Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 191–200

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200

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७- ईश्वरस्वरूप - सिंहावलोकन— २७ २८ - देवसत्यस्वरूप- परिचय— तृतीयखण्ड " १७५ माको बन्धन से मुक्त करने वाले औपनिषद - ज्ञान के सम्बन्ध में अपेक्षणीय ईश्वरस्वरूपपरिज्ञान भी विजिज्ञास्य है । अतएव ' यस्मान्न जातः ० ' इत्यादि यजुर्मंन्त्र को आधार बनाते हुए ईशप्रजापति का सैक्षिप्त स्वरूप बतलाना पड़ा । और प्रतिपादित ईशस्वरूप से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, ' परात्पर-अव्यय - अक्षर - आत्मक्षर - की समष्टि तो ' आत्मा ' है, यही ' अमृतम् ' है । स्वयम्भू - परमेष्ठयादि पञ्चपर्वात्मक विश्व इस विश्वात्मा का शरीर है, यही ' शुक्रम् ' है । एवं मध्यस्थ पञ्चप्राणात्मक विश्वसृट् आत्मा - शरीर का समन्वय – कर्त्ता है, यही ‘ ब्रह्म ' है । अमृतं - श्रात्मा, शुक्रं - शरीर, ब्रह्म - समन्वयकर्ता, तीनों के समन्वित रूप का नाम ' ग्रात्मन्वी ' ( शरीरविशिष्ट आत्मा ) प्रजापति है, यही ईशप्रजापति है । संक्षेप से यह भी कहा जा सकता है कि, “ स्वयम्भ –परमेष्ठयादि पञ्चावयव विश्वगर्भ में प्रविष्ट, विश्वविश्लिष्ट घोडशीपुरुष ही ईशप्रजापति " है । पाठकों को यह जान कर कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि, प्रकरणारम्भ से अबतक प्रतिपादित जिस ' आत्मन्वी ' ( प्रजापति ) को हम ' ईशप्रजापति ' कहते आए हैं, वस्तुतः ईशप्रजापति प्रतिपादित श्रात्मन्वी से सर्वथा भिन्न तत्त्व है | विज्ञानदृष्टि से तत्त्वतः श्रात्मसंस्थानों का विश्लेषण करने पर हमें इसी तथ्य पर पहुंचना पड़ता है, जिस तथ्य का कि उपनिषदों के सुप्रसिद्ध ' ब्रह्म सत्य - देवसत्य ' विज्ञान से सम्बन्ध है । प्रतिसंचग्मूला दार्शनिक दृष्टि से जहाँ परमेश्वर, महेश्वर, उपेश्वर, ईश्वर, आदि शब्द अभिन्नार्थक हैं, वहाँ विज्ञानदृष्टि से इन सब शब्दों के अवच्छेदक भिन्न भिन्न हैं । ' सत्यत्रतं सत्यपरं त्रिसत्यम् ' इस पुराणवचन के अनुसार सत्यप्रजापति तीन संस्थाओं में विभक्त है | पहिला सत्य आत्मसत्य है, यही ' सत्यस्य सत्यं, ज्योतिषां ज्योति लक्षण अमृतसत्य है । दूसरा सत्य प्रकृति-सत्य है, यही ब्रह्मसत्य है । एवं तीमरा सत्य विकृति - रूप यशसत्य है, यही देवसत्य है, जिसे हम शुक्रसत्य भी कह सकते हैं । इन तीनों सत्यों में संस्थाभेद से महेश्वर, उपेश्वर, प्रतिमेश्वर, ईश्वर, इन चार प्राजापत्यसंस्थाओं प्रतिष्ठा 1 महामायावच्छिन्न, सहस्रवल्शात्मक, वृक्ष इव स्तब्ध षोडशीपुरुष मायी ' महेश्वर ' है । यह अपने मायामय विश्व का एकाकी अधिष्ठाता है । इस महेश्वर में पञ्चपुण्डीरा - स्वयम्भू -आदि लक्षणा एक सहस्र प्राजापत्यचल्शा है | एक एक बल्शा ( शाखा ) एक एक स्वतन्त्र श्रात्मसंस्था है । एक एक वल्शा संस्था का एक एक आम प्रजापति ( परोरजा नामक स्वयम्भ ू , विश्वकर्मा ) अधिष्ठाता है । परमेष्ठ्यादि चारों प्रतिमा संस्थाओं को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाला यह श्राभ| -स्वयम्भू ही ‘ उपेश्वर ’ है |.महेश्वर के गर्भ में एकसहस्रशाखा भेद से ऐसे एक सहस्र ही उपेश्वर मान जायँगे । एवं इन्हें बल्शाध्यक्षता के सम्बन्ध से ' बल्शेश्वर ' भी कहा जा सकेगा । प्रत्येक बल्शेश्वर के गर्भ में परमेष्ठी, सूर्य्य,. चन्द्रमा, पृथिवी, ये चार चार प्रतिमाप्रजापतिलक्षण श्रात्मविवर्त्त हैं । इन्हें ( प्रत्येक को ) ' प्रतिमेश्वर ' कहा जायगा । इसप्रकार पूर्वप्रतिपादित विश्वविशिष्ट ' ईशप्रजापति ' में मायीमहेश्वर, स्वयम्भ बल्शेश्वर ( उपेश्वर ), परमेष्ठ्यादि प्रतिमेश्वर, भेद से तीन संस्थाविभाग मानें जायँगे । चौथा ' ईश्वर ' विवर्त अभी तक अनिरूपित

