Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 141–150
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150
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तृतीयखण्ड के अधिकारी बनते हुए उभयलोक सम्पत्ति के सत्पात्र बने रहते हैं । इसी भाव का निरूपण करती हुई उपनिषच्छ्रति कहती है—
सन्नेव स भवति, सद् बह्म ेति वेद चेत् ।
अस्ति ब्रह्मति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः ॥
तत्त्वत: बात तो यह है कि, क्रिया क्षणिक है, परिवर्तनशीला है । इसे स्वसंचार के लिए अवश्य ही किसी क्षण - परिवर्तनशील धरातल अपेक्षित है । एक क्षणिक क्रिया अन्य क्षणिक क्रिया का आधार बन जाय, यह असम्भव है । एवं बिना आधार के क्रियोपपत्ति असम्भव है । पैर के आधार पर गतिक्रिया का सञ्चार होता है । मुखाधारेण अन्न चर्वण क्रिया का सञ्चार है । स्थिर नागदन्त ( खूँटी ) पर वस्त्र - निधानलक्षण-कर्म्म सम्भव है । निदर्शन मात्र है । कहीं असतोधृतिरूप से, कहीं सतोधृतिरूप से, एवं सर्वत्र श्रात्मधृतिरूप से ( परसत्ता - स्वसत्ता - श्रात्मसत्ता रूप से ) सम्पूर्ण क्रियाओं में आप एक निष्क्रिय स्थिर आलम्बन देखेंगे | इन्हीं सब प्रत्यक्ष परिस्थितियों के आधार पर हम कह सकते हैं कि, जहाँ प्रत्येक पदार्थ क्रियामय बनता हुआ ' नास्ति ' लक्षण है, वहाँ आधारभूत नित्यसत्ता पेक्षया वह ' अस्ति ' लक्षण भी है । मनः प्राणवाङ्मय - सृष्टिसाक्षी अव्ययात्मा ही सत्ता का स्वरूपलक्षण है । एवं ' विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कत्तु ' मई त ' ( गी ०२।१७ ) के अनुसार सत्ता का त्रिकाल में भी विनाश असम्भव है । पञ्चभूतसमष्टि का ही विनाश है, सो भी तिरो-भावात्मक, लयात्मक । अतएव वैज्ञानिक महर्षि विश्वविनाश न कहकर ' विश्वप्रलय ' कहा करते हैं । जो सत्तातत्त्व कर्म्मानुगृहीत आयुर्भोगपर्य्यन्त देवदत्त के शरीरपिण्ड से संक्रान्त रहता है, कर्म्मभोगानन्तर वह इस पिण्ड सम्बन्ध से पृथक् होकर अन्य प्रातिवाहिक - शरीर पिण्ड के साथ संक्रान्त हो जाता है । साथ ही पूर्वपिण्ड भाव का भी अनुग्राहक बन जाता है । ' देवदत्तोऽस्ति ' वत् ' देवदत्तो नास्ति ' इस अभावात्मक वाक्य में भी अस्तित्त्व अक्षुण्ण है । वरतुसत्ता, वस्त्वभाव, सर्वत्र अस्तितत्त्व नित्य सम्बद्ध है । कभी सत्ता को वस्तु अपने गर्भ में ले लेतो मै, तो कभी सत्तावस्तु को अपने गर्भ में भुक्त कर लेती है । प्रथमदशा भावात्मिका सत्ता है, तो द्वितीयदशा अभावात्मिका सत्ता है । इसप्रकार विश्वदशा में उस नित्य सत्ताधरातल पर नानाभावाक्रान्त अनित्य क्रियाचल नृत्य कर रहे हैं । नृत्य करने वाले क्षण क्षण में नव नवरूप धारण करते रहते हैं, इनके सम्बन्ध से रङ्गमञ्च भी नव - नव सा प्रतीत होने लगता है, परन्तु वस्तुतः रङ्गमञ्चस्थानीय स्थिर सत्त्र – धरातल सदा - सर्वदा श्रापूर्यमाण समुद्रवत् एकरस है, अचलप्रतिष्ठ है । ६ - कारणस्वरूप विश्वमूल के दो तत्व— छोड़िए इस मतवादात्मक दार्शनिक कलह की अप्रियचर्चा को हमें तो विज्ञानसम्मत उस विश्वमूल की मीमांसा करनी है, जहाँ विवादप्रवेशाधिकार ' देवालयेषु - आर्यधर्मेतराणां, असच्छ्रद्वाणां च प्रवेशो सर्वथा निषिद्धः ' के अनुसार सर्वथा अवरुद्ध है । किसी भी षस्तुतत्त्व के मूल की खोज करने के लिए उस वस्तुस्वरूप का अन्वेषण विशेष सुविधाजनक माना गया है । क्योंकि – कारणगुणाः ' कार्यगुणानारम्भन्ते ' न्यायानुसार कारण के गुण - धर्म्म हीं कार्य्यं के गुण - धम्मों के आरम्भक ( उपादान ) बना करते हैं । सुतरां कार्य्यं के स्वरूप दर्शन से कारण स्वरूप का अनुमान सरलता से लगाया जा सकता है । हमें कार्य्यरूप विश्व के कारणरूप मूल का अन्वेषण करना है । अतएव कार्यरूप विश्व के स्वरूपदर्शन के लिए प्रेसर होने पर १२५
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भाष्यभूमिका हमें यहाँ ' अस्ति, नास्ति ' भेद से सर्वथा विरूद्ध दो तत्वों का एकत्र समन्वय उपलब्ध होता है । अस्ति अविनाशी जनता हुआ ' अमृत ' है, नास्ति विनाशी बनता हुआ ' मृत्यु ' है । अमृत - मृत्यु की समष्टि कार्यरूप विश्व है | एकमात्र इसी आधार पर हमें यह सिद्धान्त स्वीकार कर लेना चाहिए कि, जबकि कार्य्यरूप विश्व में नित्यानित्य दो विरुद्ध तत्त्वों का समन्वय है, तो तत्कारणभूत विश्वात्म में भी अवश्य ही नित्यानित्य दो मूल प्रतिष्ठित होंगे । अस्ति - नाति - लक्षण विश्वका के कारणभूत, नित्यानित्य- लक्षण, अतएव परस्परात्यन्त-विरुद्ध, साथ ही विश्वातीत होने से सर्वथा अचिन्त्य वे ही दोनों मूल तत्त्व विज्ञानकाण्ड में क्रमशः -" प्रभू - श्रभ्व " नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । कार्य्याधार पर अनुमेय इसी कारण - परिज्ञान का अपनी अर्थ-गभीस्त्र संक्षिप्तभाषा में स्पष्टीकरण करते हुए श्राचार्य्यप्रवर कहते हैं.
