Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 211–220
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220
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तृतीयखण्ड प्रथम प्रश्न में रवि - प्राणात्मक महत प्राण के निरूपण के साथ साथ अहोरात्र, पक्ष, मास, अयना-धिष्ठाता, उत्तरायण - दक्षिणायनप्रवर्त्तक, पञ्चपाद, द्वादशाकृति, सप्तचक्रात्मक सम्वत्सरप्रजापति का तात्त्विक विश्लेषण हुआ है । द्वितीय प्रश्न में धिषणा - प्राणात्मक विज्ञानप्राणनिरूपण के साथ साथ प्राणों के स्वा-भाविक विघृति, प्रतिष्ठा, ज्योतिः, इन तीन धम्र्मों का विश्लेषण हुआ है । अनन्तर प्राण के ग्रन्नादभाव का उपबृंहण करते हुए इसका सर्वाधिष्ठातृत्त्व सिद्ध किया गया है । तीसरे प्रश्न में प्रधानरूप से प्रज्ञा - प्राणात्मक प्रज्ञानप्राण का निरूपण करते हुए मुप्रसिद्ध ' प्राण - उदान - व्यान - समान - अपान ' इन पाँच वायव्य प्राणों की वैज्ञानिक मीमांसा हुई है । इसी में द्वासप्ततिसहस्र ( ७२००० ) नाड़ियों का स्वरूपपरिचय हुआ है । उद्गार, निमेष, उन्मेष, क्षुधा, पिपासा, जृम्भा, श्वयथु, कम्पन, गमन, रुदन, हसन, आदि चेष्टाविशेषों की प्रति -ठारूप कुकल, धनञ्जय, देवदत्त, नाग, आदि प्राण भी इसी प्रश्न के तात्त्विक विषय हैं । चतुर्थ प्रश्न में प्रधान रूप से भूत - प्राणात्मक मर्त्यप्राण ( भूतप्राण ) का विश्लेषण करते हुए प्राणाग्निवितों की मीमांसा करते हुए कौन जागता है, कौन सोता है, कौन उभयवम्र्मावच्छिन्न है?, इत्यादि प्रश्नों का वैज्ञानिक समाधान किया है । पाँचवें प्रश्न में अव्यक्त प्राणात्मक ' अव्यक्त प्रारण ' का प्रधान रूप से निरूपण करते हुए ' श्रोङ्कार ' की तात्विक व्याख्या हुई है । छठे प्रश्न में प्रधानतया घोडशकल पुरुष के निरूपण के साथ साथ पुरुष के क्षर भाग से उत्पन्न भूतसृष्टि का भी तात्त्विक विबेचन हुआ है । यही इसके प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त प्रदर्शन है । प्रश्न - १ - रयि - - प्राणात्माधिकरणम् - रयिप्राणात्मको महानात्मा पारमेष्ठ्यः प्रश्न - २ - धिषणा - प्राणात्माधिकरणम् - धिषणाप्राणात्मको विज्ञानात्मा सौरः प्रश्न- ३ – प्रज्ञा -- प्राणात्माधिकरणम् - प्रज्ञाप्राणात्मकः प्रज्ञानात्मा चान्द्रः प्रश्न- ४ – भूत --- प्राणात्माधिकरणम् - भूतप्राणात्मकः प्राणात्मा पार्थिवः प्रश्न- ५ – अव्यक्त - प्राणात्मा धिकरणम्ः --- अव्यक्त - प्रारणात्मकोऽव्यक्तात्मा स्वायम्भुवः जश्न - ६ – पुरुषात्माधिकरणम्- --- - पोडशकलावच्छिन्नः पुरुषात्मा समाप्ता चेयं प्रश्नोपनिषत् I B--३५ – मुण्डकोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय-५ - मुण्डकोपनिषत्- ( हिरण्यगर्भात्मक - अव्यय विशिष्ट - यक्षरात्मवर्णन परेयमुपनिषत् ) ( किंवा - विज्ञानात्मवर्णन परेयमुपनिषत् ) विज्ञानात्मप्रतिपादन द्वारा हिरण्यगर्भमूलक क्षर को प्रधान लक्ष्य बनाने वाली यह उपनिषत् ३ मुण्डको, तथा ६ खण्डों में विभक्त होती हुई ' क्षरविद्या ' नामक पराविद्या, एवं ' क्षरविधा ' नामक अपराविद्या का भी तास्विक विश्लेषण कर रही है । भौमस्वर्गव्यवस्था के, एवं भारतीय मानवधर्ममूलक वर्णाश्रम के श्रादि-घ्यवस्थापक, तर ' आदिमनु ' नाम से प्रसिद्ध भगवान् ' स्वयम्भू ' ब्रह्मा ने नित्यसिद्धा तत्त्वात्मिका अपौरुषेया १६५
