Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 181–190
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190
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तृतीयखण्ड शुक्रसे परमेष्टी | भुबन का, एवं अमृतवाक् - शुक्र से स्वयम्भू भुबन का विका हुआ है । ये दोनों अमृतभुवन मध्यस्थ सूर्य्य से पराक् रहते हुए सूर्य के अमृतत्राग्नेय शुक्र से सम्बद्ध हैं । श्रमृतभुवनद्वयी अव्ययात्मा की विकासभूमि है, मर्त्यभुवनत्रयी क्षरात्मा की विकासभूमि है, उभयात्मक अग्निद्वयावच्छिन्न मध्यस्थ इन्द्रात्मक सूर्य्य अक्षरात्मा की विकासभूमि है, जैसाकि पूर्व में अक्षरात्मा की सर्वरूपता का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कर दिया गया है । इसप्रकार शुक्रषट्कू से पञ्चभुवनसृष्टि का विकास हो जाता है । # १- १ - अमृता वाकू—— -स्वयम्भु भुवनम् - अव्ययविकासभूमिः २- २ - अमृता आप; ---- परमेष्ठि - भुवनम् ३-३- अमृतोऽग्निः - सूर्य्यभुक्नम् - अक्षरविकासभूमिः - सर्वप्रतिष्ठा ४- १ - मर्थोऽग्निः अमृता - शुक्रत्रयी मर्त्या शुक५-२- मर्त्या आपः ——- चन्द्रभुवनम् — आत्मक्षरविकासभूमिः ६-३- मर्त्या वाकू -- पृथिविभुवनम् * * उक्त पाँच भुवनों का अन्ततोगत्वा चार ही भुवनों में अन्तर्भाव मान लिया जाता है । मर्त्य श्रापः-शुक्र शुक्र सौम्य है, एवं इससे चन्द्रभुवन का विकास बतलाया गया है । मर्त्य - वाक् शुक्र मर्त्याग्निलक्षणा ग्राग्नेयी वाक् है, एवं इससे पृथिबी - भुवन का विकास बतलाया गया है । चन्द्रमा पृथिवी का ही उपग्रह माना गया है इस दृष्टि से, सौम्य होने से अन्नरूप चन्द्रमा का अन्नादात्मिका पृथिवी के साथ अन्न- अन्नाद सम्बन्ध है, एवं ‘ अत्तैवाख्यायते, नाद्यम् ' के अनुसार अन्न अन्नाद के समन्वितरूप में अन्न का स्वतन्त्र व्यवहार न होकर अन्नाद से ही उसका ग्रहण हो जाता है, इस दृष्टि से चन्द्रभुवन की स्वतन्त्र सत्ता का उच्छेद मान लिया जाता है । फलतः पिण्डात्मक भुवन की दृष्टि से स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, भूपिण्ड, ये चार ही भवन शेष रह जाते हैं । पिण्डात्मक चार भुवनों में ३ सन्धिलक्षण भुवन हैं । इसप्रकार ४ पिण्डभुवन, ३ सान्ध्य भुवन भेद से ७ भुवन हो जाते हैं, जिनके आधार पर त्रैलोक्यत्रिलोकी - लक्षण ं भुवनों का स्वरूप प्रतिष्ठित है । भूपिण्ड भूलोक है, सूर्य्यपिण्ड स्वर्लोक है, दोनों के मध्य का सान्ध्य अन्तरिक्ष प्रदेश भुवर्लोक है, यही पहिली ' रोदसीत्रिलोकी ' है । भूः भुवर्लोकावच्छिन्न स्वर्लोकात्मक सूर्य्य भूः है, परमेष्ठी स्वः है, मध्यान्तरिक्ष १६५
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भुवः है, यही दूसरी कन्दसीत्रिलोकी है । कन्दसी त्रिलोकीरूप परमेष्टी भूः है, स्वयम्भू स्व: है, मध्यान्तरिक्ष भव:, है, यही तीसरी ' संयतीत्रिलोकी ' है । रोदसी का स्वर्लोक ही कन्दसी का भूलोक भी है, एवं कन्दसी का स्वर्लोक संयती का भूलोक भी है । इसप्रकार दो लोक दो स्थानों में श्रावृत होकर ६ भुवमों की संख्या पूरी कर रहे हैं, जिनके वस्तुगत्या ७ ही विवर्त्त हैं । पृथिवी ' भूः ' " पृथिवी - सूर्य का मध्य प्रदेश ' भुवः " है, सूर्य्य ' स्वः ” है । सूर्य्य - परमेष्ठी के मध्य का प्रदेश ' महः " है, परमेष्टी ' अनन् ' है । परमेष्टी - स्वयम्भू का मध्यप्रदेश ‘ तपः ' ' है, स्वयम्भू ' सत्यम् " है । ये ही ' विश्वा ( सर्वारिण ) भुवनानि ' है । I ७ – स्वयम्भूः -- सत्यम् स्वः ६ --- अन्तरितम् – तपः भुवः - संयतीत्रिलोकी ३ स्वः- महाव्याहृति: ५- परमेष्ठी --जनत् स्वः भुः ४ — अन्तरिक्षम् —– महः ३ — सूर्य्यः ----- स्वःस्वः -III I II २ – अन्तरिक्षम् — भुवः —–भुवः भुवः क्रन्दसीत्रिलोकी ३ भुवः - महाव्याहृतिः - रोदसीत्रिलोकी ३ भू: - महाव्याहृतिः १- पृथिवी. २३ त्रीणि ज्योतींषि — ' तस्मिल्लोकाः श्रिताः ' के अनुसार अमृत ब्रह्म - गर्भित ब्रह्म - सुनह्मात्मक - वागापोऽग्निमय शुक्र ही उक्त सातों भुवनों का प्रभव - प्रतिष्ठा परायण है । वही श्रमृततत्त्व ब्रह्म के द्वारा क्षरविकार को आमे कर शुक्ररूप में परिणत होता हुआ सम्पूर्ण भुवनों में प्रविष्ट हो रहा है । ' अमृत - ब्रह्म- शुक ' इन तीन ज्योतियों से वह षोडशी सर्वत्र भासमान है । भूतज्योति शुक्र ज्योति है, यही वाग्ज्योति है । प्राणज्योति ब्रह्मज्योति है, एवं श्रात्मज्योति श्रमृतज्योति है । श्रभृतज्योति स्वज्योतिर्लक्षण ज्ञानज्योति है, ब्रह्मज्योति परज्योतिर्लक्षण किया-ज्योति है, एवं शुक्रज्योति रूपज्योतिर्लक्षण श्रर्थज्योति है । वस्तु का भान ही उसका ज्ञान है, ज्ञान ही प्रकाश है, प्रकाश ही ज्योति है । शुक से ही तद्रूप विश्व का भान होता है, इस दृष्टि से शुक्र अवश्य ही ज्योति-र्भाव माना जा सकता है । यह शुक्रज्योति प्रकृतियोनिभूत पञ्चप्राणात्मक ब्रह्मज्योति से प्रकाशित है । एवं ब्रह्मज्योति का ज्योतिष्ट्व अमृतज्योति पर अवलम्बित है । दूसरी दृष्टि से तीनों ज्योतियों का समन्वय कीजिए । स्वयं घोसीपुरुष नामक अमृतात्मा श्रव्यय-लक्षण स्वज्योति, अक्षरलक्षण परज्योति, एवं श्रात्मच रलक्षण रूपज्योति से त्रिज्योतिर्घन बन रहा है । इसकी ये तीनों ज्योतियाँ क्रमशः - मनोमयी - प्राणमयी - वाडमयी बनती हुई ज्ञान किया अर्थ - ज्योतियाँ हैं । अर्थात्मिका वाड्मयी आत्मक्ष रज्योति से अर्थोत्पादिका वाङ्मयी शुकज्योति अनुगृहीत है । क्रियात्मिका १६६
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प्राणमयी अक्षरज्योति से क्रियात्मिका प्राणमयी ब्रह्मज्योति श्रनुगृहीत है । एवं ज्ञानात्मिका मनोमयी अव्यय -ज्योति का स्वयं अपनी संस्था में विकास है । एवं इससे क्षराक्षरज्योतियाँ अनुगृहीत हैं । प्रसङ्गात् — श्राधिभौतिक -- अध्यात्मिक ज्योतिर्भावों का भी समन्वय कर लीजिए । सूर्य्य-- चन्द्रमा-पृथिवी, तीनों भूतज्योतियाँ क्रमशः स्व - पर - रूषज्योतियाँ हैं । स्वज्योतिर्घन सूर्यांशभूता बुद्धि आध्यात्मिक स्वज्योति है, परज्योतिर्धन चन्द्रांशभूत प्रज्ञान मन आध्यात्मिक परज्योति है । रूपज्योत्तिर्घन पृथिव्यंशभूत पाञ्चभौतिक शरीर श्राध्यात्मिक रूपज्योति है । सर्वत्र रूपज्योति परम्परया आत्मक्षरयुक्त शुक्र से, परज्योति अक्षरयुक्त ब्रह्म से, एवं स्वज्योति अव्यय से अनुगृहीत है । इसी ज्योतिर्विवर्च को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति ने कहा है— त्रीणि ' ज्योतींषि सचते स पोडशी ' । : - अमृत ज्योतिः ( पुरुषज्योतिः ) – ज्ञानज्योतिः - स्वज्योतिः – विश्वेश्वर ज्योतिः ( १ ) २ – ब्रह्मज्योतिः ( प्रकृतिज्योति ः ) - प्राणज्योतिः – परज्योतिः – विश्वात्मज्योतिः ३ – शुक्र ज्योति. ( विकृतिज्योति ः ) -- भूत ज्योतिः - रूपज्योतिः – विश्वज्योतिः १ – अत्र्ययज्योतिः —– स्वज्योतिः - तदनुगृहीते क्षराक्षरज्योतिपी ( २ ) २ – अक्षरज्योतिः ---- परज्योतिः – तनुगृहीतं ब्रहमज्योतिः ३ -- श्रात्मक्षरज्योतिः -- रूपज्योतिः -- तदनुगृहीतं शुक्रज्योतिः १ - - सूर्य ज्योति: -- तदनुगृहीतं विज्ञान ( बुद्धि ) ज्योतिः -- स्वज्योतिः - तदनुगृहीतं प्रज्ञान ( मनो ) ज्योतिः -- परज्योतिः ( ३ ) २ – चन्द्रज्योतिः-३ -- पृथिवीज्योतिः ( अग्निज्योतिः ) - तदनुगृहीतं शरीरज्योतिः -- -- रूपज्योतिः २३ – भूतयोनि, भूतभावन, भूतेश्वर– -छान्दोग्य उपनिषत् ने उक्त प्राजापत्य विवर्त्त का ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' ( छा ० उ ०३।१।२।१ । ) इत्यादि रूप से गायत्रब्रह्मरूपेण विश्लेषण किया है । प्राजापत्य विवर्त्त की आठ संस्थाएँ हीं इस गायत्र-सम्पत्ति का मूल है । परात्पर ', अव्यय, क्षर े, आत्मक्षर, विश्वसृट् ", पञ्चजन ', पुरञ्जन ', पुर ', इन आठ विभागों के द्वारा प्राजापत्य संस्था में अष्टाक्षर गायत्रच्छन्दः सम्पत्ति का भलीभाँति समन्वय हो रहा है । इन आट विवत्तों में चौथा आत्मक्षर विवर्त्त विपरिणामी बतलाया गया है । इसी से ' ब्रह्म ' नामक पञ्चप्राणात्मक विश्वसृटू का आविर्भाव हुआ है । अतएव आत्मक्षर का ( अभिन्न -सत्ताक कार्य्यकारणभाव दृष्टि से ) विश्वसृट् में ( भी ) अन्तर्भाव मान लिया जाता है । वह क्ष रपुरुष ही स्व परिणामधर्म्म से विकुर्वाण १६७
