Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 161–170

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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तृतीयखण्ड सूत्रात्मा है । अन्तर्य्यामीरूप से अक्षर सहृदय है, सूत्रात्मरूप से सशरीर है, अतएव शरीरयुक्त हृदयावच्छिन्न अक्षरतत्त्व पूर्वोक्त सत्यपरिभाषानुसार ' सत्यं ' है । ' तदेतत्सत्यं ' लक्षण यही अक्षर पूर्वप्रतिपादित श्वोवसीयस्-नामक अव्ययमनोरूप अव्ययपुरुष को पञ्चकल बनाता है । श्रक्षर चेतना है, इसीके व्यापार से रस चलचिति होती है । इसी चिति से चिदात्मा ( अव्यय ) की स्वरूपनिष्पत्ति होती है । अतएव अव्ययरूप का उपक्रम-मात्र कर पहिले हमें चितिप्रवर्तक पञ्चकल अक्षरवरूप का विश्लेषण करना पड़ा । अत्र पुनः अव्यय की योर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । १४ - काममय पुरुषब्रह्म-पूर्वप्रतिपादित, श्वोवसीयस्, यविष्ठ नामक, रसनलात्मक अव्ययमन हृदय में प्रतिष्ठित है । हृदया-वच्छिन्न अव्ययमन उक्थरूप से जहाँ मायापुर के केन्द्र में प्रतिष्ठित है, वहा अरूप से उक्थन्त्रिम्ब से निकल कर माया - परिधि पर्य्यन्त व्याप्त हो रहा है । मायासीमा से यह अपने व्यापकभाव से सीमाभाव में या गया है । इस सीमानिवृत्ति के लिए इसमें ' कामना ' का उदय होता है । प्राप्त वस्तु की प्राप्ति ही काम-नोत्थान का बीज है । अपरिच्छिन्न परात्पर के लिए कुछ भी अप्राप्त न था अतएव वह सर्वथा प्रातिकाम, श्रात्मैककाम था । किन्तु परिच्छिन्न मायी पुरुष के लिए प्राप्त विवर्त्त विद्यमान है । अतः तत्प्राप्ति के लिए यहाँ कामनोदय अनिवार्य्य है । अव्ययपुरुष की इसी स्वाभाविक कामना का ' एकोऽहम् बहु स्याम् ’ इन शब्दों में अभिनय किया जाता है । इसी कामना से - ' काममय एवायं पुरुषः ' के अनुसार यह काममय कहा जाता है । काममय अव्ययपुरुष ( अव्ययमन ) की कामना हृदयबल से संयुक्त है । अतएव हृदयस्थान से, दूसरे शब्दों में हृदयावच्छिन्न श्वोवसीयस् मन से विनिर्गत कामना का सर्वप्रथम हृदय में प्रतिष्ठित, हृ - द - य - मूर्त्ति अक्षर के साथ सम्बन्ध होता है । अव्यय की कामना से गतिलक्षण अक्षर सृष्टिकर्म में प्रवृत्त हो जाता है, और अक्षर की इस मानसीसृष्टि का फलभोक्ता अव्ययपुरुष ही बनता है | हृदयानुगता इसी कामनोदय का विश्ले -करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है-कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीप्या कवयो मनीषा ॥ - ऋक्सं ० १० | १२६ | ४ | कामनामय यह अव्ययमन रस - बलमूर्ति है । साथ ही रस असङ्ग है, बल ससंज्ञ है, यह स्पष्ट किया जा चुका है । ससङ्गासङ्गवृत्तियों से उभयात्मक उक्थ - रूप मन से निकलने वालीं अर्करूपा काम - रश्मियाँ भी दो स्वरूपों हीं परिणत रहतीं हैं । साथ ही यह भी निश्चित है कि, इन दोनों हीं कामनाओं में असङ्ग रस, ससङ्ग बल, दोनों का समन्वय है । केवल प्रधानता, अप्रधानता में भेद है । एकत्र रस की प्रधानता है, अन्यत्र चल का प्राधान्य है । बलगर्भिता रसप्रधाना मानसकामना रसप्रधानता से प्रसङ्ग बनती हुई बल - प्रन्थि -विमोक की प्रतिष्ठा बनती हुई ' मुमुक्षा ' ( मुक्तिकामना ) नाम से प्रसिद्ध है । रसगर्भिता बलप्रधाना मानसकामना बलप्रधानता से ससङ्ग बनती हुई - ' सिसृक्षा ' ( सृष्टिकाम्ना ) नाम से प्रसिद्ध है । मुमुक्षा नामक रसकामना १४४

