Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 81–90
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90
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द्वितीयखण्ड समन्वय की दृष्टि से हम यहाँ क्रमशः तीनों ग्रहों के १८, १३, ६, इन उपग्रहों को प्रधानता देंगे । बुध ', शुक्र ', चन्द्रमा ', ये तीन अन्तर्ग्रह, पृथिवी ' नामक मध्यग्रह, मङ्गल, बृहस्पति, शनि ', ये तीन बहिर्ग्रह, देवसेना ' नामक सान्ध्यग्रह, ये आठ ग्रह सूर्य के मुख्य उपग्रह हैं । सूर्य्य इन की प्रतिपत् है, इन्द्र है, ग्रह है, यही पहिला ग्रहोपग्रहविवर्त्त है । बुध ', शुक्र ', चन्द्रमा ', पृथिवी ', मङ्गल ", देवसेना ', बृहस्पति, शनि, ये आठ सूर्य्या-पग्रह, सूर्य, बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति ", सविता, वरुण 3, ये तेरह उपग्रह् परमेष्ठी के मुख्य उपग्रह् हैं । परमेष्टी ही इन की प्रतिपत् है, इन्द्र है । यही दूसरा ग्रहोपग्रहत्रिवर्त्त है । बुध ', शुक्र, चन्द्रमा ', पृथिवी, मङ्गल ", देवसेना ', बृहस्पति, शनि ', सूर्य ', बृहस्पति ब्रह्मणस्पति ' ', सविता ' ३, वरुण ' ', ये तरह पारमेष्ठ्य उपग्रह, परमेष्ठी ४, विश्वकर्मा वाचस्पति ५,, वेदात्मा ' ', सूत्रात्मा ' ', अन्तर्यामी १८, ये अठारह उपग्रह स्वयम्भू के मुख्य उपग्रह हैं । स्वयम्भू इन की प्रतिपत् है, इन्द्र है, ग्रह है । यही तीसरा ग्रहोपग्रह विवर्त्त है । अठारह उपग्रहों से युक्त एकोनविंश स्वयम्भूब्रह्म ने ऋतसत्यात्मक * सूत्रात्मा नामक उपग्रह के द्वारा ऋतसत्यात्मक सम्पूर्ण विश्व में, विश्वान्तर्गत ऋत उपग्रहों, एवं सत्योपग्रहों को, सबको अपने आप में हुन कर रक्खा है, एवं इन्हीं दोनों सूत्रों के द्वारा स्वयं भी सच में हुत हो रहा है । अपने अनन्त सोपाधिरूपों से प्रवर्ग्यरूपों से साक्षात्, एवं परम्परया यही ब्रह्म जहाँ परमेष्ठी त्रादि उपग्रहरूपों में परिणत हो रहा है, वहाँ अपने ही समष्ट्यात्मक आभूरूप से यही इन सत्र उपग्रहों का अन्नादलक्षण महाग्रह भी बन रहा है । उपग्रहा-वच्छिन्न ( विश्वावच्छिन्न ) यही महाग्रह सर्वाहुति के द्वारा ' सर्वहुतयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, जिस प्लव ( संसरणशील, परिवर्तनशील, अतएव उत्पत्तिविनाशशाली, अतएव च दृढ ) यज्ञ के वैज्ञानिकों ने अटारह पर्व माने हैं X | सच में अपनी, सत्र की आप में आहुति देने वाले महामहिम, सर्व द्रुत यज्ञलक्षण स्वयम्भूब्रह्म के इसी अगम्य चरित्र का दिग्दर्शन कराते हुए वेदभगवान् ने कहा है— " ब्रह्मवै स्वयम्भू ततोऽतप्यत । तदैक्षत - न वै तपस्यानन्त्यमस्ति । हन्नाहं भतं-ब्वात्मानं जुहवानि, भूनानि चात्मनि, इति । तत् सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुन्वा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रष्ठ्य ं 9 स्वाराज्यं, आधिपत्यं पय्र्खेत् ” । - शत ० ब्रा ० १३ | ७ | १ | १ |
न मा मर्त्यः कश्वन दातुमर्हति विश्वकर्मन् भौवन मन्द आसिथ ।
उपमङ्क्ष्यति स्या सलिलस्य मध्ये ममैष ते सङ्गरः कश्यपाय ॥
- शत ० ना ० २३।७।१।१५ ।
* सत्यत्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य सत्यं ऋतसत्यनेत्रम् ।
सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥
- श्रीमद्भागवत
× प्लवा ह्य ेते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यु ं ते पुनरेवापि यन्ति ॥
- मुडकोपनिषत् १२२ / ७ / ४७
