श्रीगणेशाय नमः।

Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 21–30

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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३– दार्शनिक दृष्टि, और मीमांसासूत्र— तृतीयखण्ड उक्त प्रश्न के वैज्ञानिक निर्णय से पहिले हमें दार्शनिकों कै, विशेषतः पूर्वमीमांसा ( जैमिनिसूत्रों ) के उन दार्शनिक सिद्धान्तों की मीमांसा करनी है, जिनके आधार पर सर्वश्री भाष्यकार शम्बरस्वामी ने विज्ञाना-नुमोदित मीमांसासूत्रों की दार्शनिकव्याख्या करते हुए शब्दात्मक वेदग्रन्थों की अपौरुषेयता सिद्ध करने का प्रयास किया है । वेद की अपौरुषेयता के सम्बन्ध में जो सत्र से बड़ा हेतु हमारे सामने आता है, वह है— ' शब्दनित्यतावाद ' । स्वयं जैमिनि भगवान् ने शब्दार्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध मानते हुए इसी वाद का समर्थन किया है । सूत्रकार ने जिस दृष्टि से शब्दार्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध मानते हुए शब्दनित्यता के आधार पर वेद की पौरुषेयता स्थापित की है, उस दृष्टि का अनादिनिधना नित्या उस वाक् से सम्बन्ध है, जिससे नित्य शब्दार्थों का प्रादुर्भाव हुआ है । ' वाविवृताश्च वेदाः ' इत्यादि श्रुतिसिद्ध वाङ्मय वेद नित्या वाक् से सम्बन्ध रखता हुआ अवश्य ही अपौरुषेय है जिस अपौरुषेय वेद को हम ' वेदविद्या ' कहा करते हैं, जिसके स्पष्टीकरण के लिए ' वेदग्रन्थों ' का आविर्भाव हुआ है । परन्तु भाष्यकार शचरस्वामी की पंक्तियों से कुछ ऐसा भान हो रहा है कि, वे शब्दात्मक वेदग्रन्थों को ही अपौरुषेय मानने का प्रयास कर रहे हैं, जो कि प्रवास ' बुद्धिपूर्वा वाक्य-कृतिर्वेदे ' ( वै ० द ० ) इत्यादि करणाद सिद्धान्त से तो विरुद्ध है ही, साथ ही स्वयं सूत्रों से भी वह प्रयास गतार्थ नहीं हो रहा । अस्तु जैमिनिसूत्रों का विज्ञानानुमोदित तात्पर्य्यं क्या है?, यह आगे स्पष्ट होने वाला है । अभी तो हमें लोकप्रचलित शत्रर - स्वामी की दृष्टि को लक्ष्य में रख कर दार्शनिक दृष्टि से ही वेद की अपौरुषेयता का विचार करना है । पूर्वमीमांसा ने आरम्भ में ' धर्म्मजिज्ञासा ' से विषय का उत्थान करते हुए धर्म को ' चोदनालक्षण ' ( शब्दप्रमाणलक्षण आदेश ) बतलाया है । धर्म्म स्वयं एक अतीन्द्रिय पदार्थ है । अतएव धर्म्मप्रामाण्य के सन्बन्ध में इन्द्रियसापेक्ष प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा कोई निर्णय नहीं किया जा सकता । इस सम्बन्ध में तो उन आप्त-पुरुषों का शब्द ही एकमात्र निर्णायक माना जायगा, जिन्होंनें अपनी अतीन्द्रियज्ञानलक्षणा आर्षदृष्टि से अती-न्द्रिय धर्म्मतत्त्व का साक्षात्कार कर शब्द के द्वारा उसके सम्बन्ध में अपना निर्भ्रान्त स्वतः प्रमाणभूत निर्णय प्रकट किया है | सूत्रकार के सामने जब धर्म्मजिज्ञासा का प्रश्न उपस्थित हुआ, तो उन्होंने निम्नलिखित सूत्रों से उक्त प्रामाण्य का ही समर्थन किया— १ – “ अथातो धर्मजिज्ञासा ” ( १ | १ | १ ) २ – “ चोदन लक्षणोऽर्थो धर्म्मः " ( १।१।२ ) ३ – “ तस्य निमित्चपरीष्टिः " ( १।१।३ ) ४ – “ सत्सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्म-तत्प्रत्यक्षनिमित्त ', विद्यमानोपलम्भनच्चात् " ( १ | १ | ४ | ) ३