पृष्ठ 162

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भाष्यभूमिका से निवृत्ति - कर्म का उदय होता है, सिसृक्षा नामक बलकामना से प्रवृत्ति कर्म का उदय होता है । निवृत्ति-करसचिति का प्रवर्तक, चलचिति का निवर्ततक बनता हुआ मुक्ति का प्रवर्तक है । प्रवृतिकर्म्म चलचिति का प्रवर्तक, रसचिति का निवर्त्तक बनता हुआ सृष्टि का प्रवत्तक है । उक्त दोनों कामना व्यापारों का हृदयस्थ अक्षर के साथ सम्बन्ध होता है, यह कहा जा चुका है । गति ( प्राण ) लक्षण अक्षर के आदानलक्षण विष्णुव्यापार से, विसर्ग- लक्षण इन्द्रव्यापार से हृदयस्थ रस-चलात्मक श्रव्यय मन पर माया - परिधिपर्यन्त व्याप्त रस - चल को चिति हंती है । मुमुक्षा - कामना से अक्षर द्वारा श्रव्यय मन पर बलगर्भित रस की चिति होती है, सिसृक्षा - कामना से अक्षर के द्वारा अभ्यय मन पर बल-गर्भित बल की चिति होती है । मुमुक्षानुगता बलगर्भिता रसचिति के बलतारतम्य से दो विभाग हो जाते हैं । प्रथमा रसचिति में रस की प्रधानता रहने पर भी बल जाग्रत रहता है । यही पहिली रसचिति ' त्रिज्ञान चिति ' है । आगे जाकर बल सर्वथा अन्तलीन हो जाता है, शुद्ध रस का उद्रेक रह जाता है । यही दूमरी ' आनन्दचिति ' है । रसात्मिका ये दोनों चितियाँ ' अन्तश्चिति ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनका निवृत्तिकर्मानुगता मुमुक्षा ( रसकामना ) से सम्बन्ध है । इसी प्रकार सिसृक्षानुगता - रसगर्भिता बलचिति के भी बलतारतम्य से दो विभाग हो जाते हैं । प्रथमा बलचिति में बल की प्रधानता रहने पर भी रस जाग्रत रहता है । यही पहिली चलचिति ‘ प्राणचिति ' है । आगे जाकर रस सर्वथा श्रन्तर्लीन हो जाता है, शुद्ध बल का उद्रेक रह जाता है । यही दूसरी ' वाचिति ' है । बलात्मिका ये दोनों चितियाँ ' बहिश्चिति ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनका प्रवृत्ति - कम्र्मानुगता सिसृक्षा ( बलकामना ) से सम्बन्ध है । इसप्रकार ' चेतना ' नाम से प्रसिद्ध अक्षर के व्यापार से अव्यय मन पर रस - बल के तारतम्य से ' आनन्द, विज्ञान, प्राण, वाक् ' ये चार चितियाँ प्रतिष्ठित हो जाती हैं । इस चिति के सम्बन्ध से निष्कल अव्ययपुरुष अक्षवत् पञ्चकल बन जाता है । पांचों में रस एक-रूप है, केवल बल का तारतम्य है । बलतारतम्य से तदभिन्न रस का भी तारतम्य प्रतीत होने लगता है, यह दूसरी बात है । रसत्वेन रस सदा सर्वदा एकरस ही है । इसी रसदृष्टि से वह चिदात्मा ( बलापेक्षा विविध भावापन्न रहता हुआ भी ) विविधभावशून्य है । अतएव ऋषि ने अव्यय का निम्न लिखित ही लक्षण माना है-सदृशं त्रिषु लिङ्गषु सर्वासु च त्रिभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ ( गोपथब्राह्मण ) । अन्य पुरुष की उक्त पाँच कलाएँ ह्रीं तैत्तिरीयोपनिषत् में ' पद्मकोश ' नाम से प्रसिद्ध है । मोद-प्रमोद - हर्ष उल्लास - प्रसादादि भेदभिन्न संसार के जितनें भी समृद्धानन्द ( विषयानन्द ) है, वे सब शान्तानन्द ( श्रात्मानन्द ) लक्षण अव्ययानन्द के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । इसी श्रात्मानन्द की मात्रा लेकर सच श्रानन्द-वान् बन रहे हैं । वह आनन्दमय है, आनंदघन है, अतएव अनानन्द है । इसकी आनन्दमात्रा से सब आनन्दवान् हैं । विज्ञान, प्रज्ञान, ऐन्द्रियकज्ञान, अज्ञान, श्रादि मेदभिन्न जितने भी दक्षणिक विज्ञान ( विषयज्ञान ) हैं, वे सत्र नित्यविज्ञान ( आत्मविज्ञान ) लक्ष्य अव्ययविज्ञान के विज्ञान भाग पर प्रतिष्ठित हैं । इसी आत्म-विज्ञान की मात्रा ले कर सत्र विज्ञानवान् बन रहे हैं । वह विज्ञाममय है, विज्ञानघन है, अतएव विज्ञान है । इसकी मात्रा से सब विज्ञानवान् हैं । सत्त्व, चित्त, महत् श्रादि मेदभिन्न जितने भी बहिर्मन हैं, वे सच अर्न्तमनो ( आत्ममनो ) लक्षण अव्ययमन के मनोभाग पर प्रतिष्ठित हैं । इसी श्रात्ममन की मनो मात्रा १४६

पृष्ठ 163

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तृतीयखण्ड लेकर सत्र समनस्क बन रहे हैं । वह मनोमय है, मनोघन है, अतएव श्रमना है । इसकी मात्रा से सत्र समनस्क हैं । सप्तशीर्षण्य प्राण, पञ्च वायव्यप्राण, उद्गीथ नासिक्यप्राण, स्पृतप्राण, आदि भेदभिन्न जितनें भी विश्वप्राण है, सत्र अन्तः प्राण ( श्रात्मप्राण ) लक्षण अव्ययप्राण के प्राणभाग पर प्रतिष्ठित हैं । इसी आत्मप्राण की प्राणमात्रा ले कर सत्र प्राणवान् ( प्राणी ) बन रहे है । वह प्राणमय है, प्राणघन है, अतएव ' अप्राण ' है । इसकी मात्रा से सत्र प्राणवान् हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, ग्राकाश, रसासृङ्मासादि सप्त-धातु, रस, विषादि भेदभिन्न जितनें भी वान् विवर्त हैं, सब अर्न्तवाक् ( आत्मवाक् ) लक्षण अव्ययवाक् के वागूभाग पर प्रतिष्ठित हैं | इसी आत्मवाक् की वाङ्मात्रा लेकर सब वाग्मी बन रहे हैं । बह वाङ्मय है, चागूघन है, श्रतएव अवाक् है । इसकी बाङमात्रा से सत्र वाग्मी हैं । अव्यय की पाँचों कलाएँ, श्रात्मलक्षण बनती हुई निर्विकार हैं, कोशमात्र हैं, श्रालम्बनमात्र हैं । ग्रानन्द - विज्ञान – मनः- प्राण - वाक् - युक्ता प्रकृति ( अक्षर ) ही सृष्टि का निमित्त बनती है । स्वयं अव्यय तो ' सामान्ये सामान्याभावः ' के अनुसार श्रानन्द - विज्ञान - मनः - प्राण - वाग्वन बनता हुआ अनानन्द - अविज्ञान-अमना - अप्राण - श्रवाक् बनता हुआ क्षरोपादानलक्षण क्षरसृष्टि से सर्वथा पृथक् रहता हुआ । अपने विशुद्ध श्रव्ययम्वरूप से विश्वातीत परात्पर की भाँति - वाङ्मनसपथातीत बनता हुआ अचिन्त्य, अविज्ञेय ही है । का विश्लेषण करती हुई उपनिषच्छ्र ु ति कहती है-अव्ययपुरुष के इसी तात्त्विक स्वरूप १ - एतदालम्बनं श्रेष्ठं, एतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञाचा, यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ ( कठोपः १।२।१७ ) ।

२- दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।

अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥

३ - एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ( मुण्डक २।१।२,३, । ) कहा गया है कि, आनन्द - विज्ञान - मनोमय वही अव्ययपुरुष मुमुक्षाद्वारा जहाँ मुक्तिसाक्षी है, वहाँ मनः - प्राण - वाङ्मय वही श्रव्ययपुरुष सिसृक्षद्वारा क्षरानुगत - श्रक्षरसहयोग से सृष्टिसाक्षी बन रहा है । सृष्टिप्रपञ्च में श्रानन्द - विज्ञान - मनोमय अव्यय आलम्बनमात्र है । प्रधानता मन: - प्राण - वाङ्मय श्रव्यय की है । श्रतएव उक्त श्रुति ने ' एतस्माज्जायते ' द्वारा मन, प्राण, पञ्चभूतात्मिका वाक 9 इन तीन के साथ ही ' जायते ' का सम्बन्ध बतलाया है । ' किंस्विदसीदासीदधिष्टानम् ' का यही ( श्रव्ययपुरुष ही ) ' एतदालम्बनं श्रेष्ठम् ' एतदात्मक सम्यक समाधान है । पञ्चकलात्मक, महामायावच्छिन्न, इसी अव्ययपुरुष के आधार पर, तदभिन्न, तत्सहकालोदित, ' धरणप्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध पूर्वप्रतिपादित गतिधर्म्मा, सृष्टिनिमित्तकारण भूत, हृदयावच्छिन्न, पञ्चकल अक्षरपुरुष प्रतिष्ठित है । रस - वलात्मक परात्पर का प्रत्यक्षभूत श्रव्ययपुरुष जैसे रस - बलात्मक है, एवमेत्र मायी अव्यय के रस – बलात्मक हृदयस्थान से आविर्भूत, अतएव श्रव्ययांशभूत अक्षर को भी रस - बलात्मक १४७

पृष्ठ 164

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भाष्यभूमिका ही माना गया है । रस - बल नामक ये दो तत्त्व हीं तो श्रवस्थामेद से भिन्न भिन्न स्वरूप धारण कर विश्वरूप में परिणत हो रहे हैं । रस - बल- मूलक विश्व में रस बल के अतिरिक्त तीसरी तत्त्वोत्रलब्धि की आशा रखना व्यर्थ है । फलतः अक्षर के साथ भी इन्हीं दोनों का समन्वय सिद्ध हो रहा है । १५ - प्राकृत ब्रह्म के २ विव— रस - बलात्मिका अक्षरनाम्ना प्रसिद्धा इस प्रकृति के भी रस - बल के तारतम्य से दो विवर्त हो जाते हैं । बलगर्भिता, रसप्रधाना, अतएव ' अमृता ' नाम से प्रसिद्धा प्रकृति, एक विभाग है । रसगर्भिता, बल-प्रधाना, अतएव ' मर्त्या ' नाम से प्रसिद्धा प्रकृति एक विभाग है । इसप्रकार एक ही प्रकृति का रसप्रधान श्रद्ध भाग अमृत है, बलप्रधान श्रद्ध भाग मर्त्य है । भावद्वयावच्छिन्ना, श्रमृतमृत्युमयी, यही प्रकृति ' अव्यक्त ' नाम से प्रसिद्ध है । यह अव्यक्ता प्रकृति ही अपने अमृतभाग से विश्व का निमित्तकारण है, मर्त्यभाग से विश्व का उपादानकारण है । उभयात्मक यही अव्यक्त तत्त्व मर्त्यभाग से प्रजोत्पत्ति का उपादानकारण बनता हुआ ' प्रजापति ' अभिधा को चरितार्थ कर रहा है । अमृतभाग से यह प्रजा का शास्ता है, मर्त्यभाग से प्रजा का उपादान है, यही निष्कर्ष है । प्रजापति नामक अव्यक्ततत्त्व के इन्हीं अमृत - मत्यभावों का ' श्रद्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्ध ममृतम् ' ( शतपथब्राह्मण ) इस ब्राह्मणश्रुति से स्पष्टीकरण हुआ है । प्रकृतिविवर्त्त का रसप्रधान, अमृत नामक श्रद्धभाग अविपरिणामी है, नित्य है, क्षरमर्यादा से बर्हिभुत है | अतएव इसे ' न क्षीयते ' निर्वचन से ' अक्षर ' कहा जाता है । यद्यपि यह टीक है कि, अपने मर्त्य-भाग से यह क्षरधर्म का अनुयायी है । तथापि अमृतदृष्टि से इसे अक्षर ही माना जायगा । यह बतलाया ही जा चुका है कि, अक्षर गतिधर्म्मा है, गति ही इन्द्र है । अतएव श्रुति ने इन्द्रात्मकत्वेनैव अक्षर का विश्लेषण किया है— “ यद्व वाक्षः- नाक्षीयत, तस्मादक्षयम् । अक्षयं ह नै नामनैत्-तदक्षरमिति परोक्षमाचक्षते " ( जै ० उ ० १।२४।२ । ) । " कतमत्तदक्षरमिति । यत् क्षरन् - नाऽक्षीयतेति, इन्द्र इति ” ( जै ० उ ० ११४३८ ) । यही अमृताक्षर गीताशास्त्र में ' पराप्रकृति ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इसी प्रकृति का बलप्रधान, मर्त्य नामक श्रद्ध भाग विपरिणामी है, अनित्य है, क्षरमय्र्यादाक्रान्त है, अतएव इसे ' यदक्षरत् ' निर्वचन से ‘ क्षर ' कहना अन्वर्थ बनता है । यही गीताशास्त्र की ' अपरा प्रकृति ' है । पञ्चमहाभूत, प्रज्ञानमन, विज्ञान, महान्, भेद से इस क्षरप्रकृति के आठ पर्व हैं । एवं महदक्षररूप जीवात्मा का सम्बन्ध अक्षर नामक पराप्रकृति से है । प्रकृति के अक्षर - क्षरात्मक पर- अपर - नामक इन्हीं दोनों विवर्त्तो का विश्लेषण करता हुआ गीताशास्त्र कहता है-१४८

