Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 131–140
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140
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तृतीयखण्ड यदा चमयाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ उक्त औौपनिषद सिद्धान्त के अनुसार बिना तत्स्वरूपज्ञान के हृदयन्थिविमोकलक्षणा परा शान्ति सर्वथा असम्भव है । ऐसी दशा में प्राप्तिकर्ता के लिए ( जीवात्मा के लिए ) प्राप्तव्य का स्वरूप जानना भी आवश्यक हो जाता है । और यही उपनिषदों का दूसरा, किन्तु गौण प्रतिपाद्य विषय है । जीवात्मा स्वस्वरूप बोधपूर्वक परस्त्ररूपपरिज्ञान प्राप्त करता हुआ जिन उपायों से अपने आपको शुद्ध बना कर प्राप्तव्य को प्राप्त करने में समर्थ होता है, तदुपायप्रतिपादन ही उपनिषत् का तीसरा प्रतिपाद्य विषय है । इसप्रकार पूर्वोक्त ५ प्रतिपाद्य-विषयों का प्रस्तुत दृष्टिकोण से १ - जीवात्मप्रतिपादन, २- परमात्मप्रतिपादन, ३- परमात्मप्राप्त्युपाय-प्रदर्शन, इन तीन विषयों पर भी पर्य्यवसान माना जा सकता है । दार्शनिकम्मन्यों के सदनुग्रह से, दूसरे शब्दों में विभिन्नमतवादप्रवर्त्तक सम्प्रदायों के पारस्परिक आकर्षण प्रत्याकर्षण ( खैंचातानी ) से जीव, ईश्वर, प्राप्युपाय, उक्त तीनों हीं प्रतिपाद्य विषयों का स्वरूप अपरिष्कृत कोटि में नहीं, तो परिष्कृत कोटि में भी नहीं रह गया है । तीनों के स्वरूप - सम्बन्ध में विविध भ्रान्तियों का आभास हो रहा है । साधारण मनुष्य आत्मशान्तिलाभकामना से इन मतवादात्मक - व्याख्याताओं की शरण में जाता हुआ अधिक अशान्ति का सत्पात्र बन जाता है, किंवा बना दिया जाता है । इस समस्या को समन्वित करने के लिए यह नितान्त श्रावश्यक है कि, साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को प्रणम्य मानते हुए विशुद्ध दृष्टि से ही प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त स्वरूप पाठकों के सम्मुख रख दिया जाय । जीवात्मा परमात्मा का अंश है । ' पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ' - ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् ' के अनुसार वह ( परमात्मा प्रधान है, यह ( जीवात्मा ) गौण है । इसका प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण वह है । अत: पहिले न्यायप्राप्त उस प्राप्तव्य का ही संक्षिप्त, किन्तु विज्ञानसम्मत ( वेदसम्मत ) स्वरूप उपनिषत् - प्रेमियों के सम्मुख रक्खा जाता है । प्रस्तुत विषय सम्पूर्ण उपनिषदों का मूल धरातल है । अतः पाटकों से निवेदन किया जायगा कि, वे इसे अपना मुख्य दृष्टिकोण बनाने का अनुग्रह करेंगे । ६ - निगम - अनुगम - रहस्यमीमांसा -श्रौतवचन ' निगम - अनुगम ' भेद से दो भागों में विभक्त मानें गए हैं । कई शताब्दियों से, अति-शयोक्ति न मामी जाय, तो कई सहस्राब्दियों से बेद का परिभाषा - ज्ञान लुप्तप्राय हो चुका है । वेद पर वर्तमान में जितनें भाग्य, जितनी व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, ' यज्ञकर्म्मपद्धतिविश्लेषण ' के अतिरिक्त उनमें पाठकों को कोई विशेषता उपलब्ध न होगी । | वेदवचन अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, अधियज्ञ ( वैधकर्म्मकाण्ड ), भेद सै चार संस्थाओं के संग्राहक हैं । प्रचलित, तथा उपलब्ध वेदभाष्यों का चारों में से एकमात्र ' अधियज्ञ ' * जिसप्रकार व्यापक आकाश को चम्मं के सदृश शरीर के चारों ओर लपेटना नितान्त असम्भव है, एवमेव चिना ईशदेव को जाने दुःख का अन्त असम्भव है । जिस दिन मनुष्य श्राकाश को चर्म्म बना कर लपेट लेंगे, उस दिन उसे बिना जाने भी दुःख की निवृत्ति हो जायगी, जैसाकि सर्वथा असम्भव है । ११५
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भाष्यभूमिका संस्था ही लक्ष्य बन रहा है । और परिभाषाज्ञानविलुप्ति ही इस सीमितोद्देश्य का मुख्य कारण है । परिभाषा -ज्ञान के बिना केवल व्याकरण के बल पर वैदिक शब्दों का शब्दार्थमात्र कर देने से उनका तात्त्विक बोध सर्वथा असम्भव है । उन्हीं लुप्त परिभाषाओं में से ' निगम - अनुगम ' भी महत्त्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द मानें गए हैं, जिनके वोधाभावमें वेदवचनों का समन्वय कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । इस सम्बन्ध में हमारा अपना तो यह विश्वास है कि, यदि इन दोनों परिभाषाओं का तत्त्व अवगत कर लिया जाता है, तो कितने ही अश में वैदिक तत्त्वों को ग्रन्थियाँ सुलझ जातीं हैं, और उस स्थिति में ' बहुभक्किवादीनि ब्राह्मणानि ' के अनुगमन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । किसी विशेष तत्त्व का निरूपण करने वाला वेदवचन ' निगम ' कहलाता है, एवं अन्वितार्थ की दृष्टि से तघटित अनेक तत्त्वों का संग्राहक वचन ' अनुगम ' कहलाता है । उदाहरण के लिए - ' अग्निमीले पुरोहितं होतारं रत्नधातमम् ' ( ऋक् ० सं ० १ | १ | १ | ) यह मन्त्र पार्थिब, पुरोधा, होतृलक्षण, वसुवित्, अग्नि का निरूपक बनता हुआ ' निगम ' माना जायगा । इसी प्रकार -“ रूपं रूपं मघत्रा वोभवीति " ( ऋक्संहिता ३५३।