Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 101–110
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
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तृतीयखण्ड सम्भवतः श्रास्तिकसमाज यास्क की भाँति भगवान् करणाद के वचनों पर भी कम निष्ठा नहीं रखता । तत्त्ववेद की अपौरुषेयता, शब्दवेद की पौरुषेयता स्वीकार कर लेने से जहाँ जैमिनि, यास्क, करण | दादि प्राप्त पुरुषों के सिद्धान्तों का यथावत् निर्विरोध समन्वय हो जाता है वहाँ शब्दात्मक वेद की अपौरुषेयता स्वीकार करने से अथ से इतिपर्य्यन्त पारस्परिक विरोध का साम्राज्य हो रहा है * । यह स्मरण रखने की बात है कि, वेदमहर्षियों को स्वयं वेदमन्त्रों में अनेक स्थानों पर ' कवि ' शब्द से सम्बोधित किया गया है । कवि शब्द ही यह प्रमाणित कर रहा है कि, वेद उन क्रान्तिदर्शी कवियों का * —महर्षि कणाद ने अपने सुप्रसिद्ध ' वैशेषिक दर्शन ' में विस्पष्ट शब्दों में प्रयोगशब्दात्मक वेदग्रन्थ का ऋषिकृतत्त्व स्थापित करते हुए सहजसिद्धा ( प्रकृतिसिद्धा ) मानवीय बुद्धिनिष्ठा का ही परिचय दिया है । “ बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिः ' द्वारा कणाद ने स्पष्ट ही वेदग्रन्थ का ऋषिकृतत्त्व प्रमाणित किया है । वेदग्रन्थों में प्रकृति के सञ्चालक श्राधिदैविक भावापन्न प्राणात्मक अग्नि वायु - आदित्य - रुद्र - इन्द्र - मित्र - वरुण-श्रर्य्यमा- भग- पूषा - आदि आदि देवताओं की यथास्थान - यथाकर्म्म स्तुतियाँ हुई हैं, यशोगान हुआ है । प्राकृतिक प्राणशक्तिरूप देवता उक्थरूप विश्वाध्यक्ष विश्वेश्वर की अर्करूपा शक्तियाँ है । " सर्वप्राणशक्त्यधि-ष्टाता विश्वेश्वर ' अग्निमीले पुरोहितम् ' ( हम पुरोहित अग्नि की स्तुति कर रहे हैं ) इस प्रकार प्ररोचनात्मक वाक्य - माध्यम से स्वशक्तिभूत अग्न्यादि की स्तुति करते हुए तन्माध्यम से अग्न्यादि को प्रसन्न करने के लिए आतुर हैं ", क्या ईश्वरसत्ता के प्रति यत्किञ्चित् भी आस्था - श्रद्धा रखने वाले किसी भी प्रज्ञाशील का प्रज्ञातन्त्र ऐसा स्वीकार कर सकता है? । कदापि नहीं । कथमपि नहीं । ' तस्माद्धान्यो न परः किञ्चनास ' से सर्वश्रेष्ठ सर्वज्यायान् प्रमाणित ईश्वर अपनी शक्तियों की किसी लाभकामना से स्तुति करेंगे, और ईश्वर की स्तुति से प्रसन्न होकर अग्न्यादि देवता ईश्वर में किसी वैशिष्ट्य का आधान करेंगे, क्या यही अभिप्रेत है उन अर्वाचीन आस्तिकम्मन्यों को, जो इत्थंभूत वेदशास्त्र को ईश्वर के द्वारा ही निम्मित मानने के दम्भ से अभिनिविष्ट बने हुए हैं? | आलग्यालम्!!! भगवान् जैमिनि, कणाद, आदि प्राप्त पुरूषों में हीं क्या परस्पर वैमत्य है । यदि हाँ, तो तटस्थ जिज्ञासु आस्तिक के लिए दोनों हीं दूर से ही प्रणम्य है । ऐसी स्थिति में वेद के सम्बन्ध में परस्पर विरूद्ध दृष्टिकोण रखने वाले कणाद - जैमिनि आदि की भगवत्ता का क्या कोई मूल्य शेष रह जाता है? । ' ब्राह्मणे संज्ञाक सिद्धिलिङ्गम् ' - इत्यादि करणादसूत्र भी मन्त्रब्राह्मणात्मक शब्दवेद का कृतत्त्व ही प्रमाणित कर रहे हैं । “ अथापि खल्वियं बुद्धिपूर्वा वाक्य कृतिर्वेदे । न त्वनादिरियं वेदराशिरिति । कुत एतत प्रतिपत्तव्यम्? । प्रयत्नकार्यत्त्वाद्वचनस्य वाक्यान्तरवत् । यथा खलु वाक्यान्तराणि ( लौकिकानि ) प्रयत्नकार्य्याणि, तथा वैदिकमपि वाक्यं प्रयत्नकार्यम् । नत्त्वनादिर्वेदराशिः । न खलु पौर्वापर्य भावोऽप्यनादिर्भवितुमर्हति " इत्यादि चन्द्रकान्तीय करणादभाष्यवचन के द्वारा भी प्रयोगशब्दराशिभूत शब्दात्मक वेदग्रन्थ का ऋषिकृतत्त्व ही प्रमाणित हो रहा है, जो कि प्रमाणन सवथा बुद्धिसङ्गत ही माना जायगा । ८३
