Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 201–210

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 201 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयखण्ड नाम से ही गतार्थ है । ही माना जायगा । ईशोपनिषत् में जिस विषय का निरूपण हुआ है, वह इसके ही ईशोपनिषत् का प्रधान ' गूढोत्मा ' नाम से प्रसिद्ध ईशप्रजापति का ' सञ्चर ' क्रम से श्रामूल - चूड विश्लेषण - विषयनिरूपिका बनतीं हुई जहाँ प्रतिपाद्य विषय है । आगे की सम्पूर्ण उपनिषत् खण्ड - खण्ड्यत्मक ( षोडशी का ) निरूपण करती हुई यह तूलस्थानीया हैं, वहाँ सर्वखण्डात्मक - निरूपणपूर्वक अखण्डात्मा का कि, यन्त्रयावत् उपनिषदों के सचमुच ' मूलोपनिषत् ' बन रही है । दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए ' सर्वोपनिपत् ' बन रही है । अथवा यच्चयावत् प्रतिपाद्य विषयों का संक्षेप से संग्रह करती हुई यह उपनिषत् करती हुई यह ' पूर्णोपनिषत् यह कह लीजिए कि पूर्णेश्वर की सर्वविध पूर्णविभूतियों का विश्लेषण बन रही है । अमृतात्मा, स्वयम्भू, परमेष्ठी, पृथिवी, इन पर्वों की समष्टि पूर्णेन्द्रविव प्रज्ञानात्मा, वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ - लक्षण , सूर्य्य, चन्द्रमा, वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञात्मक ईश्वरीय देवसत्य ( ईश्वरविवत ) है, एवं श्रमृतात्मा, अव्यक्तात्मा, विज्ञानात्मा ', ) भोक्तात्मा, शरीर, इन पर्वों की समष्टि श्रद्धेन्द्रविव ' ( जीवविवर्त्त सिद्ध करते हुए पूर्णेन्द्रलक्षण है । ईशने दोनों का स्वरूप बतलाते हुए, सम्बन्ध व्यक्त करते हुए, दोनों का ईशविज्ञानभाष्य अभेद में प्रतिपादित है । ' अक्षर ' को ही लक्ष्य बनाया है, जैसा कि सहस्रपृष्ठात्मक - खण्डद्वयात्मक ईश के मन्त्रों का निम्नलिखित रूप से प्रकरण विभाजन हुआ है-१ - ईशोपनिषत् -अमृतात्मनि द्विविध - सत्यात्मनिरुक्तिः - ' ईशोपनिषत् ' श्र पूर्णमदः पूर्णमिदम् ' ) १ – पुरुषात्माधिकरणम् { विद्याकर्म्ममयः पुरुषो गूढोत्मा पोडशी - ( ' अमृतात्मा ( १ ) १ – ईशावास्यमिदं सर्वम् ० । ( २ ) २ – कुर्वन्नेवेह कर्माणि ० ( ३ ) ३ – सुर्य्या नाम ते लोकाः 1 - * --० ' वा ' सत्यात्मा ' ) २ — अव्यक्तात्माधिकरणम् ( ब्रह्मसत्याक्षरः ' स्वयम्भूः ' ' अव्यक्त ( ४ ) — १ अनेजदेषं मनसो अवीयः ० । ३ -- अमृतात्मना सह ब्रह्मसस्यस्य सम्बन्धनिरूपणाधिकरणम् ( ५ ) १ – तदेजति तन्नैज॑ति ( ६ ) २ -- यस्तु सर्वाणि भूतानि I 1 ० I ( ७ ) ३ – यस्मिन्त्सर्वाणि भूतानि । - * -० १८५