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भूमिका बनता हुआ क्रमशः विश्वसृट्, पञ्चजन, पुरञ्चन रूपता में परिणाम होता हुआ स्वयम्भू ( आकाश ), परमेष्ठी ( वायु ), सूर्य्यं ( तेज ), चन्द्रमा ( जल ), पृथिवी, इन पुरात्मक पञ्च महाभूतों में परिणत हो रहा है । पञ्चमहाभूतों का आत्मा क्षर ही है, अतएव ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' कहना अन्वर्थ बन जाता है । साथ ही क्षर का परिणाम अविकृत परिणाम है, अतः अपने प्रातिस्विक नित्य रूप से यह घोडशी आात्मकोटि में भी अन्तर्भुक्त मान लिया जाता है । इसके सम्बन्ध के बिना घोडशी का षोडशकलत्त्व अनुपपन्न है । इसप्रकार विश्वसृट् - पञ्चजन- पुरञ्जन - गर्भित पुरात्मक वैकारिक विश्व, तथा श्रव्ययात ररूप विश्वात्मा, दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित आत्मक्षर अपने नित्यरूप से विश्वात्मकोटि में आता हुआ जहाँ ' घोडशी श्रात्मा ' का संग्राहक बन रहा है, वहाँ यही अपने परिणामी रूप से विश्वकोटिमें अन्तर्भुक्त माता हुआ विश्वमूर्ति भी बन रहा है | 1 पूर्व परिच्छेदों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, मनः - प्राण- वाङ्मव सृष्टि - साक्षी अव्यय के वाक् भाग का विकासस्थान परिणामी विकुर्वाण अक्षर है, प्राणभाग का विकासस्थान विपरिणामी कुर्वाण अक्षर है, एवं मनोभाग की विकासभूमि श्रविकुर्वाण स्वयं श्रव्यय है । परमाकाशानुग्रहीत, प्राणशरीर, ज्योतिष्मान् मनोमय इसी अव्यय का ' मनोमयः प्राणशरीरो भारूप आकाशात्मा ' इन शब्दों में विश्लेषण हुआ है । मनःप्रधान अव्यय ज्ञानप्रधान है, प्राणप्रधान अक्षर क्रियाप्रधान है, वाक्प्रधान आत्मक्षर अर्थ-प्रधान है । मनोमय अव्यय, प्राणमय अक्षर नित्य अविनाशी है, अनुच्छितिधर्म्मा है । किन्तु वाङ्मय श्रात्मक्षर विकारोपहित दशा में नित्य, किन्तु विकारसंसर्गदशा में अनित्य बनता हुआ नित्यानित्य है । यही क्षर अपने अनित्य परिणामी भाग से विश्वसृट्प्राण- पञ्चजनप्राण- पुरञ्जन - वेदरूप में परिणत होता हुआ वाम मर्त्याकारा ( भूताकाश ) रूप से व्यक्त होता है । यही आकाशात्मक क्षर श्रागे जाकर बलग्रन्थियों के तारतम्य से क्रमशः वायु - तेज - जल - पृथिवी स्वरूप धारण कर लेता है । पाँचों भूत मर्त्य है । इनका मूलप्रभाव यही आत्मक्षर है । अतएव उपनिषदों में इस भूतोत्पादक क्षर को - ' भूतियोनि ' नाम से व्यवहृत किया है । यत्र तत्र व्यवहृत ' भूतयोनि ' शब्द सर्वत्र निश्चयेन एकमात्र आत्मक्षर का ही वाचक समझना चाहिए | सामान्य मनुष्यों की दृष्टि जहाँ भूत पर जाके विश्रान्त हो जाती है, वहाँ विद्वान्लोग भूतयोनि ( आत्मक्षर ) का भी प्रत्यक्ष कर लेते हैं - ' तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ' । भूतयोनिर्नामक आत्मक्षर भूतसृष्टि का उपादान अवश्य बनता है, परन्तु अक्षर के व्यापार से । क्रियामय अक्षर ही निमित्त करण माना गया है । इसी के व्यापार से दर भूतोत्पादन में समर्थ हुआ है । भूतोत्पादक जहाँ क्षर है, वहाँ श्रक्षर भूतनिर्माता भूतप्रवर्तक है । अतएव उपनिषदों ने अक्षर को यत्र-तत्र - ' भूतभावन ' नाम से व्यवहृत किया है । यह शब्द सर्वत्र एकमात्र अक्षर का ही संग्राहक है । अक्षर को इन्द्रात्मक माना गया है, एवं इन्द्र ही अग्नि - सोमात्मक यज्ञ के सम्बन्ध से ' शिव ' कहा गया है । इसी आधार पर पुराण ने शिव को ' भूतभावन ' नाम से व्यवहृत करने में कोई आपत्ति नहीं समझी है । अब शेष रहता है तीसरा श्रन्यत्र पुरुष । यह भूतभावन अक्षर, भूतयोनि क्षर, भतात्मक विश्व, सबका आलम्बन है, अधीश्वर है । अतएव उपनिषदों नें इसे ' भूतेश्वर ' नाम से व्यवहृत किया है । २४ - सच्चिदानन्दघन ईश्वर-भूतभावन अक्षर, भूतेश्वर अव्यय, दोनों का एक स्वतन्त्र विभाग है । श्रव्ययाक्षर - श्रात्मा है, पञ्च-भूतमय भूतयोनिक्षर इस आत्मा का शरीर है । क्षरब्रह्म विश्व है, अव्ययाचर विश्वचर है, परात्पर विश्वातीत १६८
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तृतीयखण्ड है । इसप्रकार दृष्टिभेद से केवल बोडशी में ही पूर्वपरिच्छेद - प्रतिपादित विश्वातीतादि तीनों विवतों का समन्वय हो जाता है । क्षरात्मिका भूतसृष्टि अव्ययाक्षरात्मक आत्मा के सहयोग से हुई है । दूसरे शब्दो में आत्मा ही क्षरसृष्टि का कारण है । इसी सृष्टिरहस्य का विश्लेषण करते हुए महर्षि त्तित्तिरि कहते हैं— " तस्माद्वा एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी " - तै ० उप ० ० वल्ली ० १ अनुवाक दृष्टिपथ में एकमात्र क्षरप्रपञ्च ही आ रहा है । क्षर क्योंकि वाङ्मय है । अतएव दृठु विश्वप्रपञ्च के लिए कहा जा सकता है कि, यह सव वाकू ही वाक् है । क्षर - वाङ्मूलक, अतएव वाङ्मय विश्व की इसी वाङ्मयता का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है—
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
बाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता सा नो हवं जुपतामिन्द्रपत्नी ॥
- तै ० ० ब्रा ० २८ | ४ | ४ उपलब्ध. भूतमात्र वाङ्मय है । वाङ्मय क्षरभूत के गर्भ में प्राणमय अक्षर है, अक्षर के गर्भ में मनोमय अव्यय है, मन के गर्भ में विज्ञानमय कोश है, सर्वान्तरतम आनन्दमय कोश है । ' आनन्दमयोऽभ्या-सात् ' ( व्याससूत्र, ) इस वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार यही आत्मा की मूल प्रतिष्ठा है । श्रानन्द ' आनन्द ' है, विज्ञान ' चित् ' है, ग्रव्यय मन, अक्षरप्राण, क्षरवाकू, तीनों का समन्वित रूप ही ' सत् ' है । अमृतप्रधान मन का मर्त्यविवर्त्त ' ' रूप ' है, अमृतप्रधान प्राण का मर्त्यविवर्त्त ' ' कर्म्म ' है, एवं वाकू का मर्त्यविवर्त्त ' ' नाम ' है । नाम - रूप- कर्मात्मक मनः - प्राण - वाक्र समष्टि सत्तातत्त्व है, यही चित है, यही आनन्दं है । इसप्रकार नामरूप कर्मात्मक विश्व भी ' सच्चिदानन्दं ' है, आनन्दादि पञ्चकोशात्मक विश्वात्मा भी ' सच्चिदानन्दः ' है । दोनों के सच्चिदानन्दत्त्व में भेद यही है कि, आत्मा स्वस्वरूप से सच्चिदानन्दवन बनता हुआ सञ्चिदानन्दः है, एवं विश्व सच्चिदानन्द आत्मा के सत्ता - चेतना - यानन्द के आश्रित बनता हुआ ' सच्चिदानन्दम् ' है । यही उपनिषदों का विशेषणोपाधिरहित ब्रह्म पदार्थ है, जिसका कि निम्न लिखित शब्दों में विश्लेषण किया गया है— १- " ब्रह्म वेदं सर्वम् ” २ - " सर्वं खल्विदं ब्रह्म " ( संचरपक्षः ) ( प्रतिसञ्चरपक्षः ) ३ - " नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " ( समप्रि: ) ४- “ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " ( सम:ि ) २५ – विश्वकर्मा के सखा, और तीन धान— स्वयम्भू - परमेष्ठी — सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी, इन पाँच पुरों की समष्टि विश्व - प्रपञ्च है, यही उक्त नवीन दृष्टि से ‘ क्षरतत्त्व ' है । इसमें अव्ययाविनाभूत अक्षरतत्त्व प्रविष्ट रहता है । अव्ययाविनाभूत अक्षरात्मा का १६६
