Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 111–120

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120

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१७- वेदमन्त्रों का मन्त्रच, तृतीयखण्ड और विज्ञानत्राक्— ' विज्ञानवाक् ' का वही स्वरूप है, जो स्वरूप श्रात्मलक्षणा नित्यावाक का है । प्राकृतिक नित्य ग्रंथ से युक्त प्राकृतिक वाक् - लक्षण नित्यशब्दों का जिस उच्चावचभाव से, जिस स्वरलहरी से प्रकृतिमण्डल में समावेश है, टीक उसी के अनुरूप जिस प्रयोग का सन्निवेश होता है, वही ' विज्ञानवाक ' है । वही ' विज्ञानवाक ' ' मन्त्र ' नाम से व्यवहृत हुई है । ऋषियों ने इनका बुद्धिपूर्वक निर्माण अवश्य किया है, परन्तु इस निर्माण प्रक्रिया में वे सर्वथा परतन्त्र रहे हैं । प्राकृतिक वाक् के अनुरूप ही उन्हें शब्द - सन्निवेश करना पड़ा है । अतएव मन्त्रवाक् पौरुषेय - बनती हुई भी पौरुषेयनित्यावाक से समतुलिता होती हुई अपौरुषेयत्रत् बन रही है । जो महत्त्व मन्त्रप्रतिपाद्य विषय- का है, वही महत्त्व तद्वाचक मन्त्र - वाकू का है । और यही मन्त्र का मन्त्रस्व है, जिसका स्वरूपनिर्माण वैदिक वर्णमात्रा के आधार पर हुआ है । किसी वर्णमाला में २०, किसी में ५०, किसी में ६४ वर्ण है । परन्तु विज्ञानसिद्धा वंदिकवर्णमाला के २८८ वर्ण हैं । इस वर्णमाला का स्वरूप सर्वथा वैज्ञानिक है, कि वैदिक वर्णमाला विज्ञान ' पध्यास्वस्ति नाम से प्रसिद्ध है । संस्कृत व्याकरण से वैदिक व्याकरण का कोई समतुलन नहीं है । भगवान् पाणिनि ने भी अपने व्याकरणशास्त्र में वेदव्याकरण का पृथक्करण कर दिया है, जो दुर्भाग्य से आज पठन - पाठन प्रणाली में नहीं है । इसप्रकार वैदिक वर्णों के संघातरूप वैदिक शब्द उस नित्यवाक्तत्त्व से समतुलित रहते हुए तद्रूप बन कर तच्छक्ति समर्पक बने हुए हैं, जो वाक्शक्ति अन्य प्रयोगशब्दों में नहीं पाई जाती । क्योंकि मन्त्रशब्द नित्यवाकू से समतुलित हैं, अतएव इनका तद्वाच्य प्राकृतिक अर्थों के साथ हवा-भाविक सम्बन्ध है । जिस कर्मसिद्धि के लिए जो वेदमन्त्र विनियुक्त हैं, उनके यथानुरूप उच्चारणमात्र से कर्म्मसिद्धि हो जाती है । क्योंकि समतुलन सम्बन्ध में शब्दमन्त्र तत्पतिपाद्य शक्तिरूप हैं, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथविज्ञान भाष्यान्तर्गत ' सामिधेनीब्राह्मण में द्रष्टव्य है । उदाहरण के लिए गायत्रीमन्त्र को ही लीजिए | गायत्रीमन्त्र गायत्रीतत्त्व की प्रतिकृति है । जैसा स्वरूपविन्यास गायत्रीतत्त्व का है, वैसा ही विन्यास गायत्रीमन्त्र का है । इस मन्त्र का उस तत्त्व से स्वाभाविक सम्बन्ध है । और इस सम्बन्ध का मूल रहस्य है - छन्द: सम्पत्ति । प्राकृतिक गायत्र देवता ' अग्नि ' है । यह प्राकृतिक अग्नितत्त्व जिस अष्टावयव सीमा मे सीमित रहता है, वह वाकूपरिमाण ही छन्द है । हमारा यह गायत्रीमन्त्र उसी स्वर वर्ण मात्रा के अनुरूप बनता हुआ तद्रूप है | यदि आप प्राकृतिक गायत्रदेवता को अपने अध्यात्म में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, तो तत्प्रति-कृतिरूप गायत्रीमन्त्र का यथाविधि जप कीजिए । यदि आप मन्त्र का अर्थ जानते हैं, तो सर्वोत्तम पक्ष है । यदि अर्थ नहीं भी जानते हैं, तब भी कोई चिन्ता नहीं है । विद्यद्रहस्यविज्ञानवेत्ता व्यक्ति के स्विच दबाने से जैसे तत्सम्बद्ध विद्युद्यन्त्र प्रकाशित हो पड़ता है, वैसे विद्यद्रहस्य न जानने वाला भी स्त्रित्रमात्र के सम्वन्ध से प्रकाश का अधिकारी बन जाता है । ठीक इसी प्रकार अर्थज्ञानशून्य व्यक्ति भी यदि गायत्रीमन्त्र का जप करता है, तो तत्सम्बद्ध गायत्र देवता समानाकर्षण सिद्धान्त के अनुसार अध्यात्म में प्रतिष्ठित हो जाता है । इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, जैसे स्विच दवाने की प्रक्रिया से भी अनभिज्ञ व्यक्ति करेन्ट के सम्र्पक से * - " वाग्वै पथ्यास्त्रस्तिः । ६३