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भाष्यभूमिका तत्त्वप्रदर्शक पूर्व काव्य है । * । युग युग के अन्त में वेदज्ञान विलुप्त होता रहता है, पुनः युग - युग के आरम्भ में ऋषिगण अन्य अन्य वेदों की रचना किया करते हैं, जैसाकि ततद्विशेषवचनों से प्रमाणित है A । अत्र हमें कुछ एक उन शास्त्रीय वचनों का समन्वय करना है, जो स्पष्ट शब्दों में वेदमन्त्रों का कृतकख प्रमाणित कर रहे हैं । सर्वप्रथम पुराणवचनों की मीमांसा करते हुए हमें इसी तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि, वेदमन्त्रतत्तत् - ऋषिविशेषोंके द्वारा समयविशेष में रचे गए हैं । अतएव पुराण ने उन्हें ' मन्त्रकृतः ’ कहा है, जैसाकि निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट है— एते मन्त्रकृतः सर्वे कृत्स्नशस्तु निबोधत ॥ भृगुः काश्यः प्रचेताश्च दधीचो ह्यात्मवानपि ॥ १ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषिपुत्रास्तथा स्मृताः ।
ऋषीणाञ्च सुता ह्येते ऋषिपुत्राः श्रुतर्षयः ॥
-- मत्स्यपुराण १२१ अ ० । स्वयं ऋषि शब्द की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में दृढतम प्रमाण बन रही है । भूमिका द्वितीयखण्ड में ऋषिशब्द का विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । हम पाठकों से अनुरोध करेंगे कि, प्रकृत विषय के समन्वय के लिए वे एकबार उस प्रकरण पर अवश्य दृष्टि डालने का अनुग्रह करेंगे । ' वेद का ऋषिपदार्थ ' एतन्नामक प्रकरण से पहिले - ' वेदविद्या के संस्थाविभाग ' नामक प्रकरण का समावेश है । उसमें मन्त्रार्यपरिज्ञान, मन्त्रार्थपरिज्ञानपूर्वक अक्षरज्ञान, तत्त्वसाक्षात्कार, तत्त्वाधान, सर्वतत्त्वाथान, भेद से वेदविद्या की मन्त्रविद्या, अक्षरविद्या, दृष्टिविद्या, यज्ञविद्या, सिद्धविद्या, ये पाँच संस्थाएँ बतलाई गई हैं ( देखिए, भू ० २ खण्डपृ ०६८ से ७५ पर्य्यन्त ) । इससे अगले प्रकरण में ऋषिपदार्थकी वैज्ञानिक मीमांसा हुई है । वहाँ यह गया है कि, ' वाक्यसंग्रह भी मन्त्र है, तत्प्रतिपाद्य नित्यविद्यातत्त्व भी मन्त्र है । विद्यात्मक ( तत्त्वात्मक का त्रों
* — “ त एव पदविन्यासास्ता एवार्थविभूतयः ।
तथापि नव्यं भवति काव्यं ग्रन्थन कौशलात् ॥
A “ युगे युगे विदथ्यं गृणद्भ्योऽग्ने रयिं यशसं धेहि नव्यसीम् " ( ऋक्सं ०६।८।५ ) ।
युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्णमनुज्ञाता स्वयम्भुवा ॥
प्रतिमन्वन्तरं चैव श्रुतिरन्या विधीयते ।
ऋचो यजूंषि सामानि यथावत् प्रतिदैवतम् ॥
ऋषीणां तप्यतामुग्रं तपः परमदुश्वरम् । मन्त्राः प्रादुर्बभूवुहिं पूर्णमन्वन्तरेष्विह । ( वायुप्राण ५६ अ ० ) । ८४
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तृतीयखण्ड ऋषियों नें अपनी आर्षदृष्टि से प्रत्यक्ष किया, इसलिए तो इन्हें ' मन्त्रद्रष्टा ' ( तत्त्वसाक्षात्कारकर्त्ता ) कहा गया । अपने इस दृष्ट अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए दृष्ट अर्थस्वरूप के अनुरूप ऋषियों नें बुद्धिपूर्वक वाक्यरचना की । वाक्यरचनात्मक, विद्याप्रतिपादक, शब्दात्मक वेदमन्त्रों के निर्माणाभिप्राय से ही इन्हें ' मन्त्रकृतः ' कहा गया । जो मन्त्रद्रष्य थे, वे ही मन्त्रकृतः कहलाए । जिन्होंनें शब्दात्मक मन्त्र का तात्पर्य्य भलीभाँति देख - समझ लिया, प्रत्यक्ष कर लिया, वे ' मन्त्रवित ' कहलाए । एवं जिस शब्दात्मक वेदमन्त्र में प्राणात्मक जिस ऋषितत्त्व फा निरूपण हुआा, उस मन्त्र की अपेक्षा वह प्राण - ऋषि ' मन्पति ' कहलाया । इसप्रकार तत्वदर्शन, मन्त्र-निर्माण, मन्त्रतात्पर्य्यवेदन, आधिपत्य, भेद से ऋषिशब्द ४ संस्थाओं में विभक्त हो गया, जिन इन ऋ पे-संस्थाओं का स्वयं वेद में उल्लेख हुआ है । देखिए!
