Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 171–180

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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तृतीयखण्ड ' आभूप्रजापति ' - ' परम प्रजापति ' इध्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । परमप्रजापति नामक इस स्वयम्भू में ' आत्मा, पदं, पुनःप्रदम् ' इन तीन भावों की प्रतिष्ठा है । हृदयावच्छिन्नतत्व श्रात्मा है, स्वयम्भू मर्त्य पिण्ड ' पदं ' है, पिण्ड की अमृतमहिमा ' पुनः पदम् ' है । धर्म्मत्रयोपपन्न परमप्रजापति की महिमा के गर्भ में अपना स्वरूप लाभ करने वाले परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन चारों में आत्मादि तीनों भाव प्रतिष्ठित हैं । दूसरे शब्दों में जैसा स्वरूप - अवयवसंस्थान स्वयम्भू का है, वैसा ही स्वरूप - अवयवसंस्थान तदुत्पन्न परमेष्ठ्यादि पुरों का है । इसी आधार पर इन चारों को ' प्रतिमाप्रजापति ' कहा जाता है । परमेष्ठी वरुणमय है, सूर्य्य इन्द्रमय है, चन्द्रमा सोममय है, पृथिवी अग्निमयी है, चारों प्रतिमाप्रजापति हैं । ' दर्शपूर्णमास ' नामकी सुप्रसिद्ध प्रक्रिया से उत्पन्न इन्हीं चारों का दर्शपूर्णमासविज्ञानब्राह्मण में स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवरुक्य कहते हैं— ' स ऐचत प्रजापतिः ( स्वयम्भूः ) - इमं वाऽश्रात्मनः प्रतिमामसृक्षि । XXXXX । आत्मनो ह्येतं प्रतिमास सृजत । xxxx । ता वा एताः प्रजापतेरधिदेवता असृज्यन्त-अग्निः ( पृथिवी ), इन्द्र: ( सूर्य्यः ) सोमः ( चन्द्रमाः ) परमेष्ठी प्राजापत्यः ' इति । - शत ० ११ | १ | ६ | उक्त सृष्टिधाराक्रम का निष्कर्ष यह निकला कि, परात्पराव्ययाक्षरात्मक्षरमूर्त्ति षोडशी पुरुष के पराप्रकृति नामक अक्षर के काम - लपः - श्रम व्यापार से आत्मक्षर की ब्रह्मादि पांच मर्त्य कलाओं से सर्वप्रथम प्राणादि पाँच विकार क्षर उत्पन्न हुए, इन्हें हीं विश्वसृट् कहा गया । इन पाँच विश्वसृजों के पञ्चीकरण से पञ्चात्मक प्राणादि का विकास हुआ, इन्हें ही ' पञ्चजन ' कहा गया । पञ्चात्मक, अतएव पञ्चजन नाम से व्यवहृत प्राणादि पांचों से वेदादि पाँच भाव उत्पन्न हुए, जो कि पुरोगदानत्त्वेन ' पुरञ्जन ' नाम से व्यवहृत हुए । इन वेदादि पाँच पुरज्जनों से स्वयम्भू आदि पाँच पुरों का क्रमशः विकास हुआ । इस पञ्चपुरोत्पत्ति के श्रनन्तर वह षोडशीपुरुष इसके गर्भ में प्रविष्ट होकर विश्वात्मा नाम से प्रसिद्ध हो गया, एवं यहीं आकर उसकी ' ' प्रजापति ' अभिधा चरितार्थ हुई । विश्वसृट् " पञ्चजन, पुरञ्जन, पुर, चारों की समष्टि ' विश्व ' है, यही उस परात्पर - ग्रव्यय - अक्षर - क्षरात्मक - चतुष्टयमूर्ति विश्वात्मा का शरीर है । पर्व चतुष्टयात्मक पोडशकल त्मा, नेकल विश्व, दोनों का समन्वित रूप ही - ' ग्रात्मन्वी ' है, यही ' प्रजापति है । १५५

पृष्ठ 172

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प्रजापतिस्वरूपपरिलेख ः— भाष्यभूमिका * १ - परात्परः - सर्वचल विशिष्टरखात्मको निष्कलः १-२ - श्रव्ययः - आनन्द: - विज्ञानं-मनः-प्राण: -वाग्-२-३ - अक्षरः -ब्रह्मा-विष्णु: -इन्द्र: -अग्नि: -सोमः ३-४- श्रात्मक्षरः- ब्रह्मा--विष्णु: -इन्द्रः-अग्निः- सोमः १-५ - विश्वसृद् ( जः ) प्राणः— आपः -वाक-अन्नादः - अन्नम् २-६- पञ्चजनः ( नाः ) प्राण: -आपः-वाक् – अन्नाद: -अन्नम् ३-७ - पुरञ्जन: ( नाः ) | वेदाः— लोका: -देवाः— भूतानि — | पशवः ४-८- पुरम् ( णि ) स्वयम्भूः -परमेष्ठी - सूर्य्य: -पृथिवी-चन्द्रमाः विवर्त्तः विश्व श्रात्मन्वी - प्रजापतिः आनन्दविभूतिः विज्ञानविभूतिः मनोविभूतिः प्राण विभूतिः वाग्विभूतिः १ २ ३ ५ इसी सम्बन्ध में अनन्त - परात्पर परमेश्वर की अनन्त - श्रतएव विज्ञेय विभूति का दो शब्दों में और यशोगान कर लीजिए । सर्वचल विशिष्टरस को परात्पर कहा गया है । एवं इसमें माया - जायादि सोलह बल-कोश बतलाए गए हैं । प्रत्येक बलकोरा के गर्भ में तद्र प अनन्त बलकोश प्रतिष्ठित मानें गए हैं । फलतः विश्वस्वरूपसम्पादक मायाबलों का भी आनन्त्य सिद्ध हो जाता है । एक एक मायाबल सीमा से एक एक मायी विश्व का स्वरूप सम्पन्न होता है । उपाधिशून्या एकत्र संख्या से युक्त अनन्त परात्पर के अनन्त धरातल पर बिन्दु - स्वरूपावच्छिन्न अनन्त ( असंख्य ) मायाबल हैं । एक एक मायाबल एक एक ईशप्रजापति. का स्वरूप - समर्पक है । फलतः एक परात्पर परमेश्वर के गर्भ में अनन्त - मायी - महेश्वरों की भाति सिद्ध हो जाती है । श्रस्मदादि प्रजावर्ग का हमारे मायी - प्रजापति से सम्बन्ध है । शेष मामी विवर्स श्रन्य - अन्य विश्व सम्पत्तियों से युक्त हैं, जिनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । १५६ विवर्त्ताः श्रात्म