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भाष्यभूमिका अपना नाश करा बैठता है, एवमेव मात्रा - स्वर - वर्णोच्चारण में अव्यवस्था करने वाला मन्त्रजपकर्ता श्रभ्युदय के स्थान में अपना नाश करा बैठता है । इसी आधार पर भगवान् पतञ्जलि का ' तस्य वाचकः प्रणवः ' - ' तज्ज्ञ -पस्तदर्थभावनम् ' ( योगसूत्र ११२६, २७ ) इत्यादि सिद्धान्त प्रतिष्ठित हुए हैं । इसके अतिरिक्त मन्त्र - जपाधिकार भी एक प्रधान नियम माना गया है । जिस वर्ण के आध्यात्मिक-क्षेत्र में जन्मतः गायत्रतत्व बीजरूप से प्रतिष्ठित है, वही इस दीक्षा का अधिकारी है, जैसाकि कल्पसूत्रवचनों से प्रमाणित है । गायत्रीमन्त्र मन्त्र है, तत्त्व की प्रतिकृति है । ऋषियों नें संकलन अवश्य किया है, परन्तु संकलन तत्वानुरूप हुआ है । श्रतएव इसके स्वरूप में मानवीय बुद्धि की गति सर्वथा अवरुद्ध है । मन्त्र अपने स्वरूप में रहता हुआ ही मन्त्र है । यदि कोई इस सम्बन्ध में अपने ये विचार व्यक्त करे कि, ' मन्त्रभाषा कठिन है, अर्थ समझ में नहीं आता, अतः प्रचलित लोकभाषा में परिवर्तित कर उसका जप क्यों न कर लिया जाय तो कहना पड़ेगा, अभी वह मन्त्र के मन्त्रत्त्व से सर्वथा अपरिचित हैं । * । तत्त्वात्मिका नित्याबाक्, और मन्त्रवाकू का क्या सम्बन्ध है? इस प्रश्न की मीमांसा की गई । तत्त्वा-त्मिका वाक् ऋषि की दृष्टि है । इसी दृष्टिसम्बन्ध से ऋषि उस विषय के ' आप्त ' ( विषयप्राप्त - पहुँचवान ) हैं । इन प्राप्तों ने दृष्ट तत्त्व के अनुरूप जो शब्द कहा है, वह हमारे लिए दृष्टिवत्- प्रत्यक्षप्रमाण है । दृष्टिलक्षणा ऐसी श्रुति के लिए अन्य प्रमाण अनपेक्षित है । प्रत्यक्ष में अन्य प्रमाण की कोई अपेक्षा नहीं रहती । ऋषियों की वह श्रादृष्टि वही श्रात्मदृष्टि है, जिसके प्रभाव से ऋषि त्रिकालदर्शी बने हुए हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, इस लोकोत्तरा श्रार्घदृष्टि का महत्त्व वर्तमान युग के केवल भूतदृष्टिपरायण इन्द्रियप्रत्यक्षवादी लोकायतिक नहीं समझ सकते । परन्तु एक आस्तिक भारतीय सदा से इसके महत्त्व के सामने अपना मस्तक झुकाता आया है । * सौर प्राणदेवताओं के संग्राहक शब्दात्मक मन्त्र ' मिगममन्त्र ' कहलाए हैं, एवं पार्थिवप्राणदेवता - संग्राहक मन्त्र ' आगममन्त्र ' कहलाए हैं । सर्वभाषात्मक शाबरमन्त्रों कागममन्त्रों में हीं अन्तर्भाव है, जिनमें स्वर - वर्ण - मात्रा - छन्द आदि का नियमन नहीं है, जबकि निगममन्त्र स्वरादि नियमों से सर्वात्मना नियमित माने गए हैं । इन उभयविध मन्त्रों के अतिरिक्त ( निगमागममन्त्रों के अतिरिक्त ) काल्पनिक मतवादात्मक साम्प्रदायिक जितने भी मन्त्राभास हैं, वे सब सहज भावुक भारतीय स्तिक हिन्दू मानव के निष्ठाधरातल के संहारक ही माने जायँगे, जिस साम्प्रदायिक संहारकर्म्म का खण्ड चतुष्टयात्मक ' भावुकता ' निबन्ध में सविस्तर यशोगान? हुआ है । ६४

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तृतीयखण्ड प्रयोगलक्षण शब्दात्मक वेदमन्त्र उस वाक्- लक्षण - नित्य वेदतत्त्व की प्रतिकृति है, प्रतिमा है । अतएव नित्य विज्ञानरूप नित्य प्राकृतिक देवता की प्रतिकृतिभूत वेदमन्त्र भी साक्षात् देवता है * । चतक जिस आत्मबाकू का हम यशोगान करते आये हैं, उसका विश्लेषण किन शब्दों में किया जाय १, यह मीमांस्य है । कहा गया है कि, विज्ञान वाङ्मय वेदमन्त्र आत्मवाग् लक्षणा नित्यावाक से समतुलित है । इस नित्या वाक् के आधार पर प्रतिष्ठित होने से ऋषिवाक् भी आत्मवाक - समाना बन रही है । इसे हम अपनी सहजभाषा में ' सहजभाषा ' नाम से ही व्यवहृत करेंगे, और यही श्रात्मवाक का सहज विश्लेषण माना जायगा । जिस भाषा में कृत्रिमता का लेश भी न हो, जो निम्लान्तःकरणों से निकली हुई प्राकृतिक भाषा हो, वही सहजभाषा है, एवं ऐसी सहजभाषा श्रवश्यमेव ईश्वरीय प्रेरणा है । इसी सहजभाषा को मन्त्रभाषा कहा जाता है, इसी प्रयोग को ‘ आर्पप्रयोग ' माना जाता है, जिसमें व्याकरणशास्त्र का प्रवेश निषिद्ध है । प्रवेशाधिकार है प्राकृतिक भाषा का विश्लेषण करने वाले एकमात्र निरुक्तशास्त्र को । ' छन्दोऽभ्यस्ता ' नामकी वेदभाषा जैसे लौकिक - सहनभाषा है, वैसे ही विश्व की अन्यान्य लोकभाषाएँ भी प्राकृतिक तत्त्वों के साथ समतुलित होती हुई सहज भाषाएँ ही मानीं गई हैं । इसी श्राधार पर तन्त्र - शास्त्र का ' अमन्त्रमक्षरं नास्ति ' यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित हुआ है । सुप्रसिद्ध शाबरमन्त्रों का मन्त्रत्त्व इसी सहजभाषा के आधार पर प्रतिष्ठित है । तत्तद्द ेश-विशेषों के तत्तत् तपःपूत महापुरुषों के तपःपूत अन्तःकरणों में तत्तत् प्राकृतिक देवताओं के अनुरूप तत्तत् भाषाओं के जो स्वाभाविक उदार निकले हैं, वे सत्र मन्त्र हैं । हम मानते हैं कि, लोकभाषामय सर्पमन्त्र, कृत्यामन्त्र, श्रादि का प्रत्यक्ष में न तो कोई अर्थ ही प्रतीत होता है, न व्याकरण सिद्धा शुद्धि का ही वहाँ समावेश है । परन्तु इसके साथ ही इन मन्त्रों का प्रत्यक्ष चमत्कार देखा - सुना जाता है । यह सब उसी आत्मवाक् - मूला सहजभाषा का श्रव्यर्थ प्रभाव है, जिसका वैदिक महर्षि ' कामगवी ' से सम्बन्ध बतलाया करते हैं | कामगत्री गौ का अहोरात्र के २४ घन्टों में जिस समय में हमारी अध्यात्मसंस्था में उपभोग होता है, उस समय हमारी वागिन्द्रिय से जो शब्द निकलते हैं, वे मन्त्र हैं, उनका फल अव्यर्थ है । मन्त्रबाकू वही मन्त्रवाक् है, जिसमें हमारी इन्द्रिय, हमारे प्रज्ञानमन, हमारी लौकिक बुद्धि के कृत्रिम व्यापार आदि का सम्बन्ध न रहे । सम्बन्ध रहे एकमात्र आत्मा के स्वाभाविक सत्य भाव का । ऐसी मन्त्रवाक् में भूल कर भी अप्रामाण्य-बुद्धि नहीं हो सकती । * — “ यां नै देवतामृगभ्यनूक्ता, यां यजुः, सैव देवता । सर्क । सा उ देवता । तद्यजुः ” ( शतत्रा ० ७ | ५ | १।४ । ) । ६५ 1