पृष्ठ 165

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तृतीयखण्ड

भूमिरापोऽनलो वायुः खं - मनो - बुद्धिरेव च ।

अहङ्कार ( महानात्मा ), इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

अपरेयम् ' इतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे ( अव्ययस्य ) पराम् । जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्य्यते जगत् ॥ ( गी ० ७ ४, ५, । ) । अक्षर की ब्रह्मा - विष्णु - आदि पाँच कलाओं का पूर्व में विश्लेषण हुआ है । ये ही पाँच कलाएँ ( एतन्नामक ही ) अक्षराविनाभूत दार की हैं । दार की ब्रह्मदि पञ्चकलाएँ विपरिणामी अवश्य हैं, परन्तु अक्षरसहयोग से ये भी आत्मनित्यता से अनुगृहीत होतीं हुई ' सर्वथा नित्य है । तभी तो इसे ' आत्मदार ' कहना न्यायसङ्गत बनता । संसार में जितने भी उपादानकारण हैं, वे कार्य्यस्वरूप में परिणत हो कर अपने कारण-स्वरूप को छोड़ देते हैं | दुग्ध शर ( थर - मलाई - बालाई ) रूप में परिणत होने के अनन्तर दुग्ध नहीं रहता । लौह किट्ट ( जंग ) भाव में आकर लौहा नहीं रहता । शुक्र - सोरिणत का मिथुनीभाव अपत्यरूप में आकर शुक्र- शोणितरूप में नहीं रहता । इसप्रकार लौकिक कार्य्य - कारण- भावों में सर्वत्र विकृत - परिणामवाद का समन्वय है । परन्तु चानुगत कार्य्यकारणभाव ऐसा नहीं है । अनन्त विकारोद्भव के अनन्तर भी उपादानात्मक आत्मक्षर अपने उसी पूर्वरूप से सुरक्षित रहता है, जैसाकि विकार विनिर्गमन से पहिले था । ार के इली परिणामवाद को इसी नित्यता सम्बन्ध से ' विकृतपरिणामवाद ' कहा गया है । इसी आधार पर श्रुति ने दार की कारणता को ' क्षिति ' कहा है, जिसका - ' एप नित्यो महिमा ब्रह्मणो न वर्म्मणा वर्द्धते नंः कनीयान् ' इत्यादि श्रुति से समर्थन हुआ है । ' ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ' के अनुसार, कतिपय विशेष स्थलों को छोड़ कर विशेषणोपाधिशून्य ' ब्रह्म ' शब्द सर्वत्र क्षर का ही वाचक माना गया है । अतएव श्रुति के ‘ ब्रह्मणः ' का ' दारस्य ' यही अर्थ न्यायसङ्गत माना जायगा । १६ - पोडशकल ईशप्रजापति— इसप्रकार मागात्रल के अनुग्रह से विश्वातीत परात्पर को ( यत् किञ्चित् प्रदेश से ) विवश होकर अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, इन तीन विवर्त्तभावों में परिणत होना पड़ता है । विश्वाधिष्ठाता, विश्वाःमा, ईश प्रजापति का स्वरूप प्रक्रान्त है । अतएव आगे के तत्तत् प्रकरणों में प्रधानरूप से मनः - प्राण - वाङमय सृष्टिसाक्षी अव्यय का ही उल्लेख किया जायगा । क्योंकि विश्व ( सृष्टि ) सम्बन्ध से इसी की प्रधानता है । मन ज्ञानशक्तिघन है, इसका विकासस्थान स्वयं अव्यय - पुरुष है, अतएव श्रव्यय को ' ज्ञानात्मा ' कहा जायगा । प्राण क्रियाशक्तिघन है, इसकी विकासभूमि प्रदारपुरुष है, अतएव इसे ' कामात्मा ' कहा जायगा । वाक् अर्थशक्तिघना है, इसका विकासस्थान दारपुरुष है, अतएव इसे ' कम्र्मात्मा ' कहा जायगा । ज्ञानमय अव्यय अविकुर्वाण है, क्रियामय अक्षर कुर्वाण है, बाङ्मय दार विकुर्वाण है । ज्ञान, एवं अर्थप्रधान अव्यय, तथा क्षर दोनों निष्क्रिय हैं । सक्रिय है एकमात्र मध्यस्थ अक्षर | अव्यय विष्णुधाम है, क्षर ब्रह्मधाम है, अक्षर इन्द्रधाम है । यही पूर्वकथनानुसार ' बलकृति ' ( बलकर्म्म ) का प्रवर्त्तक १४६