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भाष्यभूमिका ही माना जायगा | देवसत्य से सम्बन्ध रखने वाले ईश्वरविवर्त के स्पष्टीकरण के लिए निम्नलिखित मुण्ड-कवचन की ओर पाटकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिपस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ मु ०३ । १ । १ । ) । " कोई एक ऐसा वृक्ष है, जिस एक ही वृक्ष की एक ही शाखा पर दो पक्षी बैठे हैं । उनमें एक पक्षी उस वृक्ष के स्वादु फल चख रहा है, दूसरा फल न खाता हुआ उस फल खाते हुए पक्षी की चौकसी कर रहा है " इत्यर्थक मन्त्र के दोनों पक्षी कौन हैं?, जिस वृक्ष की शाखा पर दोनों बैठे हैं, उस वृत्र, तथा शाखा का क्या स्वरूप है?,, यह विचारणीय है । वृक्ष वही सुप्रसिद्ध सहसवल्शायुक्त श्रश्वत्थवृक्ष है, जिसके अमृत - ब्रह्म-शुक्र नामक तीन विवर्त्तो का पूर्व में स्पष्टीकरण हुआ है । एवं निम्न लिखित श्रुतियाँ जिस श्रश्वत्थवृक्ष काय स्पष्टीकरण कर रही हैं— F

कः-१ – यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।

वृक्ष इत्र स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक स्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्गम् ॥

२ - अमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुकं, तद्ब्रह्म, तदेवामृतमु॒च्य॑ते । K तस्मिलोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् " । ( कठ ०६।१ । ) । अमृतलक्षण षोडशीपुरुष, पञ्चप्राणात्मक ब्रह्मलक्षण विश्व, पञ्चपुरात्मक शुकलक्षण विश्व, तीनों की समष्टि तो ‘ अश्वत्थवृद्ध ' ही है । पञ्चप्राणानुगृहीत पञ्चपुरसमष्टि अश्वत्थ वृक्ष की शाखा है । इसप्रकार प्रति-ज्ञात विश्वविशिष्ट आत्मन्वी का अश्वत्थ वृक्ष, तथा शाखा पर ही जब पर्य्यवसान हो जाता है, तो मानना पड़ेगा कि, शाखा पर प्रतिष्ठित दोनों पक्षियों का स्वरूप अश्वत्थवृक्ष, एव शाखा, दोनों से भिन्न हैं । दार्शनिक दृष्टि बहाँ इस भेद - विज्ञान के विश्लेषण में असमर्थ है, वहाँ वैज्ञानिक दृष्टि भलीभांति इस रहस्य का विश्ले -कर रही है । षोडशीपुरुष अमृतसत्य, किंवा श्रात्मसत्य है, यह बतलाया जा चुका है । वागादि शुकमूर्ति स्वयम्भू - पर-मेष्ठी - आदि क्रमशः ब्रह्मलक्षण प्राण, श्रापः, वाक, अन्न, अन्नाद से अनुग्रहीत होते हुए क्रमशः प्राणब्रह्म ( स्वयम्भ ू ), श्रापब्रह्म ( परमेष्ठी ), वाग्ब्रह्म ( सूर्य ), अन्नब्रह्म ( चन्द्रमा ), अन्नादब्रह्म ( पृथिवी ) नाम से व्यवहृत हुए हैं । शुक्रावछिन इन पाँचों अन्नादवझों की समष्टि क्षुदविश्वात्मिका अश्वत्थशाला है । यही अश्वत्थशाखा पञ्चब्रह्मात्मिका बनती हुई ' ब्रह्मसत्य ' अभिधा की बननी बन रही है, और यहीं पर प्रतिज्ञात श्रात्मविवर्त ' के महेश्वर, उपेश्वर, प्रतिमेश्वर, तीनों रूप गतार्थ है । अव चौथे ईश्वरक्ति की मीमांसा अपेक्षित है । एवं इसके लिए ब्रह्मसत्यात्मिका श्रश्वत्थशाखा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित पृथिवीलक्षण अन्नाद ब्रह्म की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । १७६