पृष्ठ 173

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1. तृतीयखण्ड अत्र केवल मायी प्रजापति के अनन्त विस्तार का विचार कीजिए । मायी - षोडशी प्रजापति अश्वत्थवृक्ष है । इसमें एक सहस्र योगमाया मुख्य हैं । एक एक योगमाया के गर्भ में पाँच पाँच अवान्तर योगमायाएँ प्रतिष्टित हैं । इसप्रकार पञ्च पञ्च पर्वात्मिका एक सहस्र योगमायाओं को अपने गर्भ में रखने वाला मायी अश्वत्थ पूर्ण - पुरुष प्रतिष्ठित है । इन सहस्र योगमाया - वित्तों को ग्रश्वत्थ वृक्ष की सहस्र बल्शा ( शाखा ) माना गया है । एक एक बल्शा में स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी, ये पाँच पाँच पुण्डीर ( पर्व ) हैं । अतएव पञ्च - अवान्तर योगमायात्मिका, एकवल्शात्मिका योगमाया ' पञ्चपुण्डीरा--प्राजापत्यवल्शा ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्येक वल्शा के साथ सहस्र बल्शात्मक अश्वत्थ वृक्ष के केन्द्र में प्रतिष्ठित षोडशीप्रजापति का सम्बन्ध है । अतएव प्रत्येक बल्शा का विश्वार प्रस्तुत होने पर तन्मूलभूत षोडशी को अग्रणी माना जायगा । षोडशीपुरुषानुगृहीत, पञ्च- पुण्डीरा एक वल्शा ही हमारा अपना विश्व है | हमारी अपेक्षा से ६६६ अशा परोक्ष हैं, असम्बद्ध हैं । हमारी दृष्टि में विश्व की इयता एकवल्शा पर ही समाप्त है । अत: हमनें षोडशीस्वरूप का विश्लेषण करते हुए पञ्चपर्वात्मिका एकवल्शा के स्वरूप– विश्लेषण से ही विश्व विश्लेषण गतार्थ मान लिया है । आत्मा - शरीरसमष्टिलक्षण ग्रात्मन्वी के स्वरूप की भिन्न दृष्टि से मीमांसा कीजिए । ' त्रिवृद्वा इदं सर्वम् ' अनुगम के अनुसार इस आत्मन्वी को विश्वातीत, विश्वचर, विश्व, इन तीन पर्वों में विभक्त माना जा सकता है । षोडशी पुरुष का परात्पर भाग अपने प्रातिविकरूप से मायातीत बनता हुआ विश्वातीत है | विश्वातीत परात्पर से अभिन्न, अतएव १६ कला में संगृहीत परात्पराव्ययाक्षरात्मक्षरसमष्टि लक्षण षोडशी पुरुष विश्व में प्रविष्ट होकर विश्वात्मा बनता हुआ विश्वचर है । एवं विश्वसृटू - पञ्चजन-पुरञ्जन - गर्भित स्वयम्भू - आदि पञ्चपुर आत्मा के प्रवेश से ' विशत्यस्मिन्नात्मा ' निर्वचन से ' विश्व ' नामक तीसरा वित्रर्त्त है । ये ही तीनों विवर्त्त क्रमशः प्रविविक्त, प्रविक्त, सृष्ट, इन नामों से भी व्यवहृत हुए हैं । इसप्रकार केवल मायात्रल के तारतम्य से रसचलात्मक एक ही परात्पर के तीन रूप हो जाते हैं । मायान-वच्छेदेन वही विश्वातीत परात्पर है, महामायावच्छेदेन वही विश्वचरपुरुष है, योगमायावच्छेदेन वही विश्वपुर है । १६ - प्रजापति की ५ संस्थाएँ -— ईशप्रजापति की सामान्य दृष्टि से यद्यपि परात्परादि चार ही विवतों का पूर्व में विश्लेषण हुआ है । तथापि यदि परात्पर के शुद्धरसलक्षण निर्विशेष, बलविशिष्टरसलक्षण परात्पर, इन दो विक्तों की अपेक्षा की जाती है, तो पाँच विवर्त हो जाते हैं । जो ये पांच विवर्त्त ईश्वरात्मविवर्त में हैं, वे ही पाँच विवर्त्त तदंशभूत जीवात्म - विवर्त्त हैं । जीवात्मा के पाँचों आत्मविवतों की प्रतिष्ठा ईश्वरात्मा के पाँच विवर्त्त हैं । वे पाँचों विवर्त्त शुद्धरस, बलविशिष्टरस, महामायावच्छिन्न रसचल, हृदयात्रच्छिन्न रसत्रल, परिधि - अवच्छिन्न रसत्रल, भेद से क्रमशः निर्विशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, नाम से पूर्व में व्यवहृत हुए हैं । शुद्धरसात्मक निर्विशेष शुद्ध आनन्दवन बनता हुआ ऐकान्तिकसुख ' लक्षण है । बलविशिष्टरसात्मक परात्पर मायातीत बनता हुआ, अतएव नित्य प्रतिष्ठ रहता हुआ ' शाश्वतधर्म्म ' लक्षण है । महामायावच्छिन्न रसबलात्मक अव्यय विविधभावशून्य रहता हुया ' अव्यय ' लक्षण है । हृद्दयावच्छिन्न-रसवलात्मक अक्षर निमित्तकारणत्वेन अपने विपरिणामी धर्म ' से ' अमृत ' लक्षण है । एवं परिधि-१५७