यामृषयो ' मन्त्रकृतो ' मनीषिण अन्ौच्छन् देवास्तपसा श्रमेण ।
तां देवीं वाचं हविषा यजामहे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥
नमा ऋषिभ्यो ' मन्त्रकृद्भ्यो ' ' मन्त्रपतिभ्यः ' ।
मामाऋषयो मन्त्रकृतो ‘ मन्त्रविदः प्राहुदै वीं वाचम् ॥२ ॥
ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयत् गिरः ।
सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥३ ॥
-- ऋकूसं. ६।११४।२ ॥
विचारशील पाठक यह स्वीकार करेंगे कि, शब्दात्मक वेदग्रन्थ की पौरुषेयता स्वीकार किए बिना मन्त्रोक्त ' मन्त्रकृत: ' - ' मन्त्रकृतां ' शब्दों का प्रयत्नसहस्रों से भी समन्वय नहीं किया जा सकता । इसप्रकार त्र्यत्रतक के आम्र डन से हमें निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि— “ तत्त्वात्मक ऋक्, यजुः, सामू, अथर्ववेद, तत्त्वात्मिका ज्ञानानुगता उपनिषत् उभयानुगत आरण्यक, कर्मानुगत ब्राह्मणवेद सर्वथा अपनी तत्त्वदृष्टि से, तथा बाकू - लक्षण नित्यशब्दद्दृष्टि से कूटस्थ नित्य हैं, अकृतक हैं, अपौरुषेय हैं । एवं प्रयोगलक्षण शब्दात्मक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद कृतक हैं, पौरुषेय हैं । अनित्यसमर्पक हेतुओं का, प्रमाणों का पौरुषेय - शब्दात्मक वेद से सम्बन्ध है, एवं नित्यसमर्पक हेतु - प्रमाणों का अपौरुषेय तत्त्वात्मक वेद से सम्बन्ध है " । १६ - वेदप्रामाण्य पर आपत्ति, और उसका निराकरण— अब इस सम्बन्ध में केवल एक विप्रतिपत्ति रह जाती है, और वह है ' वेदप्रामाण्यवाद ' से सम्बन्ध रखने वाली । यदि शब्दात्मक वेद पौरुषेय हैं, तो इन्हें निर्भ्रान्त, निरपेक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता । कणादसिद्धान्त के अनुसार बुद्धिपूर्वक इनका निर्माण स्वीकार कर लेने पर ये वेद भ्रान्तिदोष से युक्त रहते हुए अप्रामाण्य कोटि में आ जाते हैं, जोकि किसी भी ग्रास्तिक भारतीय को सह्य नहीं है । मनुष्य कभी सर्वथा निर्भ्रान्त नहीं हो सकता । अवश्य ही उसकी रचना में भ्रान्ति निश्चित है । ८५
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माय भूमिका दूसरी यह भी विप्रतिपत्ति उठाई जा सकता है कि, यदि प्राकृतिक तत्वों के आधार पर अपनी भाषा में मनुष्यों ने वेदमन्त्रों का निर्माण किया है, तो क्या आज भी कोई वैसा बुद्धिमान् नवीन वेदमन्त्र बना अपेक्षा सकता है! | यदि उत्तर में हाँ कहा जायगा, तो अनादिकाल से प्रचलित वेदमन्त्रों का यज्ञानुगत पद्धतियों की न घटाया से कोई महत्त्व न रहेगा । यज्ञकर्म में वेदमन्त्र नियत हैं । न उनमें एकाक्षर बढ़ाया जासकता, जानकता | उधर निर्मित नवीन मन्त्रों का कोई उपयोग भी अवश्य किया जायगा । इसप्रकार एकरसरूप से प्रवाहित वेदशास्त्र एक काल्पनिक, श्रमर्य्यादित, अप्रामाणिक, बालविनोद - साधनमात्र बन जायगा । तीसरी विप्रतिपत्ति यह भी उठाई जासकती है कि, विगत शताब्दियों में अवता रसदृश उद्भट विद्वानों ने । परन्तु अधावधि भारतवसुन्धरा को अलंकृत किया । सबनें स्वतन्त्र ग्रन्थों का प्रभूत संख्या में निर्माण वेदप्रन्थ किया अन्य ग्रन्थों की भाँति यह न सुना गया कि, अमुक विद्वान ने अमुक वेदमन्त्रों का निर्माण किया । यदि का पुरुषरचना के विषय होते, तो विगत ३-४ सहस्र वर्षों में कोई विद्वान उदाहरण के रूप से कुछ तो मन्त्रों शास्त्र निर्माण करता । इस दृष्टि से भी यही पक्ष समीचीन प्रतीत होता है कि, वेदशास्त्र अनादिसिद्ध ईश्वरीय है, अपौरुषेय शास्त्र है । इसीलिए इसकी निरपेच प्रामाणिकता सर्वथा सुरक्षित है । पहिली विप्रतिपत्ति का सम्बन्ध ' स्वतः प्रामाण्यवाद ' से है । स्मृत्यादि इतर शास्त्र जहाँ परतः प्रमाण है, वहाँ श्रुतिशास्त्र स्वतःप्रमाण है, निरपेक्षप्रमाण है । यदि मन्वादि स्मृतियों की भाँति ऋगादि श्रुतियाँ भी इन्हें स्वत