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भाष्यभूमिका क्षरानुगत सबसे प्रथम अवतार ' स्वयम्भू ' है, जिसे हम ब्रह्माक्षर के सम्बन्ध से ' ब्रह्मा ' भी कह सकते हैं । दूसरा अवतार परमेष्टी है, जिसे अथर्वमूर्ति बतलाया गया है । तीसरा अवतार सूर्य्य है, जो ' हिरण्यगर्भ ' नाम से प्रसिद्ध है । चौथा अवतार पृथिवी है, जिसे ' पद्मभूः ' कहा जाता है । पांचवां और अन्तिम अवतार चन्द्रमा है, जिसे ' निधन ' कहा गया है । ' श्री ' नाम से प्रसिद्ध आत्मरस संचरदृष्टि से चन्द्रमा पर समाप्त है, अतएव चन्द्रमा श्री की इति ( समाप्ति ) बनता हुआ सृष्टि की ' इति श्री ' बन रहा है । अतएव च इसे अवसानभाव-सूचक ' निधन ' कहना अन्वर्य बनता है । पाँचों में स्वयम्भू ब्रह्मा को परमप्रजापति, श्राभूमजापति, नामक बतलाया गया है । इसीसे त्रयीविद्यातक्षण ब्रह्मवेद का प्रादुर्भाव हुआ है । दूसरा परमेष्टी अथर्वा इसका ज्येष्ठ पुत्र है, जिसमें -'अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः के अनुसार ब्रह्मा के द्वारा त्रयीवेद प्रतिष्ठित जिस स्थिति का निम्न लिखित उपनिषन्छ्र ुति से स्पष्टीकरण हुआ है—
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
( मुण्डकोपनिषत् १ | १ | १ | ) पाँचों में परस्पर दहरोत्तरसम्बन्ध है, जिसका पूर्वपरिच्छेदों में स्पष्टीकरण किया जा चुका है । स्वयम्भू-परमेष्ठी में अमृतात्मा के रसभाग की प्रधानता है, अतएव ये दोनों अवतार अमृतप्रधान हैं । सूर्य्य से नीचे अवस्थित चन्द्रमा - पृथिवी में अमृतात्मा के बलभाग की प्रधानता है, अतएव ये दोनों अवतार मृत्युप्रधान है । एवं मध्यस्थ सूर्य्य में दोनों का समन्वय है, अतएव यह उभयात्मक है । अमृतावतारद्वयी में क्षरक्षरगर्भित अव्यय की प्रधानता है, मर्त्यावतारद्वयी में अव्ययाक्षरगर्भित दर की प्रधानता है, एवं मध्यस्थ सूर्य्य में अव्यम — क्षरगर्भित अक्षर की प्रधानता है । अक्षरमूर्ति मध्यस्थ सूर्य्य ही ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः संहिता. ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार जीवसृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । ईश्वरास्मा जहाँ अव्ययप्रधान है, जगत् जहाँ क्षरप्रधान है, वहाँ जीवात्मा अक्षरप्रधान है, जैसा कि ' इतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां ( अक्षरभूतां ) जीवभूताम् ' इत्यादि स्मार्त्ती उपनिषत् ( गीता ७५ ) से प्रमाणित है । तरमूर्ति सूर्य्यं ही ' हृन्मूलसृष्टिविज्ञान ' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व का सञ्चालक है, जैसाकि ' मुण्डकोप-निर्षाद्वज्ञानभाष्य ' में विस्तार से प्रतिपादित है । प्रकृत में उक्त अवतार - क्रम से यही बतलाना है कि, स्वयम्भू - आदि भेद से सर्वकर्मा, श्रतएव ' विश्वकर्मा ' नाम से प्रसिद्ध स्वयम्भू नामक परोरजा प्रजापति ये ही सुप्रसिद्ध तीन धाम हैं । अमृतप्रधान -स्वयम्भू - परमेष्ठी उसका ' परमधाम ' है, जिसे पुराणभाषा में हम ' ब्रह्मधाम ' कहेंगे । ' स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम ' इत्यादि मुण्डकवचन ने इसी का विश्लेषण किया है । मध्यस्थ सूर्य्य उसका ' मध्यमधाम ' है, जो पुराणपरिभाषा में ' विष्णुधाम ' ( यज्ञधाम ) नाम से व्यवहृत हुआ है । मृत्युप्रधान पृथिवी - चन्द्रमा का युग्म उसका ' अवमधाम ' है, जिसे पुराण ने ' शिवधाम ' माना है । परमधाम के स्वयम्भू - नामक प्रथम पर्व के केन्द्र में उक्तरूप से प्रतिष्ठित रहता हुए विश्वकर्मा प्रजापति लक्षण महिमारूप से इन तीनों धामों में व्याप्त रहते हुए अपनी ' विश्वकर्मा ' श्रमिधा को अन्वर्थ बना रहे हैं । १७०
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तृतीयखण्ड स्वयम्भू - विश्वकर्मा मूलरूप है, परमेष्ठ्यादि चारों इन्हीं के तूलरूप हैं, अतएव इन्हें ' प्रतिमा-प्रजापति ' कहा गया है । जैसा स्वरूपावयवसंस्थान परमप्रजापतिलक्षण स्वयम्भू विश्वकर्मा का है, वैसा ही स्वरूपावयवसंस्थान प्रतिमाप्रजापतिलक्षण परमेष्ठ्यादि चारों का है । तभी तो इन्हें उसकी ' प्रतिमा ' माना गया है । वे अपने इन चारों सखाओं को मानों ऐसी शिक्षा दे रहे हैं कि, तुम भी मेरे सदृश ही आत्मा, पदं - पुनः पदं - रूप से त्रिपर्वा बने रहो । विश्वकर्मा के इन्हीं तीनों धामों का विश्लेषण करते हुए ऋषि कहते हैं—