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* निर्भुजपाठः-* * १ – स्वसिद्धान्तोद्घाटनम् — २ – परपक्षोद्घाटनम्--भाष्यभूमिका * * * * ४ उक्त सूत्र चतुष्टयी का प्रकृत विषय से कोई सम्बन्ध नहीं है । अतएव इसकी मीमांसा में न पड़ते हुए इस सम्बन्ध में केवल यही कह देना पर्याप्त होगा कि, धर्मसम्बन्ध में प्रत्यक्षादि प्रमाणों को अवसर नहीं है । एकमात्र शब्दनोदना लक्षण शब्दप्रमाण ही धर्म में प्रमाण है । शब्दप्रामाण्यवाद जब हमारे सम्मुख उपस्थित होता है, तो सर्वप्रथम शब्दार्थ के पारस्परिक सम्बन्ध - ज्ञान की जिज्ञासा होती है । इसी सम्बन्ध - जिज्ञासा को शान्त करने के लिए निम्नलिखित सूत्रसन्दर्भ हमारे सम्मुख उपस्थित होता है— " त्पत्तिस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपेदशो ऽव्पतिरेकश्चार्थे ऽनुपलब्धे-तन्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षच्चात् । कम्मैके तत्र दर्शनादस्थानात् करोतिशब्दात्, सच्चान्तरे च यौगपद्यात् प्रकृतिविकृत्योश्च वृद्धिश्च कर्तृ भूम्नाऽस्य । समं तु तत्र दर्शनं सतः परमदर्शनं विमानागमात् प्रयोमस्य परमादित्यवद्यौगपद्यं वर्णान्त स्म विकासे नादवृद्धिपरा । नित्यस्तु नस्य परार्थत्वात् सर्वत्र यौगपद्यात् संख्याभावादनपेक्षत्वात् प्रख्याभावाच योगस्य लिङ्गदर्शनाच्च । उत्पत्तौ वाडवचनास्स्युरर्थस्यातन्निमित्तत्वात्तद्भृतानां क्रिषार्थेन समाम्ना-योऽर्थस्य तन्निमित्तच्चाल्लोके सन्नियमात् प्रयोगसन्निकर्षः स्यात् ” । उक्त सूत्रसन्दर्भ को हम ५ भागों में विभक्त कर सकते हैं । एक सूत्रात्मक प्रथम विभाग में सिद्धान्त पक्ष का, घसूत्रात्मक द्वितीय विभाग में परपक्ष का, घसूत्रात्मक तृतीय विभाग में परपक्षखण्डन का, षट्सूत्रात्मक चतुर्थविभाग में स्वपक्ष समर्थन का, तथा सूज्ञत्रयात्मक पञ्चमविभाग में शब्दवाचकत्व का स्पष्टीकरण हुआ हैं | इस विभागदृष्टि से सूत्रसन्दर्भ का निम्नलिखित संस्थान क्रम हो जाता है— " औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशो ऽत्र्य-तिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत् प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षचात् " । " कम्मै तत्र दर्शनादस्थानात् करोति शब्दात् सच्चान्तरे च-यौगपद्यात् प्रकृतिविकल्पोश्व वृद्धिश्च कर्तृ भूम्नाऽस्य " । * ऐतरेये श्रारण्यक ने दो प्रकार के पार्टी की व्यवस्था की है । विषय विभाग न करते हुए संहितारूप से होने वाला पारायणोपयोगी पाठ ' निर्भुजपाठ ' कहलाया है । एवं विषयविभाग को स्पष्ट करने वाला, अर्थज्ञानोपयोगी पाट ' प्रतृण्णपाठ ' कहलाया है । यहाँ सूत्रसन्दर्भ के दोनों पाट उद्धृत कर दिए गए हैं ।

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तृतीयखण्ड ३ – परपक्षनिराकरणम् – “ समं तु तत्र दर्शनं सतः परम दर्शनं विषयानागमात् प्रयोगस्य परमादित्यव– द्यौगपद्यं वर्णान्तरम विकारो नादवृद्धिपरा " । * ४ – स्वपक्षसमर्थनम्— * * “ नित्यस्तु स्यादर्शनस्य परार्थत्वात् सर्वत्र यौगपद्यात्-संख्याभावादनपेक्षच्चात् प्रख्याभावाच्च योगस्य लिङ्गदर्शनाच्च " । * ५ – शब्दवाचकच्चनिरूपणम्— " उत्पत्ती वाऽवचनास्स्युरर्थस्यातन्निमित्तत्वात्तद्भृतानां-क्रियार्थेन समाम्नायोऽर्थस्य तन्निमित्तचाल्लोके सन्नि-यमात् प्रयोगसंनिकर्षः स्यात् ” । प्रतृण्णपाठः-*** ( १ ) स्वसिद्धान्तोद्घाटनम्— ( १ ) –१– “ औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः ( क ) । तस्य ज्ञानमुपदेशः, अव्यतिरेकश्चार्थे ऽनुपलब्धे ( ख ) । तत् प्रमाणं बादरायणस्य, अनपेक्षच्चात् " ( पू ० मी ० १ । १ । ५ ) । ( २ ) - परपत्रोद्घाटनम् -( २ ) - १ - " कम्, तत्र दर्शनात् " ( १ । १ । ६ । ) । ( ३ ) –२– “ अस्थानात् ” ( १।१।७ । ) । ( ४ ) –३– “ करोति - शब्दात् " ( १ । १ ॥ ) । ( ५ ) - ४ - " सचान्तरे च यौगपद्यात् " ( १ । १ । ८ । ) । ( ६ ) - ५ - " प्रकृति - विकृत्योश्च " ( १।१।१० । ) । ( ७ ) - ६ - " वृद्धिश्च कर्तृ भूम्नाऽस्य " ( १ । १ । ११ । ) । ५