पृष्ठ 202

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 202 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भाष्यभूमिका ४ -- महात्माधिकरणम् ( ब्रह्मसत्याक्षरः ' परमेष्ठी ' ' महान् ' वा सत्यत्मा ) ( ८ ) -१ - स पर्य्यगाच्छ्र ुक्रमकायमत्रणम् • । ---५ -- विज्ञानात्माधिकरणम् ( ब्रह्मसत्याक्षरः ' सूर्य्यः ' ' बुद्धि ' - सत्यात्मा ) ( ६ ) १ – अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्याम् ० । ( १० ) २ – अन्यदेवाहुर्विद्यया • । ( ११ ) ३ – विद्यां चाविद्यां च ० । --६ -- प्रज्ञानात्माधिकरणम् ( ब्रह्मसत्याक्षरः ' चन्द्रमाः ' ' मनो ' वा सत्यात्मा ) ( १२ ) १ – अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिम् ( १३ ) २ – अन्यदेबाहुः सम्भवात् 0 | । ( १४ ) ३ – सम्भूति च विनाशं च ० । ६ - प्राणात्माधिकरणम् ( देव सत्याक्षरः - ' वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञो वा वैश्वानर- तैजस-( १५ ) - हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य ० । ( १६ ) २ – पूषन्नकर्षे यम सूर्य्य प्राजापत्य • । ( १७ ) ३ - - वायुरनिलममृतम् प्राज्ञो वा- त्रिकलः सत्यात्मा ) । ७ – शरीर त्रयात्माधिकरणम् ( ब्रह्मसत्याक्षरः पृथिवी, शरीर- हंस - कम्र्मात्मा वा ' सत्यात् " ॥ ( १७ ) १ – अवेदं भरमान्तं शरीरम् ० । - * --६-- उभयोः सत्यात्मनोरग्निना सह- ऐकात्म्यम् ( १८ ) १ – अग्ने नय सुपथा राये ० । ओं पूर्णमदः पूर्णमिदम् समाप्ता चेयमीशोपनिषत् १ १८६

पृष्ठ 203

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 203 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२ - केनोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय-तृतीयखण्ड ( ३ ) - केनोपनिषत् ( प्रज्ञानात्मवर्णन परेयमुपनिषत् ) ' तलवकारोपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध ' केनोपनिषत् ' में अग्नि - वायु - इन्द्र समष्टिलक्षण वैश्वानर- तैजस-प्राज्ञ - मूर्ति भोक्कात्मा का विश्लेषण करते हुए, प्रज्ञा - सोममय, सर्वेन्द्रिय- अनिन्द्रिय नामक प्रज्ञानात्मा को लक्ष्य ' हुए प्रज्ञानद्वारा ही लक्षीभूत अक्षरब्रह्मोपासना का विधान हुआ है । सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान - क्रिया-अर्थत्रयी का ही साम्राज्य है । समष्टि, अथवा व्यष्टिरूप से सर्वत्र सत्रको इन्हीं तीनों शक्तियों से आक्रान्त देखा जायगा । पाञ्चभौतिक विश्व में ' अस्माकमेवेदं खलु भुवनम् ' के अनुसार त्रिशक्तिमूर्त्ति तीन देवताओं का प्रभुत्त्व है । तीनों शक्तियों के उक्थ अग्नि - वायु - इन्द्र - देवता माने गए हैं । अग्नि अर्थ का, वायु क्रिया का, इन्द्र ज्ञान का अधिष्टाता है । इस सम्बन्ध में हमारे सामने यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, जब हम अधिदैवत, अध्यात्म, अधिभूत, इन तीनों प्रपञ्चों में ज्ञान - क्रिया- अर्थ से अतिरिक्त किसी चौथे तत्त्व को उपलब्ध नहीं करते, तो फिर त्रिशक्तिमूर्ति उक्त अग्न्यादि तीन देवताओं के ( क्षर के ) अतिरिक्त चतुर्थ नित्य ' ब्रह्म ' नामक अपूर्व तत्त्व की सत्ता क्यों, किस आधार पर स्वीकार की जाय? । भूत - देव से अतिरिक्त ग्रात्मतत्त्व की कल्पना करना क्या व्यर्थ नहीं है?, क्यों इनसे अतिरिक्त अतीन्द्रिय आत्मब्रह्म की कल्पना की जाय?, इस भावना के प्रतिवाद के लिए ही केनोपनिषत् प्रवृत्त हुई है । बतलाया गया है कि, विश्वविवर्त्त से जिस अग्न्यादिदेवतालक्षण भोक्तात्मा ( जीवात्मा ) को यह अभिमान हो रहा है कि, मैं ही सत्र कुछ हूँ, मुझसे अतिरिक्त नित्य ब्रह्म नामक कोई तत्त्व नहीं है, वह अभिमान एकमात्र प्रज्ञानब्रह्म पर ही अवलम्बित है । विज्ञानद्वारा प्रज्ञानगत चिदात्मलक्षण अक्षरब्रह्म ही प्राज्ञइन्द्र से संसक्त होकर सब को स्व शक्ति से स्व - स्व कार्य में प्रतिष्ठित किए हुए है । ' ब्रह्मणो वा विजये महीयध्वम् ' के अनुसार उसीके विजय में ये क्षरदेवता स्व - स्वकर्म में समर्थ बने हुए हैं । उसमे पृथक हो जाने पर ये एक तृण के कुब्जीकरण में भी असमर्थ हैं । इसी ज्ञानीय - तृण को उदाहरण बनाते हुए ‘ केन ' ने प्रज्ञानधिया अक्षर ब्रह्मप्राप्ति का उपाय बतलाया है । पूर्वपरिच्छेद- कथनानुसार अक्षरदृष्टया सम्पूर्ण उपनिषदों के निरूपणीय विषयों का जहाँ सामानाधिकरण्य है, वहाँ द्वारभेददृष्ट्या सत्र का वैय्यधिकरण्य है । इसी द्वारभेद के आधार पर यह कहा जा सकता है कि - सर्वेन्द्रियप्रवर्तक, अतएव सर्वेन्द्रिय नाम से प्रसिद्ध ' नियतविपयत्वमिन्द्रियत्वम् ' इस इन्द्रियलक्षण से प्रतीत होने से अनिन्द्रिय नाम से भी व्यवहृत ' प्रज्ञानमन ', किंवा ' प्रज्ञानात्मा ' का ही केनोपनिषत् में विश्लेषण हुआ है । केनोपनिषत् में प्रतिपादित विषयों का संक्षिप्त सार निम्न लिखित शिक्षादेशों में विभाजित किया जा सकता है— १ - इन्द्रियाँ - उक्थ नहीं हैं, अपितु ' प्रज्ञानात्मा ' ही उक्थ है । २- देवत्रयी का विश्वविजय चिदनुग्रह पर ही अवलम्बित है । ३- महान सोम पर प्रतिबिम्बित चिदात्मा ही महदतर है । ४ - विश्वप्रविष्ट चिद्भाग ही तृण है । ५- प्राज्ञेन्द्रगर्भित चिच्छक्तिमय सौर तेजोमय प्रज्ञासोम ही हैमवती उमा है । १८७