पृष्ठ 174

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मायभूमिका वच्छिन्न रसात्मक आत्मक्षर उपादान - कारणत्वेन अपने परिणामीरूप से विश्वपादन बनता हुआ ' ब्रह्म ' लक्षण है । गीताशास्त्र में श्रौत निर्विशेषादि पाँचों आत्मविवतों का ऐकान्तिक सुखादि लक्षणों के रूप सेही स्पष्टीकरण किया है, जैसा कि निम्नलिखित गीतावचन से प्रमाणित है— * - शुद्धरसः ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्म्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ ( गीता १४ । २७ । ) * - सवबलविशिष्टो रसः - विश्वातीतः - प्रविविक्तः २ – सर्वपरात्पराव्ययाक्षरात्मतरात्मकः षोडशी ] - विश्वचरः- प्रविष्टः ३ – विश्वसृट्- पञ्चजन - पुरञ्जनगर्भितानि पुराणि ] -१- शुद्ध रसात्मक: ऐकान्तिकमुखलक्षण: -. == * = विश्वम् - सृष्टुम् - निर्विशेषः २- सर्ववल विशिष्टरसात्मकः - शाश्वतधम्म लक्षण: - परात्परः ३- मायावच्छिन्न र सबलात्मकः - श्रव्ययलक्षणः --—— अन्ययः ४- हृदयावच्छिन्न रसचलात्मकः - अमृतलक्षणः --- अक्षः ५- परिध्यवच्छिन्न रसचलात्मकः - ब्रह्मलक्षणः ——- आत्मक्षरः # ” सर्वम् इदं एतद्वा " ( मुस्वस्यैकान्तिकस्य च ) ( शाश्वतस्य च धम्म स्य ) ( अव्ययस्य च ) ( अमृतस्य ) ( ब्रह्मणो हि प्रतिष्टाहम् ) विश्वातीत परासर विज्ञेय है, विश्वचर षोडशीपुरुष, तथा तच्छरीरस्थानीय विश्व, दूसरे शब्दों में श्रात्मन्त्री ईशप्रजापति विज्ञेय है! परात्पर मायापथ से प्रतीत बनता हुआ अखण्ड, अतएव श्रविज्ञेय है । पुरुष मायावच्छिन्न, अतएव सखण्ड बनता हुआ विशेय है । परात्पर पराचीनपदस्थानीय बनता हुआ ' अतीतः पन्थानम् ' है, पुरुष अर्वाचीनपदस्थानीय बनता हुआ ' पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ' है । और इसी श्रात्मस्वरूप - विवेक के आधार पर हम कह सकते है कि, उपनिषच्छास्त्रों का प्रतिपाद्य श्रात्मा विश्वा-तीत, अखण्ड आत्मा नहीं है, अपितु मखण्ड श्रात्मनिवर्त्त है, जैसाकि आत्मस्वरूपोपसंहारपरिच्छेद में स्पष्ट किया जाने वाला है । उपनिषत् ' आत्मा ' की उपासना बतलाता है । यह ' आत्मा ' शब्द शरीरसापेक्ष है । अशरीरी परात्पर को हमनें ' अखण्ड - आत्मा ' रूप से ' आत्मा शब्द से व्यवहृत कर दिया है । वस्तुतः परात्पर आत्मा नहीं है, अपितु आत्मा का अखण्ड आधार है । वस्तुतस्तु इसे श्रात्माधार भी नहीं कहा जा सकता । किसी भी शब्द की वहाँ गति नहीं है । क्योंकि प्रत्येक शब्द अबच्छेदक मर्यादा से युक्त है । सर्वव्यापक का कोई श्रवच्छेक ( भेदक ) नहीं, अतएव वहाँ शब्द की गति नहीं । अपिच प्रत्येक पदार्थ विशेषक १५८