पृष्ठ 166

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भाष्यभूमिका है । मध्यस्थ, इन्द्रात्मक, सक्रिय यह अक्षर अपने प्राणभाग से तपोमूर्ति ( क्रिया मूर्ति ) बनता हुआ अव्ययज्ञान के सहयोग से सर्वज्ञ, एवं क्षर के अर्थ सहयोग से सर्ववित्, अतएव ज्ञान - क्रियार्थवान् बनता हुआ सृष्टिनिर्माण में समर्थ बन रहा है । क्षर सृष्टि का उपादानकारण है, समवायि कारण है । अक्षर निमित्तकारण है, श्रसमवायि-कारण है, एवं कार्य्य - कारणातीत अव्ययपुरुष आलम्बनमात्र है । क्षर ' अवर ' है, अवरक्षरापेक्षया ' पर ', पराव्ययापेक्षया ‘ अवर ' बनता हुआ मध्यस्थ अक्षर ' पराबर ' है, अव्यय ' पर ' है । एवं विश्वातीत, अनवच्छिन्न परात्पर इस ' पर ' नामक अव्यय से भी पर ( अतीत ) होने से ' परादपि ' ( ईशाव्ययादपि ) पर: ' निर्वचन से ' परात्पर ' है । व्यापक परात्पर की सत्ता का समावेश अव्ययाक्षरात्मक्षर में भी निर्वाध है । अतएव विश्वात्म-स्वरूप की मीमांसा करते हुए इन तीनों मायी - रूपों के साथ उस मायीरूप का भी कलात्मकत्त्वेन संग्रह किया जायगा । इसप्रकार निष्कल - एककलस्थानीय विश्वातीत- विश्वसीमाभुक्त अखण्ड - परात्पर, पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल आत्मक्षर, भेद से ' ईशप्रजापति ' नामक विश्वात्मा ' पोडशकल ' बनता हुआ ' पोडशी -प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । यह षोडशी प्रजापति अव्ययप्रधान ज्ञानज्योति, अक्षरप्रधान इन्द्रज्योति, क्षप्रधान वाग्ज्योति लक्षण स्वात्मस्वरूप से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा है । इसी श्रात्मज्योतिस्त्रयी से विकार -क्षरात्मक विश्व प्रकाशित हो रहा है, जैमा कि- ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' ( मुण्डक ० २।२।१० ) श्रुति से स्पष्ट है । सूर्य्य, चन्द्र, विद्युत्, अग्नि, ये चार आधिदैविक भृतज्योतिर्विवर्त्त, वागिन्द्रियलक्षण एक आध्यात्मिक ज्योतिर्विवर्त, इन पाँचों विश्वज्योतियों ( भूतज्योतियों ) की प्रतिष्ठा वही श्रात्मज्योतिस्त्रयी है, अतएव इसे ' ज्योतिषां उयोति ' भी कहा जाता है । और प्रतिज्ञात मन्त्र के ' त्रीणि-ज्योतींषि सचते स षोडशी ' इस भाग का यही वैज्ञानिक विश्लेषण है । परात्पर, अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर - दृष्टि से ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम का समन्वय हो रहा है । इन चारों की अवान्तरकला - दृष्टि से ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम का समन्वय हो रखा है । एवं अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर - दृष्टि से ' त्रिवृद्वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम का समन्वय हो रहा है । रोदसी, क्रन्दसी, संयती, नाम से प्रसिद्ध सप्तलोकात्मिका त्रैलोक्य - त्रिलोकी ( तीन त्रिलोकी ) में आत्मरूप से व्याप्त इसी बोडशीप्रजापति का स्पष्टीकरण करते हुए षोडशकलावतार, अतएव पूर्णावतार नाम से प्रसिद्ध भगवान्

श्रीकृष्ण कहते हैं-१ – द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरवाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

२ – उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य भर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