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भाष्यभूमिका ( ३ ) -परपक्षनिराकरणम् – ( c ) - १ - " भ्रमं तु तत्र दर्शनम् " ( १ | १ | १२ | ) ( १ ) - २ - " सतः परमदर्शनं, विषयानागमात् " ( १।१।१३ । ) । ( १० ) -३ - " प्रयोगस्य परम् ' ( १।१।१४ । ) । ( ११ ) - ४ - " आदित्यवद्यौगपद्यम् ( १।१।१५ । ) ( १२ ) –५– “ वर्णान्त रम विकारः ” ( १।१।१६ । ) । ( १३ ) – ६ – “ नादद्धिपरा ” ( १।१।१७ । ) । ( ४ ) –स्वपक्षसमर्थनम्— ( १४ ) –१– “ नित्यस्तु स्यात्, दर्शनस्य परार्थचात् " ( १।१।१ = । ) । ( १५ ) - २ - ' सर्वत्र यौगपद्यात् " ( १६ ) - ३ – “ संख्याभावात् ” ( १।१।२० ) । ( १७ ) –४– “ अनपेक्षत्वात् ” ( १।१।२१ ) । ( १८ ) -५- ' प्रस्याभात्राच्च योगस्य " ( १।१।२२ । ) । ( १६ ) - ६ - " लिङ्गदर्शनाच ” ( १।१।२३ । ) । 1 ) - शब्दवाचकवनिरूपणम्-( २० ) –१– “ उत्पत्तौ वाऽवचनाः स्युः, अर्थस्यातन्निमितच्चास् ” ( १।१।२४ । ) । ( २१ ) –२ – ' तद्भृतानां क्रियार्थेन समाम्नायः, अर्थस्य तन्निमित्तश्चात् ( १।१।२५ । ) । ( २२ ) –३– “ लोके सन्नियमात् प्रयोगसंनिकर्षः स्यात् " ( १।१।२६ । ) । ( १ ) –स्वसिद्धान्तोद्घाटनम्— ( १ ) — १ ' शब्द का अर्थ के साथ श्रौत्पत्तिक ( उत्पत्ति - सृष्ट, नतु उत्पन्न - सृष्ट ) सम्बन्ध है । ( कौन शब्द किस अर्थ का वाचक है, हत्याकारक शब्द तथा अर्थ के इस औत्पत्तिक सम्बन्ध का ) ज्ञान ( वृद्धव्यवहार लक्षण परम्परारूप उपदेश से लोक मर्यादा में, तथा शास्त्रीय शब्दार्थमर्थ्यादा में तो-पदेश लक्षण ) उपदेश से होता है । ( नब उपदेश के द्वारा नित्यसिद्ध शब्दार्थ का ज्ञान हो जाता है, तो तत् शब्दवाच्य ) अर्थ ( विषय ) के न रहने पर ( भी तद्वाचक शब्द के द्वारा ही तद्वाच्य अर्थ ) का बोध हो जाता ६

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तृती eare है ( इसलिए भी शब्दार्थ का सम्बन्ध नित्य मानना पड़ता है ) | ( शास्त्रीय शब्दमर्य्यादा से, विशेषतः वेदशब्दमर्य्यादा से सम्बन्ध रखने वाला प्राप्तोदेश लक्षण शब्दोपदेश ) अवश्य ही प्रमाण है । भगवान् चादरायण ने भी ( ' निरपेक्षो रवः श्रुतिः ' इस सिद्धान्त को लक्ष्य में रखते हुए ) प्राप्तोपदेशलक्षण वेद-प्रामाण्य की निर्भ्रान्त प्रामाणिकता स्वीकार की है " । ( सिद्धान्तपक्षः ) ( १ ) । * * ( २ ) - परपक्षोद्घाटनम् — ** ( २ ) —१- ( शब्दानित्यत्त्ववादी ) कितने एक दार्शनिक ( नैय्यायिकादि ) कहते हैं कि, शब्द में कर्म्म का समावेश है । ( उन अनित्यवादियों का कहना है कि, उच्चारणक्रिया के प्रवृत्त होने पर उसमें शब्द मर्य्यादा ) देखी जाती है । ( कर्म्म क्योंकि अनित्य है, एवं इसका शब्द के साथ श्रोत प्रोतभाव देखा जाता है, इसी आधार पर मानना पड़ेगा कि, शब्द सर्वथा अनित्य है ) । श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा शब्द का सुनना ही उच्चारण किया में शब्द का दर्शन है, एवं श्रवण लक्षण यह दर्शन ही शब्दानित्यत्व का पोषक बन रहा है । ( १ ) । ( ३ ) - २ " ( शब्द की अनित्यता में दूसरा कारण चतलाता हुआ परपक्षी कहता है कि ) ‘ अस्थान ’ हेतु से भी हम शब्द को अनित्य ही कहेंगे | ( मुख से बोले हुए शब्द की न तो हम मुखस्थान में हीं कोई प्रतिष्ठा देखते, न कर्णशष्कुली में हीं, न आकाश में हीं । देखते हैं कि, देवदत्त ने यज्ञदत्त से सुना, यज्ञदत्त ने विष्णुदत से, इस प्रकार एक दूसरे के मुखविवर से शब्द उत्पन्न होता गया. साथ ही साथ विलीन भी होता गया । उत्पन्न - प्रध्वस्त स्थान - प्रतिष्टा शून्य ऐसे शब्द को कभी नित्य नहीं कहा जा सकता ) । ( २ ) 1 ( ४ ) - ३ - पिच ( शब्द का उच्चारण करो - ' शब्दं कुरु ', शब्द का उच्चारण मत करो - ' शब्द मा कार्षीः ' इत्यादि रूप से ) ' करोति ' शब्द से शब्द का सम्बन्ध देखा जाता है । ( ' करोति ' शब्दमय्यादा ही अपने नित्यलक्षण क्रियाभाव से यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, शब्द अवश्य ही ग्रनित्य है ” ) । ( ३ ) । ( ५ ) - ४ - पिच - " ( हम देखते हैं कि, एक ही ' राम ' शब्द का ) एक में अनेक व्यक्ति समय उच्चारण करते हैं । ( शब्दोच्चारण का यह यौगपद्य भी शब्दानित्यत्त्व का ही समर्थन कर रहा है । यदि शब्द नित्य होता, तो एक व्यक्ति के