Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 151–160

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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तृतीयखण्ड कि विज्ञानकाण्ड में - १ - अलक्षण, २ - विभूति, ३ - योग, ४ - बन्ध, ५- अमितवृत्तित्व ७ – श्रसङ्ग, ८ – समवाय, ६ - सन्धि, १० - दहरोत्तर, ११ - श्रोतप्रोत, १२ - महातिग्रह, १३ , - ६- श्रध्यूढ उदार ", इन नामों से प्रसिद्ध हैं । प्रकृत में इन तेरह सम्बन्धों में से चौथा ' बन्ध ' नामक सम्बन्ध ही अभिप्रेत है बन्धनलक्षण, पूर्वस्त्ररूपोपपादक अन्तम सम्बन्ध ही ' बन्ध ' सम्बन्ध है । इसी को यज्ञपरिभाषा । प्रन्थि- में ' चितिसम्बन्ध ' कहा गया है । दार्शनिक भाषा में यही सम्बन्ध ' संसृष्टि ' किंवा ' सृष्टि ' नाम से विजातीय अनेक बल परस्पर एक दूसरे में बहुत होते हुए, अपने पूर्वस्वरूपों का प्रसिद्ध है | जिस सम्बन्ध के सहयोग से तीसरे पूर्व स्वरूप में परिणत हो जाते हैं, रासायनिक - सम्मिश्रणमूलक परित्याग करते हुए ‘ चिति ' कहलाया है । संसृष्टिलक्षण सम्पूर्ण सृष्टिविवर्त्तो का मूल प्रवर्तक यही चितिसम्बन्ध है | वही सम्बन्ध सोरा - कोयला समन्वित होकर इसी सम्बन्ध से ' आरूद ' नामक अपूर्व सृष्टिरूप में परिणत संसृष्टिलक्षण इसी चितिसम्बन्ध से योगाप्राणप्रधान सौम्य शुक्र, तथा नृपाप्राणप्रधान आग्नेय हो रहे हैं । पूर्वरूपों का परित्याग कर अपत्यरूप में परिणत होते हैं । इसप्रकार जिस हृद्प्रन्थिलक्षण चितिबल शोखित, दोनों परम्पर भन्थिबन्धन होता है, उस चितिचल का मूलाधार चल ही ' जायाचल ' कहलाया से बलों का चितिचल को प्रेरणा मिलती है । चितित्रल की प्रेरणा से जायाचल की सीमा में वस्तु है । जायाचल से उत्पन्न होती है । जाया ही जनन की अधिष्ठात्री है, अतएव ' यदस्यां जायते ' निर्वचन से इसे ' जाया ' कहना ग्रन्वर्थ बनता गर्भाशय में वृत्राप्राणप्रधान शोणित का प्राधान्य है । इस शोणिताग्नि में योषाप्राणप्रधान है । स्त्री के सोम की आहुती होती है । शुक्रशोणित का ग्रन्थिबन्धन स्त्री के शोणित में प्रतिष्ठत जायाचल पुरुष के शुक्रामक होता से, अतएव स्त्री को ' जाया ' कहा जाता है । इसी जायाचल के अनुग्रह से हृद्ग्रन्थिलक्षण के आधार पर के द्वारा हृदयस्थ प्रज्ञान मन में काम तपः - श्रम नामक सृष्टयनुबन्धों का उदय होता है । इसी जायाचल चितित्रल से प्रज्ञानप्रतिष्ठित विज्ञान में काम वीर्य्य - शुक्रत्रयी का आविर्भाव होता है । इसी जायाबल की अक्षरानुगृहीत पारमेष्ठथ महानात्मा में काम क्रिया- श्रावरण, दूसरे शब्दों में काम - विक्षेप प्रेरणा से विकास होता है । निदर्शन मात्र है । सम्पूर्ण मैथुनी सृष्टि का मूलोपादान मुब्रह्म लक्षण, सुवेदमूर्त्ति - आवरणत्रयी का मूर्ति ) यही जायाचल है, जिसकी मूनोपनिषद् भृग्वङ्गिरोमय पारमेष्टय प्तत्त्व माना गया है - ( देखिए ( गो अथर्ववेद- ० ब्रा० पू ० १ | १ | ) । ( ७ ) -धाराबलम् -बतलाया गया है कि, चल प्रतिलक्षण - विलक्षण अवस्थाओं से क्षण - क्षण में परिवर्तनशील है । क्षणिकचलों का परस्पर सम्बन्ध सर्वथा अनुपपन्न हो जाता, यदि एक विशेषचल इनके मूल में प्रतिष्ठित इन न होता तो । जिस विशेष बल के सम्बन्ध से क्षणिक बलों का धारावाहिक रूप विशेषचल ' धाराबल ' नाम नाम प्रसिद्ध हैं, जिसे दूसरे शब्दों में ' सन्तानवल से ' सम्बन्ध भी उपपन्न है, वही धाराचल से बलसंघातलक्षण पदार्थ बलों के स्वाभाविक क्षणधर्म के नित्य विद्यमान कहा रहने जाता पर भी है । स्थिर इसी प्रतीत होने लगते हैं । गाङ्ग यतोय प्रसिक्षण में श्राविर्भाव - तिरोभाव धम्मों से परिवर्तित है । प्रथम विद्यमान गङ्गातोय उत्तरक्षण में विलीन है । फिर भी ' गङ्गा ' रूप से समूहालम्बनलक्षण क्षणमें एकत्र है । उत्पत्ति - स्थिति - विनाश, रूप से प्रतिक्षण विलक्षण तत्तत् पदार्थस्थिति धारावल के । अनुग्रह प्रत्यभिज्ञा से सुरक्षित अभिन्न १३५