पृष्ठ 204

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 204 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भाष्यभूमिका ६ - उपासना देवता की ही होती है । ७- प्रज्ञानसम्परित्रक्त प्राज्ञ इन्द्र ही मन है । ८ - देवोपासना शक्त्युपासनापूर्विका बन कर ही फलप्रदा होती है । विषय विभाग के सम्बन्ध में भी दो शब्द कह देना श्रावश्यक होगा । केनोपनिषत् के ३४ मन्त्र ' ८-५-१२-१ ' इस क्रम से चार खण्डों में विभक्त मानें कहेंगे । विषयसङ्गति को दृष्टि से यह विभागचतुष्टयी गए हैं, जिन विभागों को हम ' दार्शनिक विभाग ' समन्विता है, जैसा कि एतद्विज्ञानभाष्य में स्पष्ट कर दिया गया है । विज्ञानदृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला विभाग ही अर्थसमन्वय की दृष्टि से उपयुक्त है । इन दोनों विभागों का यहाँ उल्लेख कर दिया जाता है । दार्शनिक विषयत्रिभाग— १- प्रथमः खण्डः ११ - अथेन्द्रमत्र वत् ० । ४ - प्रतिबोध ० ५- इह चेदवेदीत् ० १२ स तस्मिन्नाकाशे २- श्रोत्रस्य श्रो ० १- केनेषितम् ३- न तत्र चतु ० ४- यद्वाचानभ्यु ० ५ - यन्मनसा न ० ६- यञ्चदुमा न ० इति द्वितीय: खण्ड: ३- तृतीयः खण्डः १ - झह देवेभ्यो ० २ - तद्वेषां विजिज्ञी इति तृतीयः खण्डः ४- चतुर्थः खण्डः १ - सा बझे ति ० । २ - तस्माद्वा एते ० । ७- यच्छोत्रेण न ० ३- वेऽग्निमन् वन् ० ८ - यत् प्राणेन प्रा ० ४- तदभ्यद्रवत् ० ३- तस्माद्वा इन्द्रो • ४- तस्यैष श्रादेशः ० ५- श्रथाध्यात्मम् ० इति प्रथमः खण्डः ५- तस्मिंरु चार्य ० २- द्वितीयः खण्डः ६- तस्मै तृणम् ० ७- अथ वायुम् ० ८ - तदभ्यद्रवत् ० १ - यदि मन्यसे २- नाहं मन्ये ० ६ तस्मिंस्त्वयि ० ३- यस्यामतं ० १० तस्मैतृणम् ० १८८ ६- तद्ध तद्वनम् ० ७ - उपनिषदं भो ० - तस्मै तपो दमः ० ६ - यो वा एताम् ० इति चतुर्थ: खण्ड:

पृष्ठ 205

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 205 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयखण्ड कर्म्मात्मस्वरूपविश्लेषणपूर्वक इसका चिदात्मा से सम्बन्धप्रतिपादन, कम्र्मात्मप्रतिष्ठाभूत प्रज्ञानात्म-निरूपण, प्रज्ञानस्थित शुद्ध त्रिदंशनिरूपण, तत्प्राप्त्युपाय - प्रदर्शनपूर्वक फलश्रुतिदिग्दर्शन, इन चार मुख्य प्रतिपाद्य विषयों के सम्बन्ध से खण्ड तो चार ही मानें जायँगे, परन्तु इन क्रमिक विषयों के क्रम - निरूपण की दृष्टि से मन्त्रसंख्या, तथा दर्शनाभिमत खण्डमर्य्यादा में विपर्य्यय करना पड़ेगा । और निश्चयेन इस वैज्ञानिक विभाग को एक उपयोगी विभाग माना जायगा । वैज्ञानिक विभाग-१- कम्र्मात्माधिकरणम् २- प्रज्ञानात्माधिकरणम् ३- चिदात्माधिकरणम् ( कम्र्म्मात्मखण्डः प्रथमः ( प्रज्ञानात्मखण्डो द्वितीयः ) -( चिदात्मखण्डस्तृतीयः ) -४- चित्प्राप्त्युपाय प्रदर्शनाधिकरणम् ( चित्प्राप्तिखण्डश्चतुर्थ: ) --१८ मन्त्र ५ २ ३४ संकलन १ - प्रथमाधिकरणे— १४- तस्माद्वा एते ० ८ - यत् प्राणेन प्राणिति ० १ - ब्रह्म ह देवेभ्य: ० १५ - तस्माद्वा इन्द्रो ० इति - द्वितीयः खण्डः २ - तद्वैषां विजज्ञौ ०० १६ - तस्यैष आदेशः ० ३- तृतीयाधिकरणे --३- तेऽग्निमत्र वन् ० ४- तदभ्यद्रवत् ० ५- तस्मिंस्त्वयि ० ६ – तस्मै तृणम् ० ७- अथ वायुमत्र वन् ० = -तद्भ्यद्भवत् ॰ ६- तस्मिंस्त्वयि ० १० - तस्मै तृणम् ॰ ११ - अथेन्द्रमब्रु वन् १२ - स तस्मिन्नाकाशे ० १३ - सा ब्रह्मेति ० १७- अथाध्यात्मम् ० १८ - तद्ध तद्वनम् ० इति- प्रथमः खण्डः २- द्वितीयाधिकरणे--१ - केनेषितं पतति ० २ - श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ० ३- न तत्र चक्षु ० ४- यद्वाचानभ्यु ० ५- यन्मनसा न ० ६- यच्चक्षुषा न ० ७ - यच्छ्रोत्रेण न ० १ - यदि मन्यसे सुवे ० २- नाहं मन्ये सुवे ० ३ - यस्यामतं तस्य ० ४- प्रतिबोधवि ० ५ - इह चेदवेदीत् ० इति- तृतीयः खण्डः ४ - चतुर्थाधिकरणे--१ - उपनिषदं भो ब्र ० २ - तस्यै तपो दमः ० ३ - यो वा एताम् इति चतुर्थः खण्डः