पृष्ठ 114

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भाष्यभूमिका ब्रह्मरहस्यवेत्ता ( प्राकृतिक वेदतत्त्वरहस्यवे त्ता ) महर्षि ' ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ' के अनुसार साचात् लौकिक ब्रह्म है । इन लौकिक ब्रह्मों के अलौकिक श्रात्मधरातल से विनिःसृत स्वाभाविक मन्त्र साक्षात् ब्रह्म की सत्यवाणी है । रागद्वे घादि से युक्त, कृत्रिम व्यापाराश्रय से कृत्रिमता के अनन्यानुगामी, अस्मदादि लौकिक पुरुषों की कृत्रिम लोकभाषा में ( आत्मसम्पतिविरह से ) भ्रान्तिदोष की सम्भावना की जा सकती है । परन्तु जिन महर्षियों का पवित्र अन्तःकरण राग - द्व ेषादि पाप्माओं से बर्हिभूत है, ' यथोदकं शुद्ध शुद्धम् ' # के अनुसार अपने आत्मा को उस व्यापक प्रात्मतत्त्व से युक्त कर चुके हैं, उनके अन्तःकरण से निकली हुई वाणी में स्वप्न में भी दोपकल्पना करना अपने आपको प्रायश्चित्त का भागी बनाना है । इसप्रकार वागविवर्त्तविज्ञान का सम्यक - बोध प्राप्तकर लेने के अनन्तर जब हम यह समझ लेते हैं कि, वेदमन्त्रभाषा प्रयोगलक्षणा बनती हुई, श्रतएव अनित्य बनती हुई भी श्रात्मबागलक्षणा नित्यवाक से समतुलिता होती हुई तत् प्रतिकृतिरूपा है, तो इसके स्वतः प्रामाण्य में कोई आशङ्का नहीं रह जाती । श्रात्मवागनुग्रह के सम्बन्ध से ही अनित्या भी, पौरुषेया भी वेदवाकू नित्यवत्, अपौरुषेयत् मान ली गई है । यही कारण है कि, आर्धप्रजा की वे दमन्त्रों पर, इस ऋषि कृति पर ईश्वरवाक्यवत् परिपूर्ण श्रद्धा है, दृढ़ विश्वास है । हम देखते हैं कि, अपनी अल्पज्ञता से पुराण, धर्म्मशास्त्र, निबन्धादि प्रामाणिक शास्त्रों की प्रामाणिकता में सन्देह करने वाले भी महानुभाव वेदप्रामाण्य के सामने अपना मस्तक झुका देते हैं । जिसका आत्मा लोकालो कसीमा पर पहुँच चुका है, उसके सम्बन्ध में तो कुछ कहा नहीं जा सकता । साथ ही ऐसे ' अन्धं तमः प्रविशन्ति ' सज्जन यदि वे दप्रामाण्य में भी सन्देह करें, तो स्वाभाविक ही है । परन्तु जिसमें थोड़ा भी आस्तिक्य है, ऐसा कोई भी भारतीय कम से कम वेदप्रामाण्य का तो अवश्य ही अनुगामी है । इस श्रद्धा - विश्वास का मूलकारण है-ऋषियों की आत्मानुगता सत्यवाणी । " वेद किसी पुरुषविशेष के बनाए हुए नही है, अपितु साक्षात् ईश्वर की रचना है " यह कल्पनां उक्त - श्रद्धा - विश्वास का कारण नहीं है । अपितु सर्वज्ञ, तत्त्वदर्शी, ऋषियों का सन्देश है, इसलिए ' वेदाः प्रमाणम् ' । हमें तो ऐसा लगता है कि, आत्मावागनुगता - सहज भाषामय वेद-शास्त्र नित्यात्मवाक से भिन्न होने से ही प्रचलित अपौरुषेयता का प्रचारक बन गया है । और ऐसी श्रपौरुषेयता सभी विचारशीलों को मान्य है । यदि इसी दृष्टि से हम शब्दात्मक वेदशास्त्र को अपौरुषेय, नित्यकूटस्थ कहते हैं, तत्र तो सर्वथा इष्टापति है । वास्तव में वागलक्षणा शब्ददृष्टि से शब्दप्रपञ्च भी अपौरुषेय है, तद्वाच्य नित्य अर्थतत्त्व भी अपौरुषेय है, दोनों का स्वाभाविक सम्बन्ध भी अपौरुषेय है । एवं से अपौरुषेय माना जा सकता है । यह सत्र कुछ स्वीकार श्राप्तवचन - प्रमाण से वाक्यरचनात्मक वेदशास्त्र की तत्प्रतिकृतिरूप प्रयोगलक्षण वेदशास्त्र भी इस दृष्टि कर लेने पर भी ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' इस पौरुशेयता का अपलाप नहीं किया जा सकता । इसप्रकार श्रुतिशास्त्र की अपौरुषेयता समतुलित पौरुषेयता स्वीकार कर लेने से सर्वश्रुति - सर्वसिद्धान्त समन्वय भी हो जाता है, एवं मन्त्रवाक् की उक्त परिभाषा के आधार पर स्वतःप्रामाण्यानुगता पूर्वोपात पहिली विप्रतिपत्ति का भी भलीभाँति निराकरण हो जाता है । * - यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्त तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ ( कठोपनिषत् ४।८ । ) । ६६