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भाष्यभूमिका ग्रहोपग्रह भावपरिलेखः ( अष्टादशोत्तमवरं येषु कर्म ) -४ * स्वयम्भूः “ ब्रह्मा " - परोरजाः श्रानृप्रजापतिः परमः परस्तात् - ' “ ब्रह्मनिःश्रसितवेदमूर्त्तिः ' अन्तर्यामी - नियतिः सत्यम् — ब्रह्मदण्डः शास्ता - " बोऽन्तस्तिष्ठन् सन्नियमयति सर्वान् ” सूत्रात्मा — सूत्रं सत्यम् — दण्ड प्रसारसाधकः - " ऋतं सत्येऽधायि, सत्यं ऋतेऽधायि " वदात्मा - वेदाः सत्यम् — विश्वकाय्यपादानभूतः - " ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा " वाचस्पतिः - वेदवाक्प्रवर्त्तकः विश्वनिमित्तकारण भूतः -- " वाचरपति विश्वकर्माणमृतये " १ III * परमेष्ठी “ विष्णुः ” – रजः प्रवर्त्तकः, प्रतिभा प्रजापतिः, “ प्रजापतिः - " ब्रह्मश्वेदवेदमूर्त्तिः * वरुणः - श्रमुराधिपतिः, बलप्रदः, संवरगाधर्म्मा, पाशप्रवर्तको मृत्युः - " शनाया हि मृत्युः २ सविता - प्र रकः सर्वेषां चराचरभावानां प्रसविता -- " सविता वै देवानां प्रसविता " ३ ब्रह्मणस्पतिः - पवित्रतमो गाङ्गं यसोमः पावको विशोधकस्त भावानाम - " पवित्रं ते विततम् " ४ | “ बृहस्पतिः " - वाकूपतिर्वाङ्मयो वाजपेयाध्यक्षो ब्रह्मबल प्रतिष्ठाभूमिः'ब्रह्मपतिः पूर्वंशमुत्तमो भवतिः १० ५. * सूर्य्यः “ इन्द्र ४ ” रजोमूर्त्तिः, प्रतिमा प्रजापतिः, हिरण्यगर्भः - ' गायत्री मात्रिक वेदमूत्तिः " ६ १ शनैश्चर: - श्राङ्गिरसः, सत्यवाङ्मयः, वाक्शक्तिप्रदः ( इन्द्र उत्तरंगां प्रथमः ) ७ ८ १० ११ १२ ६ = | १२ २ बृहस्पतिः - अ।ङ्गिरसः, सत्यवाङ्मयः, वाक्शक्तिप्रदः ३ | देवसेनाग्राः- भृग्वङ्गिरोमयाः, सोमाग्निमयाः, असुर प्राणविघातकाः मङ्गलः - अङ्गिरसः, ग्राग्नेयवायुघनो भौमः शोणिताध्यन्ः सेनानी - श्रङ्गिरम बहिर्ग्रहाः वायुप्रधानाः ' ३. * पृथिवी ' अग्निः " तमोमृर्तिः, प्रतिमाप्रजापतिः, इरागर्भ:,, " " यज्ञमात्रिकद मूत्तिः " । ६ * चन्द्रमा: - ' सोम ': " तमोघनः, प्रतिमाप्रजापतिः, भृगर्भः, " अथर्ववेदमूत्तिः " ५ । . 6 शुक्रः, भार्गव सौम्य वायुघनः, शुक्रयध्यक्षः बुधः, भार्गवसौम्य वायुमयः कुमारो झञ्झावातप्रवर्त्तकः -:: अन्तर्ब्रह प्रधान भावनायु वायुः
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द्वितीयखण्ड १५ - सावित्राग्नि का स्वरूपलक्षण-पूर्व प्रदर्शित ग्रहोपग्रहपरिलेख से यह स्पष्ट हो रहा है कि ' सविता ' नामक ग्रह सूर्य्यसंस्था से ऊपर पारमेष्ठ्य मण्डल में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' परमेष्ठी ' नामक दूसरे ग्रह का दूसरा उपग्रह है । परमेष्ठी के उपग्रहों में पहिला स्थान वरुण का है, दूसरा स्थान सविता का है, तीसरा स्थान ब्रह्मणस्पति का है, चौथा स्थान बृहस्पति का है । यह बृहस्पति पूर्वभावों का अन्तिम भाव है । तात्पर्य यह है कि चन्द्रमा, पृथिवी, सूर्ख, इन तीनों की समष्टि ‘ उत्तरविश्व ' ( मर्त्मविश्व ) कहलाता है । एवं अमृतसूर्य्यगर्भित परमेष्ठी, स्वयम्भू, इन दोनों की समष्टि ' पूर्व विश्व ' ( अमृत विश्व ) कहलाता है । पूर्व विश्व की अन्तिम सीमा में ( उपसंहार में ) वाकपति ' बृहस्पति ' प्रतिष्ठित है, एवं उत्तरविश्व की आदि सीमा में ( उपक्रम में ) सूर्य्योपलक्षित ' इन्द्र ' प्रतिष्ठित जैसाकि -- “ बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः " इत्यादि निगमवचन से स्पष्ट है । यह बृहस्पति ' लुब्धकवन्धु ' नामक लुब्धक समीपवर्त्ती नाक्षत्रिक बृहस्पति से, एवं शनैश्चर से अधोभाग में रहने वाले ‘ देवानां पुर एता ’, देवपुरोधा, सुप्रसिद्ध बृहस्पतिग्रह, दोनों से भिन्न तत्त्व है | लुब्धकबन्धु, तथा बृहस्पति-दोनों का जहाँ रोदसी त्रैलोक्य में अन्तर्भाव है, वहाँ इस वाकूपति, पारमेष्ठ्योपग्रहलक्षण बृहस्पति का ग्रह, क्रन्दसी त्रिलोकी से सम्बन्ध