३ – यस्मात् चरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

- गीता १५ १६, १७, १८, । १५०

पृष्ठ 167

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तृतीय ars जिस श्रात्मतत्त्व से आगे का वैकारिक विश्व उत्पन्न होने वाला है, उत्पन्न विश्व में विश्वात्मक रूप से जो आत्मतत्त्व प्रविष्ट होने वाला है, विश्वाधारभूत नाम से प्रसिद्ध वही आत्मतत्त्व पूर्वप्रतिपादित ' षोडशीप्रजा -पति है । यह ठीक है कि विकारक्षरात्मक वैकारिक विश्व की अपेक्षा वह षोडशो पृथक है । परन्तु अपने विप-रिणामी, विकुवण ग्रात्मक्षर के सम्बन्ध से उसे विश्वरूप से भी पृथक नहीं किया जा सकता । आत्मक्षरसत्ता से अभिन्न विकारक्षर।त्मक वैकारिक विश्व आत्मक्षर से अभिन्न है । इसीलिए गीता ने ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' कहते हुए ग्रात्मक्षराभिप्रायेण प्रयुक्त ' दरः ' से विश्वाभिप्रायेण प्रयुक्त ' भूतानि ' का संग्रह कर लिया है । इसी अभिन्नसत्तात्मक कार्य कारणभाव की दृष्टि से श्रुति ने - ' यस्मादन्यो न परो अस्ति जातः ' यह कह दिया है । साथ ही वस्तुगत्या वह अपने अव्ययाक्षरात्मक्षर त्मकत्रयीरूप से विश्व में प्रविष्ट होकर विश्वात्मा बन रहा है ।विश्व उसका वैकारिक - शरीर स्थानीय - स्थूलरूप है, इस दृष्टि से ' य आविवेश भुवनानि विश्वा प्रजापतिः प्रजया संरराणः ' यह कथन चरितार्थ हो रहा है । और इसीलिए गीताने भी ' यो लोकत्रयमाविश्य ' कहना न्यायसङ्गत समझा है । वस्तुतस्तु गीता का विश्वात्मा के सम्बन्ध में - ' विभर्त्यव्यय ईश्वर: ' यह स्पष्टी-करण अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । यद्यपि सामान्य दृष्टि से अव्यय अक्षर - ग्रात्मक्षर समष्टिरूप षोडशी प्रजापति को ही विश्वात्मा माना गया है । तथापि प्रधानरूप से केवल अव्यय ही विश्वात्मा माना जायगा, एवं इसे ही ' ईश्वर ' कहा जायगा । कारण यही है कि ईश्वर, जीव, जगत्, इन तीन विवर्त्तो की प्रतिष्ठा क्रमशः अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर बने हुए हैं । ईश्वरसंस्था में अव्यय की प्रधानता है । ' जीवभूतां महाबाहो ययेद धार्य्यते जगत् ' के अनुसार जीवसंस्था में अक्षर नामक पर कृति की प्रधानता है । एवं क्षरः सर्वाणि भूतानि'-' भूमिरापोऽनलो वायुः खं ' के अनुसार जगत्संस्था में आत्मक्षर नामक अपरा प्रकृति को प्रधानता है । इसप्रकार घोडशीपुरुष का क्षरभाग विश्वरूप में, अक्षरभाग जीवरूप में परिणित हो रहा है । अत्र विश्वेश्वर दृष्टि से केवल अव्यय ही बच रहता है । अतः इसे ही विश्वात्मा, ईश्वर, आदि नामों से व्यवहृत करना न्याय-प्राप्त है । और इसी दृष्टि से गीता का - ' यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर: ' यह कथन अतिशय रूप से तात्त्विक बन रहा है । प्रश्न यह होसकता है कि, यदि ईश्वरप्रजापति का केवल अव्यय से ही सम्बन्ध है, तो उसे श्रुति ने ‘ षोडशी ' ( पोडशकल ) किस आधार पर कहा?, क्योंकि षोडशकलत्र तो सर्वसंग्रह पर ही अवलम्बित है? | इस प्रश्न के सम्बन्ध में प्रकृत में यही स्पष्टीकरण पर्य्याप्त होगा कि, इसमें कोई सन्देह नहीं कि, ईश्वर - जीव - जगत् - संस्थाओं में क्रमशः अव्यय - अक्षर - आत्मक्षर की ही प्रधानता है । परन्तुः तत्त्वतः तीनों श्रात्मपर्व तीनों से अविनाभूत हैं । केवल प्रधानता, अप्रधानता का तारतम्य है । अक्षर - आत्मक्षरगर्भित अव्यय ईश्वर है, अव्यय - अक्षरगर्भित अक्षर जीवात्मा है, एवं अव्ययाक्षरगर्भित आत्मक्षर विश्व है । और इस दृष्टि से तीनों हीं संस्था षोडशकल बनतीं हुई पूर्ण हैं, जिस घोडशकलानुगता पूर्णता की सर्वव्याप्ति का ' पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णत पूर्णमुदच्यते ' इत्यादि श्रुति से समर्थन हुआ हैं । अतएव च ' बोडकलं वा इदं सर्वम् ' अनुगम का ' इदं सर्वम ' कहना [ अन्वर्थ बन रहा है । आत्मक्षरापेक्षया वही ईश्वरात्मा ' विश्वमूर्त्ति ( विश्वरूप - विश्वात्मक ) हैं, अक्षरायेक्षया वही ' विश्वकत्ती ' ( विश्वनिमित्त ) है, अव्ययापेक्षया वही गगनसदृश ' विश्वाधार ' है, एवं परात्परापेक्षया वही ' विश्वातीत ' है | वह विश्व से परे भी है ( परात्पर दृष्टि से ), वह विश्व का आधार भी है - ( अव्ययदृष्टि से ) । वह विश्व का कर्त्ता भी है ( अक्षरदृष्टिसे ), एवं वही विश्व भी है ( श्रात्मक्षरदृष्टि से ) । वह कार्य्यं भी, कारण भी है । न वह कार्य्य है, न कारण है, किन्तु श्रालम्बनमात्र है । न वह कार्य्य है, न कारण है, न ग्रालम्बन है । इसप्रकार १२१

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भाष्यभूमिका परात्पराव्ययादि दृष्टि भेद से परस्परात्यन्त विरुद्ध सम्पूर्ण धम्मों का उस में समावेश हो रहा है । जिन विरुद्ध धर्म्मप्रतिपादक श्रुतिवचनों से तत्त्वानभिज्ञ मनुष्य सन्देह में पड़े रहते हैं, उनका यह सन्देह इस तत्त्वदृष्टि से श्रात्मपर्वपार्थक्यद्वारा एकान्ततः निवृत्त है । ' सर्वधर्मोपपत्तेश्च ' ( वेदान्तसूत्र ) सूत्र का भी यही मूल-रहस्य है । यही सर्वधर्मोपपन्न षोडशीपुरुष, ( जिसे विश्वप्रजोत्पत्ति से पहिले ' प्रजापति ' न कह कर केवल ' पुरुष ' ही कहना ठीक समझते हैं ) उपनिषत् - परिभाषानुसार ' अकृतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । इसे ही यत्र तत्र ' एप सर्वेषु भूतेषु ' गूढोत्मा ' न प्रकाशते ' इत्यादि रूप से ' गूढोत्मा ' नाम से भी व्यवहृत किया गया है । एवं प्रजाध्यक्ष षोडशीप्रजापति का यही संक्षिप्त स्वरूप - विश्लेषण है । १७ - प्रजा - शब्द का तात्त्विक विश्लेषण – अब हमें संक्षेप से उस प्रजा के तात्त्विक स्वरूप का भी विश्लेषण कर देना चाहिए, जिसके समन्वय षोडशीपुरुष इस प्रजा के साथ ' संरराण: ' सम्बन्ध स्थापित करता हुआ अपनी ' प्रजापति श्रभिधा को अन्वर्थ बना रहे हैं | तत्त्ववाद को मूलतत्त्व, तूलतत्त्व, भेद से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है । तूलतत्त्व मूलतत्त्व से पृथक् कोई तत्त्वान्तर नहीं है । उदाहरण के लिए पिता मूलतत्त्वस्थानीय है, पुत्र तूलत स्थानीय है । और ' पिता वै जायते पुत्रः ' के अनुसार तूलतत्त्वस्थानीय पुत्र मूलतत्त्वस्थानीय पिता से अभिन्न है । मूलतत्त्व का जो एक स्वाभाधिक तनन ( विस्तार – फैलाव - व्याप्ति ) है, वही तुलतत्त्व माना गया है । वास्तव में तूलतत्त्व ( मूलतत्त्व का तनन रूप होने से पुत्रस्थानीय बनता हुआ ) मूलतत्त्व का ' तमय ' है । तनय ही खन्तनन है, सम्तनन ही सन्तान है । दूसरे शब्दों में श्रात्मा का जो संतनन है, वही श्रात्मतनय है, तनय ही संतनन है, श्रतएव यह संतनन ही आत्मसन्तान है 1 । ' प्रजा स्यान् सन्तती, जने ' ( अमर: ) के अनुसार आत्मसन्तनन लक्षण सन्तान हीं आत्मप्रजा है । पूर्वपरिच्छेद में बतलाया गया है कि, षोडशीपुरुष का अपरा प्रकृति - नामक आत्मक्षर भाग विपरिणामी, अतएव विकुर्वाण है । यही आत्मक्षर अपने परिणामस्वभाव से प्रजननरूप में परिणत होता हुआ स्वविकारसंघ से ' प्रजा ' रूप में परिणत होता है । क्षरतत्त्व ही प्रजा का उपादानकारण है । अतएव अक्षरसमुद्भूत इस आत्मक्षर को ' ब्रह्म ' कहा गया है । विज्ञानपरिभाषानुसार क्षरशब्द का अवच्छेदक ' उपादानत्व ' माना गया है । कारण से उत्पन्न कार्य की प्रतिष्ठा कारण ही बनता है । एवं ' ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ( शत ० ६ | १ | १ | ८ | ) के अनुसार प्रतिष्ठालक्षण कारणत्तत्त्व ही ' ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है । ऐसी स्थिति में प्रजा के उपादानकारणभूत इस क्षारतत्त्व को प्रजाप्रतिष्ठा की दृष्टि से ' विभर्त्ति सर्वम् ' इस निर्वचन से ऋषश्य ही ' ब्रह्म ' शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं, जैसा कि पूर्वपरिच्छेद में क्षरम्बरूपनिरूपण करते हुए स्पष्ट किया जा चुका है । इस ब्रह्म - भूत क्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, नाम की पाँच मर्त्यकलाओं का पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । इन पाँचों ब्रह्मकलाओं ( क्षरकलाओं ) से श्रव्ययानुगत अक्षर की सृष्टि कामना से ( मनोव्यापार से ) स्वात्मानुगत ( अक्षरानुगत ) तप से ( प्राणव्यापारलक्षण ' यत्न ' नामक श्राभ्यन्तर-व्यापार से ), एवं अक्षरानुगत अक्षर के श्रम से ( वाग्व्यापारलक्षण बाह्य व्यापार से ), इसप्रकार काम - तपः-१५२