पृष्ठ 115

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तृतीयखण्ड दूसरी विप्रतिपत्ति का स्वरूप यह था कि, “ यदि प्राकृतिक तत्त्वों के आधार पर पुरुषविशेषों नें वैदिकसाहित्य की रचना की है, तो क्या आज भी कोई तत्त्वज्ञ उन तत्त्वों के आधार पर नवीन वेदमन्त्रों का निर्म्मण कर सकता है? । यदि ऐसा हुआ, जो कि होना पौरुषेयतापक्ष में सम्भव है, तो उन नवीन मन्त्रों का विनियोग कहाँ होगा?, क्या अनादिसिद्ध यज्ञपद्धतियों का स्वरूप बदल दिया जायगा " । नेति-होवाच । प्रकृति में जितने तत्त्व हैं, उन सबका अन्वेषण हो चुका है, यह प्रजा का दृढ़ विश्वास I प्रकृति में तत्त्वात्मक वेद के जितने पर्व हैं, उन सबके अनुरूप मन्त्र - ब्राह्मणात्मक शब्दवेद की रचना हो चुकी है, जैसाकि भूमिका - द्वितीयखण्ड में यत्र - तत्र प्रकरण विशेत्रों में स्पष्ट कर दिया गया है । जो कुछ जानने योग्य था, सब कुछ जाना जा चुका है । जो नहीं जानने का है, वह आकल्पान्त नहीं हीं जाना जायगा । ऐसी सिद्ध - दशा में साध्यदशा से सम्बन्ध रखने वाली उक्त विप्रतिपत्ति का उत्थान ही सम्भव नहीं है । हाँ, कल्पान्त में जत्र वेदवाङमय कालातिक्रम से लुप्त हो जायगा, तो कल्पादि में पुनः तत्त्ववेद ऋषियों के अन्तःकरणों में प्रस्फुटित होगा, एवं पुनः तदनुरूप शब्दवेद का अविर्भाव होगा । पूर्वोपात्त तीसरी विप्रतिपत्ति का निराकरण भी प्रकृत निराकरण से ही गतार्थ है । हाँ इस सम्बन्ध में पाठकों को यह सूचित कर देना प्रासङ्गिक न माना जायगा कि, यज्ञं तिकर्त्तव्यता से सम्बन्ध रखने वाला मन्त्र - ब्राह्मण - अरण्यक, नामक वेदभाग तो यज्ञपद्धतियों के नियन्त्रण से आजतक स्व स्वरूप से सुरक्षित चला आ रहा है । परन्तु ज्ञानकाण्डानुगत, वेदका उपनिषत् भाग विक्षिप्तों की प्रक्षिप्तशीला के अनुग्रह से अवश्य ही आंशिकरूप से कलुत्रित हो गया है । त्रेतायुगकालीन राम - सीता का महत्त्व बतलाने वाली ' रामतापनीयोपनिषत् ' - द्वापरान्त - कलिखन्धि में अवतीर्ण कृष्णा - राधा का महत्त्व प्रतिपादन करने वाली ' गोपालतापनीयोपनिपत् ', ' हरे राम हरे राम ' की ध्वनि से समाकुलित ' कलिसन्तरणो-पनिषत् ' आदि कतिपय उपनिषद्ग्रन्थ वेदमर्य्यादा से एकान्ततः बहिर्भूत है, स्वाथियों की स्वार्थलीलामात्र है, जोकि ऐसा कथन हमारे अन्धश्रद्धालु- धार्मिक जगत् के लिए एक कटूक्ति ही मानी जायगी । १८ - उपनिषच्छास्त्र का अक्षुण्ण वेदव-अबतक के परिच्छेदों से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि, तत्त्वात्मक वेद अपौरुषेय है, नित्य-कूटस्थ है, अकृतक है । एवं तत्त्वप्रतिपादकात्मक, तत्त्ववाक्समतुलित, अतएव अपौरुषेयसम शब्दात्मक मन्त्र-ब्राह्मणलक्षण वेदशास्त्र पौरुषेय है, अनित्य है, कृतक है । तवात्मक वेद वास्तविक वेद है, शब्दात्मक वेद वेदग्रन्थ है, उपचारविधि से वेद है ॥ यदि उपचारविधि को छोड़ते हुए हमसे शब्दात्मक वेद की अपेक्षा से ' क्या उपनिषत् वेद है? ' यह प्रश्न किया जायगा, तो हम उत्तर देंगे कि, “ संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उप-निषत् ” चारों ही ग्रन्थ वेदग्रन्थ हैं, बेद नहीं है, फलतः उपनिषत् वेद नहीं है " । यदि उपचारविधि को आगे करते हुए उक्त प्रश्न किया जायगा, तो कात्यायन, श्रापस्तम्ब, यास्क, शवर, पाणिनि, पितृभूत, शङ्कर, कुमारिल, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, वृद्धबाचस्पति, उव्वद, सायणादि आचार्यों नें इस सम्बन्ध में जो सिद्धान्त स्थापित किया है, हमें भी उसी ग्रास्तिक - सर्वसम्मत - अनादिसिद्ध सिद्धान्त का अनुगमन करना पड़ेगा, और कहना पड़ेगा, कि – ' उपनिषित् अवश्य ही वेद है ' । १६ - वेदभक्तों की वितण्डा, और उसका निराकरण-उचित था कि, पूर्वतोऽनुवृत प्रस्तुत ४ थे प्रश्न की मीमांसा यहीं समाप्त कर दी जाती । परन्तु अकारण-वत् - एक कारणविशेष से इस सम्बन्ध में दो शब्द कहना चोर शेष रह गया है । यद्यपि हम जानते हैं कि, ६७