है । इस बृहस्पति से ऊपर ब्रह्मणस्पति है, जिसका कि सरस्वतीवाक् से घनिष्ठ सम्बन्ध है, जो कि सरस्वतीवाक् सर्वप्रथम बृहस्पति में अवतीर्ण होती है, जिसके कि समन्वय से बृहस्पति का बृहस्पतित्त्व चरितार्थ होता है । ब्रह्मणस्पति से ऊपर सुप्रसिद्ध ' सचिताग्रह ' है । इसी: सविता की प्रेरणा से सरस्वती का बृहस्पति में आगमन होता है । न केवल सरस्वती का ही, अपितु त्रैलोक्यत्रिलोकीरूप महाविश्व में रहने वाले यच्चयावत् जड़ - चेतन पदार्थों का आदान- विसर्गात्मक, स्थितिस्वरूप संरक्षक ग्रहरहर्यज्ञ ' ( भैषज्ययज्ञ ) इसी सविताप्र ेरणा पर निर्भर है । बिना सविता की प्रेरणा के सृष्टि के किसी कार्य का सञ्चालन नहीं हो सकता, जैसा कि, निम्नलिखित निगमवचनों से स्पष्ट है --१ - " सविता वै देवानां प्रसविता " ( शतः ११११२।१७ ) । २ – “ सविता वै प्रसवानामीशे " ( ऐत ० वा ० १।३० । ) । ३ – “ सविता सर्वस्य प्रसवमगच्छत् " ( ताण्ड्यम ० त्रा ० २४।१५।२३ ) -४ - " तद्वै सुपूतं, यं देवः सविता पुनातु " ( शत ० ना ० ३।१।३।२३ । ) । ५ – ' सवितृप्रसूतं वा इदमन्नमद्यते " ( कौ ० ब्रा ० १२८ । ) । रहस्यात्मक वैदिक तत्त्वों का यथावत् परिचय प्राप्त कर लेना परिभाषाज्ञानानतर जहाँ सुगमतम है, वहाँ परिभाषापरिचय के बिना इनका समन्वय कर लेना सर्वथा असम्भव है । प्रकृत प्रकरण का ' सविता ' तत्त्व भी इस रहस्य से वञ्चित नहीं है । और जब हम यह देखते हैं कि, अग्नि, वायु, सूर्य्य, चन्द्रमा, बेद, पृथिवी, अहः, पुरुष, प्राण, पशु, आदि अनेक पदार्थ ' सविता ' कहलाते हैं, तो यह रहस्यवाद और भी अधिक जटिल बन जाता है । अवश्य ही किसी ऐसी परिभाषा का अन्वेष करना पड़ेगा, जिसके आधार पर हम सविता का कोई एक निश्चित अर्थ कर सकें, एवं उस निश्चित अर्थ का निम्नलिखित परस्पर विरोधी सभी अधिकरणों के साथ निर्विरोध समन्वय सम्भव बन सके । ४६
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भाष्यभूमिका १ - मनो वै सविता ( शतः ६ ३ | १ | १३ | ) | २ - वेदा एव सविता ( गौ ० ० पू ० १ | ३३ | ) | ३ - प्राणो वै सविता ( ऐ ० वा ० १।१६ । ) । ४ - पुरुष एव सविता ( जै ० उ ० ब्रा ० ४।२७ | १७ | ) | ५- । दित्य एव सविता ( गो ० ब्रा ० पृ ० १।३३ । ) । ६- एष वै सविता, य एष ( सूर्यः ) तपति तैः ब्रा ० ३।१ ९ ।६।१५८ ) । ७ - प्रजापतिर्वै सविता ( ताण्ड्यः त्रा ० १६ ५ १७। ) । ८ - वरुण एव सविता ( जै ० उ ० ना ० ४।२७ | ३ | ) | - श्रग्निरेव सविता ( गोः बा ० पू ० १ | ३३ | ) 1 १० - वायुरेव सविता ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ । ) । ११ - चन्द्रमा एव सविता ( गो ० ब्रा ० पृ ० १।३३ । ) । १२- यज्ञ एव सविता ( गो ० ना ० पू ० १ | ३३ | ) | १३ - इगं वै सबिता ( शतः १३।१।४।२ । ) । १४ - विद्युदेव सविता ( गो ० पू ० १।३३ ) । १५ - हरेव सविता ( गो ० पू ० १।३३ । ) । १६ - पशवो वै सविता ( शत ० ३।२।३।११ । ) । १७ - उष्णमेव सविता ( गो ० पू ० १।३३ । ) । १८ - यकृत् सविता ( शत ० १२।६।१।१५ । ) । “ यन्मध्यत प्राणानैन्द्व ” यही सविता शब्द की सामान्य परिभाषा मानी जायर्ग ॥ जी तत्व, जो प्राण, मध्य में ( गर्भ में ) उक्थरूप से प्रतिष्ठित होकर अपने अर्कभाव से वस्तु को कर्म्मविशेष में प्रेरित करता है, किंवा जिस हृदयस्थ तत्त्व की प्रेरणा से हृदयावच्छिन्न वस्तु ग्रहरहर्यज्ञ में प्रवृत्त होती है, प्रेरणा का, कर्म्मप्रसूति का अधिष्ठाता वही हृदयस्थ तत्व ' सविता ' कहलाता है । एवं जिसके आधार पर इसकी यह प्रेरणा स्थूलक की सञ्चालिका बनती है, वह आधारभूमि, प्रेरणाद्वार सावित्री कहलाती है । जहाँ सविता रहेगा, वहाँ सावित्री अवश्य ही रहेगी । सावित्री से युक्त सविता ही पक्षपुच्छ ' सावित्राग्नि ' कहलाएगा । इस सावित्राग्नि-के सम्बन्ध में सामान्य परिभाषा का विचार करते हुए ' मध्यभाव, प्रेरणाभाव ' इन दो सामान्य कम्मों का विशेषरूप से अनुगमन करना पड़ेगा । और इन दोनों सामान्य धम्मों को लक्ष्य में रख कर ही सावित्राग्नि के पूर्वोक्त विविध विवर्तों का समन्वय करना पड़ेगा । ५०