-यदस्ति किञ्चित् तदिदं प्रतीमोऽविचालि शश्वत्स्थमनाद्यनन्तम् ।
प्रतिक्षणान्यन्य विकारसृष्टिप्रवाहवत्तद्विविरुद्धभावम् ॥ १ ॥
बिरुद्धभावद्वयसन्निवेशात् सम्भाव्यते विश्वमिदं द्विमूलम् ।
' आभ्वभ्वसंज्ञे ' स्त इमे च मूले द्रष्टाभु दृश्यं तु मतं तद्भ्वम् ॥ २ ॥
- श्रीगुरुप्रणीत संशयवाद । सर्वव्यापक, नित्य तत्त्व ही ' आसमन्ताद् भवति ' निर्वचनानुसार ' आभू ' है । दूसरा स्वतस्व परिच्छिन्न होता हुआ क्षणिक, अतएव अनित्य है । ' नास्ति ' ही इसका स्वरूप लक्षण है । सर्वथा नास्ति-लक्षण बनता हुआ ( अतएव स्वलक्षण बनता हुआ ) भी यह अभ्वतत्त्व उस अस्तिलक्षण श्राभूतत्व से अनुग्रहीत होकर नाम - रूप - कम्र्मात्मना प्रतीति का विषय बन रहा है, अतएव ' अभवन् - भाति ' - ' अभूत्त्वा भवति, भाति च ' इत्यादि निर्वचनों से इसे ' अस्त्र ' कहा गया है । आभूतत्त्व नित्यधर्म से सत् है, अमृत है । अभ्वतत्व अपने श्रनित्यधर्म से असत् है, मृत्यु है । मृत्यु उस अमृत का आवश्क है । परन्तु मृत्यु स्व-स्वरूप से विनष्टप्राय है, अमृतलक्षण श्रम की तुलना में नगण्य है, तुच्छ है । मुक्तिकाल में जहाँ अमृताभ-का प्राधान्य रहता है, वहाँ सृष्टिकाल में इस ' तुच्छ ' मृत्युरूप अभ्व का ही साम्राज्य रहता है 1 । उस समय ( सृष्टिदशा में ) अमृतलक्षण श्रम अन्तलीन रहता है, इसके चारों ओर मृत्युलक्षण इस तुच्छ अभ्व का ही आवरण रहता है | इसी स्थिति को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि ने कहा है- ' हुच्छेनाभ्वपि हतं यदासीत् ' ( ऋक् सं ० १०।१२६।३ । ) । सृष्टिमूलभता यही तत्त्वद्वयी तत्तत्सृष्टिविशेषों की अपेक्षा से तत्तत्प्रकरणबिशेषों में निम्न लिखित रूप से अनेक नामों से सम्बोधित हुई है-( १ ) - १ - श्रनू - - २ - अभ्त्रम् ( २ ) -१- रसः---२ - बलम् ( ३ ) -१- अमृतम् ——२ - मृत्युः ( ४ ) -१- ज्योतिः -: --.- २ तमः ( ५ ) - १ - विद्या-- -- २ - श्रविद्या ( ६ ) -१ - सत् ———-- २ - असत् -- " ते हैंते ब्रह्मणे महती अभ्वे, महती यक्षे " ( नाम - रूपे ) १२६
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तृतीयखण्ड सृष्टिमूलभूत ' आभू - अभ्व ' नामक तत्त्वद्वयी के ' विश्व - विश्वातीत ' रूप से दो प्रधान विवर्त्त मानें गए हैं । विश्वविवर्त्त कार्य्यात्मक है, विश्वातीतविवर्त्त कारणात्मक है । कारणात्मक दोनों तत्त्व उन्मुग्धावस्थापन्न हैं, कार्य्यात्मक दोनों तत्त्व उद्बुद्धावस्थापन्न हैं । उद्बुद्ध दशा में कार्य्यात्मक प्राभूतत्त्व के ‘ सत्ता, चेतना, आनन्द, ’ भेद से तीन विवर्त्त हो जाते हैं, एवं कार्य्यात्मक अभ्वतत्त्व के ‘ नाम, रूप, कर्म्म, ’ भेद से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । इन तीनों श्रभ्वरूपों में से यदि कर्म्मविवर्त का रूप में अन्तर्भाव मान लिया जाता है, तो अभ्व के ' नाम - रूपात्मक ' दो ही विवर्त्त शेष रह जाते हैं । सच्चिदानन्दघन भूब्रह्म के नाम - रूप नामक ये अभ्व श्रतिशयरूप से प्रभावशाली मानें गए हैं । जिन्होंनें अपने प्रतिष्ठारूप स्वयं आभूब्रह्म को आवृत करते हुए उसे सृष्टिकर्मसञ्चालन के लिए काम - तपः - श्रमात्मक सृष्टयनुबन्धों का अनुगामी बना डाला हो, उनके प्रभाव का क्या कहना है । इसी आधार पर श्रुति का ' ते हैते ब्रह्मणो महती अभ्वे, महती य ' ( शत ० ११ । २ । ३ । ४ । ५ । ) यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अभ्वात्मक नाम - रूप विवर्त्त ' सचमुच अस्मदादि संसारियों के लिए श्रब्रह्म की सबसे बड़ी त्रिभीषिवा है । सम्पूर्ण विश्वप्रजा नामरूप की विभीषिका से भयत्रस्त हैं । इसप्रकार यह अभ्व पदार्थ हम लौकिक मनुष्यों को डराने के लिए सचमुच अभ्व ( हौत्रा ) बन रहा है । हमें भयत्रस्त करने वाला नामरूपात्मक अभ्व, तथा सच्चिदानन्दघन आभू, दोनों परस्पर विजातीय हैं । भू तत्त्व असङ्गधर्म से निरञ्जन, व्यापक धर्म्म से दिग्देशकालानवच्छिन्न, अमृतधर्म्म से नित्य, एकरसात्मक धर्म से शान्त, एवं परिपूर्ण है । ठीक इसके विपरीत अभ्व तत्त्व आसक्तिधर्म्म से साञ्जन, व्याप्यधर्म से दिग्देशकालावच्छिन्न, मृत्यु से ति ' विभिन्न बलधर्म्म से अशान्त, तथा अपूर्ण है । साथ ही दोनों हीं विभिन्न दृष्टिकोणों से ' अनन्त ' है । रसात्मक श्रभूब्रह्म संख्या से जहाँ एक है, वहाँ दिग्देशकालानवच्छिन्न बनता हुआ स्वरूपतः अनन्त है । बलात्मक अभ्व दिग्देशकालावच्छिन्न बनता हुआ जहाँ संख्या से अनन्त है, वहाँ स्वरूपतः सादिमान्त है । शुद्धरसात्मक आभूब्रह्म विशेषक चलों से अस्पृष्टदशा में ' निर्विशेप ' नाम से व्यवहृत हुआ है । एवं वहीं भूब्रह्म विशेषक - अशेष बलों से युक्तावस्था में आकर सर्व ' बल विशिष्ट रसरूपेण ' परात्पर ' नाम से सम्बोधित हुआ है । इसप्रकार शुद्धरस, एवं अशेषबलवद्रस भेद से अमृत - मृत्युमय विश्वातीत कारणब्रह्म के ' निर्विशेष'-' परात्पर ' भेद से दो विवर्त हो जाते हैं । चलों का आत्यन्तिकरूप से रस से पार्थक्य हो जाय, यह सर्वथा असम्भव है, जैसा. के आगे जाकर स्पष्ट होने वाला है । फलतः शुद्धरसात्मक ' निर्विशेष ' का शेष लवद्रसरूप ' परात्पर ' में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । निर्विशेष व्यवहार की मूलप्रतिष्ठा बुद्धिगम्य मानस - प्रत्ययमात्र ही माना गया है । ' घटे घटत्त्वम् ' इस वाक्य के समन्वय के लिए विशेषण की प्रविवक्षा करते हुए - ' घटत्त्वोपहिते घटे घटत्त्वम् ' यह वाक्यार्थ मानना पड़ता है । घट के साथ तद्विशेषणभूत घटत्त्व का नित्य सम्बन्ध है । चिना घटत्त्व सम्बन्ध के घट शब्द ही सर्वथा अनुपपन्न है । ऐसी दशा में ' घटे घटत्त्वम् ' का ' घटत्त्वविशिष्टे घंटे-घटत्वम् ' इसप्रकार विशेषण पूर्वक समन्वय होना चाहिए था । परन्तु ' सामान्ये सामान्याभावः ' के अनुसार व्यक्ति में जाति की प्रतिष्ठा सम्भव है, किन्तु जाति में जातिप्रतिष्ठा एकान्ततः अनुपन्न है । घटत्त्व घट में रहता है, घटत्त्व बटत्त्व में नहीं रहता । जब घटत्त्व में घटव नहीं रहता, तो ' घत्त्वविशिष्टे घटे घटत्त्वम् ' कहना असम्भव है । साथ ही बिना घटत्त्व लगाए ' घटे घटत्त्वम् ' का समन्वय भी असम्भव है । इस विप्रतिपत्ति के १२७
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भाष्यभूमिका निराकरण के नित्य विद्यमान घटत्व की अपने बौद्धजगत् में अविवक्षा कर ' घटत्वोपहिते घटे घटत्वम् ' इस प्रकार समन्वय कर लिया जाता है । ठीक यही प्रक्रिया यहाँ समझिए । ' शुद्धरसो निर्विशेषः ' का ' बलोप-हितः शुद्धरसो निर्विशेषः ' इस रूप से समन्वय करना पड़ेगा | क्योंकि अपने प्रत्यय - जगत् में आप रस को चल से पृथक कर सकते हैं, किन्तु सत्तादृष्टि से दोनों अभिन्न हैं । चिना बल के शुद्धरत अनुपन है । इस प्रकार ज्ञानीय जगत् में बल की अविवक्षा करते हुए शुद्धरस को ' निर्विशेष ' कहना सुसङ्गत बन सकता है । ' अयं घटः ' -अयं पट: ' - ' अयं पुरुषः ' ये घट - पट पुरुषादि शब्द विशेषात्मक बनते हुए परस्पर एक दूसरे के व्यावत'क बन रहे हैं । घट इसलिए घट है कि, वह पटादि नहीं है । शुद्धरस एकाकी है, उसमें अनेकत्वानु-योगिक, एकत्त्वप्रतियोगिक इन विशेषभावों का अभाव है । विशेषभावों का उदय होता है अनेकत्त्वानुयोगिक, एकत्वप्रतियोगिक बलों के सम्बन्ध से । श्रतएव ' निर्गता विशेषा यस्मात् ' इस निर्वचन से विशेषक बल विरहित इस विशुद्ध रस को ' निर्विशेष ' कहना चन्वर्थ बन रहा है । ' रसो ह्येव सः, रसं ह्ये वायं लब्ध्वा-श्रानन्दी भवति ' ( तै ० उप ० २ | ७ | १ | ) इस श्रौपनिषद सिद्धान्त के अनुसार विशुद्ध रसरूप निर्विशेषत्रह्म श्रात्यन्तिकसुख ( पराशान्तिलक्षण शान्त श्रानन्द ) रूप है । दुःखरूप विशेषक बल का ( भाति दृष्टि से ) इसके साथ अणुमात्र भी स्पर्श नहीं है । इसी आधार पर श्रोती उपनिषत् का अक्षरशः अनुगमन करने वाली स्मार्त्ती उपनिषत् ' ( भगवद्गीतोपनिषत् ) ने इसे ' ऐकान्तिक सुख ' नाम से व्यवहृत किया है, जैसा कि अनुषद में स्पष्ट होने वाला है । विशेषभावप्रवत्तक यच्चयावत् - बलों को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाला, अतएव अशेषवल-द्रसमूर्ति, सर्वधर्मोपन्न विश्वातीत तत्त्व ' परात्पर ' है । यह असीम है, अपरिच्छिन्न है, नित्यधर्म्मा है । विश्वा-तीतत्त्वेन व्यापक होने से कभी ग्रन्थिविमोकलक्षण नाश की सम्भावना नहीं है । श्रतएव इसे ' शाश्वतधर्म्म ' नाम से व्यवहृत किया गया है । शाश्वतधर्म्मलक्षण इस सर्वत्रलविशिष्ट रखात्मक, सर्वधर्मोपपन्न परात्पर को मूलाधार बना कर ही हमें प्रजापति की १६ कलाओं का उपक्रम करना है । इसी परात्पर से इसी के गर्भ में एक बलविशेष के अनुग्रह से