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भाष्यभूमिका त्रयोविद्या के आधार पर जिस शब्दात्मिका त्रयीविद्या को जन्म दिया, बही ' ब्रह्मविद्या ' नाम से प्रसिद्ध हुई । इस विद्या के अक्षरानुगता पराविद्या, क्षरानुगता पराविद्या, ये दो विवर्त्त हुए । वेदविद्या पराविद्या कहलाई, अक्षरविद्य । पराविद्या कहलाई । उभयात्मिका वह ब्रह्मविद्या स्वयम्भू के औरसपुत्र अथर्वा में सर्वप्रथम प्रति-ठित हुई । अथर्वा ने देवस्वर्गनिवासी महर्षि अङ्गिरा को अपना प्रधान शिष्य बनाया । श्रङ्गिरा ने सत्यवाह-भरद्वाज में वह विद्या प्रतिष्ठित की । भरद्वाज ने भारतवर्षीय अङ्गिरा ऋषि में वह परावरा ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठित की । आगे जाकर ' महाशाल ' उपाधिलक्षण यशोनाम से विभूषित शौनक ने समित्पाणि होकर अङ्गिरा का शिष्यत्त्व स्वीकार किया । अङ्गिरा ने भी इस सत्पात्र के प्रश्नों का यथावत् समाधान करते हुए परावरा विद्या के उपदेश से शौनक को धन्य बनाया । वही परावग विद्या मुण्डकोपनिषत् का प्रतिपाद्य विषय है । पराविद्या वह विद्या है, जिससे शब्दातीत अक्षरतत्त्व का बोध होता है । अपराविद्या वह विद्या है, जिससे शब्दब्रह्म का तात्त्विकरूप अवगत होता है । अपराविद्यात्मिका वेदविद्या पूर्वसोपान है, पराविद्यात्मिका अक्षरविद्या पर सोपान है । दोनों की प्रतिष्ठा आधिदैविक जगत् में सूर्य्यात्मक हिरण्यगर्भप्रजापति, एवं आध्यात्मिक जगत् में तदंशरूप विज्ञानात्मा बन रहा है । परिभाषाप्रकरण में स्पष्ट किया गया है कि, स्वयम्भू से लोकसर्ग का आरम्भ है, एवं ( अस्मदादि की अपेक्षा ) पृथिवी पर लोकसर्ग की समाप्ति है । सूर्य्य इन दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित है, जैसाकि ' बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ' - ' मध्ये एकल एव स्थाता ' - ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्त पति ' - ' आदित्यो वै विश्वस्य हृदयम् ' इत्यादि निगमों से प्रमाणित है । ' सृष्टि, स्थिति, दृष्टि ' भेद से इस विश्वसृष्टि का तीन प्रकार से समन्वय किया जा सकता है | हम पृथिवी पर प्रतिष्ठित हैं । पहिले पृथिवी पर हमारी दृष्टि पड़ती है । पृथिवी से चन्द्रमा, चन्द्रमा से सूर्य्य, सूर्य्य से परमेष्ठी, सर्वान्त में स्वयम्भू, यही हमारा स्थूला रुन्धती - न्यायमूलक दृष्टिक्रम है । यही पृथिवीमूला ' दृष्टिविद्या ' है, जिसे ' प्रणवविद्या ' भी कहा गया है । उत्पत्तिक्रम ही सृष्टिक्रम है । इसमें पहिले स्वयम्भू, अनन्तर परमेष्ठ्यादि क्रम का विकास है । यही स्वयम्भमूला ' सृष्टिबिद्या ' है, जिमें ' ओङ्कार विद्या ' भी कहा गया है । उत्पन्न होने के अनन्तर जिस पर्व से सम्पूर्ण विश्व की स्वाभाविक स्थिति सुरक्षित रहती है, वही ‘ स्थिति ' मूल बनता हुआ स्थितिविद्या का आधार बन रहा है, और वह एकमात्र यही सूर्य्यात्मक हिरण्य— गर्भप्रजापति है । स्वयम्भू - परमेष्ठीयुग्म ' अमृता सृष्टि ' है, चन्द्रमा - पृथिवीयुग्म ' मर्त्यासृष्टि ' है, मध्यस्थ सूर्य्य उभय-धर्मात्मिका सृष्टि है । मध्यस्थ सूर्य्य से दोनों अनुगृहीत है, अतएव इसे हम स्थितिमूल मान सकते हैं । यही सूर्य्यमूलासृष्टि ' स्थितिविद्या ' है, जिसे ' उद्गीथविद्या ' भी कहा गया है । पञ्चपर्वात्मक वह ईश सर्वत्र व्याप्त है । स्वयम्भू इसका शिरोभाग है, उत्पत्तिलक्षण सृष्टिक्रम में यही प्रधान है । सूर्य्य इसका