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द्वितीयखण्ड सर्वप्रथम सहस्रत्रल्श मूर्ति, महामायावच्छिन्न श्वत्थपुरुष को ही अपना लक्ष्य बनाइए । अश्वत्थ-पुरुष अव्ययात्मना महामायापुर के केन्द्र में उक्थरूप से प्रतिष्ठित है । यह अव्यय पुरुष मनोमय है, भारूप है, सत्य संकल्प है, सत्यकाम है, नित्यकाम है । यही मन ' श्वोवसीयस् ' नाम से प्रसिद्ध है । ' कामस्तदग्रे समव-तनाधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ( ऋ १०।१२६।४ ) इस वर्णन के अनुसार इसी केन्द्रस्थ श्वोवसीयस् रुपमन से कामना का उदय होता है । काममयी प्रेरणा, किंवा काममय संकल्प की मूलभूमि यही पुरुषमन है । अतएव इस पुरुषमन को हम अवश्य ही उक्त सामान्य परिभाषा के अनुसार ' सविता ' कह सकते हैं । वाक् ही इस प्ररणा का द्वार बनती है, अतएव वाक् को अवश्य ही सावित्री कहा जा सकता है । पक्षपुच्छलक्षण ( अमृतलक्षण ) यही सविता -सावित्री युग्म सर्वभूलभूत प्रथम सावित्राग्निविवर्त्त ' है । इस पुरुष के ग्रव्यय, अक्षर, क्षर, तीन विवर्त हैं । तीनों में अक्षर मध्यस्थ है । स्वक्रियाभाव मे यही विश्वकर्मका सञ्चालक चन रहा है । इसकी इस प्रेरणा का द्वार अर्थमूर्त्तिक्षर बन रहा है । मनोमय अव्यय चालम्बन है, इस पर प्राणमूर्ति अक्षर प्रतिष्ठित है, यही सविता है । वाङ्मय अर्थमूर्ति दर इस अक्षरप्रेरणा का ( प्राणव्यापार का ) द्वार बनता हुआ सावित्री है, यही सावित्राग्नि का दूसरा विवर्त्त है । तीनों विवर्तों में से प्रत्येक का विचार कीजिए । आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाङ्मय अध्यय-पुरुष का मध्य भाग ' मन ' है, यही सविता है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोममय अक्षरपुरुष का मध्य भाग ' इन्द्र ' है, वही सविता । प्राण, आपः, वाकू, अन्नाद, अन्नमय क्षरपुरुष का मध्यभाग ' वाकू ' है, यही सविता है । ‘ मध्यत ऐन्द्ध ' के अनुसार मध्यस्थ अव्यय मन, मध्यस्थ अक्षुरेन्द्र, मध्यस्था क्षुरवाक्, तीनों इन्द्र हैं । अतएव मन को भी इन्द्र कहा जाता है, प्राण भी इन्द्ररूप से उपस्तुत है, एवं वाक् भी इन्द्ररूप मे उपवर्णित है । और इस इन्द्रव्यवहार का एकमात्र कारण ' मध्यत ऐन्ड ' भाव ही है । देखिए! १ - " हृदयमेवेन्द्रः " ( शत ० १२।६।१।१५ । ) । २– “ यन्मनः स इन्द्रः ” ( गो ० पू ० ४ । ११ । ) । ३– “ वाग्वा इन्द्रः ” ( कौ ० ब्रा ० २२७ ) । ४ -- “ अथ य इन्द्रः, सा वाक् " ( जै ० उ ० ब्रा ० १ | ३३ | २ | ) | त्र एकच शेश्वर, योगमायावच्छिन्न विश्व के अधिपति की दृष्टि से उन्हीं सामान्य परिभाषाओं को लक्ष्य में रखते हुए सावित्रग्रह का अन्वेषण कीजिए । पहिले व्यष्टिदृष्टि से देखिए । स्वयम्भू ब्रह्म को वेदमूर्ध्नि बतलाया गया है । इस वेदमूर्ति स्वयम्भू का वेदभाग ' ऋक - यजुः साम ' भेद से तीन भागों में विभक्त है । तीनों में मध्यस्थ ' यजु ' है, जिसके कि यत्, जू, दो भाग हैं । यत् प्राण है, जू वाक् है । प्राण वायु है, आकाश है, दोनों की समष्टि ' मध्यत ऐन्द्ध ' के अनुसार इन्द्र है, इन्द्र ही सविता है, यही यजु है, यही सर्वसृष्टि-प्रवर्तक है, ऋक साम इसके छन्दोरूप अश्व हैं । देखिए!