सोमाभावोत्पत्ति के द्वारा हमारे प्रकृत प्रकरण के ' ईशप्रजापति ' का विकास होने वाला है, जिसे हम ' घोडशीप्रजापति ' भी कहा करते हैं । निर्विशेषवत् विश्वातीत परात्पर भी अपनी सर्वधर्म्मता से श्रुतद्द्व्यावृत्त बनता हुआ वाङ्मनसपथातीत है, अतएव विशेय है, अनुपास्य है । विज्ञेय है सम्बन्ध में- ' पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ' एकमात्र तदंशभूत ईश्वर प्रजापति, जिसके यह कहा जाता है । १ - विश्वात्मा के १६ बलकोश— ईशप्रजापति के मूलकारात्मक परात्पर परमेश्वर की रस, बल नाम की जिन दो कलाओं का अबतक यशोगाम हुआ है, वह प्रत्येक कला ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम की अधिकारिणी बन रही है । दन षोडशी भावों का विकास स्वयं परात्पर में नहीं होता, अपितु परिच्छिन्न ईशप्रजापति में ही होता है । श्रतएव श्रुति ने प्रजापति को ही ' वोडशी ' कहा है । ईशप्रजापति के रसभाग से सम्बन्ध रखने वालीं १६ कलाओं को थोड़ी देर के लिए यहीं छोड़ पहिले बलभागानुता १६ कलाओं की मीमांसा कर लीजिए । १२८
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aarters बलतत्त्व अनन्त हैं, असंख्य हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु कोशदृष्टि से इन असंख्य बलों का १६ महात्रलों में ही अन्तर्भाव हो रहा है । यच्चयावत् बल १६ जातियों में विभक्त हैं, एवं १६ बलजातियों को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले १६ महाबल ' कोशचल ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । इन बलकोशों के तात्त्विक विश्लेषण के लिए तो एक स्वतन्त्र निबन्ध अपेक्षित है । यहाँ केवल प्रकरणसङ्गति के लिए संक्षिप्त परिचय के साथ - साथ उनका नामोल्लेख कर देना ही पर्याप्त होगा । पहिला बलकोश ' विद्याबल ' है, एवं इसका एक स्वतन्त्र विभाग है । ' माया, जाया, धारा, आप: ' इन चार बलकोशों का एक स्वतन्त्र विभाग है । ' हृदय - भूति - यज्ञ - सूत्र ' इन चार बलकोशों का एक स्वतन्त्र विभाग है । ' सत्य - यक्ष - अभ्व - मोह ' इन चार बलकोशों का एक स्वतन्त्र विभाग है । ' वय, वयोनाभ, वयुन ' इन तीन बलकोशों का एक स्वतन्त्र विभाग है । इसप्रकार १-४-४-४-३ मेद से पाँच विभागों में विभक्त रहते हुए १६ बलकोश विविध भावापन्न बलात्मक विश्व के आरम्भक बन रहे हैं । ( १ ) - मायाबलम् -रस - बलात्मक व्यापक परात्परप्रदेश को मित ( सीमित ) बना देने बाला जो सर्वप्रधान बलकोश है, वही ' मीयते अनया- ' मिनोति या सा ' इत्यादि निर्वचनों के अनुसार ' माया ' नाम से प्रसिद्ध है । इस बल के सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, इतर पन्द्रह बलकोशों को भी यह माया बलकोश अपने गर्भ में रखता हुआ महान् बन रहा है । मायाबलप्रवृत्ति ही इतर बलकोशप्रवृत्ति का मुख्य कारण है । मायाचल ही एक ऐसा बल है, जिसके उदय से व्यापक परात्पर प्रदेशावच्छ देन सीमित बन कर ' पुरुष ' नाम धारण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टि का प्रवर्त्तक बनने में समर्थ होता है । मायाबल क्योंकि बल है, मृत्युलक्षण है, अतएव इसे ‘ असत् ' कहने की भी इच्छा होती है । सद्स के आधार पर उदित होने से इसे ' सत् ' भी कहने की इच्छा होती है । सदसद्विश्व एकमात्र माया का ही विजृम्भण है, अतएव इसे ' सदसत् ' कहने की भी इच्छा होती है । परन्तु ये तीनों हीं इच्छाएँ व्यर्थ सिद्ध हो रहीं हैं । सद्ररसानुबन्ध से इसे एकान्ततः ' असती ' भी नहीं कहा जा सकता, बलस्वरूपानुबन्ध से इसे एकान्ततः ' सती ' भी नहीं कहा जा सकता है । सत् - अस्त के परस्पर विरोध से ( जो सत् है, वह असत् नहीं, जो असत् है - वह सत् नहीं, इस दृष्टि से ) इसे ' सदस्ती ' भी नहीं कहा जा सकता । इसप्रकार अचिन्त्य परात्पर को पुरुषरूप में परिणत करने वाली माया भी अस्मदादि गर्भाभूत प्रजा के लिए सर्वथा अचिन्त्य ही बन रही है । उसके गर्भ में एक अतिस्वल्प क्रोड में जन्म लेने वाला मनुष्य जगन्माता के ' इदमित्थं ' रूप को यदि जानने में असमर्थ रहता है, तो इस में कोई आश्चर्य नहीं है | मायाचल की इसी अनिर्वचनीयता का दिग्दर्शन कराते हुए अभियुक्तों ने कहा है—
नसती सा, नासती सा, नोभयात्मा विरोधतः ।
काचिद् विलक्षणा माया वस्तुभूता सनातनी ॥