पृष्ठ 152

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मायभूमिका प्रतीत होती है । भोजन, गमन, शयन, पठन, इत्यादि क्रिएँ ( प्रत्येक किया ) अभिक्रम- प्रक्रम सम्बन्ध से असंख्य कियाओं का कूटरूप एक एक व्यूहन है । स्वस्वरूप से इस क्रिया का संघातलक्षण व्यूहन असम्भव है । क्योंकि उत्तरोत्तर क्षणों में पूर्व- पूर्व किया का विलयन है । फिर भी भोजन - गमनादि व्यूहात्मिका क्रियाएँ एक - एक किया मानी जा रही है । यह इसी धारावल - सम्बन्ध की महिमा है । इसी धारावज्ञ का दार्शनिक भाषा में स्पष्टीकरण करते हुए प्राचीनों ने कहा है— गुणभृतैरत्रयणैः समूहः क्रमजन्मनाम् । बुद्धया प्रकल्पिताभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते ॥ ( बाक्यपदी ) । एक सरोवर में ऊपर तक पानी भर दीजिए । साथ ही विरुद्ध दिशाओं में दो मार्ग ( मोरी ) समाना-कार वाले बना दीजिए । एक से समानमात्रा में पानी निकलने दीजिए, दूसरे मार्ग से समानमात्रा में पानी आने दीजिए । इस समानमात्रागमन - निर्गमन से आप को सरोबर का पानी स्थिरवत् प्रतीत होगा, और यह भी धारावल का एक अनुगत उदाहरण माना जायगा । इस धारावल की मूलोपनिषत् भी भृग्वङ्गिरोमय पारमेष्ठ्य अपतत्त्व ही मानी गई है । ( ८ ) - आपोबलम् -' समूहः क्रमजन्मनाम् ' – गुणकूटो द्रव्यम् ' इत्यादि के अनुसार प्रत्येक पदार्थ असंख्य बलसमष्टिलक्षण है । साथ ही यह भी निर्विवाद है कि, पढार्थस्वरूपसम्पादक ये बल पृथक् - पृथक् रहते हुए अपनी क्षररूपता का समर्थन कर रहे हैं । बालुका - राशि का प्रत्येक बालुका पृथक - पृथक है । टीक यही स्वरूप इभ क्षरात्मक बलों का है । सर्वथा विभक्त, विजातीय- सजातीय, इन नाना बलों को हृदयस्थ श्रात्मानुयोगिक बना कर इन सत्र पर एकरूप से ब्याप्त होने वाला बल विशेष ही ' आपोबल ' है । प्रत्येक वस्तु के शक्ति, वीर्य्य, गुण, प्रभाव, पराक्रम, पांचों बल भिन्न भिन्न हैं । प्राणात्मक इन पाँचों बलों को स्व स्वरूप में एकत्र प्रतिष्ठित रखने वाला, ब्यासज्यवृत्ति से सब पर व्याप्त रहने वाला आप्तिलक्षण बल ही आपोबल है । जिस पुरुष की आध्यात्मिक संस्था से श्रापोबल उत्कान्त हो जाता है, उसके उक्त पांचों बल शिथिल हो जाते हैं । उत्साह, धैर्य्य, शक्ति, पराक्रम, आदि की प्रतिष्ठा यही श्रापोवल है । प्राणात्मक यह पारमेष्ठ्यबल सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एकरूप से व्याप्त है, अतएव ' यदाप्नोत् ' इस निर्वचन से श्रुति में ' आप ' नाम से सम्बोधित हुआ है । आप भ्रमण करते हुए जा रहे हैं । चलते चलते आप थक जाते है । थकान का अर्थ यही है कि, आध्या-त्मिक आपोबल के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला गतिधर्म्मा शारीर प्राण अधिक मात्रा में खर्च हो जाता है । गतिधर्म्मा प्राण के निर्वार्य बन जाने से आगे चलना अशक्य हो जाता है । विश्राम के लिए कहीं चैट जाते हैं । सर्वव्यापक वही प्राणात्मक श्रापोवल शरीर में प्रविष्ट होता हुआ श्रान्त- शरीरावयवों को सचल बना देता है, पुनः गमन प्रकान्त हो जाता है । अध्यात्म - अधिभूत- अधिदैवतादि भेद से यह प्रपोजल अनेक संस्थाओं में विभक्त हो रहा है । इस प्रपोजल की उपनिषत् भी भृग्यङ्गिरोमय पारमेष्ठ्य पूतत्त्व ही माना गया है । ' जाया, धारा, आप: ' तीनों बल यदि एक ही क्षरभाग में समन्वित हो जाते हैं, तो वह क्षरद्रव्य ' अपद्रव्य ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । अपद्रव्य जाया - धारा - प्रपोजल के ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध से १३६