पृष्ठ 175

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तृतीयखण्ड बल के सम्बन्ध से अन्य पदार्थों का व्यावर्त्तक माना गया है । घट को इसलिए ' घट ' शब्द से व्यवहृत किया करते हैं कि, उसमें रहने वाला घटत्व पटत्व - मठत्व - पुरुषत्वादि यच्चयावत् इतर विशेषकों का व्यावर्त्तक है । तदतिरिक्त यच्चयावत् पदार्थों का अभाव ही तत्पदार्थ का स्वरूपसम्पादक मान । गया है, अतएव तद्वाचक शब्द तदतिरिक्त यच्चयावत् पदार्थों का व्यावत ' के ( निवर्त्तक ) बना रहता है । अत-एव तच्छब्द से तत्पदार्थ का ग्रहण सम्भव है । परन्तु परात्पर सर्वव्यापक है । यह घट भी है, मठ भी है, सत्र कुछ है, अतएव सबकुछ नहीं की कोटि में प्रविष्ट है । अतएव उसका व्यावर्त्तक नहीं, अतएव उसके लिए किसी शब्द का प्रयोग सम्भव नहीं । जब वह शब्दशास्त्र का विषय ही नहीं, तो उसे शब्दशास्त्रात्मक उपनिष-च्छास्त्र का प्रतिपादक क्यों कर माना जासकता है । अवश्य ही शब्दात्मक वाक्प्रपञ्च की मर्य्यादा से अतीत त्रनता हुआ वह अनिर्वचनीय है । बात यथार्थ है । वाकू - लक्षण शब्द का आविर्भाव स्वापम्भुवी सत्यावाक से सम्बन्ध रखता है, जोकि सत्यावाक् श्रनादिनिधना मानी जाती हुई भी विश्वसीमा में अन्तर्भुक्त है । फिर इसने विश्वसीमातीत परात्परका निर्वचन कैसे सम्भव है । हम मान लेते हैं कि, स्वायम्भुवी नित्या सत्यवाक् की वहाँ गति है | परन्तु निर्वचन तो प्रयोगलक्षण, वागिन्द्रियानुबन्धी अनित्य शब्दों से ही सम्बन्ध रखता है । निर्वचन साधक प्रयोगात्मक, इन अनित्य शब्दों का तो वहाँ लेश भी सम्बन्ध नहीं है । इस शब्दश्वरूपदृष्टि से भी उस इन्द्रियातीत परात्पर का वागिन्द्रियानुषधी शब्दापेक्षया अनिर्वचनीयत्व ही सिद्ध हो रहा है । साथ ही मन की भी वहाँ गति नहीं है । क्योंकि मन सेन्द्रिय बनता हुआ परिच्छिन्न है । हृदयबलावच्छिन्न तत्त्व ही मन है । चिना विषय के इसका व्यापार अपम्मच है । सहृदय - सशरीर विषय ही मनोगति का आलम्बन बनता है । अहृदय अशरीर परात्पर विषयमर्य्यादातिक्रान्त रहता हुआ मन से भी अतीत है । अतएव अनिर्वचनीयवत् यह सर्वथा विज्ञेय भी है, जैसा कि - ' न तत्र वाग् गच्छति, नो मनः ' इत्यादि श्रुतियों से भी प्रमाणित है । परात्पर की वाङ् - मनसपथातीता इसी अनिर्वचनीयता, तथा अविज्ञेयता का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है –

संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः ।

यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥

२० – ‘ संविदन्ति ' का रहस्यार्थ— “ उक्त श्रुति एक विशेष रहस्यार्थ का विश्लेषण कर रही है । श्रुति ने कहा है कि, न उसे वेद जान सकते, न विष्णु जान सकते, न ब्रह्मा जान सकते । साथ हीवाणी मन के साथ वहाँ जाने में असमर्थ हो वापस लौट आती हैं " । श्रुति ने जहाँ प्रत्यक्ष भाषा में इसकी विज्ञेयता अनिर्वचनीयता बतलाई है, वहाँ सकेत -भाषा से इसकी प्राप्ति का उपाय अवश्य बतला दिया है । उसका बखान नहीं हो उसकी उपासना सकता, चिन्तत, ध्यान, नहीं हो सकता । परन्तु एक विशेषप्रक्रिया के अनुगमन से कालान्तर में परात्पर - सम्पत्ति प्राप्त अवश्य हो जाती है । और उस विशेष प्रक्रिया का मूलाधार है इन्द्रानुगत निष्कामकर्म्मलक्षण ' बुद्धियोग ', जिसका ' उपनिषत् इमें क्या सिखाती है? ' प्रकरण में विस्तार से निरूपण होने वाला है | श्रक्षरपुरुष का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि, ' ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र ' तीनों हृय - अदर हैं । इन तीनों हृद्याक्षरों का क्रमशः आत्मक्षर, अव्यय, अक्षर से सम्बन्ध है । मनः प्रधान अव्यय का विष्णु-१५६