इस मायाबल के ' महामाया, योगमाया, विष्णुमाया, ब्रह्ममाया, शिवमाया, आदि भेद से अनेक विवर्त्त ' मानें गए हैं । सर्वप्रथम उद्भूत, इतर मायाविवर्त्तो को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाली, ' विश्वात्मा ' नाम से प्रसिद्ध ईशप्रजापति का स्वरूप निर्माण करने वाली, विश्वव्यापिनी श्रादिमाया ही ' महामाया ' है । महामायी ईशप्रजापति है, जिसके गर्भ में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्यादि अनेक भावों का समावेश है । इन पर्वो १२६
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का म्वरूप सम्पादन करने वाली मायाएँ पृथक - पृथक हैं । माया सीमाभाव है, सीमा ( श्रावपन लक्षण आवतन ) बलविशेष है । सीमात्मिका माया ही पर्वजन्म का हेतु बनती है । पर्वात्मिका ये मायाएँ ईशप्रजापतिस्वरूप-निर्मात्री माया के गर्भ में उदित होतीं हुईं स्वमक्तिचल के सम्बन्ध से महामाया से युक्त रहतीं हैं । अतएव इन्हें ' योगमाया ' नाम से व्यवहृत किया गया है । एक विश्व में महामाया एक योगमाया अनन्त हैं । महासीमा अनन्त पदार्थ भेद से अनन्त सीमा, सीमा में सीमा, इसप्रकार दहसेत्तर सम्बन्ध से विश्वगर्भ में योगमायाएँ व्याप्त हो रहीं हैं । योगमायाओं की दहरोत्तर सम्बन्धानुगता इस सर्वव्याप्ति का यह परिणाम है कि, आज वह महामायी अव्ययेश्वर सर्वसाधारण के लिए विदूर बन रहा है । जो महामायी अव्यय महामायानुबन्ध से प्रत्यक्ष है, वही योगमायाखण्डों से श्रावृत होकर तिरोहित है । योगमायानुबन्धी पुरुष योगमाया के ( त्रिगुणात्मिका प्रकृति के ) जाल में ही फैमा रहता है । इन योगमायाजालों से जालवान् X बनता हुआ वह ईश जालात्मिका इन्हीं योगमायाओं से योगमायावच्छिन्न विश्वप्रमा का शासन करता हुआ योगमाया के सम्बन्ध से शासित प्रजा के लिए अप्रत्यक्ष वन रहा है । आत्मस्वरूप को श्रावृत करने वाली, खण्ड - खण्डात्मिका - त्रिगुणात्मिका यही माया वह योगमाया है, जिसके सम्बन्ध में स्मृति का निम्नलिखित स्पष्टीकरण है— नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमन्ययम् ॥ ( गी ० ७।२५ ) । प्रतिष्ठाप्रवर्त्तक, किंवा प्रतिष्टा लक्षण, हृद्य ब्रह्माक्षर का स्वरूप सम्पादन करने वाली प्रतिष्टात्मिका माया ही ' ब्रह्ममाया ' है, जो ब्रह्माक्षर के सहयोग से त्रयीमूर्ति बनती हुई विश्त्र की मूलोत्पादिका बन रही है । प्रत्येक पदार्थ में जो प्रतिष्ठात्मक एक टहराव उपलब्ध होता है, वह इसी ब्रह्ममाया का अनुग्रह है । इसके अतिरिक्त वस्तु की उपलब्धि भी इसी ब्रह्ममाया से होती है । उपलब्ध वस्तुतत्त्व त्रयीवेदसम्पत्ति से युक्त है, जैक भूमिका प्रथमखण्डान्तर्गत- ' उपलब्धि वेदनिरुक्ति ' प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । महामायावच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्ववित्, ज्ञानमय- तपोमूर्ति, ईश प्रजापति इसी ब्रह्ममाया सहयोग से ब्रह्मात्मिका वेद · प्रतिष्ठा के प्रवर्त्तक बनते हुए सृष्टिकर्म ग्रारम्भ करने में समर्थ होते हैं- ' तस्मादेतद् ब्रह्म ': ।
X य एको जालवानीशत ईशनीभिः " सर्वा ल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एनैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
- श्वेताश्वतर ० ३ १॥
जालवान् - योगमायावच्छिन्नः । ईशानीभिः - योगमायाभिः ।
* शब्दात्मिका सुविमलजुषां निधानमुद्भस्यपदपाठवतां च साम्नाम् ।
देवी ' यो ' भगवती भवभावनाय वार्ता च सजगतां परमार्तिहन्त्री ॥
- सप्तशती - यः सर्वज्ञः सर्ववित्, यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म - नामरूप - मन्नं च जायते ॥ ( मुण्डकोपनिषत् १।१६ । ) । ब्रह्म - प्रतिष्ठा । नामरूपं - ज्योतिः । अन्नं - यज्ञः । १३०