द्वारा एक समय में उच्चारण का विषय बनता हुआ वह अन्य व्यक्ति के द्वारा उसी समय में कमी उच्चारण का विषय न बनता ) ” । ( ४ ) । ( ६ ) – ५ – अपिच - “ ( वर्णों के ) प्रकृति - विकृतिभाव से भी शब्द का अनित्यस्त्व ही सिद्ध हो रहा है । ( जो तत्त्व नित्य होता है. वह अपने प्राकृतिक स्वरूप को कभी नहीं छोड़ता । परन्तु देखते हैं कि सुध्यु-पास्यः, दध्यत्र, चिदात्मा,चिन्मयः, चिल्लयः चिच्छक्तिः ,, चिज्जन्यं, चित्सत्यं, चिड्डामरः, इत्यादे शब्दों में चर्णप्रकृति के अनेक विकार उपलब्ध हो रहे हैं । वर्णों का यह विकारभाव भी शब्दानित्यत्त्व का ही समर्थक बन रहा है ) " । ( ५ ) । ७–६ – अपिच– “ समोच्चारणकाल में वही शब्द वृद्धिभाव में परिणत देखा ( सुना ) जाता है | ( यदि अनेक व्यक्ति एक साथ मिलकर किसी शब्द का उच्चारण करते हैं, तो एक व्यक्ति के उच्चारण की

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अपेक्षा वही शब्द उच्चस्वरयुक्त सुनाई पड़ता है । शब्द का यह वृद्धिभाव भी अनित्यत्त्व का समर्थन कर रहा है । उच्चारण का तारतम्य ही शब्दावयवों के अपचय का समर्थक बनता हुआ इनका अनित्यत्त्व सिद्ध कर रहा है " ) । ( ६ ) । ( परपक्षः ) ( ३ ) - परपक्षनिरसनम् — ८ - १ - " ( उक्त ६ सूत्रों से सूत्रकार शब्दानित्यत्त्व का उद्घाटन कर आगे के ६ सूत्रों से उक्त वादों का हेत्वाभासत्त्व - मिथ्या हेतुत्व सिद्ध करते हुए कहते हैं कि ) पूर्व में शब्दानित्यत्त्व समर्थन के लिए जो हेतु उपस्थित किए गए हैं, वे हेत्वाभास हैं । इनसे कभी शब्द का अनित्यत्त्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । शब्द में वादी ने कर्म का दर्शन ( श्रवण ) बतलाते हुए शब्द की अनित्यता बतलाई थी । इस प्रथम हेतु के सम्बन्ध में हमें यह कहना है कि, जो अर्थ ( विषय ) नित्य होता है, उसके सम्बन्ध में भी कर्म की मर्य्यादा देखी सुनी जाती है । विद्यमान अर्थ का सदा सर्वदा दर्शन हो ही, यह नियम नहीं है । बहुत दूर होने से, बहुत समीप होने से, इन्द्रियदोष से, इन्द्रिय सहकारी प्रज्ञान सर्वेन्द्रियमन ) के अस्थिर रहने से, विषय की आत्यन्तिक सूक्ष्मता से, विषय तथा इन्द्रियों के मध्य में किसी व्यवधान के जाने से, तथा ऐसे ही अनेक कारणों से विद्यमान वस्तु भी दर्शन का विषय नहीं बना करती । उक्त प्रतिबन्धकों को हटाने के लिए प्रयत्नलक्षण कर्म करने से ही उस सवस्तु का दर्शन होता है । आवरण हटाने के लिए किए गए कर्म्म मात्र से उस सद्वस्तु का अनित्यत्त्व सिद्ध होगया, यह कौन बुद्धिमान् स्वीकार करेगा । हमारे कर्म से आवरण मात्र हटता है, न कि शब्द उत्पन्न होता है । ' प्रयत्नलक्षण कर्म से शब्द का दर्शन ( श्रवण ) होता है, ' इस हेतु का सम्भवतः वादी ने यह तात्पर्थ्य समझ लिया है कि, यह कर्म्म शब्द का उत्पादक है । उत्पन्न वस्तु अनित्य होती है, इसीलिए प्रयत्न कर्म से उत्पन्न शब्द भी अनित्य है । इस पर हमारा कहना है कि, जिस कर्म्म को वादी ने शब्द का उत्पादक मान लिया है, वह कर्म्म तो शब्द का अभिव्यञ्जकमात्र है । पीतमृत्तिका में पहिले से गन्ध विद्यमान है । परन्तु अभिव्यञ्जक पदार्थ के सम्बन्ध न होने पर्य्यन्त पहिले से विद्यमान भी मृद्गन्ध के दर्शन ( गन्धग्रहण ) नहीं होते । जब इसमें जलसेक कर्म्म किया जाता है, तो तत्काल गन्ध दर्शन होजाते हैं । क्या जलसेक कर्म्म गन्ध का उत्पादक है १ । ठीक यही परिस्थिति यहाँ समझिए । उच्चारण से पहिले जो नित्य विद्यमान शब्द श्रनभिव्यक्त था, वही उच्चारण कर्म से अभिव्यक्त होता हुआ हमारे दर्शन ( श्रवण ) का विषय बन गया है, एतावता क्या उच्चारण कर्म्म शब्द का उत्पादक मान लिया जायगा? । कदापि नहीं । और फिर हमारे यह भी समझ में नहीं आया कि, वादी ने इस अप्रयोजक, तथा श्रनैकान्तिक हेतु को उद्धृत ही क्यों किया, जब कि यह हेतु नित्यानित्य दोनों पक्षों में समान है । यदि शब्द अनित्य है, तब भी उच्चारण कर्म्म अभिव्यञ्जक मात्र है । यदि शब्द नित्य है, तब भी यह कर्म्म अभिव्यञ्जक मात्र है । इससे शब्द की नित्यता, अनित्यता का जब कोई सम्बन्ध ही नहीं, तो ऐसे हेतु को उद्धृत करना क्या निष्प्रयोजन नहीं है १ ( १ ) । ” १ - २ - वादी का दूसरा हेतु था ' अस्थानात् ' । " शब्द की कोई प्रतिष्ठा नहीं है, अपितु यह उच्च-रित - प्रध्वस्त है । यदि शब्द सत् ( नित्य ) होता, तो उसकी कोई प्रतिष्ठा होती, हमें वह सदा सुनाई पड़ता ” ८

