Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 121–130

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 121 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत ' वेद - पौरुषेय - अपौरुषेयत्व - मीमांसा ' प्रथमस्तम्भ - उपरत १ -X-नामक

पृष्ठ 122

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 122 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत-' उपनिषत्प्रतिपाद्यविपय दिगदर्शन ' नामक द्वितीय - स्तम्भ

पृष्ठ 123

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 123 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः उपनिषत्प्रतिपाद्यविषयदिग्दर्शन १ - द्वितीय स्तम्भोपक्रम-द्वितीय स्तम्भ गुहानिहित जिस आत्मविद्या के स्वरूप प्रतिपादन के लिए वेदशाखानुगत अनेक ( ११३१ ) उपनिषद् ग्रन्थ अवतीर्ण हुए, उनके प्रतिपाद्य विषय के सम्बन्ध में ' उपनिषदों में क्या है? इस प्रश्न का विशेष महत्त्व नहीं है । इस प्रश्न का यथावत् समाधान तो स्वयं उपनिषद् - ग्रन्थों पर ही निर्भर है । प्रासङ्गिक भूमिका-परिलेख में उपनिषद् - प्रतिपाद्य विषयों की तालिका का स्पष्टीकरण भी असम्भव है । यदि प्रतिपाद्य विषयों की केवल की जाय सूची भी उद्ध, त, तो इसके लिए भी लगभग ४०० पृष्ठात्मक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ अपेक्षित है । फलतः उक्त प्रश्न के सम्बन्ध में सिद्धान्ततः यही उत्तर पर्य्याप्त माना जायगा कि, ' उपनिषदों में क्या है? ' जिज्ञासा शान्त करने के लिए अनन्य निष्ठा से स्वयं उपनिषद् - ग्रन्थों का ही स्वाध्याय करना चाहिए । और इस प्रकार इसी समाधान पर हमारा प्रस्तुत द्वितीय स्तम्भ समाप्त माना जा सकता है । क्योंकि आरम्भ में प्रतिज्ञा की जा चुकी है । अतः तद्रक्षार्थ इस सम्बन्ध में भी परिभाषा - दृष्टि से कुछ तो भी निवेदन कर देना आवश्यक बन जाता है । प्रकृत स्तम्भ में बतलाई जाने वालीं परिभाषाओं के आधार पर ही पाठक यह अनुमान लगा सकेंगे कि, उपनिषत् - साहित्य भारतवर्ष की वह अमूल्य निधि है, जिसे अपने ममीप रखता हुआ भारतवर्ष सम्पूर्ण विश्व में अपना एक महत्त्व - पूर्ण स्थान सुरक्षित रख लेने के महान् उत्तरदायित्त्व से प्रकृत्या ही सुसमन्वित है । २- भूतसर्ग, और शास्त्रोपदेश-( १ ) - यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्नम् ॥ - श्वेता ० ३०३ | ६ | ( २ ) - अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ – श्वेता ० ३।२० ।

( ३ ) - ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।

विश्वस्यैकं परिवष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ॥

( ४ ) - सर्वव्यापिनमात्मानं, क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।

आत्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥

१.७ — श्वे ० ३।७ । —श्वे ० १।१६

पृष्ठ 124

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 124 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भूमिका ( ५ ) - पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ – ईशोपनिषत् १