पृष्ठ 153

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aatmars उद्भूत है । यही कारण है कि, पानी में तीनों बलकर्म्म उपलब्ध हो रहे हैं । सिञ्चनक से जायाभाव का प्रत्यक्ष है । धारात्त्व स्फुट है, प्रति भी प्रत्यक्ष है । सत्यपिण्ड की भाँति पानी नियत स्थान पर न रह कर अपने ग्राप्तिधर्म्म से ग्रासमन्तात् व्याप्त हो जाता है । साथ ही लोकसृष्टिरूप से भी यह अपने प्राप्तिधर्म्म'-जायाधर्म्म - धाराधम्मों का स्पष्टीकरण कर रहा है । निम्नलिखित गोपथवचन पूतस्व में प्रतिष्ठित आपोमयी इस चलत्रयी का भलीभांति विश्लेषण कर रहा है— ' आभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि, जनयिष्यामि, आप्स्यामि, धारा - जाया-तद्- - ' आपः – अभवत् । तद्धाराणां जायानां, अपां - धारावं, जायात्वं, अपत्त्वम् ' । ( गो ० ब्रा ० पू ० १ / २ / ६ / १०।११ । ) । ( ९, १०, ११, ) – सत्य, यज्ञ, अभ्व - वलानि -· सत्य - यज्ञ - अभ्व, इन तीनों बलों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध माना गया है । तीनों में सत्य - बल आधार है, यज्ञ - श्रभ्व - चल आधेय हैं । मनः प्राणगर्भिता, अर्थप्रवर्त्तिका, सत्या नाम से उपस्तुता, नित्या वाक्तत्त्व से समतुलित वाक् - लक्षण श्रात्मशब्दात्मक अपौरुषेय, नित्यकूटस्थ, तत्त्वात्मक, त्रयीवेद ही ' सत्यबल ' है, जिसका पूर्वप्रकरण में विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है । क्योंकि आधारभूत ' वेदाः सत्यम् ' चल ऋक्साम-यजुर्भेद से त्रिकल है, अतएव इस पर प्रतिष्ठित यज्ञ, अभ्व बलों के भी तीन तीन विवर्त्त हो जाते हैं । वेदसत्य के तीन पर्वों में से ऋक्साम आयतनमात्र हैं, ब्रह्माग्निलक्षण यजुःपुरुष ही मुख्य सत्य है । ' सहृदयं सशरीरं सत्यम् ' ही सत्यतत्त्व का वैज्ञानिक लक्षण है । ब्रह्माग्निलक्षण यजुः पुरुष सहृदय है, यज्ञ, और प्रभ्वबल इसके शरीरस्थानीय हैं । अतएव यज्ञाभ्वयुक्त त्रयीवेद को अवश्य ही उक्त लक्षणानुसार ' सत्य ' कहा जा सकता है । इस सत्यबल की प्रथम विकासभूमि ' स्वयम्भूलोक ' है । अतएव यह लोक ' सत्यलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । स्वयम्भूलोक ब्रह्माक्षर के अनुग्रह से ब्रह्ममूर्ति बन रहा है । ' ते हैते - ब्रह्मणो महती अभ्वे, महती यज्ञे ' के अनुसार अभ्व, और यक्ष वेदमूर्ति इसी स्वयम्भू ब्रह्म की महा त्रिभीषिका है । यजुः का वास्तविक स्वरूप ‘ यज्जू: ' बतलाया गया है । यत् भाग प्राण है, जूभाग वाक है । प्राण वायु है, वाक् ग्राकाश है । स्वायम्भूत्र यह वेदाकाश परमव्योम, परमाकाश, श्रादि नामों से प्रसिद्ध है, एवं यत् - लक्षण प्राण ' परोरजा ' नाम से प्रसिद्ध है । यह बेदात्मक प्राणसत्य यक्षरूप विश्वसत्य से श्रावृत होकर ही विश्व का उपादान बनता है । यक्षावच्छिन्न इसी प्राणसत्य से, जिसे हम ग्रात्मसत्य भी कह सकते हैं, नाम - रूप - कर्म का विकास हुआ है । सत्यलक्षण, अमृतधर्म्मा यह वेदप्राण सर्वालम्बनभूत, पञ्चकोशात्मक व्ययपुरुष से अविनाभूत है । पञ्चकोशात्मक व्ययपुरुष का मनः - प्राण - वाङ्मय सत्ताभाग सृष्टि - साक्षी है । इसके सम्बम्ध से वेदात्मक, किंवा वेदरूप सत्यप्राण भी मनः - प्राण - वाङ्मय बन रहा है । मनःप्राणवाङ्मय, वेदमूर्त्ति, इस परोरजा प्राण के प्राणगर्भित - मनोभाग से रूप का, प्राणगर्भित प्राणभाग से कर्म्म का, एवं प्राणगर्भित वागूभाग से नाम का विकास हुआ है । त्रिमूर्ति, अमृतसत्यात्मक परोरजाप्राण की तीनों कलाओं से उद्भूत नाम - रूप-१३७

पृष्ठ 154

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भाष्यभूमिका कम्र्म्मात्मिका मृत्युत्रयी ही ' यज्ञचल ' है । नामरूपकम् समष्टिलक्षरण यक्ष विश्वरूप सत्य है । इस सत्य का भी सत्य त्रिमूर्ति वह परोरजाप्राण है । त्रिः सत्यात्मक इसी अमृतप्राण का निम्नलिखित श्रुति स्मृत्तियों से स्पष्टीकरण हुआ है— १ – तदेतत् त्रयं सदेकमयमात्मा । आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्रयम् । तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नम् । प्राणो वा अमृतम् । नामरूपे सन्यम् । ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ” ( शत ० १४ । ५ । १ । ३ । ) ।

२ - सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये ।

सत्यस्य सत्यं ऋतसत्यनेत्रे सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥

-- श्रीमद्भागवत अमृतसम्पत्ति से सल्लक्षण बने हुए प्राण सत्य से, एवं मृत्युसम्पत्ति से असल्लक्षण बने हुए नामरूप-कर्म्मात्मक यक्षत्रल से, दोनों से विलक्षण ( सदसद्विलक्षण ), इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध कराने वाला जो एक अनिर्वचनीय बल है, वही तीसरा ' अभ्वबल ' है । नाम, रूप, कर्म्म, इन तीनों का प्रत्येक पदार्थ में जो परस्पर भेद प्रतीत हो रहा है, वह मृत्युमुलक है । ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' के अनुसार नानात्वलक्षण भेद अवश्य ही मृत्युनिबन्धन है । अमृतप्राण के श्राश्रित नाम - रूप - कर्म को भेद प्रतीति का प्रवर्त्तक बनने वाला एतल्लक्षण जलविशेष ही यक्षबल है । एवं कुछ न होकर भी रात्रि -तम- दिक-देश - काल - संख्या - परिमाण - यांग - विभाग - संयोग - पृथक्त्व - परत्त्व - अपरत्त्व, आदि भातिसिद्ध पदार्थ जिस सदसद्विलक्षण बलविशेष के अनुग्रह से व्यवहारकोटि में प्रविष्ट हैं, दूसरे शब्दों में जो केवल भातिसिद्ध पदार्थों का अवलम्बन बन रहा है, वही ' अभ्ववल ' है । सम्पूर्ण विश्व समष्टि, एवं व्यष्टिरूप से उभयथा सत्य - यक्ष-अभ्व - त्रयी का समन्वयमात्र है । ( १२ ) मोहबलम् – अभ्वबल का विकास ही मोहबल है । जो न होकर, दूसरे शब्दों में अभाववत् होकर भावात्मना प्रतीत होता है, वही मोल है । इस बल की प्रेरणा से असत्य पदार्थ भी सत्य प्रतीत होने लगते हैं । रज्जु में सर्प की प्रतीति, शश में शृङ्गप्रतीति, वन्ध्यापुत्र की प्रतीति, खपुष्प प्रतीति, शुक्ति में रजत की प्रतीति, मरीचिका में तोय की प्रतीति, ये सत्र भ्रान्त प्रतीतियाँ है, असत् - प्रतीतियां हैं, यही अभ्वमूलक मोह है । अविद्या के साथ विद्या का सम्बन्ध हो जाना ही अध्यास है, यही अध्यास मोह है । इस मोहल के अनुग्रह से असंभावित पदार्थ भी सम्भव कोटि में आ जाते हैं । जिस अविद्याबल के उद्रेक से जीवात्मा का विद्यालक्षण ज्योतिर्भाग श्रावृत हो जाता है, अविद्याबलात्मक विषयों से उत्पन्न, तमोभावमूलक वह वासना संस्कार ही मोह है । नामरूपकर्मात्मक यक्ष के सहयोगी भातिभावप्रवर्त्तक अभ्व को मूल बनाने वाला अनुकूलसम्बन्धमूलक राग, एवं प्रतिकूल सम्बन्धमूलक द्वेष ही मोह की मूलोपनिषत् मानी गई है । यही — ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुयन्ति जन्तवः ' के अनुसार दुःखप्रवृत्ति की भी मूलोपनिषत् बन रहा है । १३८

पृष्ठ 155

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तृतीयखण्ड ( १३, १४, १५, ) - वय योनाथ -वन - बलानि ज्ञानीयजगत् में भासित होने वाले पदार्थमात्र वय, वयोनाध, एवं वयुन की समष्टि है । ज्ञान में उपलब्ध वस्तु वयुन है | इस वयुन में वय- वयोनाध प्रतिष्ठित है । गुण - कर्म्ममय वस्तुतत्त्व वय है, वस्तुतस्व को सीमित बनाने वाला, आकारविशेषप्रदान करने वाला आयतन वयोनाध है, जो याज्ञिक परिभाषानुसार ' छन्द ' नाम से व्यवहृत हुआ है । वयोनाघलक्षण छन्द, और छन्द से छन्दित वयलक्षण वस्तुतत्त्व, दोनों को एक सूत्र में बद्ध रखने वाला, दूसरे शब्दों में वय का बयोनाथ के साथ सम्बन्ध कराता हुआ वय - वयोनाधात्मक द्विपर्वा-पदार्थ पर समान रूप से व्याप्त रहने वाला तत्त्व ही वयुन है । इन तीनों चलों में वयुन - चल ही प्रधान है । अतएव वयुन के ग्रहण से वय - वयोनाघ दोनों का संग्रह हो जाता है । वय सदा एक रहता है, परन्तु वयोनाध बदलता रहता है । इस वयोनाथ ( छन्द - ग्राकार ) के परिवर्तन से वह एकरूप वय भिन्न भिन्न नाम - रूप धारण कर लेता है । एक ही आपोद्रव्य ( पानी ) केवल आयतन रूप वयोनाध ( छन्द ) भेद से सर, पुष्करिणी ( पोखर ), नदी, समुद्र, वापी, कूप, तड़ाग, आदि विविध नाम - रूपों में परिणत हो रहा । इस वयोनाध के अनुग्रह से एक ही ब्रह्म ( क्षर ) विविध भावापन्न विश्वरूप में परिणत हो रहा है । भेदस्वरूपसमर्पक वयोनाधत्रल से नित्य वेष्टित वयचल स्त्ररूपाधायक, विशेषक, श्रौत्पातिक, स्वयंसिद्ध, परिपन्थी, इन पाँच प्रकार के बलग्रामों से युक्त रहता है, जिन बलग्रामों का ब्रह्मविज्ञानादि स्वतन्त्र निबन्धों में विस्तार से निरूपण हुआ है । ( १६ ) — विद्याबलम् — पूर्वप्रतिपादित मायादि १५ हों बल अविद्याप्रधान बनते हुए ' अविद्याचल ' नाम से संग्रहीत है | विद्याप्रधान इन १५ माया - जाया - धारादि बलग्रन्थियों से सृष्टि की प्रकृत्ति होती है । अतएव इन्हें हम ' प्रवत ' कवल ' नाम से व्यवहृत करेंगे । जिस बलविशेष से इन अविद्यात्रल - ग्रन्थियों का विमोक होता है, मुक्तिप्रवर्तक, वही निवर्त्त'क चल ' विद्यावल ' नाम से प्रसिद्ध है । ईश्वरपुरुष पञ्चदश बलात्मक अविद्याबल, विद्यात्रल, दोनों से युक्त है । आनन्द - विज्ञान - मनोमय पुरुष विद्याप्रधान है, मनः प्राणवाङ्मय पुरुष अविद्या-प्रधान है | पञ्चदश अविद्याबलों से पुरुष का विद्या भाग उपकृत है, विद्याबल से पुरुष का विद्याभाग उपकृत है । ईश्वरपुरुष निष्कामकर्म्म करता हुआ भी अविद्याबन्धन से मुक्त रहता है । क्योंकि उसमें विद्या - विद्या, दोनों समतुलित हैं । ठीक इसके विपरीत काम्य कम्मों में लिप्त रहने वाला जीवपुरुष प्रज्ञापराध से अस्मितादि दोषों का संग्रह कर इनसे आत्मा के विद्याभाग को उत्तेजना देता हुआ अविद्याभाग-प्राधान्यप्रवृत्ति का कारण बन जाता है । अतएव इसका आत्मविद्याभाग मेघाच्छन्न सूर्य्यवत् श्रावृत रहता है । अतएव च आध्यात्मिक संस्था में दुःख, भ्रान्ति, ऊमि, अवस्था, आदि पाप्माओं का साम्राज्य बना रहता इन्हीं षोडश कोशबलों का संक्षेप से स्पष्टीकरण करते हुए आचार्य ने कहा है-१ – अनेककरणी – ' माया " मित्यानेकत्वसम्भवः | अवान्तरव्यवच्छेदादेको नानात्वमश्नुते ॥ १३६