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तृतीयखण्ड विश्वान्तर्गत अणोरणीयान्, महतो महीयान् सत्र पदार्थों में ' सर्वमिदमन्नं सर्वमिदमन्नादः ' इस निगम के अनुसार परस्पर अन्न अन्नाद ( भोग्य - भोक्तृभाव ) भाव प्रतिष्ठित है, जिसका -' यो मा ददाति स इ देवमावदहमन्नं, अन्नमदन्तमद्मि इत्यादि मन्त्रवर्णन से भी समर्थन हुआ है । परस्परान्नान्नाद सम्बन्ध से ही पदार्थों की स्वरूपरक्षा हो रही है । इसी आदान-प्रदानात्मक, जीवनसाधक कर्म को ' यज्ञ ' कहा जाता है । इस यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा ग्राहरणधर्म्मा हृद्य विष्णु नामक अक्षर है । अतएव ' यज्ञो वै विष्णुः ' - ' विष्णुर्वै यज्ञः ' इत्यादि रूप से अन्न - अन्नादात्मक ( अग्नीषोमात्मक ) यज्ञ, एवं तत्प्रवर्त्तके, अशनायाशक्तियुक्त हृद्य - विष्णु - क्षर का अभेद मान लिया गया है । प्रतिष्टात्मिका ब्रह्ममाया की भी प्रतिष्ठित बनाने वाली यज्ञात्मिका यही ' विष्णुमाया ' है । सृष्टिपालन-धर्म इसी माया का स्वधर्म है । अन्नादानलक्षणा यज्ञसत्ता ही सृष्टिम्वरूपरक्षा है । तभी तक हृद्य प्रतिष्ठात्रा सुरक्षित है । जिस योगमाया का ( वस्तुपिण्डात्मिका सीमा का ) पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, वह योगमाया यज्ञात्मिका इस विष्णुमाया के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । जब तक विष्णुमाया का अनुग्रह है, तब तक अन्नयज्ञ सुरक्षित है । जब तक अन्नयज्ञ है, तभी तक वस्तुसीमात्मिका योगमाया का विकास है | इसी आधार पर प्राचीनों नें योगमाया का विष्णुमाया में अन्तर्भाव मानते हुए इसे भी विष्णु-माया ही कह दिया है, जैसाकि ' योगमाया हरेश्चैतत् तथा संमोह्यते जगत् ' ( सप्तशती ) इत्यादि रहस्य-प्रमाण से प्रमाणित है । इसप्रकार सर्वज्ञादिलक्षण वही ईश प्रजापति विष्णु माया के सहयोग से ही अन्नात्मक यज्ञ के प्रवर्तक बनते हुए सृष्टिपालनकर्म में समर्थ बन रहे हैं - अन्नं ' च जायते ' | चौथी ' शिवमाया ' नामरूपात्मक विश्व का शिवभाव सुरक्षित रखती है । नामरूप ही अर्थप्रपञ्च है, अर्थही भूत है, तत्सम्बन्ध से ही इन्द्राग्निसोम के भेद से त्र्यक्षरमूर्ति शिव भूतपति कहलाए हैं । भूतपति शिव में प्रधानतः इन्द्रावर का ही विकास माना गया है । अतएव इस माया को विज्ञानभाषा में हम ' इन्द्रमाया ' ही कहेंगे । पुराणशास्त्र की शिवमाया, एवं वेदशास्त्र की ' इन्द्रमाया ' अभिन्न पदार्थ हैं । ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार इन्द्र ही नामरूपात्मिका माया के सहयोग से अर्थविवर्त्त का अध्यक्ष बन रहा है * । उक्त मायात्रयी का निष्कर्ष यही हुआ कि, त्रिगुणात्मिका योगमाया के गर्भ में सत्त्व - रज - तम- इन तीन गुणों के आधार पर क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्राक्षरों से सम्बद्ध ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र ( शिव ) माया का विकास होता है । तीनों उस त्रिगुणात्मिका योगमाया का ही विस्तार है । समष्टिरूप से वही योगमाया है, व्यष्टिरूप से वही ब्रह्ममायादि नाम से व्यवहृत होने लगती है । इसप्रकार महामाया, योगमाया, भेद से विभागद्वयात्मिक । माया चतुर्विभागात्मिका बन रही है ।
* रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय ।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शतादश ॥
—ऋक्सं ० ६।४७।१८ । १३१
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मायभूमिका १ - १ – महामाया – ईशप्रजापतिस्त्ररूपत्वक्षरणा - एका - गुणातीता । * * - योगमाया - खण्ड सृष्ट्यनुग्राहिका - गुणत्रयात्मिका । २- १ - ब्रह्ममाया --- प्रतष्ठात्रह्मात्मिका वेदमयी ( प्रतिष्ठा ) - ब्रह्म । ३- २ – विष्णुमाया - अन्नयज्ञात्मिका ( यज्ञ: ) - अन्नम् । ४–३ – इन्द्रमाया – नामरूपात्मिका ज्योतिर्लणा ( ज्योतिः ) नामरूपे ।
यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म - नामरूप - मन्नं च जायते ॥
प्रकत में मायाचल के सम्बन्ध में हमें वही कहना है कि, जायादि १५ बलकोशों को अपने गर्भ में प्रति-ष्ठित रखने वाला, सञ्चरदशा में सर्वप्रथम उद्भूत होने वाला, सीमाभावसम्पादक बलविशेष ही पहिला ' मायाबल ' है । मायाबलोदय के अनन्तर ही अन्य बलों का उदय होता है । ( २ ) - हृदयबलम् — अव्ययपुरुत्रानुत्रन्धी चल जहाँ ' मायाचल ' है, वहाँ अक्षरपुरुषानुचन्धी चल ' हृदयचल ' नाम से व्यवहृत हुआ है । बतलाया गया है कि, इतर बलकोस माया नामक बलकोश के गर्भ में प्रतिष्ठित है । सञ्चरदशा में सर्वप्रथम मायाबल का उदय होता है । परात्पर के जिस प्रदेश में ( जबकि मायोदय से पहिले व्यापक परात्पर के सम्बन्ध में प्रदेश शब्द अनुपन्न है ) माया का विस्तारलक्षण तनन होता है, वह प्रदेश सीमित बनता हुआ एक रेखात्मक पुर बन जाता है । इस मायापुर के सम्बन्ध से रसबलात्मक वह परात्पर ही माया