Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 91–100

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100

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तृतीयखण्ड है कि, ये सादि सान्त हैं । क्योंकि वेदशास्त्र भी ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( वैशेषिकद ०६।१।१ ) के अनुसार प्रयोगशब्दात्मक बनता हुआ अनित्य है, अतः इसे भी सादि सान्त, अतएव पौरुषेय ही मानना न्यायसङ्गत है । इसके प्रमाण के लिए “ काठकं - कापालकं- पैप्पलादकं मौद्गलं ' इत्यादि पुरुष समाख्या हीं पर्य्याप्त हैं । ये पुरुष- ! समाख्या बतला रहीं हैं कि, प्रयोगशब्दात्मक वेदशास्त्र कटादि के पीछे कृतरूप बनता हुआ सादि ही माना जायगा । बात यथार्थ है । कठादि पुरुषों से समाख्यात वेद कटादि से पहिले क्योंकि अनुपपन्न हैं, अतएव इन्हें अनित्य ही कहा जायगा । ( वेदांच के सन्निकर्षं पुरुषाख्याः ) ( २ ) — अपिच - ' बबरः प्रावाह रिपर कामयत ' - ' कुसुरुबिन्द औद्दालकिरकामयत ' इत्यादि लक्षण जनन - मरणभावानुबन्धी वाक्य वेद में सुने जाते हैं । इन नित्य वाक्य - दर्शनों से भी यह सिद्ध हो रहा है । कि, बबर - कुसुरुचिन्दादि पुरुषविशेषों के पीछे हो वेदशास्त्र का निर्माण हुआ है । इस नित्य दर्शन हेतु से भी वेदों का कृतकत्त्व, अनित्यत्त्व, तथा सादि - सान्तत्त्व ही सिद्ध हो रहा है । ( नित्यदर्शनाच्च ) । ( ३ ) - क्षेप प्रयोगशब्ददृष्टि से यथार्थ हैं । प्रयोगलक्षण शब्द अनित्य हैं, अतएव तद्रूप बेदशास्त्र भी नित्य ही है । परन्तु वाक्- लक्षण शब्दों की दृष्टि से इन आक्षेपों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता । पूर्वपक्षी ने प्रयोगलक्षण अनित्य शब्दों को आगे करते हुए आक्षेप किया है । सूत्रकार वाक् लक्षण नित्य शब्द दृष्टि से आक्षेप का निराकरण करते हुए कहते हैं— ' उक्त ं तु शब्दपूर्वत्त्वम् ' । सूत्र का तात्पर्य यही है कि, ' वेद, विद्या, विज्ञान ' तीनों शब्द अभिन्नार्थ के सूचक हैं | नित्यसिद्धा विद्या ही वेद है, यही नित्य ( ईश्वरीय ) विज्ञान है । नित्यसिद्ध ये विज्ञान शब्दों से प्रतीत होते हैं । इन नित्यसिद्ध, अर्थरूप विज्ञानों का, तथा तद्वाचक नित्यसिद्ध वाक् - लक्षण नित्य शब्दों का औत्पत्तिक ( नित्य ) सम्बन्ध है, जिसका बोध हमें उपदेश के द्वारा हुआ करता है । यह सिद्धान्त ' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुलब्धे, तन् प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्त्वात् ' इस सूत्र से पूर्व में उक्त है । तत्तदर्थावबोध के लिए तत्तद्विशेष प्राप्तपुरुषों का तत्तदर्थवाचक तत्तच्छब्दप्रयोग ही उपदेश है | अपने स्वाभाविक औपपत्तिक सम्बन्ध से उपदिष्ट शब्द से सर्वथा अभिन्न, उस अनुपलब्ध - शब्दवाच्य-विशेष विज्ञान की उपलब्धि हो जाती है । शब्दद्वारा उपलब्ध वह नित्य विज्ञान ही विद्या है, वही वेद है । द्रष्टा महर्षि अपनी दृष्टि से दृष्ट अर्थका अस्मदादि अनार्ष व्यक्तियों के लिए उपदेश करते हैं । द्रष्टा का यह वाक्य | जहाँ स्वयं द्रष्टाओं के लिए दृष्टि है, वहाँ हमारे लिए दृष्टिस्वरूपा - ( प्रत्यक्षस्थानीया ) श्रुति है । इसप्रकार वेदात्मिका नित्यविद्या का अपनी दृष्टि से साक्षात्कार करके ही द्रष्टा महर्षि शब्दों के द्वारा हमें उपदेश दिया करते है । जिस विद्या का द्रष्टा लोग हमें शब्दों के द्वारा उपदेश करते हैं, वह विद्या नित्य है, पहिले से ही विद्यमान है । द्रष्टागरण केवल द्रष्य हैं, कर्त्ता नहीं । ऋषिगण नित्या वेदविद्या को उत्पन्न नहीं करते, अपितु नित्यसिद्धा विद्या का साक्षात्कारमात्र करते हैं । विद्यावाचक वाक् - लक्षण शब्द नित्य बतलाए गए हैं, साथ ही इन शब्दों का उस विद्या के साथ नित्य ही सम्बन्ध बतलाया गया है । ऐसी स्थिति में वाक् - लक्षणा शब्दपूर्वा विद्या ( वेदतत्त्व, किंवा तत्त्वात्मक वेद ) कैसे अनित्य हो सकती है । फलतः वेदविद्या का नित्यत्त्व सर्वथा अक्षुण्ण बना रह जाता है । ७३

