१३।२ । ) । ३ – ब्रह्मव वाचः परमं व्योम " ( ० ब्रा ० ३।६।५।५ । ) । - " जुषता मिन्द्रपत्नी " ( तै ० ना ० २८५ ) । ४– ५ – “ वागित्यन्तरिक्षम् " ( जे ० उप ० ब्रा ०: ।२२।११ । ) । ६ – “ वाक् सावित्री ” ( गोपथत्रा ० पू ० १।३३ । ) । ब्रह्म पहिले एकाकी था । उसने यह विचार किया कि, मैं मेरे परिमाण का ही एक दूसरा देव उत्पन्न करूँ, क्योंकि यह एक आश्चर्य्यमयी विभीषिका ही मानी जायगी कि, मैं एकाकी ही बन रहा हूँ । फलतः प्रजापति ने श्रम किया, तप किया । श्रान्त, तेपान, अतएव तप्त प्रजापति के ललाट पर जो पसीने बह निकले, उनसे प्रजापति ने शान्तिलक्षण श्रानन्द का अनुभव किया । और प्रजापति के मुख से निकल पड़ा कि, यह सचमुच आश्चर्य की घटना ही हुई कि, मैंने ' सुवेद ' प्राप्त कर लिया । प्रजापति की इस उक्ति से यह स्वेद ( ललाट का पसीना ) ' सुवेद ' ( अथर्ववेद ) नाम से प्रसिद्ध हो गया । वस्तुतः यह ' सुवेद ' ही है । और ' सुवेद ' का यही सु ( सुख - शान्ति ) भाव है कि, ब्रह्मलक्षण यजुरग्नि जहाँ आग्नेयस्वभाव से उग्र था, रूक्ष था, वहाँ यह आपोमय बनता हुआ शान्त है, स्निग्ध है । वह ग्रग्निवेद होने से क्षोभलागा बनता हुआ दुर्वेद है, यह सोमवेद बनता हुआ सुवेद है । परोक्ष प्रिय देवता इसी सुवेद को ' स्वेद ' नाम से व्यवहृत करते हैं | तात्पर्य्य इस कथन का यही है कि, मनुष्य जब भी तपः श्रम करता है, इस तपः - श्रम से शारी-समद्ध इसका यजुरग्नि ( यजुर्वेद ) क्षुब्ध हो पड़ता है, और फलस्वरूप सर्वप्रथम इसके ललाट पर पसीने चमकने लगते हैं । इसी अवस्था में ग्राकर यह शान्ति का श्वास लेता है । पसीना बहाकर जो कार्य्य किया जाता है, वही सुकार्य्यं तथा सफल कार्य कहलाता है । यह पमीना ही स्वोट है, स्वोद नहीं मुगेट है, मजुरग्नि से उत्पन्न होने वाला योगाप्राणात्मक अथर्ववेद है । ३२