( ६ ) - एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनुप्रभृतः ।

एकैवोषाः सर्वमिदं विभाति - ' एकं वा इदं विबभूव सर्गम् ' ॥

- ऋक्सं ० ६।४।२६ । उक्त उपनिषत् -मन्त्र - श्रुतियों के अनुसार ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इत्यादि लक्षण सच्चिदानन्दघनमूर्ति ईश्वर - प्रजापति से कोई स्थान विरहित नहीं है । वह सर्वत्र, सत्र जीवों में साक्षी - रूप से विद्यमान है । वही सब कुछ बना है, सबमें प्रतिष्ठित है, वही ' सर्वम् ' है । जीवात्मा इसी सर्व-व्यापक ( विश्वव्यापक ) ईश- प्रजापति का अंश है । जीवसर्ग असंज्ञ, श्रन्तः संज्ञ, ससंश, मेट से तीन श्रेणियों में विभक्त है । धातुजीव श्रसंज्ञ हैं, इनमें केवल अर्थ शक्तिप्रधान वैश्वानर आत्मा का विकास है, अत एव इन्हें ' एकात्मक ' जीव कहा गया है । ' स्तम्ब ' से प्रारम्भ कर श्रोषधि - वनस्पति श्रादि वृक्षवर्ग अन्तः संज्ञ जीव हैं, इनमें अर्धलक्षण वैश्वानर के साथ साथ क्रियाशक्तिप्रधान तैजस श्रात्मा का भी विकास है, अतएव इन्हें ' द्वयात्मक ' जीव कहा गया है । इनका मूलभाग भूगर्भ में बद्ध रहता है, इनका स्थानपरित्याग नहीं होता, मूलत्याग नहीं होता, अतएव इन्हें ' मूलजीव ' भी कहा जाता है । कृमि से आरम्भ कर देवयोनिलक्षण ' ब्रह्म ' नामक ( चान्द्रदेवात्मक ) जीवपर्य्यन्त सम्पूर्ण जीववर्ग ससंज्ञ नाम से प्रसिद्ध है । इनमें अर्थ - क्रियालक्षण वैश्वानर - तेजस के साथ साथ ज्ञानशक्तिप्रधान प्राज्ञ - श्रात्मा का भी विकास है, श्रतएव इन्हें ' त्र्यात्मक ' जीव भी कहा गया है । यह तीसरा ससंज्ञ नामक जीववर्ग ही लोकभाषा में ' जीव ' नाम से प्रख्यात है । मातृस्यानीय पार्थिव ' श्यैत ' प्राण, तथा पितृस्थानीय सौर ' नौघस ' प्राण, इन दोनों के समन्वय से ही उक्त संसज्ञ - जीवसर्ग का विकास हुआ है । इन व्यावापृथिव्य प्राणों के समन्वयतारतम्य से यह जीवसर्ग १३ मागों में विभक्त हो रहा है । कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य ' ये पाँच सर्ग ' तिर्य्यक्सर्ग हैं । एवं इनमें गुणा-त्मिका प्रकृति ( योगमाया ) के रजोगुण की प्रधानता है । अतएव यह पञ्चसर्गसमष्टि सांख्य - भाषा में ' रजोविशाल-सर्ग ' नाम से व्यवहृत हुई है । कृमिसर्ग के द्यावापृथिव्य प्राय के सन्निवेश तारतम्य से सहस्रपात् शतपात्, द्वात्रिं-शत्पाद, षोडशपात्, मेद से चार विवर्त हैं । कीट का श्रष्ठपात् विवर्त ' प्रधान है । पार्थिव श्राकर्षण को शिथिल करने वाला सौर प्राण ज्यों ज्यों अधिकाधिक मात्रा में आता जाता है, त्यों - त्यों पार्थिवाकर्षणत्रत अधिकाधिक कम होने लगता है । कृमि, -कीट, इन दो सर्गों में ( प्राण-संनिवेशतारतम्य रहने पर भी ) पार्थिव प्राय की प्रधानता है । तीसरे पशुमर्ग में दोनों प्राण सममात्रा से युक्त रहते हैं । अतएव चतुष्पाद पशुसर्ग पार्थिव पुच्छभागसे तथा सौर शिरोभाग से समुतिलित - सा बन कर खड़ा रहता है । आगे के पक्षि- मनुष्य सर्गों में पार्थिवप्राण गौण है, सौरप्राण प्रधान है । सौरप्राण की मात्रावृद्धि से शिरोभाग आंशिक रूप से उन्नत हो जाता है, पार्थिवप्राणप्रधान पुन्छभाग अवनत रह जाता है । पक्षिमर्ग का यही स्वरूप है | पक्षी जत्र भी बैठता है, शिरोभाग उन्नत रहता है, तिर्य्यगरूप से बैठता है । सौरप्राण ओर अधिक मात्रा से आता है, शिरोभाग सर्वथा ऋजु ( सीधा ) बन जाता एवं मानवसर्ग का यही स्वरूप है । १०८