पृष्ठ 176

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भाष्यभूमिका अक्षर से, प्राण: प्रधान अक्षर का इन्द्राक्षर से, एवं वाकप्रधान क्षर का ब्रह्माक्षर से सम्बन्ध है अतएव पूर्व में अव्यय को विष्णुधाम, अक्षर को इन्द्रधाम, एवं क्षर को ब्रह्मधाम बतलाया गया है । पर श्रव्यय, ब्रह्म क्षर, दोनों के मध्य में प्रतिष्टित अक्षर ही सर्वकम्मी माना गया है । यह स्पष्ट किया जा कुका है कि, अव्यय की श्रानन्दादि पाँचों चितियों का स्वरूप चेतनात्मक अक्षर से ही सम्बद्ध है । हृद्याक्षर के व्यापार से ही अव्यय मन पर अन्तश्चितिलक्षण श्रानन्द - विज्ञान चिति होती है, एवं बहिश्चितिलक्षण प्राण - वाश्चिति होती है । अन्तश्चितिलक्षण अव्यय मुक्तिसाक्षी है, बहिश्वितिलक्षण अव्यय सृष्टिसाक्षी है । एवमेव क्षर की पाँच कलाओं का श्रेय भी अक्षरव्यापार को ही है । यदि मध्यस्थ अक्षर न होता, तो न तो अव्यय चिदात्मा बनता, न इसके सृष्टिसाक्षोरूप को आधार बनाने वाला दर सृष्टिकर्म में समर्थ बनता । इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि, पञ्चकलात्मक श्रव्यय का अव्ययत्त्व, पञ्चकलात्मक चर का क्षरत्त्व मध्यस्थ अक्षर पर ही अवलम्बित है । मध्यस्थ अक्षर इस ओर के क्षर का भी संग्राहक है, उस ओर के अव्यय का भी संग्राहक है । अक्षर - त्रिमूर्ति है । यही पर ' अव्यय, अव्ययस्वरूपसम्पादक, एवं संग्राहक ) है, यही ब्रह्म ( आत्मक्षर, आत्मक्षरस्वरूपसम्पादक, एवं संग्राहक ) है । अक्षर की इसी सर्वात्मकता का स्पष्टीकरण करती हुई उपनिषत् कहती है-एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म, एतद्वयं वाक्षरं परम् । एतद्धयेवान्तरं ज्ञाचा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ ' यो यदिच्छति तस्य तत् ' का समाधान वास्तव में अक्षर से ही हुआ है । लोकवैभवप्राप्तिकामना, ईश्वरा-नुग्रहप्राप्तिकामना, एवं सर्वबन्धनविमोकलक्षणा मुक्तिप्राप्तिकामना, यच्चयावत् कामनाओं का इन्हीं तीन कामनाओं में श्रन्तर्भाव है । इन्हीं तीनों कामनाओं के सम्बन्ध से कर्म्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, नामक तीन योग आविर्भूत हुए हैं । तीनों का क्रमशः अव्यय - अक्षर - क्षर से सम्बन्ध है । कर्मयोग क्षरसम्पत्तिलक्षणा लोककामना का, भक्तियोग अक्षरसम्पत्तिलक्षणा ईश्वरप्राप्तिकामना का, एवं ज्ञानयोग अव्ययसम्पत्तिलक्षणा मुक्तिकामना का समर्थक है । इन तीनों का मूलाधिष्ठान मध्यस्थ अक्षर ही है । कारण यही है कि, तीनों में हीं साधनदशा में तत्तत्कामनानुगत तत्तत्कर्म्मविशेषों का अनुगमन श्रपेक्षित है । कम्मं का एकमात्र प्राणमय अक्षर से सम्बन्ध है । मनोमय अव्यय ज्ञानत्त्वेन निष्क्रिय है, वाङ्मय दर अर्थत्त्वेन निष्क्रिय है, सक्रिय है क्रियात्त्वेन प्राणमय श्रक्षर । साथ ही श्रव्ययज्ञान से ज्ञानमय, क्षरार्थ से कियामय बनता हुआ तन्मय भी है । यही सर्वमूर्ति मध्यस्थ अक्षर क्षरात्मकला से लोककामना का, स्वात्मकला से इश्वरप्राप्तिकामना का, एवं अव्ययात्मकला से मुक्तिकामना का पूरक बनता हुआ ' यो यदिच्छति तस्य तत् ' को अन्वर्थ बना रहा है । श्रतएव कर्म्मयोगलच्या यज्ञकाण्ड में भी अक्षर को ही छिद्रसन्धाता माना गया है, भक्तियोगलक्षया उपासना काण्ड में भी अक्षर को ही उपास्य बतलाया है, एवं ज्ञानयोगलक्षण मुक्तिमार्ग में भी अक्षर को ही हृद्ग्रन्थि - विमोचक माना गया है । जब तक हृद्ग्रन्थि है, तत्र तक बन्धन है, माया सीमा है, परात्परसम्पत्ति का विच्छेद है । परात्यरभाव में परिणत होने के लिए माया -सीमा का विमोक अपेक्षित है । इसके लिए हृद्द्मन्थिविमोक श्रावश्यक है, एवं इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए हृदयावच्छिन्न- ' परावर ' नामक अक्षर का समाश्रय अपेक्षित है । अक्षर इन्द्र-१६:

पृष्ठ 177

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पद है | विश्व में इस इन्द्राक्षर का विकास पञ्चपर्वात्मक विश्व की मध्यपर्वस्थानीया सूर्य्यसंस्था में हुआ है । यही सौर इन्द्र आध्यात्मिक संस्था में ' बुद्धि ' रूप से प्रतिष्ठित है । क्षरजगत् के सम्बन्ध से इसमें मर्त्यलक्षण । श्रविद्या-चतुष्टयी प्रतिष्ठित रहती है, अव्ययात्मानुग्रह से इसमें अमृतलक्षणा विद्याचतुष्टयी प्रतिष्ठित रहती है । फलतः विद्या - विद्या भेद से बुद्धि के श्राठ विवर्त्त हो जाते हैं । इनमें से श्रविद्याबुद्धिचतुष्टयी क्षरसम्बन्धेन सृष्टि-बन्धन की प्रवर्तिका बनती है, विद्याद्याबुद्धि अव्ययानुग्रहेण मुक्तिप्रवर्तिका बनती है । यही वास्तविक बुद्धियोग है, जो उपनिषदों की शिक्षा का तात्त्विक निष्कर्ष है । बुद्धि इन्द्राक्षरात्मिका है! यही हृद्ग्रन्थि - विमोक में समर्थ है । अव्ययज्ञानानुगत विष्णुदृष्टि से वह अविज्ञेय है, वाङ्मय क्षरानुगत ब्रह्मा की दृष्टि से वह अनिर्वचनीय है । परन्तु प्राणमय अक्षरानुगत इन्द्रापेक्षया वह अवश्य ही हृद्ग्रन्थिविमोकद्वारा प्राप्त होने योग्य है । ' स हि नेदिष्ठ ' पस्पर्श ' - ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् ' इत्यादिरूप से श्रुति इन्द्रात्मक आदित्य पुरुष को ही परात्परानुगता अद्वैतसम्पत्ति की प्रतिष्ठा बतला रही है । मन, प्राण, वाक् तीन ग्रात्मविवर्त हैं, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, तीन हृद्य विवर्स हैं, तीनों क्रमशः अव्यय -अक्षर - क्षरानुगृहीत हैं । १ – मनः – ( ज्ञानम् ) – अव्ययः - - विष्णुः २ - प्राणः - ( क्रिया ) --अक्षरः —- इन्द्रः ३ – वाक् —- ( अर्थः ) —क्षर ——— ब्रह्मा –सर्वमूर्त्तिः – इन्द्राक्षरः श्रुति ने उक्त रहस्य को लक्ष्य में रख कर कहा है कि, विष्णु - ब्रह्मा उसे नहीं जान सकते । साथ ही वाक ' वह अनिर्वचनीय है, मन से विज्ञेय है । श्रुति ने न तो इन्द्र का उल्लेख किया, न तत्प्रतिष्ठा रूप प्राण का उल्लेख किया । इसी संकेत से स्पष्ट हो रहा है कि, प्राणात्मक अक्षरेन्द्र बुद्धियोग के द्वारा हृद्ग्रन्थि-विमोक करत्ना हुआा अवश्यमेव उसे प्राप्त कर सकता है । प्रश्न हो सकता है कि, यदि इन्द्राक्षर से वह प्राप्तव्य था, तो श्रुति ने उसका उल्लेख क्यों नहीं कर दिया, क्यों इस रहस्य को परोक्ष रक्खा? | उत्तर स्पष्ट है । उल्लेख वाणी का विषय है । और वहाँ न वाणी है, न मन है । केवल कर्म्मानुगमन है । इस तत्त्वशिक्षा के लिए श्रुति ने संकेतभाषा का ही आश्रय लेना उचित समझा है । इन्द्रसहयोगी अक्षर हृदग्रन्थि का निवर्त्तक, मुक्ति का प्रवर्त्तक है, यह सिद्धान्त निम्नलिखित श्रुति से प्रमाणित है—