पृष्ठ 116

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भाष्यभूमिका कारण- विशेष से प्रयुक्त दो शब्दकथन विद्वानों की दृष्टि में सर्वथा महत्वशून्य, श्रतएव श्रात्यन्तिक रूप से व्यर्थ है । तथापि सामान्य आस्तिकप्रजा की स्वाभाविक निष्ठा की रक्षा के नाते हमें उस व्यर्थकारण का भी श्राश्रय लेना पड़ रहा है । ' प्रियं च नानृतं ब्रूयात् ' इस मन्वादेश को शिरोधार्य करने वाला एक भारतीय गतानुगतिक उस प्रिय कथन का कदापि अनुगमन नहीं कर सकता, जो अनृतभाव का पोषक है । यदि किसी के सिद्धान्त से सत्यसिद्धान्त पर आक्रमण होता है, तो हमें उस कल्पित सिद्धान्त का अवश्य ही स्पष्टीकरण कर देना चाहिए, फिर चाहे सामान्यजनसमाज में वह सिद्धान्त, तथा सिद्धान्तप्रवर्तक व्यक्ति सम्मानाई ही क्यों न रहा हो । कुछ समय पूर्व वेदसंदेश को आगे कर सर्वश्री स्वामी दयानन्दजी ने वेदशास्त्र के सम्बन्ध में अपना यह मन्तव्य प्रकाशित किया था कि, ' वेद का मन्त्रभाग, उसमें भी उपलब्ध चार संहिताएँ तो ईश्वरकृत होने से वेद है, परन्तु तैत्तिरीयादि कृष्णयजुः संहिताएँ ( वेदशाखाएँ ), विधिन । मक ब्राह्मणग्रन्थ, श्रारण्यक्प्रन्थ, एवं उपनिषत्प्रन्थ, ऋषिकृत होने पौरुषेय हैं, वेद नहीं, किन्तु वेदव्याख्यानमात्र हैं " । उधर स्वामी जी से पहिले जितनें वेदविचारक उत्पन्न हुए, सबने एकस्वर से मन्त्र - ब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेद का वेदत्व स्वीकार किया है । आर्यप्रजा के श्रद्धा - विश्वास दोनों पर समान रूप से प्रवाहित रहा हैं । और उपचार विधि से ऐसे श्रद्धा-विश्वाम सर्वथा मान्य हैं । वर्तमानयुग के वेदविचारकों में सर्वश्री सत्यत्रत ' सामश्रमी ' महाभाग का नाम भी गणनाई है | आपने निरुक्का लोचन, ऐतरेयालोचन, त्रयीटीका, त्रयीपरिचय, आदि कई एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं । १८४६ ख्रिस्ताब्द मई की २८ ता ० को पाटलीपुत्र ( पटना ) में श्रापका जन्म हुआ, एवं १ ९ ११ ख्रिस्ताब्द १ जून को स्वःप्रयाण हुआ | आपकी विचारशैली भी वैदिक साहित्य के सम्बन्ध में एक उपयोगी दृष्टिकोण का समर्थन करने वाली है । श्रापने भी अपने स्वतंत्र ग्रन्थों में ' मन्त्रब्राहा बायोर्वे दनामधेयम् ' सिद्धान्त का ही समर्थन किया है । साथ ही कृतकत्वाकृतकत्त्व सन्बन्ध में भी आपने ' कृतकत्त्व ' पक्ष को ही बलप्रदान किया है । इसप्रकार प्राचीन चीन सभी वेदविचारकों नें मन्त्रवत् ब्राह्मणभाग का भी वेदत्त्व स्वीकार किया है । परन्तु अङ्गिरादि ४ ऋषियों के ही अन्तःकरण में प्रकट होने वाली ४ मन्त्रसंहिताओं के समर्थक स्वामी जी ने ब्राह्मणभाग के वेदत्य की उपेक्षा कर अपनी अनन्य वेदनिष्ठा का आदर्शपरिचय १ देने का अनुग्रह किया है, जिस परिचय का सर्वथा भ्रान्ति पूर्णत्य, श्रतएव निर्मूलस्व, श्रतएव च बालबुद्धि कल्पनामात्रत्वेन निःसारत्व विद्वञ्जनों द्वारा तत्तत् समयविशेषों में प्रमाणित किया जा चुका है । हमारा अपना ऐसा संकल्प था कि, श्रज्ञ जनता को छोड़ कर जो विचारशील | सामाजिक विद्वान् हैं, वे अवश्य ही स्वामी जी के वैदिक दृष्टिकोण से अपने आपको पृथक् कर चुके होंगे । उदाहरण के लिए अथर्ववेद भाष्यकार सर्वश्री प्रो ० राजाराम महोदय, तथा सुप्रसिद्ध वेदप्रेमी श्रीदामोदरसातवलेकर महोदय के साभा भाष्यानुगत अथर्वभाध्य, मृतपितृ श्राद्ध समर्थक ' यमपितृपरिचय ' नामक रचनाएँ सन्तोष का कारण बन रही थी । परन्तु हमारा यह सुखस्वप्न उस समय सर्वथा विलीन होगया, जब माननीय भगवद्दत्तजी महोदय लिखित ' ब्राह्मणप्रन्थे तिदास प्रकाशिका ' नामकी भूमिका से युक्त, वि ० सं ० १ ९ ८२ में प्रकाशित ' वैदिककोश ' देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । भूमिका भागके – ' क्या ब्राह्मण वेद है? ' इस द्वितीय प्रकरण का आरम्भ करते हुए श्रापनें निम्न-लिखित उद्गार प्रकट किए हैं । ६८

