Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 71–80
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80
पृष्ठ 71
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड सप्तपुरुषपुरुषात्मकश्चित्यप्रजापतिः -- “ ब्रह्म ” १ - ऋष }. ऋग्वेद: २ -- यत् “ ब्रह्मनिःश्वसितवेदः, अपौरुषेयवेदः, ब्रह्मवेदः, यजुर्वेदः ३ -- जू : अग्निवेदः, त्रयीवेदः, स्वायम्भव: ४ -- सामः 1. सामवेदः ५ -- आपः ५-- वायुः ७- सोमः ८ - श्रादित्यः E- यम: १०- अग्निः त्रयी -अङ्गिरा त्रयी — भृगु * ) अथर्ववेदः -“ ब्रह्मस्वेदवेदः, पौरुषेयवेदः, सुब्रह्मवेदः, सोमवेदः, चतुर्थभेदः पारमेष्ठ्यः १ - यजुः प्राणः - २ ऋषयः ( ऋषिद विकासभूमिः ) २- श्राप: -२ असुराः ( सुरदविकासभूमिः ) ३ - वायुः -- २ गन्धर्वाः ( गन्धर्ववेदविषासभूमिः ) सोम: --२ पितरः ( पितृवेदविकास भूमि: ) ५ - श्रादित्यः - २ श्रादित्याः ( १२ ) ६ – यमः ——२ रुद्राः ( ११ ) { ( देववेदविकासभूमि: ७ – श्रग्निः-२ वसवः ( 5 )
पृष्ठ 72
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भूमिका ब्रह्मनिःश्वसितलक्षण त्रयीवेदमूर्ति स्वयम्भू ब्रह्म का प्रथमावतार, ब्रह्मस्वेदवेदलक्षण परमेश्रीप्रजापति का द्वितीया तार । अनन्तर क्या हुआ?, इसी प्रश्न का समाधान करते हुए भगवान् मनु कहते हैं—
सोऽभिध्याय शरीरात् रुात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
एव ससर्जादो तासु बीजमवासृजत् ॥
- मनु ० ११७ । अपने वाक भाग से उसने पोमय परमेष्ठी उत्पन्न किया । यही उसका प्राधा पत्नी भाग कहलाया । इसी योषात्मिका पत्नी के गर्भाशय में वेदात्मक रेत का सेक हुआ । इसी बीजावान से सुप्रसिद्ध त्रयीमूर्ति भगवान् सूर्य्यनारायण प्रकट हुए । घटना यों घटित हुई । स्वायम्भुव वेदाग्नि ग्रापोमय परमेष्ठी के गर्भ में प्रतिष्ठित था । वहाँ इसी वेदप्राण के स्वाभाविक क्षोभ से कालान्तर में उस पोमय समुद्र में श्रङ्गिरा नामक सांयौगिक अग्नि उत्पन्न हो गया । ये आग्नेय परमाणु उस आपोमय समुद्र में अग्निविस्फुलिङ्गरूप से ( जो कि श्रग्निविस्फुलिङ्ग ज्योतिःशास्त्र - परिभाषा में - ' धूमकेतु ' * नाम से प्रसिद्ध हैं ) अतिशय वेग से इतस्ततः परिभ्रमण करने लगे । केन्द्रस्थ त्रयीब्रह्म के केन्द्राकर्षण से प्राकर्षितये अग्निपुञ्ज, अग्निशिखाएँ, ग्राग्नेय-परमाणु क्रमशः केन्द्र में सञ्चित होने लगे । जितने श्राग्नेयपरमाणु केन्द्रबल की सीमा में प्रविष्ट हो गए, वे केन्द्राकर्षण से आकर्षित होकर बाहर निकलने में असमर्थ होते हुए उसी केन्द्र मण्डल में घूमने लगे । ज्यों ज्यों अग्निकरण यहाँ ग्राकर चित होने लगे, त्यों त्यों यह केन्द्रावच्छिन्न अग्निसंघ पिण्डभाव में परिणत होने लगा । कालान्तर में परिभ्रममा यही अग्निपुञ्ज पारमेष्ठ्य दाय सोमाहुति का सहयोग प्राप्त कर अति-शय ज्योतिर्भाव में परिणत हो गया । यही प्रदीप्त, प्रकाशित, हिरण्यांशुसमप्रभ ज्योतिर्पिण्ड ( भूतव्यं तिगड ) ' सूर्यनारायण ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । ' नार ' लक्षण पानी को ( आपोमय परमेष्ठी मण्डल को ) अपना आयतन बनाने के कारण ही यह हिरण्मयाण्ड ' नारायण ' कहलाया A । यह तो हुई स्मृतिंदृष्टि । अत्र श्रीतदृष्टि से सूर्य्योत्पत्ति की मीमांसा कोजिए । यह कहा जा चुका है कि, चित्य प्रजापति अपने वाकूभाग से प्रापोमय परमेष्ठी उत्पन्न कर अपनी त्रयीविद्या के साथ इसी श्रापोमयमण्डल में * पारमेष्ठ्यसमुद्र में प्रचण्ड वेग से परिक्रममाण, प्रचण्डतमवेग से घोधूयमान अग्निविस्फुल्लिङ्गा-त्मक इन सहस्र धूमकेतुनों के दिकपरिचय के लिए देखिए भा ० हि ० निबन्धान्तर्गत प्रथमखण्ड का ' विश्व-स्वरूपमीमांसा ' नामक द्वितीय स्तम्भ |