पृष्ठ 125

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 125 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय as उक्त पाँच तिर्य्यक् - जीवसर्गों के अतिरिक्त ' राक्षस, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, ऐन्द्र, पैत्र, प्राजापात्य, ब्राह्म ' यह अष्टविध ससंज्ञजीवसर्ग और है । इनमें पार्थिवप्राणाकर्षण का श्रात्यन्तिक प्रभाव है, अतएव इन्हें ' अपाद ' जीव कहा गया है । इसके अतिरिक्त मनुष्यों में जहाँ ११ इन्द्रियाँ हैं, वहाँ इनमें ८ सिद्धि, ६ तुष्टि भेद से १७ इन्द्रियाँ अधिक हैं 1 । सम्भूय इनमें २८ इन्द्रियों का समावेश है । पार्थिव आकर्षण का स्थान चान्द्रसौम्यप्राण ग्रहण कर लेता है, अतएव इन्हें ' चान्द्रदेवता ' भी कहा गया है । चन्द्र - चन्द्रिका ही इन सौम्य जीवों की श्रावासभूमि है । सौर ताप इनके लिए एकान्ततः असह्य है । सोम ही सत्त्वगुण की प्रतिष्ठा है । अतएव इन्हें ' सत्वविशालसर्ग ' माना गया है । इसप्रकार रजोविशाल पञ्चविधतिर्यक् सर्ग, सत्वविशाल अष्टविध ऊर्ध्वसर्ग, ससंज्ञ सर्गके १३ विभाग हो जाते हैं । अन्तः संज्ञ नामक वृक्षसर्ग, असंज्ञ नामक धातुसर्ग, दोनों तमोविशाल अधः सर्ग हैं, एवं दोनों का ' स्तम्ब ' शब्द से ग्रहण है । इसप्रकार स्तम्ब से आरम्भ कर ब्रह्मपर्यन्त १४ प्रकार का भूतसर्ग ( जीवसर्ग ) हो जाता है, जैसा कि निम्नलिखित प्राधानिक वचन से भी प्रमाणित है— ऊर्ध्वं सत्वविशालस्तमाविशालश्च मूलतः सर्गः मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादि - स्तम्यपर्यन्तः । ( सां ० का ० ५४ ) । यद्यपि कारिकाने तिर्यक्सर्ग में ' पशु - पक्षी - सर्प - कीट - स्थावर ' नामक पाँच सर्गों का समावेश मानते हुए मानुषसर्ग को स्वतन्त्र माना है, परन्तु उक्त कारिका के समन्वय की दृष्टि से ' कृमि - कीट - पक्षी - पशु - मनुष्य ' यही बिभाग सुसङ्गत प्रतीत होता है । यद्वा तद्वास्तु, सिद्धान्त में कोई विरोध नहीं है । उक्त चतुर्दशविध भूतसर्ग ' एकं वा इदं त्रि बभूव सर्वम् ' के अनुसार ईशप्रजापति की काम - तपः--श्रनलक्षणा व्यापारत्रयी से उत्पन्न होने के कारण यद्यपि ' ईश्वरांश ' ही माना जायगा । तथापि इस श्रंशभाव का पूर्ण विकास एकमात्र मानवसर्ग में ही माना गया । | देवसर्ग परतन्त्र है, धातु - मूलसर्ग अचेतन है, कृमि -कीट - पशु - पक्षी - सर्ग चेतना के पूर्ण विकासाभाव से परतन्त्रवत् है । परन्तु मनुष्यसर्ग पूर्णेश्वर की यच्चयात्रत् पूर्ण विभूतियों से युक्त रहता हुआ सर्वसर्गापेसया प्रधान है, तत्समतुलित है । इसी चित - पूर्णता के सम्बन्ध से इसे प्रजापति के नेदिष्ठ ( निकटतम ) कहा गया है, जैसा कि ' पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' इत्यादि ब्राह्मणवचन प्रमाणित है । असंज्ञादि त्रिविध जीवों के साथ क्रमशः वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ नामक आत्मविवत्तों का सम्बन्ध व्रत-लाया गया है । ये तीनों आत्मविवर्त क्रमशः अग्नि, वायु, इन्द्र नामक प्राणदेवताओं से अनुग्रहीत हैं । तीनों में ‘ इन्द्रप्राण ' ही चैतन्यब्रह्म ( अक्षरब्रह्म ) के निकटतम है । प्रज्ञा सोमांश है, तदभिन्न प्राण इन्द्र | प्रज्ञात्मक प्राण ही इन्द्र है । प्रज्ञासोम ीघ्र है, इसी पर चित् का ग्राभास होता है, इसी चित् के सम्बन्ध से प्रज्ञात्मक प्राणेन्द्र ' चिदाभासलक्षण ' जीवात्मस्वरूप में परिणत होता है । यद्यपि कृमि - कीटादि पाँचों हीं सर्गो में प्राज्ञेन्द्र का सम्बन्ध है | परन्तु पूर्ण विकास केवल मानवसर्ग में ही हुआ है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, ऐन्द्रव्या-करण का विकास केवल मनुष्य में ही हुआ है । ज्ञानेन्द्र ही क - च - त - ट- पादिवर्णविभक्तिलक्षण व्याकरण का प्रवर्त्त'क है । अन्य सर्गो में वर्णवाक् का अभाव है, केवल मनुष्य ही - ' तुरीयं वाचो वदन्ति ' । इस प्राज्ञेन्द्र के पूर्ण विकास से ही मतुष्यमर्ग प्रजापति के नेदिष्ठ माना गया है । तलवकारोपनिषत् नें इस विषय की विशद-१०६