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द्वितीयखण्ड ललाट पर पसीने चमके । प्रजापति ने पुनः तपःश्रम किया । इसका परिणाम यह निकला कि, इस तपःश्रम के भूयोऽनुगमन से उसी प्रकार इसके अग्निमय चित्यशरीर से स्वेदधारा बह निकली, जैसे कि अति परिश्रम से हमारा सर्वाङ्गशरीर पसीनों से तर - बतर हो जाता है 1 । इन्हीं स्वेदधाराओं से आगे जाकर सृष्टि-कम्र्मोपयिक प्राप्ति ( व्याप्ति - प्रसार - फैलाव ) लक्षण प्रापोबल, धृतिलक्षण धाराबल, प्रजननलक्षा ये तीन बल और उत्पन्न हो गए । पानी में ये तीनों बल नित्य प्रतिष्ठित रहा करते हैं । शरीर में जायाबल, जब तक अपू - मात्रा रहती है, लोकभाषानुसार शरीर में जब तक पानी रहता है, तभी तक शरीरयष्टि धृत रहती है । यही पानी स्वयोषाप्राण के द्वारा प्रजोत्पत्ति का कारण बनता है । यही अपतत्त्व लोकव्याप्ति का कारण बनता है । जाया, धारा, आप, तीनों बलों से युक्त यही अपूतत्त्व श्रागे जाकर भृगु - अङ्गिरा की उत्पत्ति का कारण बनता है, जो कि भृग्वङ्गिरासमष्टि ' अथर्ववेद ' नाम से प्रसिद्ध है । भृगु स्नेहतत्त्व है, अङ्गिरा तेज तत्त्व है । इन दो तस्वों के विकास का कारण वाङ्मय वही यजुर्वेद है । बजु का यत् भाग गतिप्रकृतिक, तथा जू भाग स्थितिप्रकृतिक बतलाया गया है । यजु में इन दोनों धम्मों का श्रागमन स्वयं विश्वात्मा से हुआ है । विश्वात्मा ( अव्यय ) के विद्या, कर्म्म, नाम के दो धातु बतलाए गए हैं । विद्याधातु स्थितिमत् है, इसका अनुग्रह यत् भाग पर होता है, अतएव यत् भाग ( ऋषि-प्राण ) गतिमत् बन जाता है । कर्म्मधातु गतिमत् है, इस का अनुग्रह जू भाग पर होता है, अतएव यह जू भाग ( वागूभाग ) स्थितिमत् बन जाता है । गतिमत् यत् ( प्राण ) को गर्भ में रखने वाले जू, ( वाक् ) से अपूतत्त्व उत्पन्न हुआ, ‘ तत्सृष्टा तदेवानुप्राविशन् ' के अनुसार यह यत् - गर्भित जू ( त्रयीवेद, किंवा त्रयीवेदमूर्ति चित्य प्रजापति ) इस ग्रापोमय मण्डल में प्रविष्ट हो गया । इस से पहिले प्राप्तत्त्व सर्वथा ऋत रहने से श्रृण्ड-मर्य्यादा से बहिष्कृत था । परन्तु जब सत्यलक्षण त्रयीवेदमूर्ति - प्रजापति इस के गर्भ में आ गए, तो आण्डरूप का विकास हो गया । इसी श्राण्डभाव का स्पष्टीकरण करती हुई वाजिश्रुति कहती है— " तस्यां ( वेद - ) प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । त्रागेव सासृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोत् यदिदं किश्व । यदाप्नोत् तस्मात् - ' आप ' । यदषृणोत्, तस्मात् – ' वाः ' । सोऽकामयत, आभ्योऽद्भ्योऽधिप्रजायेय इति । सोऽनया त्रग्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत ' आण्डं ' समवर्त्तत " । - शत ० ना ० ६।१।१६ १०१ इस त्रयीविद्या के प्रवेश से, तथा स्वयं अपतत्त्व के स्थिति - गतिमल्लक्षण मजुरग्नि से उत्पन्न होने से इसमें भी इन दोनों स्थिति - गतिभावों का आविर्भाव श्रावश्यक था । बत - रूप गतिभाव से गतिलक्षण तेजो-भाव का, एवं जूरूप स्थितिर्भाव से स्थितिलक्षण स्नेहभाव का अपतत्व में विकास हो गया । तेजोभाव बिश-फलनलक्षण ग्रङ्गिरा कहलाया, स्नेहभाव संकोच लक्षण ं भृगु कहलाया, दोनों की समष्टि ' आप ' कहलाई । आगे जाकर अङ्गिरा की अग्नि, यम, श्रादित्य, ये तीन घन - तरल - विरलावस्थाएँ एव ं भृगु की श्रापः, वायु, सोम, ये तीन धन - तरल - विरलावस्थाएँ हो जाती हैं । अङ्गिरात्री से देवसृष्टि का विकास होता है, भृगुत्रयी के बन आपोभाव से मुरमष्टि का, तरल वायुभाग से गन्धर्व्वसृष्टि का एवं विग्ल समभाग से पितरसृष्टि का ३३

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भाष्यभूमिका विकास होता है । इस प्रकार आपोमय, भृग्वङ्गिरोरूष इम अथर्वा से देवता, असुर, गन्धर्व्व, पितर, इन चार जाति के प्राणों का विकास होता है । इन चारों में प्राधान्य सौम्य पितरप्राण का ही माना गया है । इम प्रधानता का कारण यही है कि, स्नेह ही अपूतत्त्व का प्रधान धर्म है, उधर पोमय अथर्व का भार्गव सोम ही आपः, वायु की अपेक्षा अधिक स्निग्ध हैं । अतएव भगवान् मनु ने ऋषिप्राण के अनन्तर सौम्य पितरप्राण काही विकस माना है | ऋषिप्रागा वही स्वायम्भव यजुमूर्ति वेदप्राण है । इन ऋषिप्राणों के याज्ञिकसमन्वय से पितर प्राण का, ( सुरप्राण का एवं गन्धव्वं प्रागण का भी ) विकास होता है, भृगुमूर्ति पितरप्राणों के ममन्त्रय से अङ्गिराद्वारा देवप्रारण का विकास होता है । ऋषि, पितर, असुर, गन्धर्व्वा ' प्राणगर्भित वेदप्रागण से सूर्य्यद्वारा चर - अचर रोदसी त्रैलोक्य, एवं तत्प्रजा का विकास हुआ है । इसी धारावाहिक प्राणसृष्टिक्रम दिग्दर्शन कराते हुए, राजर्षि कहते हैं—

ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देवमानवाः ।

देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥

— मनुः ३।२०१ । प्रकृत में इस प्रपञ्च मे वक्तव्यांश यही है कि, प्रजापति के यजुर्भाग से, ब्रह्मभाग से, वागूभाग से जो अपूत्तत्त्व उत्पन्न हुआ, उसमें जाया, धारा, ग्रापः, नाम के तीन तो मैथुनी सृष्टि के अनुबन्धी बल उत्पन्न हुए । एवं स्नेहलक्षणा भृगुत्रयी, तथा तेजोलक्षणा अग्नित्रयी उत्पन्न हुई । इन ६ रूपों से यह अथर्वब्रह्म, सुवेट, स्वेद, ' षड्ब्रह्म ' कहलाने लगा । उधर वह ब्रह्म ' ऋक्साम - यत्- जू ' भेद से चतुपर्वा बन गया । चतुब्रह्म, एवं षड्ब्रह्म, दोनों क्रमश: ' ब्रह्म - सुब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध हुए । ब्रह्म और मुब्रह्म, दोनों एक ही यजुर्वाक के विभिन्न दो विवर्त्त ' हैं | स्वस्वरूप से वही यजुर्वाक ' ब्रह्म ' है, अनूरूप में परिणत होकर वही ' सुब्रह्म ' कहलानं लगती है - ' ' वाग्वै ब्रह्म च सुब्रह्म च ” ( ऐतेरयब्रा ० ६ | ३ | ) | ब्रह्म के चार पर्व, सुब्रह्म के ६ पर्व, इन १० कलाओं के समन्वय से दशाक्षर विराट्छन्द से छन्दित विराट् - पुत्र ( सूर्य्य ) का जन्म होने वाला है, जैसा कि पाठक अनुपद में हीं देखेंगे । अभी तो उस प्रमाणवाद की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित कर देना है, जिसके लिए कि हमारा सनातनधर्मी जगत् श्राकुल रहता है । यत् - जू लक्षण प्राण - वाकू को यजुर्वेद कहा जाता है, इस यजुर्वाकू से पानी उत्पन्न होता है, आपोमय मण्डल में त्रयीवेदमूर्त्ति ब्रह्म प्रविष्ट होकर अण्डसृष्टि का प्रवर्तक बन जाता है, वेदप्राण को ऋषि कहते हैं, इत्यादि के सम्बन्ध में तो प्रमाण बतला दिए गए । यत्र उस प्रमाण पर भी दृष्टि डाल लीजिए, जो इस अपतत्त्व को ब्रह्म का पसीना बतलाता है, इसे भृग्वनिमय कहता है, एवं इसे ही अथर्ववेद मानता है । १ – “ ब्रह्म वा इदमग्रमासीत्, स्वयन्त्वेकमेव । तदैक्षत - महद्वै यतं, तदेकमेवास्मि । हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्मम इति । तदभ्यश्राम्यत्, अभ्यतपत्, समतषत् । तस्य श्रान्तस्य, तप्तस्य, सन्तप्तस्य ललाटं स्नेहो, यदाद्रथं मजायत, तेनानन्दत् । तमब्रवीत्, महद्वं यक्षं ' सुवेद ' मविदामह इति । तस्मात् सुवेदोऽभवत् । तं वा एतं सुवेदं सन्तं ' स्वेद ' इत्याचचते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः, प्रत्यक्षद्विषः ” । —गोपथब्रा ० १ | १ | १ | ३४

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द्वितायखण्ड २- " स भूयोऽश्राम्यत्, भूयोऽतप्यत् भूय श्रात्मानं समतपत् । तस्य श्रान्तस्य, तप्तस्य, सन्तप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगर्तेभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्पदन्त । ताभिरनन्दत् । तद्-ब्रवीत् - आभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि, जनयिष्यामि, आप्स्यामि, यदिदं किश्च । तस्माद् ‘ धारा ' अभवन्, जाया अभवन्, आपोऽभवन् । तद्धाराणां धारावं, यच्चासु धियते । तज्जायानां जायात्वं यच्चासु पुरुषो जायते । तदपामप्त्वम् । आप्नोति ह वै सर्वान् कामान्, यान् कामयते ” । -गो ० पू ० १ | १ | २ | ३ – ‘ इतरा पेयाः, स्वाद्वचः, शान्ता: ( आपः ) । तत्रैवाम्यश्राम्यत्, अभ्यतपत्, सम-तपत् । ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यो यद्रेत आसीत्, तदभृज्यत । यद-भृज्यत, तस्माद् ‘ भृगुः ' समभवत्, तद्भृगोभृ गुत्त्वम् ” । - गो ० पू ० १३ ४– “ तं वरुणं मृत्युमभ्यश्राम्यत्, अभ्यतपत् समतपत् । तस्य श्रान्तस्य, तप्तस्य, सन्तप्तस्य सर्वेभ्योऽङ्गभ्यो रसोऽचरत् सोऽङ्गरसोऽभवत् । तं वा एतमङ्गरसं सन्तं-' अङ्गिरा ' इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः, प्रत्यक्षद्विपः " | - गोः: मा ० पू ० १७ ॥ ५ - " तद्यथेमां पृथिवीमुदीयां ज्योतिषा धूमायमानां वर्ष शमयति, एवं ब्रह्मा ' भृग्वङ्गिरोभि-हृतिभिर्यज्ञस्य विरिष्ठ ' शमयति – “ अग्निरादित्ययमा इनि " । एते अङ्गिरसः । एते इदं स समाप्नुवन्ति । वायुरापश्चन्द्रमाः ( सोमः ), इत्येते भृगवः । एते