A १ - तदण्डमभवद्ध मं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिञ्जज्ञं स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥
- मनुः ११६ ॥
२ - आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥
- मनुः १।१० । ३५
पृष्ठ 73
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड प्रविष्ट होकर केन्द्रभाव से प्रतिष्ठित हो गए । वहाँ प्रतिष्ठित होकर इन्होंनें अङ्गिराभाग के अग्नि, वायु, आदित्य इन प्राणों से क्रमशः ऋक, यजुः, साम ये तीन वेद उत्पन्न किए । यह वेदत्रयी क्योंकि इन तीनों देवताओं से उत्पन्न हुई, अतएव यह ' देववेदत्रयी ' कहलाई । इसी से आगे जाकर यज्ञ का वितान हुआ । इस वेदत्रयी की हमें सौर प्रतिफलित गायत्र तेज से उपलब्धि होती है, अतएव हमारे दृष्टिकोण से यह ' गायत्री मात्रिकवेद ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही वेदत्रयी भूतज्योतिद्वारा पदार्थोपलब्धि का कारण बनती है, अतएव वैज्ञानिकों नें इसे ' उपलब्धिवेद ' नाम से भी व्यवहृत किया । इस वेद की मूलप्रतिष्ठा क्योंकि सूर्य्य है, अतएव यह् ' सौरवेद ' भी कहलाया । सूर्य की मूलप्रतिष्ठा आङ्गिरस अग्नि है, अतएव यह ' अग्निवेद ' भी कहलाया । यद्यपि स्वायम्भुववेद भी अग्निवेद ही था । परन्तु वह ब्रह्माग्निवेद था, एवं यह देवाग्निवेद है । इस प्रकार स्वयज्ञकर्म्म की सिद्धि के लिए उस समुद्रगर्भित त्रयीमूर्ति ब्रह्म से सर्वप्रथम यह दूसरी वेदत्रयी ही प्रकट हुई, जिसे कि ' प्रथमज ' वेद कहा जाता है । स्वयम्भू ब्रह्म प्रथमज नहीं है, वह ' स्वयमेव उद्बभौ ” । जन्मभाव का मैथुनी सृष्टि से सम्बन्ध है । एवं मैथुनी सृष्टि में सब से पहिले उत्पन्न होने वाला यही देववेद है, अतएव इसे ही ' प्रथमज ' वेद कहना श्रन्वर्थ बनता है । रोदसी ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम ( -अग्रे ) अग्निमूर्ति इसी वेट का, तद्रूप इसी हिरण्यगर्भ प्रजापति ( सूर्य ) का प्रादुर्भाव होता है । इसी प्रभाव के कारण यह सौरसावित्राग्नि ' अ ' कहलाया है । अम ही परोक्ष भाषा में ' अग्नि ' कहलाया है । इसी तृतीय वेदावतार, एवं द्वितोय त्रयीवेदावतार का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है— १ – “ सोऽकामयत - आभ्योऽद्भ्योऽधि प्रजायेय इति । सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत आण्डं समवर्त्तत । ततो ब्रह्मैव प्रथममसृज्यत - ' त्रय्येव विद्या ' | तस्मादा हुब्रहमास्य सर्वस्य ' प्रथम ' इति । अपि हि तस्मात् पुरुषात् ब्रहमैव पूर्वमसृज्यत । तदस्य तन्मुखमेवासृज्यत । मुखं ह्य तदग्नेर्यद्द्ब्रह्म " । २– “ अथ यो गर्भोऽन्तरासीत्, सोऽग्निरसृज्यत । स यदस्य सर्वस्याग्रमसृज्यत, तस्मा-दग्रिः । अग्रिर्हवै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम् । परोक्षकामा हि देवाः "
- शत ० ना ० ६।१।१।१०-११ ॥