पृष्ठ 126

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 126 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भाष्यभूमिका वैज्ञानिक मीमांसा की है । वहाँ बतलाया गया है कि, अग्नि वायु - इन्द्र, तीनों में से केवल इन्द्र ने हीं ब्रह्म का समीप से स्पर्श किया - ' स हि नेदिष्ठं पस्पर्श ' ( केनोपनिषत् ४।३ ) । अपिच एक और कारण से भी मानवसर्ग की उक्त नेदिष्ठता का समन्वय किया जा सकता है । ईश-प्रजापति में जितने संख्या - विभाग हैं, जीवसर्ग में से केवल मानवसर्ग में हीं उन सबका यथानुरूप पूर्ण विकास है | ईश्वरांश- ईश्वरावयव · रूप स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रादि का शत्र ईश्वरात्मा से सम्बद्ध है । इन में किसी में सर्वत्व नहीं है । परन्तु मनुष्य में स्वयम्भू - आदि सत्र पर्वो का श्रव्यक्तादिरूप से समावेश है । जो अमृत - ब्रह्म - शुक्र नाम की सस्थाएँ ईश्वर में हैं, वे ज्यों की त्यों मनुष्य में हैं, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट होने वाला है । नेदिष्ठ होने के कारण अपनी ज्ञान - क्रिया - अर्थ - कलाओं से उसकी ज्ञान - क्रिया - अर्थ - कलाओं का सम्बन्ध जोड़ता हुआ एकमात्र मनुष्य ही ज्ञानकाण्ड, उपासनाकाण्ड, कर्म्मकाण्ड का अधिकारी माना गया है! एकमात्र मानवसर्ग ही अपने ऐहिक जन्म में अपनी स्वाभाविक स्थिति से उच्चभूमिका में पहुँच सकता है । शेष जीवसर्ग केवल अपने सहज - जीवन के ही अनुगमन में समर्थ है । सम्पूर्ण शब्दोपदेश एकमात्र मानवसर्ग को उद्देश्य बना कर ही प्रवृत्त हुए हैं । जब मनुष्य ईश्वर का अंश है, साथ ही अंश का अंशी के साथ जब स्वाभाविक सम्बन्ध है, एवं इसी सम्बन्ध से जब मनुष्य प्रजापति के नेदिष्ठ है, तो फिर इसे उपदेश देने की क्या आवश्यकता है? क्यों यह १, ज्ञान- उपास्ति - कर्म्म- का अनुगमन करे, जब कि इसकी ज्ञान - क्रिया - अर्थ - कलाएँ स्वतएव उसकी ज्ञान - क्रिया-अर्थ - कलाओं से सम्बद्ध हैं?, इन प्रश्नों का समाधान ' पा'मा ' विवर्त ' है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, पूर्णेश्वर की यच्चयावत् पूर्ण विभूतियों से युक्त रहता हुआ मनुष्य पूर्ण है, स्वतन्त्र है, बन्धनरहित है । और यही इसका वास्तविक स्वरूप है । परन्तु ६ ऊर्मिम, ६ - अवस्था, ५ क्लेश, इन १७ पाप्माओं से युक्त रहने के कारण यह उसके स्वाभाविक सम्बन्ध से वञ्चित हो रहा है । इन्हीं पाप्माओं के अनुग्रह से यह उससे पृथक होता हुआ अपने स्वाभाविक दिव्य स्वरूप को भूल रहा है । दूसरे शब्दों में मध्यस्थ पा'माओं ने इसे उससे पृथक् कर रक्खा है । और यही इस पूर्ण की अपूर्णताप्रवृत्ति का मुख्य कारण है । इसी अपूर्णता से प्रज्ञा-पराध का अनुगामी बनता हुआ जीवात्मा अपनी स्वाभाविक शक्तियों का अभिभव करता हुआ निर्बल बन जाता है । ऐसा निर्बल आत्मा ' नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ' के अनुसार उस व्यापक श्रात्मतत्व - विभूति की अनुग्रह - प्राप्ति में तो सर्वथा असमर्थ ही बना रहता है । इसके साथ ही शक्तिहास के कारण आधिदैविक - श्राधिभौ-तिक - आध्यात्मिक तापों से यह दुःखी भी बना रहता है । ३ समाधानपरम्परा— तापत्रयनिवृत्तिपूर्वक दुःखात्यन्तनिवृत्ति के लिए, साथ ही पाप्मानिवृत्तिपूर्वक अपने विशुद्ध आत्म-स्वरूप में आते हुए उसकी स्वाभाविक विभूतियों की अनुग्रहप्राप्ति के लिए अवश्य ही मनुष्य का कुछ कर्त्तव्य हो जाता है । उस कर्त्तव्य - शिक्षण के लिए शास्त्रोपदेश प्रवृत्त हुआ । है । ज्ञान - क्रिया-अर्थमय आत्मा की कर्त्तव्यधारा कर्म्म - उपास्ति - ज्ञान - भेद से तीन धाराओं में विभक्त है । इन तीनों के लिए कर्त्तव्यवेद के विधि - आरण्यक - उपनिषत् - नामक तीन शास्त्रोप्रदेश प्रवृत्त हुए हैं । कर्मात्मक विधिभाग, उपासनात्मक आरण्यक भाग, दोनों का विचार अनपेक्षित हैं । अपेक्षित है ज्ञानात्मक उपनिषद् - भाग का ११०