पृष्ठ 156

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भाष्यभूमिका

२ – जन्मप्रदायिनी – ' जाया " सत्तान्वितवले वलम् ।

निचाय्य धत्त े सत्तायां कृत्वा सत्ता प्रदात् पृथक् ॥

३ – प्रवाहकारिणी ' धारा " सन्तानयति गच्छतः ।

गति - स्थित्योः समं योगं या प्रयोजयतेऽद्भुतम् ॥

४ - ऋत-- ' मापो " बलात् सिद्ध, सत्यं ' हृदयतो " बलात् ।

द्विधैवेदं जगत् सर्व ऋतं वा सत्यमेव वा ॥

५ – विचं, पशुः, प्रजा, गात्रं, वेदा, एभिर्हि पञ्चमिः ।

अभिवृद्धि – ‘ भूति ” बलात् गात्रवृद्धिद्रमाङ्क ुरः ॥

६ – भोक्तारमभि भोग्यार्थोपसत्ति ' र्यज्ञ ” मूलिका ।

स्थिरे भोग्ये तु या भोक्तु क्रान्तिः ' सूत्र ' मस्ति तत् ॥

७ – बाचः प्राणस्य मनसो नाम्नि रूपे च कर्म्मणि ।

अभियोगोऽस्ति तत् ‘ सत्यं - ' पक्षं " रूपादि भक्तयः ॥

८ – बलानामसतामेषां मृत्यूनाममृते रसे ।

अपृथक्त्वमभेदो यस्त – ‘ दभ्व ” बलदर्शनम् ॥

६ - अभावो भाववद् भाति मिथ्यार्थे सत्यताग्रहः ।

सोऽध्यासो - ' मोह ' " एकत्वं यदत्यन्तविरुद्वयोः ॥

१० - ज्ञाने विषयसंसर्गो विपयाकारिताधियः ।

' वयुनं " विषयाणां वा धिया त्यागपरिग्रहौ ॥

११ – द्रन्याणि गुणकर्म्माणि मात्रावन्ति विभान्ति नः ।

तद्- ' वयो " याश्च तन्मात्राः स ' वयोनाघ " इष्यते ॥

१२ – इत्थं पञ्चदशैतानि बलान्यन्योऽन्यमीरते ।

विद्या पञ्चदशी, ' विद्या ' " तत् प्रतिबन्धना ॥

( श्रीगुरुप्रणीत ब्रह्मविज्ञान - निर्विशेषानुवाका ) १४०

पृष्ठ 157

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तृतीयखण्ड १ - विद्य । ( १ ) ( १ ) - माया ( १ ) ( ६ ) - हृदयम् ( १ ) ( १० ) - सत्यम् ( १ ) ( १४ ) -वयः ( १ ) ( ३ ) -जाया ( २ ) ( ७ ) -भूतिः ( २ ) ( ११ ) -यक्षम् ( १ ) ( १५ ) - वयोनाधः ( २ ) केवलमन्यत् इति ( ४ ) -धारा ( ३ ) ( ८ ) - यज्ञः ( ३ ) ( १२ ) -अभ्वम् ( ३ ) | ( १६ ) - वयुनम् ( ३ ) ( ५ ) - आप: ( ४ ) | ( ६ ) -सूत्रम् ( ४ ) ( १३ ) - मोहः ( ४ ) इति सत्रीचीनानि त्रीणि-इति सी चीनानि इति सभीचीनानि इति सध्रीचीनानि अन्यानि चत्वारि - अन्यानि चत्वारि अन्यानि चत्वारि - अन्यानि १ ४ ४ ४ ३ १६ – ' पोडशकलं बलं वा इदं सर्गम् ' । ११ – प्रविविक्तब्रह्म विवर्त्ता-— परिच्छिन्न ईशप्रजापति के बलभाग से सम्बन्ध रखने वाले १६ बलकोशों का संक्षिप्त स्वरूप बतलाया गया । अत्र रसभागानुगत षोडश भावों का संक्षेप से स्पष्टीकरण किया जाता है । विश्वातीत्, सर्वत्रलविशिष्ट -रममूर्तिः पगत्पर को हमनें व्यापक कहा है । इस व्यापक परात्पर के यत् किञ्चित प्रदेश में सर्वप्रथम ' मायात्रल ' का उदय होता है । जितने प्रदेश में उदित मायाबल व्याप्त रहता है, वह मायी परात्पर - प्रदेश ( मायामित-प्रदेश ) ' अव्ययपुरुष ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । विश्वातीत, श्रमायी परात्पर असीम बनता हुआ * ' रेखा ' परपर्य्यायक ' लेखा ' रूप मायापुर से विरहित रहता हुआ परात्पर था, पुरुषमर्यादातिकान्त था, परन्तु आज वही ( अपने यत्किञ्चित् प्रदेश से ) मायामय लेखात्मक पुर में सोमित हो, अपना व्यापक स्वरूप खोता हुआ ' पुरि शेते ' निर्वचन से ' पुरुष ' अभिधा का पात्र बन रहा है । यद्यपि " परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ” ( मुण्डको ०३।२।८ । ) इस उपनिषच्छ्र ुति के अनुसार परात्पर भी पुरुष शब्द से व्यवहृत होता देखा गया है, तथापि इस श्रुति के ' परात्पर ' से विश्वातीतपरात्परका ग्रहण न कर विश्वात्मलक्षरण परात्पर का ग्रहण करते हुए * " लेखा हि पुरम् " ( शत ०६ | ३ | ३ | २५ | ) | १४१

पृष्ठ 158