३ -- " हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ” ॥
- यजुः सं ० १३ | ४ | फिर क्या हुआ?, इस का उत्तर है सृष्टिका अनन्त विज्ञान, तत् प्रतिपादक अनन्त शास्त्र, जिनकी कि प्रकृत में तालिका भी उद्धृत नहीं की जा सकती । प्रकरणसङ्गति के लिए केवल यही जान कर सन्तोष कर लीजिए कि, गायत्रीमात्रिकवेदावच्छिन्न सूर्य से रोदसी त्रैलोक्य का विकास हुआ, शनि - मङ्गल - बृहस्पति — पृथिवी आदि उपग्रह उत्पन्न हुए । पृथिवी के त्रिभाग से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ । चन्द्रमा में श्रर्थवसोमवेद का प्रादुर्भाव हुआ । पृथिवी में भूताग्निसम्बन्धी यज्ञमात्रिकवेद ( त्रयीवेद ) का प्रादुर्भाव हुआ । इस वेद मे पार्थिव सम्क्सरयज्ञ उत्पन्न हुआ । यज्ञ से पर्जन्य हुआ, पर्जन्य से वृष्टिद्वारा ओषधि – वनस्पतियाँ उत्पन्न हुई । इनकी आहुति से प्रजोत्पत्ति हुई! इस प्रकार नही मूलवेद इस क्रमधारा से सर्वस्त्र बन गया, सर्वस्व बन रहा है, जिसके कि अनन्त विस्तार की सूची उधृत करना भी असम्भव है । ३६
पृष्ठ 74
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भाष्यभूमिका अब तक बतलाए गए प्रपञ्च से सारग्राही पाठकों को वह निष्कर्ष निकाल लेना चाहिए कि, सहस्र-शायुक्त अश्वत्थमूर्ति महामायी महेश्वर की एक शाखा में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रपा, पृथिवी, ये पाँच तो प्रधान पुण्डीर ( पोर -पर्व ) हैं । पाँचों क्रमशः ब्रह्मनिः श्वसित पौरुषेय ब्रह्मा-निमय मौलिक ब्रह्मवेद, ब्रह्मस्वेद पौरुषेय सोममय यौगिक सुब्रह्मवेद, गायत्री मात्रिक पौरुषेय देवाग्निमय यौगिक सौरवेद, ब्रह्मस्वेदलक्षण अथर्ववेद, एवं यज्ञमात्रिक नामक पौरुषेय भूताग्निमय यौगिक पार्थिववेद, इन पाँच वेदसंस्थाओं से युक्त हैं । पाँचों में स्वयम्भू, सूर्य्य, पृथिवी, ये तीन पुण्डीर क्रमशः ' ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, अनादाग्नि ' से सम्बद्ध रहते हुए अग्निविवर्त्त हैं, एवं तीनों में क्रमशः ब्रह्म निःश्वसितवेदत्रयी, गायत्री-मात्रिकवेदत्रयी, यज्ञमा त्रिवेदत्रयी, इन तीन त्रयीवेदों का ( अग्निवेदों का ) उपभोग हो रहा है । ब्रह्मनिः-श्वसितवेदत्रयी ज्ञानज्योतिः प्रधाना है, प्रतिष्टालक्षणा है, सर्वालम्बन रूपा है । गायत्रीमात्रिकवेदत्रयी भूतज्योतिः-प्रधाना है, उपलब्धिलक्षणा है, यज्ञालम्बन है । एवं यज्ञमा त्रिकवेदत्रयी नामरूपात्मिका सत्यज्योतिः प्रधाना है, प्राप्तिलक्षणा है, यज्ञात्मिका है । परमेष्ठी एवं चन्द्रमा ये दोनों सोम विवर्त्त हैं । दोनों अथर्ववेद हैं । पारमेष्ठ्य सोम ' पवित्रदिक्सोम ' है, इसका सौर अग्निहोत्र से सम्बन्ध है । चान्द्रसोम ' भास्वरसोम ' है, इसका पार्थिव अग्निहोत्र से सम्बन्ध है । सूर्य्यका अन्न परमेष्ठी है, पृथिवी का अन्न चन्द्रमा है, ये चारों इस स्वायम्भुव ब्रह्माग्नि के अन्न हैं । अतएव वह ' सर्वहुत ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है, भूपिण्ड सूर्य्य के चारों ओर, सूर्य्य परमेष्ठी के चारों ओर, एवं परमेष्टी स्वयम्भू के चारों ओर परिक्रमा लगा रहे हैं । स्वयं स्वयम्भू अचल हैं, स्थिर हैं । इसीलिए तो औपनिषद ज्ञान के आचार्यों नें स्वायम्भुव श्रात्मा को ' शान्तात्मा ' कहा है । जब तक वह है, तब तक सम्पूर्ण विश्व है । जिस दिन वह अपने अव्यक्तभाव में आ जायगा, उस दिन ' नेति होवाच ' । शान्ता म लक्षण इसी सत्यम्त्रयम्भू का यशोगान करते हुए मनु ने कहा है-१ - एवं सर्वं स सृष्ट्वेदं मां चाचिन्त्यपराक्रमः । आत्मन्यन्तर्दधे भूयः कालं कालेन पीडयन् ॥ - मनुः ११५१ ॥ २- यदा स देवो जागर्त्ति तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्व निमीलति । ३ - एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं संजीवयति चाजसं प्रमापयति - मनुः ११५२३ ।
चराचरम् ।
चाव्ययः ॥
प्रसङ्गोपात्त बतलाए गए इन वेदविवर्त्ती का आगे सम्बन्ध । अतएव हम पाठकों से अनुरोध करेंगे कि, श्रा -मनुः ११५७॥ बतलाई जाने वाली वेदनिरुक्ति के साथ घनिष्ठ के विषयसमन्वय की दृष्टि से वे इस प्रासङ्गिक वेद-स्वरूप पर पूरा लक्ष्य रक्खें, एवं अपनी इस लक्ष्यसिद्धि के लिए वे निम्नलिखित तालिकाओं पर पू अवधान रखने का अनुग्रह करें-४०
पृष्ठ 75
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेद - लोक - देव - विवर्त्तभावाः-* द्वितीयखण्ड १ –स्वयम्भूः — ब्रह्माग्निः —— ब्रह्मा ( अग्निः — ग्रग्निः २ - परमेष्ठी - पवित्रदिक सोमः - विष्णुः( सामः ) ३ – सूर्य्यः — — देवाग्निः -— इन्द्रः ( अग्निः ) - सोमः ४ — चन्द्रमाः- भास्वरमोम म:: - - सोमः ( सोमः ) श्रग्निः ५. — ब्रुथिवी —— अन्नादाग्निः -- अग्निः ( अग्निः ) ** ( ख ) १ – ब्रह्माग्निः – स्वायम्भुवः — ब्रह्मनिःश्वसितवेदः, अपौरुषेयः ] - मृलवेदः । २ – दिक्सोमः - पारमेष्ठ्यः - ब्रह्मवेदवेद:, पौरुषेयः ३ — देत्राग्निः सौर: --गायत्रीमा त्रिवेदः, पौरुषेयः " ४— भास्वरसोमः - चान्द्रः– ब्रह्मस्वेद वेदः, पौरुषेयः — तुलवेदाः । ५ — अन्नादाग्निः -- पार्थिवः - यज्ञमात्रिक वेदः, पौरुषेयः ( ग ) १ – ब्रह्म निःश्वसितवेदत्रयी - - ज्ञानज्योति ः प्रधान।-सर्वालग्त्रनभृता । ( अग्निवेदः ) | ३ – गायत्रीमात्रिकवेद्ययी — भूतज्योतिः प्रधाना-यज्ञालम्बनभूता । ( अग्निवेदः ) ५ - यज्ञमात्रिकवेदत्रयी— सत्यज्योतिःप्रधाना-यज्ञात्मिका । ( श्रग्निवेदः ) २ — ब्रह्मस्वेदवेदः— ४ - ब्रह्मस्वेदवेद: -* सौरयज्ञस्वरूपसमर्पकः पारमेषः ( सामवेदः ) पार्थिवयज्ञस्वरूपसमर्पक श्वान्द्रः ( सोमवेद: ) सावित्राग्नि के स्वरूपलक्ष्गा की प्रतिज्ञा हुई थी, एवं इस सम्बन्ध में यह कहा गया था कि, सावित्राग्नि का स्वरूपपरिज्ञान सविताप्राणपरिज्ञान पर निर्भर है, एवं सविताप्रागापरिज्ञान ' ग्रहोपग्रह विज्ञान ' पर निर्भर हैं । ४१
पृष्ठ 76
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ग्रहोपग्रहों का थोड़ा स्वरूपपरिचय कराने के अनन्तर ही अनन्तवेद का प्रसङ्ग उपस्थित हो पड़ा, एवं विवश होकर उसकी गाथा गानी पड़ी । अत्र पुनः प्रतिज्ञात उसी ग्रहापग्रहचर्चा की और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है । १४ - प्रतिपद्नुच ( भाव-अनेक उदाहरणों के द्वारा जिन ग्रहोपग्रहभावों का स्पष्टीकरण हुआ था, उनका वेदप्रसङ्ग मे प्रतिपादित पूर्व के स्वयम्भू आदि पर्वो के साथ समन्वय कीजिए, एवं इसी समन्वय के द्वारा मूल लक्ष्यात्मक ' विग्रह ' का अन्वेषण कीजिए, जो कि सावित्रग्रह, किंवा सावित्राग्नि भरद्वाज की वेदतुष्टि का कारगा चना था । पञ्चपर्वा विश्व को हम