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भाष्यभूमिका ( ४ ) —– ‘ काटकम् - कापालकम् ' इत्यादि पुरुषाख्याएँ वेद विद्या का कालसंनिकर्ष बतला रहीं हैं, इस आक्षेप का भी कोई महत्त्व नहीं है । पुरुषाख्या का यह तात्पर्य्य नहीं है कि, वह पुरुष ही उस श्राख्यात विषय का कर्त्ता है । अपितु प्रवचन के सम्बन्ध से भी आख्या उपपन्न हो जाती है । विद्या का अध्यापन ही प्रवचन है । नित्यसिद्धा वेदविद्या का बोध उपदेशलक्षण प्रवचन के बिना असम्भव है । उपदेष्टा महर्षि-वेदविद्या को उत्पन्न नहीं करते, अपितु नित्यसिद्ध । विद्या को दृष्टि से हृदयङ्गममात्र करते हैं । उन वेदविद्याओं में जिस प्राप्तमहर्षि ने अपनी दृष्टि से जिस विद्या का सर्वप्रथम आविष्कार किया, ( वेदयुगकालीना - यशः ख्यापनलक्षणा परिपाटी के अनुसार ) वह विद्या भी उसी द्रष्टा महर्षि के नाम से प्रसिद्ध हुई, एवं उस महर्षि का उपदेशलक्षण वाक्यग्रन्थ भी उसी के नाम से व्यबहृत हुआ । उपदेशलक्षण शब्द के प्रयोगभाव के अनित्य रहने पर भी वाक- लक्षण उपदेशशब्द भी जब अनित्य नहीं है, तो तद्वाच्या वेदविद्या कैसे अनित्य हो सकती है १ । प्रवचनकर्तृत्वेन ही काटकम् - कापालकम् - इत्यादि आख्याएँ प्रचलित हैं, यही निष्कर्ष है । शब्द और अर्थ का क्योंकि तादात्म्य है, अतएव अर्थात्मक विज्ञान तथा शब्दात्मक शास्त्र, दोनों के लिए ' वेद ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । नित्या वेदविद्या भी वेद है, तत् प्रतिपादक शब्दशास्त्र भी वेद है । साक्षात्कृतधर्मा महामहर्षियों ने साक्षात्कृतधर्म्मा मनुष्यों को उपदेशलक्षण शब्दवेद से अर्थवेद का बोध कराया है । त्रिल्मग्रहण के लिए ही वेद - वेदाङ्गलक्षण ग्रन्थ का समाम्नाय संकलित हुआ है, जैसा कि निम्न लिखित यास्कवचन से प्रमाणित है— साक्षात्कृतधर्म्माण ऋषयो वभूवुः । तेऽवरेभ्यो ऽसाक्षात्कृतधर्म्मभ्य - उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्मग्रहणायेमं ग्रन्थं समाम्नासि पुर्वेदं च, वेदाङ्गानि च " ( यास्कनिरुक्त- - ) इति । उक्त नैगमिक वचन में पठित ' मन्त्रान् सम्प्रादुः ' का ' मन्त्र ' पद नित्यसिद्धा वेदविद्या, तथा तत्प्रतिपादक शब्दात्मक वेदशास्त्र, दोनों का प्रतिपादक बन रहा है । प्रयोगलक्षण श्रनित्य शब्दराशि की मूलप्रतिष्ठा बना हुआ वाक् - लक्षण नित्य शब्दराशिरूप शब्दवेद का, तथा तद्वाच्य विद्यावेद का, दोनों का समाम्नायमात्र संनिकृष्टकाल से सम्बन्ध रखता है । नित्या वेदविद्या, एवं तत्प्रतिपादिक नित्या शब्दाशि रूप वेदशास्त्र का काल से कोई सम्बन्ध नहीं है । दोनों ही स्वस्वरूप से सर्वथा अनादि, नित्य, तथा पौरुषेय हैं । ' आख्या प्रवचनात् ' इस समाधानसूत्र का यही तात्पर्य है । ( ५ ) -- ' बबरः प्रावाइणिरकामयत ' - ' कुसुरुबिन्द श्रद्दालकिरकामयत ' - ' कुशिकस्य सूनुः ' --' टिषेणो होत्रमृपिर्निषदन् देवापिः ' इत्यादि अनित्य अर्थ दर्शनों के आधार पर प्रतिष्ठित ' विमतं वेद-वाक्यं पौरुषेयम् । वाक्यत्त्वान्, भारतादिवत् ' इस अनुमान से वेदशास्त्र पौरुषेय है, यह दूसरा श्राक्षेप था । इस सम्बन्ध में सूत्रकार ने ' परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ' इस सूत्र के द्वारा जो समाधान किया है, वैज्ञानिक व्याख्याता उस सूत्र का यह समन्वय करते हैं कि--७४

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यद्यपि नित्यसिद्धा आधिदैविक विद्याओं का निरूपण ही वेदशास्त्र का मुख्य विषय है । तथापि विद्याप्रदर्शन के प्रसङ्ग में विषयसमन्वय की दृष्टि से ऋषियों ने यत्र तत्र आधिभौतिक - लोकचरित्र ( इतिहास ) का भी गौणरूप से समावेश कर दिया है । फलतः लह लोकवृत्त- प्रदर्शन अपनी प्रासङ्गिक मर्य्यादा से गौण-श्रुतिसामान्यमात्र ( प्रासङ्गिक ) बन रहा है । इन प्रासङ्गिक अनित्य लोकवृत्तों के आधार पर नित्यसिद्धा वेद-विद्या, तथा तद्वाचक नित्यसिद्ध वाक्- लक्षण शब्दराशिरूप वेदशास्त्र की नित्यता पर कोई बात नहीं हो सकता । यद्यपि हम मानते हैं कि, प्रसङ्गोपात्त लोकवृत्तात्मक वेदभाग किसी नित्यविद्या का प्रतिपादक नहीं है । तथापि समष्ट्यात्मक वेदशास्त्र का मुख्य लक्ष्य नित्या वेदविद्या ही है । अतः इस दृष्टि से न तो इसे अनित्य - इतिवृत्तग्रन्थ ही कहा जा सकता, न इसके वेदशास्त्रत्त्व ( नित्यविद्याप्रतिपादकत्त्व ) पर ही कोई आक्षेप किया जा सकता । ( ६ ) - ' कृते वा विनियोगः स्यात् कर्म्मणः सम्बन्धात् ' सूत्र प्रकृत अधिकरण का अन्तिम सूत्र है । व्याख्याताओंों नें इस सूत्र को स्वतन्त्र पूर्वपक्ष, तथा स्वतन्त्र समाधानपरक माना है, जैसा कि पूर्व में दार्शनिक अर्थ बतलाते हुए स्पष्ट किया जा चुका है । सूत्र पढ़ा हुआ है उसी अधिकरण में । त्रकार क्रकंशः पूर्वपक्षों का निराकरण करते आ रहे हैं । पूर्वपक्षोत्थान ' वेदांश्व के ' - अनित्यदर्शनाच्च ' इन दो सूत्रों से अधिकरणारम्भ में ही हो चुका है । दोनों आक्षेपों का क्रमशः ' आख्या प्रवचनात् ' - परं तु श्रुति सामा-न्यमात्रम् ' इन दो सूत्रों से समाधान भी हो चुका है । उधर सूत्रों की स्वाभाविक शैली यह है कि, पूर्वपक्ष-प्रतिपादक सूत्रों का आरम्भ में सन्निवेश रहता है, उत्तरपक्षप्रतिपादक सूत्रों का उसी पूर्वपक्षक्रम से उत्तर में समावेश रहता है । इधर हमारे