या ते धामानि परमाणि, याबमा, या मध्यमा विश्वकर्म्मन्नुतेमा ।
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्त्रं वृधानः ॥
( यजुः सं ० १७ | २१ | ) २६ - यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि— गुप्ततम - सृष्टिरहस्यप्रतिपादक उक्त मन्त्रविज्ञान का विस्तारभय से केवल मन्त्रोद्धरण पर ही विश्राम मानते हुए पाठकों का ध्यान उस अनुगममन्त्र की ओर आकर्षित किया जाता है, जो ' यानि पञ्चधा त्रीणि-त्रीणि, तेभ्यो न ज्याय: परमन्यदस्ति ' इत्यादि रूपसे प्रकरणोपक्रम में उद्धृत हुआ है । इस अनुगम मन्त्र के सम्बन्ध में वहीं यह भी स्पष्ट हुआ है कि, अनुगम भाव के सम्बन्ध से अनेक अन्वितार्थों का विश्लेषण करने वाले इस मन्त्रका प्रकत में ईशप्रजापति से सम्बद्ध अर्थ ही प्रधानतया अपेक्षित है । ईश से सम्बद्ध तदर्थ से पहिले ईशस्वरूप विजिज्ञास्य कोटि में आया, अतः मन्त्रार्थं विश्लेषण से पहिले ईश - स्वरूप प्रतिपादन अपेक्षित माना गया । एवं इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ' यस्मान्न जातः ' इत्यादि यन्त्र को मूल धरातल मानते हुए ईश का संक्षिप्त स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित करना पड़ा । अत्र क्रमप्राप्त ' यानि पञ्चधा ' का निरूपण पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । ईशप्रजापति से सम्बद्ध अर्थ भी अनुगमदृष्टि से कई विवर्त्तभावों से सम्बन्ध रखता है । उन में से प्रकृत में केवल तीन ही ग्रर्थों का समन्वय किया जायगा । ( १ ) - स्वयम्भ ू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन पञ्चधा विभक्त पाँचों प्राजापत्य संस्थानों में प्रत्येक में ' हृत्पृष्ठ, अन्तः पृष्ठ, बहिपृष्ठ ' भेद से तीन तीन पृष्ठ हैं । हृदय हृत्पृष्ठ है, इसमें अन्तर्य्यामी सत्यात्मा प्रतिष्ठित है, अतएव इसे ' आत्मपृष्ठ ' भी कहा जाता है । हृदययुक्त स्वयम्भू आदि पिण्ड हृदयस्थ आत्मा का पहिला प्रपत्तिस्थान है । इस श्रात्मप्रपत्ति के सम्बन्ध से ही इम पिएड को ' पदम् कहा गया है । वही ' अन्तःपृष्ठ ' नामक दूसरा पृष्ठ है । ' अन्तर्बहिर्जगद्विज्ञान ' के अनुसार प्रत्येक वस्तु का पद - लक्षण पिण्ड स्पृश्य माना गया है । पिण्ड को हम छू भर सकते हैं, देख नहीं सकते, जैसाकि भूमिका द्वितीयखण्ड में वेदमहिमाव्यूहनादि प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जाचुका है । दृश्य जगत् से बहिर्भूत होने के कारण हो पिण्ष्ठात्मक पदपृष्ठ ‘ अन्तः पृष्ठ ' कहलाया है । जिस प्रकार आत्मानुगृहीत हृत्पृष्ठ में ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्रात्मक अन्तर्य्यामी प्रतिष्ठित है, एवमेव इस अन्तः पृष्ठलक्षण पिण्ड में अग्नीषोमात्मक सूत्रात्मा प्रतिष्ठित है । हृदयस्थ ब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित इन्द्र - विष्णु की पूतत्त्व के आधार पर प्रतिस्पर्द्धा होती है । इस प्रतिस्पर्द्धा से ब्रह्माके आधार पर वेदसाहसी का, विष्णु के आधार पर लोकसाहस्री का, इन्द्र के आधार पर वाक्साहस्त्री का वितान होता है, जैसाकि निम्नलिखित श्रौत प्रमाणों से प्रमाणित है— १७१