हृदय है, स्थिति-क्रम में यही प्रधान है । पृथिवी पाद - स्थानीया है, दृष्टिक्रम में यही प्रधान है । इसप्रकार सृष्टि, स्थिति, दृष्टि, भेद से सृष्टिपवों का स्वयम्भू, सूर्य, पृथिवी, तीनों से उपक्रम माना जा सकता है । १ – स्वयम्भूमूलासृष्टिः - - शिरोमूला – ' सृष्टि ' मूला - सृष्टिविद्या -- श्रोङ्कारविद्या २ - सूर्यमूलासृष्टि: - -- हन्मूला - - - ' स्थिति ' मूला - सृष्टिविद्या -- उद्गीथविद्या ३ - पृथिवीमूलासृष्टिः -- पादमूला — — ' दृष्टि ' मूला - सृष्टिविद्या - प्रणवविद्या १६६
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तृतीयखण्ड ' हिरण्मयेन सविता: ' – ' हिरण्मयेन पात्रे ० ' इत्यादि वचनों के अनुसार रुक्माभ सूर्य्य हिरण्यगर्भ हैं | अतएव तन्मूला विद्या ' हिरण्यगर्भ विद्या ' कहलाई है । स्वयम्भू - परमेष्ठी में अव्यय का प्राधान्य है, चन्द्रमा - पृथिवी में क्षर की प्रधानता है, मध्यस्थ सूर्य में मध्यस्थ इन्द्रानुगत मध्यस्थ अक्षर का विकास है । इसी अक्षरदृष्टि से प्रकृत उपनिषत् में हिरण्यगर्भमूला अक्षरविद्या का विश्लेषण हुआ है । ( १-१ ) -प्रथममुण्डक के प्रथम खण्ड में अक्षर से होने वाली सृष्टिविद्या का विश्लेषण हुआ है । विश्वानुत्रन्धी कार्य्यकारणभाव औद्भाविक, सान्तानिक, सांस्कृतिक, नैमित्तिक, औपपादिक, प्राकृतिक, पारि-णामिक, रसानुवृत्तिक, सांयौतिक, श्रीपादानिक, सांक्रामिक, ग्राक्रमिक, प्रातिभासिक, वैकल्पिक, ऐच्छिक, नोदनालक्षण, आदि भेद से अनेक भागों में विभक्त माना गया है । इन सब कार्य कारणाभावों का चार कार्य्य - कारणाभावों में अन्तर्भाव मानते हुए सृष्टि का निरूपण हुआ है । पृथिवी से ओषधियों का उत्पन्न होना, पुरुष से केशलोम का उत्पन्न होना, ऊर्णनाभि ( मकड़ी ) से तन्तु ( जाल ) का उत्पन्न होना, अग्नि से विस्फुलिंग ( अग्निकण - चिनगारी ) उत्पन्न होना, चारों ही उपादानात्मक कार्यकारणभाव हैं, परन्तु चारों के स्वरूप में विभेद है । तपोलक्षण कर्म्म से ब्रह्म का चयन होता है, चिते ब्रह्म से अन्नोत्पत्ति होती है, अन्न से ऊर्क द्वारा प्राण का विकास होता है, प्राणबल से मन उद्बुद्ध होता है, मानस विकास से सत्यात्मक विज्ञान ( बुद्धि ) विकसित होता है, सत्य से महदनुबन्धी लोक का विकास होता है, लोक से कम का उदय होता है । कर्म्ममय भौतिक विश्व में इन सम्पूर्ण सर्गों का एकमात्र प्रवर्त्तके अक्षरब्रह्म ही है । और यही प्रथममुण्डक के प्रथम-खण्ड का प्रधान प्रतिपाद्य विषय है । ( १-२ ) -- प्रथममुण्डक के द्वितीय खण्ड में अक्षर के आधार पर होने वाले क्षरात्मक, अष्टादशपर्वा--वच्छिन्न प्राकृतिक यज्ञतत्त्व का ही विश्लेषण हुआ है । यज्ञाधारभूत यज्ञाग्नि की सप्तजिह्वा का विश्लेषण भी इसी खण्ड का विषय है । आरम्भ में त्रेताग्नि से सम्बद्ध वितानयज्ञ का तात्त्विक विश्लेषण करते हुए अन्त में इसकी क्षररूपता का स्पष्टीकरण हुआ है । इसी अवर - क्षरधर्म के आधार पर सर्वान्त में ' प्लवा ह्येते अदृढ । यज्ञरूपाः ' कहते हुए कामनाप्रधान इस यज्ञकम् ' को अमृताक्षरप्राप्ति में प्रतिबन्धक मानते हुए श्रात्मोपासना ( ऋक्षरोपासना - निष्कामयज्ञानुगता ) का आदेश हुआ है । एवं यही इस खण्ड का संक्षिप्त प्रतिपाद्य विषय है । ( २ - १ ) - द्वितीय मुण्डक के प्रथम खण्ड में अक्षर के सर्वव्यापक विराट स्वरूप का प्रदर्शन हुआ । है अक्षरविभति- प्रदर्शन के