पृष्ठ 117

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तृतीयखण्ड “ शत्रर, पितृभूति, शंकर, कुमारिल, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, वाचस्पतिमिश्र, रामानुज, उव्वट, सायण, प्रभृति सत्र ही बड़े बड़े आचार्य, मन्त्र ब्राह्मण दोनों को वेद मानते आए हैं । गत ३००० वर्षों में आर्यावर्त के किसी विद्वान् * को इस बात का सन्देह नहीं हुआ । इतने काल में ग्रार्यों के हृदयों में ब्राह्मणों की श्रुतियों का उतना ही मान रहा है जितना संहिताओं के मन्त्रों का । आर्यों के समस्त श्रीतकर्म इन दोनों को तल्य मान कर ही होते चले आए हैं + + + + + + । यह सब कुछ ही था, पर विक्रम की इस बीसवीं शताब्दी में दयानन्द सरस्वती ने इन सबके विरुद्ध इस बात का प्रकाश किया कि, ब्राह्मणग्रन्थ वेद नहीं है । वे ऋषिप्रोक्त हैं, ईश्वरोक्त नहीं A । इत्यादि । दयामन्द सरस्वतीने स्वपक्षपोषणार्थ अनेक युक्तियाँ B दीं । वे मुक्तियाँ इस बातको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त ही हैं । उनके विरुद्ध जो उचित पूर्वपक्ष उठाया गया है, हम उसका उत्तर तो देंगे ही, पर कुछ एक सर्वथैव नए प्रमाण भी करते हैं । इन प्रमाणों से ब्राह्मणों का अनीश्वरोक्त होना सिद्ध होजायगा । अन्त में हम यह भी प्रस्तुत बतावेंगे कि, इतने बड़े बड़े पुराने आचार्यो को इस बात में भ्रम क्यों होगया C. I लीजिये अब प्रमाणों के चल को देखिये, धौर सत्य को ग्रहण कीजिये + + + + ( वै ० को ० भू ० ३५ पृ ० ) । " एवमिमे सर्वे वेदा निम्मिताः, सकल्पाः, सरहस्याः, सब्राह्मणाः, सोपनिषत्काः, सेतिहासाः सान्वाख्यानाः, सपुराणाः, सस्वराः, ससंस्काराः, सनिरुक्ताः, सानुशासनाः, सानुमार्जनाः, सवाकोवाक्याः ” ( गो ० ना ० पू ० २।६ । ) । यहाँ ब्राह्मणकार स्वयं कह रहे हैं कि, ( १ ) कल्प, ( २ ) रहस्य, ( ३ ) ब्राह्मण, ( ४ ) उपनिषत्, ( ५ ) इति-हास, ( ६ ) अन्वाख्यान, ( ७ ) पुराण, ६ ) संस्कार, ( १० ) निरुक्त, ( ११ ) अनुश सन, ( १२ ) अनु-( ८ ) स्वर, ( मार्जन, और ( १३ ) वाकोवाक्य, आदि ग्रन्थ वेद नहीं है । जब ब्राह्मणकार स्वयं इन्हें वेद नहीं मानते, तो फिर हम क्यों इन्हें वेद मानें ” ( भू ० पृ ० ३४ ) । उक्त कथन से श्रीमानों का यह अभिप्राय विदित होता है कि, गोपथब्राह्मण में ' वेदा: ' शब्द पृथक निर्द्दिष्ट है, एवं ‘ सब्राह्मणा: ’, सोपनिषत्का: ', पृथक् निर्द्दिष्ट है । यदि ब्राह्मणार कोपनिषत् भी वेद होते तो * -- यथार्थं कथन हैं । जो वास्तव में विद्वान् हैं, उन्हें तो आज भी ब्राह्मणभाग के वेदत्त्व पर कोई सन्देह नहीं है । -- आर्यभूमि में उत्पन्न एक सच्चा आर्य तो अपनी इस मान्यता का ग्राज भी अनुगमन ही करेगा । X - ' यह सब कुछ ही था, और तबतक रहेगा, जबतक वेदार्थवित्- विद्वान् इससे विपरीत, अशास्त्रीय कल्पित भावनाओं के निराकरण के लिए सदा सन्नद्ध रहेंगे । A - क्या स्वामीजी का अभिमत निराकार ईश्वर भी मन्त्रोच्चारण किया करता है? । B. — केवल युक्तियां, क्योंकि इस सम्बन्ध में प्रमाण मिलना असम्भव था । और विशुद्ध युक्तिवाद का प्रजा की दृष्टि में कितना महत्व है?, इस सम्बन्ध में कुछ कहना हीं नहीं है । C. - इसलिए कि, वे स्वामी जी के अनार्षविचारों के अनुगामी न थे! ६६