८ । ) । “ इन्द्रो रूपाणि करिक्रुदचरत् " ( सामसंहिता उ ० ६ । ७ । ३ । ) । “ त्वष्टा नै रेतः सिक्त ं विकिरोति " ( कौ ० ब्रा ० उप ०३।६ । ) । " अग्नि देवानामवम विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः " ( रोत्राः १ | १ | ७ || ) | " बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ” ( शतः ब्रा ०८ | | ५ ६ | ६ | ) । “ हिरण्यगर्भः समचर्त्तताम्रे ” ( ऋक्संहिता १०।१२१।१ । ) । इत्यादि वचन क्रमशः इन्द्र, त्वष्टा, अग्नि, विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, हिरण्यगर्भ, इन विशेष तत्त्वों का निरूपण करते हुए निगमकोटि में प्रविष्ट हैं । एवं— " चत्वारि वाक्परिमिता पदानि ” ( ऋक्संहिता १।१६४।४५ । ) ।
" चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा " ( ऋक्संहिता ४ । ५८ । ३ । ) ।
" त्रीणि ज्योतींषि सचते स पोडशी " ( यजुः संहिता ८।३६ ॥
" चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " ( शाङ्खायनब्राह्मण ११६। ) । " षोडशकलं वा इदं सर्वम् " ( कौ ० ब्रा ० ' ' ' ८।१ । ) । " त्रिवृद्धि यज्ञः ' ” ( शत ० ' " ) “ पाङ्क्तो नै यज्ञः ” ( शत ० १।१।२।१६ । ) । “ विराड् नै यज्ञः ” ( शत ०१।१।१।२२ । ) । " यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि " ( छान्दोग्योपनिषत् २।२१।४ । ) । ११६
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तृतीयखण्ड इत्यादि वचन अन्वितार्थघटित यच्चयावत् स्थलों के संग्राहक बनते हुए अनुगमकोटि में प्रविष्ट हैं । पूर्व के शब्दार्थनित्यता- प्रकरण में ' चत्वारि वाक्परिमिता पदानि ' मन्त्र का इसी अनुगमभाव के आधार पर अनेक स्थलों में समन्वय हुआ है । ' चत्वारि शृङ्गा ० ' इत्यादि मन्त्रका श्राध्यात्मिक वृषभ दृष्टि से - ' मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, इन चार सींगों वाला, कारण- सूक्ष्म - स्थूलशरीर भेद से ( प्रतिष्टात्मक ) तीन पैरों वाला, चित्याग्नि ( मर्त्याग्नि ), चितेनिधेयाग्नि ( अमृताग्नि ) भेद से दो मस्तकबाला, सप्तक्रियात्मक प्राणों से सात हाथों वाला, मूल - हृदय- ब्रह्मरन्ध्र भेद से तीन स्थानों में बद्ध रुद्राग्निमूर्त्ति वृषभ शब्द ( माहतनाद ) करता हुआ अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्टित है, इसप्रकार भी समन्वय किया जा सकता है । आधिदैविक सम्वत्सरचक्र की दृष्टि से – पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, श्रापः, इन चार सींगों वाला, भूत-भविष्यत् - वर्त्तमान - भेद से तीन पैरों वाला, ब्रह्मौदनलक्षण सम्वत्सराग्नि, प्रवर्ग्यलक्षण सान्तपनाग्नि भेद से दो मस्तक वाला, अहोरात्रवृत्तात्मक सप्तछन्दोरूप सात हाथों वाला, प्रातः सवन - माध्यन्दिन पवन - सायंसवन - भेट से प्रातः- मध्यान्ह सायं भेद से त्रिःस्थान से बद्ध सम्वत्सराग्निलज्ञरण वृषभ शब्द करता हुआ सवंत्सरत्रिलोकी में प्रतिष्ठित है । श्रधियज्ञपक्ष की दृष्टि से— “ ऋग् - यजु - साम - अथर्व ' - मन्त्र भेड़ से चार सींगों वाला, त्रिसवन भेद से तीन पादवाला, ब्रह्मौदन - प्रवर्ग्यान्न भेद से दो मस्तक वाला, सप्तछन्दोलक्षण सात हाथों वाला, मन्त्र - कल्प-ब्राह्मण - भेद से त्रिधा बद्ध यज्ञ - वृषभ शब्द कर रहा है । ( देखिए गो ० ब्रा ० पू ० २।१६ ) । ईश्वरप्रजापति के अव्यय - अक्षर - दर - नामक तीन ज्योतिर्विव है । त्रैलोक्यप्रजापति के ' सूर्य्य-चन्द्र - अग्नि नामक तीन ज्योतिर्विवत हैं । विषयावच्छिन्नज्ञान, शब्दावच्छिन्नज्ञान, संस्कारावच्छिन्नज्ञान भेद से आध्यात्मिक प्रजापति के तीन ज्योतिर्निवर्त्त हैं । इन सत्र विवर्तों का ' त्रीणि ज्योतींषि ' इस अनुगम से संग्रह हो रहा है । परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर, चारों श्रात्मपर्व सबमें सामानरूपेण अनुपविष्ट हैं । कं - खं - रं - शं, नामक अन्न - श्रावपन - अन्नाद - शान्ति - लक्षण चारों भावों का सर्वत्र समन्वय है । प्रत्येक पिण्ड स्तौग्यलोकात्मक बनता हुआ चतुर्लोकात्मक है । गार्हपत्य, ग्राहवनीय, दक्षिणाग्नि, पशुश्रपणाग्नि, भेद से याज्ञिक अग्नि भी चतुर्द्धा ही विभक्त है । ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, भूताग्नि, पाशुकाग्नि भेद से- ' चतुर्द्धा विहितो हवा अग्नि-रास ' ( शत ० श्राप्त्या ब्राह्मण ) के अनुसार लोकाग्नि भी चतुर्द्धा ही विभक्त है । इन सत्र विवर्तों का ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' से संग्रह हो रहा है । निष्कल परात्पर, पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल आत्मक्षर, भेद से सर्वप्रपञ्च षोडशकल है । पञ्चदशस्तोम के सम्बन्ध से इन्द्र भी षोडशी बन रहा है । एकादश इन्द्रियवर्ग, मन - बुद्धि चित्त - - अहङ्कार चतुष्टयी, आत्मा, इस दृष्टि से अध्यात्मविचर्त्त भो षोडशकल प्रमाणित हो रहा है । सप्तशीर्षण्य प्राण, प्रामा-पानादि ५ वाकयप्राण, ४ गुहाप्राण, भेद से भी १६ कलाओं का समन्वय किया जा सकता है । एवं ' षोडशकल ' वा इदं सर्वम् ' अनुगम अपनी अन्वर्थता से इन सबका संग्राहक बन रहा है । ११७
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भाष्यभूमिका आत्मा, प्रजा, वित्त भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । श्रात्मा - प्राण- पशु भेद से आध्यात्मिक यज्ञ भी त्रिवृत् है | अन्न- ऊर्के - प्राण भेद से अन्दयज्ञ भी त्रिवृत् है । त्रेताग्नि के सम्बन्ध से अधियज्ञलक्षण वैधयज्ञ भी त्रिवृत् है । एवं ' त्रिवृिद्धि यज्ञः ' अनुगम से इन सब विवर्तों का संग्रह हो रहा है । अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमास, – चातुर्मास्य - पशुबन्ध, ज्योतिष्टोम भेद से वैध यज्ञ भी पाङक्त ( पञ्चावयव ) है । अहोरात्र, शुक्लकृष्णपक्ष, ऋतु, त्र्यन, सम्बत्सर, के भेद से प्राकृतिक साम्वत्सरिक यज्ञ भी पाङक्त है । इष्टि, पशु, सोम, अतियज्ञ, शिरोयज्ञ, भेद से भी यज्ञ पाङक्त है । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन पाँच पर्वों से विश्वस्वरूपसम्पादक ' सर्वहुत ' यश भी पान्क्त है । अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मा, भेद से आध्यात्मिक ' विश्वदानि ' यज्ञ भी पाङक्त है । पुरुष, अश्व, गौ, अवि, अज, भेद से पशुयज्ञ भी पञ्चधा ही विभक्त है । एवं इन सब पाङक्त - यज्ञविवतों का ' पाइको वै यज्ञः ' इस अनुगम से संग्रह हो रहा है । - वायु- सोम - अग्नि - यम- आदित्य ऋक् साम - यत् - जू - भेद से विश्वप्रवर्तक मौलिक वेदयज्ञ भी दशाक्षरसम्पत्ति से ‘ विराट् ’ है । क्योंकि विराट्छन्द के दश अक्षर ही मानें गए हैं । १- गार्हपत्य, १ - आहवनीय, ८ धिष्ण्याग्नि भेद से त्रैलोक्यव्यापक स्तोमयज्ञ भी विराट् है । दशर्षिप्राण समष्टिरूप सौर हिरण्यगर्भयज्ञ भी विराट् है । एवं इन सब विराट् - भावों का - ' विराट् वै यज्ञ: ' इस अनुगम से संग्रह हो रहा है । उद्धत - अनुगम प्रतीकों में सर्वान्त में ' यानि पचधा त्रीणि त्रीणि ० ' यह प्रतीक है, एवं प्रकृत में इसी की ओर पाठकों का विशेषरूप से ध्यान आकर्षित करना है । पूरे अनुगम वचन का स्वरूप निम्न लिखित है-यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यरतद्व ' द स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति ॥ ( छा ० उप०२।२१।४। । " पांच स्थानों में विभक्त जो तीन तीन तत्त्व हैं, उनसे अतिरिक्त महान् और कोई वस्तु नहीं है । जो व्यक्ति पञ्चधा विभक्त इस त्रित्त्व विवर्त्त ' का स्वरूपज्ञान प्राप्त कर लेता है, उस विद्वान् के लिए सम्पूर्णं दिशाएँ ( चारों ओर से ) बलि ( भोग्यसम्पत्ति ) समर्पण करतीं रहतीं हैं " उक्त अनुगम - मन्त्र का यही अक्षरार्थ है । पूर्वप्रतिपादित अनुगम वचनों की भाँति अपने अनुगमभाव से इस अनुगममन्त्र का भी , अनेक विवर्तो के साथ सम्बन्ध हो रहा है । परन्तु प्रकृत में केवल उसी अर्थ का विश्लेषण किया जायगा, जिसका ‘ ईशप्रजापति ’ से सम्बन्ध है । पञ्चधा विभक्त त्रयी तत्त्व को उत्पन्न कर ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' सिद्धान्त के अनुसार वह ईशप्रजानपि उस पञ्चधा विभक्त त्रयी तत्त्व के गर्भ में प्रविष्ट है । पञ्चधा विभक्त त्रयीतत्त्व का प्रतिपादन करने वाले उक्त मन्त्र के वैज्ञानिक विश्लेषण से पहिले यह आवश्यक होगा कि, इसके उत्पादक ईश्वरप्रजापति के स्वरूप पर थोड़ा प्रकारा डाल लिया जाय । ७ श्रात्मन्वी - ईशप्रजापति-राजा, प्रजा, पिता, पुत्र, पति, पत्नी, इत्यादि शब्दों की भाँति ' ईश्वर ' शब्द एक सापेक्ष शब्द है । प्रजापेक्षया ‘ राजा ' शब्द की, राजापेक्षया ' प्रजा ' शब्द की, पुत्रापेक्षया ' पिता ' शब्द की, पिता की अपेक्षा से ११८