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श्रम, नामक सृष्टि के सामान्य अनुबन्धों से - ' सोऽकामयत, स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् ' के अनुसार क्रमशः प्राणः, आपः, वाक्, अन्नादः, अन्नम् ' ये पाँच विकार उत्पन्न होते हैं । मर्त्य ब्रह्मा का विकार ‘ प्राणः ' है, मर्त्य विष्णु का विकार ' श्रापः ' है, मर्त्य इन्द्र का विकार ' वाकू ' है, मर्त्य अग्नि का विकार ‘ ग्रन्नादः ' है, एवं मर्त्य सोमकला का विकार ' अन्न ' है । स्थिति क्रमानुसार जहाँ अन्नादविकार सर्वान्त में है, वहाँ सृष्टिक्रमानुसार प्राणविकार उपक्रम है, अन्नविकार सर्वान्त में प्रतिष्ठित है । पञ्चकलात्मक विपरि-रणामी क्षरब्रह्म की पाँच मर्त्यकलाओं से उत्पन्न प्रारपादि पाँचों विकार स्वतन्त्र न रह कर परस्पर एक दूसरे को ग्राहुति कुण्ड बना कर परस्पर एक दूसरे में आहुत हो जाते हैं । यही ' सर्वहुत ' नामक पहिला मौलिक ज्ञ है । इसी से विश्वमूलभूत ऋग्यजुः सामादि तत्त्वों का आविर्भाव हुआ है । १८- विश्व - पञ्चजन - पुरञ्जनपुर - विवर्त्तचतुष्टयी — क्षर से उत्पन्न स्वतन्त्र विकारक्षर विश्व के मूलोपादन होने से ' विश्वसृद् ' नाम से प्रसिद्ध हैं । एवं सर्वहुतयज्ञ से पञ्चात्मक बने हुए ये ही पांचों विकारक्षर ' पञ्चजन ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । यद्यपि पञ्चात्मक इन पञ्चजन प्राणादि में त्रिवृत्करणप्रक्रिया की भाँति प्रत्येक में प्राणादि पाँचों विकारक्षरों का समन्वय है । तथापि श्रद्ध भाग में प्राणादि, श्रद्ध भाग में शेष चारों, इस पञ्चीकरण प्रक्रिया के सम्बन्ध से ' तद्वादन्याय ' के आधार पर ये पञ्चजन - क्षर प्राणादि नाम से ही व्यवहृत हुए हैं । पञ्चात्मक प्राण नाम के पञ्चजन से वेदतत्त्व का, श्रापः से लोकतत्त्व का, वाकू से देवतत्त्व का, अन्नाद से भूततत्त्व का, एवं अन्न से पशुतत्त्व का प्रादुर्भाव होता है । इस बात पर विशेष ध्यान रखना चाहिए कि, ग्रागे जो कुछ उत्पन्न होता है, ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' सिद्धान्त के अनुसार उस उत्तरोत्तरसर्ग में पूर्व पूर्व के यच्चयावत् सर्ग अनुस्नूत रहते हैं । पञ्चात्मक, अतएव पञ्चजन नामक विकारक्षरों से उत्पन्न वेदादि पांचों तत्त्व ही आगे जाकर उसी सर्वहुत यज्ञप्रक्रिया का आश्रय लेते हुए पुरभाव के उत्पादक बनते हैं, अतएव इन्हें ' पुरञ्जन ' कहा जाता है । इन पाँचों पुरञ्जनों में परस्पर - दोत्तरभाव माना गया है । प्राणमय वेदपुरञ्जन सत्र से महान् है, इसकी महिमा के गर्भ में लोकादि चारों पुरञ्जन प्रविष्ट हैं । इसी वेदपुरञ्जन को मन्त्रसंहिता ने ' विश्वकर्मा ' कहा है, जैसाकि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । आपोमय लोकपुरञ्जन वेदपुरञ्जन से छोटा है, इसकी महिमा में देवादि तीनों पुरञ्जन अन्तर्भुक्त हैं । वाङ्मय देवपुरञ्चन लोकपुरञ्जन से छोटा है, इसकी महिमा में अन्नादमय भूत-पुरञ्जन प्रतिष्ठित है । ग्रन्नादमय भूतपुरञ्जन देवपुरञ्जन से छोटा है, इसकी महिमा में अन्नमय पशुपुरञ्जन प्रतिष्ठित है, एवं यहीं सृष्टिमर्य्यादा का अवसान है । दहगेत्तरसम्बन्ध से प्रतिष्ठित वेद, लोक, देव, भूत, पशु, नामक इन पाँच पुरञ्जनों से ( योगमाया के द्वारा ) ब्रह्मपुर, विष्णुपुर, इन्द्रपुर, श्रग्निपुर, सोमपुर, ये पाँच पुर उत्पन्न होते हैं । ये ही पाँचों पुर विज्ञान-शास्त्र में क्रमशः स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, पृथिवी, चन्द्रमा, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । दहरोत्तर सम्बन्ध से प्रतिष्ठित वेदादि पाँच पुरञ्जनों से उत्पन्न स्वयम्भू आदि इन पाँचों पुरों में भी वह टहरोत्तर सम्बन्ध सुरक्षित है । स्वयम्भूपुर - महिम्न में, परमेष्ठ्यादि चारों प्रतिष्ठित हैं । परमेष्ठी पुरमहिमा में सूर्य्यादि तीनों प्रतिष्ठित हैं । सूर्य्यपुरमहिमा में पृथिवीव्यादि दोनों प्रतिष्ठित हैं । एवं पृथिवीपुरमहिमा में चन्द्रपुर प्रतिष्ठित है । इन पांचों पुरों की समष्टि ही ' विश्व ' है । पञ्चपर्वात्मक विश्व में ' विश्वाभाव ' लक्षणा अव्यक्तदशा को, विश्वाभावलक्षण १५३