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तृतीय ars अन्नाद तत्त्व अग्निलक्षण है, दूसरे शब्दों में अग्नि ही अन्नाद है, एवं - ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' श्रुत्यनुसार पृथिवी आग्नेय विवर्त्त है । यह प्रजापति ( प्रतिमाप्रजापति ) नामक पार्थिव अन्नादग्नि ' श्रद्ध हवैं प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्ध ममृतम् ' इस अनुगम के अनुसार अमृत - मर्त्य भेद से दो भावों में परिणत रहता है । याज्ञिक परिभाषा मे अमृताग्नि ' चितेनिधेय ' कहलाया है, मर्त्याग्नि ' चित्य ' कहलाया है | विज्ञानपरिभाषा में चितेनिधेय अग्नि ' पुष्करपर्ण ' कहलाया है, धित्याग्नि ' कृष्णमृग ' कहलाया है । इनमें से चित्य मृग्यमाण होने से कृष्णमृग नाम से प्रसिद्ध मर्त्य अग्नि से भ पिण्ड का स्वरूप - निर्माण हुआ है, एवं चितेनिधेय अमृताग्नि से महिमामयी महापृथिवी का निर्माण हुआ है, जिसे ' उख्यापृथिवी ' भी कहा गया है । ' ग्रापः - फेन - मृत् - सिकता - शर्करा - अश्मा - यः - हिरण्य ' इन आाट क्षरों की समष्टि चित्याग्निलक्षण भ पिण्ड है । इस चित्यपिण्ड का जो आग्नेय तेजोरस ( प्राण ) है, वह भूपिण्डकेन्द्र को आधार बना कर बड़ी दूर तक ( २१ वें अहर्गण पर स्थित सूर्य्य से भी कुछ ऊपर तक ) अपना एक मण्डल बनाता है, जोकि मण्डल मामपरिभाषा में ‘ रथन्तरसाम ' नाम से व्यवहृत हुआ है । सूर्य्य ही ' आदित्यो वै देवरथः ' के अनुसार ' रथ ' है । पार्थिव साम इस रथात्मक सूर्य का तरण कर जाने से ही ' रथन्तर ' कहलाया है । इसी सामसम्बन्ध से यह अमृतलक्षण प्राणाग्नि, किंवा रसाग्नि ' रायन्तर ग्रग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ हैं । भूकेन्द्र से २२ वें अहर्गण पर्यन्त व्याप्त इस राथन्तर प्राणाग्नि की घन - तरल - विल - भेद से तीन अवस्था हैं । घनावस्थापन्न अनि ' अग्नि ' है, लरलावस्थापन्न अग्नि ' वायु ' है, बिरलावस्थापन्न अग्नि आदित्य है । महापृथिवी के त्रिवृत्स्तोमपर्यन्त ( ६ पर्यन्त ) घनाग्निलक्षण अग्नि प्रतिष्ठित है, पञ्चदश ( १५ ) स्तोमपर्यन्त तरलाग्निलक्षण वायु प्रतिष्ठित है, एकविंश ( २१ ) स्तोमपर्यन्त विरलाग्निलक्षण श्रादित्य प्रतिष्ठित है । उदूढ, रोदसी, क्रन्दसी, संयती, कुर्म्म, श्रात्मगति, स्तौम्य, भौम, भेद से त्रैलोक्य-विवर्त्त ' आाट भागों में विभक्त माना गया है । इनमें से स्तोम भागों से सम्बन्ध रखने वाली त्रिलोकी ही स्तम्यत्रिलोकी कहलाई है । 11 J 4 " चितेनिधेयाग्नि पार्थिव है । अतएव २२ स्तोमावच्छिन्न आग्नेय धरातल ' पृथिवी ' कहलाया है । इस महापृथिवी को ‘ पृथिवी ' कहा जाता है, चित्यपृथिवी को ' भूः ' कहा जाता है । भू के आधार पर पृथिवी प्रतिष्ठित है । चितेनिधेय- प्राणात्मिकावटका रलक्षणा इस महापृथिवी का त्रिवृत्प्रदेश महापृथिवी का पृथिवीलोक है, पञ्चदशप्रदेश अन्तरिक्ष लोक है, एकविंशप्रदेश द्युलोक है । तीनों लोकों में पूर्वकथनानुसार क्रमशः अग्नि, वायु, श्रादित्य, नापक देवदेवता प्रतिष्ठित हैं । अग्निमूर्त्ति - श्रग्नि- वाय्वादित्य, तीनों देवताओं का परस्पर यजन होता है । तीनों की क्रमशः तीनों में हुति होती है । अग्नि को धार ( योनि ) बना कर वाय्वादित्य की आहुति से वाय्वादित्यगर्भित श्रग्निप्रधान जो अपूर्वभाव उत्पन्न होता है, वही ' वैश्वानर ' कहलाया है । ६ पृथिवी, १५ - अन्तरिक्ष, २१ आदित्य, ये तीनों क्रमशः पृ ० ० द्यौ ० नामक पार्थिव विश्वों के नर ( नायक ) हैं । तीनों नरों के समन्वय से उत्पन्न होने के कारण ही यह ' विश्वेभ्यो नरेभ्यः - अग्निवाय्वादित्येभ्यः - जातः ” निर्वचन से १७७