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तृतीयखण्ड ' पुत्र ' शब्द की, पत्नी की अपेक्षा ' पति ' शब्द की, पति की अपेक्षा ' पत्नी ' शब्द की स्वरूपरक्षा है । एव-मेव ईश्वर शब्द भी आत्मन्वी का स्थान ग्रहण करता हुआ विश्वसापेक्ष है । विशुद्ध ' आत्मा ' ईश्वर नहीं है, अपितु आत्मा, तथा विश्व दोनों की समष्टि लक्षण ' आत्मन्बी ' भाव ही ईश्वर है । ईशिता ( शास्ता ) ही ईश्वर है * । वह अपनी विश्वप्रजा पर शासन कर रहा है । विश्वप्रारूपा सम्पत्ति के सम्बन्ध से ऐश्वर्य्यशाली बनता हुआ ही वह महामायी, विश्वव्यापक श्रात्मतत्व ( तद्विशिष्टरूप से ) ' ईश्वर ', किंवा उपनिषदों की भाषा में ' ईश ' नाम से प्रसिद्ध हो रह । है । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ऋषि, पितर, असुर, देवता, गन्धर्व, पशु, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, पिशाच, ग्रह, नक्षत्र, कृमि, कीट, वन, उपवन, नद, नदी, सागर, त्रैलोक्यत्रिलोकी, ओषधि, वनस्पति, पर्वत, धातु, उपधातु, रस, उपरस, विष, उपचित्र, आदि आदि स्थावर-नगमात्मक जितने भी पदार्थ हैं, सब उस आत्मेश्वर की प्रजा है । एवं वह इस प्रजा का अपने शासनचल से शास्ता बना हुआ ही लोक एवं वेद में ' प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । प्रजाविवर्त - समष्टि ही ' विश्व ' है | त्रिपुरुष - पुरुषात्मक आत्मेश्वर अपने क्षरभाग से ( विकारक्ष र नामक, पञ्चतन्मात्रात्मक गुणभूत से ) इसे उत्पन्न कर पूर्वकथनानुसार इसके गर्भ में प्रविष्ट हो कर आत्मन्त्रीमा हुआ है । अतएव ‘ विशत्यस्मिन्नात्मा ' इस निर्वचन से उक्त प्रजासंघ को ' विश्व ' कहना श्रन्वर्थ बन रहा है । हमारा ईश्वर शब्द, किंवा ईश शब्द विश्व तथा विश्वप्रविष्ट आत्मा, दोनों की समष्टि का संग्राहक बन रहा है । इसी ग्रात्मन्त्री ईश्वरप्रजापति का स्वरूप विश्लेषण करता हुआ निम्नलिखित यजुर्म्मन्त्र पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है—
यस्मान्न जातः परो अम्यो अस्ति य श्राविवेश भुवनानि विश्वा ।
प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी ॥
- यजुः ० सं ० ८ | ३६ | । “ उत्पन्न होने वाले यच्चयावत् जड़ - चेतनपदार्थ जिससे भिन्न नहीं है, जो सम्पूर्ण भुवनों में अन्तःप्रविष्ट है, ( अब्नी ) प्रजा के साथ संयुक्त होता हुआ वह षोडशी प्रजापति तीन ज्योतियों से सर्वत्र व्याप्त हो रहा और है ” यह है मन्त्र का यक्षरार्थ । श्रुति ने ' यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति ' इस वाक्य प्रजा, प्रजा-पत्ति का अभेद बतलाया है । साथ ही उसे भुवनों में प्रविष्ट भी बतलाया है । इसके साथ साथ उसे ' बोडशो ’ ( घोडशकल ) बतलाते हुए, तीन ज्योतियों से समन्वित मानते हुए सर्वव्यापक भी माना है । प्रकृत ईश-स्वरूपप्रकरण ' में हमें “ प्रजापति, प्रजा, षोडशी, त्रीणि ज्योतींषि, भुवनानि " इन शब्दों का विश्लेषण करतेहुए ' सचते ' इस क्रिया पद के रहस्यार्थ का निरूपण करना है । इस रहस्यज्ञान के अतिरिक्त ईश स्वरूप के सम्बन्ध में और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता । * य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वा ल्लोकानीशत ईशनीभिः । य एनैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विहुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ( श्वे ० उ ० ३। ९ ५ ) । ११६
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भूमिका = कार्यरूप विश्व के दो तत्त्व-सर्वव्यापक प्रजापतितत्त्व के ' आत्मा, विश्व ' नामक दो पर्व बतलाए गए हैं । प्रजापति के ये दोनों हों पर्व ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगमन वचन के अनुसार १६ - १६ - कलाओं से युक्त हैं । ' स्थूलारुन्धती-न्याय ' का समाश्रय त्वेते हुए पहिले विश्व की १६ कलाओं का दिग्दर्शन कराया जायगा, अनन्तर विश्वात्मा की १६ कलाओं का स्पष्टीकरण होगा । उच्चावच - भावापन्न - क्षणे क्षणे नव - नवरूपेण प्रतीयमान - सम्भूति - विनाशलक्षण विवधभावों से नित्य समाकुलित स्थावर – जङ्गमात्मक विश्व के भूत - भौतिक पदार्थों पर जब हम दृष्टिपात करते हैं, तो उन पदार्थों में हमें परस्परा-त्यन्त विरुद्ध दो भावों की उपलब्धि होती है । प्रत्येक पदार्थ जहाँ एक दृष्टि से हमें सर्वथा स्थितिभाव से युक्त प्रतीत हो रहा है, वहाँ वही पदार्थ एक विभिन्न दृष्टिकोण से गतिभावात्मक भी प्रतीत हो रहा है । ' स्थिति - गति ' -दोनों परस्पर तमः - प्रकाशवत् अत्यन्त विरुद्ध हैं । दोनों का एक स्थान पर, एक ही चिन्दु पर सहावस्थान यद्यपि असम्भव है । परन्तु आश्चर्य है कि, सर्वत्र इसी आश्चर्यमयी स्थिति के प्रत्यक्ष दर्शन हो रहे हैं । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए कि तमः प्रकाशवत् परस्परात्यन्तविरुद्ध विषय, विषयी, दोनों का जैसा एकत्र समन्वय देखा सुना जाता है, और दार्शनिक लोग जिस समन्वय को मायिक कहते हुए ' मिथ्या ' कहने का साहस किया करते हैं, वही समन्वय परस्परात्यन्तविरुद्ध स्थिति - गति भावों का हो रहा है । प्रत्येक पदार्थ क्षण - क्षण में नवीन नवीन रूप धारण कर रहा है । यह विश्वसनीय है कि, बस्तु का जो स्वरूप पूर्वक्षण में रहता है, उत्तरक्षण में उसका प्रात्यन्तिक अभाव है । इसी क्षणपरिवर्त्तन से वस्तुस्वरूप में परिवर्तन होता रहता है । इसी परिवर्तनरूपा दक्षणिक क्रिया को अपना मुख्य लक्ष्य बना कर कितने एक स्याद्वादानुयायी विश्वप्रपञ्च को ' नास्तिसार ' कहा करते हैं । इस परिवर्तन के साथ साथ उस प्रत्यक्ष दृष्ट अपरि-वर्त्तन का भी अपलाप नहीं किया जा सकता, जिसके अनुग्रह से क्षण - क्षण में स्वरुपान्तर धारण करता हुआ भी पदार्थ ' स एवायं स एवायं ' इत्याकारा प्रत्यभिज्ञा का जनक बना रहता है । इसी अपरिवर्तनीय तत्त्व को अपना दृष्टिकोण बनाने वाले ब्रह्मवादी विश्वप्रपञ्च को ' अस्तिसार ' कहा करते हैं । प्रत्येक पदार्थ बदलता हुआ भी नहीं बदल रहा, चलता हुआ भी नहीं चल रहा, नास्तिसार बनता हुआ भी अस्तिसार है, गतिमत् भो स्थितियुक्त है । इसप्रकार स्थितिलक्षण परिवर्तन, तथा गतिलक्षण परिवर्तन, दोनों का सर्वत्र प्रत्येक पदार्थ में समन्वय उपलब्ध हो रहा है, जिसके दो एक उदाहरण बतला देना श्रप्रासङ्गिक न माना जायगा । गर्भ ', शिशु, बाल, पौगण्ड, तरुण, युवा, प्रौढ, वृद्ध, स्थावर, दशमी *, इन १० अवस्थाओं से युक्त ( जो कि दशावस्थाएँ स्वरूपतः परस्पर अत्यन्त विरुद्ध है ) एक पुरुष को उदाहरण बना कर वस्तुस्थिति से सम्बद्ध स्थिति - गति - भावों का समन्वय कीजिए । मानव की ये दसों अवस्थाएँ परस्पर विरुद्ध हैं, इन सत्र विरुद्धावस्थाओं का एक ही मनुष्य में कालभेद से समन्वय हो रहा है । दस परिवर्तनों ने एक अपरिवर्तन को आधार बना रक्खा है । वही किसी समय गर्भावस्थापन था, वही शिशु था, वही बालादि था । गर्भ अन्य था, * " शूद्रोऽपि ' दशमी ' ज्यायान्, किंपुनर्ब्राह्मणो यदि " इत्यादि वचनानुसार यह अन्तिम अवस्था ' दशमी ' नाम से व्यवहृत हुई है । १२०
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तृतीयखण्ड शिशु अन्य था, बालादि भिन्न थे, किन्तु वही - वही सर्वत्र सत्र भिन्न स्वरूपों में अभिन्न था । क्या इन १० अवस्थाओं में परिवर्तन का अक्सान है?, नहीं । ये तो स्थूल परिवर्तन हैं । सूक्ष्मप्राण - विचारदृष्टि हमें बतला रही है कि, गर्भस्थिति से आरम्भ कर दशमी अवस्थापर्य्यन्त पुरुष की अनन्त अवस्थाएँ हैं । प्रतिक्षण में अवस्था परिवर्तन हो रहा है । अतिसौक्ष्म्यात् उसका हम धर्म्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष न कर सकें, यह दूसरी बात है । इस क्षणिक - अवस्था परिवर्त्तन से ही गर्भावस्थापन्न प्रादेशमित ( १० || गुलमित ) प्राणी क्रमशः वृद्धि - भाव को प्राप्त होता हुआ ३ || हाथ का दीर्घकाय युवक बन जाता है । इन्हीं क्षणिक अवस्थाओं के अनुग्रह से आगे जाकर यही युवा क्रमश: प्रौढ, वृद्ध, स्थविरादि अवस्थाओं का अनुगामी बनता हुआ एक दिन धराशायी हो जाता है । प्रादेशमित गर्भ किसी नियत क्षण विशेष में ३ || हाथ लम्बा बन गया, यह कौन स्वीकार करेगा । अवश्य ही मानना पढ़ेगा कि, प्रतिक्षणविज्ञक्षण प्रक्रान्त परिवर्तन से सम्बन्ध रखने वाले रसासृङ्मासादि के बृद्धिक्रम ने ही इसे दीर्घकायावस्था में परिणत किया है । और यही एक ऐसा अन्यर्थ हेतु है, जिसके आधार पर इस अवस्था - परिवर्तन को हम क्षणिक मानने के लिए सन्नद्ध हैं । इस क्षणभाव के साथ साथ हम ' यह वही देवदत्त है, जिसे हमनें बचपन में अमुक स्थान पर देखा था, आज यह इतना बड़ा हो गया है ' इत्यादि लोक-व्यवहार के मूलमूत अक्षणभाव के भी दर्शन कर रहे हैं । एकपुरुषानुगत स्थितिलक्षण अपरिवर्त्तन, एवं एकपुरुष।