प्रमाण : किस आधार पर माना गया?, प्रथम विप्रतिपत्ति का यही स्वरूप है । और पौयेय हैं, तो उसका निराकरण यों किया जासकता है । पाठकों को स्मरण होगा कि, वाक्के चार पदोंका विश्लेषण करते हुए पूर्व में हमनें ' बाकशब्द, नादशब्द, ध्वनिशब्द, प्रयोगशब्द ' भेद से वाक् के इन चार भावों का विश्लेषण किया था । वहीं यह भी स्पष्ट किया गया था कि, ये चारों क्रमशः श्रात्ममयी, वायुमयी, इन्द्रमयी, अग्निमयी हैं । चारों में श्रात्ममयीवाकू है | चाहे सर्वथा नित्या है, वायु - इन्द्वमयीवाक् नित्या - अनित्या है, एवं अन्तिमयीवाक् सर्वथा अनित्य शास्त्रीय वाक् हो, अथवा लौकिक वाकू, प्रयोगात्मिका प्रत्येक वाक में इतर तीनों का अन्तरान्तरीभाव से समा-वेश रहता है । हमारी अध्यात्ममस्था में ' आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय ' मेद से चार प्रधान विवर्त हैं । इन चारों आध्यात्मिक विवर्तों के साथ क्रमशः उक्त चारों वाग विवर्तो का घनिष्ठ सम्बन्ध है । हम जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, उनका श्राग्नेयीवाकू से सम्बन्ध है । एवं यह प्रयोगलक्षणा आग्ने-यीवाक् ' अग्निवाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' इस श्रीत सिद्धान्त के अनुसार वागिन्द्रिय से प्रधान सम्बन्ध रखती है । ध्वनिवाकू इन्द्रदेवतामयी होने से ऐन्द्री है । उधर प्रज्ञानमन में ' प्रज्ञा - प्राण ' नाम से दो तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । यह प्रशात्मक प्राण ही - " या वै प्रज्ञा- सः प्राणः, यः प्राण: - सा प्रज्ञा, सह ह्ये तावस्मिन् शरीरे वस्तः, सहोत्तिष्ठतः । प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा । तं मामायुरमृतमिस्युपास्व ” ( कोवीतकिबाह्मणोपनिषत् ) इस कौषी— तकि — सिद्धान्त के अनुसार इन्द्र है । प्रज्ञान मन साक्षात् इन्द्र है । फलतः ध्वनिलक्षणा ऐन्द्रीवाकू का श्रध्या-त्मिक मनके साथ स्वाभाविक सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है । तीसरी वायव्यावाकू ही नादात्मिकावाक् है, जिसका ८६
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तृतीयखण्ड मूलस्वरूप ब्रह्मग्रन्थि में प्रतिष्ठित माना गया है, एवं जिसे चैतन्यलक्षण कहा जाता है ÷ । ' यो बुद्ध: परतस्तु सः ' के अनुसार चिदात्मा का निकटवर्त्ती, विज्ञान ( बुद्धि ) ही चैतन्य ( अक्षर ) है । तन्मय नाद अवश्य ही बुद्धि से सम्बद्ध माना जासकता है । चौथी वाक् - लक्षणा नित्या वाक् का मनःप्राणवाङ्मय आत्मा से सम्बन्ध है | श्रात्मविवर्त्त अव्यय, अक्षर, आत्मार, विकारक्षर, भेदसे चार भागों में विभक्त माना गया है । इन चारों आत्मविवर्त्तो का क्रमशः श्रात्मा बुद्धि, मन, इन्द्रिय के साथ प्राधान्य है । अव्ययप्रधान आत्मा नित्या ग्रात्म - वाकू लक्षणा परावाकू से सम्बद्ध है | अक्षरप्रधाना बुद्धि नित्यानित्या वायव्य गगलक्षणा पश्यन्तीवाकू से युक्त है । श्रात्मन्नर प्रधान प्रज्ञानमन नित्यानित्या ऐन्द्रीवाक्लक्षणा मध्यमावाकू से युक्त है | एवं विकारक्षरप्रधान वामिन्द्रिय नित्या आग्नेयीवाक् - लक्षणा वैखरीवाक् से युक्त है । इसप्रकार उपा-दिभेद से एक ही वाक्तत्त्व चतु: संस्थ बन रहा है । इस चतुःसंस्थ वाकूतत्त्व का अधिकारीभेद से यत्र तत्र समन्वय होरहा है । यद्यपि पूर्वकथनानुसार सर्वविध वाक्प्रयोगों में इतर तीनों संस्थाएँ अन्तरान्तरीभाव से प्रतिष्टित हैं । एक यज्ञ मनुष्य अपनी वागन्द्रिय से जिस सामान्य लौकिकवाकू का प्रयोग करता है, उसमें भी ऐन्द्री - वायव्या-श्रात्म - नामक तीनों वाक्तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । तथापि ऐसी लौकिकवाकू में आग्नेयीवा की ही प्रधानता रहती है | श्रौर इसी प्रधानता - अप्रधानता के तारतम्य से वाक्प्रयोक्ताओं को हम चार श्रेणियों