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भाष्यभूमिका इनका पृथक् निर्देश न होता । इस सम्बन्ध में यही कहना है कि, जिस तत्त्वात्मक वेद का पूर्वखण्डों में विस्तार से निरूपण किया गया है, उस तात्त्विकवेद के मूल तूल भेट से दो विभाग हैं मन्त्रवेद है, तूलतत्त्रवेद की प्रतिकृति ब्राह्मणवेद है । मूलवेद, तूल वेद के समतुलन । मूलतत्त्ववेद की प्रतिकृति गौए है । केवल इस श्रृङ्गाङ्गीभाव के स्पष्टीकरण के लिए ही दोनों का पृथक पृथक में मूलवेद प्रधान है, तूलवेद निर्देश हुआ है । हमें तरस आता है आपके उपर्युक्त उद्धरण पर इसलिए कि, ' ब्राह्मणभाग ईश्वरोक्त नहीं है ' जिस अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए आप उक्त उद्धरण उद्धृत कर रहे हैं, वह आपके मन्तव्य के सर्वथा विपरीत ब्राह्मणभाग का भी ईश्वरकर्तृत्व सिद्ध कर रहा है । ' एवमिमे सर्वे वेदा विनिर्मिताः ' के सम्बन्ध में यदि आप ' केन निर्मिताः ' का निर्णय कर लेते, तो सम्भवतः ऐसी भूल न होती । किसने वेदादि की रचना प्रश्न का समाधान करती हुई उपनिषच्छ्र ुति कहती है - की!, इस “ एव ं वा अरंऽस्य महतोभृतस्य निःश्वसितमेतद्यद् - ऋग्वेदो, यजुर्वेदः, सामवेदो, ऽथर्वाङ्गिरसः, इतिहासः, पुराणं, विद्याः, उपनिषदः, श्लोकाः, सूत्राणि, अनुव्याख्यानि, न्याख्यानानि । ययैवैतानि निःश्वसितानि ” ( बृ ० श्र ० उ ० २ । ४ । १० । ) । जो महानभूत मन्त्रवेद का प्रवर्त्तक है, वही ब्राह्मणवेद का प्रवर्त्तक है, साङ्गवेद उसी का निःश्वास है " इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में श्रुति मन्त्रवत् - ब्राह्मणभाग का भी ईश्वरकर्तृत्व सिद्ध कर रही है । कदाचित् यह कहेंगे कि, बृ ० श्रुति में उपनिषत् शब्द तो आया है, परन्तु ' ब्राह्मण ' शब्द नहीं आया । उत्तर में श्राप क्या आप उपनिषद्भाग को वेद मानते हैं? । नहीं, तो क्यों? हाँ, तो तत्सम ब्राह्मण भी वेद कहेंगे आपके ( पृष्ठ संख्या ३६ ) कथनानुसार इतिहास - पुराणशब्द तो ब्राह्मणभाग की ही संज्ञा क्यों नहीं? फिर कथन में भी कोई सार नहीं रह जाता । उधर तत्त्ववेददृष्टि से हमारे पक्ष में भलीभांति उक्त है वचन । तत्र तो उक्त हो रहे हैं । चरितार्थ को एक दूसरे काल्पनिक हेतु की मीमांसा और कर लीजिये । आगे जाकर स्मृति के निम्नलिखित श्लोक उद्घृत करते हुए आप कहते हैं— “ उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते ॥ ( मनुः २।१४० ) । इस श्लोक में रहस्य शब्द आया है । रहस्य शब्द श्ररण्यक, अथवा उपनिषत् है । उपनिषत्, और आरण्यक आज कल ब्राह्मणों का भागमात्र है । मनु का द्योतक निर्देश करते हैं । अतएव मनुजी की दृष्टि में ब्राह्मण वेद नहीं है " ( भू ० ३५ पृ इनका ० ) वेद से पृथक कैसा अश्रुतपूर्व साहस है । श्रीमानों के ही द्वारा आरम्भ में उद्धृत पूर्वोक्त गोपथवचन ' सकल्पा सरहृस्या: -सब्राह्मणः – सोपनिषत्का: ' इत्यादिरूप से कल्प - रहस्य, ब्राह्मण, उपनिषत्, श्रादि: -का परस्पर भेट * क्यों, क्या निश्चयात्मक निर्णय नहीं कर सके, जिससे ' अथवा ' कहना पड़ा १ १००