ये व्याख्याता इस सूत्रशैली के सर्वथा विरुद्ध ' कृते वा विनियोगः ०१ इत्यादि सूत्र को सङ्केतविधि से पूर्वपक्ष का भी सूचक मान रहे हैं, एवं उत्तरपक्ष का भी प्रतिपादक बतला रहे हैं । ' एतत्सूत्रसूचितामेतत्सूत्र णैव निवर्त्तनीयां शङ्कां प्रदर्शयति ' यह वाक्य हमारे उक्त कथन में प्रमाण बन रहा है । अस्तु | हमारी दृष्टि से प्रकृत सूत्र न तो सङ्केत विधि से किसी नवीन शङ्का का उत्थापक है, न नवीन समाधान का प्रवर्त्तक | अपितु ' अनित्यदर्शनाच्च ' इस आक्षेप का जो एक समाधान ' परंतु श्रतिसामान्य-मात्रम इस सूत्र से हुआ है, ' कृते वा - विनियोगः ० ' अधिकरण का यह अन्तिम सूत्र उसी ' अनित्य-दर्शनाच्च ' का एक दूसरा समाधान है । ' कृते वा विनियोगः ० ' इत्यादि सूत्र पटित ' वा ' शब्द इसी वैकल्पिक समाधान का सूचक बन रहा है । इस सूत्र को स्वतन्त्र शङ्का, एवं स्वतन्त्रसमाधानपरक मान लेने पर ' वा ' का क्या स्वारस्य रह जाता है, इस प्रश्न का उत्तरदायित्त्व उन्हीं व्याख्याताओं से सम्बन्ध रखता है । हमें केवल उस अर्थ के समन्वय का अधिकार है, जो अधिकरणमर्य्यादा का अनुगमन करता हुआ ' वा ' स्वारस्य का भी समर्थक रहा है । सम्पूर्ण वेदशास्त्र समष्टिरूप से नित्यविद्या का प्रतिपादक है, यह पञ्चम सुन व्याख्या में स्पष्ट किया जा चुका है । वेदप्रतिपादिना, खण्ड - खण्डात्मिका अनन्त विद्याओं का ब्रह्मविद्या, यज्ञविद्या, इन दो विद्याओं में अन्तर्भाव किया जा सकता है । मौलिकविद्या ब्रह्मविद्या है, यौगिक विद्या यज्ञविद्या है । तत्त्वविद्या मौलिकविद्या है, रासायनिक सम्मिश्रणानुगता, ग्रग्नीषोमात्मिका विद्या यौगिकविद्या है । जिन दो विज्ञानों ७५

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भाष्यभूमिका के लिऐ पाश्चात्य सायन्स में फिजिक्स ( Physics ), केमेस्ट्री ( Chemistry ), ये दो शब्द प्रयुक्त हुए हैं, टीक उन्हीं के लिए हमारे विज्ञानात्मक वेदशास्त्र में ' ब्रह्मविद्या, यज्ञविद्या ' शब्द प्रयुक्त हुए है । मौलिक तत्त्रविद्या ' प्राण, वाक ' भेद से दो भागों में विभक्त है । प्राण की सामान्य संज्ञा ' देवता ' है, वाक् की सामान्य संज्ञा भूत है । सर्वव्यापक, निर्त्यावज्ञानघन ईश्वरप्रजापति की ये ही दो मुख्य सन्तान हैं -' दैवतानि च भूतानि च ' । ऋषि, पितर, असुर, गन्धर्क, पशु, भेद से देवतासंज्ञक प्राणतत्व की मुख्य पाँच नातियाँ हैं । एवमेव ' गुण - अणु - रेणु - भूत - महाभूत ' भेद से भूतसंज्ञक बाकूतत्त्व की प्रधान पाँच जातियाँ हैं । * पञ्चधा - पञ्चधा विभक्त, त्रिः - त्रिः - मर्य्यादा से युक्त ये देव भूततत्त्व ही विश्वस्वरूप के प्रारम्भक ( उपादान ) बनते हुए विश्व के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण हैं । इन दोनों तत्त्वों का विज्ञान ही ब्रह्मविज्ञान, किंवा ब्रह्मविद्या है, जिसके आधार पर यज्ञविद्या प्रतिष्ठित है । यही वेदशास्त्र का एक मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । दूसरा मुख्य प्रतिपाद्य विषय है यज्ञविद्या । यह यज्ञविद्या नित्ययज्ञविद्या, वैधयज्ञविद्या, भेद से दो प्रकार की है । प्राकृतिक तत्त्वों के पारस्परिक अन्तर्य्याम सम्बन्ध से उत्पन्न, आदान - विसर्ग- क्रियात्मक नित्यभाव नित्य-यज्ञात्मक है । पुरुषप्रयत्नसाध्य अग्निहोत्रादि जितनें यज्ञकर्म सुने जाते हैं, वे सब प्रकृति में हो रहे हैं । इसी आधार पर ' सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् ' ( शत ० ) इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । ' अन्नोर्क प्राणानामन्योऽन्यपरि-· ग्रहो यज्ञः ' - ' वाचवित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यज्ञः ' ( ऐतरेया ० ) यही नित्य यज्ञ के प्रसिद्ध लक्षण हैं, जिनका ' अग्नी सोमाहुतिर्यज्ञ: ' इस लक्षण पर पर्यवसान माना जा सकता है । ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इस बृहज्जाबालविद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण विश्व अग्नीसोमात्मक बनता हुआ यज्ञात्मक है, जिसका मन्त्रकृत् - ऋषि ' यज्ञ ेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन ' इन शब्दों में अभिनय किया करते हैं । इसी प्राकृतिक नित्ययज्ञ के सम्बन्ध से ब्रह्मविज्ञानात्मक ईश्वर प्रजापति ' यज्ञप्रजापति ' स्वरूप में परिणित हो रहा है, जिसका विश्वरूप से हम साक्षात्कार कर रहे हैं । जब तक नित्ययज्ञ है, तभी तक विश्वस्वरूप सुरक्षित है । उक्त प्राकृतिक सम्पत्ति से विश्व का कोई भी जड़ - चेतन पदार्थ वञ्चित नहीं है । सत्र में श्रदान-त्रिसर्गात्मिक । नित्ययज्ञप्रकिया प्रवाहित है । सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, नक्षत्र, ग्रह मनुष्य, पशु, पक्षी, श्रधि, वनस्पति, कृमि, कीट, आदि सब त्र्यक्षरमूर्ति ( ब्रह्मन्द्रविष्णुमूर्ति ) अन्तर्य्यामी की प्रेरणा से द्वयक्षरमूर्ति ( अग्नी-बोममूर्ति ) सूत्रात्मा के आधार पर स्व स्व यज्ञ के यजमान बन रहे हैं । वैधयज्ञ में होता आदि ऋत्विक सम्पति, गार्हपत्याग्दि आदि अग्निसम्पति, इत्यादि जो जो साधन - सामग्रियां होतीं हैं, उस सबका स्व - स्व - स्वरूपसंस्थाना-नुपात से इन प्राकृतिक यज्ञों में भी समावेश है । यही क्यों, वहाँ ( प्रकृति ) जैसा है, वैसा ही तो यहाँ होता है । प्रसङ्गोपात्त दो शब्दों में प्रकृतसूत्रसमन्वयकर्त्ता व्याख्याताओं के उस ' उन्मत्त - बालभलाप ' हेतु को भी परीक्षा कर डालिए । ' वनस्पतयः सत्रमासत ' इत्यादि वेदवचनों को व्याख्याता लोग इसलिए उन्मत्त-* यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्व सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति || ( छान्दोग्य • ) ७६

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तृतीयखण्ड प्रलाप चलाते हैं कि, उनकी दृष्टि में सर्वथा जड़ वनस्पतियाँ यज्ञ करने में असमर्थ हैं । आगे जाकर सूत्रार्थ करते हुए व्याख्याता कहते हैं कि - ' स्तुतयो ह्येताः सत्रस्य । वनस्पतयो नामाचेतना इदं सत्रमुपासितवन्तः, किंपुनर्विद्वांसो ब्राह्मणाः ' ( शावर भाष्य १ । १ । ३२ ) | व्याख्याता प्राकृतिक यज्ञस्वरूप से अपरिचित रहे होंगे, यह कहना तो घृष्टता मानी जायगी । हाँ इन वाक्यों को स्तुतिपरक बतलाना सर्वथा मीमांस्य है, यह कहने में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । वनस्पतियों मे भी अवश्य ही सत्र हो रहा है । तत्तद् वनस्पतिविशेषों में यज्ञातिशय का तारतम्य है, जैसाकि ' ते हि यज्ञियाः ' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है | श्रुति सत्र की महत्ता नहीं बतला रही, अपितु वनस्पतियों में प्रतिष्ठित प्राकृतिक नित्ययज्ञ का विश्लेषण कर रही है । ऐसी दशा में आरम्भ में इसे उन्मत्त प्रलापस्थानीय मानते हुए वेद की प्रामाणिकता का उत्थान करना, अन्त में स्तुतिपरक मानते प्रामाण्यसमर्थन करना, सभी कुछ बड़ों की बड़ी बातें हैं । हुए हाँ, तो हम कह रहे थे कि, प्राकृतिक विश्व में प्राकृतिक देवताओं के द्वारा सञ्चालित, विश्वस्वरूप संरक्षक विश्वरूपात्मक यज्ञ ही नित्ययज्ञ है । यह नित्ययज्ञ उसी नित्य ब्रह्मविद्या पर प्रतिष्ठित है, जिस ब्रह्मविद्या को ' त्रयीविद्या ' भी कहा जाता है । एवं जिसे - ' सैपा त्रयीविद्या यज्ञः ' ( शत ० ना ० ) - ' त्री वा एषा विद्या-तपति ' ( शत ० वा ० ) इत्यादि रूप से यज्ञात्मक बतलाया गया है । ब्रह्मविद्या के आधार पर वितत इस नित्य-यज्ञविद्या का आर्षमहर्षियों नें अपनी दृष्टि से साक्षात्कार किया । इस साक्षात्कृति मे उन्होंनें इस यज्ञकर्म्म का आविष्कार कर डाला, जो ग्राज ' वैधयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका वेदवित् विद्वान् अनुष्ठान किया करते हैं । यही वैधयज्ञक नित्य यज्ञविद्या है । हमारे वेदशास्त्र में नित्य ब्रह्मविद्या का नित्य यज्ञविद्या के साथ - साथ इस वैधयज्ञ की इतिकर्त्तव्यता का भी प्रतिपादन हुआ है । प्रावाहरिण, औद्दालकि, आदि अनित्य अर्थों का इसी वैधयज्ञकर्म के साथ सम्बन्ध है 1 तात्पर्य्यं कहने का यही है कि, अकृतक ( नित्य ) के साथ कृतक ( अनित्य ) का सम्बन्ध नहीं हो सकता । फलतः अकृतक ब्रह्म - यज्ञविद्याओं के साथ कृतक श्रद्दालकि, प्रावाहरिण, यादि व्यक्तियों का कोई सम्बन्ध नहीं है । अपितु इनका प्रसङ्ग कृतक यज्ञकर्म ( वैधयज्ञकम्म ) के साथ ही घटित हैं । सूत्रकार कहते हैं कि, हम नानते हैं कि औद्दालकि आदि अनित्य व्यक्तियों का वेद में उल्लेख है । परन्तु इनका कृतकयज्ञ में विनियोग है । क्योंकि अनित्य वैधयज्ञकर्म ' के साथ ही इन ग्रनित्य व्यक्तियों का सम्बन्ध घटित है । फलतः उस नित्य ब्रह्म —– यज्ञविद्यात्मक, तथा कृतकयज्ञप्रमाणात्मक वेड का व दत्त्व तथा नित्यत्त्व सर्वथा अक्षुण्ण बना रह जाता है | अनित्य यज्ञ से सम्बद्ध अनित्य अर्थों का दर्शन नित्य ब्रह्म - यज्ञप्रतिपादक नित्य वेदशास्त्र की नित्यता, तथा प्रामाणिकता का विघातक नहीं बन सकता, यही निष्कर्ष है, जिसका - ' कृने वा विनियोगः स्यान, कर्म्मणः सम्बन्धात् ' इस सूत्र से स्पष्टीकरण हो रहा है । अब इस सम्बन्ध में यही वक्तव्य शेष रह जाता है कि, प्रयोगलक्षण शब्द सर्वथा अनित्य है । तद्रूप शास्त्रोपदेशलक्षण वेद भी अनित्य है । किन्तु वाक् – लक्षण शब्द सर्वथा नित्य है, एवं विद्यालक्षण चोट भी सर्वथा नित्य है । स्पष्ट शब्दों में हमें यह कह देना चाहिए कि, तनात्मक वेद सर्वथा प्रकृतक, नित्य, कूटस्थ, अपौरुषेय है, जिसका मीमांसाशास्त्र ने समर्थन किया है । एवं तत्त्वप्रतिपादकात्मक, प्रयोगशब्दात्मक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र कृतक है, अनित्य है, पौरुषेय है । वेदशास्त्र वेद की पुस्तक है, न कि वेद । वेद ७७