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इस हेतु का भी उस समय कोई महत्त्व नहीं रह जाता, जत्र सत् - सूर्य्य का उदाहरण हमारे सामने आता है । हम मानते हैं कि, कण्ठताल्वादि जनित संयोग - विभाग कर्म्म से ही शब्दोच्चारण होता है । परन्तु एतावता ही शब्द का अनित्यत्त्व सिद्ध नही किया जा सकता । संयोग विभाग तो शब्द के अभिव्यञ्जक मात्र ही मानें जायेंगे | सायंकाल सूर्य के दर्शन होते हैं, पृथ्वी की भूभारूप आवरण के आ जाने से रहते हुए भी सूर्य्य का अदर्शन ( अप्रत्यक्ष ) हो जाता है । जत्र आवरण हट जाता है, तो प्रातः पुनः सूर्य दर्शन होनाता है । सूर्य्य सत् पदार्थ है । परन्तु देखते हैं, आवरण से वह नहीं भी दिखलाई देता । नियत स्थान प्रतिष्ठा में रहता हुआ भी सत् सूर्य्य जैसे आवरण से, अभिव्यञ्जक सामग्री के अभाव से दृष्टि का विषय नहीं बनता, एवमेव सत् - शब्द भी आवरण से अस्थानवत सा प्रतीत होने लगता है । दर्शनादर्शनलक्षण अस्थान भाव शब्द की अस्थानता का समर्थन करने में असमर्थ है । ( २ ) " । ( १० ) -३ " वादी का कहना था कि, शब्द के साथ ' शब्दं कुरु - ' शब्दं मा कार्षीः ' इत्यादि रूप से ' करोति ' लक्षण अनित्या क्रिया का सम्बन्ध देखा जाता है, इस लिए भी शब्द अनित्य है " । इस सम्बन्ध में हमारा यह कहना है कि, जिन जिन स्थानों में ' करोति ' का सम्बन्ध देखा जाता है, उन उन स्थानों में शब्द प्रयोग के लिए ही इस ' प्र ' का सम्बन्ध मानना पड़ेगा । तात्पर्य यही है कि, कुरु, मा कार्षीः, इत्यादि प्रैष आज्ञा ) शब्द के प्रयोग से सम्बन्ध रखता है, न कि शब्द सें । हम देखते हैं कि, शब्दप्रयोग करने वाले के लिए ही " यह शब्द करता है " इत्यादि रूप से ' करोति ' का व्यवहार होता है । फलतः करोति का सम्बन्ध शब्द-प्रयोग से है, न कि शब्द से । जब शब्द के साथ ' करोति ' का सम्बन्ध ही नहीं; तो इस हेतु से शब्द का अनित्यत्त्व कैसे सिद्ध किया जासकता है " ( ३ ) ( ११ ) -४ “ वादी का चौथा हेतु यह था कि “ एक ही रामशब्द का एक ही समय में अनेक व्यक्ति उच्चारण करते हैं | यह यौगपद्य भी शब्दानित्यता ही सिद्ध कर रहा है " । इस के उत्तर में सूर्य- दृष्टान्त ही पर्य्या'न्त होगा । सत् - सूर्य्य एक है, यह निर्विवाद है । इस एक सत् - सूर्य का एक ही समय में असंख्य व्यक्ति दर्शन कर रहे हैं | क्या इस यौगपत्र से सत् तूर्य की नित्यता में कोई बाधा है? । यदि नहीं, तो सत् शब्द के सम्बन्ध में होने वाला उच्चारणानुत्रन्धी यौगपद्य शब्दनित्यता में कैसे बाधक माना जासकता है? ” ( ४ ) । ( १२ ) -५ “ पांचवाँ हेतु वर्षों का विकारभाव था । वादी का कहना था कि ' दध्यत्र ' इत्यादि स्थानों में ' इकार ' प्रकृति के स्थान में यकार विकृति उपलब्धि हो रही है । विकारभार अनित्यता का समर्थक है । उत्तर में यह निवेदन करना है कि, वर्णसमाम्नाय में पठित कारादि ५० वर्ण सर्वथा नित्य हैं । इन नित्य वणों के सम्बन्ध में शब्दतत्त्वरहस्यवेत्ता विद्वानों ने यह व्यवस्था की है कि, ' अमुक स्थल में - प्रसङ्ग में अमुक वर्ण का ही उच्चारण करना चाहिए । इकार एक स्वतन्त्र नित्य वर्ण है, यकार एक स्वतन्त्र नित्य वर्ण है । शास्त्र व्यवस्था करता है कि, जहाँ इकार के आने प्रकार वर्ण रहे, वहाँ इकार का उच्चारण न कर यकार का उच्चारण करना चाहिए | क्या इस वर्णव्यत्यासलक्षणा व्यवस्था से शब्द अनित्य होगया? | कभी नहीं ( ५ ) । " ( १३ ) -६ “ अनेक व्यक्तियों के एक साथ मिल कर शब्दोच्चारण से भेरी मृदङ्गादि के शब्द से शब्द में वृद्धि देखी जाती है ” इस छठे हेतु का भी उस समय कोई महत्त्व नहीं रह जाता, जब हमारा ध्यान शब्दानु-स्यूत ' नाद ' भाव की ओर जाता | वायवीय संयोग विभाग से सम्बन्ध रखने वाला शब्द नादभाव में परिणत ε