त्रैलोक्यविज्ञान के अनुसार तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं, एवं उन तीनों महाविभागों को क्रमशः “ भूः भुवः स्वः ” इन नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । ' क्षुद्र विश्व " विश्व का ‘ भू: ' नामक पहिला पर्व है, ' अन्तर्विश्व " विश्व का ' भुवः ' नामक दूसरा पर्व है, एवं ' महाविश्व " विश्व का ' स्वः ' नामक तीमरा पर्व है । महाविश्व विश्वप्रजापति ( पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यचल्शात्मक त्रल्शेश्वर-प्रजापति ) का मस्तकोपलक्षित ' ऊर्ध्वप्रदेश ' है, ग्रन्तर्विश्व विश्वप्रजापति का हृदयोपलक्षित ' मध्यप्रदेश ' है, एवं क्षुद्रविश्व विश्वप्रजापति का पादोपलक्षित ' अधः प्रदेश ' है । ऊर्ध्वप्रदेशोपलक्षित महाविश्व विश्वप्रजापति का ' परमधाम ' है, मध्यप्रदेशोपलक्षित अन्तर्विश्व विश्वप्रजापति का ' मध्यमधाम ' है, एवं अधः प्रदेशांप-लक्षित क्षुद्रविश्व विश्वप्रजापति का ' श्रवमधाम ' है । त्रिधामात्मक, त्रिविश्वात्मक, त्रिमहाव्याहृत्यात्मक, त्रिप्रदेशात्मक विश्व ही उनका शरीर है । परमधाम उसका ' संयतीलोक ' हैं, यही ' स्वलांकि है । मध्यमाम उसका ‘ क्रन्दसीलोक ' है, यही भुवलॉक है । एवं अवमधाम उसका ' रोदसीलोक ' है, यही ' भूलोक ' है । लोकत्रयात्मक इन्हीं तीनों धामों का स्पष्टीकरण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है--१ - इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिहता न्यसीदत् पिता नः । स शिपा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आविवेश ॥ - बजुः सं ० १७/१७ ।
२ – विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।
सं बाहुभ्यां धमति संपतत्र द्यावाभूमी जनवन् देव एकः ॥
- यजुः सं ० १७/११ |
३ - - या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्म्मन्नुतेमा ।
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधा वः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ॥
- यजुः स ० १७! २१ । पञ्चपुण्डीरात्मक, योगमायावच्छिन्न महाविश्व के महा, अन्तः, क्षुद्र भेद से तीन अवान्तर भेद हो जाते हैं । इन तीन अवान्तर विश्वों के क्रमशः " ब्रह्मा, विष्णु, शिव " ये तीन देवता अध्यक्ष हैं । ब्रह्मा संयंती-लोक के सर्वस्व हैं, विष्णु क्रन्दसीलोक के सर्वस्व हैं, एवं शिव रोदसीलोक के सर्वस्व हैं । ब्रह्मा का संयंती ४२
पृष्ठ 77
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड नामक लोक ‘ परमाकाश ' ( परमव्योम ) नाम से, विष्णु का क्रन्दसीलोक ' महासमुद्र ' नाम से, एवं शिव का रोदसीलोक ‘ सम्बत्सर ' नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञानभाषा में इन्हीं को ' वैश्वरूय्य ' कहा गया है । इन विश्वरूपों के ये तीनों अध्यक्ष क्रमशः उत्पादन, पालन, संहारकम्मों के सञ्चालक बन रहे हैं । ' ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ' इन पांच देवताओं के समन्वयतारतम्य से ही उक्त देवत्रयी का विकास हुआ है 1 । स्वयं स्वायम्भुव ब्रह्मा तो एकाकी बनते हुए अपनी महिमा से सर्वाध्यक्ष, अतएव सर्वमूर्त्ति ( पञ्चमूर्ति, किंवा चतुर्मूर्त्ति, अतएव चतुम्मुख ) बन रहे हैं । स्वायम्भुव ब्रह्मा, पारमेष्ठ्य विष्णु, सौर इन्द्र, इन तीनों