साथ साथ अक्षर की स्वात्मानुगता निमित्तकारणता का, एवं प्राण - मन- शुभ्र--अज - नामक अव्ययात्मानुगता सर्वालम्बनता का विश्लेषण करते हुए ऋषि ने प्रसङ्गोपात्त अक्षरानुगत चेतन-सर्ग, प्राणसर्ग, ग्रोषधि - वनस्पतिसर्ग, धर्मसृष्टि, गुहाशयों में प्रतिष्ठित चतुर्द्धा विभक्त सप्तप्राण, सप्तार्चि, सप्तसमिध, सप्तहोम, सप्तलोक, अन्तः संज्ञासंज्ञसर्ग, आदि विराडक्षर की विराट् विभतियों का प्रतिपादन किया है । और यही इस खण्ड के संक्षिप्त प्रतिपाद्य विषय हैं । ( २--२ ) -- द्वितीय मुण्डक के द्वितीय खण्ड में महद्ब्रह्म के आधार पर प्रतिष्ठित, अतएव ' महद्ब्रह्म ' -कमज्ञरम् ' के अनुसार ' महदक्षर ' नाम से प्रसिद्ध अक्षरब्रह्म की उपासना का ( महदुपाधिदृष्टि से ) प्रकार १८७
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भाष्यभूमिका बतलाया गया है । उपासना - प्रकार प्रतिपादन के साथ साथ अक्षरानुगत श्रोङ्कार के तान्त्रिक स्वरूप का विश्लेषण करते हुए ऋषि ने इस ' परावर ' अक्षर की सर्वव्याप्ति का भी दिग्दर्शन कराया है । यव्यय - क्षरयुक्त अक्षर सर्वज्ञ - सर्व वित् - सर्वकर्म्ममूर्ति बनता हुआ विश्व का वरिष्ठ तत्त्व बन रहा है, और यही प्रस्तुत खण्ड का संक्षिप्त प्रतिपाद्य विषय है । ( ३।१ ) - तृतीय मुण्डक के प्रथम खण्ड में ईश्वरीय देवसत्य, तथा जीवात्मानुगत देवसत्य, इन दोनों से अनुगृहीत देवसत्याक्षरों के तात्त्विक स्वरूप का ही विश्लेषण हुआ है । परिभाषाप्रकरण में प्रतिपादित अश्वत्थ वृक्ष की पार्थिव शाखा पर दो सुपर्ण प्रतिष्ठित । एक साक्षी है, दूसरा भोक्ता है । साक्षी मुपर्ण ईश्वर है, भोक्ता सुपर्ण जीव है । अनृत, जिाता, माया, अविद्यादि पाप्माओं के सम्बन्ध से जीवाक्षर स्वात्म-विभति ( ईश्वराक्षर ) के सात्त्विक सहयोग से वञ्चित होता हुआ दुःख पाया करता है – ' अनीशया शोचति मुह्यमानः ' । जिस दिन जीवात्मा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान, ब्रह्मचर्य्य, वेदानुपालन, आदि व्रतों के अनुगमन से निर्धूतकत्मत्र बन जाता है, उसी दिन क्षीणदोष बनता हुआ, आत्मसंयम से - ' यति ' संज्ञा में परिणत होता हुआ यह जीवात्मा अन्तः शरीरस्थ ( हृदयाकाशस्थ दहराकाशस्थ ) उस ज्योतिर्म्मय - शुभ्र अक्षर - ब्रह्म के विभूति सम्बन्ध का सत्पात्र बन जाता है । और इस दशा में आकर यह विशुद्धसत्त्व जीव यथाकाम, यथा-चार, सत्यसंकल्प बन जाता है । भूतिकाम प्रत्येक गृहस्थी को ऐसे अक्षरवित् विद्वान् का सत्कार करना चाहिए । ( ३ ( २ ) -- तृतीय मुण्डक के द्वितीय खण्ड में प्रधानरूप से अक्षरप्रतिष्ठारूप परमधाम का विवेचन हुआ है । अक्षरप्राप्ति का क्या उपाय है?, अक्षर कहाँ प्रतिष्ठित है?, कौन अक्षर प्राप्त कर सकता है?, अक्षर प्राप्त्यनन्तर जीवसंस्था का कैसा स्वरूप हो जाता है?, अचीर्णव्रत का क्या स्वरूप है?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान करता हुआ प्रस्तुत खण्ड अक्षर पर ही लक्ष्य समाप्त कर रहा है । यही हिरण्यगर्भ है, यही अध्यात्म में विज्ञानात्मा है । अतएव मुण्डकोपनिषत् का प्रधान प्रतिपाद्य यही माना गया है । १ – अक्षरानुगत सृष्टि प्रपञ्चाधिकरणम् २ – अक्षर कृत यज्ञसृष्टिनिरूपणाधिकरणम् ३ – अक्षरात्मनो विराट्स्वरूपनिरूपणाधिकरणम् ४ – अक्षरोपासना प्रकार प्रदर्शनाधिकरणम् ५- देवसत्यात्मकाक्षरस्वरूपनिरूपणाधिकरणम् ६ -- अक्षरप्रतिष्ठानिरूपणाधिकरणम् १ मुण्ड के १ खण्ड: २ खण्डः " " २ मुरडके १ खण्डः २ खण्ड: " 9 ३ मुण्डके १ खण्ड: २ खण्ड: समाप्ता चेयं मुण्डकोपनिषत् ५ 86-१६८