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भाष्यभूमिका विरोध परिहार कर लेना चाहिए । विज्ञानपरिभाषा में अव्ययपुरुष के लिए ' पर ' सङ्केत है । यह परतत्त्व ( श्रव्ययतत्व ) ईश्वराव्यय, जीवाव्यय, भेद से ( महामाया, योगमायानुबन्धों से ) दो विवर्त ' भावों में परिणत रहता है । मुक्तिदशा में अपनी आध्यात्मिक अक्षरादि कलाओं का श्राधिदैविक अक्षरादि कलाओं में विलयन करता हुचा जीवाव्यय सर्वान्त में ईश्वराव्यय में लीन हो जाता है, जैसाकि - ' परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ' ' मुण्डक • ३ | २ | ७ | ) इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । टीक इसी स्थिति का ' परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ' इस श्रुति से समर्थन हुश्रा है । जीवाध्यय पर है, इस पर की ( जीवाव्यय की ) अपेक्षा वह पर ( ईश्वराव्यय ) पर है, उत्कृष्ट है, एकमात्र इसी हेतु से श्रुति नें ' परात्परः ' ( जीवाव्ययात् उत्कृष्टः ) इस निर्वाचन के अाधार पर ईश्वराव्यय को ' परात्पर ' शब्द से व्यवहृत कर दिया है । अव प्रश्न रह जाता है, विश्वातीत ' परात्पर ' शब्द के निर्वचन का । उसका समा-धान अनुपद में ही होने वाला है । १२ – श्वोवसीयस - ब्रह्म— -बतला रहे थे कि, परात्पर का मायावच्छिन्न प्रदेश ' पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । रसत्रलात्मक परात्पर केशरूप पुरुष में भी रस बल के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? 1 रस अमृत है, सत् है । बल मृत्यु है, असत् है । गीतापरिभाषानुसार ' अ ' शब्द से व्यवह्रियमाण अव्यय पुरुष रसचलात्मक बनता हुआ अमृत - मृत्युमय है, सदसन्मूर्ति है, जैसाकि - " अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन! ” इत्यादि गीतावचन से प्रमाणित है । मायावच्छिन्न, रसनलरूपेण द्विकल, अव्ययपुरुष की यह प्रथमावस्था श्राविज्ञान में ' मन ' ( श्वोवसीयस्, किंवा श्वोक्स्यस् नामक अव्ययमन ) नाम से प्रसिद्ध है । ' उभयात्मकं मनः ' सिद्धान्तानुसार यह श्रव्ययमन रस - क्लात्मक है । मनोमय, उभयात्मक, यह श्रव्ययब्रह्म ही प्रवर्तक बल का अनुगामी बनता हुआ काम – तपः - श्रम - नामक सृष्टिकम् के सामान्य अनुबन्धों से उत्तरोत्तर वसीयस् बनता हुआ विश्व का श्रालम्बन बनता है । अतएव इसे ' श्वः श्वः वसीयान् ' - निर्वचन से श्वोवसीयस्, एवं तैत्तिरीय श्रुति के अनुसार ' तदेतच्छ्वोषस्य सं ब्रह्म ' ( तैत्तिरीय ०२ | २ || १० | ) इत्यादि रूप से श्वोवम्यस् नाम से व्यवहृत किया गया है । जो तत्त्व अपरिच्छिन्न होता है, उसमें हृदयबल का ( केन्द्रसम्पत्ति का ) अभाव है । इसीलिए अपरिच्छिन्न विश्वातीत परात्पर केन्द्रसम्पत्ति से वञ्चित था । श्रतएव च उसमें कामना - व्यापार का प्रभाव था, और इसीलिए वह काममूल- विश्वसर्ग - मर्य्यादा से पृथक था । क्योंकि कामना मानस व्यापार है, ' हृन्प्रतिष्ठं यदजिञ्जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' ( यजुः सं ० ३४ ६ ) । इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार मन की प्रतिष्ठा हृदय माना गया है । परात्पर में जब हृदय का ही विकास नहीं, तो काममय मन का स्वरूप कत्र सम्भव है । इधर अव्ययपुरुष मायासी मानुग्रह से सकेन्द्र है । श्रतएव तत्प्रतिष्ठ रसचलात्मक मन काम - व्यापार में समर्थ है । * चार - पाँच स्थलों को छोड़ कर गीतोक्त ' श्रस्मच्छन्द ' ( अहं ) सर्वत्र एकमात्र अव्ययपुरुष का ही वाचक है, जैसा कि गीताविज्ञानभाष्यान्तर्गत श्राचार्यखण्ड के ' गीताकृष्णरहस्य ' नामक प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । १४२