भिद्यते हृदयग्रन्थिच्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्निन् दृष्टे परावरे ( अक्ष से ) ॥

२१- आत्म - ब्रह्म - यज्ञ - योनि -— मुण्डकोपनिषत् २२ । ८ । षोडशीप्रजापत्ति का स्वरूपोपसंहृत करते हुए यह कहा गया है कि, षोडशीपुरुष ' अमृतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । स्वयम्भू – परमेष्टी - सूर्य्य - पृथिवी - चन्द्रमा, ये पाँच ' खण्डात्मा ' हैं, प्राकृतात्मा हैं । विश्वापेक्षया १६१

पृष्ठ 178

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भाष्यभूमिका विश्वब्यापक अमृतात्मा ( षोडशीपुरुष ) अखण्डात्मा है । यही उक्त पाँचों खण्डात्म - विवतों की योनि है । स्वयम्भू - आदि प्राकृतात्माओं का आत्मभाव इस अमृतात्मा पर अवलम्बित है । इसी अमृतात्मा के गर्भ-प्रवेश से स्वयम्भू आदि आत्मन्वी बनते हुए परम - प्रतिमा - प्रजापति नामों से व्यवहृत हुए हैं । अतएव इस अमृत तत्त्व को हम ' आत्मयोनि ' कह सकते हैं । श्रात्मयोनिर्लक्षण अमृतात्मा ( षोडशी ) के आत्मक्षर से उत्पन्न होने वाले प्राणादि पाँच विकार-क्षर विश्व के मूलोपादान बनते हुए ' विश्वसृट् ' कहलाए हैं । इसी उपादानकारणता के सम्बन्ध से हम इस विश्वसृट् को ' ब्रह्म ' कह सकते हैं । षोडशकल श्रमृतात्मा व्यापक परात्पर का जहाँ प्रथम विवर्त है, वहाँ प्राणरूप यह विश्क्सृडूब्रह्म द्वितीय विवर्त्त है । उस घोडशी में यह पञ्चप्राणमूर्ति ब्रह्मविव सन्निविष्ट है, जैसाकि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है— एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः प्राणैश्चिचं सर्वमतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्ध

पञ्चधा संविवेश ।

विभवत्येष आत्मा ॥

( मुण्डक ३ | १ | ६ | ) | अणुलक्षण आत्मा विशुद्ध व्ययपुरुष है । अक्षर और आत्मक्षर इस अव्ययपुरुष की अन्तरङ्ग -प्रकृति है, स्व - भाव है, अतएव इनका पुरुषस्वरूप में हीं अन्तर्भाव मान लिया जाता है । इसीलिए क्षराक्षर के परा - परा - प्रकृति स्थानीय होने पर भी गीताने ' द्वाविमौ पुरुषौ लोके चरश्चातर एव च ' इत्यादि रूप से ' पुरुष ' शब्द से व्यवहृत कर दिया है । इस अन्तरङ्ग प्रकृतिविशिष्ट पुरुष में नित्य सन्निविष्ट प्राणादि लक्षण-पञ्चात्मक विश्वसृट् विकृतिप्रधान विश्व का मूलकारण होने से ' कृतेः प्रागवस्था ' निर्वचन से बहिरङ्ग-प्रकृति नाम से व्यवहृत हुआ है । षोडशीपुरुष ( अन्तरङ्गप्रकृतिरूप क्षराक्षरविशिष्ट अव्ययपुरुष ) के सृष्टिसाक्षी मनःप्राणवाग भाग के, तथा बहिरङ्गप्रकृतिलक्षण पञ्चप्राणात्मक विश्वसृटू के समन्वय से ही पञ्चजन-पुरञ्जनादि के द्वारा विश्वस्वरूप का प्रादुर्भाव हुआ है । बहिरङ्गप्रकृतिलक्षण विश्वसटू का पहिला विव आत्मक्षर के ब्रह्मभाग का विकारभूत ' प्राण ' तत्त्व है । इस विश्वसृट - प्राण से पञ्चजन ( पञ्चीकृतप्राण ) द्वारा सर्वप्रथम ' ब्रह्मनिःश्वसित ' नामक अपौरुषेय वेदलक्षण वेदपुरञ्जन प्राहुर्भूत हुआ है, जैसाकि निम्नलिखित वाजिश्रुति से स्पष्ट है -“ सोऽयं पुरुषः ( प्राणात्मकः ) प्रजापतिरका मयत - ' भूयान्त्स्यां प्रजायेय ' इति । सोऽश्राम्यत्, स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्याम् । सैत्रास्मै प्रतिष्ठाभवत् । तस्मादनूच्य प्रतितिष्ठति । प्रतिष्ठा ह्येषा, यद् ब्रह्म ( त्रयीविद्या ) " ( शत ० ६ | १ | १ | | ) । ऋग्यजुः – सामात्मक इस वेदपुरञ्जन के मध्य में प्रतिष्ठित यजुहा के यत्- जू नामक दो विवर्त्त हैं । यत्भाग गतिप्रकृतिक प्राण है, जु भाग स्थितिप्रकृतिक वाक है । यत् - प्राण के व्यापार से जू - वाक से सर्वप्रथम भृग्वङ्गिरोलक्षण आपोवेद प्रादूर्भूत हुआ है । वाक् ही अविकृतपरिणामवाद से अरूप में परिणत १६२