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तृतीयखण्ड ३६ - माण्डूक्योपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय-( ६ ) –माण्डूक्योपनिषत् ( चतुष्पाद - प्रज्ञान ब्रह्मनिरूपणपरेयमुपनिषत् ) । लघुकायात्मिका इस उपनिषत् में प्रज्ञानब्रह्म के चार पदों के विश्लेषण के साथ साथ तत्समतुलित शब्दब्रह्म - लक्षण श्रोङ्कार के चार पदों का निरूपण हुआ है । ' श्रद्ध ' मात्रा, प्रकार, उकार, मकार ' इन चार पदों की समष्टि ओङ्कार है । ' अर्द्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत: ' ( सप्तशती ) के अनुसार सर्वालम्बनभूता, सर्वव्यापिका, परात्परसमतुलिता, अनुच्चार्य्या, नित्या मात्रलक्षणा मात्रा ' श्रद्ध ' मात्रा ' है । उच्चार्य्या - अनित्या - प्रयोगलक्षण - शब्दात्मिका अद्ध मात्रा से इस नित्या श्रद्ध ' मात्रा का कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसा कि सर्वसाधारण ने मान रखा है । भौतिकमात्रा ही मात्रा है । वह मर्त्य - भौतिक प्रपञ्च से श्रुतीत होती हुई श्रमात्रा है । जितना प्रदेश अकारादि तीन मृत्युमात्राओं नें घेर रक्खा है, उतना ही प्रदेश ( इन तीनों उपाधियों की दृष्टि से ) इस श्रमात्रतत्त्व ने घेर रक्खा है । एकमात्र इसी अभिप्राय से इस श्रमात्रतत्त्व को श्रद्ध मात्रा कह दिया जाता है । अमात्रतत्त्व अमृत है, मात्र लक्षण प्रकारादि मर्त्य हैं, दोनों की समष्टि ही श्रोङ्कार है । उभयात्मक यह ओङ्कार ' ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' के अनुसार आत्मोपासना की आधारभूमि है । इस अनुगम वचन का शतशः स्थलों में समन्वय हो रहा है, जैसाकि ' कठोपनिपद्विज्ञानभाष्य ' में प्रति-पादित उदाहरणों से स्पष्ट है । उदाहरण के लिए तीन चार उद्धरण यहाँ भी उद्धत कर दिए जाते हैं । इन तीनों में भी प्रत्येक पर्व स्व - स्व मृत मृत्युमात्राओं से प्रोङ्कार - सम्पत्ति से युक्त हो रहे हैं-* परात्परः -- अर्द्ध मात्रा १ अव्ययः - अकारः • अक्षरः - - उकारः ३ आत्मक्षरः - मकारः षोडशी - ओङ्कारः * - षोडशीपुरुषः-* १ –स्वयम्भूः - परमेष्ठी-२- सूर्य: --३ - पृथिवी - चन्द्रमा--- ' ओम् ' - इत्येवमात्मानमुपासीत ' - अर्द्ध मात्रा -- श्रकारः -- उकारः - मकारः ( तस्य वाचकः प्रणवः ) - ' ग्रोम् ' इत्येवमात्मानमुपासीत परब्रह्म -------- शब्दब्रह्म १६६
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* - हृदयस्थः षोडशीपुरुपः -1 प: - अर्द्ध मात्रा १- अव्यक्तः - महान् ——- अकारः भाष्यभूमिका २ - विज्ञानम् ---उकारः ' ओम् ' इत्येवमात्मानमुपगमीत ३- प्रज्ञानम् -- ~ -मकारः परब्रह्म ------ -शब्दब्रह्म - अव्यक्तः- महान् -- श्रद्ध मात्रा १ - विज्ञानम् ---- अकारः २- प्रज्ञानम् --उकारः -'ओम् ' इत्येवमात्मानमुपासीत ३- शरीरम् --मकारः परब्रह्म शब्दब्रह्म * — विज्ञानम् --श्रद्ध मात्रा - * १ – प्रज्ञानं, प्राज्ञः ——श्रकारः २- तैजसः---- उकारः -'ओम् ' इत्येवमात्मानमुपासीत ३ वैश्वानरः - मकारः परब्रह्म शब्दब्रह्म २००