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“ उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिग्ये कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्र ं वितदैरयेथाम् ॥ ” - ऋक्संहिता ६।६६१ “ किं तत् सहस्रमिति, इमे लोकाः, इमे वेदाः, अथो वागिति यात् ” ( ऐ ० आरण्यक ) । वेद - लोक- बाक् - साहस्री के सम्बन्ध से वस्तुपिण्ड के आधार पर बड़ी दूरतक एक स्वतन्त्र मण्डल का आविर्भाव होता है । यही मण्डल ' महिमामण्डल ' नामसे प्रसिद्ध है । यही दृश्यभाव की प्रतिष्ठा बनता हैं, अत-एव इसे ' बहिः पृष्ठ ' कहा जाता है । हृदयस्थ ग्रात्मा पहिले पिएड में प्रपन्न होकर पुनः विभूति सम्बन्ध से इस बहिःपृष्ठ में प्रपन्न होता है । इस पुनःप्रपत्ति के सम्बन्ध से ही इस बहिःपृष्ठ को ' पुनः पदम् ' कहा जाता है । पुनः पदात्मक बहिःपृष्ठ में वेदसाहस्री के सम्बन्ध से ऋक् यजुः साम - अथर्व, इन चारों वेदों का उपभोग होरहा है । लोकसाहस्री के सम्बन्ध से पृथिवी, अन्तरिक्षं, द्यौः - श्रपः, इन चारों लोकों का सम्बन्ध हो रहा है | एवं वाक्साहसी के सम्बन्ध से त्रिवृत्, पञ्जदश, एकविंश, त्रयस्त्रिंश, इन चार वाक्स्तोमों का सम्बन्ध हो रहा है । अयुग्मस्तोम के सम्बन्ध से त्रयस्त्रिंशदहर्गणात्मिका, युग्म्म स्तोम सम्बन्ध से अष्टाचत्वारिंशदहर्गणात्मिका यह वाक्-साहस्री ही अपने त्रिवृत् - पअदश- सप्तदश- एकविंश - त्रिणव- त्रयस्त्रिंश, इन अयुग्मस्तोमों के सम्बन्ध से ६ भागों में परिणत होती हुई ' वाक - बटुकार ' सम्पत्ति ' वषट्कार ' नाम से प्रसिद्ध हो रही है । पाँचों पिण्डों में, न केवल पांचों में हीं, अपितु पिण्डमात्र में हृदय - पद - पुनःपद - मेदसे तीन तीन पृष्ठ है । हृदयावच्छिन्न श्रात्मपृष्ठ ' उक्थ ' है, पिण्डावच्छिन्न पदपृष्ठ ' अर्क ' है, मण्डलावच्छिन्न पुनःपदपृष्ठ ' अशीति ' है । इसप्रकार पाँचों पिण्ड त्रिपृष्ठ बनते हुए ' यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि ' को चरितार्थ कर रहे हैं । पञ्चधा विभक्त इस त्रिक के परिज्ञान से सब कुछ विज्ञात है - ' यस्तद्वेद स वेद सर्वम् ' । ( २ ) -स्वयम्भ – परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा, - पृविवी - पांचों सर्वहुतयज्ञ - सम्पत्ति से युक्त हैं । क्योंकि ' पञ्चीकरण ' प्रक्रियात्मक सर्वहुत - यज्ञ से ही इनकी स्वरूप निष्पत्ति हुई है । अन्य की अन्य में आहुति होना ही यज्ञ है । यज्ञसामान्य परिभाषा के अनुसार जिसमें आहुति होती है, वह ' अन्नाद ' कहलाया है, जिसकी आहुति होती है, वह अन्न कहलाया है । गुरूपदेश अन्न है, शिष्यमेधा अन्नाद है । रूप अन्न है, चक्षुरिन्द्रिय अन्नाद है | अन्नाद ' अग्नि ' शब्द से, अन्न ' सोम ' शब्द से व्यवहृत हुआ है । यह अग्नि - सोमव्यवहार केवल अन्नादान्न - व्यवहार पर विश्रान्त है । सुप्रसिद्ध अग्नि - सोमतत्व यही अभिप्रेत नहीं है । प्रदानकर्ता अन्नाद-धर्म्मा बनता हुआ ' अग्नि ' है, फिर वह तत्त्व दृष्टि से अग्नि हो, सोम हो, अथवा ओर कोई तत्त्व हो । जिसका आदान होता है, वह अन्न है, वही ' सोम ' कहलाया है, फिर वह कोई भी तत्त्व हो । अन्नाद - अन्न से अतिरिक्त यज्ञस्वरूपनिष्पत्ति के लिए एक तीसरे श्रवपन ' तत्त्व की सता और स्वीकार करनी पड़ती है । श्रावनलक्षणा सर्वाधारात्मका आधारभमि पर प्रतिष्ठित होकर ही अन्नाद अन्नादान में समर्थ होता है । इसप्रकार प्रवचन ( श्रालम्बन ), अन्नाद, अन्न, मेद से यज्ञ त्रिसंस्थ बन जाता है । सर्वहुतयज्ञात्मक स्वयम्भू आदि पांचों यज्ञ इम तीनों यज्ञसंस्थाओं से नित्युक्त हैं । श्रवपन ' अमृतं ' है, अन्नाद ' ब्रह्म ' है, अन्न ' शुक्र ' है । आपनलक्षण आकाशात्मा षोडशीपुरुष ' खं ब्रह्म ' है, १७२