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तृतीयखण्ड वह नित्य तत्त्व है, जो इस पुस्तकद्वारा प्रतिपादित है । ऐसी अवस्था में ' क्या उपनिषत् वेद है? इस प्रश्न के उत्तर में यही कहना न्यायसङ्गत प्रतीत होता है कि, उपनिषत् ही क्या, संहिता, बाह्मण, श्रारण्यक, उपनिषत् -ग्रन्थ, चारों ही वेद नहीं हैं, अपितु वेदग्रन्थ हैं । अवश्य ही यह कथन धार्मिकजगत् के प्रचलित अन्ध – श्रद्धा विश्वास के विपरीत जाता हुआ उसके प्रत्यत्यन्तिक क्षोभ का कारण है । परन्तु सत्यरक्षा के नातें इस क्षोभ को ही हम अपने लिए ' इष्टापत्ति ' समझ रहे हैं । १२- सिंहावलोकन – पाठकों को स्मरण होगा कि, खण्डत्रयात्मक भूमिकाग्रन्थ के प्रथमखण्ड में ' क्या उपनिषत् वेद है?, इस चतुर्थ प्रश्न की मीमांसा आरम्भ हुई थी । मङ्गलरहस्यानन्तर इस प्रकरण को आरम्भ करते हुए यह स्पष्ट किया गया था कि, – “ उपलब्ध अनुपलब्ध संहिताग्रन्थ, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यकप्रन्थ, उप-निषद्ग्रन्थ, ये चारों हीं वेद नहीं है । ऐसी अवस्था में प्रकृत प्रश्न के सम्बन्ध में भी हम निःसंदिग्ध होकर कह सकते हैं कि, उपनिषत् वेद नहीं हैं " ( देखिए उ ० भूमिका १ खण्ड प्रकरण प्राप्त पृ ० सं ० १, पूर्वतोऽनुवृत्ता पृ ० सं ० ५५ ) श्रागे जाकर उसी प्रथमखण्ड में प्रचलित श्रद्धा - विश्वास की मीमांसा करते हुए प्रकृत प्रश्नमीमांसा की श्रावश्यकता सिद्ध की गई । अनन्तर ' वेद पौरुषेय हैं?, अथवा अपौरुषेय? ' इस प्रश्न के सम्बन्ध में दार्शनिकों के ४२ मतवादों की मीमांसा की गई । अनन्तर खण्डसम्म प्ति । - पर्य्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि को मूल मानते हुए तात्त्विक वेद के १७ विवर्तों का क्रमशः स्पष्टीकरण किया गया । इसप्रकार भूमिका प्रथमखण्ड में ( १०० पृष्ठात्मक ) १ – प्रारम्भिक निवेदन, ( ४० पृष्ठात्मक ) - २ - उपनिषदों के श्राद्यन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया जाता है?, ( ७० पृष्ठात्मक ) - ३ - " उपनिषत् शब्द का क्या अर्थ है? " इन तीन प्रतिज्ञात विषयों का स्पष्टीकरण करते हुए क्रमप्राप्त ' क्या उपनिषत् वेद है? ' इस चतुर्थ प्रश्न के सम्बन्ध में २५० पृष्ठों में क्रमशः प्रश्नमीमांसावश्यकता, दार्शनिकमतवाद, तात्त्विकवेदनिरुक्ति, इन तीन विषयों का प्रतिपादन हुआ । इसप्रकार प्रतिज्ञात आरम्भ के ३ प्रश्नों का सर्वात्मना निरूपण करता हुआ, तथा चतुर्थ प्रश्न के सम्बन्ध में उक्त तीन विषयों का स्पष्टीकरण करता हुआ लगभग ५०० पृष्ठों में भूमिका प्रथमखण्ड समाप्त हुआ । ५०० पृष्ठात्मक भूमिका द्वितीयखण्ड में प्रतिज्ञात उसी चतुर्थ प्रश्न के सम्बन्ध में वेद की पौरुषेयता, अपौरुषेयता की मीमांसा हुई । जिस वेदतत्त्व का वेदग्रन्थों में निरूपण है, जो वेदतत्त्व व्याख्यादोष से विलुप्त हो गया है, उसके स्पष्टीकरण के लिए हमें महाविस्तार का आश्रय लेना पड़ा । और अपौरुषेय - तात्त्विकवेद-स्वरूपपरिचय के सम्बन्ध में द्वितीयखण्ड में निम्नलिखित विषयों का वैज्ञानिक विवेचन हुआ -१ - वेद का मौलिक स्वरूप २ - तात्त्विकवेद, और प्रमाणवाद ३ – प्राजापत्यवेदमहिमा ४ - अपौरुषेय वेद का तात्त्विक इतिवृत्त ५- बन्दोवितान - रस लक्षणा वेदत्रयी ६ - अग्निविकास रहस्य और वेदशाखाविभाग ७८

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तृतीयखण्ड प्रस्तुत भूमिका - तृतीयखण्ड पाठकों के सम्मुख है । इसमें आरम्भ में प्रथमखण्ड से अनुवृत्त उसी ' क्या उपनिषत् वेद है? ' इस चौथे प्रश्न की मीमांसा प्रक्रान्त है । इसके अनन्तर प्रतिज्ञात अन्य विषयों की प्रोर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जायगा । इस सिंहावलोकन से पाटकों को विषय - समन्वय में विशेष सुविधा रहेगी, एकमात्र इसी लक्ष्य से यह सिंहावलोकन प्रस्तुत हुआ है । १३- वेदशास्त्र, और हमारा प्रचलित दृष्टिकोण— तात्त्विक वेदस्वरूप को यथावत् हृदयङ्गम कर लेने के पश्चात् हमें संदिग्धरूप से यह स्वीकार कर लेना पड़ता है कि, जिसे प्रजा ब्रह्म का निश्वास कहती है, जिसके ब्रह्म निःश्वसित, गायत्रीमात्रिक, यज्ञ-मात्रिक, आादि अनेक चिवर्त्त हैं, जिसके छन्द, वितान, रसात्मक, तीन विवर्त्त प्रधान माने गए