पृष्ठ 194

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भाष्यभूमिका ' वैश्वानर ' कहलाया है ( शत ० ६ | ३ | १ | ३ | ) | यद्यपि इस में तीनों का समन्वय है, परन्तु श्रग्नियोनित्त्वेन प्रधानता त्रिवृत्तोमावच्छिन्न पार्थिव अग्नि की ही मानी जायगी । अग्नि क्योंकि अर्थशक्ति का अधिष्ठाता है, अतएव इस वैश्वानर को हम ' अर्थशक्तिप्रधान ' ही कहेंगे । अपने उक्थरूप से त्रिवृत् - पार्थिवलोक में रहता हुआ यह वैश्वानर रूप से त्रैलोक्य में व्याप्त है, जैसाकि - ' आ यो द्यां भात्यापृथिवीम् ' -' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' इत्यादि निगमों से प्रमाणित है । आन्तरिक्ष्य वायु को आधार ( योनि ) बना कर अग्न्यादित्य की आहुति से अग्न्यादित्यगर्भित वायुप्रधान जो अपूर्ब तत्त्व उत्पन्न होता है, वही ' हिरण्यगर्भ ' नाम से प्रसिद्ध है । वायु की यहाँ प्रधानता है, वायु क्रियाशक्तिप्रधान है, अतएव तत्प्रधान आन्तरीक्ष्य हिरण्यगर्भ को हम क्रियाशक्तिप्रधान मानने के लिए तय्यार हैं | आदित्य को आधार बना कर वाय्वग्नि की आहुति से काय्वग्निगर्भित आदित्यप्रधान जो अपूर्वभाव उत्पन्न होता है, वही ' सर्बज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । आदित्य ( इन्द्र ) की यहाँ प्रधानता है, ' म हि नेदिष्ठं पस्पर्श ' न्याय से यह ज्ञानशक्तिप्रधान है । अतएव तत्प्रधान दिव्य सर्वज्ञ को अवश्य ही ज्ञानप्रधान माना जा सकता है । अर्थप्रधान पार्थिव वैश्वानर एककल है, क्रियाप्रधान अान्तरीक्ष्य हिरण्यगर्भ अन्तरीक्ष्य - अष्टविध -सर्पाकृतियुक्त धिष्ण्याग्नि ( नाक्षत्रिकाग्नि ) सम्बन्ध से अष्टकल है, ज्ञानप्रधान दिव्यसर्वज्ञ एककल है । सकलन से तीनों की समष्टि ' दशकल ' है । यही दशाक्षर विराट्सम्पत्ति - उदय का मूलहेतु है । इसीलिए इस समष्टि को ' विराट ' कहा गया है । ज्ञानप्रधान सर्वज्ञभाग इस विराट्पुरुष का साहस्री - भावयुक्त ‘ शिरः ’ प्रदेश है । क्रियाप्रधान हिरण्यगर्भभाग इसका साहस्रीभावयुक्त ' चक्षुः ' ( हृदय ) प्रदेश है । एवं अर्थप्रधान वैश्वानरभाग साहस्रीभावयुक्त ' पाद ' भाग है । स्तोम्यत्रिलोकी में अपने इन उक्त रूपों से व्याप्त दशकल यह विराट्पुरुष त्रिवृदवच्छिन्न वैश्वानररूप पादभाग से चित्याग्निलक्षण भूपिण्ड पर खड़ा है । अग्नि सत्यतत्त्व है । एक ही सत्याग्नि की तीन अवस्थाओं से विराट की स्वरूपनिष्पत्ति हुई है । ' अग्निः सर्वा देवताः ' के अनुसार अग्नि ही सार्वदेवत्य है । अतएव अग्नित्रयमूर्ति शक्तित्रथावच्छिन्न- स्तौम्यत्रैलोक्य-व्याप्त - इस विराट्पुरुष को हम अवश्य ' देवसत्य ' कह सकते हैं । देवसत्यात्मक इसी विराट्पुरुष का विश्लेषण करती हुई यजुःश्रुति कहती है-सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं सर्णत स्पृत्त्वात्य तिष्ठद्दशाङ्ग ुलम् ॥ ( यजुःसं ० ३१।१ । ) पार्थिव प्राणाग्निलक्षण अमृतरस ( तेजोरस ) हो उक्त देवस्रत्य का स्वरूपाधायक है । दूसरे शब्दों में पार्थिव प्राणाग्नि ही अग्नि- वायु - आदित्य - स्वरूप में परिणत होता हुआ देवसत्य का स्वरूपसमर्पक बन रहा है । अग्नि – वायु - आदित्य, तीनों पार्थिवाग्नि रस ही हैं, इस सम्बन्ध में निम्नलिखित वाजिश्रुति ही प्रमाण है— " आपो वा अर्कः । तद्यदपां शर आसीत्, तत् समहन्यत सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत्, तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्चताग्निः । स त्रेधात्मानं १७८