पृष्ठ 206

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 206 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३३ - कठोपनिपत् के प्रतिपाद्य विषय मायभूमिका ( ३ ) - कठोपनिषत् ( भोक्तात्मवर्णन परेयमुपनिपत् ) -कठोपनिषत् में यद्यपि प्रधानतया ' भोक्तात्मा ' का ही निरूपण है, तथापि गौगणदृष्टि से इसमें प्रायः सभी विषयों का समावेश हुआ है । स्वर्ग, नरक, यम, धर्म, अग्नि, खण्डात्मविवन, अश्वत्थ, योग, विद्या, विभूति श्रादि तत्त्वों का संक्षेप से विश्लेषण करने वाली यह उपनिषत् अपना एक विशेष महत्त्व रखती है । ‘ नचिकेता ' नामक ब्राह्मण बालक पिता के ' मर्ववेदसूयज्ञ ' में दक्षिणा रूम से प्रदत्त भीति से शरीर छोड़ कर श्रातिवाहिक शरीर से परलोक में पहुंचता है । तीन रात्रियों के अनन्तर उसका यमराज से साक्षात्कार होता है । जिस प्रकार साध्वी सावित्री की पतिभक्ति पर प्रसन्न यम ने उसे तीन वर प्रदान किए थे, वैसे ही नचिकेता की पितृभक्ति पर, तथा तीन रात्रियों तक निराहार रहने के प्रतिशोधरूप तीन वर मांगने का नचिकेता को श्रादेश मिलता है । नचिकेता प्रश्न करता है कि, कितने ही विद्वान् श्रात्मा को ' रथवत् ' मानते हैं । धुरा, पहिया, कस्तम्भी, प्रउग, आदि को समष्टि ही रथ है । रथावयवों से ' रथ ' नामक अवयवी पृथक नहीं हैं । एव-मेव हस्त पाद - मस्तकादि अवयवसमष्टि ही आत्मा है | शरीरातिरिक्त श्रात्मा कोई नित्य तत्त्व नहीं है । एवं कितने ही ब्रह्मवादियों का कहना है कि, श्रात्मा ' सरवत् ' है । सरोवर के सूख जाने का तात्पर्य्य यही है कि, पानी सूक्ष्मरून ( चाष्परूप ) में परिणत होकर लोकान्तर ( अन्तरिक्ष ) में चला जाता है । एवमेव स्थूलशरीर के निधनानन्तर श्रात्मा श्रङ्गष्ठमात्र श्रतिवाहिक शरीर धारण कर स्वकम्र्मानुसार तत्तल्लोकविशेषों में गमन करता रहता है । इसप्रकार ' प्रेतात्मा ' के सम्बन्ध में चिरकाल से विद्वानों में मतभेद चला आ रहा है । मैं जानना चाहता हूँ कि, बस्तुस्थिति क्या है? । नचिकेता के श्रात्मविषयक उक्त प्रश्न को सुन कर पात्रता परीक्षा के लिए यमराज उसे प्रलोभनों में डालना चाहते हैं । परन्तु संस्कारी बालक अपने प्रश्न पर दृढ़ रहता है और कहने लगता है-अन्यत्र धर्म्मात्, अन्यत्राधम्र्म्मात्, अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । अन्यत्र भूताद्, भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ उत्तर में अव्यय - क्षरविशिष्ट उसी अक्षरब्रह्म को लक्ष्य बनाते हुए यमराज कहते हैं-सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति ॥ यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति । तत्पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥ " ओम् ' इत्येतत् " । ' ओम् ' के एकाक्षरत्त्व का क्या स्वरूप है?, स्वर्म्याग्नि का क्या स्वरूप है?, उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है १, इत्यादि प्रश्नसमाधिपूर्वक इस उपनिषत् में अश्वत्थविद्या, ब्रह्म सत्यविद्या, देवसत्यविद्या, कर्म्मयोग, ज्ञानयोग, आदि विद्या, तथा योगों का अपूर्व विश्लेषण हुआ है । संक्षेपतः भोक्लात्मद्वारा अक्षर-१६०

पृष्ठ 207

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 207 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयखण्ड लक्ष्यावाप्ति बतलाते हुए इस उपनिषत् ने ग्रात्मन्वी की विद्यात्मिका विभूति, एवं कर्मात्मक योग, इन दो पर्वों का अनेक दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया है, जैसा कि उपनिषत् के निम्नलिखित उपसंहारवचन मे प्रमाणित है—