हैं, जो सम्पूर्ण विश्व, विश्वप्रजा, प्रजाकर्म्म, की मूलप्रतिष्ठा है, मूलप्रभव है, ऋण धन भाव से जिसके २१-१०१-१००० –ε विभाग हैं, वह तात्त्विक वेद अवश्य ही पौरुपेय है । इस अपौरुषेय, नित्य, तात्त्विक वेद की दृष्टि से मूलवेद-चतुष्टयी, तूलवेदत्रयी, दोनों हीं अपौरुषेय हैं, नित्य हैं । ऋकू – यजुः साम - अथर्व - तत्त्वममष्टि मूलवेदचतुष्टयी है । कर्म्मानुगत ब्राह्मण, उभयानुगत श्रारण्यक, ज्ञानानुगत उपनिषत् - तत्त्वसमष्टि तूल वेदत्रयी है । इस तात्त्विक, मन्त्रब्राह्मणात्मक, अपौरुषेयवेददृष्टि से यदि हमारे सामने ' क्या उपनिषत् वेद है?, यह प्रश्न उपस्थित होगा, तो हम निःदग्घरूप से कहेंगे ' उपनिपत अवश्य ही वेद है ' । यदि उपनिषल्लक्षण तात्त्विकवेद का स्पष्टीकरण करने वाले उपनिषद्ग्रन्थों की दृष्टि से हम से ' क्या उपनिषत् वेद है? यह प्रश्न किया जायगा, तो हमें कहना पड़ेगा कि, ' उपनिपन वेद नहीं है ' | यदि ' तातृस्थ्यात्ताच्छन्द्यन्याय ' की दृष्टि से उपनिषद्ग्रन्थ के सम्बन्ध में हम से उक्त प्रश्न किया जायगा, तो हम कहेंगे - संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषत्, चारों हीं वेद हैं । अतएव ' उपनिषत् अवश्य ही वेद है ' । इस प्रकार दृष्टिभेद से प्रश्न के तीन समाधान हो जाते हैं । समाधान - विवर्त्तो को थोड़ी देर के लिए यहीं छोड़ते हुए. प्रचलित श्रद्धा - विश्वासानुगता वेदभक्ति का विचार कर लेना भी सामयिक ही माना जायगा । इस में कोई सन्देह नहीं कि, भगवान् जैमिनि ने शब्दार्थ का औत्तिक सम्बन्ध बतलाते हुए, शब्दों की नित्यता स्थापित करते हुए वेद की कूटस्थ - नित्यता, तथा अपौरुषेयता का समर्थन किया है । परन्तु साथ ही इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि, जैमिनि के इस अपौरुषेयवाद की तात्त्विक वेदविद्या, एवं तद्वाचक वाक लक्षण नित्यवेद ही मुख्य आधारभूमि है । और यह भी निर्विवाद है कि, जिन व्याख्याताओं नें मीमांसा - सूत्रों के द्वारा प्रतिपादित जिन प्रयोगात्मक नित्य शब्दों की नित्यता का समर्थन करते हुए प्रयोगात्मक वेदशास्त्र को अपौरुषेय बतलाया है, वह व्याख्याताओं का ऐकान्तिक प्रौढ़िवादमात्र है । सर्वान्त में यह भी निःसंदिग्ध है कि, साम्प्रदायिक युग के अनुग्रह से पुष्पित - पल्लवित होने वाले सन्तमत का अनुयायी आज का भारतवर्ष अनुचित भक्तिवाद का पोषक बनता हुआ अपना प्रतिभाविकास सर्वथा खो चुका है । किसी ने संस्कृतभाषा में कुछ कह दिया, बस वही हम मन्दबुद्धियों के लिए श्रात प्रमाण बन गया । ग्राज भारतीयशास्त्र बुद्धिक्षेत्र से सर्वथा गम्य बन चुका है । हम अपनी ओर से विचार करना ब्रह्महत्या से भी बड़ा पाप समझ बैठे हैं । हमी अन्धविश्वास का यह दुष्परिणाम है कि, आज भारतीय विद्वान् तत्त्वान्वेषण कार्य्य से सर्वथा पराङ्मुख बन रहे ७६

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भाष्यभूमिका हैं । व्याख्याताओंनें जो कुछ कह दिया, वह इनके लिए ब्रह्मवाक्य है । फिर चाहे व्याख्याताओं की व्याख्याएँ तत्त्ववाद से कोई सम्बन्ध न रखतीं हों । हम दोष दिया करते हैं पश्चिमी विद्वानों की बाह्यसमालोचनात्मिका बाह्यवृत्ति को । और कहा करते हैं उनके सम्बन्ध में यह कि, पश्चिमीविद्वान् ग्रन्थ के अन्तरङ्ग विषय पर दृष्टि नहीं डालते । दूसरे शब्दों में ग्रन्थ में किन विषयों का निरूपण है, इस सम्बन्ध में वे कोई विचार न कर, ग्रन्थ कब बना?, किसने बनाया?, तत्कालीन भौगोलिक, ऐतिहासिक स्थिति कैसी थी!, इत्यादि बहिरङ्गपरीक्षाओं में हीं उनका स्वाध्यायकर्म ( रिसर्चवर्क ) समाप्त हो जाता है । परन्तु दोष देने वाले भारतीय विद्वानों से हम पूँछते हैं कि, व्याकरण-न्यायादि अर्वाचीन ग्रन्थों को छोड़ कर अपने सर्वस्वभूत वैदिक साहित्य का उन्होंनें अन्तरङ्गदृष्टि से कौनसा कितना विचार किया? । वेदों में किन किन तात्विक विद्यानों का निरूपण है?, क्या हमनें कभी भूल कर भी इस दिशा में कोई प्रयास किया? । बस केवल एक, हाँ एकमात्र यही हमारा परम पुरुषार्थ बन रहा है कि, ‘ वेद अपौरुषेय है ' इस कल्पना को सुरक्षित रखने के लिए अपना सम्पूर्ण प्रतिभा बल समाप्त करते रहना । मानलीजिए वेदशास्त्र अपौरुषेय है, सर्वविद्यानिधि है । यह भी मान लिया कि, आपने व्यर्थ के शब्दाडम्बर का आश्रय लेते हुए युक्तियों से दूसरों को इसकी अपौरुषेयता का लोहा भी मनवा दिया । परन्तु एतावता आपने स्वयं तो क्य पुरुषार्थसिद्धि कर ली, और दूसरों का कौनसा उपकार कर डाला! जत्रतत्र वेदप्रतिपादित तत्त्वों का प्रचार - प्रसार नहीं हो जाता, तबतक आपका यह अपौरुषेय वेदशास्त्र पाषाणप्रतिमावत् दूर से ही प्रणम्य