पृष्ठ 159

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१३ - पञ्चगतिसमष्टि लक्षण अक्षरब्रह्म-किसी विशेष रहस्य को लक्ष्य में रख कर ही ऋषियों नें केन्द्रबिन्दु को ' हृदय ' नाम से व्यवहृत किया है । मायालोदय के अनन्तर, मायावलोय के अव्यवहितोत्तर - क्षण में ही उदित होने वाला सब से पहिला बल यही हृदयत्रल है । गतितत्त्व ही इस हृदयत्रल का मौलिक स्वरूप है । यह गतितत्त्व ही स्थिति, गति, आगति, रूप से तीन स्वरूपों में परिणत होता हुआ ' हृदय ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । गतिसमुच्चय ही स्थिति है | आप जितनें भी स्थितिभावयुक्त पदार्थ देख रहे हैं, विश्वास कीजिए — वे एक ही समय में, एक ही क्षण में चारों ओर गतिमान् बन रहे हैं । यदि उसमें से किसी ओर की गति निकल जाती है, किंवा निकाल दी जाती है, तो वह पदार्थ उस दिकू से विरुद्ध दिकू में चल पड़ता है । समानबलशाली दो मल्लों के द्वारा विरुद्ध दिग्द्र्य में आकर्षित रज्जु स्थितिभाव में परिणत होती देखी गई है । दो विरुद्ध दिगूगतियों के एकत्र निपात से ही यह स्थितिभाब उत्पन्न हुआ है । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि, सर्वतोदिग्गतिसमन्वय का, अथवा कम से कम विरुद्धदिग्द्रयगतिसमन्वय का ही नाम ' स्थिति ' है । फलतः स्थितितत्त्व का पर्य्यवसान गतितत्त्व पर ही मानना पड़ता है । गतिसमष्टिलक्षण । यही स्थिति ' ब्रह्मा ' है, यही मूल प्रतिष्ठा है । हृदय ( केन्द्र ) से प्रधि ( परिधि ) की ओर अनुगत रहने वाली गति ' गति ' है, यही उत्क्रान्ति है, यही चलकृति है । ' या च का च बलकृतिरिन्द्रकम्मैव तत ' ( यास्क निरुक्त ) के अनुसार यही चलकृतिलक्षणा, किंवा परागूगतिलक्षणा गति इन्द्र है । एवं प्रधि से केन्द्र की ओर अनुगत रहने वाली, अर्वागूगतिलक्षणा गति ' गति ' है, यही विष्णु है । इसप्रकार एक ही गतितत्त्व अवस्थाभेद से स्थिति - गति - ग्रागति - लक्षण ब्रह्मा - इन्द्र - विष्णु - रूप में परिणत हो रहा है । अर्वागतिलक्षण विष्णुतत्त्व प्रागतिधर्म्म से अन्नाहरण करते ' हुए पालक बन रहे हैं, परागूगतिलक्षण इन्द्रतत्त्व गतिधर्म्म से विक्षेपण करते हुए संहारक बन रहे हैं । दोनों का नियमन करने वाले स्थितिलक्षण ब्रह्मा स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होकर सर्जन कर रहे हैं । तीन देवता नहीं है, एक ही देवता की, एक ही तत्त्व ( गति ) की तीन अवस्थाविशेष है - " एका मूर्त्तिस्त्रयो देवा ब्रह्म - विष्णु - महेश्वराः ” । स्थित्यादि तीनों भावों में ' गति ' तत्त्व ही प्रधान है । क्योंकि गति ही तीनों का उदर्क ( अन्तिम अवस्था - परिणाम ) है । अतएव विशुद्ध गतिलक्षण इन्द्र श्रेष्ठ, प्रोजिष्ट, बलिष्ट माने गए हैं । पुराण-शास्त्र के ये ही शिव - देवता हैं । पुराण ने ' महादेव ' सम्बोधन के द्वारा इनकी श्रेष्ठतादि का समर्थन किया है । आगतिलक्षण विष्णु इन्द्र से अवर कक्षा में प्रतिष्टित, अतएव ' उपेन्द्र ' - ' इन्द्रावरज ' आदि नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । साथ ही ‘ ' इन्द्र - विष्णु ' का नित्य सम्बन्ध माना गया है । शुद्ध प्रगति विष्णु है, शुद्ध गति इन्द्र है । स्थिति गर्भिता गति सोम है, स्थिति गर्भिता गति अग्नि । इसप्रकार स्थिति - गर्भता से गति के अग्नि-सोमात्मक दो विवर्त और हो जाते हैं । इन पाँचों में प्रथमा त्रयी हृद्या बनती हुई अन्तर्य्यामी नाम से प्रसिद्ध है | ' हरति - अन्नं ' निर्वचन से आगतिधर्म्मा विष्णु प्रशनायाचल से अन्नाहरण करते हुए ' हृ ' -अक्षर से गृहीत हैं । ' द्यति - अन्नम् निर्वचन से गतिधर्म्मा इन्द्र उत्कान्तिलक्षण विक्षेपबल से अन्न निर्गमन के प्रवर्तक बनते हुए ' द ' अक्षर से अनुगृहीत हैं । ' नियमयति गतिञ्चागतिञ्च ' निर्वचन से १४३