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तृतीयखण्ड होती है | वेदपुरञ्जन के अनन्तर वेदवाकू से सर्वप्रथम इसी की उत्पत्ति हुई है, इसी आधार पर श्रुति कहती है-" तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । सेदं सर्गमाप्नोत्, यदिदं किञ्च । यदाप्नोत् तस्मादापः । श्रदवृणोत्, तस्मात् –बाः ( वारि: ) " ( शत ० ६ । १ । १।६ । ) । भृग्वङ्गिरोमय इस अपूतत्त्व का भृगुभाग स्नेहलक्षण है, अङ्गिराभाग तेजोलऋण है । दोनों की समष्टि ‘ ग्रापोवेद ’ लक्षण ' सुवेद ', किंवा ' सुब्रह्म ' है । ब्रह्मवेद नामक त्रयीवेद का यह स्वेद ( पसीना ) स्थानीय बनता हुआ ही परोक्षभाषा में ' सुवेद ' कहलाया है - ( देखिए गो ० ब्रा ० १ | १ | ४ | ) | इस आपोमय भृग्वङ्गिरोमय सुवेद के गर्भ में ' तत्सृष्ट्वा ' न्याय से तदुत्पादक त्रयीवेद प्रतिष्टित है, जैसाकि निम्नलिखित थर्वश्रुति से प्रमाणित है— आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापोभृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥ ( गोपथब्राह्मण -१ । १ । २६ । ) । त्रयीवेद ' सार्वयाजुष ' नामक प्राणाग्निलक्षण बनता हुआ अग्निवेद है, पोलक्षण सुवेद अप्-सम्बन्ध से सोमवेद है | वह ब्रह्म था, यह सुब्रह्म है । वह वेद था, यह सुवेद है । वह स्थिति - गत्यात्मक था, यह स्नेह - तेजोमय है | इस सुब्रह्मलक्षण वेदरूप तत्त्व की उस ब्रह्माग्निरूप वेदतत्त्व में मातरिश्वा वायु की प्रेरणा से आहुति होती है । इस श्राहुतिकर्म्म से वेद- सुवेद के चितिलक्षण अन्तर्य्याम समन्वय से जो पूर्व तत्त्व उत्पन्न होता है, वही अग्निषोमात्मक तत्त्वविशेष आगे होने वाली मैथुनी सृष्टियों का बीजस्थान बनता हुआ ' शुक ' नाम से प्रसिद्ध है । सृष्टिविवर्त्त ' अनस्था, अस्थन्वान् ' भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । आत्मसृष्टि अनस्था है, विसृष्टि ( शरीरसृष्टि ) अस्थवती है । पुरुष ( षोडशीमुरुष ), और प्रकृति ( प्राणः - श्रापः - वाक् - अन्नादः-अन्नं - भेद से पञ्चकलात्मिका बहिरङ्ग - प्रकृति ) के समन्वय से तो अनस्था आत्मसृष्टि होती है, एवं ब्रह्म ( त्रयीवेद ), सुब्रह्म ( अथर्ववेद ) के समन्वय से उत्पन्न अग्नीषोमात्मक शुक से प्रस्थन्वती सृष्टि होती है । ' अस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्त्ति ' ( शत ० ब्रा ० ) के अनुसार अनस्था आत्मसृष्टि ( भाव सृष्टि - मानसी सृष्टि ) ही ग्रस्थन्वती सृष्टि ( मैथुनी सृष्टि, गुणविकाससृष्टि ) की प्रतिष्ठा मानी गई है । एक हड्डी वाले ( धामच्छद ) महाभारयुक्त स्थूल पाञ्चभौतिक शरीर को एक बिना हड्डी वाले ( अपने ऊपर प्रतिष्ठित कर रक्खा है, क्या यह कम आश्चर्य है । उसी शुक्र तत्त्व से स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा - पृथिवी, ये पञ्चपिण्डात्मक यह अस्थन्वत् विश्व ही उस अनस्था आत्मा भामच्छद ) सुसूक्ष्म - भारशून्य तत्त्व ने स्थन्वती सृष्टि के मूलारम्भक ( मूलोपादान ) पांच ग्रस्थन्वान् पिण्ड उत्पन्न हुए हैं का मर्त्य ' शरीर है । इस परिच्छेद के प्रकृत वक्तव्य से निष्कर्षं यही निकला कि, केवल बलग्रन्थितारतम्य से उस एक ही तत्त्व ( परात्पर ) के ‘ अमृतम् ' - ब्रह्म - ' शुक्रम् ' ये तीन विवर्त्त हो जाते हैं । अमृत ' पुरुष ' ( षोडशीपुरुष ) हैं, १६३