पृष्ठ 127

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 127 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयखण्ड विचार | उपनिषत् का मुख्य उद्देश्य है जीवात्मा के ज्ञानमय मानस पटल पर आए हुए आवरणों को हटाने का उपाय- प्रदर्शन | अपने इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए उपनिषत् की ईश्वरप्रजापति, जीवात्मा, आवरण-स्वरूप, आवरणनिधृत्युपाय, इन चार विषयों को लक्ष्य बनाना पड़ता है । यह स्मरण रखने की बात है कि, उपनिषत् - शास्त्र जीवाभ्युदय - निःश्रेयस् के लिए ही प्रयुक्त हुआ है । अतः इसका प्रधान प्रतिपाद्य विषय तो जीवात्मा ही है । परन्तु जीव उस ईश्वर का अंश है, एवं अंश - तभी अंशी की विभूतियों का अनुग्रह प्राप्त कर सकता है, जबकि इसे उसके स्वरूप का बोध हो जाय । एकमात्र इसी उद्देश्य से उपनिपत् को गौण रूप से ईश्वरात्मा का भी विश्लेषण करना पड़ता है । इसप्रकार प्रस्तुत विवेचन से हमें ' उपनिषदों में क्या है?, ' इस प्रश्न के सम्बन्ध में निम्न लिखित समाधान परम्परा का अनुगामी बनना पड़ता है— १ - उपनिषदों में जीवात्मा के तात्विक स्वरूप का निरूपण है । २ - उपनिषदों में ईश्वरात्मा का प्रासङ्गिक विश्लेपण है । ३ - उपनिषदों में आत्मस्वरूपावरक पाप्माओं का प्रदर्शन है । ४ - उपनिषदों में आवरणनिवृत्युपायप्रदर्शन है । ५ - उपनिषदों में संचर- प्रतिसंचररूप से सृष्टिविज्ञान का उपहा है । “ श्रात्मस्वरूप - प्रतिपादनपुरःसर, गत दोष - निवृत्युपाय बतलाते हुए उसके साथ इसका सम्बन्ध करा देना ही उपनिषच्छास्त्र का मुख्य कर्त्तव्य है " इस वाक्य से दो उद्देश्य सूचित हो रहे हैं । आत्मस्वरूप का प्रतिपादन पहिला, एवं मुख्य उद्देश्य है । एवं जीवात्मा को उपायों के द्वारा निर्धूत - कल्मष बना कर इसे उनके साथ अभिन्न बनाते हुए अमृतत्त्व प्राप्त करा देना दूसरा उद्देश्य है । क्योंकि शाम्रोपदेश का लक्ष्य एकमात्र जीवात्मा है । अतएव मानना पड़ता है कि, उपनिषद में प्रतिपादित ग्रात्मा ' जीवात्मा ' ही है । जीवात्मा-परमात्मा का अंश है । इस श्रंशस्वरूपज्ञान के सम्बन्ध में गौणरूप से परमात्मा का भी यदि निरूपण हो जाय, तो एतावता ही उपनिषत् के मुख्य प्रतिपाद्य उद्देश्य की कोई क्षति नहीं मानी जा सकती । ऐसी दशा में जिन व्याख्याताओं नें उपनिषदों को परमात्मप्रतिपादन प्रधान मानते हुए इन शास्त्र को अखण्डात्मप्रतिपादक बतलाया है, उनके सम्बन्ध में कुछ न कहना ही प्रचलित श्रद्धा - विश्वास की रक्षा का एकमात्र मार्ग है । ४ - उपनिषदों के सन्तमतानुयायी प्राचीन व्याख्याता— सन्तमत को पुपित - पल्लवित करने वाले सम्प्रदायवाद ने अपने समय में अवश्य ही भारतीय साहित्य, संस्कृति, धर्म्म की रक्षा में अपना हाथ बँटाया होगा । परन्तु आज तो इस सम्प्रदायवाढ ने ( वैदिकतत्त्वविलुप्ति से ) रकार, क्षकार, ककार के स्थान में क्रमशः भकार - क्षकार - ककार को ही प्रतिष्ठित कर रखा है । कहना न होगा कि, ' पुराणमित्येव न साधु सर्वम् ' आभाणक की अवहेलना करने से इसी सम्प्रदायवाद ने वैदिक तत्त्व-विलुप्ति में पर्याप्त सहयोग दिया है । हम देश के साहित्यसेवी विद्वानों से सानुनय यह निवेदन करेंगे कि, यदि वे वैदिक - साहित्य का वास्तव में समुद्धार चाहते हैं, तो उन्हें सम्प्रदायवाद का प्राश्रय छोड़ कर विशुद्ध - आ प्रणाली से ही उन्हें स्वाध्याय में प्रवृत्त होना चाहिए । प्रत्येक दशा में उन्हें निम्न लिखित श्रौत - आदेशों का अनुगमन करना पड़ेगा, और तभी वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे-१११