नुगत गतिलक्षण अनन्तावस्थारूप परिवर्त्तन, दोनों का एक ही पुरुषसंस्था में समन्वय उपलब्ध हो रहा । अनुष्णाशीत दुग्ध में दधिस्वरूपकामना से गृहलक्ष्मी दधि का प्रतञ्चन ( जाँवण ) देती है । प्रात: हम दुग्ध को दधि स्वरूप में पाते हैं । जिस सायंकालीन क्षण में दुग्ध में दध्यातञ्चन दिया जाता है, उसी क्षण से दधिस्वरूपनिर्माणोपयुक्ता क्रिया प्रारम्भ हो जाती है । दूध किसी नियत - विशेष - क्षण में दधि नहीं बन जाता । अपितु क्षणिक क्रियाधारा ही दुग्ध की एक विशेष अवस्था को ' दधि ' उपाधि के योग्य बनाती है । दधि बन जाने पर क्या परिवर्तन क्रिया का अवसान हो गया?, नहीं । परिवर्तन प्रकान्त है । दधि को उपयोग में न लेकर यों हीं रहने दीजिए । आप देखेंगे कि, वही मधुर दधि उसी प्रक्रान्त क्रिया के अनुग्रह से कालान्तर में अम्ल दधि बन गया है । कालान्तर में उसमें जाल का ( फफूँद का ) उदय हो जायगा, घनता बढ़ने लगेगी, द्रवभाग सूखने लगेगा, सूखते सूखते ग्रापका दधि दधि - अवस्था से वञ्चित होकर मृत्तिका रूप धारण कर लेगा, मृत्तिका कालान्तर में पत्थर, पत्थर लोहा, लोहा हिरण्य बन कर संचरप्रक्रिया से उपरत होता हुआ लोहा पत्थर, पत्थर मिट्टी, बन जायगा । इसी प्रतिसञ्चरक्रिया - प्रक्रान्ति से मिट्टी कालान्तर में मृदनुगता चलग्रन्थि के विमोक से पानी न जायगी । पानी अग्निरूप में, अग्नि वायुरूप में, वायु श्राकाशरूप में परिणत हो जायगा | आकाश प्राणरूप में प्राता हुआ अन्ततोगत्त्वा ग्रात्मलक्षण मनःस्वरूप में परिणत होता हुआ प्रतिसञ्चरक्रिया से उपरत हो जायगा । पुनः सञ्चरक्रिया का सञ्चार होगा | फिर मन से प्राण, प्राण से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से मिट्टी, मिट्टी से ओषधि - वनस्पति, इन पशुद्वारा भक्षण - चर्व्वण से दुग्ध, ( दध्यातञ्चनरूप मानवक्रिया से माध्यम के समावेश से ) दुग्ध से दही, दही से मिट्टी, ' एवं प्रवर्त्तितं चक्रम् ' । इसप्रकार सञ्चर - प्रतिसञ्चररूप से क्रिया का क्षणिक परिवर्तन धारावाहिकरूप से निरन्तर प्रकान्त है । साथ साथ क्षणभाव का आाधारत्व भी सुरक्षित है । रथकार सुदृढ कार्ष्मर्य्यादि काष्ठ से एक मञ्जूषा बना कर लाता है । उसे किसी सुरक्षित स्थान में रख दिया जाता है | अपनी नूतनावस्था में कामञ्जूषा के अवयव ऐसे सुदृढ रहते हैं कि, हरताघात की कौन ९ २१
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भाष्यभूमिका कहे, लौहाघात भी इसे सहसा विदीर्ण करने में असमर्थ हो जाता है । १००-२०० वर्षों के अनन्तर ' वही ' सुदृढा-वस्थापन्ना मञ्जूषा सर्वथा श्लयथावस्थापन्ना बन जाती है । अङ्गुली - स्पर्श से ही मञ्जूषा के अवयव पृथक होने लगते है । यह उसी क्षणिक - परिवर्तन का अव्यर्थ अनुग्रह है । मञ्जूषा को इस लयावस्था में परिणत होने के लिए, विदित नहीं कितनी ( असंख्य ) अवस्थाओं का श्रातिथ्य स्वीकार करना पड़ा होगा । क्षणिक परिवर्तन ही जीर्णता का मूलाधार है । यदि क्षणिक परिवर्तन न होता, तो कोई वस्तु जीर्ण न होती | निर्माण के गर्भ में ध्वंस प्रतिष्ठित है, ध्वंस के गर्भ में निर्माण प्रतिष्ठित है । उत्त्पत्ति के साथ साथ ध्वंस प्रक्रान्त है, ध्वंस के साथ साथ उत्पत्ति प्रक्रान्त है । जीवन का क्षण क्षण मृत्यु से श्राक्रान्त है, मृत्यु का क्षण क्षण जीवनधारा है । सम्भूति- विनाश, दोनों एकत्र समन्वित है । नवनिर्माण ध्वंस का निमन्त्रण कर रहा है, ध्वंस नवनिर्माण का श्रामन्त्रण कर रहा है । यही विश्व का चिरन्तनप्रवाह है, जिसका त्रिकालज्ञ महर्षि - ' सम्भूतिंच विनाशंच यस्तद्वे दोभयं सह ' इन शब्दों में यशोगान किया करते हैं । प्रत्येक पदार्थ क्षणिक क्रियाओं का प्रवाह मात्र है । पूर्व पूर्व क्रिया का उत्तर- उत्तर क्षण में विलयन है । जो क्रिया प्रथम क्षण में है, दूसरे क्षण में उसका, तीसरे क्षण में दूसरी का, चौथे में तीसरी का तिरोभाव है । अतएब मानना पड़ेगा कि, संसरणधर्मा, अतएव संसार - नाम से प्रसिद्ध जगत् के यच्चयावत् पदार्थ क्षणिकबल-विकासात्मक क्रियाभाव के अनुग्रह से ' नास्तिसार ' ही है । ' नास्ति ' का अर्थ है – ' कुछ नहीं ' । यह ' कुछ नहीं ' हीं वस्तुस्वरूप की पहली भूमिका है । इस भूमिका के दार्शनिक विद्वान् ' नास्ति - अस्ति नास्ति, ये तीन संस्थाविभाग बतलाया करते हैं । प्रथम क्षण में क्रिया सुप्त है, मध्य क्षण में क्रिया उद्बुद्ध है, तृतीय क्षण में पुन: क्रिया सुप्त है । प्रथम क्षण नास्ति है, अन्तिम क्षण नास्ति है, अतएव तन्मध्यपतित मध्य का अस्तिक्षण भी नास्ति हो है । इसप्रकार त्रिक्षण - क्रिया का अन्ततोगत्वा नास्तिसारत्त्व ही सिद्ध हो रहा है । आदि में अव्यक्तभाव, अतएव अन्त में अव्यक्तमाव, मध्य का व्यक्तभाव भी अव्यक्तगर्भभूत होता हुआ अव्यक्तभाव ही माना जायगा । निम्नलिखित वचन क्रियामय विश्व के इसी