पृष्ठ 170

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भाष्यभूमिका अनुपाख्य तम को दूर करने वाला, सर्वप्रथम व्यक्त होने वाला, स्वस्वरूप से अव्यक्तावस्था में परिणत रहने वाला, विश्वकर्म्मा नामक, वेदपुरञ्जनात्मक स्वयम्भू ही है । जैसाकि भगवान् मनु ने कहा है—

१ – आसीदिदं तमीभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

प्रतमविज्ञेयं प्रसुप्तमित्र सर्गतः ॥

२ — ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।

महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥

३ – योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सुक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्त्रयमुद्यभाँ ॥ ( मनुः १।५,६,७, ) । भूतपुरञ्जनानुगृहीता पृथिवी ' पृथिवी ' है, पशुपुर ० चन्द्रमा ' जल ' है, देवपुर ० सूर्थ्य ' तेज ' है, लोकपुर • परमेष्ठी ' वायु ' है, एवं वेदपुरञ्जनानुगृहीत स्वयम्भू ' आकाश ' है । इन पाँचों महाभूतों का । दिभूत आकाशात्मक अव्यक्त स्वयम्भू ही है, अतएव मनु ने इसे ' महाभूतादि: ' नाम से व्यवहृत किया है । परमेष्ठ्यादि चारों पुर गतिमत् होने से क्रियात्मक रजोगुणमूर्त्ति बनते हुए जहाँ ' रजांसि ' हैं, वहाँ अपने स्थितिभाव से सत्त्वात्मक बनता हुआ सत्यधर्म्मा स्वयम्भू रजोमर्य्यादा से बहिर्भूत होता हुआ ' परोरजा ' नाम से प्रसिद्ध है । ‘ ईदं ’. रूपेण भासित आज जो विश्वप्रकाश हो रहा है, इस व्यक्त विश्व का आदिप्रवर्त्तक यही स्वयम्भू है । इसकी अभिव्यक्ति से पहिले यह सम्पूर्ण विश्वप्रपञ्च अनुपाख्यलक्षण निचिडतम से ही आकान्त था । विश्वाभावलक्षण इस तम का निराकरण इसी से हुआ है, श्रतएव इसे ' तमोनुदः ' कहा गया है । इसकी जागृति में विश्वसंता है, इसकी सुति में विश्वप्रलय है । अपने सत्य - स्थिरधर्म से यही स्वयम्भू ' शा · तात्मा ' कहलाया है । अध्यात्मसंस्था में प्रवर्धरूप से प्रतिष्ठित स्वायम्भ व अंश भी ' शान्तात्मा ' ही कहलाया है, जिसे कि हम आध्यात्मिक - स्वयम्भू कहा करते हैं । आधिदैविक स्वयम्भूरूप इस शान्तात्मा का अव्यक्त व्यक्तभाव ही प्रलय - सृष्टि की प्रतिष्ठा है, जैसाकि निम्नलिखित मनुवचन से प्रमाणित है— यदा स देवो जागर्त्ति तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति ' शान्तात्मा ' तदा सर्व निमीलति ॥ ( मनुः १।४२ । ) शान्तात्मलक्षण इस स्वयंम्भू प्रजापति के गर्भ में पूर्वोक्त - दहरोक्करभाव - सम्बन्ध से परमेष्ठयादि चार प्रतिष्ठित है । वह इन चारों पर अपनी पुन: पदलक्षण महिमा से आसमन्तात् - श्रावपनलक्षण-( सर्बाधारलक्षण ) आयतनरूप से व्याप्त है, अतएव ' आसमन्ताद्भवति ' निर्वचन से यह स्वयम्भू * " चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि " ( यजुः संहिता ) “ तरणि किरणसङ्गादेपपानीयपिण्डो, दिनकरदिशि चञ्चञ्चन्द्रिकाभिश्चकास्ते ” १५४ ( सिद्धान्ततत्त्वविवेक )