पृष्ठ 128

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भाष्यभूमिका “ यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि त्वया सेवितव्यानि, नो इतराणि " ( तै ० ३० १ ११ १,२,। ) श्रद्धा - विश्वास के आधार पर अपना गौरव सुरक्षित रखने वाले भारतवर्ष ने अपने अतिशय उदार-क्रोड़में अनेक सम्प्रदायों को जन्म दिया । सभी सम्प्रदायों नें स्व प्रतिष्ठा के लिए अपनी प्रामाणिकता के लिए उस सुप्रसिद्ध प्रस्थानत्रयी ( उपनिषत्, भगवद्वीता, शारीरकसूत्र ) का आश्रय लिया, जिसके बिना कोई भी सम्प्रदाय प्रतिष्ठित नहीं माना जासकता । फलस्वरूप सम्प्रदायप्रवृत्त के स्वनामधन्य श्रीवल्लभ, रामानुज, माध्व, निम्बार्क, शङ्कर, आदि सम्प्रदायप्रवर्तकों ने अपने अपने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्थानत्रयी पर स्वतन्त्र भाष्य लिखे । उपलब्ध होनें वाले इन साम्प्रदायिक भाष्यों में श्राजदिन विद्वत्समाज में शाङ्कर माष्य का विशेष समादर है, यह निर्विवाद है । अतः दो शब्दों में हम इस भाष्य के दृष्टिकोण का ही दिग्दर्शन करा देना पर्याप्त समझते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि, जिस साम्प्रदायिक कलहयुग में भगवान् शङ्कराचार्य्यं श्रवतीर्ण हुए थे, उस युग की दृष्टि से शाङ्करभाष्य अपना एक विशेष महत्त्व रखता है । और तद्य गापेक्षया हम शाङ्कर - भाष्य का महोपकार मानने के लिए बाध्य हैं । प्रकृतिसिद्ध शाश्वत धर्म के सनातन नियमों में जब जब ग्लानि उपस्थित होती है, तत्र तत्र भगवंदश भारतवसुन्धरा में अवतीर्ण हुआ करता है, यह प्रजा का चिरन्तन, साथ ही प्रामा णिक विश्वास है । कोई युग था, जिसमें यज्ञविद्यात्मक सूर्य्य अपनी सहस्रकलाओं से भारतवर्ष में तप रहा था । कालातिक्रम से आगे जाकर वैधपशुबलि का दुरुपयोग होने लगा । स्वार्थियों ने वैध - विधियों की उपेक्षा कर ईश्वर के नाम पर अवैध विधि से सर्वथा निरर्थक असंख्य मूक पशुओं को बलिवेदि पर चढ़ाना आरम्भ कर दिया । इसी हिंसावृत्ति ने कालान्तर में उस सम्प्रदायवाद को जन्म दे डाला, जो अपने अवैध अकाण्ड ताण्डवों से आगे चलकर ' कापालिक ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्रकृतिस्वरूपसंरक्षणात्मक यज्ञकम्मों की उपेक्षा, तन्माध्यम से - ‘ न मांसभक्षणे दोषो, न मये, न च मैथुने " ( मनु: ५/५६ ) इत्यादि मनूपवर्णित अवैदिक अनाचारों का प्राधान्य, प्रकृतिविरुद्ध असदाचरणात्मक सद्भावों के काल्पनिक चमत्कारों का महान् व्यामोहन, फलस्वरूप सहज सनातनधर्म्म का अभिभव, आस्था श्रद्धापरायण । भारतीय जनता का निःसीम क्षोभ, इसकी सहज भावुकता से लाभ उठाने में कुशल काल्पनिकों के द्वारा अहिंसा के माध्यम से सहसैव प्रादुर्भुत वेटविरुद्ध अहिंसापथ का आविर्भाव, तत्परिणामस्वरूप सहजभाबुक वेदमर्म्मानभिज्ञ बुद्धादि के द्वारा प्राकृतिक सहज सौन्दर्य्यविघातक शून्य - क्षणिकवाद का महता समारम्भेण प्रचार प्रसार, आदि आदि काण्ड - ताण्डवों नें शाश्वत सनातन वैदिक आचारात्मक धर्म को सर्वथैव ग्लानकोटि में ला उपस्थित किया । एवं हि श्रूयते - अहिंसा का असामयिक डिन्डिमघोष करने वाले यज्ञविज्ञानशून्य बौद्ध मतवादानुयायी तत्कालीन नरपतियों नें प्रकृतिसिद्ध वैदिक यज्ञकर्म्म के समूलोत्पाटन का दृढ़ संकल्प * यदा यदा हि धर्म्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्म्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ( गीता ) । ११२