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भाष्यभूमिका होजाता है । शब्दोच्चारण के अभिव्यञ्जक बायवीय संयोग विभाग ही ' नाद ' शब्द से व्यवहुत हुए हैं । शब्द-च्चारण में जो वृद्धि सुनी आजी है, वह यथार्थ में नाद की वृद्धि है, न कि शब्द की । फलतः वादी के इस अन्तिम हेतु का भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता " ( ६ ) । ( परपक्ष खण्डनम् ) । ( ४ ) स्वपक्षसमर्थनम्-प्रथम सूत्र से शब्दार्थ का श्रौत्पात्तिक सम्बन्ध बतलाते हुए सूत्रकारने शब्दका नित्यत्व ( सिद्धान्त ) व्यवस्थित किया । श्रागे के ( २-७ ) के ६ सूत्रों से उन ६ हेत्वाभासों का स्पष्टीकरण किया, जिन के आधार पर परपक्षी शब्द का अनित्यत्व सिद्ध कर रहा है । उत्तर के ( ८-१३ ) ६ सूत्रों से उन ६ श्रीं हेलाभासों का निराकरण करते हुए सूत्रकारने परपक्ष का खण्डन किया । अत्र आगे के ( १४ - १६ ) ६ सूत्रों से स्वसिद्धान्त ( शब्द - नित्यत्त्व ) का समर्थन करने वाले कुछ एक तात्त्विक सिद्धान्तों का स्पष्टीकरण हो रहा है— ( १४ ) - १ - " यदि वस्तुस्थिति का तात्विक दृष्टि से विचार किया जाता है, तो यह अवश्य ही स्वीकार करना पड़ता है कि, “ शब्द सर्वथा नित्य ही है । " शब्दोच्चारयिता का परार्थ शब्ददर्शन ही शब्द नित्यता में निर्बाध हेतु है । उच्चारयिता शब्दस्वरूप के परिचय के लिए, दूसरे शब्दों में शब्द स्वरूप की प्रतिपत्ति बोध ( ) के लिए अपने मुख से शब्द का उच्चारण नहीं करता । यद्यपि यह ठीक है कि उच्चारयिता के शब्दोच्चारण से श्रोता को शब्दस्वरूप का बोध होता है, तथापि उच्चारयिता के प्रयत्न का यहीं विश्राम नहीं मान लिया जाता । श्रपितु वह शब्दप्रतिपत्ति के द्वारा वत् - शब्दवाच्य किसी अर्थ का श्रोता को बोध करना चाहता है । यही क्यों, उच्चवारयिता का प्रधान लक्ष्य यही रहता है कि, मुझ से उच्चरित शब्द का श्रोता अमुक तात्पर्य्य समझे I । बिना अर्थप्रतिपत्ति को लक्ष्य बनाए कोई भी उच्चारयिता निरुद्देश्य, निरर्थक शब्द का उच्चारण नहीं किया करता । इसी आधार पर मानना पड़ेगा कि, उच्चारयिता का प्रधान लक्ष्य है - श्रोता को शब्द के द्वारा अर्थप्रतिपत्ति कराना । अब देखना यह है कि, उच्चारयिता के मुख से निकला हुआ शब्द श्रोता को तद्वाच्य ( शब्दवाच्य ) अर्थ का बोध कैसे करा देता है? । कहना पड़ेगा कि, इस अर्थावबोध के लिए शब्दविशेष का अर्थविशेष के साथ शक्तिग्रह होना परमावश्यक है । ' राम शब्द का अमुक अर्थ है ' यह जाने बिना कभी श्रोता राम शब्द के श्रवण से लाभ नहीं उठा सकता । शब्द का अर्थ के साथ जो नियत शक्तिग्रह है, वही शब्द के अर्थबोध में प्रधान हेतु हैं । शक्तिग्रह के द्वारा शब्द के वाच्य अर्थ का बोध होना तभी सम्भव बन सकता है, जब कि शब्द को नित्य मान लिया जाय । यदि परपक्षी के कथनानुसार शब्द अनित्य है, तो वह उच्चरितप्रध्वस्त - मर्थ्यादा से भी श्राक्रान्त मानना पड़ेगा | अपने इस नाशधर्म से पूर्व शब्द उत्तर काल में प्रवृत्त नहीं होसकता । यह भी कहना पड़ेगा । जिस राम शब्द का जिस अर्थ में उच्चारयिता, तथा श्रोता दोनों को पहिले से शक्तिग्रह था, शब्दा-नित्यत्त्वपक्ष में इदानों उस शक्तिग्रह का अभाव है । क्योंकि पहिला शब्द भिन्न था, इस समय बोला सुना गया शब्द भिन्न है । इस समय ( तत्काल ) उत्पन्न होने वाले शब्द का श्रयं के साथ शक्तिग्रह है नहीं । फिर शब्दार्थ बोध ( श्रोता को ) हुआ कैसे?, एवं ऐसे अविज्ञात शक्तिग्रह वाले शब्द का उच्चारयिता ने उच्चारण किया कैसे?, यह उन्हीं शब्दानित्यत्त्ववादियों से प्रष्टव्य है । जिनके मत में शब्द नित्य है, वे इस विप्रतिपत्ति से दूर हैं । उच्चारयिता इस समय अर्थप्रत्ययदृष्टि से जिस नित्य शब्द का उच्चारण कर रहा है, उसका यह शब्दोच्चारण उसी अतिप्राचीन शक्तिग्रह से १०