में विभक्त कर रुकते हैं । सर्वप्रथम व्यवहारजगत् की दृष्टि से हम वाकू को ' शास्त्रीयवाक्, लौकिकवाक् ' भेद से दो भागों में विभक्त करेंगे । चिना पढ़े लिखे सर्वसाधारण मनुष्यों में जिस वाक का प्रयोग होता है, वह लौकिकवाक् है । एवं विद्वानों की विद्यानुगता भाषा शास्त्रीयावाक है, और लौकिकीवाकू की अपेक्षा इस शास्त्रीयवाक में अधिक प्रामाण्यबुद्धि रहती है | सामान्य जन स्वत एव ऐसी निष्ठा रखते हैं कि, हम जो कुछ कहते सुनते हैं, उसकी अपेक्षा शिक्षित मनुष्यों का कहना - सुनना विशेष महत्त्व रखता है । शिक्षितों की शास्त्रीयभाषा को हम ' निगम, आगम ' भेद से दो भागों में विभक्त देखते हैं । एवं अशि-क्षितों की लौकिक भाषा को सभ्यभाषा ( नागरिक भाषा ), असभ्य भाषा ( ग्राम्य यथाजातभाषा ) भेद से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं । जिन व्यक्तियों नें कभी किसी पुस्तक के दर्शन न किए हों, उन व्यक्यिों की भाषा सर्वथा काल्वालीकृत, अतएव अलग्ल ( अस्पष्ट ) होती है । कब, कहाँ, कैसे, क्या बोलना चाहिए, इसप्रकार का विवेक करने में असमर्थ, अस्पष्ट - अशुद्ध - अलग्ल - वर्णस्वरादिपूर्वक उच्चारण करने वालों की भाषा में
* —ब्रह्मग्रन्थिस्थितः सोऽथ क्रमादुपथे चरन् ।
नाभि - हृत् - कण्ठ - मूर्द्धा - स्ये - ष्वाभिर्भात्रयते ध्वनिम् ॥
- चैतन्यं सर्वभूतानां विवृत्तं जगदात्मना ।
नादब्रह्म तदानन्दम द्वितीयमुपास्महे ॥
—सङ्गीतरत्नाकरः । ८७
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भाष्यभूमिका केवल वागिन्द्रियानुगत आग्नेयी - वाक की ही प्रधानता रहती है । ऐसी वाक की लोकदृष्टि से भी कोई प्रतिष्ठा नहीं है । ऐसे व्यक्तियों का कथन लौकिक व्यवहार में भी प्रमाण नहीं माना जा सकता । यह एक प्रकार की बालभाषा है, जिसका उद्देश्य एकमात्र भोजन - शयन - गमन - इत्यादि प्राकृतिक इच्छाओं का व्यक्त करना होता है । एवं यही व ] क् का पहिला, किंवा चौथा संस्थान है । वागिन्द्रिय के साथ साथ प्रज्ञानमन का सहयोग प्राप्त हुआ, इससे सामान्य मनुष्य सामान्य मनुष्य न रह कर ' प्राज्ञ ' बन गया । मानसीवाकू के सहयोग से इसकी प्रयोगात्मिका वाक में कुछ विशेष बल आ गया । लोकव्यवहार से स्पष्टा - शुद्धा उपयोगिनी भाषा व्यबहुत होने लगी । लोकोन्नति के लिए नवीन साहित्य का निर्माण होने लगा । और इसप्रकार आग्नेयी ग्राम्य भाषा ने नागरिकरूप धारण कर लिया । एवं ऐसे ही व्यक्ति लोकदृष्टि से शिक्षित कहलाने लगे । इनका कथन, इनकी रचना, इनका साहित्य व्यावहारिक जगत् में प्रामाणिक माना जाने लगा । इस प्रकार मानस धरातल के सहयोग से एक दूसरी किंवा, तीसरी वाकसंख्या का उदय हो गया । जिस साहित्य का त्रिशुद्ध व्यवहारजगत् से सम्बन्ध है, जिस साहित्य का ऐहलौकिक उन्नति के अतिरिक्त पारलौकिक - श्रभ्युदयमार्ग से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह सम्पूर्ण वाङ्मय साहित्य विशुद्ध लोक-साहित्य है । एवं लोक में लौकिक मनुष्य ही अपने विशुद्ध ऐहलौकिक व्यवहारों में इसे प्रमाण मानते हैं । इसप्रकार लोकोन्नतिप्रवृत्तिलक्षण । नागरिक भाषा, तथा नागरिकसाहित्य, एवं जीवन यात्रानिर्वाह कैकलक्षणा-ग्राम्यभाषा, तथा ग्राम्यसाहित्य ( किस्सा - कहानी ) दोनों लौकिकवाकू हैं । जिन्हें लोकाभ्युदय के साथ साथ आत्मनिः श्रेयस् अपेक्षित है, उन बुद्धिमानों के लिए ये दोनों ही भाषाएँ दोनों ह्रीं साहित्य सर्वथा अप्रामाणिक, तथा अनुपादेय है । भारतीय त्रास्तिकवर्ग ने ' लोकायतिक ' कहते हुए इस कोटि को सर्वथा उपेक्षणीय ही माना है । इसी सम्बन्ध में थोड़ा और स्पष्टीकरण कर लीजिए । वर्त्तमान जगत् को आज हम दो श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं । एक विभाग तो ऐसा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य ' खाना - पीना - मौज उड़ाना ' है । दूसरे शब्दों में जो केवल ' भोजन के लिए ही जीवित हैं ' । जो परमपुरुषार्थ भारतवर्ष के ग्राम में रहने वाले, प्राम्य जीवन बिताने वाले एक अशिक्षित ग्रामीण का है, वही उद्देश्य उक्त उद्देश्यानुगामी शिक्षितों का है | माता - पिता के सर्वस्व - समर्पण - योग से शिक्षित बनने वाले इस वर्ग की शिक्षा का लोकोन्नति से सम्बन्ध तो दूर रहा, अपनी कुटुम्बोन्नति का भी यहाँ अवकाश नहीं है । शिक्षाकाल समाप्त कर देने के अनन्तर माता - पिता- भाई - बहिन - कुटुम्ब - जातिबन्धु - आदि को अनन्यनिष्ठा से नमस्कार समर्पण करता हुआ यह पुरुषार्थी? एकमात्र अपने जीवन की रक्षा में ही अपनी शिक्षा का सदुपयोग? करने लग पड़ता है । जहाँ एक अशिक्षित ग्रामीण भारतीय कम से कम कौटुम्बिक व्यवस्था का समर्थक बना रहता है, वहाँ हमारे ये पुरुषार्थी-शिक्षित इससे भी हाथ धो लेते हैं । वकालत, इञ्जिनीयरी, प्रोफेसरी, आदि आदि नवशिक्षानुत, जो भी कर्म किया जायगा, सबके मूल में ऐकान्तिक स्वार्थ हो प्रतिष्ठित रहेगा । दूसरा विभाग ऐसा है, जो अपने साथ साथ अपनी जाति की भी उन्नति चाहता है । और सम्भवतः यह श्रेय केवल पश्चिमी जगत् को है । लोकोन्नति को सद्भावना से, चाहे उस भावना का भारतवर्ष से कोई सम्बन्ध न हो, शिक्षाबल पर नवीन भौतिक श्राविष्कार, उपयोगी साहित्य का निर्माण, आदि इनका पुरुषार्थं " "
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तृतीयखण्ड है । यह दूसरी बात है कि, आत्मसम्पति से वचित यह साहित्य, ये याविष्कार परिणाम में भले ही उन्नति के स्थान में केवल ' समूलस्तु विनश्यति ' के ही कारण सिद्ध होते हों । महाभारत के कुछ आगे से आरम्भ कर वर्त्तमान युगपर्य्यन्त उक्त दोनों श्रेणियों की कैसी, क्या व्यवस्था रहो?, यह भी एक मनोरञ्जक प्रश्न है । इस क्रम के विकास - हास के इतिवृत्त से हमें यह समझने लेने में सुविधा रहेगी कि, भारतवर्ष ने कब से अपने शास्त्रीय वाङ्मयकोष की उपेक्षा कर विशुद्ध लोकसाहित्य को अपनाया है । इस सम्बन्ध यह स्मरण रखना चहिए कि, प्रतिपाद्य ग्राम्य - नागरिक, दोनों का ही लोक-दृष्टि से सम्बन्ध है ॥ शास्त्रीयदृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला विकास -हासभाव इससे सर्वथा पृथक् है । कम से कम महाभारतयुग में ग्राम्यसाहित्य निगमागमबार्त्ता थी, नागरिकसाहित्य निगमागम स्वाध्याय था । शतपथसमकालीन महाभारतकाल की साधारण जनता में निगमागमचर्चा ने ही विनोद का स्थान ग्रहण कर रक्त्रा था * । एवं उस युग के नागरिकों में निगमागमस्वाध्याय का ही व्यसन था । आगे जार नागरिक जीवन में निगमागम - स्वाध्यायचर्चा शिथिल पड़ने लगी, क्रमशः भक्तिमार्गापरपर्य्यामक सम्प्रदायवाद ने ग्रासाहित्य पर आक्रमण करना प्रारम्भ किया । और इसप्रकार इस युग में भक्ति-साहित्य ही नागरिकों का प्रधान केन्द्र बन गया । ग्राम्यजीवन ने भी निगमागम चर्चा के स्थान में भक्तिगाथाओं का स्थान ग्रहण कर लिया । आगे जाकर नागरिक जीवन भक्तिसाहित्य से भी वञ्चित हो गया । अपनाया इसने सर्वथा काल्पनिक काव्य - नाटकादि साहित्य को । हाँ इस युग में भी ग्राम्यजीवन भक्तिगाथा का ही अनुगामी बना रहा । और इसके मूलाधार बने रामायण, सूरसागर, प्रेमसागर, आदि भाषाग्रन्थ । अत्र वर्त्तमान युगदृष्टि से विचार कीजिए । पश्चिमी दृष्टिकोण के सम्बन्ध से नागरिकों की किस साहित्य पर निष्ठा है?, एबं उपयोग की दृष्टि से उसका कितना महत्त्व है?, प्रश्नों का समाधान किया जा चुका है । अत्र केवल भारतीयदृष्टि से विचार कर लीजिए । सामयिक समाचारपत्र, उपन्यास, गल्प, सिनेमासाहित्य, छायावाद, आदि काल्पनिक साहित्य आज का नागरिकसाहित्य है । आल्हाऊदल, नोटङ्की, ढोलामारू, हीरराँझा, आदि वर्त्त ' - मानयुग का ग्राम्यसाहित्य है । इसप्रकार अपना ऐसा बीभत्स पतन