प्रदेशावच्छेदेन ' पुरुष ' कहलाने लगता है । मायी पुरुष ( अव्यय ) के गर्भ में ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - नामक हृ - द - य - इन तीन अक्षरों का, किंवा त्र्यक्षरमूर्ति एकादारपुरुष का विकास होता है । यही नियतिलक्षण बल ' हृदयबल ' नामक दूसरा बल है, जिसका उदय मायावलोदय के अव्यवहितोत्तरक्षण में ही हो जाता है । व्यापक वस्तुतत्त्व में कोई नियत केन्द्र नहीं होता, अपितु वह सर्वात्मना केन्द्र है, किंवा उसकी प्रतिचिन्दु केन्द्र है । केन्द्रभाव परिच्छिन्न वस्तुतत्त्व से ही सम्बन्ध रखता है । मायाबलोदय से पहिले असीम बने हुए, परात्पर में हृदयबल का विकास था । परन्तु मायी परात्पर में, जिसे हम ऋत्र पुरुष कहेंगे, हृदयबल का उदय हो जाता है । हृदयबल की मूलोप-निषत् गतितत्व ही मानी गई है । यह गतितत्त्व ही गतिसमष्टि, अर्वागगतिलक्षणा विशुद्धा श्रगति, पराग्गति-लक्षणा विशुद्धा गति, गतिसमष्टिगर्भिता श्रागति, गतिसमष्टि गर्भिता गति, मेद से पाँच अवस्थाओं में परिणत होकर स्थिति, विशुद्धा आगति, विशुद्धा गति, स्थितिगर्भिता आगति, स्थितिगर्भिता गति भेद से परिचित हो रही है 1 । इन्हीं पाँच गतिभावों को विज्ञानभाषा में क्रमशः ' ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सोम, अग्नि ' नामों से व्यवहृत किया गया है । ' यदक्षरं पञ्चविधं समेति, युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति ' ( ऐतरेय आरण्यक ) इत्यादि ऐतरेय श्रुति के अनुसार पञ्चाक्षरमूर्ति यही अक्षरतत्व नियन्ता है, अन्तर्यामी है । इस पञ्चाक्षर विवर्त्त के अन्तर्यामी, सूज्ञात्मा - भेद से आगे जाकर दो विवर्त हो जाते हैं । त्र्यक्षरमूर्ति हृदयाक्षर अन्तर्य्यामी है, द्वयक्षरमूर्ति पृष्ठयाक्षर सूत्रात्मा है । अन्तर्य्यामी के आधार पर प्रतिष्ठित सूत्रात्मा ही अपने क्षरभाव से विश्व का उपादान १३२
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तृतीयखण्ड बनता है । ' तमिन्ह तस्थौ भुवनानि सर्वा ' का तस्मिन् अन्तर्य्यामी है, भुवनानि वस्तुभुवन की प्रतिष्ठा है । ‘ गृहह्णाति इति गर्भः ' निर्वचन से सर्वप्रतिष्ठा लक्षण हृदय सूत्रात्मा है । हृदय ही न्दसि ' से गई ही वेदभाषा में ' गर्भ ' रूप में परिणित हो रहा है । मायानन्तर बल ' ग ' है । ' हृ - ग्रहोर्भश्छ-इतर प्राणकोश प्रतिष्ठित हैं, एवं हृदयत्रल का यही संक्षिप्त स्पष्टीकरण है । उद्भूत इस हृदयचल में ही १ – १ – गतिसमनिः- - स्थिति: --- ब्रह्मा ( यम् २ – २ – अर्वाग्गतिः ——- आगतिः -३–३ – पराग्गतिः- - गतिः -- विष्णुः ( ह ) ( हृदयं अन्तर्यामी -- इन्द्रः ( द ) ४ – १ – स ० ग ० ग ० अर्वागूति- स्थितिगर्भिता आगतिः - सोमः ५ – २ – स॰ग॰ग॰परागूगतिः- स्थितिगर्भिता गतिः — अग्निः ( ३ ) —भूतित्रलम्— - पृष्ठं सूत्रात्मा प्रत्येक वस्तु में श्रादाननिबन्धन प्राणन एवं विसर्गनिबन्धन अपानन सौर दिव्यप्राण, पार्थिव भूतप्राण, दोनों प्राणों के सन्निवेशतारतम्य से व्यापार हुआ करता है । में ) दोनों प्राण प्रतिष्ठित हैं । सौर प्राण ' प्राण ' नाम से प्रसिद्ध है, उत्पन्न यही त्रैलोक्यगत पदार्थमात्र में ( प्रत्येक-पार्थिव प्राण ' अपान ' है, एवं यही अपानन व्यापार की प्रतिष्ठा है । प्राणनव्यापार प्राणन व्यापार का प्रवर्तक है । होता रहता है, यही पदार्थों की सम्भूति है । अपानन व्यापार से इन अवयवों से पदार्थावयवों का श्राविर्भाव इनका विनाश है । सम्भूति - विनाश - प्रवर्त्त ' के प्राणन पाननव्यापारसमन्वयावस्था का तिरोभाव होता रहता है, एवं यही है । त्रिना विनाश ( विसर्ग ) के सम्भूति का उदय असम्भव है । ही सम्भूतिलक्षण ' भूतिबल ' है । भृतिलक्षणा सम्भूति के गर्भ में श्रादानभावानुगता प्राणनव्यापारलक्षणा दान की प्रवृत्ति प्रदान पर ही अवलम्बित ननव्यापारलक्षणा विनष्टि, दोनों प्रतिष्ठित हैं । ग्राविर्भाव, तिरोभाव का समन्वय सम्भूति, एवं विसर्गभावानुमता अपा-मूलप्रतिष्ठा है । प्राणनापानन - स्वरूप आदान विसर्गात्मक भूतिचल जब तक ही भूतिलक्षणा सम्भूति की पदार्थों का सम्भूतिलक्षण विकास ( स्वरूपस्थिति ) है । जिस क्षण उभयात्मक पदार्थों में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक है, पदार्थ विशुद्ध विनाश का अनुगामी बन जाता है । उभयात्मक इस भूतिचल यह भूतिबल उच्छिन्न हो जाता में नानावस्था -- परिवर्तन हुआ करता हुआ है । के सम्बन्ध से ही प्रत्येक पदार्थ उदाहरण के लिए सूर्य को ही लीजिए । प्रातः सूर्य का आविर्भाव होता है, सायं निग्राभमूलक तिरोभाव है । यह तो हुई स्थूलदृष्टि । अत्र है, मध्यान्ह में युवावस्था क्षणावस्थापन्न प्रत्येक बल श्राविर्भाव - तिरोभावलक्षण भूतिबल से सूक्ष्मदृष्टि युक्त है से भूतिल का समन्वय कीजिए । हुआ, उत्तर क्षण में इसका तिरोभाव हुआ । पुनः उदय, पुनः तिरोभाव ॥ इसप्रकार पहिले बल नास्ति सुप्त अस्ति था, आविर्भूत नास्तिस्वरूप १३३