की समष्टि ही ' विष्णु ' है । सूर्य में इन्द्र का प्राधान्य तो है ही । इसके अतिरिक्त इनमें पारमेष्ठ्य विष्णु भी मुब्रह्मरूप से प्रतिष्ठित हैं । अतएव सूर्य्यसंस्था को हम ' विष्णुसंस्था ' कह सकते हैं । इन्द्र, अग्नि, सोम ( चन्द्र ), इन तीनों ज्योतियों की समष्टि ही ' शिव ' है । पृथिवी में अग्नि तो प्रधानरूप से प्रतिष्ठित है ही । इसके अतिरिक्त इसमें चान्द्र सोम अन्नरूप से, सौर इन्द्र महिमारूप से प्रतिष्ठित है । अतएव पार्थिवसंस्था को हम ' शिवसंस्था ' कह् सकते हैं । इस प्रकार आरम्भ में बतलाए गए तीन विश्वों का क्रमश: - - ' स्वयम्भू, सूर्य्य, पृथिवी ' इन तीन लोकों के साथ समन्वय हो जाता है । स्वयम्भूमण्डल ब्रह्मसंस्था है, सूर्य्यमण्डल विष्णुसंस्था है, एवं पृथिवी— मण्डल शिवसंस्था है | ब्रह्मसंस्था में प्रतिष्ठित ब्रह्मा ज्ञानज्योतिः प्रधान ब्रह्मनिःश्वसितवेद मे युक्त रहते हु ज्ञानप्रवर्तक हैं, जानाध्यक्ष हैं, चित्पति हैं । विष्णुसंस्था में प्रतिष्ठित विष्णु भूतज्योतिः प्रधान गायत्रीमात्रिक-बेद से युक्त रहते हुए क्रियाप्रवर्त्तक हैं, क्रियाध्यक्ष हैं, कर्म्मपति हैं । एवं शिवसंस्था में प्रतिष्ठित शिव सत्यज्योतिः-प्रधान यज्ञामात्रिक वेद से युक्त रहते हुए सत्यात्मक ( नामरूपात्मक ) अथों के प्रवर्तक हैं, अर्थाध्यक्ष हैं, अर्थपति हैं, भूतपति हैं, भूतेश हैं । " नमस्त्रिमूर्त्तय तुभ्यं प्राकूसृष्टेः केवलात्मने । " १- ब्रह्मा ( स्वायम्भुवः ) −२ ब्रह्मा | ब्रह्मा ( १ ) २ – विष्णुः ( पारमेष्ठ्यः ) -२ विष्णुः -- विष्णुः ( २ ) ३ – इन्द्र: ( सौर: ) --- विष्णुः ४ – अग्निः ( पार्थिवः --- | शिवः ५. – सोमः ( चान्द्रः ) —- | शित्रः -१ – ब्रह्मा - प्राणमुखः ] - प्रथममुखः २ -- विष्णुः - श्रब्रूमुग्वः j | द्वितीयमुखः १ ३ – इन्द्रः - वाङ्मुखः ] - तृतीयमुखः ४ — अग्निः - अन्नादमुखः । चतुर्थमुखः --शिवः ( ३ ) - सोऽयं स्वायम्भुवो ब्रह्मा - चतुर्मुखः “ पञ्चमूर्त्तिश्चतुम् त्तिबां ” ( आदिदेवः ) - संयतीलोकाधिष्ठाता-५ -- सोम. - अन्नमुखः ४३ S
पृष्ठ 78
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( १ ) २ - विष्णु: - मुग्वः - पारमेष्टयः ( २ ) ३ -- इन्द्र: -वाङ्मुखः -- सौर: ( १ ) ३ -- इन्द्र: -वाङ्मुखः - सौरः ३ ( २ ) ४ -- अग्निः - ग्रन्नादृमुग्बः - पार्थिवः ( ३ ) ५ -- सोमः - ग्रन्नमुग्वः - चान्द्रः भूाप्यभमिका - सोऽयं सोरो विष्णुद्विमुखः ' “ द्विमूर्तिमुखो वा " ( a:) - क्रन्दगीलोकाधिष्ठाता-- सोयं पार्थिव शिवस्त्रिमुखः “ त्रिमूर्तिस्त्रिनेत्रां बा " ( महो देवः - मत्याँ श्राविवेश ) - रोदसीलोकाधिष्ठाता-ब्रह्मसंस्था विष्णु संस्था शिवसंस्था १ - महाविश्वम् १ – ऊर्ध्वप्रदेशः २ — अन्तर्विश्वम् २ — मध्यप्रदेशः ३ – क्षुद्रविश्वम् ३ – अधः प्रदेशः १ - मस्तकम् १ — परमधाम १ - संयती २ - हृदयम्, ३ - पाद्विभूतिः २ – मध्यमत्राम ३ - श्रवमधाम २ – क्रन्दसी ३ - रोदसी परमाकाशः महासमुद्रः मम्वत्सरः स्वायम्भवः मौरः पार्थिवः ब्रह्मा विष्णुः शिवः ( चतुर्मुखः ) ( द्वि.मुघः ) ( त्रिमुरवः ) ' समुदाये दृष्टा: शब्दा:, अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते ' इस न्याय के अनुसार सहस्रशाखा समष्टिलक्षगा महामायावच्छिन्न, अवयत्री महाविश्वेश्वर का वाचक अश्वत्थ शब्द एकशाखात्मक, योगमायावच्छिन्न, अवयवरूप बल्शेश्वर का भी वाचक माना जा सकता है । तात्पर्य्य महामायी को जैसे अश्वत्थ कहा जाता है, एवमेव तदवयव-भूत एकशाखात्मक, त्रिसंस्थात्मक, विव्याहृत्यात्मक, त्रिप्रदेशात्मक, त्रिधामात्मक, त्रिलोकात्मक, त्रिविश्वरूपात्मक, ४४