कराता हुआ भारतवर्ष आज अपने मौलिक साहित्य के परिशान से बहुत आगे अनुधावन कर चुका है । अस्तु, प्रकृत में हमें केवल यही त्रतलाना था कि, प्रज्ञाममनोऽनुता सभ्यभाषा, एवं तदनुगामी लोकोन्नतिमात्रै कसाधक नागरिक साहित्य लौकिकवाक् का एक विभाग है । एवं वागिन्द्रियानुगता ग्राम्यभाषा, एवं तदनुगामी अनुरञ्जकमात्र श्राम्यसाहित्य लौकिक - वाक् का एक विभाग है । इसप्रकार लौकिकवाकू - विवर्त्त शिक्षित - अशिक्षित श्रेणि - भेद से दो भागों में विभक्त हो रहा है । दूसरा शास्त्रीय वाविवर्त्त है । भारतीय दृष्टिकोण से इसके निगम ग्रागम, भेद से मुख्य दो विवर्त ' हैं । बुद्धि से अनुगताळेतात्त्विकभाषा ममभाषा है । सम्पूर्ण स्मृतियाँ, दर्शन, पुराण, महाभारत, कल्पसूत्र, निबन्ध, व्याकरण, ज्योतिष आदि संस्कृतवाङ्मय साहित्य श्रागमसाहित्य हैं, एवं * तद्ध तदविद्वांस प्याहु: - ' सैषा त्रयीविद्या तपति ' इति । - शतपथब्राह्मण १० काण्ड । ८६
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भाष्यभूमिका श्राध्यात्मिक स्थान — प्रयत्नों का यथावत् अनुगमन करने वाली, श्रतएव शुद्धा, सुपरिष्कृता, लौकिक-नागविवर्तद्वयी की अपेक्षा अतिशय रूपेण प्रमाणभूता, बुद्धिसहकृता वायव्य - वागनुगता - प्रयोगवाक् आगम-भाषा है, जिसे हम विद्वानों की भाषा कहा करते हैं, जिसके छन्दोबद्ध पद्य ' श्लोक ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । इस वाक् का बुद्धिपूर्वकत्त्व ही सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है । अनेक शास्त्राओं में विभक्त मन्त्रसंहिताएँ, ब्राह्मण, श्रारण्यक, उपनिषत् भेद से चार विवतों में विभक्त वैदिकसाहित्य ' निगमसाहित्य ' है । एवं वर्ण स्वर - पद - वाक्य अर्थादि की दृष्टि से प्राकृतिक तत्त्वों के साथ अनुरूपशः समतुलिता, श्रात्मबागनुगता, विज्ञानसम्मता, अन्यप्रमाणानपेक्षस्थानीया, स्वतः प्रमाणभूता, ' छन्दोभ्यस्ता ' नाम से प्रसिद्धा भाषा ही ' निगमभाग ' है, जिसे हम ऋषियों की भाषा कहते हैं । एवं जिसके पद्य - गय-गेय भागों को ' मन्त्र ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । इस वाक् का बुद्धिपूक स्वावच्छिन्न श्रात्मसहयोगत्त्व ही श्रन्यतम वैशिष्ट्य है । इसप्रकार आत्मा - बुद्धि - मन - इन्द्रिय - भेद से भाषा के ऋषिभाषा, पण्डितभाषा, नागरिक भाषा, ग्राम्यभाषा ( प्रान्तीय भाषा ), भेद से चार विवर्त हो जाते हैं । चारों में उत्तरोत्तरापेक्षया पूर्व-पूर्व भाषा प्रमाणभूता है । चारों में ऋषिभाषा प्रकृति से समतुलित बनती हुई ईश्वरभाषावत् सर्वप्रमाण-मूर्द्धन्या है, स्वतः प्रमाणभूता है । अत्रतक भाषा सम्बन्ध के जो विवर्त बतलाए गए हैं, उनका निम्न लिखित परिलेखों से भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है । इसके साथ ही यह भी स्मरण रखने की बात है कि, ये चारों हीं विवर्त ' प्रयोगभाषा से ही सम्बन्ध रखते हैं 1 । प्रयोक्ताओं की दृष्टि भिन्न है, प्रयोगत्त्वेन प्रयोगभाषा समान है । १-१ - ऋषिभाषा - निगमभाषा ( ' छन्दोऽभ्यस्ते ' ति विश्रुता वेदभाषा- एतद्देश एवात्रिभूता ) । २-२ - विद्वद्भापा - श्रागमभाषा ( ' भारती ' ति विश्रुता संस्कृत भाषा - एतद्देशीयैव ) । लौकिकवाक ३-३ - नागरिकभाषा - राष्ट्रीयभाषा ( वर्त्तमानभारतवर्षे नागरिक हिन्दी, न तु हिन्दूस्थानी अन्य राष्ट्रेषु चान्यान्या ) । ४-२ - प्राम्यभाषा --- प्रान्तीयमापा ( भारतवर्षे मध्बं गु ० क ० ते ० मा ० - इत्यादिभेदेनानेक-# धाविभक्ताः ) । शास्त्रीयावाक् te