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तृतीयखण्ड प्रकृत उपनिषत् में केवल ‘ प्रज्ञानब्रह्म ' की चार विभूतियों का ही प्रतिपादन हुआ है । चान्द्ररस से निष्पन्न होने वाला विज्ञानगत अक्षरचेतनायुक्त सर्वेन्द्रियमन ही प्रज्ञानात्मा है । स्तौम्य त्रिलोकी के त्रिवृत् स्थानीय पार्थित्र अग्निप्रधान रस से निष्पन्न होने वाला, ' चत्त्वार आत्मा, द्वौ पक्षौ, पुच्छं प्रतिष्ठा ' के अनुसार सप्त अग्निचिति के सम्बन्ध से सप्ताङ्ग, ५- ज्ञानेन्द्रिय, ५ -- कर्मेन्द्रिय, ५ - प्राण, १ -- मन, १ -- बुद्धि, १ - चित्त, १ - ग्रहङ्कार, इन १६ भोगसाधनों से एकोनविंशतिमुख, अर्थप्रधान अग्निप्राधान्य से स्थूलभुक्, अर्थ-विकास से बहिःप्रज्ञ तत्त्व ही ' वैश्वानर ' है । स्तौम्य त्रिलोकी के पञ्चदश - स्थानीय श्रान्तरीक्ष्य बायुप्रधान रस से निष्पन्न होने वाला, उक्त भोग-साधनों से एकोनविंशतिमुख्ख, प्रविविक्तभुक् तत्त्व ही ' तैजस ' है । एवं एकविंश- स्थानीय दिव्य इन्द्रप्रधान रस से निष्पन्न होने वाला, आनन्दभुक् तत्त्व प्राज्ञ है । सर्वाधार आनन्दघन तत्त्व ' प्रज्ञान ' है । महदनुगृहीत विज्ञान से नित्य - संपरिष्वक्त प्रज्ञानगत चिदंश का पहिले ' प्राज्ञ ' में, प्राज्ञ द्वारा तैजस में, तद्द्द्वारा वैश्वानर में आगमन होता है । वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ, तीनों की जाग्रदवस्था ' जाग्रदवस्था ' है । वैश्वानर की सुपुप्ति, तथा तैजस-प्राज्ञ की जागृति ‘ स्वप्नावस्था ' है । एवं तीनों की सुपुप्ति ' सुपुप्त्यवस्था ' है । वैश्वानर जाग्रदवस्था का, तैजस स्वप्नावस्था का, प्राज्ञ सुषुप्त्यवस्था का आधार है । वैश्वानर मकार है, तैजस उकार है, प्राज्ञ प्रकार है । ये तीनों मृत्यु - मात्रा उस तुरीय मात्र - प्रज्ञानब्रह्म पर प्रतिष्ठित हैं । मात्रामय त्रिमूर्ति भोक्ताद्वारा प्रज्ञानगत लक्षीभूत अक्षरप्राप्ति ही प्रकृदुपनिषन्निष्कर्ष है । - महद्विज्ञानगर्भितं प्रज्ञानं ब्रह्म- तुरीयम् — चेतोमुखः, आनन्दभुक् — तृतीयः पादः १- - प्राज्ञः -२ - तैजसः – एकोनविंशतिमुखः, सप्ताङ्गः, प्रविविक्तभुक् - द्वितीयः पादः ३ त्रैश्वानरः— " " 99 स्थूलभुक् - प्रथमः पादः अर्द्ध मात्रा अकारः ( मकारः ) उकारः ( उकारः ) मकार: ( अकार: ) समाप्ता चेयं माण्डूक्योपनिषत् ६ - * --३७ - तैत्तिरीयोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय-७ - तैत्तिरीयोपनिषत् - ( परावरब्रह्मविज्ञानवर्णनपरेयमुपनिषत् ) तैत्तिरीयोपनिषत् में - शिनावल्ली, ब्रह्मानन्द बल्ली, भृगुवल्ली, नामक तीन प्रधान प्रकरण हैं । प्रत्येक में क्रमश: १२, ६, १०, अनुवाक हैं । त्रि- वल्लीयुक्ता ३१ अनुवाकसमष्टि लक्षणा इस उपनिषत् में ' परावरब्रह्म ' का विश्लेषण करते हुए ऋषि ने ग्रानन्दमय व्यय की प्राप्ति का ही अक्षरद्वारा प्रतिपादन किया है । परब्रह्म ही अक्षरब्रह्म है, श्रवरब्रह्म ही शब्दब्रह्म है । प्रथमा वल्ली में इस शब्दब्रह्म का ही विवेचन हुआ है । अक्षरब्रह्म अव्यय - क्षर से विनाभूत है । इस त्रिमूर्ति, अतएव सर्वमूर्ति अक्षरब्रह्म के ' श्रात्मा-विश्व ' नामक दो मुख्य विवर्त्त हैं । स्वयं षोडशीपुरुष श्रात्मविवर्त्त ब्रह्म- सुब्रह्म की समष्टि विश्ववित है । २०१