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा ' विद्या ' मेतां ' योग ' विधिं च कृत्स्नम् ।

ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥

१ - प्रथमा वल्ली-१ – उप घातप्रक ( णम्-( कठ ० ६।१८ । ) । १ वल्ली, १ अध्याय, १ मन्त्र से मन्त्रपर्यन्त १० " " ११ " " " " 2 २ –प्रथमवरवरणं, तद्दानं च—— ३ – स्वग्र्ग्याग्निजिज्ञासारूप-द्वितीयवर वरणं तद्दानं च ४ — तृतीयवराभ्यर्थना — ५- सृङ्काप्रदानप्रस्तावः-६ — नचिकेतोविमर्शः-२ - द्वितीया वल्ली-७ — नचिकेतोधैर्य्यप्रशंसा-१२ १६ " " " 3 " " " २० २२ 29 " " " २३ २५ 23 " " " " २६ २६ " " " " " " इति - प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ८ - परात्परस्थ पुरुषत्रयविज्ञानम्--१ · X २ वल्ली, १ अध्याय. १ मन्त्र से 22 " " १४ १३ पर्यन्त १६ " 91 २० " 19 २४ ६ - पारावारो महानात्मा शारीरात्मको धाता -., इति -- प्रथमाध्यायेद्वितीया वल्ली २ -X-१६१ ---

पृष्ठ 208

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 208 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३ - तृतीया वल्ली-१८ – महतः सेतोः परपार संस्थानम्--११ – मतः पारे यात्रिको भोक्तात्मा-१२ -- ब्रह्मविष्विन्द्राधिकृतेषु - अभया-व्ययाक्षरपदेषु विष्णुपदावच्छेदेन यात्रा निमित्तम् १३ -- भोक्तात्मनः पारायणीयः पन्थाः --१४ - भोक्तुः पारायणीयो योगक्रमः-१५ – पारायण विद्योपसंहारः-४ - चतुर्थी बल्ली -- इन्द्रियानुगतायाः - विज्ञानात्मनो-द्रष्टु ष्टे: - प्रत्यगात्मानमनु-परावर्त्तनादेशः १७ -- महतो विभूति - योगौ-१८ -- मृत्युस्वरूपनिरूपणम्-भाष्यभूमिका ३ वल्ली, १ अध्याय, 23 99 I " 2 39 " " 33 " ३ ४ वल्ली, २ अध्याय, ३ 99 १० 95 १६२ 2 १ X ३ ४ X ५ I x १२ १० X १३ १५ x १७ १६ X १ X ११ x इति — प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ( प्रथमोऽध्यायश्च समाप्तः )

पृष्ठ 209

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 209 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

arrears १६-- श्रातिवाहिकशरीरावच्छि-न्नस्य भोक्तात्मनः सर्वग्रन्थि---- ४ वल्ली २ अध्याय १२ १५ विमोके परमात्मनि लयः इति - द्वितीयाध्याये चतुर्थी वल्ली ४ -५ - पञ्चमी वल्ली --२० – पुरस्वरूपनिरूपणपूर्वकं षोडशकला--वच्छिन्नस्य भोक्तात्मनः स्वरूपप्रदर्शनम् २१ – व्यानस्वरूपविमर्शः-५ वल्ली, २ अध्याय, १ x ३ ३ x ५ " " " २२ – योनिस्त्ररूपनिरूपणम् -६ x ७ " " " " २३ – ब्रह्मसत्यनिरूपणम्-२४— देवसत्यनिरूपणम्-" " " 15 ८ -x ११ 22 १२ x १५ 22 ६ -- षष्ठी वल्ली-२५- अश्वत्थनिरूपणम् इति -- द्वितीयाध्याये पञ्चमी वल्ली २६ – विद्योपदेशः २७-- आत्मसंस्थाक्रमप्रदर्शनम् २८ – इन्द्रिय चारणलक्षण ) योगोपदेशः २६ -- सत्तारूपेणात्मनः साक्षात्कारः ५ --- --१६३ ६ वल्ली, २ अध्याय, " " १ x ३ ४ X ५ " ६ x ε " I १० X ११ " 3 १२ X १३ " " "

पृष्ठ 210

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 210 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