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तृतीयखण्ड व्याकुरुत - आदित्यं तृतीयं, वायुं तृतीयम् । स एष प्राण: ( प्राणाग्निः - अमृताग्निः ) त्रेधा विहितः " ( शत ० १०।६।५।२ । ) । भूपि ब्रह्मसत्यपर्व है । भूमहिमा लक्षण स्तौम्यत्रिलोकीरूपा महापृथिवी इससे भिन्न है । तद्युक्त विराट् नामक ' देवसत्य ' विवर्त्त भी उस पूर्वात्मविनर्स से भिन्न है । स्वयम्भू से प्रारम्भ कर भूपिण्डपर्य्यन्त अश्वत्थ वृक्ष की शाखा है । भूपिण्ड इस शाखा का उपान्त्य प्रदेश है । इसके आधार पर वितत महापृथिवी ही देवसत्य की प्रतिष्टा । षोडशीलक्षण श्रात्मसत्य ( अमृतसत्य ) पहिले स्वयम्भू आदि पञ्चात्मक ब्रह्मसत्य में अवतीर्ण होता है । अनन्तर भूपिण्ड के द्वारा देवसत्य में आता है । ' यदस्य त्वं, यदस्य च देवेषु ' ( केनोपनिषत् २ | | ) के अनुसार ' त्वं ' से उपलक्षित ब्रह्मसस्य, एवं ' देवेषु ' से उपलक्षित देवसत्य, दोनों में वही श्रमृतसत्य अवतीर्ण है । इसप्रकार ' देवसत्य ' नामक विराट् - पुरुष का पार्थक्य भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । यही वह सुपर्ण ( पक्षी ) है, जो अश्वत्थशाखा के छोर भाग ( पार्थिवभाग ) में प्रतिष्टित रहता हुआ अपने सखा सुपर्ण का साक्षी बना हुआ है । यही साक्षीसुपर्ण वस्तुगत्या ' ईश ', किंवा ' ईश्वर ' शब्द का मुख्य अवच्छेदक है । क्योंकि उसी मुण्डकप्रति ने आगे जाकर इस अनश्नन् - सुप को ' ईश ' शब्द से च्यवहृत किया है । देखिए! समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्य-- ' मी ' - मस्य महिमानमिति वीतशोकः । ( मुः ३३२ ) । - पोडशीपुरुषः - ' महेश्वरः - आत्मसत्यम् ३ - अक्षरः ( ५ ) ४ - आत्मक्षरः ( ५ ) १- परात्परः ( १ ) २- अव्ययः ( ५ ) आत्मसत्यम् ब्र ह्य -- प्रतिमेश्वरगर्भितः-‘ उपेश्वरः ’ - ब्रह्मसत्यम् १ - प्राणब्रह्म - स्वयम्भूः ( वाकू - शुक्रम् ) २- पोब्रह्म - परमेष्ठी ( आपः शुक्रम् ) ३ - वाग्ब्रह्म — सूर्य्यः ( अमृतमयग्निशु ) ४- अन्नब्रह्म – चन्द्रमाः ( आपः शुक्रम् ) १७६ स