है । कहने की इच्छा न रहते हुए भी कहना पड़ रहा है कि, इस अपौरुषेयवाद - भ्रान्तिने हीं हमें अपने इस तात्विक साहित्यज्ञान से बचित किया है । ईश्वर की वाडी, और उसे हम समझलें- असम्भव, इसी महा-त्रिभीषिकाने हमारे इस अन्तरात्म स्थानीय वैदिक साहित्य को हमसे पृथक् करते हुए हमें निर्जीव बना डाला है । १४- वेदप्रामाण्यरक्षा, और प्राचीन व्याख्याता-व्याख्याताओं नें तथा तदनुगामी भक्तों ने क्यों ऐसा किया?, वेदकी अपौरुषेयता के सम्बन्ध में शक्ति-समर्पण क्यों किया?, इसका एकमात्र कारण है- ' वेदमामाश्यरक्षा ' । व्याख्याताओं का यह विश्वास रहा है कि, मनुष्य की रचना भ्रान्ति से शून्य नहीं रह सकती । फलतः मनुष्यरचित ग्रन्थ कभी धर्म में निरपेक्ष प्रमाण नहीं बन सकता । यदि वेद को भी पौरुषेय मान लिया जायगा, तो यह निरपेक्ष प्रमाण न रहेगा । वेद अपौ-रुषेय है, ईश्वर का नि: श्वास है, ईश्वर भ्रान्ति से रहित है, श्रतएव तन्निःश्वासरूप वेद भी निर्भ्रान्त प्रमाण है । अपने इस प्रामाण्यवाद की रक्षा के लिए व्याख्याताओं ने जब वेद को अपौरुषेय मान लिया, तो इनके सामने कई एक विप्रतिपत्तियाँ उपस्थित हो पड़ीं । जिनमें मुख्य स्थान लोकनृतलक्षण इतिवृत्त ( इतिहास ) का है । वेद अपौरुषेय है, इसीलिए उसमें ' इतिहास ' नहीं है । मानवसृष्टि उत्तरभाविनी है, वेद ईश्वरकृत है । भला उसमें मनुष्य चरित्र का समावेश कैसे सम्भव है? कैसा आश्चर्य! ' बरः प्रावाहरिकामयत ' से प्रवहणशील वायु का ग्रहण, इतिहासप्रसिद्ध बजर का कोई मूल्य नहीं । व्याख्याताने ' बचरः प्रावादखि ' का तो अपनी कल्पित अपौरुषेयता की रक्षा के लिए ' यच्च प्रवाणिरिति तन्न ० ' यह कल्पित समाधान कर डाला, परन्तु अपने उठाए हुए पूर्वपक्ष भाष्य के ' सुरुबिन्द औदालकिः कामयत ' वाक्य का कोई समाधान न किया । सुप्रसिद्ध उद्दालक महर्षि के पुत्र ८०

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तृतीयखण्ड कुसुरुचिन्द नामक पुरुषविशेष का अनुकरण शब्द उन्हें न मिल सका । ' मानवेतिवृत्त के स्वीकार करने से वेद का सादित्त्व सिद्ध हो जायगा ' यह कैसा शून्य तर्काभास है, इसका विचार विज्ञ पाठकों को ही करना चाहिए * । थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि, वेदशास्त्र अपौरुषेय भी है, और इसमें इतिहास भी है | सूर्य - चन्द्र - पृथिवी - आदि प्राकृतिक सृष्टियां ईश्वर से पीछे हुई हैं, यह सभी स्वीकार करेंगे । यदि उत्तरभावी इन सृष्टेविवर्तों के निरूपण के रहते भी ईश्वरीय वेद का अपौरुषेयत्व सुरक्षित है, तो उत्तरभावी मानवसृष्टि-विवर्त्त के निरूपण से अपौरुषेयत्त्व पर कौनसी आपत्ति आ गई? | त्रिकालज्ञ ईश्वर क्या आगे होने वाले मानवविवर्त्तो से अपरिचित था? अस्तु, वेदों में इतिहास है?, अथवा नही?, यह एक स्वतन्त्र विषय है, जिसका ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्त्वम् ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में विस्तार से निरूपण हुआ है । अभी तो हमारा मुख्य लक्ष्य वेदापौरुषेयत्व - पौरुषेयत्व ' विषय ही बन रहा है, जिसके सम्बन्ध में यही निश्चित सिद्धान्त है कि, प्रयोगलक्षण नित्य शब्दात्मक वेदनन्थ अवश्य ही कृतक, अनित्य, तथा पौरुषेय है । “ मीमांसासिद्धान्त को लक्ष्य बनाते हुए शब्द नित्यता स्त्रीकार की जा सकती है । और माना जा सकता है कि, ‘ अ – आ – क - च - ट - त - पादि वर्ण उत्पन्न नहीं होते, अपितु इनकी अभिव्यक्ति होती है । मिट्टी से घट का निर्माण करना घटोत्पत्ति है, एवं अन्धेरे में पहिले से रक्खे घट को दीपादि प्रकाश से पा लेना घट की अभिव्यक्ति है | कण्ट - ताल्वादि प्रयत्नों से वर्ण अभिव्यक्तमात्र होते हैं, अतएव वर्ण अपौरुषेय हैं । जत्र वर्ण पौरुषेय हैं, तो वर्णात्मक शब्द भी अपौरुषेय ही मानें जायँगे " क्या इस तर्क का कुछ महत्त्व है? इस दृष्टि से तो कोई भी वस्तु ' उत्पन्न ' नहीं कही जा सकती । क्योंकि सत्कार्यवाद सिद्धान्त के अनु-सार उत्पन्न वस्तुमात्र बीजरूप से पहिले से ही अपने उपादानकारण में प्रतिष्ठित रहती है, जिसका ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं, मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' इत्यादि उपनिषन्छु ति से स्पष्टीकरण हुआ है । शुक्र - शोणित के मिथुनभाव से उत्पन्न प्रजा त्रीजरूप से पहिले से ही वहाँ प्रतिष्ठित है । दधि से उत्पन्न घृा पहिले से ही दधि में प्रतिष्ठित है । नहीं तो, पानी से घृत क्यों नही निकाल लिया जाता? | और इस दृष्टि से वर्ण, तत्समूहात्मक शब्द ही क्या, सम्पूर्ण पदार्थ अभिव्यक्तिकोटि में आते हुए अपौरुषेय हैं । यदि तर्कवादी महोदय