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मायभूमिका आविर्भाव तिरोभाव भूतिबल से क्षण - क्षण में प्रकान्त है । इसी भूतिबल के समन्वय से विश्व की सम्भूति हुई है । प्राणापानरूप इसी भूतिबल के समन्वय से विश्वात्मा विश्वविभूति का भोक्ता बना हुआ है । अपने इसा भूतिबल के सम्बन्ध से जीवात्मा पशुबल, विचत्रल, प्रजावल, जायाचल, आदि बलविभूतियों से युक्त होता हुत्रा पुष्टिमान् बन रहा है । भूतिबलाभात्र में पराभूति निश्चित है । और यही भूतिचल का संक्षिप्त निदर्शन है । ( ४ - ५ ) - पइबल एवं सूत्रत्रल— जिस बल के आधार पर शारीराग्नि में अन्नाधान होता है, दूसरे शब्दों में जिस हृद्य - विष्णु - अनुगत बलाकर्षण से प्राकर्षित अन्न शारीर अग्नि में बहुत होता है, यही बल ' अशं नयते ' निर्वचन से ' शनाया ' नाम से प्रसिद्ध है । ' अश ' अन्न है, इसे शारीराग्नि में पहुँचाने वाला बलविशेष ही अशनाया है । शनाया-बल ही लोकभाषा में ' बुभुक्षा ' ( भूम्य ) नाम से व्यवहृत हुआ है । प्राणकोशात्मक यह शनायाचल ' यज्ञ सूत्र ' मेद से दो भागों में विभक्त है । ' अन्नाद ' नाम से प्रसिद्ध शारीर अग्नि में जिस बल के द्वारा अन्न की आहुति होती है, शनायामूलक वही बल ' यज्ञबल ' है । जबतक हमारी अध्यात्मसंस्था में यह यज्ञबल प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक आहुत अन्न अन्नाद अग्नि में अन्तम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित होता रहता है । यज्ञबल के उच्छिन्न हो जाने पर श्राहुत अन्न का अन्नादाग्नि से अन्तर्य्याम सम्बन्ध नही होने पाता, अपच ( बदहजमी ) हो जाता है । इसका स्थायीरूप कालान्तर में श्रन्नादोत्कान्ति का कारण बन जाता है । जब तक खाया हुआ अन्न हजम होता रहे, तत्र तक मानना चाहिए कि, यज्ञचल सुरक्षित है । कुण्डाग्नि में पुरोडाश का श्राहित होना यज्ञबल है । शारी-राग्नि में अचाहिति होना यज्ञचल है, वस्त्र में रङ्ग का अहित होना यज्ञबल है । श्राहिति ही आहुति है । ( शत ० १० | ६ | २ | २ | ), आहुति ही यज्ञ है । यही विष्णुबल है । स्वस्थान में प्रतिष्ठित रहने वाला, श्रनाद में आहित अन्न ( भुक्तान्न ) का अन्नाद से अन्तर्थ्याम सम्बन्ध कराके दोनों के समन्वय से एक तीसरा पूर्व ( रक्षासङमांसादि लक्षण ) स्वरूप उत्पन्न करने वाला विष्णुमूलक स्थायी बल ही ' यज्ञचल ' है । अन्य देश में अवस्थित अन्न को अन्नादाग्नि में श्राहित करने वाला, गतिधर्म्मावच्छिच, अशनाया-मूलक जो आकर्षणचल है, बही ' सूत्रचल ' है । सूर्य्य इसी सूत्रबल से रश्मियों के द्वारा पार्थिव रसात्मक अन्न की अपने सावित्राग्नि में श्राहित किया करता है । भुवने आकर्षण लक्षण इसी सूत्रबल से विष्वद्वृत्तानुगत भूचक्र ( पृथिवी ) को नियतमार्ग ( क्रान्तिवृत्त ) पर परिभ्रमण करने के लिए विवश कर रक्खा है । एक पदार्थ दूसरे पदार्थ का भोग्य बनता हुआ जिस बलाकर्षण से परवश बन जाया करता है, भोग्यतालक्षण परवशता-सम्पादक, शनायामूलक, गतिशील, वही आकर्षणचल सूत्रचल है । स्थायी यज्ञचल, नायी सूत्रचल, दोनों की प्रतिष्ठा परम्परया साक्षात् विष्णु है, विष्णुशक्ति ही शनाया है । एक ही शनाया के स्थिति - गति मेद से उक्त दो विवर्त हो जाते हैं । इसी आधार पर हमनें दोनों का शनायाचलरूप से संग्रह कर लिया है । ( ६ ) - जायाबलम् -पदार्थ - स्वरूप को स्थूलरूप देने वाला, दूसरे शब्दों में पदार्थों को उत्पन्न करने वाला बलविशेष ही ' जायाबल ' नाम से प्रसिद्ध है । विजातीय बलों के चितिसम्बन्ध से ही वस्तु उत्पन्न होती है । बलों से साथ होने वाला सम्बन्ध यों तो असंख्य संख्या में विभक्त है । परन्तु इसके प्रधान १३ विभाग मानें गए हैं, जो १३४