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सम्बन्ध रखता हुआ अर्थप्रत्यय का साधक बन रहा है, एवं इसी प्राक्तन शक्तिग्रह के आधार पर श्रोता को अथावबोध कराने के लिए उच्चारयिता शब्द का उच्चारण करने में कोई आपत्ति नहीं समझता । जिस शब्दार्थ - शक्तिग्रह से इस समय अर्थबोध होता है, वह शक्ति उच्चारणविषयीभूत जिस शब्द में पहिले से गृहीत है, वही शक्ति उसी शब्द मे आज भी अविच्छिन्नरूप से विद्यमान । वही राम शब्द है, वही उसका अर्थ है, एवं वही शक्तिग्रह है । राम शब्द नवीन हो, उस में शक्तिग्रह नवीन हो, यह बात नहीं है, जिसका हेतु पूर्व में बतलाया जा चुका है । इसप्रकार अर्थप्रतिपत्ति के समन्वय के लिए शब्द का नित्यत्त्व ही सिद्ध हो रहा है ” ( १ ) । ( १५ ) – २ - " शब्द नित्य है, इस सम्बन्ध में दूसरा निर्वाध हेतु है - ' शब्द का यौगपद्य ' । गौ शब्द के सुनते ही हमें एक साथ सम्पूर्ण गौ व्यक्तियों का बोध हो जाता है । दूसरे शब्दों में गौ शब्द गौजाति का चोक बन रहा है । यदि शब्द अनित्य होता, तो कभी यह जाति का बोधक नहीं बन सकता था । किसी एक व्यक्ति ने अपने मुख से गौ-शब्द सुना, एवं सबको शब्दार्थ का दूसरी दृष्टि ( विज्ञानदृष्टि ) से सूत्रार्थ का समन्वय कीजिए । शब्द का उच्चारण किया । सामने असंख्य श्रोता खड़े हैं । सबने वह ज्ञान हो गया । यह तभी सम्भव हो सकता है, जब कि शब्द को नित्य मान लिया जाय । जिनके मत में शब्द अनित्य है, वे इस यौगपद्य का कथमपि समन्वय नहीं कर सकते । कारण स्पष्ट है । अनित्यता - पक्ष में शब्द मुग्त्र से उत्पन्न हुआ, वहीं नष्ट हो गया । ऐसी दशा में अन्य व्यक्तियों के लिए इसका भान असम्भव है । कण्ठ - ताल्वादि स्थान, करण, संयोग, विभागादि शब्दोत्पादक व्यापार केवल उच्चारयिता से सम्बन्ध रखते हैं । अन्यत्र इनका अभाव है । जब अन्यत्र शब्दोत्पादक व्यापारों का अभाव है, तो अन्यत्र शब्द श्रवण का भी अभाव ही मानना पड़ेगा । इधर जो शब्द को नित्य मानते हैं, उनके मतानुसार यौगपद्य का भलीभाँति समन्वय रहा है 1 मुखप्रदेशलक्षण एक नियत बिन्दु से निकला हुआ नित्य शब्द एक ही साथ चारों ओर आकाश मण्डल में ( वीचीतरङ्गन्याय से ) अपना एक परिमण्डल ( वतु लवृत्त ) बना डालता है । पूर्व - पश्चिम - उत्तर-दक्षिण - ऊपर नीचे सर्वत्र इस शब्दमण्डल की व्याप्ति हो जाती है । इस शब्दपरिमण्डल की सीमा के गर्भ में जितनें व्यक्ति प्रतिष्ठित रहते हैं, परिमण्डलान्तर्वर्त्ती शब्द उन सब व्यक्तियों में उस शब्द की नोदना कर देता है, फलतः स्त्र उसे सुनने में समर्थ हो जाते हैं । इसप्रकार हमारा यह ' शब्दयौगपद्य ' भी शब्द -नित्यता का ही समर्थन कर रहा है " ( २ ) । ( १६ ) -- ३- “ संख्या का अभाव भी शब्दनित्यता ही सिद्ध कर रहा है । यदि एक व्यक्ति अपने मुख से १०-१५ बार एक ही गौशब्द का उच्चारण करता है, तो लोक में ऐमे उच्चारयिता के सम्बन्ध में कहा जाता है कि - ‘ इसने १०-१५ वार एक ही गौ शब्द का उच्चारण किया ' । शक्तिग्राहकशिरोमणिभूत यह लोकव्यवहार केवल उच्चारण की अनेक संख्या बतलाता हुआ, साथ ही शब्द की एक संख्या बतलाता हुआ शब्दनित्यत्त्व ही घोषित कर रहा है । यदि शब्द अनित्य होता, तो पूर्व व्यवहार के स्थान में यह व्यवहार होता कि- “ अमुक व्यक्ति १०-१५ गौ शब्द बोल रहा है " । परन्तु ऐसा व्यवहार नहीं होता, जिसका कि एक मात्र मूल हेतु है - शब्द का नित्यत्व " ( ३ ) । ११