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तृतीयखण्ड बतला रहा है । और इसी विभागदृष्टि को प्रामाणिक समझते हुए आपने १३ संख्या उद्धृत की हैं । और आज मनूक्त ‘ सरहस्य ' को श्राप उपनिषदादि का द्योतक मानने की भयङ्कर विस्मृति के अनुगामी बन रहे हैं । लमतिपल्लवितेन । ' छिन्ने मूले ० ' न्याय से जब मूलारम्भ ही कल्पित है, तो मार्गे के हेतुत्रों की मीमांसा व्यर्थ है । ‘ स्थालीपुलाकन्याय ' से विद्वान् सत्रकी यथार्थता का अनुमान लगा सकते हैं । ब्राह्मसभाम का वेदत्त्व प्रमाणित करने वाले निम्नलिखित वचनों पर दृष्टि डालिए— ( १ ) - " वेदे खल्वपि - पयोव्रतो ब्राह्मणः, यवागूव्रतो राजन्यः, आमिक्षात्रतो वैश्यः " ( म ० भा ० १ । १ । १ । ) । ( २ ) - " वेदशब्दा अप्येवमभिवदन्ति - योऽग्निष्टोमेन यजते, य उ चैनमेव ं वेद " । ( ३ ) —– “ वेदेऽपि - य एव ं विश्वसृजः सत्राण्यध्यास्ते, इति तेषामनु-कुर्चसाद्वत् सत्राण्यध्यासीत ” ( इत्यादि ) उक्त वचनों में ब्राह्मण भाग के लिए ' वेदे खल्वपि ' - ' वेदशब्दा येवमभिवदन्ति ' - ' वेदेऽपि ' इत्यादि स्पष्ट शब्दों में ‘ वेदे ' नाम व्यवहृत हुआ है । इसप्रकार इन प्रमाणों से अपने कल्पित मन्तव्य का आमूलचूड़ निराकरण होते देख कर आप निम्नलिखित शब्दों में उक्त वचनों का समन्वय करने की व्यर्थ चेष्ठा करने लगते हैं— " वेदव्याख्यान होने से, तथा प्रवचन की भाषा होने से ही इन्हें वेद के अत्यन्त समीप माना जाता है । जिस प्रकार हम भी कल्पों को वैदिक तो मानते हैं ( बड़ा अनुग्रह ), पर साक्षान ईश्वर क्त वेद नहीं । वैसे ही प्राचीन लोग भी ब्राह्मणों को वैदिक तथा औपचारिक दृष्टि से वेद कहते थे ” ( भूमिका ) । ४– “ मन्त्रत्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " ( आपस्तम्बश्रौतसू ० २४।१।३१ ) । ५– “ मन्त्रत्राह्मणं ‘ वेद ' इत्याचक्षते " ( बोधायनगृ ० सू ० २।६।२ । ) । ६ – “ आम्नायः पुनःर्म्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च " ( कौशिकमृ ० १।३ । ) । इत्यादि वेदसमर्थक याप्रमाणों के सम्बन्ध में भी आप उसी कल्पित भावना को आगे कर निम्न-लिखित उद्गाार प्रकट कर रहे हैं— “ श्रौतसूत्रों का जन्मदाता जब ब्राहारण स्वयं कह चुका है कि, वह वेद नहीं है ( सिद्ध कीजिए! ), तो कल्पसूत्रों के इन रमार्त्त प्रमाणों का क्या मूल्य हो सकता है " । कल्पसूत्र स्मार्त्त ' प्रमाण हैं । कृपाकर यह और बतला दीजिए कि ब्राह्मणभाग को आप किस प्रामाण्य-कोटि में रखते हैं? | स्मार्त्त ' कोटि का तो आपके मुख से हो खण्डन हो रहा है । शेष रहती है श्रुतिकोटि । श्रुतिप्रमाण स्वतःप्रमाण बनता हुआ वेदप्रमाण है । कैसी विशृङ्खलता है, कैसी लथ- विचारधार । है?, पाठक स्वयं मुकुलितनन बनकर विचार करें । १०१

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भाष्यभूमिका यह है कल्पनारसिकों के गन्धर्बनगर का भग्नावशेष । इस विषय में अधिक कहना समय का दुरुपयोग करना है । ब्राह्मण ( विधि, आरण्यक उपनिषत् ) भाग वेद है, अथवा नहीं? इस प्रश्न का सम्यक्-समाधान तो पूर्वप्रतिपादित वेदस्वरूपण से ही गतार्थ है । अत्र इस सम्बन्ध में केवल एक दृढ़तम - अश्माखण-प्रमाण बतला कर प्रकरण समाप्त किया जाता है । वाद का आश्रय लेते हुए ब्राह्मणभाग के समर्थक श्रौतस्मार्त्त प्रमाणों को थोड़ी देर के लिए काल्पनिक मतवादियों के अनुसार हम भी प्रक्षिप्त, अथवा अर्थान्तरप्रतिपादक मान लेते हैं । यह सत्र कुछ स्वीकार कर लेने पर भी ब्राह्मणभाग के वेदत्त्व को अक्षुण्ण बनाए रखने वाला एक ऐसा हेतु बन्त्र रहता है, जिसका प्रयत्न सहस्रों से भी निराकरण नहीं किया जासकता । उपनिषद्ग्रन्थों में ईशादि - दशोपनिषद् ग्रन्थ सुप्रसिद्ध हैं । सभी इन्हें प्रमाण मानते हैं । इनमें पहिली ' वाजसनेय ' नाम की ईशोपनिषत् ' है । ईशो-पनिषत् आत्मा की उपनिषत् ( मूल रहस्यविज्ञान ) बतलाने वाली ब्रह्मविद्यात्मिका उपनिवत् है । यह भी सर्वविदित है कि, वादी के द्वारा मूल - ईश्वरीय वेद - रूप से स्वीकृत उपलब्ध शुक्लयजुः संहिता के ४० वें अध्याय का ही नाम ' ईशोपनिषत् ' है । इससे पूर्वके ३६ अध्यायों में यज्ञकम्मों की इतिकर्तव्यता का विश्लेषण हुआ है । कर्म्म करना ही क्यों चाहिए? इस प्रश्न की उपनिषत् ' आत्मविद्या ' है, जैसा कि भूमिका - प्रथमखण्डान्त-र्गत ‘ उपनिषच्छब्दार्थ ' प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । ऋषि ने पहिले विविध यज्ञ - कम्मों का निरूपण किया । अनन्तर ४० तें अध्याय में उसकी उपनिषत् बतलाई । ' कुर्वन्नेवेह कम्मणि ' इत्यादिरूप से श्रात्मज्ञानोदयोपथिक- निष्कामकर्म्मलक्षण बुद्धियोग का उपदेश दिया । संहिता वेद हैं, यह सर्वसम्मत है, संहितावेद का ४० वाँ अध्याय ही ईशोपनिषत् है, यह भी सर्वविदित है । क्या उपनिषयों के वेदत्त्व के सम्बन्ध में इससे भी अन्य कोई प्रमाण अपेक्षित है? । प्रमाणसिद्धा इस प्रत्यक्ष स्थिति को देखते हुए भी जो महाशय ब्राह्मणभाग को वेद न मानने का दुःसाहस करते हैं, उन्हें श्राज से ही अपनी मानी हुई वेदसंहिता को भी वेद शब्द से व्यवहृत करना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उनके मतानुसार मनुष्यकृत ईशोपनिषत् यजुः संहिता का ही अन्तिम भाग है । अस्तु इस सारहीन चर्चा को यहीं नमस्कार कर अन्त में हम अपने प्रकान्त प्रश्न के सम्बन्ध में यही कह देना चाहते हैं कि-" उपनिषत् अवश्य ही वेद है " । १०२