पृष्ठ 79
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयखण्ड त्रिदेवात्मक योगमायी बन्शेश्वर को भी ' अश्वत्थ ' कहा जा सकता है, जिसके कि महा केन्द्रलक्षण ऊर्ध्वभाग में ( ब्रह्मसंस्था में ) ब्रह्मा प्रतिष्ठित हैं, मध्यकेन्द्रलन्नण मध्यभाग में ( विष्णुसंस्था में ) विष्णु प्रतिष्ठित हैं, एत्र श्रन्त की शिवसंस्था में शिव प्रतिष्ठित हैं । इसी अवयवात्मक अश्वत्थस्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए आत
पुरुषों ने कहा है-मूलतो ब्रह्मरूपाय, मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रतः शिवरूपोय, अश्वत्थाय नमो नमः ॥
स्वर्लक्षणा संगती, भुवर्लक्षणा क्रन्दसी, भुलक्षणा रोदसी, तीनों लोक त्रिवृद्भाव के कारण भूः भुवः स्वः, इन तीन तीन व्याहृतियों से युक्त हैं, जैसाकि ईशापनिषद्भाष्यादि के सप्तलोकविज्ञान में विस्तार से निरूपित है । रोदसीलोक का भ्रः पृथिवी है, भुवः अन्तरिक्ष है, स्वः सूर्य्य है, तीनों की समष्टि रोदसीत्रिलोकी है, यही शिवात्मक ' भूलोक ' है । क्रन्दसी लोक का भूः समहिम सूर्य है, अन्तरिक्ष भुवः है, परमंत्री स्वः है, तीनों की समष्टि कन्दसीत्रिलोकी है, यही विष्ण्वात्मक भुवर्लोक है । समहिम परमेष्ठी भूः है, ग्रन्तरिक्ष भुवः है, स्वयम्भू स्त्रः है, समष्टि संगतीत्रिलोकी है, यही ब्रह्मात्मक स्वर्लोक है । रोदसी का म्बलक्षण सूर्य का भूलोक है, कन्दमी का स्वर्लक्षण परमेष्ठी मंयती का भूलोक है । अतएव ६ के ७ ही लोक रह जाते हैं | इन सातों में चार सत्यलोक हैं, तीन अन्तरिक्षलोक हैं । तीनों में क्रमशः रुद्रवायु, शिववायु, सूत्रवायु, ये तीन वायु प्रतिष्ठित हैं, जैसाकि परिलेख से स्पष्ट है— १ –स्वयम्भूः ( सत्यलोकः ) ' २ – अन्तरिक्षम ( तपोलोक: ) ग्रन्तग्निम ३- परमेष्ठी ( जनल्लोकः ) ४ - अन्तरिक्षम् ( महलांक: ) ५ – सूर्य्य: ( स्वर्लोकः ) द्यौ: ६ — ग्रन्तरिक्षम् ( भुवर्लोकः ) — अन्तरिक्षम् ७— पृथिवी ( भूलोकः - पृथिवी त्रिलोकी रोदसी ' अन्तरिक्षम भूः पृथिवी त्रिलोकी क्रन्दसी मुत्रः पृथिवी त्रिलोकी संयती सप्तवितस्तिकायात्मक * इस बल्शेश्वर में प्रधानरूप से स्वयम्भू, परमेष्टी, सूर्य, ये तीन प्रतिपत् हैं । पृथिव्यादि सूर्य्यप्रतिपत के अनुचर हैं, सूर्य्यादि परमेष्ठीप्रतिपत् के अनुचर हैं, एवं परमेष्ठादि स्वयम्भू-* क्वाहं तमो महदहं खचराग्निवाभू: संवेष्टिताएड घटसप्त वितस्तिकायः । क्वदृग्विधाविगणिताण्ड पराणुचर्या वाताध्वरोम विवरस्य च ते महिच्वम् ॥ - श्रीमद्भागवत १०।१४।११ । ४५
पृष्ठ 80