व्यक्त - भाव का स्पष्टीकरण कर रहा है— अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्तमध्यानि भारत! अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ( गीता २२८। ) । अव्यक्तभानप्रधाना बनती हुई किया जब नास्तिसारा है, तो इस नात्तिदृष्टि से क्रियामय विश्व को, एवं तद्गर्भीभूत पदार्थमात्र को हम ' नास्ति ' शब्द से ही व्यवहृत कर सकते हैं । ' नास्ति ' - ' कुछ नहीं ' है, ' कुछ नहीं ' हीं ‘ शून्यम् ' है । एकमात्र इसी दृष्टिकोण से विशुद्ध ' नास्ति ' तत्त्व ( क्रियातत्त्व ) की ही श्राराधना करने वाला, अपने नास्तिभाव की रक्षा के लिए सत्ता का ' अर्थक्रियाकारित्वं सत् ' यह लक्षण करने वाला नास्तिक दर्शनानुयायी विद्वान् विश्व के सम्बन्ध में अपने निम्नलिखित उद्गार प्रकट किया करते हैं— ' सर्वमिदं - क्षणिकं - क्षणिकं श्रतएव शून्यं शून्यम् ' । सब सर्वप्रपञ्च क्षणिक क्रियारूप है, तो अवश्य ही सत्र शून्य है, ' कुछ नहीं ' ही ( नाम्ति ही ) विश्व का तात्त्विक स्वरूप है | क्रिया क्षणिक है, अतएव अन्य क्षमिक क्रिया के साथ उसका समतुलन असम्भव है । ' अमुक किया अमुक क्रिया जैसी है ' इस प्रकार का क्रिया - लक्षण तभी सम्भव है, जब कि एक ही क्षण में १२२
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तृतीयखण्ड उन दोनों क्रियाओं की स्थिति उपलब्ध हो । परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है । अतः कहा जा सकता है कि, " रामरावणयोर्युद्ध ं रामरावणयोरिव " के अनुसार प्रत्येक क्षणिक क्रिया का लक्षण स्वयं वही क्षणिक किया ही है । इसी दृष्टि से ' स्वलक्षणं स्वलक्षणम् ' की प्रवृत्ति हुई है । ' पराञ्चि खानि व्यतृपत् स्वयम्भूः ' इत्यादि उपनिषच्छ्रति के अनुसार ' ख ' कार इन्द्रियों का वाचक है । ऐच्छिक विषयागमन से यह ' ख ' ( इन्द्रियाँ ) पूर्ण बनता हुआ, सुष्टुभावात्मक ' सु ' भाव का अनुगामी बनता हुआ जहाँ ' सुख ' नाम व्यवहृत हुआ है । वहाँ विषयागमन के अभाव में अपूर्णता, किंवा रिक्ततालक्षण दुष्टभाव का अनुगामी बनता हुआ ' दुःख ' नाम से व्यवहृत हुआ है, और सुख - दुःख द्वन्द्व का यही वैज्ञानिक निर्वचन हैं । जब सम्पूर्ण प्रपञ्च क्षणिक क्रियासारात्मक त्रनता हुआ शून्य है, तो इस शून्य वैषयिक जगत् से पूर्णता सम्पत्तिलक्षण सुखभाव कैसे सम्भव हो सकता है? पूर्णता में सुख है । पूर्णता नहीं, तो सुख कहाँ । इसी आधार पर ' दुःखं दुःखम् ' इस अन्तिम वाक्य की प्रवृत्ति हुई है । इसप्रकार क्षणिक, अतएव शून्य, अतएव स्वलक्षण, अतएव दुःखरूप क्रियामय पदार्थों में हम प्रतिक्षण विलक्षण नास्तिप्रधान परिवर्तन का साक्षात्कार कर रहे हैं । यह परिवर्तन नियति का अमोघ - दण्ड-विधान है | मनुष्य अपने कर्त्तव्य से विमुख हो सकता है, परन्तु पदार्थों का यह क्षणिक सरण, क्षणिक गमन क्षणमात्र के लिए भी अवकाश ग्रहण नहीं करता । जिस क्षण में सृष्टिधारा का उपक्रम हुआ, उस क्षण से आरम्भ कर उसी प्रकार अद्यावधि पन्त सभ्यगरूप से ( बिना किसी व्यवधान के ) विश्व का सरण हो रहा है, आप्रल-यान्त होता रहेगा, जैसाकि - ‘ याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ' - ' धाता यथापूर्वमकल्पयद्दवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' इत्यादि आस्तिक सिद्धान्तों से भी प्रमाणित है । प्रकृति का यह परिवर्तन क अस्मदादि कम्मों की भांति अस्तव्यस्त बनता हुआ । असम्यक नहीं है, अपितु स्वनियतिभाव से वह ' सम्यकू ' है । अतएव उसके सरण से युक्त विश्व ' सम् क् - सरति ' निर्वचन से ' संसार ' कहलाया है । एवं इसी स्वाभाविक गतिभाव से इसे ' गच्छतीति जगत् ' निर्वचन के आधार पर ' जगत् ' कहना भी अन्वर्थ बन रहा है | इस-प्रकार ग्रात्मप्रवेशदृष्टि से ‘ विश्व ' नाम से, सम्यक्सरणदृष्टि से ' संसार ' नाम से, एवं गत्यपेक्षया ' जगत् ' नाम से प्रसिद्ध ईशात्मा का शरीरस्थानीय यह महाभु वन अवश्य ही नास्तिसार है । पदार्थमात्र परिवर्तनशील हैं, यह भी निर्विवाद है । साथ अपने क्षणिक परिवर्तन से सत्र क्षणिक हैं, यह भी निःसंदिग्ध है | परन्तु यहीं तत्त्ववाद को विश्राम नहीं दिया जा सकता । आश्चर्य है कि, सर्वथा नास्तिसार इन पदार्थों के लिए ' अस्ति ' शब्द का भी प्रयोग देखा सुना जाता है । मनुष्य प्रतिक्षण बदल रहा है, मानते हैं । परन्तु साथ ही यह भी मानना पड़ता है कि, वह कल भी था, आज भी हैं, कल भी रहेगा । कल्प्तक ही क्यों, चिरकाल पर्य्यन्त रहेगा चिरकाल पर्य्यन्त ही क्यों, सदा रहेगा । उसके अस्तित्त्व को कौन मिटा सकता है । नामरूपकर्मात्मक नास्तिभाव भले ही बदलता रहे, अस्तित्त्व कभी नहीं बदला करता । बह नास्ति - अस्ति ( अभाव - भाव ) सर्वत्र समरूप से सदा प्रतिष्ठित है । ' देवदत्त है ' इस अस्तिसूचक वाक्य में यदि ' है ' इत्याकारक अस्तित्व विद्यमान है, तो ' देवदत्त नहीं है ' - इत्याकारक नास्तिसूचक वाक्य के अन्त में भी ‘ है ' इत्याकारक अतित्त्व विद्यमान है । देवदत्त तो नामरूपकर्म की समष्टि है, वह बदलती रहे, उसके शुद्ध अस्तित्व को, दार्शनिक भाषा में आत्मा को कौन मिटा सकता है । १२३