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( इन्द्रः ) - प्राण: ( इन्द्रः ) - वाकू ( इन्द्रः ) वायुः भाष्यभूमिका १ - " प्राण एवेन्द्र: " ( शत ० १२ | ६ | १ | १४ | ) | २- “ स योऽयं मध्ये प्राणः, एष एवेन्द्रः " ( शत ० ६ । १ । १ । १।२ । ) । १-- " इन्द्रो वागित्युवाऽहु: " ( शत ० १ | ४ | ५ | ४ | ) { २ - " वागिन्द्रः " ( शतः ८।७।२।६ । ) । १ -- " यो वै वायुः, स इन्द्रः, य इन्द्रः, स वायुः " ( शत ० ४।१।३।१६ ) । २- अयं वा इन्द्रो योऽयं पवते " ( शत ० ३२६ । ४ । २४ । ) । १ - " स यस्स आकाश:, इन्द्र एव सः " ( जै ० उ ० ना ० ११२८ | २ | ) | ( इन्द्रः ) आकाशः २ -- “ स यस्स आकाशः, आदित्य एव सः " ( जै ० उ ० ब्रा ० १२५ | २ | ) | १ - " ऋक्सामे वै इन्द्रस्य हरो " । ऐतरेयत्रा ० २।२४ । ) । अत्र वरुण नामक परमेष्ठी मण्डल का विचार कीजिए । आपोमय परमेष्ठी में वरुण, सविता, ब्रह्मा-स्पति, बृहस्पति, ये चार उपग्रह प्रधान माने गए हैं । चारों में वरुण क्योंकि ग्रापोमय पारमेष्य समुद्र के केन्द्र में प्रतिष्ठित है, अतएव वरुण को ' मध्यत ऐन्द्ध ' के अनुसार अवश्य ही इन्द्र कहा जा सकता है । दूसरा सविताग्रह वरुणात्मक इसी इन्द्र का द्वितीयावतार है । प्रथमावस्था वरुणा है, द्वितीयावस्था सविता है । मध्य भागस्थ वरुण के इसी इन्द्रत्त्व का स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि कहते हैं— १ - - इन्द्रो वै वरुणः, स उ वै पयोभाजनः ( गो ० ब्रा ० उ ० ११२२२ ) । कैसा आश्चर्य है । इन्द्र और वरुण का सहज वैर माना जाता है । इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल हैं, तो वरुण पश्चिम दिशा के । इन्द्र ज्योति के अध्यक्ष हैं, तो वरुण तम के । और यहाँ वरुण को इन्द्र कहा गया है । इस कथन का एकमात्र आधार ' मध्यत ऐन्द्व ' ही है । जो मध्यस्थ होगा, फिर वह अग्नि हो, वायु हो, सोम हो, पुरुष हो, पशु हो, अवश्य इन्द्र कहा जायगा, जो कि यह इन्द्रभाव वरुणशत्रु इन्द्र विशेष से सर्वथा-पृथक है । तीसरा हिरण्यगर्भात्मक सूर्य्यमण्डल है । सौर प्राण साक्षात् इन्द्र हैं, यही इस मण्डल का सविता है । क्योंकि वह मण्डल हिरण्मय है, अतएव सवितात्मक इस सौर इन्द्र को हिरण्यपाणि कहा जाता है – “ तस्मात ( सविता ) हिरण्यपाणिरिति स्तुतः " ( गो ० ब्रा ० उ ० १ २ | ) । इसी प्रकार पृथिवीगर्भस्थ गायत्राग्नि इसी मध्य मर्य्यादा से इन्द्र कहलाया है, जैसा कि - " तर्हि हैप ( अग्निः ) भवतीन्द्रः " ( शत ० २।३।– २११ ) इत्यादि वचन से स्पष्ट है । यही स्थिति समष्टयात्मक चल्शेश्वर की समझिए । पञ्चपर्वात्मक विश्व के केन्द्र में सूर्य्य प्रतिष्ठित है, अतएव सूर्य्य को भी इन्द्रात्मक सविता मान लिया गया है । यज्ञ भुवन की नाभि ५२
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है, इसलिए यज्ञ को सविता कह दिया गया है । प्रजापति प्रत्येक पदार्थ के गर्भ में प्रतिष्ठित है, इसलिए प्रजापति को सविता मान लिया गया है । पार्थिव सम्वत्सर का केन्द्र पृथिवी ( भूपिण्ड ) है, अतएव इसे सविता मान लिया गया है । गर्भभूत त्रयीवेद से ही विश्वप्रवृत्ति हुई है, इसलिए वेदों को सविता पान लिया गया है । चान्द्रसम्वत्सर का केन्द्रभूत चन्द्रमा भी सविता माना जा सकता है । यही क्यों, सम्पूर्ण विश्व के सम्पूर्ण पदार्थ व्यष्टि, तथा समष्टि रूप से उभयथा इस सवितृ - मर्यादा से आक्रान्त हैं । मध्यस्थ प्राण की अपेक्षा से सभी सबिता हैं, इनसे निकलने वाली प्रेरणात्मिका ऋजुरश्मियाँ सावित्री हैं । एवं सविता तथा सावित्री का समन्वित रूप ही सावित्राग्नि है । इस सावित्राग्नि का मूल हमारे वल्शात्मक विश्व में स्वायम्भव ब्रह्मनिःश्वसित वेद ही माना जायगा । ऋक्साम - यजुर्म्मय वेद का मध्यस्थ यजुः प्राण ही सर्वप्रेरक बनता हुआ सावित्राग्नि माना जायगा, इसी को हम आत्माग्नि कहेंगे । इसी के परिज्ञान से अनन्तवेद परिज्ञात बनेगा, इसी के अनुगमन से अमृतत्त्व की प्राप्ति होगी । हमारे रोदसी ब्रह्माण्ड मध्यस्थ सूर्य्य के द्वारा ही आत्मलक्षण इस सावित्राग्नि, किंवा वेदाग्नि की उपासना करते हुए हम अमृतत्त्व के अधिकारी बनेंगे । क्योंकि “ सूर्य्य, आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ” इस मन्त्र-वर्णन के अनुसार यही हमारे आध्यात्मिक सावित्राग्नि की प्रतिष्ठा बना हुआ है, जैसा कि, – “ योऽसावादित्ये पुरुषः- सोऽहम् ” इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । क्योंकि हमारा उपकारक यही सौर सावित्राग्नि बनता है, अतएव आगे जाकर ( हमारी अपेक्षा से ) सूर्य को प्रधानतः सविता मान लिया गया है । इस प्रधानता का एक कारण यह भी है कि, सौरसविता क्योंकि विश्व के मध्य में प्रतिष्ठित है, अतएव यह ऊर्ध्वस्थित अमृत-भाव का भी अनुग्राहक है, एवं अधोऽवस्थित मृत्युभाव का भी संग्राहक है । सूर्य्यलक्षणा उद्गीथोपासना से ओङ्कारोपासना गतार्थ हो जाती है । पाठकों को स्मरण होगा कि, भरद्वाजाख्यान में सावित्राग्नि के द्वारा ब्रह्म, प्रजापति, बृहस्पति, इन्द्र, वायु, अग्नि, इन ६ औं देवताओं के साथ सायुज्यप्राप्ति बतलाई गई थी । अत्र यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं रह गई है कि, ये ६ त्र देवता कौन कौन हैं?, एवं इनका सावित्राग्नि से क्या सम्बन्ध है? | ब्रह्म स्वयम्भू है, इसका ब्रह्मनिःश्वसित नामक स्वायम्भुववेद के साथ सम्बन्ध है । प्रजापति परमेष्ठी है, इसका ब्रह्मस्वेद नामक बारमेष्ठ्य वेद से सम्बन्ध है | बृहस्पति पूर्वेषामुत्तमः है, यह इन दोनों वेदों का सौर संस्था में समन्वय करते हैं । इन्द्र सूर्य्य है, इसका गायत्रीमात्रिक नामक सौरवेद से सम्बन्ध है । वायु अान्तरिक्ष्य चान्द्र भार्गव तत्त्व है, इसका अथर्व नामक चान्द्रवेद से सम्बन्ध है । एवं अग्नि पृथिवी है, इसका यज्ञमात्रिक नामक पार्थिववेद से सम्बन्ध है | पृथिवी ', चन्द्रमा, सूर्य्य ', परमेष्ठी, स्वयम्भू ", पाँच पुर हैं, बिएड हैं । अग्नि ', वायु ', ( भार्गव सौभ्यवायु ), इन्द्र, प्रजापति, ब्रह्म ", ये पाँचों क्रमशः पाँचों के पाँच अध्यक्ष हैं, प्रतिष्ठावा देवता हैं | यज्ञमात्रिक ', अथर्वा ', गायत्रीमात्रिक, स्वेदवेद, ब्रह्मनिःश्वसित ', ये पाँचों क्रमशः पाँचों के वेद हैं । ६ ठे पारमेष्ठ्य बृहस्पति अमृतवेद ( ब्रह्मस्वेद ० ) का मर्त्यवेद ( गा ० अथ ० के यज्ञ ० ) साथ समन्वय कराने वाले हैं । एवं पर्वा इस महामहिम वेदसंस्था के एकमात्र अनन्त अधिष्ठाता सावित्राग्नि हैं, जिनके कि उत्पत्तिमूलासृष्टि के अनुसार स्वयम्भू मूल माने जायँगे, एवं स्थितिमूलादृष्टि के अनुसार विश्वमध्यस्थ ग्रादित्यदेवता मूल माने जायँगे । इस अमृतलक्षण, मध्यस्थ, सावित्राग्नि के परिज्ञान से सम्पूर्ण वेदसंस्था गतार्थ हो जाती है । यह अग्नि क्योंकि प्राणाग्नि है, अमृतरूप है, अतएव इसे ' पक्षपुच्छ्रविधः ' ५३
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भाष्यभूमिका कहना ही अन्वर्थ बनता है । इसी श्रात्मविध सावित्राग्नि को सामने रखते हुए इन्द्र ने भरद्वाज की वेदतृष्णा शान्त की थी । इसी सावित्राग्नि की सर्वव्याप्ति के परिज्ञान- द्वारा भरद्वाज ने अग्निवाश्विन्द्रबृहस्पतिप्रजापति ब्रह्म नामक ६ देवताओं के साथ, एवं पञ्चधा विभक्त वेदों के साथ भरद्वाज ने सायुज्यभाव प्राप्त किया था । और सावित्राग्नि को लक्ष्य में रख कर मरद्वाजाख्यान के उपक्रम में हमने कहा था कि, इस आख्यान से मौलिक वेद का बुद्धिग्राह्य स्वरूप भलीभांति स्पष्ट हो रहा है, अतएव भरद्वाजाख्यान उद्धृत किया जाता है । लक्ष्य पूरा हुआ, अब इस सम्बन्ध में केवल एक बात जान लेना और शेष रहा है 1 कठोपनिषत् में सुप्रसिद्ध ' नचिकेता - यमोपाख्यान ' आता है । वहाँ नचिकेता यमराज से अमृत-प्राप्तिलक्षण स्वर्ग्य अग्नि की जिज्ञासा करता है । एवं यमराज ' यावतीर्वा यथा वा ' ( कठोपनिषत् १ | १ | १५३ ) कहते हुए इष्टकाओं से सम्बन्ध रखने वाले चयनयज्ञ का स्वरूप बतलाते हुए स्वर्ग्याग्नि का परोक्षभाषा में स्पष्टीकरण करते हैं | वहाँ का स्वर्ग्याग्नि, एवं यहाँ का सावित्राग्नि, दोनों एक वस्तु है । वहाँ नचिकेता, यम के व्याज से ऋषि ने ( कट ने ) ' त्रिणाचिकेताग्नि ' नाम से इसका स्पष्टीकरण किया है, एवं यहाँ ' भरद्वाज, तथा इन्द्र के व्याज से ऋषि ने ( तित्तिरि ने ) ' सावित्राग्नि ' नाम से इसका स्वरूप स्पष्ट किया है । उद्देश्य दोनों हीं ग्राख्यानों का यही है कि, त्रयोविद्या, एवं त्रयीविद्या से सम्बन्ध रखने वाला कर्म्म-काण्ड यदि केवल प्रवृत्ति - प्रधान है, तो यह विद्यासापेक्ष बनता हुआ भी विद्यानिरपेक्ष बन जाता है, एवं उस दशा में इसका फल अशाश्वत हो जाता है । यदि प्रवृत्तिभाव हटा लिया जाता है, तो यही कम्म अभ्युदय निःश्रेयस्, दोनों सम्पत्तियों की प्राप्ति का कारगा बन जाता है । आत्मदृष्टि से कर्त्तव्यबुद्धि से किया हुआ क आत्मार्थ बनता हुआ यज्ञार्थ है, परार्थ है एवं ' यज्ञार्थात् कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्मबन्धन ' के अनुसार यह कर्म्म ' सर्वथा बन्धन है । इस अवन्धनकर्म्मा ' की प्रतिष्ठा आत्मा है, आत्मा की प्रतिष्ठा सावित्राग्नि है, सावित्राग्नि की प्रतिष्ठा सौरवेद है, सौरवेद का मूल स्वायम्भुव ब्रह्मनिः श्वमितलक्षण, ज्ञानज्योतिर्धन मध्यस्थ यजुर्वेद है, और यही मुख्य सावित्राग्नि है, जिसके कि स्पष्टीकरण के लिए हमें ग्रहोपग्रहविज्ञान का श्राश्रय लेना पड़ा । जो इस सावित्राग्निमूर्ति ग्रात्मा को, वेदाग्नि को नहीं जानता, वह अग्निमुग्ध है, धूमान्त है । वह अपने स्वरूपज्ञान से बञ्चित होता हुआ आत्मलक्षण अमृतलोक से वञ्चित है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर महर्षि ने कहा है-कश्चिद्ध वा अस्माल्लोकात् प्रत्य, आत्मानं वेद - प्रयमहमस्मि ' इति । कश्चित् स्वं लोकं न प्रतिप्रजानाति । अग्निमुग्धो हैव धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिप्रजानाति । अथ यो तमग्निं सावित्रं वेद, स एवास्माल्लोकात् प्र ेत्य - आत्मानं वेद - ' अयमहमस्मि ' इति । स स्वं लोकं प्रतिप्रजानाति । एप उ चैवैनं तत् सावित्रः स्वर्गं लोकमभिवहति । अथ यो हैवैत-मग्निं सावित्रं वेद, तस्य हैवाहोरात्राणि - श्रमुष्मिँल्लोके शेवधिं न धयन्ति । श्रधीतं हैव स शेवधिमनु परैति ॥ -- तैत्तिरीय ब्राह्मण ३ का ० | १० प्र ०।११ ० १,२,३, ० ५४
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द्वितायखण्ड १६ - व्यष्टिलक्षण प्राजापत्यवेद-अनन्त, अनादि वेद से सम्बन्ध रखने वाले, अनन्त ब्रह्माण्डों को अपने गर्भ में रखने वाले सर्व-प्रवर्त्तक, सर्वापेक्षया तटस्थ, सर्वत्रलविशिष्टरसमूर्ति अनन्त - अनादि परात्पर के अनन्त चरित्र का, सहस्रलक्षण अनन्त वेद से सम्बन्ध रखने वाले सहस्र ब्रह्माण्डात्मक, महामायावच्छिन्न मायी महेश्वर के अनन्त चरित्र का, मायी महेश्वर की पञ्चपुण्डीराम | जापत्यवल्शा से सम्बन्ध रखने वाले पञ्चपर्वात्मक बल्शेश्वर का, एवं त्रल्शेश्वर-स्वरूपसम्पादक ब्रह्मनिःश्वसित त्रयीवेद का, ब्रह्मस्वेदवेद का, गायत्रीमात्रिक वेद का, अथर्ववेद का, तथा यज्ञमात्रिक वेद का संक्षिप्त निरूपण करते हुए भरद्वाज के प्रति उपदिष्ट सावित्राग्निमयी त्रयीविद्या का इस त्रयीविद्या से से सम्बन्ध रखने वाले त्रल्शेश्वर के ब्रह्म, प्रजापति, बृहस्पति, इन्द्र, वायु, अग्नि, इन ६ पर्वों का दिग्दर्शन कराया गया । और इसके द्वारा विज्ञ पाठकों का ध्यान इस लक्ष्य की ओर आकर्षित करने की चेष्टा की गई कि, ' वेद ' एक वैसा मौलिक तत्त्व है, जो अपने तत्त्वात्मक ऋक्साम - यजुः - अथर्व - पर्वों से विश्व का मूल हुआ है । विश्व कैसे, किससे बना?, कहाँ प्रतिष्ठित है?, कब तक प्रतिष्ठित रहेगा?, कहाँ विलीन हो जायगा?, इन सत्र विश्वविद्याओं का एकमात्र मूलाधार यही तात्त्विक वेद है, यहीं अनादिवेद है, यही अपौरुषेयवेद है, जिसके कि स्वरूप - परिचय के लिए शब्दात्मक ' वेदशास्त्र ' का आविर्भाव हुआ है, जो कि वेदशास्त्र पौरुषेय | शब्दात्मक वेदशास्त्र पौरुषेय है, अथवा अपौरुषेय? इस प्रश्न की मीमांसा तो आगे जाकर होगी । अभी तो हमें उस वेदतत्त्व के स्वरूप का ही बुद्धिगम्य विचार करना है, जिसका कि इस शब्दात्मक ( मन्त्रात्मक ) वेदशास्त्र में स्पष्टीकरण हुआ है | तत्त्वात्मक वेद कैसा जटिल पदार्थ है, इसका अनुमान केवल इसी से लगाया जा सकता है कि, तत्त्वात्मक वेद के ' ऋक् - यजुः साम - अथर्व ' ' इन चार पर्वों के निरूपण के लिए ही २१ ऋग्वेदग्रन्थ, १०१ यजुर्वेदमन्थ, १००० सामवेदग्रन्थ, एवं ६ अथर्ववेदग्रन्थ, सम्भूय ११३१ वेदग्रन्थ प्रजा के सम्मुख उपस्थित हुए हैं । अत्र तक वेद के तात्त्विक स्वरूप का जो विश्लेषण हुआ है, उससे हमारा पूरा पूरा सन्तोष नहीं हो मकता । यही नहीं, प्रतिपादित स्वरूप हमारे लिए एक जटिल समस्या और बन जाता है । अतएव किसी वैसी सुगम पद्धति का अनुगमन अपेक्षित है, जिसके द्वारा हम असा इस वेदतत्त्व के स्वरूपज्ञान के सत्पात्र चन सकें । इसी सत्पात्रता की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम वेद, और प्रजापति के पारस्परिक सम्बन्ध का ही स्पष्टीकरण किया जा रहा है । " प्रजापति ही वेद है? " यह एक पक्ष है । इस पक्ष में प्रजापति, और वेद, दोनों का ' तादात्म्य " सम्बन्ध है । “ वेद प्रजापति के निःश्वास हैं २ " यह दूसरा पक्ष है । इस पक्ष में दोनों का ' ग्रङ्गाङ्गिभाव ' सम्बन्ध है 1 । “ प्रजापति से वेद उत्पन्न हुए हैं ३ " यह तीसरा पक्ष है । इस पत्र में दोनों का जन्य - जनकभाव-सम्बन्ध है । तीनों ही सम्बन्ध दृष्टिकोण भेट से गतार्थ हैं, विरोधशून्य हैं । प्रथम पक्ष का यज्ञमात्रिक वेद से सम्बन्ध है, पार्थिववेद से सम्बन्ध है । पार्थिव प्रजापति यज्ञात्मक त्रयीवेद ही स्वरूपनिर्माण में समर्थ हुए हैं | यदि पार्थिवप्रजापति ( अग्नि ) में से यज्ञमात्रिक वेद पृथक् कर दिया जाता है, तो प्रजापति का कोई स्वरूप ही शेष नहीं रहता । दूसरे पक्ष का स्वायम्भुव ' ब्रह्म निःश्वसितवेद ' से सम्बन्ध है । सप्तपुरुष पुरुषा-त्मक चित्य प्रजापति स्वयम्भू है, श्रङ्गी हैं । स्थिति - गतिलक्षण ज्ञानमूर्ति यजुभांग इनकी प्रतिष्ठा बनता हुआ उसी प्रकार इनका अङ्ग है, जैसे कि शरीर श्रात्मा की प्रतिष्ठा बनता हुआ आत्मा का ग्रङ्ग बना रहता है । ५५
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भाष्यभूमिका तीसरे पक्ष का गायत्री मात्रिक सौर वेद से सम्बन्ध है । इसकी उत्पत्ति आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में प्रतिष्ठित ब्रह्म से हुई है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से बतलाया जा चुका है । क्योंकि यह प्रजापति से उत्पन्न है, अतएव इमे अवश्य ही जन्य - जनकभावानुबन्धी माना जा सकता I इस प्रकार स्वयम्भू, सूर्य्य, पृथिवी, इन तीन संस्थाओं के भेद से तीनों पक्षों का यथावत् समन्वय हो रहा है । इसके साथ ही यह भी स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए कि, अग्नितत्त्व का ही नाम वेदत्रयी है, अग्नि-तत्व का ही नाम प्रजापति है । हाँ, अग्निस्वरूप में अवश्य ही अन्तर है । स्वायम्भुव अग्नि ब्रह्माग्नि है, सौर अग्नि देवाग्नि है, पार्थिव अग्नि भूताग्नि, किंवा अन्नादाग्नि है । अन्नादाग्नित्रयीविद्या ही यज्ञमात्रिकत्रयी-विद्या है, देवाग्नित्रयीविद्या ही गायत्रीमात्रिकत्रयीविद्या है, एवं ब्रह्माग्नित्रयीविद्या ही ब्रह्मनिःश्वसितत्रयीविद्या है, एवं पारमेष्ठ्या सोमविद्या तथा चान्द्रसोमविद्या ही चौथी अथर्व विद्या है । ( क ) १ – प्रजापतेर्निःश्वासभूता वेदा: - ग्रङ्गाङ्गिभावसम्बन्धः ( ब्रह्मनिः श्वसितवेदत्रयी - स्वायम्भुववेदत्रयी ) । २ - प्रजापतेर्वेदा उत्पद्यन्ते - जन्यजनकभावसम्बन्धः ( गायत्रीमा त्रिक वेदत्रयी - सौरवेदत्रयी ) । ३ — प्रजापतिरेव वेदाः- तादात्म्यसम्बन्ध: ( यज्ञमात्रिक वेदत्रयी - पार्थिववेदत्रयी ) । # ( ख ) १ – ब्रह्माग्निः- - स्वायम्भुवः श्रग्निविद्या - ब्रह्मनिःश्वसितवेदत्रणी । * — सुब्रह्मसोमः पारमेष्ठ्यः सोमविद्या - अथर्ववेदः । २– देवाग्निः—— - सौर: -: - - श्रग्निविद्या - गायत्रीमा त्रिकबेदत्रयी । * — सुब्रह्मसोमः — चान्द्रः — सोमविद्या — अथर्ववेदः । ३ – भूताग्निः- - पार्थिवः -- अग्निविद्या -- यज्ञमात्रिक वेदत्रयी । ( ग ) १ – ज्योतिर्वेदः — ज्ञानाग्निर्ज्ञानज्योतिः -- मनोमयम् — मनोवेद: ( ब्रह्म निःश्वसितवेदः ) । * - प्रतिष्ठावेदः २ — ज्योतिर्वेदः — भूताग्निभूतज्योतिः - प्राणमयम् - प्राणवेदः ( गायत्रीमात्रिकवेदः ) * - प्रतिष्ठा वेदः ३ — ज्योतिर्वेदः -- सत्याग्निः सत्यज्योति: - वाङ्मयम् - - वाग्वेदः ( यज्ञमात्रिकवेदः ) । ५६