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साक्षी सुपर्णः देवसत्यः -त्यः १- सर्वज्ञः ( १ ) आदित्यप्रधानः ( २१ ) २- हिरण्यगर्भः ( ८ ) वायुप्रधानः ३ - वैश्वानरः ( १५ ) --महिमापृथिवी} - ' ईश्वरः ' - देवसत्यः ( १ ) अग्निप्रधानः ( ६ ) } ५ - अन्नादब्रह्म – भूपिण्डः ( चित्यः ) ( वाकूशुकम् ) २६ - जीवात्म स्वरूप विश्लेषण — जैसा स्वरूप, जो श्रवयवसंस्थान ' ईशप्रनापति ' का है, ठीक वही स्वरूप, वही अवयवसंस्थान जीवात्मा ( संसज्ञविध त्र्यात्मक मानुषात्मा ) का है । केवल मात्रा में तारतम्य है । अतएव वह जहाँ ' पूर्णेन्द्र ' कहलाया है, वहाँ जीवात्मा ‘ अद्धेन्द्र ' नाम से व्यवहृत हुआ है । अध्यात्म, अधिभूत, भेद से नोवसर्ग दो भागों में विभक्त है । ईश्वर अधिदैवत है । इसी से अंश - प्रत्यंशरूपेण इन दोनों जीवसर्गों का विकास हुआ है । अभिभूत नीवसर्ग ' शिपिविष्ट ' नाम से प्रसिद्ध है । वज्र ( हीरा ), पुष्पराग, नील, मुक्ता, आदि धातुमात्र, पुस्तक लेखिनी - मसीपात्र - वस्त्रादि भूत - भौतिक पदार्थ, इन सबका शिपिविष्ट सर्ग में अन्तर्भाव है । अध्यात्मजीव ' तमः, रजः, सत्त्व ' मेद से तीन भागों में विभक्त है । श्रोषधि - वनस्पत्यादि प्रपञ्च तमोविशाल हैं, कृमि - कीट - पशु - पक्षी - मनुष्य, यह पञ्चसर्ग रजोविशालजीव हैं, एवं अष्टविध देवयोनिसर्ग सत्त्वविशाल जीव हैं, जैसाकि प्रकरणारम्भ में विस्तार से बतलाया जा चुका है । तत्र प्रतिपादित धातुजीव, मूलजीव, जीवजीव, तीनों में धातुजीव अधिभूतप्रपञ्च है, मूलजीव, जीव - जीब अध्यात्मप्रपञ्च हैं । दोनों संस्थाओं में सर्वत्र समानता है, केवल - देवसत्यस्वरूप में तारतम्य है । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए कि, श्रात्मसत्य -- ब्रह्मसत्य - दृष्टि से अधिदैवत - अध्यात्म - अधिभूत- तीनों संस्थाएँ समतुलित हैं । केवल नाम मात्र में अनन्तर है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है— १८०

पृष्ठ 197

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षोडशीपुरुषः तृतीयखण्ड पोडशीपुरुषः १ – स्वयम्भूः २– परमेष्ठी १ - अव्यक्तात्मा र २ - महानात्मा ३ – सूर्यः ४- चन्द्रमाः ३ – विज्ञानात्मा ४ - प्रज्ञानात्मा ५- पृथिवी ५- शरीरम् अधिदैवतम् अध्यात्मम् पोऽशीपुरुषः गुद्दा २ - आपः ३ – ज्योतिः ४ — अमृतम् ५- रसः अधिभूतम् ३० - उपनिषच्छास्त्र का मुख्य लक्ष्य-प्रकरणारम्भ में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, उपनिषदों का मुख्य प्रतिपाद्य जीवात्मा है, गौण प्रतिपाद्य ईश्वरात्मा है । दोनों विवतों का उपनिषदों में संचर - प्रतिसंचर, दोनों दृष्टियों से निरूपण हुआ है । ज्ञानपक्ष प्रतिसंचर है, विज्ञानपक्ष संचर है । ज्ञानसहकृत विज्ञान विश्वप्रपञ्च है, विज्ञानसहकृत ज्ञान विश्वात्म ( जीवात्म, ईश्वरात्म ) प्रपञ्च है । विज्ञानगर्भित ज्ञान विश्वातीत है । इसका उपनिषदों से क्या, किसी भी शब्दशास्त्र से सम्बन्ध नहीं है । नित्यशुद्ध बुद्ध मुक्त विश्वातीत का ज्ञान किसी भी साधन विशेष से कराया नहीं जाता । अपितु - ‘ तत् स्वयं योगसंसिद्धः काले नात्मनि विन्दति ' ( गी ०४ | ३८ | ) के अनुसार ग्रन्थिबन्धविमोक से स्वत: सिद्ध वह सहजज्ञान ' जीवात्मापीति ' का कारण बन जाता है । उसके लिए स्वाध्याय -जप - तप - नु-ष्टान – मनन - कुछ भी अपेक्षित नहीं है । वह अनुपास्य है, अविजिज्ञास्य है । उपनिषत् इसके सम्बन्ध में सर्वथा तटस्थ रूप से ‘ नेति - नेतीति होवाच ' यह कह सकती है । ' उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय क्या है '?, एतदभिप्रायात्मक ‘ उपनिषदों में क्या है?, ' इस प्रश्न का एकमात्र उत्तर " ज्ञानसहकृत विज्ञानात्मक विश्वप्रपञ्च, एवं विज्ञानसहकृत ज्ञानात्मक श्रात्मप्रपञ्च, आत्मप्रपञ्च में ईश्वरात्मप्रपञ्च का गौणरूप से, जीवात्मप्रपञ्च का प्रधान रूप से निरूपण हुआ है ” यही हो सकता है । एक रहस्यपूर्ण विश्लेषण – जीवात्मा के श्रभ्युदय - निःश्रेयस् के लिए उपनिषच्छास्त्र प्रवृत्त हुआ । है I जीवात्मा ‘ चिदाभास ' लक्षण है । इस चिदाभासलक्षण जीवात्मा की योनि ' महानात्मा ' नामक प्राकृत आत्मा है, १ = १