पृष्ठ 129

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयखण्ड कर डाला सत्यामत्य का निर्णयक भगवान् है । परन्तु जनश्रुति कहती है कि, यशकाल में वैध विधियों का उल्लंन करने वाले व्यक्तियों के द्वारा जो अवस्था निरपराध मूक पशुओं की थी, वही स्थिति यज्ञकर्म्म-परायण भूसुरों की हुई । बौद्धों के इस अत्याचार से धर्म्मग्लानि सीमोल्लंघन कर गई । वेदधर्म्मविलुप्ति के उपक्रम दृष्टिगोचर होने लगे । ' किं करोमि, क गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति ' का प्रार्त्तनाद प्रतिध्व-नित हो पड़ा । पुकार सुनी गई, स्वनामधन्य, प्रातः स्मरणीय भट्टपाद ( श्रीकुमारिलभट्ट ) का प्रादुर्भाव हुआ । भट्टपादशिष्य सर्वश्री मण्डन मिश्र के प्रातिनिध्व में भारतवर्ष ने पुनः एकबार यज्ञकाण्ड का भेरीनाद फूंक दिया । भारतीय बौद्धों को चीन - जापान का आश्रय लेना पड़ा । जनता कर्म्मकाण्ड के ऐसे भयावह स्वरूप से ऊब चुकी थी । उसके सामने कोई निश्चित उद्देश्य नहीं रह गया था । ग्लण्डोपासना से अनेक मतवाद राष्ट्रीय संघटन के अन्यतम शत्रु प्रमाणित हो रहे थे । इन सत्र धर्म्मग्लापक विषम भावों के उपशम के लिए उसी युग में सत्यकाम जगदीश्वर की ज्ञानकलाने भी अवतीर्ण होना आवश्यक समझा । एवं वही ज्ञानावतार धार्मिक जगत् में ' शङ्कर ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । आपने वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डाली, और यह सिद्धान्त स्थिर किया कि, जनता के सामने इस समय कोई ऐसा आदर्श रखना चाहिए, जिससे यह वेदसिद्ध यज्ञकर्म्मनिष्ठा से भी पराङ्मुख न हो जाय, साथ ही लोग नानामतवादों के कुचक्र से भी अपनी रक्षा कर सकेँ । अपने इसी सामयिक, उपयुक्त, उद्देश्य को सफल बनाने लिए भगवान् शङ्कर ने प्रस्थानत्रयी को आगे करते हुए ' श्रद्वैतसम्प्रदाय ' को जन्म दिया! सर्वकर्मन्यासमूलक संन्यास पथ को आगे करते हुए अद्वैतवाद स्थापित किया । आपने धार्मिक जगत् के सामने यह सिद्धान्त रखना सामयिक समझा कि, क्षरप्रधान, अष्टादश ( १८ ) अवान्तर भरकम्मों से युक्त यज्ञकर्म शास्त्रीय अवश्य है, साथ ही शास्त्रने स्वर्गादि जो फल इन कम्मों के बतलाए हैं, वे भी सर्वथा प्रामाणिक हैं । तथापि —

प्लवा ह्य ेते अदृढ़ा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म ।

एतच्छु यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवा पियन्ति ॥

— मुण्डकोपनिषत् १ । १ । ७ ॥

उक्त श्रौत सिद्धान्त के अनुसार ये यज्ञकर्मलक्षण नौकाएँ मृत्युलक्षण दरात्मक संसार - सागर से तरण ऋशने में अन्त में व्यर्थ ही सिद्ध होती हैं । अतः ' नास्त्यकृत्तः कृतेन ' - - " न कर्म्मणा, न प्रजया धनेन, त्यागेनैकेऽमृतत्त्वमानशुः " इत्यादि आदेशों के अनुसार कामनाप्रधान यज्ञकम्मं का परित्याग कर ज्ञानप्रधान ( विशुद्ध ज्ञानात्मक ), सर्वकर्म्मात्यन्तविमोकलक्षण संन्यासमार्ग का ही आश्रय लेना चाहिए । तभी पराशान्तिलक्षण शाश्वत आनन्द प्राप्त हो सकता है । अपने इस सामयिक दृष्टिकोण के समर्थन के लिए प्रस्थानत्रयी के उपल-ब्ध भाष्य असमर्थ थे । फलतः इस दृष्टिकोण से नवीन भाष्य लिखे गये । इन भाष्योंके द्वारा ज्ञानमार्ग का प्राधान्य स्थापित किया गया, और यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि, सम्पूर्ण उपनिषत एकमात्र विश्वातीत अखण्ड श्रात्मा की ही प्रतिपादिका हैं । # " ज्ञानप्रधान आत्मा ' कृत ' लक्षण कर्म से विरहित होता हुआ, विशुद्ध ज्ञानरूप बनता हुआ ' कृत ' नाममे, तथा कर्म्म ' कृत ' नाम से प्रसिद्ध है । कृत ( कर्म्म ) से कृत ( आत्मा ) का बोध नहीं हो सकता " शङ्कर-मतानुसार प्रकृत वाक्य का यही समन्वय है । ११३