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भाष्यभूमिका ब्रह्म ( प्राणादि पञ्चात्मक विश्वसृद्ध - बहिरङ्गप्रकृति ) ' प्रकृति ' है, शुक ( ब्रह्मसुबह्मसमन्वयात्मक स्थिति - गति-स्नेह - तेजोमय तत्त्व ) ' बिकृति ' है । अमृतलक्षण पुरुष ' आत्मयोनि ' है, ब्रह्मलक्षणा प्रकृति ' प्रकृतियोनि ' है, एवं शुक्रलक्षणा विकृति विकारसंघात्मिका ' यज्ञयोनि ' है । स्व ० प ० सू ० चं ० पृ ०, ये पाँच अधियज्ञ हैं, इन पाँचों की योनि शुक्र है । पाँचों अधियज्ञों में ( प्रत्येक में पञ्चीकरण की अपेक्षा से ) प्राण: - आपः - वाक्— अन्नादः - अन्नं, ये पांच पांच - प्राकृत प्राण प्रतिष्ठित है, एवं इन पञ्चात्मक - पञ्चधा विभक्त पञ्चप्राणों की योनि ' ब्रह्म ' ( विश्वसृट् ) है । पाँचों संस्थाओं के पृथक् पृथक् पांच हीं षोडशी - श्रात्मा है । इन पाँचों श्रात्म-विवर्तों की योनि श्रमृतात्मलक्षण षोडशी है । इसप्रकार अमृता- शुक्र रूप में परिणित होकर वही तत्त्व सत्र कुछ बन रहा है । विश्वमूल की इसी सर्वव्याप्ति का स्पष्टीकरण करती हुई उपनिषच्छ्रुति कहती है-" तदेव शुक्रं, तद्ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत् ” ( कठोपनिषत् ६।१ । ) २२- सप्तभुवनसृष्टि-' प्रजा ' शब्द का निर्वचन करते हुए पूर्व में कहा गया है कि, आत्मसन्तान ही प्रजा है । इस आत्म-सन्तान का मुख्यरूप शुक्र ही माना गया है । लोकसाधारण में ' वीर्य ' नाम से प्रसिद्ध सौम्य शुक्र की आहुति ही प्रजा का उपादान बनती है, अतः हम वीर्य्यात्मक शुक्र को प्रजा कह सकते हैं । सृष्टिक्रम में भी ब्रह्म - सु-ब्रह्मात्मक शुक्र ही स्वयम्भू आदि लोक, एवं लोकस्थ जीववर्ग का उपादान बनता है । अतः शुकतत्त्व अवश्य ही प्रजा कहा जा सकता है । स्वयं षोड़शीपुरुष आत्मा है, शुक्र श्रात्मप्रजा है, वहिरङ्गप्रकृतिलक्षण मध्यस्थ पञ्चप्राणात्मक ब्रह्म दोनों का सम्बन्धसूत्र है, जैसाकि ' प्राणैश्चितं सर्वमोतं प्रजानाम् ' इत्यादि पूर्वोक्त मुण्डक श्रुति से स्पष्ट है । ब्रह्मात्मक पञ्चप्राण से ही वह प्रजापति ( बोडशी ) ' प्रजया संरराण: ' । इसप्रकार प्रजापति शब्द की व्याप्ति ‘ अमृतं - ब्रह्म - शुक्रम् ' इन पर्वों तक समझनी पड़ेगी । अब उक्त श्रुति का ' तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे ' यह वाक्य, एवं पूर्वप्रतिज्ञा श्रुति का ' य आविवेश युवनानि विश्वा ' यह वाक्य और शेष रह जाता है । इनका समन्वय और कर लीजिए । जिस ब्रह्म – सुब्रह्मात्मक शुक्र का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, भुवनसृष्टि का एकमात्र उसी से सम्बन्ध है | रस – चलात्मक, श्रतएव अमृत - मृत्युभयमूर्ति षोडशीपुरुष की स्वाभाविक अमृत - मृत्युविभूति के अनुग्रह से शुक्र - पदार्थ भी वञ्चित नहीं है । इसके भी श्रमृतशुक्र, मर्त्यशुक, भेद से दो ही विवर्त्त माने गए हैं । वाक, आपः अग्निः, ये तीन अमृतशुक्र हैं, अग्निः, श्रपः, वाकू, ये तीन हीं मर्त्यशुक्र हैं । सम्भूय दो के ६ शुक्र होजाते हैं । इन ६ त्रों में मध्यस्थ अमृताग्निशुक्र, मर्त्याग्निशुक्र, दोनों के समन्वय से तो भुवन-मध्यस्थ सूर्य्य का जन्म हुआ है । क्योंकि इसमें अमृत - मर्त्य दोनों आग्नेय शुक्रों का समन्वय श्रतएव ' निवेशयन्नमृतं मर्त्यच ' के अनुसार इसमें दोनों धर्मं हैं । मर्त्य श्रापः शुक्र से चन्द्रमा का, मर्त्यवाक्शुक्र से पृथिवी का उदय हुआ है, एवं ये दोनों मर्त्यभुवन मध्यस्थ सूर्य से अर्वाक् रहते हुए सूर्य के मर्त्य आग्नेयशुक्र से सम्बद्ध हैं, जैसाकि - ' तस्माद्यत् किञ्चार्वाचीन. मादित्यान्, सर्वं तन्मृत्युनाऽऽप्तम् ' ( शत ० १०१५ | १ | ४ | ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । अमृत आपः १६४