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नास्तिलक्षण केवल क्षणिक तत्त्व की ही उपासना करने वाले नास्तिकों का इस सम्बन्ध में यही कहना है कि, नास्ति से पृथक अस्ति नामक कोई नित्य - शाश्वत तत्त्व नहीं है । हम उन नास्तिसार - नास्तिकों से प्रश्न करेंगे कि, यदि ' नास्ति ' के अतिरिक्त कुछ नहीं है, तो ' मनुष्योऽयमस्ति ' - ' घटोऽस्ति ' - ' पटोऽस्ति ' इत्यादि व्यवहार किस आधार पर प्रतिष्ठित हैं? । यदि वे धारावल के द्वारा समाधान करते हैं, तो उनका प्रयास व्यर्थ है । एक चक्र मे १२ पक्ष पंखे ) हैं । चक्र प्रबल वेग से घूम रहा है । इस धारा- वेग से १२ हों पक्षों का द्वादशसंख्यात्त्व उच्छिन्न हो रहा है, एक चक्र प्रतीत हो रहा है । ठीक इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु में क्षणिक-क्रिया - सन्तान परम्परा का ऐसा द्रुतगामी परिवर्तन हो रहा है, जिससे एकत्वानुरूपा स्थिरता सी प्रतीत होने लगती है । धाराचल को आगे कर आप यही न कहना चाहते हैं । स्वागतम् । कोई आपति नहीं है । सीधे शब्दों में न सही, ‘ धारात्रलसन्तान ' नाम से आपको किया से अतिरिक्त एक तत्त्व मानना पड़ रहा है, जिमे हम सत्ता कहा करते हैं । अवश्य ही आपके मतानुसार मी वह सत्ताभाव उस क्षणिक - क्रिया से सर्वथा अपूर्व है । केवल नाम मात्र में विवाद है । दूसरी दृष्टि से सत्तास्वीकृति के अनुगामी बनिए । सम्पूर्ण विश्व को अव्यक्तस्भार मानते हुए आप कम से कम ' नास्ति ' इस तत्त्व का अस्तित्त्व अवश्य स्वीकार कर रहे हैं । आपके माने हुए ' न अस्ति ' लक्षण नाम्ति में नकारात्मक क्षणिक तत्त्व, श्रस्तिरूप क्षण तत्त्व दोनों का समावेश हो रहा है । क्या आप अपने माने हुए नास्ति में ' अस्ति ' पद की सत्ता स्वीकार नहीं कर रहे! । अथवा छोड़िए इस विवाद को । ' नास्ति ' से यदि केवल आपका अभिप्राय ' न ' कार ही तव भी एकतत्त्वास्तित्त्व की स्वीकृति से आप अस्ति - स्वीकृति से अपने आपको बर्हिभूत नहीं कर सकते । यदि इस सम्बन्ध में आप यह कहने का साहस करेंगे कि, ' नास्ति ' भी हमारे मतानुसार ' नास्ति ' स्वरूप ही ही है, सत्तात्मक नहीं । नाति की सत्ता बन ही कैसे सकती है । फलतः ' नास्ति ' मन्तव्य के आधार पर हमें बत्तानुगामी बतलाना कैसे सम्भव हो सकता है । तो उत्तर में हमें यह निवेदन करना पड़ेगा, कि तब तो आपने साक्षात् रूप से ही ' अस्तितव ' मान लिया । श्रभावाभाव सत्ता का संग्राहक माना गया है । सम्भवतः आप भी मानते हैं कि, घटाभावाभाव ( घटके अभाव का अभाव ) घटसत्ता का कारण है । सुतरां नास्ति का नास्तित्त्व अस्तित्व का संग्राहक बन रहा है । श्रम्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए इन व्यर्थ के तर्कवादों को थोड़ी देर के लिए छोड़ कर ही हम आपके ' नास्ति ' की मीमांसा कर लेते हैं । मान लेते हैं, श्रापका ' नास्ति ' ही तात्विक सिद्धान्त हैं | यापके इस नास्तिवाद का यही तो तात्त्पर्य्य है कि, संसार भी कुछ नही है, संसार के पदार्थ भी शून्यं शून्यं बनते हुए कुछ नहीं हैं । यदि ऐसा है, तब आप यह किस आधार पर कह सकते हैं कि-' नास्ति ' यही हमारा मौलिक सिद्धान्त है । आप ही के शब्दों में जब कोई भी वस्तुतत्त्व ' हाँ ' कहने योग्य नहीं है, तो स्वयं आप, आपका नास्तिसिद्धान्त, नास्तित्त्व के प्रतिपादक आपके ग्रन्थ, सब कुछ नास्तिकोटि में आते हुए शून्यं - शून्यं हों तो हैं । यदि इस पर आप अपने नास्तिसिद्धान्त की इस नास्ति को इष्टापत्ति मानते हैं, तो यही पूर्वोक्त श्रभावाभावात्मक सत्ताभाव आपका गलन ह कर लेता है । बात वास्तव में तथ्यपूर्ण है । जो महानु-भाव क्षणिक क्रिया के अभिनिवेश में आकर एकहेलया सत्रको ' सत् ' कह जाते हैं, उनका स्वरूप ही कालान्तर में सत् बन जाता है । मनोविज्ञानसिद्धान्त के अनुसार ' यह भी नहीं, वह भी नहीं, सब मिथ्या ' कहने वालों की प्रतिष्ठा कालान्तर में सचमुच उच्छिन्न हो जाती है । ठीक इसके विपरीत स्तिब्रह्मोपासक विद्वान् ' सन्त ' पद १२४