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तृतीयखण्ड १-१- आत्मानुगामिनी — आत्म विज्ञानप्रधाना - प्रयोगभाषा ( लोकोत्तरा - ऋपिभाषा ) २- २ - बुद्ध्यनुगामिनी—- बुद्धिप्रधाना-# ३ - १ - मनोऽनुगामिनी —- - मनः प्रधाना ----- प्रयोगभाषा ( अलौकिकी – पण्डितभाषा ) --प्रयोगभाषा ( लौकिकी— नानाविधा ) ४- २ - वागिन्द्रियानुगामिनी - इन्द्रि प्रधाना- -- प्रयोगभाषा ( लौकिकी --- नानाविधा ) शास्त्रीयात्राक लौकिकीवाकू १ - - इन्द्रिय - मनो- बुद्धियुक्ता आत्मप्रधाना- कृत्स्नात्मिका प्रा ० भा ० श्रुतिभाषा ( ऋषि ) । २ - २ - आत्मेन्द्रिय - मनोयुक्ता बुद्धिप्रधाना--" -स्मृति भाषा ( पण्डित ) । लौकिकीबाकू ३ - १ - आत्म- बुद्धि - इन्द्रिययुक्ता मनः प्रधाना-४- २ - आत्म - बुद्धि - मनोयुक्ता - इन्द्रियप्रधाना ---" 29 - लोकसाहित्यभाषा ( नाग ० ) " " " - प्रामसा ० भा ० ( प्रा ० ) । शास्त्री यात्राकू १-१- अव्ययप्रधानः -- ग्रात्मा - तन्मयी - आत्मचाकू ( व क्लक्षणः शब्द: -- ऋ ० ) २-२- अक्षरप्रधाना ---- बुद्धि: - तन्मयी - बुद्धिवाक् ( नादलक्षणः शब्द: – पं ० ) लौकिकीवाक् ३-१ - आत्मक्षरप्रवानं - मनः तन्मयी - मनोवाक् ( ध्वनिर्लक्षणः शब्दः - ना ० ) ४- २ - विकारक्षर प्रधानं - इन्द्रियम्- तन्मयी - इन्द्रियवाक् ( प्रयोगलक्षणः शब्दः प्रा ० ) शास्त्री यात्राक २ ६१
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शास्त्री यावाक १-२ - बाकू - लक्षणा शब्दवाकू - बाकू -- तद्र पा ' परावाकू'- --- स्वतः प्रमाणा २-२ - नादलक्षणा शब्दवाकू -- नादः - तद् पा ' पश्यन्तीवाक् - - परतः प्रमाणा लौकिकीबाक् ३-१ - ध्वनिर्लक्षणा शब्दवाक - - ध्वनिः तद्र ूपा ' मध्यमावाक्’- लोकप्रमाणा ४-२ - प्रयोगलक्षणा शब्दबाक् शब्दः - तद्र, पा ' वैखरीवाक् ’ -- अप्रमाणा उक्त चारों वाग्विवर्ती को सामने रखिए, और प्रामाण्यवादानुगता - प्रथमा विप्रतिपत्ति की मीमांसा कीजिए । चारों वाग्विवत में से परावाक् - लक्षण, अव्ययात्मानुगत, नित्यत्रागविवर्स ही हमारे वेदप्रामाण्यवाद का स्वरूप - रक्षक बना हुआ है । जैमिनि सूत्रों की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, जिन शब्दों को ऋषि ने नित्य बतलाया है, जिन शब्दों का प्रथों के साथ श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध बतलाया है, वे शब्द उक्त चारों वाग्विवतों में से वाक -लक्षण प्रथमशब्द विवर्त से ही सम्बन्ध रखते हैं । ' वागर्थाविव-सम्प्रतौ ' - ' न शब्द मित्रास्ति ' के अनुसार प्रकृतिसाम्राज्यगर्भ में यथानुरूप प्रतिष्ठित यच्चयावत् नित्य अर्थ यदि श्रात्मस्थानीय हैं, तो तदनुरूप वालक्षण नित्यशब्द शरीरस्थानीय हैं । ऐसे नित्यार्थ, नित्यसमष्टिलक्षण, शब्दार्थमय, नित्यप्राकृतिकविज्ञानात्मक, नित्य वेद का ही नाम ' अपौरुषेयनित्यवेद ' है । इस शब्दार्थराशिरूप नित्य वेद का प्राप्तमहर्षियों ने अपनी दृष्टि से साक्षात् कार किया । किंवा ईश्वरानुग्रह से यह शब्दार्थमय नित्य विज्ञान ऋषियों के तपःपूत पवित्र अन्तःकरणों में स्वतः प्रकट हुआ । ऋषियों नें इससे लोकाभ्युदय की इच्छा की । इस इच्छा को कार्य्यरूप में परिणत करने के लिए उन्होंनें वाक - नाद - ध्वनिगर्भित प्रयोगलक्षण अनित्यशब्दों का आश्रय लिया, जो कि प्रयोगलक्षण नित्यशब्दा-श्रयण प्रयोगात्मक वेदशास्त्र की पौरुषेयत्व का समर्थक बनता हुआ शब्दतत्त्वामभिज्ञ लौकिक मनुष्यों की दृष्टि में अप्रामाण्यलेश का संग्राहक बन रहा है । इसमें कोई संदेह नहीं कि, वेदशास्त्र श्रनित्यप्रयोगशब्दात्मक है । इसमें भी कोई संदेह नहीं कि, इस दृष्टि से वेदशास्त्र कृतक है, पौरुषेय है । परन्तु एतावता ही प्रयोगशब्दात्मक इतर साहित्य के साथ प्रयोगशब्दात्मक इस वैदिक साहित्य की तुलना नहीं की जा सकती । इसका एकमात्र कारण है, प्रयोगलक्षण अनित्यशब्दात्मक वेदमन्त्रों का वाक् - लक्षण नित्यशब्दमन्त्रों के श्रायतन ( साँचे ) में प्रतिष्ठित रहता । इसी आधार पर तो वेदशास्त्र के प्रयोगात्मक शब्दों को बागलक्षण नित्यशब्दायतन प्रधान मानते हुए ' विज्ञान वाङ्मय ' माना जाता है । ६२