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तृतीय ars इसके आधार पर प्रतिष्ठित पञ्चप्राणात्मक विश्वसृट् - नामक अन्नादब्रह्म अन्न के साथ रमण करता हुआ. ' रंत्रह्म ' है, एवं वागापोऽग्निमय शुक्रात्मक अन्नब्रह्म सुखसाधक बनता हुआ ' कं ब्रह्म ' है । तीनों की समष्टि ही ' यज्ञ ' है । जबतक यज्ञ है, तभीतक बस्तुस्वरूप का शिवभाव है, शंभाव है । अतएव समष्टि ' शत्रह्म ’ है । इन चारों विवर्त्तो का ' प्रश्नोपनिपद्विज्ञानभाष्य ' में विस्तार से निरूपण हुआ है । प्रकृत में केवल यही वक्तव्य है कि, आवपन - अन्नाद - अम्न- दृष्टि के सम्बन्ध से भी पञ्चधा विभक्त स्वयम्भू आदि सर्वहुत यज्ञपर्व ' यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि ' को गप्तार्थ बना रहे हैं । ( ३ ) – प्रत्येक वस्तुपिण्ड की प्रतिष्ठा हृत्पृष्ठ माना गया है । इस हृत्प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित उक्थ तत्त्र ही ' हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः ' के अनुसार ' मन ' कहलाया है । आत्ममय उक्थमन तभी तक प्रतिष्ठित रहना है, जब तक कि हृत्प्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है । मनोमयी इस हृत्प्रतिष्ठा की रक्षा जि + तत्त्वविशेत्र से होती है, वही तत्त्वविशेष विज्ञानशास्त्र में ' मनोता ' कहलाया है । जबतक वस्तुपिण्ड के साथ हृत्प्रतिष्ठारक्षक मनोताभाव का सम्बन्ध रहता है, तभी तक हृत्प्रतिष्ठा, किंवा मानसप्रतिष्ठा सुरक्षित हैं, एवं तभीतक वस्तुस्वरूपसत्ता सुरक्षित है । स्वयम्भू आदि पाँचों पर्व भी इस ' मनोता ' - सम्पत्ति से नित्य युक्त हैं । इन्हीं से इन पिण्डों की स्वरूपरा है । प्रत्येक पिण्ड में तीन तीन मनोता हैं, जिनके नाममात्र प्रकृत में उद्ध ृत कर दिए जाते हैं । स्वयम्भू के ‘ वेदाः सत्यं, सूत्रं सत्यं, नियतिः सत्यम् ' सत्यात्मक वेद - सूत्र - नियति - नामक तीन मनोता हैं । इसी त्रिसत्प के आधार पर भृग्वङ्गिरोमय सौम्य - आग्नेय देवता प्रतिष्ठित हैं । अतएव देवताओं के सम्बन्ध में - ‘ त्रिः सत्या वै देवाः ' यह निगम - प्रचलित है । परमेष्ठी के मनोता ' भृगु, अङ्गिरा, अत्रि इन नामों से प्रसिद्ध हैं । घनाद्यावस्था के भेद से भृगु भृगुत्रयी है, अङ्गिरा मित्रयी है, परन्तु वाङ्मय, अतएव धामच्छद तीसरा तत्त्व त्रिभाव से बहिर्भूत है, अतएव ' न त्रिः ' निर्वचन से उसे ' अत्रि ' कहा गया हैं । दृष्टिभेद से ‘ इडा, ऊर्झ ू , भोगाः ’ ये भी परमेश्री के मनोता मानें गए हैं । ज्योतिष्टोमयज्ञप्रवर्त्त'क ' ज्योति ', गोष्टोमप्रवर्त्तक ' गौः, ' आयुष्टोमप्रवर्त्त ' क ' आयु ' ये तीन मनोता सूर्य्य के हैं । ज्योतिर्म्मनोता देवप्रतिष्ठा है, गौर्म्मनोता भूतप्रतिष्ठा है, श्रायुनोता आत्मप्रतिष्टा है । ' रेतः, श्रद्धा, यशः ' ये तीन मनोता चन्द्रमा में प्रतिष्ठित हैं । रेतोमनोता शुक्र की प्रतिष्ठा है, श्रद्धामनोता शुक्रस्थ महानात्मानुगत पितृप्राण की प्रतिष्ठा है, यशोमनोता शरीरक्रान्तिलक्षण श्रीभाव की प्रतिष्ठा है । ' वाक्, गौः, द्यौः ' ये तीन मनोता पृथिवी से सम्बद्ध हैं | वाङ्मनोता असंज्ञ जीवों की प्रतिष्ठा है, गौर्म्मनोता अन्तः संज्ञ जीवों की प्रतिष्ठा है, एवं द्यौर्म्मनोता ससंज्ञ जीवों की प्रतिष्ठा है । इसप्रकार पञ्चधा विभक्त तीन तीन मनोता ' यानि पञ्चधा त्रीणि ' त्रीणि को चरितार्थ कर रहे हैं । १७३
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मायभूमिका ( १ ) १ ( २ ) १ - वेदाः — ब्रह्मप्रतिष्ठा २ - सूत्रम् — विष्णु प्रतिष्ठा --स्वयम्भूः १-३ ( ३ ) ३ - नियतिः - इन्द्रप्रतिष्ठा ( ४ ) १ - भृगुः --सौम्यदेवप्रतिष्ठा २ ( ४ ) ( ६ ) २ - अङ्गिराः श्राग्नेयदेवप्रतिष्ठा -- परमेष्ठी १-३ ३ - श्रत्रिः - श्रावरणप्रतिष्ठा ( ७ ) १ - उयोतिः - देवप्रतिष्ठा ३ ( ८ ) २ - गौ: - -भूत प्रतिष्ठा --सूर्य्य: १-३ ( १ ) ३ - श्रायुः - श्रात्मप्रतिष्ठा ( १० ) १ - रेतः - शुकप्रतिष्ठा ४ ( ११ ) २ - श्रद्धाः – पितृप्रतिष्ठा : — -- चन्द्रमाः १-३ ( १२ ) ३ - यश: —– श्री - प्रतिष्ठा ५ ( १४ ) २ - गौ: -( १३ ) १ - वाक् – असंज्ञप्रतिष्ठा : - अन्तः संज्ञप्रतिष्ठा - पृथिवी १-३ | ( १५ ३ - द्यौः - - ससंज्ञप्रतिष्ठा ५-१५ १७४ । परमन्यदस्ति उयायः न तेभ्यो त्रीणि त्रीणि पञ्चधा यानि " ॥ " हरन्ति बलिमस्मै दिशो सर्वा -सर्व वेद से द यस्तद्व