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भाष्यभूमिका द्वितीया ब्रह्मानन्द - वल्ली में आत्मविवर्त्त ' का विश्लेषण हुआ है, तृतीया भृगुवल्ली में विश्वविब का स्पष्टी-करग्ण हुआ है । इन दोनों के गर्भ में सम्पूर्ण खण्डात्मक विवर्त ' प्रतिष्ठित है । अतएव उपनिषत् को गौणरूप से इन खण्डात्माओं का भी सक्षेप से निरूपण करना पड़ा है । इसप्रकार यह उपनिषत् एक प्रकार से ईशो निषत् से समतुलित होती हुई सर्वोपनिषत् बन रही है । प्रतिपाद्य विषयों का दो शब्दों में दिगदर्शन करा दिया जाता है. १ - शीक्षावल्ली ( शब्दब्रह्मप्रतिपादनपरा ) -( १ ) - प्रथमोऽनुवाकः-इस अनुवाक में शान्तिपाट का विधान हुआ है । शब्दब्रह्मा भिन्न परब्रह्म का प्रतिपादन करने वाली इस उपनिषत् ने सर्वप्रथम शब्दब्रह्म का ही माङ्गलिक स्मरण आवश्यक माना है । शब्दब्रह्म की प्रतिष्ठा इन्द्रतत्त्व है | शब्द में ' स्वर - वर्ण ' इन दो भावों का प्राधान्य है । स्वर का इन्द्र से सम्बन्ध है, वर्ण का अग्नि से सम्बन्ध है । इन्द्र सौर है, यही स्वरात्मिका बृहतीवाक् की प्रतिष्ठा है । अग्नि पार्थिव है, यही वर्णात्मिका अनुष्टुप् वाक् की प्रतिष्ठा है । अनुष्टुपू - लक्षणा वर्णवाक् बृहतीव । गूलक्षणा स्वरवाक् से नित्य अनुगृहीत रहती है । सूर्य्यस्थ मर्त्यभाग ही प्रवर्ग्याग्नि के द्वारा पृथिवीरूप में परिणत होता हुआ । वर्णसृष्टि की प्रतिष्ठा है, सूर्य्यस्थ अमृतभाग ही स्वात्मरूप ( इन्द्ररूप ) से स्वरसृष्टि का आलम्बन है । अमृत - मृत्युसंस्थान - लक्षण, शब्दब्रह्माधिष्ठाता सूर्य के समष्टि - व्यष्टिरूप से दो विवर्त्त माने गए हूँ । समष्टिविवर्त्त ं ‘ ब्रह्म ' है, व्यष्टिविवर्त्त बृहस्पति, इन्द्र, विष्णु, मित्र, श्रर्य्यमा, वरुण, इन भावों में विभक्त है । आरम्भ की त्रयी का सौर - अमृतभाग से, अन्त की त्रयी का सौर मर्त्यभाग से प्रधान सम्बन्ध है । सूर्य-ब्रह्म का मृत्युभाग ही अवस्थाभेद से तीन स्वरूपों में परिणत हो रहा है । सम्पूर्ण खगोल के ' मध्याह्न -मध्यरात्रि ' मेद से दो विभाग माने गए हैं । याम्योत्तर रेखा ( ध्रुवप्रोतवृत्त नाम की दक्षिणोत्तर वह रेखा, जो मध्याह्न - मध्यरात्रि का विभाजन करती है ) ही इन दो विभागों का मूल है । इस रेखा से विभक्त मध्यरात्रि से मध्याह्न तक का भचक्रखण्ड पूर्व कपाल है, शेष अखण्ड पश्चिम कपाल है । पूर्वकपालस्थ वही सौर तत्त्व मित्र है, पश्चिमकपालस्थ वही सौर तत्त्व वरुण है, एवं मध्यस्थ वही तत्त्व श्रर्य्यमा है । इन तीनों मर्त्यरूपों का क्रमशः त्रिवृत्, पञ्चदश, सप्तदश, स्तोमों से सम्बन्ध है । एवं इन्हीं से आध्यात्मिक मर्त्य विभाग सुरक्षित रहता है । ' अग्निर्वै देवानामवम विष्णुः परमः, तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' ( ऐतरेयब्राह्मण ) के अनुसार २१ शस्तोमस्थ वही श्रादित्यप्राण विष्णु है । पञ्चविंशस्थ वही प्राण ' इन्द्र ' ( सौम्यविद्य त् ) है, वही ‘ महाव्रत ’ है, यही ‘ अविवाक्यमहः ' है । ' बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' के अनुसार इन्द्रसंस्था से ऊपर २६. वें अहर्गण पर इस्त्री का अन्यतम वाङ्मयरूप बृहस्पति प्रतिष्ठित है I ये तीनों अमृतभाव - प्रधान बनते हुए आत्मोपकारक हैं । ' आत्मा - शरीर ' दोनों का श्रमृतमर्त्यत्रयी से सम्बन्ध है । दोनों की मङ्गल कामना अभीष्ट है । अतः व्यष्टि - समष्टिरूप से उन्हीं देवताओं की स्तुति की गई है । तै ० उ ० यजुर्वेदीया है । यजुः की मूलप्रतिष्ठा वायु है, वही इस यजुरुपनिषत् की प्रत्यक्ष देवता है । अतः अन्त में उसकी स्तुति हुई है । इसप्रकार प्रथम अनुवाक में वायुतत्त्वाधिष्ठित तैत्तिरीयने आत्म - शरीर-२०२