पृष्ठ 160

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भाष्यभूमिका स्थितिधर्म्मा ब्रह्मा स्व - प्रतिष्टा - बलाकर्षण से इन्द्रा - विष्णु का नियमन करते हुए ' यम् ' अक्षर से अनुग्रहोत हैं । तीनों की समष्टि ही ' हृदयम् ' है । प्रत्येक पदार्थ हृदय, पृष्ठ, भैद से दो भागों में विभक्त माना जाता है । हृदय - स्थान में हृ - द - यम्-लक्षणक्षरमूर्ति हृद्य अन्तय्यांमी प्रतिष्टित है, अतएव इस त्रयी को ' हुयाक्षर ' कहा जाता है । पृष्ठ वस्तुपिण्ड है, एवं इसकी प्रतिष्ठा अग्नि- सोम नामक अक्षरद्वयी है, यही पुष्ट्याक्षर है, यही सूत्रमा है,जैसा कि मायाचल कोश निरुक्ति में स्पष्ट कर दिया गया है । अन्तर्यामी हृद्य सत्यसृष्टि का मूलाधार बनता हुआ भी ' अजायमानः ' के अनुसार सङ्ग है । एवं पिण्डानुगत श्रग्नि - सोम क्षरसृष्टि के सम्पर्क से ससङ्ग है । इस प्रपञ्च से वक्तव्यांश यही है कि, गतिलक्षण हृदयबल पञ्चाक्षररूप में परिणत होता हुआ विश्व का निमित्त-कारण बन रहा है | श्रव्ययालम्बन पर प्रतिष्टित पञ्चाक्षरमूर्ति हृद्य अक्षरपुरुष ही सृष्टि का निमित्त माना गया है, जैसा कि - " तथाऽऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ” इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । उक्त पाँच अक्षरों में, किंवा एक ही अक्षर की पाँच कलाओं में इन्द्राक्षर मध्य स्थानीय बनता हुआ केन्द्र सम्पति का संग्राहक बन रहा है । उस और ब्रह्मा - विष्णु हैं, इस ओर अग्नि - सोम है, केन्द्रो-पलक्षित मध्य भाग में इन्द्र है । मध्यस्थ तत्त्व में बल का विशेष उद्गम माना गया है । अतएव ' मध्यत ऐन्ध ' निर्वचन से हृदयानुगामी इस मध्याच्चर को ' इन्ध ' कहा जाता है, जो कि इन्ध शब्द परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्ष भाषा में ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है ( शव ० ६ | १ | १ | २ ) | क्योंकि इन्द्र मध्यस्थ है, अतएव ' देहली-दीपक ' न्याय से इसका ब्रह्मा विष्णुयुग्म से, अग्नि - सोमयुग्म से, दोनों से मम्बन्ध है । ' ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र ' समष्टि अन्तर्य्यामी है, ‘ इन्द्र - अग्नि - सोम ' समष्टि सूत्रात्मा है । क्षरनगत् - दृष्टि से इन्द्र स्वज्योतिर्लन्नण सूर्य्य-ज्योति है, अग्नि रूपज्योतिर्लक्षण पार्थिवज्योति है, सोम परज्योतिर्लन्नण चन्द्रज्योति है । इन्द्र का जब तक अग्नीषोमात्मक यज्ञ से सम्बन्ध नहीं होता, तब तक वह रुद्र बनता हुआ संहारक है । सूर्य्यभुक्त सामित्राग्नि में जब तक पारमेष्टय सोमाहुति हो रही है, तब तक यज्ञस्वरूपरक्षा है, तभी तक तत् सम्बन्ध से सौर रुद्र शिव बनता हुआ अभ्युदयकर है । जिस दिन सूर्य्यात्मक इन्द्र, किंवा इन्द्रात्मक सूर्य सोमाग्निसमन्वयलक्षण यशसम्पत् से नियुक्त हो जायगा, उस दिन अपने विशुद्ध रौद्रभाव में परिणत होता हुआ सौर इन्द्र संसार को भस्मसात् कर देगा | तीनों के समन्वित रूप में हीं क्योंकि विश्व का अभ्युदय है, श्रतएव इस त्रिमूर्ति को ' शिव ' कहा गया है । अग्नि प्रथम नेत्र है, सोम ( चन्द्र ) द्वितीय नेत्र है । जब तक श्रग्नि - सोम का समन्वय है, तंत्र तक सूर्य्यरुद्रात्मक तृतीय नेत्रपटल बन्द है । यज्ञावसान के अन्यवहितोत्तर - क्षण में हीं तृतीय नेत्र खुल जायगा, और भवनेत्रजन्मा यह वह्नि सम्पूर्ण विश्व को स्मृतिमर्भ में विलीन कर देगा । पुराण ने इन्द्वाग्निसोम के समन्वितरूप को लक्ष्य बनाते हुए ' ब्रह्मा - विष्णु - शिव ' रूप से त्रिदेवतावाद का विश्लेषण किया है । एवं वेद ने पाँचों को पृथक पृथक मानते हुए पञ्चदेवतावाद का विश्लेषण किया है । दोनों पक्ष तत्त्वतः श्रभिन्न है । हृ - द - य - रूप अन्तर्य्यामी, श्रग्नि - सोमात्मक सूत्रात्मा, दोनों की समष्टि पञ्चकलात्मक ' अक्षरतत्त्व ' है, यह पूर्व निरूपण से स्पष्ट हो जाता है । हृदयभाव से बही अक्षर अन्तर्य्यामी है, पुष्ठ्यभाव से नही अक्षर १४४