इदं सर्वं समाप्नुवन्ति । एकमेव संस्थं भवतीति ब्राह्मणम् ॥

गो ० ब्रा ० पू ० रामा ६- ' अथ अर्वाडेन मेतास्त्रेवाप्सु - अन्विच्छत इति । तद्यदत्रवोत् अथ अर्वाड नमेतास्त्रेवा-स्वन्विच्छेति, तत् ' अथर्वाऽभवत् । तदथर्वणोऽथर्वच्चम् । तस्य ह वा एतस्य भगवतो-ऽथर्बण ऋषेः, यथैव ब्रह्मणो लोमानि यथाङ्गानि यथा प्राणः, एवमेवास्य सर्व्व आत्मा समभवत् 1 । तमयर्व्वाणं ब्रह्माऽब्रवीत् प्रजापते! प्रजाः सृष्ट्वा पातलय स्व-इति । तस्मात् प्रजापतिरभवत् । तत् प्रजापतेः प्रजापतित्वम् । अथर्व्वा वै प्रजापतिः । प्रजापतिरिव वै सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद " । ३५ - गो ० ० ० ४ ।

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Shree भूमिका * ( ७ ) -- ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।

सर्वमापोमयं भूतं सर्वं भृग्वङ्गिरोमयम् ।

अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः ” ॥

--गो ० वा ० पू ० २ | ३६ | निष्कर्ष यही हुआ कि, व्यक्तावस्थपन्न स्वयम्भू प्रजापति की सृष्टिकामना से इनके ऋक् – सामावच्छिन्न ' यत् ' से अनुग्रहीत जूलक्षग़ बाकू भाग से सर्वप्रथम आपोमय, भृग्वङ्गिरोमय, पड् ब्रह्मलक्षण ग्रथव नामक ' सुब्रह्म ' का ही विकास हुआ । क्योंकि मैथुनी सृष्टि के सर्वेसर्वा यही अथर्वा बनते हैं, अतएव मैथुनी सृष्टि की अपेक्षा से इन्हें ही प्रजापति कहा जायगा, जैसा कि उक्त ६ टी श्रुति से स्पष्ट है । वह प्रजापति ( त्रयीब्रह्म ) ' ब्रह्म ' कहलाएगा, एवं यह प्रजापति ‘ प्रजापति ' कहलाएगा । उसे ' स्वयम्भू ' कहा जायगा, एवं इसे ' परमेष्ठी ' कहा जायगा । स्वायम्भुववेद ' अपौरुषेयब्रह्मनिःश्वसित वेद ' कहलाएगा, एवं पारमेय वेद - ' पौरुषेयब्रह्मस्वेदवेद " कहला-एगा । ब्रह्मनिःश्वसितवेद ' त्रयीवेद ' कहलाएगा, एवं ब्रह्मस्वेदवेद ' अथर्ववेद ' कहलाएगा । इन दोनों की समष्टि को ही ' मौलिकवेद ' कहा जायगा । यही आगे के यौगिक वेद्विवत्तों की मूलप्रतिष्ठा बनेगा । गति, स्थिति, स्नेह, तेज, ये चार इस वेद के स्वरूपधर्म होंगे । यही उस सशाख ग्रनन्त ग्रश्वत्थवेद का सादिसान्त तीसरा इतिवृत्त कहलाएगा । * गोपथब्राह्मण से सम्बन्ध रखने वाले इन सम्पूर्ण वचनों की विशद वैज्ञानिक व्याख्या क्योंकि अन्य निबन्ध में कर दी गई है । अतः प्रकृत में केवल वचन ही उद्धृत हैं । देखिए ' भारतीय हिन्दूमानव, और उसकी भावुकता ' निबन्ध के प्रथमखण्ड का ' विश्वस्वरूपमीमांसा ' स्तम्भ । ३६