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रतिपत् के अनुचर हैं । इन प्रतिपत् - अनुचरभावों का पारस्परिक समन्वय ही विश्वयज्ञस्वरूपसम्पादक अन्नान्नादभाव है, जिसे कि हम ' ग्रहोपग्रहभाव ' भी कह सकते हैं । आरम्भ से इन ग्रहोपग्रहभावों का समन्वय कीजिए, और पता लगाइए कि, जिस सावित्रग्रह के अन्वेषण के लिए उक्त विस्तारक्रम का श्राश्रय लिया गया है, वह किम लोक में प्रतिष्ठित है? लोन, पाषाणदि असंज्ञवर्ग, ओषधि - वनस्पत्यादि अन्तः संज्ञवर्ग, इन दोनों विभागों का संग्राहक, तमोविशाल १ - मूलसर्ग ', २ – कृमि ', ३- कीट १, ४ - पक्षी ', ५ - पशु, ६ - मनुष्य ", पाँच प्रकार वा रजो-विशाल २- मध्यसर्ग ( तिर्य्यकसर्ग ), ७ - पिशाच ', ८ - राक्षस, ६ - यक्ष ', १० - गन्धर्व ४, ११ - पितर ", २ – इन्द्र ', १३ – प्रजापति ७, १४ - ब्रह्म, आठ प्रकार का सत्त्वविशाल ऊर्ध्वसर्ग ( देवसर्ग ), इस प्रकार मम्भूय चतुर्दशविध भूतसर्ग, स्तौम्यत्रिलोकी से सम्बन्ध रखने वाले तीन स्तौम्यलोक, पृथिवी के अदितिभाग में सम्बन्ध रखनें वाले इन्द्रप्रमुख ३३ देवता, दितिभाग से सम्बन्ध रखने वाले वृत्रप्रमुख ६६ असुर, ग्रापः, फेन, मृत्, सिकता, शर्करा, अश्मा, श्रय, हिरण्य, सात धातु, सात उपधातु, सात रस, सात उपरस, सात वित्र, तात उपविष, हविर्यज्ञ, यज्ञमात्रिकबेद, अनुष्टुपूवाक्, मुत्यु, क्षारसमुद्र, ग्रान्दमण्डल, चन्द्रमा, ग्रादि सत्र अनुचर हैं, एवं स्वयं पृथिवी इन सत्र अनुचरों की प्रतिपत् है । प्रतिपल्लक्षणा पृथिवी ग्रह है, इन्द्र है | अनु-चरलक्षण चन्द्रमादि उपग्रह हैं, जनता है । यही ग्रहोपग्रहभाव का पहिला विवर्त्त है । अपने चन्द्रमादि उपग्रहों से युक्त पृथिवीग्रह, बुध, शुक्र, मङ्गल, देवसेना, बृहस्पति, शनि, बे सात ग्रह, ३३ दिव्यदेवता, उपांशु, अन्तर्य्याम, मैत्रावरुण, आादि ४० मौम्यग्रह, सात देवस्वर्ग, ज्योतिः, गौः, आयुः, सहस्र गौभाव, वैश्वानर, कश्यप, गायत्रीमाकिवेद, बृहतीबाकू, मनु, विराट्, अमृत, मृत्यु, अर्गावसमुद्र, मम्बत्सरमण्डल, सावित्री, गायत्री, भर्गतेज, आदि सम्पूर्ण सौरप्रपञ्च अनुचर हैं, इन सत्र अनुचरों की प्रतिपन सूर्य्य है । प्रतिपल्लक्षण सूर्य्य ग्रह है, इन्द्र है । अनुचरलक्षणा पृथिव्यादि जनता है । यही ग्रहोपग्रहभाव का दूसरा विवर्त्त है । अपने पृथिव्यादि उपग्रहों से युक्त सूर्य्यग्रह, बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, सविता, वरुण, सरस्वान समुद्र. सरस्वतीवाक्, आम्भृणीवाक्, ऊर्क, धिष्ण्य अग्नि ( नक्षत्रमण्डलोपलक्षित नाक्षत्रिक अग्नि ), ६६ असुर, २७ गन्धर्व, ८४ पितर, भृगु, अङ्गिरा, त्रि. इटू, ब्रह्मस्वेदवेद, सप्तसमुद्र, गोसवयज्ञ, इत्यादि सम्पूर्ण प्रपञ्च अनुचर हैं, इन सब अनुचरों की प्रतिपत् परमेष्ठी है । प्रतिपल्लक्षण परमेष्ठी ग्रह है, इन्द्र है, अनुचरलन्नण सूर्य्यादि उपग्रह हैं, जनता है । यही ग्रहोपग्रहभाव का तीसरा विवर्त है । अपने सूर्य्यादि उपग्रहों से युक्त परमेष्ठी ग्रह, विश्वकर्मा वाचस्पति, वेदात्मा, सूत्रात्मा अन्तर्यामी, नभस्वान् समुद्र, सत्यावाक, ब्रह्माग्नि, ऋषि, ब्रह्मनिःश्वसितवेद, सर्वहुतयज्ञ, इत्यादि सम्पूर्ण प्रपञ्च अनुचर हैं । इन सब अनुखरों की प्रतिपत् स्वयम्भू है । प्रतिपल्लक्षणा स्वयम्भू महाग्रह है, महेन्द्र है । अनुचरलक्षण परमेष्ठ्यादि महोपग्रह हैं, महा जनता है । एवं ग्रहोपहभाव का यही चौथा विवर्त्त है । इन चार विवर्तों में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, ये तीन विवर्त्त ही मुख्य माने गए हैं । इन तीनों के पूर्णगणना के अनुसार अवान्तर, प्रत्यवान्तर भेटों को लेकर असंख्य ग्रहोपग्रह हो जाते हैं । किन्तु विषय-४६