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भाष्यभूमिका जैसा कि – ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ' इत्यादि गोतासिद्धान्त से प्रमाणित है । महानात्मा अक्षरानुगृहीत माना गया है । यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, सूर्य्य से ऊपर अमृताव्यय की प्रधानता है, स्वयं सूर्य्य में अक्षर की, तथा सूर्य्य से नीचे क्षर की प्रधानता है । स्वयम्भू प्राणात्मकत्वेन ‘ ब्रह्म ’ है, यही व्यक्त है । परमेष्टी त्रात्मकत्वेन ' सुब्रहा ' है, यही महान् है, दोनों की समष्टि ' महद्ब्रह्मां है । अव्यक्त - महत्, दोनों सम्मिलित रूप से ' महान् ' हैं । उस चिदात्मा का अक्षरधिया इसी पर आभास ( प्रतिबिम्ब ) होता है । महद्ब्रह्मपर्यन्त अव्ययानुगृहीत अक्षर का साम्राज्य है, जैसा कि निम्न-- लिखित महल्लक्ष्ण से स्पष्ट है—

भृतं भविष्यत् प्रस्तौमि, महद्ब्रह्मकमक्षरम् ।

बहु ब्रह्म कक्षरम् ” ॥

महदक्षर का प्रथम विज्ञान से, विज्ञानद्वारा प्रज्ञान से, प्रज्ञानद्वारा वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञमूर्ति भोक्तात्मा से सम्बन्ध होता है । भोक्तात्मा ( कम्र्म्मात्मा ) ज्ञानजनित भावना, कर्म्मजनित वासनासंस्कार से लिप्त रहता है । इस मलिनावरण से परम्परया आगत शुद्ध आत्मसत्त्व भी मलिन हो जाता है । यही जीवात्मा का अनीशत्त्व है, यही ' अनीशया शोचति मुयमान: ' मुण्डकानुसार मोहमूलक दुःखप्रवृत्ति का कारण है । यह ध्यान रखने की बात है कि, ' जीबभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ' के अनुसार जीत्मा की मूलप्रतिष्ठा अव्यय - क्षरगर्भित ' अक्षर ' ( महदक्षर ) ही है । जीवात्ममुक्ति का एकमात्र अक्षर – दृष्टि पर ही पर्य्यवसान है । अक्षर ही जीवात्महृद्ग्रन्थि की प्रतिष्ठा है । इसके विमोक से ही मुक्तिलाभ निश्चित है, जैसाकि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ' इत्यादि रूप से पूर्व प्रकरणों में स्पष्ट किया जा चुका है । इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि, अव्ययानुगत अक्षर ही उपनिषच्छास्त्र का मुख्य लक्ष्य ( मुख्य-आत्मा ) है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से प्रमाणित है—

१ – “ विः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत् पदमत्रैतत् समर्पितम् ।

एतत् प्राणन्निमिपच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्वरिष्ठं प्रजानाम् " ॥

२ – “ यदच्चिं मद्यदणुभ्योऽणु यस्मिन् लोका निहिता लोकिनश्च ।

-तदेत - ' दक्षरं ब्रह्म ' स प्राणस्तदु वाङ ्म मनः ।

तदेतत् सत्यं तदमृतं तद्व ेद्धव्यं, सोम्य विद्धि " ॥

३ –– “ धनुगृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्य पासा निशितं सन्धयीत ।

आयम्य तद्भावगतेन चेतसा ' लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ” ॥