पृष्ठ 130

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भाष्यभूमिका जो श्रखण्ड तत्त्व विज्ञानशास्त्र में ' निर्विशेष ' नामसे, विज्ञानशास्त्र - ( वेदशास्त्र ) सम्मत गीताशास्त्र में ' ऐकान्तिकसुख ' नामसे प्रसिद्ध है, जो निर्विशेष श्रात्मतत्व निर्गुण, निराकार, निरञ्जन, निर्धर्मक, निष्कल, अनवच्छिन्न बनता हुआ विश्वातीत है, वाङ्मनसपथातीत बनता हुआ शब्दशास्त्र निरूपणमर्यादा से एकान्ततः बहिर्भूत है, सर्वथा शास्त्रानधिकृत, अतएव सर्वथा विज्ञेय वही व्यापक ब्रह्म शाङ्करभाष्यों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय बना । जिस तत्त्व को वेद नहीं जान सकते, वेदाविर्भाक्कर्त्ता ब्रह्मा जिसके बोध से वञ्चित हैं, वेदरक्षक विष्णु जिसे दूरते ही प्रणम्य समझते हैं, समयरहस्यवेत्ता शङ्कराचार्य ने उसी को उपनिषदों का प्रतिपाद्य बना डाला । इसप्रकार -१ – यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातपविजानताम् ॥ ( केनोपनिषत् २।३ । ) २ - संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः । यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । ( तै ० उ ० २६ ) ३ – अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-रतद्व्यावृत्या यं चक्तिमभिधत्त े श्रुतिरपि । स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः-- महिम्नस्तोत्र इत्यादि श्रौतस्मार्त्त प्रमाणों के अनुसार जो तत्त्व शास्त्रानधिकृत बनता हुआ सर्वथा विज्ञेय था, यह भगवान् शङ्कराचार्य की प्रचण्ड प्रतिभा से कुछ समय के लिए विज्ञेय- मान लिया गया । उस समय की उपयोगिता की दृष्टि से, एब विभिन्नमतवादमूला दार्शनिक दृष्टिसे, सम्भव है शाङ्करभाष्य की प्रामाणिकता का मजा समादर करे | परन्तु वैदिक विज्ञानकाण्ड में अखण्डात्मनिरूपण का कितना?, और कैसा महत्व है? इस प्रश्न के निर्णायका भार नीरक्षीर विवेकी विचारशील विज्ञ पाटकों पर हीं छोड़ते हुए प्रकृत विषय का अनुसरया किया जाता है । ५ - उपनिषदों के गौण - प्रधान - लक्ष्य -प्रकरणारम्भ में प्रतिपाद्य विषय का दिग्दर्शन कराते हुए यह रपष्ट किया जा चुका है कि, उपनिषदों का प्रधान लक्ष्य ' जीवात्मा ' ही है । कारण स्पष्ट है । दार्शनिक मतवाद के शब्दों में भी उपनिषत् - शास्त्र श्रात्मज्ञान के लिए प्रवृत्त हुआ है । ज्ञानप्राप्यपेक्षा अल्पज्ञ नीवात्मा को है, न कि सर्वज्ञ ईश्वर को । वह तो स्वयं ही स्वस्वरूप से नित्य विज्ञानानन्दघन है । अतएव स्वीकार करना पड़ेगा कि, उपनिषदों का आत्मपदार्थ मुख्यतः ' जीवात्मा ' को ही अपना लक्ष्य बना रहा है । जीवात्मा उसका श्रंश श्रवश्य है । परन्तु पाप्मामूलक विद्यादि दोषों से आक्रान्त हो कर, ईशसम्पत्ति से वञ्चित होता हुआ - ' अनीशया शोचति मुह्यमानः ' ( मुण्डक ३।१।२ ) के अनुसार यह दुःखार्णव में निमग्न रहता है । इस दुःखनिवृति के लिए ' तमेत्र विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( यजुः संहिता ) के अनुसार तच्चरणप्रपत्ति ही एकमात्र पथ है । ११४