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तृतीयखण्ड विशिष्ट की मङ्गल कामना करते हुए समष्टि - व्यष्टिरूप से शब्द -- परब्रह्म - त्रिवर्ती की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है | इसप्रकार सम्पूर्ण उपनिषत् में अवान्तर विषयगर्भित तीन प्रधान विषयों का विश्लेषण हुआ है, जैसाकि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है— ? – प्रथमा - शीक्षावल्ली-शब्दह्मनिरूपणाधिकरणम् २ – द्वितीया -- ब्रह्मानन्दवल्ली- - आत्मविवर्त्तनिरूपणाधिकरणम् ३ – तृतीया- भृगुवल्ली-- विश्वविवर्त्तनिरूपणाधिकरणम १- प्रथमा - शीक्षावल्ली - तत्र द्वादशाधिकरणानि -१ – मङ्गल रहस्याधिकरणम् प्रथमोऽनुवाकः ( ११ ) । २ – वर्णमातृकारहस्याधिकरणम् द्वितीयोऽनुवाकः ( १।२ । ) । ३ – पदसंहितारहस्याधिकरणम तृतीयोऽनुवाकः ( १।३ । ) । ४ – शब्देन्द्ररहस्याधिकरणम् चतुर्थोऽनुवाकः ( 2181 ) 1 ५ - शब्दार्थव्याकृतिरहस्याधिकरणम पञ्चमोऽनुवाकः ( 8121 ) 1 ६ – इन्द्रयोनिरहस्याधिकरणस् षष्ठोऽनुवाकः ( १।६ । ) । ७ — पाङ्ग्ङ्क्तयज्ञरहस्याधिकरणम सप्तमोऽनुवाकः ( 8101 ) 1 = - - ओङ्कार र हस्याधिकरणम् मोऽनुवाकः ( ११ = | ) । ६ - ऋतसत्यरहस्याधिकरणम् नवमोऽनुवाकः ( 2181 ) 1 १०- - ब्रह्मतेजो रहस्याधिकरणम् दशमोऽनुवाकः ( १।१० । ) । ११ - स्वस्त्ययनकर्म्मरहस्याधिकरणम् एकादशोऽनुवाकः ( १।११ । ) । १२ - मङ्गलरहस्योपसंहाराधिकरणम् द्वादशोऽनुवाकः ( १।१२ । ) 1 इति - द्वादशाधिकरणात्मकं - शब्दब्रह्मनिरूपणाधिकरणम् । समाप्ता चेयं प्रथमा शीक्षावल्ली १ ऋ २०३
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भाष्यभूमिका २ - द्वितीया ब्रह्मानन्द वल्ली - तत्र अधिकरणानि-१ - बाग्नार हस्याधिकरणम् २ - प्राणमयब्रह्मरहस्याधिकरणम् ३- मनोमयन्ब्रह्मरहस्याधिकरणम् ४ - विज्ञानमयब्रहा रहस्याधिकरणम् ५- श्रानन्दमय ब्रहार इस्याधिकरणम् ६ - र सब्रह्मर हस्याधिकरणम् ७ - अक्षरब्रह्मरहस्याधिकरणम् प्रथमोऽनुवाकः ( २ । १ । ) । द्वितीयोऽनुवाकः ( २२ ) । तृतीयोऽनुवाकः ( २ | ३ || – श्रव्ययरहस्यम्
चतुर्थोऽनुवाकः ( २ । ४ । ) ॥
पञ्चमोऽनुवाकः ( २२५ । ) ॥
षष्ठोऽनुवाकः ( राधा ) । सप्तमोऽनुवाकः ( २ | ७ | ) | — अक्षर रहस्यम् = - अभयनहार इस्याधिकरणम् अष्टमोऽनुवाकः ( २ = 1 ) – परात्पररहस्यम् ६ - क्षरब्रह्मरहस्याधिकरणम् नवमोऽनुवाकः ( २ | ६ || - श्रात्मतर रहस्यम् इति - नवाधिकरणात्मकम् - आत्म विवर्त्तनिरूपणाधिकरणम् । समाप्ता चेयं द्वितीया ब्रह्मानन्दवल्ली ३ - तृतीया भृगुवल्ली - तत्र दशाधिकरणानि -समष्टिः- १ - भूतात्मरहस्याधिकरणम् प्रथमोऽनुवाकः ( ३ | १ | ) | ( समष्टिब्रह्म ) | श्रन्नादः - २ - पार्थित्रब्रह्मरहस्याधिकरणम् द्वितीयोऽनुत्राकः ( ३।२ । ) । ( अन्नमयं ब्रह्म - पृथिवी ) | अन्नम् -३ - चान्द्रब्रह्म रहस्याधिकरणम् तृतीयोऽनुवाकः ( ३।३ । ) । ( प्राणमयं ब्रह्म- चन्द्रमाः ) । वाक् —-४ - सौरब्रह्मरहस्याधिकरणम् चतुर्थोऽनुवाकः ( ३ | ४ | ) । ( मनोमयं ब्रह्म - सूर्य्यः ) । आपः -- ५ - पारमेष्ठ्यब्रह्मरहस्याधिकरणम् पञ्चमोऽनुवाकः ( ३ | ५ | ) | ( विज्ञानमयं ब्रह्म - परमेष्ठी ) । प्राणः -- ६ - स्वायम्भुवब्रह्मरहस्याधिकरणम् षष्ठोऽनुवाकः ( ३।६ | ) | ( श्रानन्दमयं ब्रह्म - स्त्रयम्भूः ) । ७- ब्रह्मव्रत रहस्याधिकरणम् = - प्रतिष्ठात्रह्म रहस्याधिकरणम् सप्तमोऽनुवाकः ( ३ । ७ । ) । अमोऽनुवाकः ( ३ = | ) | २०४