( मुण्डक २।२११,२,३, ) । १८२

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तृतीयखण्ड उक्त मन्त्रों का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' से मतार्थ है I । यहाँ इन उद्धरणों से यही बतलाना है कि, उपनिषदों का मुक्त्यधिष्ठाता आत्मा एकमात्र अव्ययानुगृहीत ' अक्षर ' ( महदक्षर ) ही है । जीवात्मावरण - निवृत्तिपूर्वक प्रज्ञानादि द्वारा अक्षर तक पहुँचा देना ही उपनिषदों का परम पुरुषार्थ है । अनृत, माया, जिह्मता, आदि पाप्मा अक्षरप्राप्ति में प्रतिबन्धक हैं । एवं ब्रह्मचर्य्य, तपः, सत्य, वेदानुपालन, श्रद्धा, उपनिषत्, ये ६ धर्म्म ' तत्प्राप्त्युपाय हैं । इनके द्वारा श्रात्मत्रल ( भक्तात्मबल ) बढ़ाता हुआ भोक्तात्मा महान् - प्रज्ञान - विज्ञानादि साधनभूत ज्ञानों में से किसी एक को द्वार बना कर, अथवा परम्परया क्रमशः सत्र मध्यस्थों को द्वार बनाता हुआ अन्ततः लक्ष्यवेध में समर्थ हो जाता है । शरीर रथ है, इन्द्रियाँ अश्व हैं, बुद्धि सारथि है, मन प्रग्रह ( लगाम ) है, कर्म्मप्रपञ्च मार्ग है, महदक्षर गन्तव्यस्थान है । वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञमूर्ति भोक्तात्मा यात्री है । लक्षीभूत महदक्षर पर इसे पहुँचना है । वह प्राप्तव्य एक है, परन्तु बलात्मक – कर्म्मतारतम्य से तद्रूप प्रज्ञानादि मार्ग अनेक हैं, भिन्न भिन्न हैं * । प्राप्तिसाधनभूत-द्वारभेद से जहाँ उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय भिन्न भिन्न है, वहाँ प्राप्तव्य की दृष्टि से सत्र उपनिषदें अभिन्नार्थ-प्रतिपादिका बन रहीं हैं । विश्वचरसंस्था को मुख्य धरातल मानते हुए ज्ञान - विज्ञान - दृष्ट्या घोडशी का निरूपण, तत्र -- प्रतिष्ठ--अव्यक्तादि खण्डात्माओं का निरूपण, आवरणस्वरूपविश्लेषण, तन्निवृत्युपायप्रदर्शन, आदि ही उपनिष-च्छास्त्र के प्रतिपाद्य विषय हैं । किसी उपनिषत् में समष्टिरूप से अखण्ड - सखण्ड सभी का विश्लेषण हुआ है । कोई प्रज्ञानात्मा का विश्लेषण कर रहा है । इसी प्रकार किसी में प्रज्ञान का, किसी में विज्ञान का, किसी में भोक्तात्मा का, किसी में प्राणात्मा का स्पष्टीकरण हुआ है । और अवश्य ही द्वारभेददृष्टया सत्र उपनिषत् भिन्न - भिन्न तत्त्वों की ही प्रतिपादिका हैं । जिस नीवात्मा के बन्धन विमोक के लिए उपनिषच्छास्त्र प्रवृत्त हुआ है, उस जीवात्म - विवर्त्त का स्वरूप उद्धृत कर परिच्छेद उपरत हो रहा है । * रुचीनां वैचित्र्याद् - ऋजु - कुटिल - नानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ ( पुष्पदन्तः ) १ = ३

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श्रमृतसत्यम् १- परात्परः ( १ ) भाष्यभूमिका २- श्रव्ययः ( ५ ) -अक्षर प्रधानः फोडशी --- ( पुरुषः ) ३- अक्षर: ( ५ ) ४ - आत्मक्षरः ( ५ ) ॥। मनः ॥ १ । परं परः परः महान् पुरुषः अर्थेभ्यश्व ह्यर्था ेरात्मा परा बुद्धिबुद्ध परा परमव्यक्तमव्यक्तात् इन्द्रियेभ्यः " महतः मनस्तु ) कठ ( || || २ गतिः परा सा काष्ठा सा किञ्चित् परं पुरुषान्न १ - श्रव्यक्तं ब्रह्म - स्वायम्भुवम् श्रव्यक्तात्मा - ( अव्यक्तम् ) २ - महद्ब्रह्म --- पारमेष्ठयम् - महानात्मा - ( महान ) ३ - विज्ञानं ब्रह्म - सौरम् --- विज्ञानात्मा - ( बुद्धिः ) ४- प्रज्ञानंब्रह्म -- चान्द्रम् - प्रज्ञानात्मा ( मनः ) १- प्राज्ञः- - सर्वज्ञांशः २ - तैजसः -- हिरण्यगर्भाशः ३ वैश्वानरः वैश्वानरांशः पार्थिवाः प्राणात्मा ( आत्मा ) -हा स-भोक्ता देवसत्यम् - सुपर्णः -त्यम्५- शरीरंब्रह्म - मोमम्---भूतात्मा - ( शरीरम् ) ( १ ) - ' ईशोपनिषत् ' – ( ' गृढोत्मावर्णन परेयमुपनिषत् ' ) ३१ - ईशोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय— उपनिषदास्त्रों में प्रतिपादित विषयों का पूर्वपरिच्छेदों में स्वतन्त्ररूप से दिग्दर्शन कराया गया । अत्र उदाहरण के लिए कुछ एक उपनिषदों की विषय- तालिका और उद्धत कर दी जाती है । यह विषय -तालिका उपनिषत् - स्वाध्याय- प्रेमियों के लिए विशेषरूप से अनुरअन की सामग्री होगी, ऐसा श्रात्मविश्वास है । उपलब्ध उपनिषद् ग्रन्थों में ' ईश ' नाम की ' बाजसनेयोपनिषत् ' का प्रथम स्थान है । ईश ही सम्पूर्ण विवों की प्रथम भूमिका है । अतः तत्प्रतिपादनपरा इस उपनिषत् का प्रथम - सन्निवेश न्यायसङ्गत १८४