I ३० - व्यानप्रन्थिविमो के परामुक्तिः ३१ - नाडीस्वरूपविज्ञानम् ३३ – फलश्रुतिप्रकरणम् भाष्यभूमिका ६ वल्ली २ अध्याय १४ x १५ ": " १६ x १७ 19 99 १८ X x इति — द्वितीयाध्याये षष्ठी वल्ली ( द्वितीयोऽध्यायश्च समाप्तः ) समाप्ता चेयं कठोपनिषन् ३४ – प्रश्नोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय -३-४ – प्रश्नोपनिषत् ( खण्डात्मानुगतप्राणप्रपञ्च निरूपणपरेयमुपनिषत् ) ' पिप्पलादोपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध षट् - प्रश्नात्मिका इस उपनिषत् में प्राणविद्या - प्रतिपादन के द्वारा ‘ अक्षरलक्ष्य ' की ओर सङ्केत हुआ है । आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, भेद से प्राण के मुख्य तीन विवर्त्त हैं । प्रत्येक के असंख्य विवर्त हैं, जैसा कि - ' को हि तद्वेद, यावन्त इमेऽन्तरात्मन् प्राणा: ' ( शत ७ | २ | २ | २० | ) निगम से स्पष्ट है । अनेकधा विभक्त इन आध्यात्मिक प्राणों के कोशभूत पाँच आध्यात्मिक प्राणों का ही इस प्राणोपनिषत् में विश्लेषण हुआ है । ' यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ' ( श्वेताश्वतर ० ) के अनुसार श्राध्यात्मिक, श्रमृतात्मलक्षण षोडशीपुरुष में श्रव्यकप्राण, महतप्राण, विज्ञानप्राण, प्रज्ञानप्राण, पशुप्राण, भेद से पाँच प्राकृत प्राण प्रतिष्ठित हैं । इसी पञ्चप्राणसमष्टि का पूर्व के पारिभाषिक परिच्छेदों में ' विश्वसृट् ' नाम से विश्लेषण हुआ है, एवं इन्हीं को ' प्राणः - आपः वाक् - अन्नं अन्नादः ’ कहते हुए इनकी समष्टि को ' ब्रह्मसत्य ' कहा गया है । इन पाँच मुख्य प्राणों के साथ एक एक भूतभाग प्रतिष्ठित रहता है | भूत ही प्राण की प्रतिष्ठा ( आलम्बन ) है । भूत - प्राण - भेद से दो कलाओं में विभक्त पञ्चप्राण-निरूपण - पूर्वक पञ्चप्राणधारभूत षोडशी पर विश्रान्ति ही उपनिषन्निकर्ष है । सत्यकाम शैव्य, सौर्य्यायण गार्ग्य, कौशल्य आश्वलायन, भार्गव वैदभि, कबन्धी कात्यायन, छत्र ब्रह्मसत्य ( प्राणपञ्चक ) जिज्ञासु समित्पाणि होकर प्राणविद्याचार्य्य महर्षि पिप्पलाद के आश्रम में पहुँचते हैं । और क्रमश: प्राणस्वरूप के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं । प्रश्न सम्बन्ध से यह उपनिषत् ' प्रश्नोपनिषत् ', पिप्पलाद सम्बन्ध से ' पिप्पलादोपनिषत् ', एवं प्राणप्रतिपादन सम्बन्ध से ' प्राणोपनिषत् ' कहलाई है । प्रथम प्रश्न में रयि - प्राणात्मक ' महत्प्राण ' का, दूसरे प्रश्न में धिषणाप्राणात्मक ' विज्ञानप्राण ' का, के अधिष्ठाता प्रज्ञा - प्राणात्मक ' प्रज्ञानप्राण ' का, चौथे तीसरे प्रश्न में जाग्रत - स्वप्न सुषुप्ति प्रश्न में भूत - प्राण-त्मक ' भूतप्राण ' का, पाँच प्रश्न में अव्यक्त - प्राणात्मक ' अव्यक्तप्राण ' का निरूपण हुआ है । ये पांचों प्राण ' अरा इव रथनाभौ ' के अनुसार नाभिस्थानीय षोडशकल पुरुष में प्रोत हैं । छठे प्रश्न में उसी पुरुषतत्त्व का विश्लेषण हुआ है । १६४