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उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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भाष्यभूमिका ( १७ ) – ४- " ' अनपेक्षत्त्व ' हेतु से भी शब्द की नित्यता ही सिद्ध हो रही है । सापेक्षवाद का उपा-दान लक्षण कार्य्य - कारणभाव से सम्बन्ध है । घट कार्य है, मृत्तिका कारण है । पट कार्य्य है, तन्तु कारण है । घट - पट कार्यो की स्वस्वरूप निष्पत्ति के लिए उपादानकारणरूप मृत्तिका - तन्तुओं की अपेक्षा रहती है । परन्तु देखते हैं, शब्द अपने स्वरूप के लिए किसी अन्य कारण की अपेक्षा नहीं रखता । भच्द के आरम्भक अवयव विशेष घट- पटवत् शब्द का स्वरूप निर्माण करते हों, यह बात नहीं है । कण्ठताल्वादि निमित्तकारणों से नित्य शब्द किसी उपादान कारण की अपेक्षा न रखता हुआ स्वतः प्रकट हो जाता है । नो अनेपक्ष है, वह अवश्य ही नित्य है " ( ४ ) ( १८ ) -- ५ - " यदि कोई यह श्राग्रह करे कि " शब्दस्वरूपसिद्धि के लिए अवयवरूप कारणों की अपेक्षा अवश्य ही रहती है । ' राम ' शब्द की सिद्धि ' - - - म् - ' इतने अवयवों की रामष्टि पर निर्भर है । ऐसी दशा में घट - पटवत् हम शब्द को भी सापेक्ष ही कहेंगे । जब शब्द सापेक्ष है, तो वह श्रनित्य भी अवश्य ही है " । तो इस अवयवयोग के सम्बन्ध में हमें ' प्रख्याभाव ' हेतु उपस्थित करना पड़ेगा । केवल वर्णों की समष्टि देख कर अपेक्षा मानना असङ्गत है । कौन कहता है - - - - - मू - ' मिल कर राम शब्द बना है । ' राम ' इत्याकारक शब्द स्वतन्त्र है, वर्ण स्वतन्त्र हैं । अतएव ' राम ' शब्द से जो अर्थ प्रतीत होता है, वह उक्त वर्णों से कभी सम्भव नहीं है । यदि अभ्युपगमवाद से थोड़ी देर के लिए यह भी मान लिया जाय कि, वर्ष समष्टि ही शब्दनिष्पत्ति का कारण है, तब भी प्रख्या के अभाव से यह कारणता अपेक्षाबाद का समर्थन करने में असमर्थ है । घटपटादि में मृत् - तन्तु का जैसा योग बतलाया जाता है, क्या शब्दमर्यादा में बैसा योग प्रतीत होता है? नहीं । शब्दस्वरूप निष्पत्ति प्राकृतिक है, नित्य है । इधर घट - पट की स्वरूपनिष्पत्ति विकारभाव से सम्बन्ध रखती हुई नित्य है । शब्दसम्बन्धी कार्य्यकारणभाव भावात्मक होने से नित्य है, घट - पट सम्बन्धी कार्य्य - कारणभाव भूतात्मक होने से अनित्य है । दोनों में अहोरात्र का अन्तर है । उधर अपेक्षावाद का साम्राज्य भूतसृष्टि से ही सम्बन्ध रखता है, न कि भावसृष्टि से । मानसीसृष्टि ही भावसृष्टि है, जिसका भूतसृष्टिलक्षणा वैकारिकी, तथा मैथुनी सृष्टि से कोई सम्बन्ध नहीं है । इस पर भी यदि कोई प्रातिशाख्य सिद्धान्त को लेकर यह आक्षेप करे कि, " वायुः खात्, शब्दस्तत् ' इस प्रातिशाख्य वचन के अनुसार वायु ही शब्दरूप में परिणित होता है । वायु एक भौतिक कारण है । इस अनित्य ( भौतिक ) वायु की कारणता से सम्बन्ध रखने वाला शब्द भी अवश्य ही अनित्य है ” तो इस आक्षेप के सम्बन्ध में भी ' योगस्य प्रख्याभावान् ' वही उत्तर दिया जायगा । शब्दाविर्भाव में जो महत्त्व संयोग - विभागादि भावनात्मक कारणों का है, वायु भी ( भूत होता हुआ भी ) शब्दाविर्भाव में अपना वही महत्त्व रखता है । वायु केवल नोदनारूप से निमित्तमात्र बनता है, मृत्तिका - तन्तुवत् शब्द का उपादान नहीं । वायु को शब्दोत्पत्ति में कारण मानने वालों से हम पूंछते हैं कि, यदि वायु मृत्तिका - तन्तुवत् शब्द का उत्पादान कारण है, तो शब्द में वायु का सन्निवेश क्यों नहीं उपलब्ध होता । मृत्तिका से उत्पन्न घट में हमें मृत्तिका उपलब्ध हो रही है । परन्तु देखते हैं शब्द में वायवीय अवयवों का कहीं गन्ध भी नहीं है । यदि शब्द में वायवीय अवयव होते, तो वायुवत् शब्द का भी स्पर्श होता । फलतः सिद्ध हो जाता है कि, वायु शब्द का उपादान नहीं हैं, अपितु शब्दाविर्भाव का निमित्त मात्र है । " ( ५ ) । १२