वेदों की ऐसी अपौ-रुषेयता स्वीकार करते हैं, तो इष्टापत्ति है । वादी को स्मरण रखना चाहिए कि, मीमांसा का शब्दनित्यत्त्ववाद बाकू - लक्षण नित्यशब्द से ही सम्बद्ध है, जिसके आधार पर तद्रूप वेद ही अपौरुषेय माना जा सकता है. न कि प्रयोगशब्दात्मक वेदग्रन्थ । * - " यच्च प्रावाहणिरिति, तन्न । प्रवाहणस्य पुरुषस्यासिद्धत्वात् । न प्रवाहणस्या-पत्यं प्रावाहणिः । प्र शब्दः प्रकर्षे सिद्धः वहतिश्च प्रापणे । नचस्य समुदायः कश्चित् सिद्धः । इकारस्तु यथैवापत्ये सिद्धस्तथा क्रियायामपि कर्त्तरि । तस्माद्यः प्रवाहयति, स प्राहाहणिः । ‘ वबरः ' इति शब्दानुकृतिः । तेन यो नित्योऽर्थः तमेवैतौ शब्द वदिष्यतः । अत ऊक्त ', ' परन्तु श्रुतिसामान्यमात्र ' मिति " ( शावर भाष्य १।१।३१ ) । ८१

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भाष्यभूमिका अभ्युपगमवाद का श्राश्रय लेते हुए थोड़ी देर के लिए वादी के अभिव्यक्तिवपक्ष को स्वीकार करते हुए हम वर्ण, एवं तत् समूहात्मक शब्दों को अपौरुषेय मान लेते हैं । और मान लेते हैं यह कि, शब्दनिर्माण करना मनुष्यशक्ति के बाहिर है । कण्ठ - ताल्वादि प्रयत्न से नित्य विद्यमान शब्दों की अभिव्यक्तिमात्र होती है । यदि ऐसा है, तो वेद ही क्या, विश्व का समस्त साहित्य अपौरुषेय क्यों नहीं? हिन्दीत्रालबोध भी अपौरुषेय क्यों नहीं? उक्त विप्रतिपत्ति का यदि यह समाधान किया जाता है कि, “ यद्यपि वर्ण तो अपौरुषेय ही हैं, परन्तु इनके पूर्वापरसन्निवेश से शब्दों का, शब्दों से वाक्यों का स्वरूपनिर्माण पुरुष - प्रयत्नाधीन है । एवमेव शब्द, वाक्यों का स्व - स्व - विशेष अर्थों का जो सम्बन्ध है, वह भी पुरुषप्रयत्नरूप संकेत से पौरुषेय है । देशभेद, जाति मेद से शब्दार्थसंकेत परस्पर विभिन्न हैं । यह भी सिद्ध विषय है कि, ये संकेत समयानुसार बदलते भी रहते हैं । इसप्रकार वर्णों के अपौरुषेय होने पर भी शब्द वाक्यादि रचना के, तथा अर्थसंकेत के पौरुषेय होने से कालिदासादि की कृतियों को पौरुषेय ही माना जायगा " । तो हम कहेंगे कि, वर्ण भी अनित्य है । शब्दरचना - श्रर्थसकेत पुरुष प्रयत्नसाध्य होने से ही तो आपके मतानुसार पौरुषेय हैं । उधर आप यह कह रहे हैं कि, कण्ठ - ताल्वादि प्रयत्न से वर्णाभिव्यक्ति होती है । उत्पत्ति न सही, अभिव्यक्ति ही सही, परन्तु अभिव्यक्तिसाधक व्यापार तो पुरुष का है । फिर वर्ण पौरुषेय कैसे रहे? ' शब्दरचना, अर्थसंकेत तो पुरुष का व्यापार है, कण्ठ- तात्वाद्यभिघात पुरुष का व्यापार नहीं है ' क्या किसी युक्ति से आप यह गिद्ध कर सकेंगे? । थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि, वर्ण अपौरुषेय हैं, पद- वाक्यादि पौरुषेय हैं । यदि यह मान भी लिया जाता है, तब भी आप वेदों का अपौरुषेयत्व सुरक्षित नहीं रख सकते । क्या वेदमन्त्रों में पद वाक्य नहीं है? । यदि हैं, तो रघुवंशादिवत् ये भी पौरुषेय क्यों नहीं? । उत्तर दीजिए! यहाँ आकर नत्र वादी के सब प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं, तो वह एकमात्र अपनी अन्धः श्रद्धा का अनु-गमन करता हुआ कहने लगता है कि, रघुवंशादि के पद - वाक्य तो पुरुषप्रयत्नाधीन होने से पौरुषेय हैं । किन्तु वेदमन्त्रों के पद - वाक्य, पद - वाक्यार्थ, सभी अपौरुषेय हैं । ' अग्निमीले पुरोहितं होतारं रत्नधातमम् । यज्ञस्य देवमृत्विजम् ' यह मन्त्र अनादिकाल से ज्यों का त्यों चला श्रा रहा है । ऋषिगण तपोबल से इस अनादिसिद्ध मन्त्र को देख कर इसे अभिव्यक्तमात्र कर देते हैं । ऋषिगण मन्त्रों के द्रष्टा हैं, कर्त्ता नहीं । तभी तो ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः ' यह कहा गया है । १५ - मन्त्रद्रष्टारः, और मन्त्रकृतः— कौन कहता है कि - ' मन्त्रद्रष्टारः ' इस यास्कवचन को हम प्रमाण नहीं मानते १, और कौन कहता है कि, वेद अपौरुषेय नहीं है? | अवश्य ही ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा हैं, कर्ता नहीं । श्रतएव श्रवश्य ही वेद अपौरुषेय हैं । परन्तु कौन से मन्त्र?, कौनसे वेद १, तत्त्वात्मक मन्त्र, तत्त्वात्मक वेद । ऋग्यजुः - सामा- थर्वलक्षण तत्त्वमन्त्र अनादि हैं, तत्समष्टिरूप तत्त्ववेद भी अनादि हैं । अवश्य ही ऋषिगण इनके द्रष्टामात्र हैं । परन्तु इस • तत्त्वात्मिका वेदविद्याका स्पष्टीकरण करने वाले प्रयोगशब्दात्मक वेदग्रन्थ कभी अपौरुषेय नहीं हो सकते । ऋषियों नैं तपोबल से तत्त्वात्मक वेदमन्त्रों को देखा, तदनुरूप अपनी भाषा में वेदमन्त्रों की रचना की । ' बुद्धिपूर्वा-वाक्यकृतिर्वेदे यह वैशेषिक सिद्धान्त इस वेदकृतकता, तथा पौरुषेयता का ही समर्थन कर रहा है । और ८२